बीते रविवार (19-04-2026) को हम सबके सामूहिक प्रयास और आदरणीय महेश चन्द्र पुनेठा सर के प्रोत्साहन से सातवीं साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा का ऑनलाइन आयोजन सफल रहा, जिसमें निम्नलिखित पुस्तकों/रचनाओं/विषयों पर सार्थक चर्चा हुयी:




न हारा है इश्क़ और न दुनिया थकी है
दिया जल रहा है हवा चल रही है - ख़ुमार बाराबंकवी

अकेलेपन का डर हमें अक्सर हमारे जीवन को अन्य वस्तुओं से भरने
पर मजबूर कर देता है। वहीं से उन वस्तुओं के प्रति आसक्ति का जन्म
होता है, जिसके कारण हमें जीवन में न जाने कितना दुःख भोगना
पड़ता है। यदि इस डर को गहराई से समझा जाए तो जीवन सरल
और बोधपूर्ण हो जाएगा। यह किताब हमें उस डर के पार ले जाने का
एक प्रयास है। - अकेलापन और निर्भरता पुस्तक के कवर पृष्ठ से
उक्त परिचर्चा में निम्नलिखित पुस्तकसाथी शामिल रहे:
योगेश बिष्ट (किताबवाला दोस्त), अवनीश त्रिपाठी, हिमांशु जोशी, लाल बहादुर, अमितेन्द्र सिंह, कर्ण भाईजी(लिटरेरी लैंड), सौम्या मैम, सिद्धि तिवारी मैम, सचिन सिंह, शिवम राय, अंशुल, शोभित, आशुतोष, राजन वर्मा, आशुतोष श्रीवास्तव,अरविंद कुमार, गायत्री, प्रिया, दिव्याशु, लक्ष्मण जोशी, प्रिया जायसवाल, उर्मिला, उमा जायसवाल और लवकुश|

धन्यवाद ज्ञापन के साथ परिचर्चा के संचालक लवकुश कुमार ने परिचर्चा को अगली परिचर्चा तक के लिए विराम दिया |
पुस्तक परिचर्चा मे शामिल सभी पुस्तक साथियों (bookmates) ने पुस्तक परिचर्चा मे शामिल होकर/अभिव्यक्ति/सराहना/भागीदारी के माध्यम से इस पहल को पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा देने में, मानवीय मूल्यों के पोषण में, अपनी बात को बेहिचक रखने में महत्वपूर्ण माना एवं एक दूसरे के प्रति आभार व्यक्त किया ताकि इस जरूरी कार्य की नियमितता बनी रहे एवं समाज मे एक सकारात्मक बदलाव में अपना विनम्र योगदान सुनिश्चित किया जा सके |
इस आशा के साथ कि यह रिपोर्ट पाठकों को पुस्तक परिचर्चा को समझने और उसमे शामिल होने के लिए प्रेरित करेगी |
अगली परिचर्चा 26 अप्रैल को होगी, शामिल होकर पढ़ने-लिखने की संस्कृति पर काम करने में अपना योगदान सुनिश्चित करें।
धन्यवाद
-लवकुश कुमार