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सातवीं ऑनलाइन साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा 19-04-2026

बीते रविवार (19-04-2026) को हम सबके सामूहिक प्रयास और आदरणीय महेश चन्द्र पुनेठा सर के प्रोत्साहन से सातवीं साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा का ऑनलाइन आयोजन सफल रहा, जिसमें निम्नलिखित पुस्तकों/रचनाओं/विषयों पर सार्थक चर्चा हुयी:

  1. श्रीमद भगवद्गीता
  2. रेत की मछली - कान्ता भारती
  3. स्वामी – मनु भण्डारी
  4. महाभोज – मनु भण्डारी
  5. आपका बंटी - मनु भण्डारी
  6. चले साथ पहाड़ – अरुण कुकसाल
  7. तीन - अमित श्रीवास्तव , बचपन के पुराने किस्सों को याद करने के लिए पढ़िए यह उपन्यास
  8. अकेलापन और निर्भरता -  आचार्य प्रशांत
  9. The Secret - Rhonda Byrne

  • गीता में हैं जीवन के सूत्र
  • क्या हम वाकई जानते हैं की हमारी भलाई किसमे है ?

  • क्या हम जो भगवान से मांगते हैं, वह वाकई हमारी जरूरत होती है ?
  • कहीं हम समाज सेवा के बाद तारीफ की आकांक्षा तो नहीं रखते हैं ?
  • कहीं ऐसा तो नहीं है कि हम समाज के लिए करते कम और सोचते ज्यादा हैं ?

  • अच्छा काम कर रहे तो उसे जारी रखें, असर दिखेगा, खुद के काम पर विश्वास रखें तारीफ की आकांक्षा न रखें
  • अपने अधिकारों के लिए अपनी बात स्वयं रखेँ और किसी और का इंतज़ार न करें आपकी पैरवी के लिए
  • खुद के लिए खड़े हों और बहस से भी परहेज न करें

न हारा है इश्क़ और न दुनिया थकी है

दिया जल रहा है हवा चल रही है     - ख़ुमार बाराबंकवी

  • पितृसत्तात्मक व्यवस्था से स्त्री पुरुष दोनों को ही नुकसान
  • रिश्ते का आधार, परस्पर उन्नती, जीवन मे शांति और सहयोग
  • नई वाली हिन्दी ताकि ज्यादा से ज्यादा युवाओं को पढ़ने की संस्कृति से जोड़ा जा सके
  • सेक्स एजुकेशन की जरूरत ताकि जीवन के विभिन्न मुद्दों के आनुपातिक महत्व निर्धारित करना आसान हो सके और साथ ही जिज्ञासाओं को समुचित रूप से संबोधित करके, युवाओं को किसी भी भ्रामक स्रोत से बचाया जा सके  
  • दूसरों पर नियंत्रण करने की इच्छा ने इंसान को स्वयं भी गुलाम बनाया है
  • पहाड़ों की दिक्कतों को पुस्तकों के जरिये शब्द मिले
  • जब दिक्कतें और आकांक्षाएँ व्यक्त की जाती हैं तो नीति निर्माताओं के लिए आसानी होती है और नीतियाँ प्रासंगिक बनती हैं
  • यदि आपको शिकायत है कि लोग आपकी बात समझ नहीं पाते तो आपको स्वयं भी साहित्य अध्ययन करना चाहिए और औरों को भी इसके लिए प्रोत्साहित करना चाहिए ताकि खुद की बात को समझाना और दूसरों की बात को समझने के लिए आपको समुचित समझ मिल सके पृष्ठभूमि की |
  • अगर हम समझा नहीं पा रहे तो संभव है कि हम खुद ही अच्छे से नहीं समझे अभी
  • अकेलेपन से डरने वाला इंसान सामाजिक गुलाम बनता है – आचार्य प्रशांत

अकेलेपन का डर हमें अक्सर हमारे जीवन को अन्य वस्तुओं से भरने

पर मजबूर कर देता है। वहीं से उन वस्तुओं के प्रति आसक्ति का जन्म

होता है, जिसके कारण हमें जीवन में न जाने कितना दुःख भोगना

पड़ता है। यदि इस डर को गहराई से समझा जाए तो जीवन सरल

और बोधपूर्ण हो जाएगा। यह किताब हमें उस डर के पार ले जाने का

एक प्रयास है।   - अकेलापन और निर्भरता पुस्तक के कवर पृष्ठ से 

 

उक्त परिचर्चा में निम्नलिखित पुस्तकसाथी शामिल रहे:

योगेश बिष्ट (किताबवाला दोस्त), अवनीश त्रिपाठी, हिमांशु जोशी, लाल बहादुर, अमितेन्द्र सिंह, कर्ण भाईजी(लिटरेरी  लैंड), सौम्या मैम, सिद्धि तिवारी मैम, सचिन सिंह, शिवम राय, अंशुल, शोभित, आशुतोष, राजन वर्मा, आशुतोष श्रीवास्तव,अरविंद कुमार, गायत्री, प्रिया, दिव्याशु, लक्ष्मण जोशी, प्रिया जायसवाल, उर्मिला, उमा जायसवाल और लवकुश|

 

धन्यवाद ज्ञापन के साथ परिचर्चा के संचालक लवकुश कुमार ने परिचर्चा को अगली परिचर्चा तक के लिए विराम दिया |

पुस्तक परिचर्चा मे शामिल सभी पुस्तक साथियों (bookmates) ने पुस्तक परिचर्चा मे शामिल होकर/अभिव्यक्ति/सराहना/भागीदारी के माध्यम से इस पहल को पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा देने में, मानवीय मूल्यों के पोषण में, अपनी बात को बेहिचक रखने में महत्वपूर्ण माना एवं एक दूसरे के प्रति आभार व्यक्त किया ताकि इस जरूरी कार्य की नियमितता बनी रहे एवं समाज मे एक सकारात्मक बदलाव में अपना विनम्र योगदान सुनिश्चित किया जा सके |

इस आशा के साथ कि यह रिपोर्ट पाठकों को पुस्तक परिचर्चा को समझने और उसमे शामिल होने के लिए प्रेरित करेगी |

अगली परिचर्चा 26 अप्रैल को होगी, शामिल होकर पढ़ने-लिखने की संस्कृति पर काम करने में अपना योगदान सुनिश्चित करें।

 

  धन्यवाद 

-लवकुश कुमार