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अंतिम दृश्य (कहानी) - विशाल चंद

बरसों बाद शहर से छुट्टियाँ बिताने आया नाती शुभम अपने बूबू (दादाजी) के साथ खेतों की ओर निकल पड़ा ।

 

रास्ते में एक के बाद एक बंद पड़े मकानों पर ताले लटके थे। कहीं टूटी छतों पर घास उग आई थी तो कहीं आँगन में झाड़ियां अपनी मर्ज़ी से बढ़ रही थी। पूरे गाँव में ऐसा सन्नाटा था कि दूर बहते गधेरे की आवाज़ भी साफ़ सुनाई दे रही थी।

 

नाती ने धीरे से पूछा,

"बूबू, इतने सारे घर खाली क्यों हैं? क्या यहाँ कोई नहीं रहता?"

बूबू कुछ क्षण चुप रहे। उनकी आँखें उन बंद दरवाज़ों पर टिक गईं, जिनके पीछे कभी जीवन बसता था।

 

उन्होंने लंबी साँस ली और बोले,

"नाती, ये घर खाली नहीं हैं... इनमें यादें रहती हैं। यहाँ कभी हँसी रहती थी, त्योहार रहते थे, खेतों की खुशबू रहती थी। अब बस ताले रह गए हैं।"

 

दोनों धीरे-धीरे खेतों की ओर बढ़ने लगे। बूबू ने दूर फैले सीढ़ीनुमा खेतों की ओर इशारा करते हुए कहा,

 

"जब मैं तेरी उम्र का था, तब इन खेतों में मंडुवा, कौदा, झंगोरा, जौ और गेहूँ इतना होता था कि साल भर किसी चीज़ की कमी नहीं रहती थी। कटाई के दिनों में पूरा गाँव एक परिवार बन जाता था।"

 

नाती ने चारों ओर देखा। अधिकांश खेत झाड़ियों से ढके थे। "अब खेती क्यों नहीं होती, बूबू?"

 

बूबू मुस्कुराए, लेकिन वह मुस्कान भीतर के दर्द को छिपा नहीं सकी

"खेती करने वाले ही कहाँ बचे, नाती? पहले जंगली सूअर रात में फसल का थोड़ा-बहुत नुकसान करते थे। अब बंदर, लंगूर, हिरण और दूसरे जंगली जानवर मिलकर पूरी मेहनत उजाड़ देते हैं। ऊपर से पढ़े-लिखे लड़कों को गाँव में काम नहीं मिलता। पेट की आग उन्हें शहर ले जाती है।"

 

कुछ दूर चलने के बाद एक कच्ची सड़क दिखाई दी।

नाती ने पूछा,

"बूबू, यह सड़क कब बनी?"

बूबू की आँखों में हल्की-सी चमक आई।

"यह सड़क सरकार ने नहीं बनाई थी बेटा... इसकी शुरुआत गाँव वालों ने की थी। हर घर से जिसने जितना बन पड़ा, उतना चंदा दिया। जिसके पास पैसे नहीं थे, उसने अपने हाथों का श्रम दिया। महीनों तक हम सबने गैंती और फावड़े से पहाड़ काटा। उस दिन लगा था कि अब हमारे बच्चे लौट आएँगे।"

 

"फिर लौटे क्यों नहीं?" शुभम ने पूछा 

यह सुनकर बूबू कुछ देर तक चुप रहे।

फिर बोले,

"सड़क से रास्ता बनता है बेटा... ज़िंदगी नहीं। ज़िंदगी के लिए रोज़गार चाहिए, अस्पताल चाहिए, अच्छे स्कूल चाहिए और ऐसी खेती चाहिए जिसमें किसान की मेहनत बची रहे। जब तक ये सब नहीं होगा, तब तक सड़क गाँव तक तो पहुँच जाएगी, लेकिन गाँव के बच्चे वापस नहीं पहुँच पाएँगे।"

 

दोनों खेत की मेड़ पर बैठ गए।

सामने डूबता सूरज पहाड़ों के पीछे उतर रहा था। हवा में पहाड़ की हल्की-सी खुशबू थी लेकिन उस खुशबू में एक अनकहा दर्द भी घुला हुआ था।

 

नाती ने धीरे से बूबू का हाथ पकड़ लिया।

"बूबू... क्या मैं बड़ा होकर इस गाँव में रह सकता हूँ?"

बूबू ने उसके सिर पर हाथ फेरा। उनकी आँखें भीग चुकी थीं

"रहना नाती... लेकिन मजबूरी में नहीं, अपनी मर्ज़ी से। ऐसा पहाड़ बनाना कि किसी को अपना गाँव छोड़ना ही न पड़े।"

सूरज पूरी तरह पहाड़ के पीछे छिप चुका था।

घर लौटते समय बूबू ने एक बार फिर पीछे मुड़कर गाँव को देखा। बंद घर वैसे ही खड़े थे, जैसे बरसों से किसी अपने का इंतज़ार कर रहे हों और नाती पहली बार समझ रहा था कि पलायन केवल गाँव छोड़ने का नाम नहीं बल्कि उन आँखों का दर्द है जो हर शाम लौटते कदमों की राह देखती हैं।

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लेखक की टिप्पणी

यह कहानी मेरे द्वारा वर्ष 2021 में लिखे गए ब्लॉग लेख "उत्तराखंड में पलायन और मेरा गांव" से प्रेरित है। उस समय उठाए गये पलायन के प्रश्नों को इस कहानी के माध्यम से एक नए साहित्यिक रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है। कहानी के पात्र और घटनाएँ काल्पनिक हैं किन्तु इसके सामाजिक संदर्भ वास्तविक अनुभवों और अवलोकनों से जुड़े हैं।


विशाल चन्द जी समाजशास्त्र के शोधार्थी, पाठक और संवेदनशील शिक्षार्थी हैं। नवीन ज्ञान अर्जन और सतत सीखना आपके व्यक्तित्व का अभिन्न हिस्सा है। पुस्तकों का पठन और संग्रहण आपको विशेष प्रिय है।

आपके भीतर एक घुमक्कड़ चेतना भी सक्रिय है, जो आपको नए लोगों, स्थानों और अनुभवों से जोड़ती रहती है। बागवानी आपके लिए प्रकृति से संवाद का माध्यम है।

आप समाज को अपने स्वतंत्र दृष्टिकोण से देखने और विभिन्न समूहों के साथ मिलकर सामाजिक दायित्वों के निर्वहन को निरंतर प्रयासरत रहते हैं।


जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना आपके जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट ।

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अधूरी उड़ान (कहानी): स्त्री विमर्श - विशाल चंद

"चेली, अगले रविवार को लोग तुझे देखने आ रहे हैं।"

रसोई में आटा गूँधते हुए माधवी के हाथ एक पल के लिए रुक गए। उसने धीरे से ईजा की ओर देखा। ईजा की नज़रें झुकी हुई थीं, जैसे यह बात कहते हुए वे स्वयं भी भीतर से टूट रही हों।

"लेकिन ईजा... मैं अभी पढ़ना चाहती हूँ।" 

ईजा ने बस इतना कहा—"सब ठीक हो जाएगा चेली... शादी के बाद भी पढ़ाई कर लेना।"

माधवी हल्का-सा मुस्कुराई। वह जानती थी कि यह मुस्कान केवल उसके चेहरे पर थी, मन में नहीं।

 

उस छोटे-से पहाड़ी गाँव में लड़कियों के सपनों की उम्र अक्सर बारहवीं की परीक्षा तक ही मानी जाती थी।

कुछ ही दिन पहले बोर्ड परीक्षा का परिणाम आया था।

"रिजल्ट आ गया?" पड़ोस की चाची ने आँगन से आवाज़ लगाई।

 

माधवी ने धीरे से सिर झुका दिया।

"एक विषय में रह गई..."

 

बस इतना सुनना था कि घर का माहौल बदल गया। ईजा (मां) चुप रहीं। बौजू(पिताजी) देर तक कुछ नहीं बोले। लेकिन शाम होते-होते अम्मा की आवाज़ पूरे आँगन में गूँज उठी— "अब पढ़ाई-लिखाई बहुत हो गई। चेली जवान हो गई है। कोई अच्छा लड़का देखो। पढ़-लिखकर कौन-सा कलेक्टर बनना है?"

 

उस दिन माधवी ने पहली बार महसूस किया कि परीक्षा में असफल होने से भी बड़ा डर उसके सामने खड़ा है—कहीं उसकी शादी तय न कर दी जाए और वही हुआ।

 

अगले ही सप्ताह दो रिश्तेदार घर आए। उनके हाथ में मिठाई का डिब्बा था और बातों में एक सरकारी नौकरी में कार्यरत लड़के का ज़िक्र। किसी ने माधवी से नहीं पूछा कि वह क्या चाहती है। उससे केवल इतना कहा गया—

"चेली, मेहमानों के लिए चाय बना दे।"

 

चाय की ट्रे लेकर जब वह कमरे में पहुँची तो उसे लगा जैसे वहाँ उसकी नहीं। उसके भविष्य की कीमत तय की जा रही हो।

 

रिश्तेदार जाते-जाते बौजू से कह गए— "ऐसे रिश्ते बार-बार नहीं मिलते। फ़ौज में नौकरी है। चेली की ज़िंदगी बन जाएगी।"

 

अम्मा कई महीनों से एक ही बात दोहराती थीं— "मरने से पहले अपनी पोती का ब्याह अपनी आँखों से देख लूँ, फिर भगवान जब चाहे बुला ले।" बौजू चुप रहते। ईजा की आँखें भर आतीं और माधवी... वह बस सब सुनती रहती।

 

वह पढ़ना चाहती थी। उसका सपना था कि वह अध्यापिका बने। उसे लगता था कि शिक्षा केवल नौकरी पाने का साधन नहीं बल्कि अपने पैरों पर खड़े होने और अपने जीवन के फैसले स्वयं लेने की ताक़त भी देती है। लेकिन गाँव में आज भी यह मान लिया जाता था कि चेली की सबसे बड़ी मंज़िल उसकी शादी है।

 

कुछ दिनों बाद बौजू ने धीरे से कहा— "माधवी, लड़का अच्छा है। सरकारी नौकरी करता है। हमें लगता है कि यही ठीक रहेगा।"

 

माधवी बहुत देर तक खिड़की से पहाड़ों को देखती रही। सामने दूर तक फैले चीड़ और बांज के जंगल हवा के साथ झूम रहे थे। उसे लगा जैसे पहाड़ों के ऊपर उड़ते पक्षी उससे पूछ रहे हों—"क्या सपनों की भी कोई उम्र होती है?"

 

उसने चाहा कि एक बार कह दे— "मैं अभी शादी नहीं करना चाहती। मैं पढ़ना चाहती हूँ।"लेकिन शब्द गले में ही अटक गए। शायद इसलिए कि वह जानती थी—उसके एक "ना" के सामने अम्मा की आख़िरी इच्छा, ईजा की मजबूरियाँ, बौजू की सामाजिक चिंता और रिश्तेदारों की सलाह खड़ी थी।

 

धीरे-धीरे शादी की तैयारियाँ शुरू हो गईं। कॉलेज की फीस के लिए जो पैसे उसने बचाकर रखे थे, उन्हीं पैसों से उसके लिए शादी की साड़ी खरीदी गई।

 

रिश्तेदार आते और कहते— "चेली भाग्यशाली है। फ़ौजी लड़का मिला है।" अब इससे अच्छा रिश्ता कहाँ मिलेगा?

 

हर कोई उसकी किस्मत की बातें कर रहा था, लेकिन किसी ने उसके सपनों के बारे में नहीं पूछा। 

शादी का दिन आ गया। मंडप में मंत्र गूँज रहे थे। अग्नि साक्षी थी। रिश्तेदार मुस्कुरा रहे थे। तभी उसकी दोस्त लक्ष्मी ने पूछा— तू इस विवाह से खुश तो हैं न ? 

 

माधवी ने सामने देखा। अम्मा के चेहरे पर संतोष था।

ईजा की आँखों में आँसू थे।

बौजू के चेहरे पर वर्षों की चिंता उतरती दिखाई दे रही थी।

 

उसने धीमे से कहा— "हाँ..."

 

उस एक शब्द के साथ सबके चेहरे खिल उठे। लेकिन किसी ने यह जानने की कोशिश नहीं की कि वह "हाँ" उसकी इच्छा थी या परिस्थितियों के आगे उसका मौन समर्पण।

 

समय बीत गया।

 

एक दिन माधवी अपनी छोटी-सी चेली को स्कूल छोड़ने जा रही थी। पहाड़ की वही पगडंडी थी, वही चीड़ के पेड़ और वही सुबह की धूप।

 

रास्ते में चेली ने मासूमियत से पूछा— "ईजा, मेरी शादी भी आप लोग ही तय करोगे?"

 

माधवी कुछ पल के लिए ठिठक गई। उसने अपनी चेली का हाथ थामा और मुस्कुराकर कहा— "नहीं चेली। शादी तेरी होगी, इसलिए फैसला भी तेरा होगा। हमारा काम तुझे समझाना होगा, तेरे लिए फैसला लेना नहीं।"

 

चेली मुस्कुरा दी और आगे दौड़ गई।

 

माधवी वहीं खड़ी पहाड़ों की ओर देखने लगी। उसे लगा कि उसकी अपनी उड़ान भले ही अधूरी रह गई हो, लेकिन अब उसकी चेली के पंख कोई नहीं काट पाएगा

 

शायद बदलाव ऐसे ही शुरू होता है—जब एक पीढ़ी अपने हिस्से का दर्द अगली पीढ़ी को विरासत में देने से इनकार कर देती है।

 

विशाल चन्द  @reading_owl.3

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 लेखक की टिप्पणी

 

यह कहानी मेरे द्वारा वर्ष 2021 में लिखे गए ब्लॉग लेख "लड़की, विवाह और सहमति" से प्रेरित है। उस समय उठाए गए सामाजिक प्रश्नों को इस कहानी के माध्यम से एक नए साहित्यिक रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है। कहानी के पात्र और घटनाएँ काल्पनिक हैं, किन्तु इसके सामाजिक संदर्भ वास्तविक अनुभवों और अवलोकनों से जुड़े हैं।

यदि यह कहानी पाठकों को विवाह में सहमति, शिक्षा और बेटियों के सपनों पर एक बार फिर सोचने के लिए प्रेरित करे, तो इसका उद्देश्य सार्थक होगा।


विशाल चन्द जी समाजशास्त्र के शोधार्थी, पाठक और संवेदनशील शिक्षार्थी हैं। नवीन ज्ञान अर्जन और सतत सीखना आपके व्यक्तित्व का अभिन्न हिस्सा है। पुस्तकों का पठन और संग्रहण आपको विशेष प्रिय है।

आपके भीतर एक घुमक्कड़ चेतना भी सक्रिय है, जो आपको नए लोगों, स्थानों और अनुभवों से जोड़ती रहती है। बागवानी आपके लिए प्रकृति से संवाद का माध्यम है।

आप समाज को अपने स्वतंत्र दृष्टिकोण से देखने और विभिन्न समूहों के साथ मिलकर सामाजिक दायित्वों के निर्वहन को निरंतर प्रयासरत रहते हैं।


जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना आपके जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट ।

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प्रस्फुटन (कहानी) - शीतल भट्ट

"एक मजेदार कक्षा के साथ, सीखने, खुलने, निखरने और बेहतरी के सफर पर एक संकोची लड़की के एक मुखर व्यक्ति बनने की कहानी" 

 

शालिनी बहुत ही चुपचुप रहने वाली लड़की है। पहले वह स्कूल में अक्सर अपना सिर नीचे ही रखती,वह कभी सवाल नहीं करती थी। समझ न आने में सर को बताती नहीं थी कि उसे समझ नहीं आ रहा है। उसके लिए स्कूल जाना सबसे बोझिल कामों में से एक था। स्कूल और वहां के माहौल ने उसकी तरफ कभी कोमल हाथ नहीं बढ़ाया, बचपन से ही टीचर के लिए डर और अपने साथियों द्वारा उसका मजाक बनाए जाने का ऐसा असर हुआ कि स्कूल उसके लिए किसी यातना शिविर सा बन गया।

वह हमेशा दबाव में रहती, डर उसके ऊपर इतना हावी हो गया था कि वह हमेशा डरी-डरी रहती। ऐसा करते-करते शालिनी ने आठवीं पास कर लिया। वह घर में बहुत खुश रहती, वहां वह सहज हो पाती। मां के साथ घर के काम में हाथ बटाती। स्कूल से आते ही मां को खोजते हुए खेतों में पहुंच जाती थी।

शालिनी को लगता स्कूल जाने से अच्छा यह होता कि वह अपनी मां के साथ घर और खेतों का काम कर पाती। लेकिन स्कूल तो जाना ही था,उससे बचना नामुमकिन सा था। अब उसका दाखिला बड़े स्कूल में हो गया। वह नौवीं में पहुंच गई थी। तमाम तरह की शंकाएं और उस स्कूल के बारे में सुनी बातें उसे रह रहकर डराती। वही डर में वह खुद को फिर से सहमा हुआ पाती जहां से वह अभी अच्छी से निकली भी नहीं थी। नया स्कूल सच में बड़ा था ,वहां बहुत सारे बच्चे थे। टीचर भी बहुत सारे।यह नजारा उसके लिए आश्चर्यजनक करने वाला रहा।

एक दिन उन्हें कक्षा में एक अध्यापक पढ़ाने आएं। सोमेश सर ,जो उन्हें सामाजिक विज्ञान पढ़ाते थे। पहली बार तो वह सर के व्यवहार को देखकर अचंभित हो गई कि कोई अध्यापक ऐसा भी हो सकता है। वह बच्चों से लगातार प्रश्न पूछने को कह रहे थे। बिना किसी डर के वह पहली कक्षा थी जहां शालिनी को राहत सी महसूस हुई।

सोमेश सर ने बहुत सारी बातें बताई। किताबें,समाज और साथ में स्कूल के पुस्तकालय की भी। शालिनी ने आज तक अपने जीवन में पुस्तकालय नहीं देखा था। सच बात तो यह थी कि पाठयपुस्तक के अलावा उसने कोई किताब देखी ही नहीं थी। सोमेश सर के मृदु और बच्चों के साथ दोस्ताना व्यवहार का यह असर होने लगा कि शालिनी दबे पांव पुस्तकालय का रुख करने लग गई। वह सहमी सी जाती थी,एक कोने में जाकर बैठ जाती थी। उसके लिए वह पुस्तकालय किसी अजूबे से कम न था।टेबल पर बहुत सारी पत्रिकाएं बिखरी हुई थी। अलमारियों में बहुत करीने से किताबें लगी थी

दीवारों में बच्चों के हाथों से लिखे हुई कुछ लंबे से पोस्टर टंगे हुए थे। बाद में सर ने बताया कि यह दीवार पत्रिका है। जो वहां के बच्चों ने स्वयं बनाई है। इसमें कुछ भी लिख सकते हो,जिसे किसी किताब से नहीं उतारना बल्कि अपने भीतर की दुनिया में जो चल रहा है उसे कागज में उतारना है,बिना किसी संकोच के। उसे पहली बार महसूस हुआ कि बच्चों को भी स्कूल में सम्मान दिया जाता है। यहां कुछ न आने पर सिर्फ उन्हें मारा या डांट नहीं लगाई जाती बल्कि उनके हिस्से की दुनिया रचने की आजादी भी दी जाती है।

इस तरह से शालिनी सर के साथ धीरे धीरे घुलने मिलने लग गई। अब वह सर के सामने वाली बेंच में बैठी रहती। इंटरवल होते ही पुस्तकालय आ जाती। पत्रिकाएं पढ़ती। यह उसका पसंदीदा काम होने लगा। सोमेश सर के पढ़ाने का अंदाज सबसे निराला था। उनके कक्षा में सन्नाटा कभी भी जगह नहीं ले पाया,वहां बच्चों की हंसी, बच्चों के प्रश्न और विषय से संबंधी किसी बात पर अपनी बात रखते बच्चों का शोर कक्षा को जीवन्त बनाएं रखता था।हर किसी की बात सुनी जाती, बहुत बार तो ऐसा होता कि बच्चे सर की बात से सहमत नहीं होते, उसके एवज में स्वयं तर्क करने लगते, फिर भी पूरा माहौल खुशनुमा बना रहता। यह सब शालिनी को भीतर ही भीतर गुदगुदाता । उसने आज तक ऐसा दृश्य न देखा था न कभी कल्पना की थी। उसने एक ऐसे अध्यापक की कल्पना किसी सपने में भी नहीं की थी। उसका बालमन सर की तरफ आकर्षित होता जा रहा था। वह सोमेश सर ही थे जो उसे हर वक्त लाइब्रेरी में मिलते। शालिनी का यह पहला परिचय था पुस्तकों से। उसे किताबों की रंग बिरंगी दुनिया अपनी सी लगती। वहां कोई उसे उसकी कमजोरी से नहीं आंकता था, बल्कि अपनी क्षमताओं से मिलाता।सोमेश सर बच्चों के विचार व्यक्त करने और पढ़ने के बहुत पक्ष में रहते,यही कारण था कि बच्चों की चहलकदमी सर के आस पास बनी रहती।

एक दिन शालिनी इंटरवल में लाइब्रेरी में बैठी थी, तब ही स्कूल में बनने वाली दीवार पत्रिका के लिए नए संपादक मंडल का चुनाव हो रहा था। सर ने शालिनी से भी पूछा कि क्या वह भी संपादक मंडल की सदस्य बनना चाहेगी।सर के सामने वह सिर्फ हां बोल पाई थी। लेकिन उसकी खुशी का ठिकाना नहीं था। उसे लगा हां यही तो चाहती थी वो। उसके बाद उसका लेखन शुरू हो गया। जिसे सोमेश सर ने काफी सराहना शुरू किया। इसका असर यह होने लगा कि सर की कक्षा में उसका डर निकलने लगा। वह सभी चीजों में बढ़ चढ़ के प्रतिभाग करने लगी। सर के सिखाने का ही तरीका था कि उसके भीतर कभी गौरवबोध नहीं आया। सोमेश सर सभी बच्चों को एक समान मानते। किसी को सिर्फ इसलिए तवज्जो नहीं देते थे कि वह अच्छा बोलता है या पढ़ने में अच्छा है। वह बच्चों की तरफ से आने वाली शिकायत में भी तटस्थ बने रहते। उन्हें कभी शालिनी ने किसी की तरफदारी करते नहीं सुना। हालांकि वह बच्चों के लेखन को सार्वजनिक रूप से सराहते। शालिनी को अब पढ़ने में आनंद आने लगा,सामाजिक विषय उसका पसंदीदा विषय बन गया। उसे सोमेश सर के पढ़ाने का बेसब्री से इंतजार रहता।वह एक दिन भी घर में नहीं रहती,रोज स्कूल में जाती,अब वह पहले से ज्यादा चीजों को सीखने की कोशिश करती।

शालिनी धीरे धीरे आत्मविश्वास से भरने लगी थी। वह किसी न किसी बहाने से सर के आस पास रहती,उनसे बातें करती। सर का स्नेह ही था जो उसे सीखने को प्रेरित कर रहा था।अब उसने अपने आस पास समाज को ज्यादा  बारीकी से देखना शुरू कर दिया। सर ने उसकी यह भ्रांति भी तोड़ी कि सिर्फ स्कूल की चारदीवारों के भीतर और पाठयपुस्तकों से ही सीखा जाता है। वह किताब को समाज से जोड़कर पढ़ाया करते थे। उनमें अक्सर गांव के गरीब व्यक्ति की कहानी, सस्ते गल्ले की दुकान वाले का इंटरव्यू , अगर आप प्रधानमंत्री बन गए तो क्या करोगे, इस तरह के विषय शामिल रहते। इन सबको वह बड़ी ईमानदारी से करती।

उसे सर को दिखाने का उतावलापन रहता, उसने कैसा लिखा है करके। स्कूल पहुंचकर वह सबसे पहले लाइब्रेरी की ओर देखती कि सर आएं हैं या नहीं। जो विषय आज तक उसे रटने वाला और उबाऊ लगता था उसे सोमेश सर ने सबसे मजेदार बना दिया था। स्कूल अब उसके लिए दबाव नहीं बल्कि उत्सुकता का केंद्र बन गया। सोमेश सर उसकी जिंदगी में न आएं होते तो उसके जीवन में जो यह बदलाव आ रहे थे ,वह कभी नहीं आ पाते। उसने अब लोगों की बातों को नजरअंदाज करना सीख लिया था। वह बाकी विषयों में भी ध्यान लगाने लगी थी। 10वीं में वह अच्छे अंकों से पास हो गई थी। जबकि उसके घर वालों को यह डर था कि कहीं वह फेल न हो जाएं। विषय में रुचि बढ़ने के कारण उसने 11वीं में भी मानविकी विषय लिए। जिसके लिए उसे घर में भी काफी संघर्ष करना पड़ा। घर वाले चाहते थे लड़की साइंस ले, लेकिन दिल तो मानविकी विषयों में अटक गया था।

जबरदस्ती वो विज्ञान पढ़ भी नहीं पाती। फिर भी कुछ दिन विज्ञान पढ़ने गई, एकदम वह उदास पड़ने लग गई। सोमेश सर की कक्षा उसे रह रहकर याद आती,उसका वहां न होने का विचार उसे उदास कर जाता। उसने किसी से बात करना छोड़ दिया था। घर में भी किसी से बात नहीं करती थी। एक दिन हताश होकर वह स्कूल से जाते ही बिस्तर में जाकर सो गई, कंबल के अंदर मुंह छिपाकर रोती रही। उस रात घर वालों के बहुत मनाने पर भी उसने खाना नहीं खाया। उसकी जिद्द के आगे घर वालों को हार माननी पड़ी। दूसरे दिन सुबह स्कूल जाते वक्त पापा ने उसे मानविकी पढ़ने की इजाजत दे दी। वह दिन उसके लिए किसी उपलब्धि की तरह था। मानो उसने अपनी कोई जरूरी मांग मनवाई हो। इस तरह उसने मानविकी में अपना एडमिशन लिया। वह खुश तो थी, लेकिन उसके सभी साथियों ने विज्ञान विषय ले लिए थे। वह अकेली पड़ गई थी। बाकी जो थे वह अभी उसके लिए नए थे। पूरे स्कूल में एक तरह की हवा फैल गई कि शालिनी ने मानविकी ले ली। वह भी सोमेश सर के विषय के कारण। घर जाते वक्त उसके कुछ साथियों ने कहा भी था यह पागल हो गई है, सोमेश सर ने इसमें काला जादू कर लिया है।

जहां सब विज्ञान पढ़ रहे हैं और यह कला वर्ग में जा रही है। पहले पहले उसे यह बताने में शर्म सी आती या संकोच होता की वह कला वर्ग की छात्रा है।लोग भी उसे शक की नजरों से देखते। बाकी धीरे धीरे उसे वहां वहीं सुकून मिलने लगा था, जिसके लिए उसने संघर्ष किया था। सोमेश सर राजनीति विज्ञान पढ़ाते। वह लाइब्रेरी जाने लगी। लिखना,पढ़ना दोनों साथ साथ चलता रहा। उसे याद है एक बार सर ने उसे "आजादी मेरा ब्रांड" पुस्तक पढ़ने को दी,जो अनुराधा बेनीवाल का यात्रा वृतांत है। उसे पढ़कर उसे बहुत आजादी का अनुभव हुआ। जहां पहले वह कहीं भी अकेले जाने से डरती थी,अब उसने अकेले चलना शुरू कर दिया। उसने इस पुस्तक की समीक्षा भी लिखी। जिसे काफी सराहना मिली।

इस तरह पढ़ना लिखना उसकी आदतों का हिस्सा बन गया। 12वीं तक वह लगातार सोमेश सर से पढ़ती रहीं और चीजों को जानती रही। लिखना पढ़ना उसके पसंदीदा कामों में एक बन गया।सोमेश सर का ही असर था कि शालिनी के व्यवहार में बहुत सकारात्मक परिवर्तन आएं। बाकी विषयों में भी उसने मन लगाकर पढ़ना शुरू किया।

एक बार जब वह इंटरवल के बाद होने वाली क्लास में थोड़ी देरी से पहुंची तो इंग्लिश के अध्यापक ने उसे बुरी तरह डांटते हुए कहा कि तुम्हारा यही रवैया रहा तो तुम इंग्लिश में फेल हो जाओगी। यह सुनकर वह सहम गई और चुपचाप अपनी जगह में जाकर बैठ गई। जब 12वीं का रिजल्ट आया तो शालिनी न सिर्फ अंग्रेजी में उत्तीर्ण हुई थी बल्कि बहुत अच्छे नंबर लेकर आई। यह देखकर उसके आंखों में आंसू आ गए । यह पल उसके लिए भावुक करने वाला था। यह सिर्फ परीक्षा का ही रिजल्ट नहीं था , शालिनी के टूटने, बिखरने बनने, सीखने, अपने डर से लड़ने, खुद को लेकर हीन भावना से निकलने का सफर था। उन सभी लोगों की उपेक्षाओं के बावजूद सोमेश सर की अपेक्षाओं ने उसे बचा लिया था। सोमेश सर ने अपने प्रेम और मृदु स्वभाव से न सिर्फ पढ़ने को रुचि में बदल दिया बल्कि कभी भी किसी प्रश्न का जवाब नहीं बताते थे, बल्कि स्वयं खोज लाने को कहते थे। जिससे बच्चों को स्वयं जूझना पड़ता। इसी ने शालिनी को मजबूत और स्वयं कुछ खोजने सीखने को उत्साहित किया।

 

-शीतल भट्ट


 

शीतल जी, उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के एक दूरस्थ पहाड़ी गांव भट्टयूडा से आती हैं। आपने अपना परास्नातक, भूगोल विषय में लक्ष्मण सिंह मेहर कैंपस पिथौरागढ़ से किया है। आप सामाजिक खांचों में फिट नहीं होना चाहती, इसे इस परिप्रेक्ष्य मे देखें कि आप हर वह रिवाज नकारना चाहती हैं जो आपको एक लड़की होने का हवाला देकर कम आंकते हो।

किताबें संवेदनशील ,सामाजिक ,निर्भय और वैज्ञानिक चेतना देती हैं, अतः किताबें पढ़ना, नया जानते रहकर अपनी समझ को विस्तार देते रहना आपकी आदत मे शुमार है। आपको फिल्में देखना पसंद है, और घूमना भी। भूगोल आपको अपनी ओर खींचती है साथ ही  नए और रचनात्मक लोगों के साथ बात करने और उनके बारे में जानने को उत्सुक रहती हैं |


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शुभकामनाएं

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आधार(लघुकथा) - लवकुश कुमार

सजग (चाय की चुस्कियाँ लेते हुए) - प्रतिभा, मुझे तुमसे कुछ पूछना है।

प्रतिभा - हाँ सजग, पूछिए आपको क्या पूछना है?

सजग - मुझे कभी-2 यह डर लगता है कि हमारी दोस्ती कब तक चलेगी या चलेगी भी या नहीं?

प्रतिभा - आप ऐसा क्यों सोचते हैं जब तक हम एक-दूसरे की प्रगति, स्वतंत्रता व स्पष्टता में सहायक रहेंगे, यह दोस्ती चलती रहेगी। किसी एक का साथ भी अगर दूसरे की प्रगति में सहायक होगा तो हमारी दोस्ती बनी रहेगी। एक मित्र की उन्नति होगी तो वो दूसरे मित्र को भी तो आगे बढ़ाएगा।

सजग - धन्यवाद प्रतिभा इस स्पष्टता के लिए।

©लवकुश कुमार


लेखक भौतिकी में परास्नातक हैं और उनके लेखन का उद्देश्य समाज की उन्नति और बेहतरी के लिए अपने विचार साझा करना है ताकि उत्कृष्टता, अध्ययन और विमर्श को प्रोत्साहित कर देश और समाज के उन्नयन में अपना बेहतर योगदान दिया जा सके, साथ ही वह मानते हैं कि सामाजिक विषयों पर लेखन और चिंतन शिक्षित लोगों का दायित्व है और उन्हें दृढ़ विश्वास है कि स्पष्टता ही मजबूत कदम उठाने मे मदद करती है और इस विश्वास के साथ कि अच्छा साहित्य ही युवाओं को हर तरह से मजबूत करके देश को महाशक्ति और पूर्णतया आत्मनिर्भर बनाने मे बेहतर योगदान दे पाने मे सक्षम करेगा, वह साहित्य अध्ययन को प्रोत्साहित करने को प्रयासरत हैं, 

जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना आपके जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट ।


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बेहतरीन किताबें, कहानियां, उपन्यास पढने का भी समय नहीं तो सारांश ही सुन लीजिये - (स्वर जो ध्यान बाँध ले)
जिनावर - चित्रा मुगदल https://www.youtube.com/watch?v=2xj4XDVv6aE सारांश 3 मिनट के बाद शुरू होता है |

दौड़ लघु उपन्यास- ममता कालिया

https://www.youtube.com/watch?v=AKruXIgPdvA एक लघु उपन्यास 
कामायनी - जयशंकर प्रसाद  https://www.youtube.com/watch?v=9PFfsgicNw4 स्वर कृतिम बुद्धिमत्ता 
मुंशी प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी - मंत्र https://www.youtube.com/watch?v=9WmyGjf739w पूरी कहानी 

निर्मोही-ममता कालिया की कहानी

https://www.youtube.com/watch?v=AypnekxuCaI अपनी रचनाओं में ममता कालिया जी न केवल महिलाओं से जुड़े सवाल उठाती हैं, बल्कि उन्होंने उनके उत्तर देने की भी कोशिश की हैं।

 

आनंद लीजिये इन रचनाओं का और अपनी सोच को विस्तार दीजिये |

धन्यवाद की पात्र हैं वह लेखिका/लेखक जिन्होंने ये कहानियां लिखी और वह वक्ता जिन्होंने अपनी आवाज में इनके सारांश को हमारे लिए और सुलभ तथा रोचक  बनाया|

बोलते तो सब हैं एक बोलना ये भी है कि आप किसी चेतना को छूने वाली कहानी को आवाज दें |


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दिल को छू लेने वाली कुछ कहानियां (स्वर नम्रता सिंह)
परिंदा - सुनीता त्यागी  https://www.youtube.com/watch?v=BWUyL5xtPGU
तस्कीं को हम न रोयें - ममता कालिया https://www.youtube.com/watch?v=B_mpmpd5VeA
थोड़ा सा प्रगतिशील - ममता कालिया  https://www.youtube.com/watch?v=0tdKgYiLTqs
परली पार - ममता कालिया https://www.youtube.com/watch?v=MaXpAwVXnOc
पंडिताइन - ममता कालिया https://www.youtube.com/watch?v=JgJW0VmNNlU

आनंद लीजिये इन कहानियों का चेतना को छूने वाली कथावस्तु और मन को बाँधने वाली आवाज में |

धन्यवाद की पात्र हैं वह लेखिका जिन्होंने ये कहानियां लिखी और वह वक्ता यानी नम्रता जी जिन्होंने अपनी  आवाज में इन्हें  हमारे लिए और सुलभ तथा रोचक  बनाया |

बोलते तो सब हैं एक बोलना ये भी है कि आप किसी चेतना को छूने वाली कहानी को आवाज दें |


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खुलती गिरहें ( कहानी ) - सविता मिश्रा 'अक्षजा'

पत्नी और माँ के बीच होते झगड़े से तंग आकर बेटा माँ को ही नसीहतें देने लगा| सुनी-सुनाई बातों के अनुसार माँ से बोला- "बहू को बेटी बना लो मम्मा, तब खुश रहोगी|"
"बहू बेटी बन सकती है?" पूछ अपनी दुल्हन से|" माँ ने भौंह को चढ़ाते हुए कहा|
"हाँ, क्यों नहीं?" आश्वस्त हो बेटा बोला|
"बहू तो बन नहीं पा रही, बेटी क्या खाक बन पाएगी वह|" माँ ने गुस्से से जवाब दिया|

"कहना क्या चाहती हैं आप माँजी, मैं अच्छी बहू नहीं हूँ?" सुनते ही तमतमाई बहू कमरे से निकलकर बोली|
"बहू तो अच्छी है, पर बेटी नहीं बन सकती|"
"माँजी, मैं बेटी भी अच्छी ही हूँ| आप ही सास से माँ नहीं बन पा रही हैं|"
"मेरे सास रूप से जब तुम्हारा यह हाल है, माँ बन गयी तो तुम मेरा जीना ही हराम कर देगी।" सास ने नहले पर दहला दे मारा|
"कहना क्या चाह रही हैं आप?" अब भौंह तिरछी करने की बारी बहू की थी|
"अच्छा ! फिर तुम ही बताओ, मैंने तुम्हें कभी सुमी की तरह मारा, कभी डाँटा, या कभी कहीं जाने से रोका!" सास ने सवाल छोड़ा|
"नहीं तो !" छोटा-सा ठंडा जवाब मिला|
बेटा उन दोनों की स्वरांजली से आहत हो बालकनी में पहुँच गया|

"यहाँ तक कि मैंने तुम्हें कभी अकेले खाना बनाने के लिए भी नहीं कहा| न ही तुम्हें अच्छा-खराब बनाने पर टोका, जैसे सुमी को टोकती रहती हूँ|" उसे घूरती हुई सास बोली|
"नहीं माँजी, नमक ज्यादा होने पर भी आप सब्जी खा लेती हैं!" आँखें नीची करके बहू बोली|

"फिर भी तुम मुझसे झगड़ती हो! मेरे सास रूप में तो तुम्हारा ये हाल है| माँ बन, सुमी जैसा व्यवहार तुमसे किया, तो तुम तो मुझे शशिकला ही साबित कर दोगी।" बहू पर टिकी सवालिया निगाहें जवाब सुनने को उत्सुक थीं।

कमरे से आती आवाजों के आरोह-अवरोह पर बेटे के कान सजग थे| चहलकदमी करता हुआ वह सूरज की लालिमा को निहार रहा था|

"बस करिए माँ! मैं समझ गयी| मैं एक अच्छी बहू ही बनके रहूँगी|" सास के जरा करीब आकर बहू बोली|
"अच्छा!"
"मैंने ही सासू माँ नाम से अपने दिमाग में कँटीली झाड़ियाँ उगा रखी थीं| सब सखियों के कड़वे अनुभवों ने उन झाड़ियों में खाद-पानी का काम किया था|"

"सुनी क्यों! यदि सुनी भी तो गुनी क्यों?"

बेटे ने बालकनी में पड़े गमले के पौधे में कली देखी तो उसे सूरज की किरणों की ओर सरका दिया|

"गलती हो गई माँ! आज से उन पूर्वाग्रह रूपी झाड़ियों को समूल नष्ट करके, अपने दिमाग में प्यार का उपवन सजाऊँगी| आज से क्यों, अभी से| अच्छा बताइए, आज क्या बनाऊँ मैं, आपकी पसंद का ?" बहू ने मुस्कुराकर कहा |

"दाल भरी पूरी..! बहुत दिन हो गए खाए हुए।" कहते हुए सास की जीभ, मुँह से बाहर निकल होंठों पर फैल गई|

धूप देख कली मुस्कुराई तो, बेटे की उम्मीद जाग गयी| कमरे में आया तो दोनों के मध्य की वार्ता, अब मीठी नोंकझोंक में बदल चुकी थी|

सास फिर थोड़ी आँखें  तिरछी करके बोली- "बना लेगी...?"
"हाँ माँ, आप रसोई में खड़ी होकर सिखाएँगी न!" मुस्कुराकर चल दी रसोई की ओर|

बेटा मुस्कुराता हुआ बोला, "माँ, मैं भी खाऊँगा पूरी|"

माँ रसोई से निकल हँसती हुई बोली, "हाँ बेटा, जरूर खाना ! आखिर मेरी बिटिया बना रही है न|" 

© सविता मिश्रा 'अक्षजा' 

ईमेल-2012.savita.mishra@gmail.com


अक्षजा जी को पढ़ना संवेदना जगाता है और स्पष्टता से भर देता है, आपने अपनी रचनाओं से मानवीय रिश्तों, संघर्षों, विरोधाभासों प्रकाश डालते हुए या कहें की ध्यान खींचते हुए एक  शांतिमय और समृद्ध जीवन / दुनिया के लिए तरह तरह की विधाओं में साहित्य रचकर साहित्य कोश में अमूल्य योगदान दिया है, आपने  लघुकथा, कहानी, व्यंग्य, छंदमुक्त कविता, पत्र, आलेख, समीक्षा, जापानी-विधा हाइकु-चोका आदि विधाओं में ढेरों रचनाएं साहित्य कोश को अर्पण की हैं, आपकी 'रोशनी के अंकुर' एवं  'टूटती मर्यादा' लघुकथा संग्रह तथा  ‘सुधियों के अनुबंध’ कहानी संग्रह के साथ  अस्सी के लगभग विभिन्न विधाओं में साझा-संग्रहों में रचनाएँ प्रकाशित हैं और 'खाकीधारी'  2024{लघुकथा संकलन} 'अदृश्य आँसू' 2025 {कहानी संकलन} 'किस्से खाकी के' 2025 {कहानी संकलन}  'उत्तर प्रदेश के कहानीकार' 2025 {कथाकोश} का सम्पादन भी किया, आप लघुकथा/समीक्षा/कहानी/व्यंग्य / कविता  विधा में कई बार पुरस्कृत हैं|  आदरणीय लेखिका के बारे में और इनकी अन्य रचनाओं, योगदान, सम्प्रतियों के बारे में जानने के लिए यहाँ क्लिक करें|


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