बीते शनिवार (23 मई 2026) को सुंदर उत्तराखंड के सुंदर अल्मोड़ा जिले के द्वाराहाट ब्लॉक में स्थित पीएम श्री राजकीय बालिका इंटर कॉलेज में आयोजित विज्ञान यात्रा- प्रयोग यात्रा सरिता – प्रयास 2026 के अंतर्गत एक कार्यशाला का आयोजन किया गया, यह कार्यक्रम साइन्स इन द सर्विस ऑफ सोसाइटी और सोपान आश्रम कानपुर की संयुक्त पहल से आयोजित 21 दिवसीय उत्तराखंड विज्ञान यात्रा के अंतर्गत सम्पन्न हुआ, जिसमें मुझे एक एक विज्ञान प्रेमी के तौर पर शामिल होने का अवसर मिला|
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि पदम्श्री अवकाश प्राप्त सम्मानित प्रो० डॉ हरीश चन्द्र वर्मा (आईआईटी कानपुर) और साथ में साइन्स इन सर्विस ऑफ सोसाइटी के कुमाऊं संयोजक भवानी शंकर कांडपाल सर रहे, कार्यक्रम की अध्यक्षता विद्यालय की प्रधानाचार्य, आदरणीय सोनिका नेगी मैम ने की|
साथ ही सहयोगी , हेमंत उपाध्याय , सोपान आश्रम कानपुर के अनुभव अवस्थी, साइंस इन द सर्विस ऑफ सोसाइटी के कार्यकर्ता विनोद कुमार जोशी ,सामाजिक कार्यकर्ता और पर्यावरणविद त्रिभुवन जोशी तथा केंद्रीय विद्यलाय हल्द्वानी से मोहित शर्मा सर पूरी यात्रा में साथ रहे| इस यात्रा का अंत देहारादून में उत्साही फ़िज़िक्स teachers की workshop के साथ होगा, वैबसाइट से कुछ पुरानी छवियाँ - National Workshop of Utsahi Physics Teachers (NWUPT)

कार्यक्रम की शुरुआत अतिथियों के स्वागत और सम्मान के साथ, संगीत शिक्षिका सुरभि पंत मैम और उनकी कुशल छात्राओं द्वारा प्रस्तुत संगीतमय वंदना द्वारा हुयी|
जीवंत और कुशल मंच संचालन, एल टी, गणित शिक्षिका भावना जोशी मैम ने किया जिसमें एल. टी विज्ञान की शिक्षिका रेनु तिवारी मैम एवं प्रवक्ता भौतिकी किरन बिष्ट मैम का विशेष योगदान रहा|
विद्यार्थियों को एक यादगार प्रयोगिक और वैज्ञानिक एक्सपोजर मिला साथ ही कार्यशाला बच्चों और शिक्षकों सबके लिए मन बांधने वाली और यादगार रही|


मै अगर अपनी बात करूँ तो सबसे पहले आभार विद्यालय प्रबंधन का, इतनी बेहतर व्यवस्था और आयोजन के लिए, सभी समर्पित और संबन्धित शैक्षिक और गैर-शैक्षिक स्टाफ का आभार क्योंकि "ऐसे आयोजन में सबका अपना योगदान" होता है|
आभारी हूँ साइन्स इन द सर्विस ऑफ सोसाइटी उत्तराखंड (विशेष आभार आदरणीय भवानी शंकर कांडपाल सर का जो कुमाऊँ समन्वयक हैं ) और सोपान आश्रम कानपुर का जिनकी संयुक्त पहल के अंतर्गत यह कार्यशाला हुयी, जिसमें न केवल HC वर्मा सर और उनकी टीम से मिलने का मौका मिला वरन वैज्ञानिक चेतना का माहौल कैसे बने, विद्यार्थियों और शिक्षकों में स्वतंत्र सोच कैसे विकसित हो और कैसे बच्चों को विज्ञान और विषयवस्तु से जोड़ा जा सके, इसके गुर सीखने का भी अवसर मिला|
मैंने सीखा कि कैसे कोई भी अध्याय या बात शुरू करने से पहले कैसे विद्यार्थियों/पाठकों के साथ कम्युनिकेशन स्थापित किया जाये ताकि आगे वह हमारी बात को और अच्छे से सुन/पढ़ सकें- यह सीख न केवल विद्यार्थियों/युवाओं को कुछ समझाने में मददगार होगी वरन पुस्तक लेखन में भी लाइटर नोट से बात शुरू करने का तरीका पाठकों का मन बांधने में उपयोगी होगा|
मैंने देखा कि कैसे वर्मा सर और उनकी टीम द्वारा विद्यार्थियों से छोटे-छोटे आसान सवाल (अवलोकन पर आधारित जैसे की धागा किस रंग का है, लाल धागा अंधेरे मे किस रंग का दिखेगा इत्यादि) करके न केवल उनका हौसला बढ़ाया बल्कि उन्हे विषय वस्तु से जोड़ लिया और भवानी सर द्वारा बच्चों के नाम पूछकर, उनके नाम को भी उस चर्चा का हिस्सा बना लेना ये साबित करता है कि शिक्षक यदि हाजिरजवाब है तो बच्चों के साथ संवाद स्थापित करना और उन्हे इन्वाल्व करना कितना आसान हो जाता है जैसे कांडपाल सर ने एक प्रयोग के दौरान एक बिटिया से उसका नाम पूछा, जवाब आया, “हितैषी” तुरंत कांडपाल सर कहते हैं कि अरे वाह देखो हरीश सर भी हमारे कितने हितैषी हैं जो आज हमारे बीच आए हैं |
अपने सवालों द्वारा (puzzle method द्वारा attention ensure करना) वर्मा सर और उनकी टीम ने सभी श्रोताओं को कार्यशाल से जोड़े रखा|
कई बार ऐसा होता है कि हम कहीं बैठे होते हैं और मन कहीं होता है, यह हमारे और विद्यार्थियों सबके साथ होता है, सोचिए कि यदि ऐसा हो कि हम हर काम को इन्वाल्व होकर करना अपनी आदत मे लाएँ तो न केवल हमारी मन स्थिति बेहतर होगी साथ ही बच्चे हम से सीखकर यही आदत ला पाएंगे और फिर रिवीजन क्लास लेने की जरूरत, या बार बार समझाने की जरूरत न पड़ेगी|
इस तरह की कार्यशाला में टाइम कब बीत जाता है पता ही नहीं चलता, इस तरह का इन्वाल्व्मेंत न केवल हमे और बच्चों को बेहतर अवलोकन मे मदद करता है बल्कि वर्तमान मे भी रखता है| यदि इस तरह का इनवल्वमेंट हम अपने हर काम मे सुनिश्चित कर सकें तो ये मन पास्ट और फ्युचर के चक्र से बाहर निकम हमे वर्तमान मे जीने मे मदद कर पाएगा और हमे चीजों को ढंग से अवलोकित कर पाएंगे|
सबसे महत्वपूर्ण कि कभी कभी ऐसा होता है कि विद्यालय मे लैब बनाने के साधन बहुत सीमित और कभी कभी न के बराबर होते हैं, उस अवस्था में भी कैसे बहुत आधारभूत और आसानी से मिलने वाले सामान से कुछ ऐसे प्रयोग किए जा सकते हैं जो बच्चों मे वैज्ञानिक चेतना जागा सकें, जैसे इस कार्यशाला में, "सामान्य लेजर पोइंटर, समतल दर्पण, पानी की बोतल, काँच का गिलास, सिक्का, रिंग चुंबक, इंजेक्शन वाली सिरिन्ज आदि" चीजों से बच्चों को प्रयोग कराये आगे, माने जैसा बजट हो वैसी व्यवस्था की जा सकती है|
ऐसी ही सामग्री के साथ प्रयोग के लिए आदरणीय वर्मा सर की वैबसाइट का अवलोकन किया जा सकता है, संदर्भ के लिए कुछ लिंक दिये जा रहे हैं:
https://www.shiksha-sopan.org/
Common Misconceptions of Physics PGTs in topics based on quantum Physics
Learning Physics through Simple experiments
Developing equations of light path in Mirage-like situations
डा0 एच0 सी0 वर्मा जी जो एक milestone और icon है उनके द्वारा जो आसानी से उपलब्ध और कम लागत वाली सामग्री से प्रयोग कराए गए, सही मायने में “ उन्होंने बताया कि केवल सिद्धांत पढ़ लेना विज्ञान नहीं है, बल्कि उसे प्रयोग द्वारा परखना ही वास्तविक विज्ञान है। तर्क हमें सोचने की दिशा देता है और प्रयोग उस तर्क की सत्यता सिद्ध करता है।”
-प्रकाश चन्द्र जोशी सर, सहायक अध्यापक विज्ञान, राजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय ईरा चौधार द्वाराहाट अल्मोड़ा
कार्यशाला ने हमें यह महसूस कराया कि किस प्रकार सरल प्रयोग, उनसे जुड़े प्रश्नों की श्रृंखला और विचारपूर्ण चर्चाएँ एक बेहतर शिक्षण वातावरण का निर्माण करती हैं तथा रचनात्मक सोच को बढ़ावा देती हैं।
जब हम प्रयोगों का अवलोकन कर रहे थे, तब हम यह समझने का प्रयास कर रहे थे कि ऐसा क्यों हो रहा है। कार्यशाला से मिली एक महत्वपूर्ण सीख यह रही कि सबसे अधिक सीख तब होती है जब हमारा मन किसी प्रश्न पर अटक जाता है। उसके बाद मन स्वयं उत्तर खोजने के लिए सक्रिय हो जाता है, और इस प्रकार प्राप्त ज्ञान लंबे समय तक स्मरण रहता है।
इसके अतिरिक्त, कार्यशाला में हमने यह भी अनुभव किया कि सीखने की "प्रक्रिया" अंतिम परिणाम से अधिक महत्वपूर्ण होती है। जीवन में भी मंज़िल से अधिक महत्वपूर्ण उसकी यात्रा होती है।
-मदन मोहन सुंदरियाल सर, प्रवक्ता भौतिक विज्ञान रा इ का बिन्ताएवं विज्ञान समन्वयक ब्लॉक द्वाराहाट
सबसे अच्छी बात जो मुझे सीखने को मिली वो यह है कि अपने विषय को पढ़ाने के तरीके को Puzzle Method द्वारा बनायें, जिससे ज्यादा से ज्यादा बच्चे उसमें involve हों और actively participate कर अपने ideas दें।
ये भी सीखा कि हमारे आस-पास हर वस्तु और घटना के पीछे विज्ञान है, इसलिए वो नज़रिया विकसित करना होगा, जिससे हम उन घटनाओं को विज्ञान के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत कर, बच्चों में विज्ञान के प्रति सहजता उत्पन्न कर सकें।
- प्रीति राणा मैम, LT GIC Asgoli, Almora
कुछ बातें जो इस कार्यशाला में अवलोकन मे आयीं सीधे उनको उद्धृत करता हूँ:
विद्यार्थियों से संवाद स्थापित करने का तरीका, कुछ वाक्य जिन्होने ने केवल बच्चों के मन को बांध लिया बल्कि उपस्थित शिक्षकों और अन्य लोगों के चेहरे पर मुस्कान और बीच बीच में हंसी लाकर माहौल को जीवंत बनाये रखा: -
अलंकृत और गैर अलंकृत शिक्षक और प्यारे बच्चों, सबको मेरा.... मेरा क्या ? सबको मेरा नमस्कार - HCV सर
अच्छा आपका नाम हितैषी है, देखो वर्मा सर भी हमारे हितैषी हैं जो आज हमारे बीच आए हैं - भवानी शंकर कांडपाल सर
भवानी सर ने इस बात से शुरुआत की कि गणित कैसा लगता है आप सबको?
ऐसे वर्मा सर ने बच्चों से पूछा कि सबसे खराब विषय कौन सा लगता है आपको?
अवलोकन करना सिखाया:
धागा किस रंग का है?
अच्छा लाल है
क्या अंधेरे में भी लाल ही रहेगा?
अच्छा अंधेरे में काला दिखेगा
लेकिन काला धागा क्या कभी लाल दिखता है!
और क्या है यहाँ आइए देखते हैं?
अच्छा, ये मैगनेट है, इसके बीच में छेंद क्यों
ये क्या है ? मिरर, अरे वाह पीछे से ही पहचान लिया
अच्छा शीशे में अपना चेहरा देख पा रहे ?
शीशे में कहाँ हो ? खंभे के अंदर (शीशे को खंभे से सटाकर रखते हुये)
हम स्कूल क्यों आते हैं ? पढ़ने
तो आज हम खेलेंगे
कौन कौन डॉ बनना चाहता है
ये सिरिन्ज इसीलिए नहीं चल रही है क्योंकि ये कह रही की कांडपाल सर ने जो इसके छेंद पर अंगूठा रख रखा है तो अब यह नहीं चलेगी
अच्छा किसने कहा की इसके कान खराब हैं, चलो इसे ही बुलाओ आँख और कान के समन्वय वाले प्रयोग के लिए
कुछ बातें जो सीधे शिक्षकों से कही गयीं-
HCV सर की कुछ कविताओं का संग्रह - https://hcverma.in/Poems
एक शिक्षक के सवाल पर कि यदि कोई विद्यार्थी पूछे कि अमुक कान्सैप्ट का जीवन में क्या इस्तेमाल? प्रस्तुत HCV सर का जवाब:
इस पर वर्मा सर ने बताया कि, “सब कुछ brain driven है और यह शिक्षा हमारे दिमाग़ को विकसित करने का एक साधन है , हम जो कुछ भी विषय आज पढ़ रहे’ हैं वह सीधे तौर पर भले ही हमारे पेशे में काम न आए लेकिन उस विषय को समझते हुये जो तार्किक क्षमता विकसित होती है हमारे भीतर, वह क्षमता ही आगे चलकर हमे चीजों को समझने, समझाने, सृजन करने और निर्णय लेने में मदद करती है| यह तार्किक क्षमता हमे नयी नयी परिस्थितियों से निपटने में मदद करती है|”
कार्यशाला का हिस्सा शिक्षकों के प्रश्नोत्तर का भी रहा|
कार्यशाला का प्रभाव ऐसा रहा कि संगीत शिक्षिका सुरभि पंत मैम ने भी कहा कि वाकई भौतिकी को हम जीवन के कई क्षेत्रों से जोड़ सकते हैं जैसे कि संगीत में, कंपन्न, आवृति और अनुनाद से|
कार्यशाला से जुड़े कुछ विडियो नीचे दिये गए लिंक से देखे जा सकते हैं
| पीएमश्री रा०क०इं०का० द्वाराहाट की छात्राओं द्वारा मन को सुकून देने लेने वाला गायन| | https://www.youtube.com/watch?v=XOrKWeNIMIA |
| पानी से भरे गिलास या पारदर्शी बोतल के उस तरफ कलम की निब का उल्टा और सीधा दिखाई देना | https://www.youtube.com/watch?v=Y9uzBinRul4&pp=0gcJCQoLAYcqIYzv |
| वायुदाब, घनत्व और तापमान पर HC वर्मा सर के विचार और विश्लेषण और साथ में उदाहरण प्रैशर कुकर का| | https://www.youtube.com/watch?v=7dafkrhKUl8 |
| छड़, उस पर टंगा झोला, बल और बल आघूर्ण, संतुलन के लिए विभिन्न बल और मांसपेशियों में तनाव | https://www.youtube.com/watch?v=v7Z9SyvachY |
| ऊष्मीय गति या तापमान के बढ्ने से बढ़ता वायुदाब- अनुभव जी और मोहित सर | https://www.youtube.com/watch?v=oD1yeAwIxOM |
| गिलास, सिक्का और कार्ड बोर्ड: जड़त्व या कुछ और? एक समीक्षा, एक एप्रोच- HC Verma सर | https://www.youtube.com/watch?v=gWcPqAwL450 |
| रुमाल से पाउडर के कण झड़ने का कारण जड़त्व से अलग- HC Verma सर | https://www.youtube.com/watch?v=hDFvhuLTNzE |
| जो राह चुनी तूने, उसी राह पे राही चलते जाना रे- गायन सुरभि पंत मैम | https://www.youtube.com/shorts/bf_QC6SEcKY |
साइन्स इन द सर्विस ऑफ सोसाइटी के बारे में और जानने या सदस्य बनने के लिए ईमेल करें- sss.dbu@gmail.com या संपर्क करें - 9528237575
पता- Kashmiri Colony, Niranjanpur, dehradun
कार्यशाला का समापन शामिल शिक्षकों को सहभागिता का प्रमाण पत्र उपलब्ध कराकर, धन्यवाद ज्ञापन और समूह फोटो से किया गया|


कई शिक्षकों ने कहा कि ऐसी कार्यशालाएँ होती रहें ताकि उनके अध्यापन और शिक्षण के तरीके मे बेहतरी होती रहे|
https://www.thetoptennews.com/archives/32605
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शुभकामनाएं
-लवकुश कुमार
मेरी प्यारी कॉफी,
सुमधुर स्मृति,
तुम जहां भी होगी बहुत खुश होगी, ऐसा मेरा विश्वास है क्योंकि तुम थी ही इतनी प्यारी। तुम सबसे इतने प्यार से मिलती थी, हर आने वाले को तुम प्यार की डोर में बाँध लेती थी जैसे तुम्हारा उससे जन्म-जन्मांतर का रिश्ता हो। हमारी कॉलोनी वाले सभी तुमको बहुत प्यार करते थे। जब तुम कार में बैठकर रानी की तरह ठाठ से जाती तो सभी बच्चे हाथ हिला कर तुम्हारा अभिवादन करते। तुम्हारे जाने के बाद भी वे तुम्हारी खोज-खबर लेने हमारे घर आ जाते हैं। कुछ लोग तो अब भी पूछते हैं, जब हमारे घर का गेट खोलते हैं तो सबसे पहले अंदर झांकते हैं, मेरे आश्वासन देने पर की डरने की कोई बात नहीं है, काॅफी चली गई है, तब ही वे अंदर आते हैं। आज कुछ निडर प्राणी हमारे घर में खूब उछल-कूद मचा रहे हैं जो तुम्हारे रहने पर फटकते भी नहीं थे, अब ये बेधड़क नन्हें-मुन्हें बच्चे तुम्हारी जगह धमा-चौकड़ी कर हमारा मन लगाए रहते हैं और म्याऊँ-म्याऊँ की बोली से हमारे कानों में मिश्री-सी घोल जाते हैं । उनका दबे-पांव आना और चुपचाप झांकना मुझे तुम्हारी याद दिलाता रहता है। वैसे भी हम तुमको भूले ही कहां है, बस कुछ इस तरह से तुम्हारी यादें ताजी हो जाती हैं।
तुम्हारी भारी-भरकम आवाज जब पूरे घर में गूंजती तो हम समझ जाते कि कोई आया है और तुम हमें बुला रही हो या आने वाले से उसका नाम पूछ रही हो। तुम्हारे पास तो एक ही भाषा थी, हमें समझना पड़ता था कि तुम क्या कहना चाहती हो? गुस्से के समय तुम्हारा चेहरा बदल जाता था। तुम्हारे अंदर के भाव तुम्हारे प्यारे से चेहरे पर ऐसे आते जैसे कोई बच्चा रूठ गया हो और उस समय मेरी हंसी रोके नहीं रुकती। तुमको अपने गले से लगाए बिना मैं ना रह पाती। जब मैं सितार बजाती तो तुम मेरी गोद में सिर रख कर पूरी तन्मयता से सुनती जैसे सब समझ रही हो और आनंद ले रही हो। तुमने मुझे हर एक प्राणी से प्यार करना सिखा दिया। सभी प्राणियों में मुझे एक ही आत्मा दिखाई देने लगी, यह मेरे लिए तुम्हारी सबसे बड़ी सौगात थी जो मुझे कोई और नहीं दे सकता था, एक आध्यात्मिकता का अहसास जो तुमने करवा दिया। आज इसी वजह से मैं उन प्राणियों से डरने या डराने की जगह उनसे दोस्ती करने की कोशिश कर रही हूं। यह मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि पहले मैं जिनसे भयभीत रहती थी,उनसे आज प्यार करने का मन चाह रहा है, यह सब कुछ हमारी कॉफी रानी की बदौलत ही तो हो रहा है। परिवर्तन ही तो जीवन का नियम है, तभी तो हम अपने आप को बदलते हुए आगे बढ़ते हैं और ऊपर उठते जाते हैं। तुमने मुझमें आध्यात्मिक चेतना जगा दी कि आखिर हम सब भी तो उस एक परमात्मा की संतान ही तो है। बस रूप अलग-अलग है, फिर सभी की मूलभूत जरूरतें भी तो एक ही है इसीलिए तुम हमारे परिवार की सदस्या बन गई थी। पूरे अधिकार से तुम हमारे बीच धंसने में जरा भी नहीं हिचकती। तुम्हारा बस चलता तो तुम गलबाहियां डालकर बैठ जाती। मेरे पति ने इसीलिये तुम्हारा नाम काॅफी रानी रख दिया था। हमारे सोफे पर बैठकर तुम हमारे साथ ही अखबार पढ़ा करती थी हमसे छीन कर, जब हम तुमसे अखबार मांगते तो तुम अजीब-सा मुंह बनाकर हम पर गुस्सा दिखाती। शायद तुमको हमारा अखबार पढ़ना अच्छा नहीं लगता था क्योंकि उस समय हम तुम्हारे साथ होकर भी पेपर पढ़ने में व्यस्त हो जाते थे, यह बात तुमको नागवार गुजरती।
तुम्हारा पालन-पोषण मेरे बेटे सान्निध्य की गोद में और बचपन हमारे साथ खेलकर गुजरा। मस्ती के साथ झूमते हुए तुम बहुत जल्दी बड़ी होने लगी। कभी-कभी अफसोस होता कि तुम इतनी तेजी से क्यों बड़ी हो रही हो? हम लोगों का और हमारे यहां आने वाले सभी लोगों का तुमने मन मोह रखा था, तुम मनमोहिनी बन गई थी। तुम्हारा रंग भी दूध वाली कॉफी जैसा था, व्हाइट और ब्राउन मिक्स, इसीलिए बेटे ने तुम्हारा नाम कॉफी रखा था। कोई यदि हमारे यहां से जाने के बाद बहुत दिनों के बाद हमसे मिलने आया और तुम उसको पहचानती तो बस उसके पास आकर बैठ जाती और वहां से उठने का नाम नहीं लेती क्योंकि उससे प्यार जो करवाना होता, तुम प्यार की प्रतिमूर्ति थी। हर एक से प्यार पाकर तुम्हारे चेहरे पर एक सुकून दिखाई देता और तुम आंखें बंद कर उसका सुखद अहसास सामने वाले को भी करवा देती, जैसे तुम कृतज्ञता व्यक्त कर रही हो। तुम्हारी हर एक गतिविधि ने जैसे हम सबको एक बंधन में बांध दिया था। घर में तुम्हारी बातें ज्यादा होती और दूसरी बातें कम होती। तुम हमारे बीच जैसे एक पुल बन गई थी। बड़ी होने पर भी तुम शायद खुद को बच्ची ही समझती थी। उसी तरह रूठना लेकिन जल्दी मान जाना तुम्हारी बहुत बड़ी विशेषता थी।
उम्र का तकाज़ा अब तुम्हें पहले की तरह उछल-कूद की इजाज़त नहीं दे रहा था। तुम्हारा भागना-दौड़ना भी प्रतिबंधित हो गया। तुम्हारी चंचलता पर भी लगाम लग गई। यह सब हम लोगों के लिए भी कष्टदायी हो गया। तुम हमारे पलंग पर अब भी पहले की तरह सोने के लिए मचल जाती लेकिन लाचार होकर बैठ जाती, हम लोग भी विवश थे क्योंकि तुम्हारा भारी शरीर बाधा बन गया था इसीलिए हम भी तुम्हें पलंग पर नहीं चढ़ा सकते थे। हमें तुम्हारे बिना पलंग सूना लगता था, जबकि शुरू में जब तुम हमारे साथ सोने की जिद करती तो हम तुम्हारी इस जिद से बहुत परेशान और नाराज होते थे। लेकिन तुम जीत जाती और हम हार जाते पर हमें हार कर भी जीत से ज्यादा खुशी मिलती। लेकिन तुमको उदास देखकर हम भी दुखी हो जाते थे। क्या करें कि तुम पहले की तरह ही उछलकर पलंग पर चढ़ जाओ और हम दोनों के बीच धंस जाओ। मेरे पतिदेव के सीने पर ठोड़ी टिकाये बिना तो तुमको नींद ही नहीं आती थी। तुम्हारी गर्दन का बोझ जब बर्दाश्त नहीं होता तो प्यार से हम तुम्हें हटाते, लेकिन यह हमारी कल्पना के भी बाहर था कि हम तुमको बिस्तर पर अपने साथ सुलाएंगे पर तुम्हारे प्यारे से मुखमंडल के आगे हम सबकुछ भूल जाते थे। तुम्हारा बिस्तर हमारे कमरे के कोने में लगा दिया जाता, जहां तुम चुपचाप दुबक कर बैठ जाती, बिना किसी शोर-शराबे के। तुम भी शायद अब उम्र के तकाजे के साथ समझौते का रुख अपना रही थी, तुमको उठने में और चलने में परेशानियां शुरू हो गई। किसी के आने की आहट भी तुमको अब शायद सुनाई नहीं देती। तुम्हारे ऊपर बुढ़ापा तेजी से हावी हो रहा था। धीरे-धीरे तुम्हारी सारी गतिविधियां उम्र के साथ प्रतिबंधित हो रही थी। इससे हम भी परेशान रहने लगे क्योंकि तुम्हारी हालत दिन पर दिन बिगड़ती जा रही थी। तुम्हारी लाचारी ने ही तुम्हें चिड़चिड़ा बना दिया था। हम लोग धैर्य के साथ तुम्हारा उस समय में साथ दे रहे थे और सब मिलकर सेवा करते थे। कभी-कभी हम लोग भी तेजी से गिरते तुम्हारे स्वास्थ्य के लिए परेशान हो जाते। ना जाने तुम कैसे स्वस्थ होगी? लेकिन उम्र का तकाज़ा रोके कहां रुकता है? तुम भी उसकी गिरफ्त में आ गई थी,ये हमें खुद को समझाना पड़ा। जो आया है, उसे जाना ही पड़ेगा। कोई यहां अमरफल खाकर नहीं आया। तुम्हारा शायद अब अंतिम समय आ गया था। बेटे सान्निध्य ने अच्छे से अच्छा इलाज करवाया। लेकिन शायद ईश्वर ने इतने ही समय के लिए हमारे साथ तुम्हारा अद्भुत संबंध जोड़कर हमें एक आध्यात्मिक जगत से जोड़ने के लिए भेजा था। तुम्हारी सारी स्मृतियां अंतिम समय तक हमारे साथ रहेंगी। बेटे ने तुम्हारी समाधि हमारे छोटे से लाॅन में जो तुमको बहुत पसंद था, वही बनवाई है, जिससे तुम मीठी-प्यारी स्मृतियों के रूप में हमारे पास मौजूद रहोगी। मेरे पतिदेव रोज उस जगह धूपबत्ती लगाते हैं। मैंने एक साल तक तुम्हारे लिए वहां दूध रखा क्योंकि तुम दूध पीने के लिए सबसे ज्यादा उछलती हुई आती थी। आज भी मुझे तुम्हारी बड़ी-बड़ी कजरारी आंखों में तुम्हारे अंतिम समय की लाचारी याद आती है। एक अफसोस है, काॅफी काश मैं तुम्हें अपने अंतिम समय तक साथ रख पाती। जब मैंने तुम्हें अंतिम बार गले लगाया, तुम जमीन पर निढाल मेरी तरफ याचना भरी दृष्टि से देख रही थी। तब तुम्हारी आंखें मेरे आलिंगन और चुंबन से धीरे-धीरे हमेशा के लिए जैसे बंद हो गई और वातावरण में खामोशी-सी छाने लगी, तुमको अलविदा करते ही एक सन्नाटा-सा चारों पसर गया हो । जैसे घर का कोई बड़ा बुजुर्ग हमें अकेला और असहाय छोड़कर चला गया हो जो हमारी बहुत प्यारी सुकून देने वाली छाया थी।
तुम कभी-कभी सपनें में अपनी झलक दिखला जाती हो। बेटे सान्निध्य के साथ तुम्हारा लगाव बिल्कुल माँ-बेटे के संबंध जैसा था। आज भी उसे जाने-अनजाने में एक अलौकिक अहसास करवा देती हो तुम। आत्मा के रूप में तुम हमारे साथ ही हो। तुम्हें जो रोज घुमाते थे, आज भी वह कॉलोनी में डॉग्स को घुमाते मिल जाते हैं तो नमस्ते के साथ-साथ तुम्हारी तारीफ किए बिना नहीं रहते। ऐसी डॉगी अभी तक नहीं मिली जो इतनी प्यारी और शांत थी। अब तो तुम्हारी यादें ही प्यारी लगने लगी हैं और इन्हीं यादों के साथ हमने जीना सीख लिया है। एक प्यारा-सा खिलौना भगवान ने पोते के रूप में हमें दिया है। सौभाग्य से उसे भी तुम्हारा स्नेह मिला था। वह जब तुम्हारे ऊपर पैरों से कूदता था तो तुम उसे प्यार से मुड़ कर देखती जैसे दादी एक पोते पर प्यार लुटा रही हो। इससे ज्यादा तुम उसे क्या दे सकती थी? यही तुम्हारी हम सब के लिए सबसे बड़ी सौगात थी प्यार, जो तुम जाते-जाते हम सभी को दे गई। नन्हा-सा पोता अपने नन्हें-नन्हें कदमों से अक्सर तुम्हारी समाधि तक पहुंच कर वैसे ही चढ़ जाता है जैसे तुम्हारी पीठ पर चढ़ा करता था। तुम हमेशा हमारी स्मृतियों में रहोगी कॉफी, यह पंक्तियां तुम्हारी यादों को समर्पित है-
हमारे घर की पहचान थी कॉफी
हम सब का अरमान थी काॅफी
हमारे घर की शान थी कॉफी
हम लोगों की जान थी काॅफी
तुम्हारी अपनी
स्नेहिल प्रीति
डॉ. प्रीति अग्रवाल ने सन् 1984 में हिंदी-साहित्य में स्वर्ण-पदक लिया। सन् 2015 में पी.एच.डी. की उपाधि प्राप्त की। आपने कॉलेज की नौकरी करने के बदले खुद को साहित्य, कला, संस्कृति और सामाजिक कार्यों में शामिल करने का निर्णय लिया।
आपको संस्कार भारती ग्वालियर द्वारा सामाजिक-सांस्कृतिक सेवाओं के लिए वीरांगना लक्ष्मीबाई सम्मान भी दिया गया है। आपने अनेक राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में विभिन्न विषयों पर लेख प्रकाशित किए हैं।
आपकी पुस्तक यात्रा संस्मरण चलो चले अंडमान तथा शोध प्रबंध हिंदी बाल गीतों में लोक संस्कृति और पूर्व सिविल सेवा अधिकारी और माननीय राष्ट्रपति श्री शंकर दयाल शर्मा जी के निजी सचिव जो आपके पति है, उनकी जीवनी तृषित- एक जीवन यात्रा प्रकाशित हो चुकी है।
आपका दूरदर्शन एवं आकाशवाणी से जीवंत जुड़ा रहा है। फिलहाल आप लाइफ काउंसलर के रूप में लोगों को फोन पर निःशुल्क सेवा उपलब्ध करा रही हैं।
आपने लोगों की जटिल से जटिल जीवन संबंधी समस्याओं को सुलझाया है। अनेक लोगों के जीवन को अपने मार्गदर्शन से आत्महत्या से बचाया है तथा उनके जीवन को सार्थकता भी दी है। वे रिश्तें जो तलाक तक पहुंच गए थे आपने उन्हें भी फिर से मिला दिया। आप प्री-मैरिज काउंसलिंग भी निःशुल्क करती हैं।
कोई भी इच्छुक व्यक्ति आपसे बात कर सकता है, यह काउंसलिंग पूरी तरह निःशुल्क है, आपका मोबाइल नंबर 9644624449 है। शाम को 6:00 बजे से 9:00 बजे तक आपसे संपर्क किया जा सकता है।आपातकालीन परिस्थितियों में कभी भी बात कर सकते हैं।
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शुभकामनाएं
"एक मजेदार कक्षा के साथ, सीखने, खुलने, निखरने और बेहतरी के सफर पर एक संकोची लड़की के एक मुखर व्यक्ति बनने की कहानी"
शालिनी बहुत ही चुपचुप रहने वाली लड़की है। पहले वह स्कूल में अक्सर अपना सिर नीचे ही रखती,वह कभी सवाल नहीं करती थी। समझ न आने में सर को बताती नहीं थी कि उसे समझ नहीं आ रहा है। उसके लिए स्कूल जाना सबसे बोझिल कामों में से एक था। स्कूल और वहां के माहौल ने उसकी तरफ कभी कोमल हाथ नहीं बढ़ाया, बचपन से ही टीचर के लिए डर और अपने साथियों द्वारा उसका मजाक बनाए जाने का ऐसा असर हुआ कि स्कूल उसके लिए किसी यातना शिविर सा बन गया।
वह हमेशा दबाव में रहती, डर उसके ऊपर इतना हावी हो गया था कि वह हमेशा डरी-डरी रहती। ऐसा करते-करते शालिनी ने आठवीं पास कर लिया। वह घर में बहुत खुश रहती, वहां वह सहज हो पाती। मां के साथ घर के काम में हाथ बटाती। स्कूल से आते ही मां को खोजते हुए खेतों में पहुंच जाती थी।
शालिनी को लगता स्कूल जाने से अच्छा यह होता कि वह अपनी मां के साथ घर और खेतों का काम कर पाती। लेकिन स्कूल तो जाना ही था,उससे बचना नामुमकिन सा था। अब उसका दाखिला बड़े स्कूल में हो गया। वह नौवीं में पहुंच गई थी। तमाम तरह की शंकाएं और उस स्कूल के बारे में सुनी बातें उसे रह रहकर डराती। वही डर में वह खुद को फिर से सहमा हुआ पाती जहां से वह अभी अच्छी से निकली भी नहीं थी। नया स्कूल सच में बड़ा था ,वहां बहुत सारे बच्चे थे। टीचर भी बहुत सारे।यह नजारा उसके लिए आश्चर्यजनक करने वाला रहा।
एक दिन उन्हें कक्षा में एक अध्यापक पढ़ाने आएं। सोमेश सर ,जो उन्हें सामाजिक विज्ञान पढ़ाते थे। पहली बार तो वह सर के व्यवहार को देखकर अचंभित हो गई कि कोई अध्यापक ऐसा भी हो सकता है। वह बच्चों से लगातार प्रश्न पूछने को कह रहे थे। बिना किसी डर के वह पहली कक्षा थी जहां शालिनी को राहत सी महसूस हुई।
सोमेश सर ने बहुत सारी बातें बताई। किताबें,समाज और साथ में स्कूल के पुस्तकालय की भी। शालिनी ने आज तक अपने जीवन में पुस्तकालय नहीं देखा था। सच बात तो यह थी कि पाठयपुस्तक के अलावा उसने कोई किताब देखी ही नहीं थी। सोमेश सर के मृदु और बच्चों के साथ दोस्ताना व्यवहार का यह असर होने लगा कि शालिनी दबे पांव पुस्तकालय का रुख करने लग गई। वह सहमी सी जाती थी,एक कोने में जाकर बैठ जाती थी। उसके लिए वह पुस्तकालय किसी अजूबे से कम न था।टेबल पर बहुत सारी पत्रिकाएं बिखरी हुई थी। अलमारियों में बहुत करीने से किताबें लगी थी।
दीवारों में बच्चों के हाथों से लिखे हुई कुछ लंबे से पोस्टर टंगे हुए थे। बाद में सर ने बताया कि यह दीवार पत्रिका है। जो वहां के बच्चों ने स्वयं बनाई है। इसमें कुछ भी लिख सकते हो,जिसे किसी किताब से नहीं उतारना बल्कि अपने भीतर की दुनिया में जो चल रहा है उसे कागज में उतारना है,बिना किसी संकोच के। उसे पहली बार महसूस हुआ कि बच्चों को भी स्कूल में सम्मान दिया जाता है। यहां कुछ न आने पर सिर्फ उन्हें मारा या डांट नहीं लगाई जाती बल्कि उनके हिस्से की दुनिया रचने की आजादी भी दी जाती है।
इस तरह से शालिनी सर के साथ धीरे धीरे घुलने मिलने लग गई। अब वह सर के सामने वाली बेंच में बैठी रहती। इंटरवल होते ही पुस्तकालय आ जाती। पत्रिकाएं पढ़ती। यह उसका पसंदीदा काम होने लगा। सोमेश सर के पढ़ाने का अंदाज सबसे निराला था। उनके कक्षा में सन्नाटा कभी भी जगह नहीं ले पाया,वहां बच्चों की हंसी, बच्चों के प्रश्न और विषय से संबंधी किसी बात पर अपनी बात रखते बच्चों का शोर कक्षा को जीवन्त बनाएं रखता था।हर किसी की बात सुनी जाती, बहुत बार तो ऐसा होता कि बच्चे सर की बात से सहमत नहीं होते, उसके एवज में स्वयं तर्क करने लगते, फिर भी पूरा माहौल खुशनुमा बना रहता। यह सब शालिनी को भीतर ही भीतर गुदगुदाता । उसने आज तक ऐसा दृश्य न देखा था न कभी कल्पना की थी। उसने एक ऐसे अध्यापक की कल्पना किसी सपने में भी नहीं की थी। उसका बालमन सर की तरफ आकर्षित होता जा रहा था। वह सोमेश सर ही थे जो उसे हर वक्त लाइब्रेरी में मिलते। शालिनी का यह पहला परिचय था पुस्तकों से। उसे किताबों की रंग बिरंगी दुनिया अपनी सी लगती। वहां कोई उसे उसकी कमजोरी से नहीं आंकता था, बल्कि अपनी क्षमताओं से मिलाता।सोमेश सर बच्चों के विचार व्यक्त करने और पढ़ने के बहुत पक्ष में रहते,यही कारण था कि बच्चों की चहलकदमी सर के आस पास बनी रहती।
एक दिन शालिनी इंटरवल में लाइब्रेरी में बैठी थी, तब ही स्कूल में बनने वाली दीवार पत्रिका के लिए नए संपादक मंडल का चुनाव हो रहा था। सर ने शालिनी से भी पूछा कि क्या वह भी संपादक मंडल की सदस्य बनना चाहेगी।सर के सामने वह सिर्फ हां बोल पाई थी। लेकिन उसकी खुशी का ठिकाना नहीं था। उसे लगा हां यही तो चाहती थी वो। उसके बाद उसका लेखन शुरू हो गया। जिसे सोमेश सर ने काफी सराहना शुरू किया। इसका असर यह होने लगा कि सर की कक्षा में उसका डर निकलने लगा। वह सभी चीजों में बढ़ चढ़ के प्रतिभाग करने लगी। सर के सिखाने का ही तरीका था कि उसके भीतर कभी गौरवबोध नहीं आया। सोमेश सर सभी बच्चों को एक समान मानते। किसी को सिर्फ इसलिए तवज्जो नहीं देते थे कि वह अच्छा बोलता है या पढ़ने में अच्छा है। वह बच्चों की तरफ से आने वाली शिकायत में भी तटस्थ बने रहते। उन्हें कभी शालिनी ने किसी की तरफदारी करते नहीं सुना। हालांकि वह बच्चों के लेखन को सार्वजनिक रूप से सराहते। शालिनी को अब पढ़ने में आनंद आने लगा,सामाजिक विषय उसका पसंदीदा विषय बन गया। उसे सोमेश सर के पढ़ाने का बेसब्री से इंतजार रहता।वह एक दिन भी घर में नहीं रहती,रोज स्कूल में जाती,अब वह पहले से ज्यादा चीजों को सीखने की कोशिश करती।
शालिनी धीरे धीरे आत्मविश्वास से भरने लगी थी। वह किसी न किसी बहाने से सर के आस पास रहती,उनसे बातें करती। सर का स्नेह ही था जो उसे सीखने को प्रेरित कर रहा था।अब उसने अपने आस पास समाज को ज्यादा बारीकी से देखना शुरू कर दिया। सर ने उसकी यह भ्रांति भी तोड़ी कि सिर्फ स्कूल की चारदीवारों के भीतर और पाठयपुस्तकों से ही सीखा जाता है। वह किताब को समाज से जोड़कर पढ़ाया करते थे। उनमें अक्सर गांव के गरीब व्यक्ति की कहानी, सस्ते गल्ले की दुकान वाले का इंटरव्यू , अगर आप प्रधानमंत्री बन गए तो क्या करोगे, इस तरह के विषय शामिल रहते। इन सबको वह बड़ी ईमानदारी से करती।
उसे सर को दिखाने का उतावलापन रहता, उसने कैसा लिखा है करके। स्कूल पहुंचकर वह सबसे पहले लाइब्रेरी की ओर देखती कि सर आएं हैं या नहीं। जो विषय आज तक उसे रटने वाला और उबाऊ लगता था उसे सोमेश सर ने सबसे मजेदार बना दिया था। स्कूल अब उसके लिए दबाव नहीं बल्कि उत्सुकता का केंद्र बन गया। सोमेश सर उसकी जिंदगी में न आएं होते तो उसके जीवन में जो यह बदलाव आ रहे थे ,वह कभी नहीं आ पाते। उसने अब लोगों की बातों को नजरअंदाज करना सीख लिया था। वह बाकी विषयों में भी ध्यान लगाने लगी थी। 10वीं में वह अच्छे अंकों से पास हो गई थी। जबकि उसके घर वालों को यह डर था कि कहीं वह फेल न हो जाएं। विषय में रुचि बढ़ने के कारण उसने 11वीं में भी मानविकी विषय लिए। जिसके लिए उसे घर में भी काफी संघर्ष करना पड़ा। घर वाले चाहते थे लड़की साइंस ले, लेकिन दिल तो मानविकी विषयों में अटक गया था।
जबरदस्ती वो विज्ञान पढ़ भी नहीं पाती। फिर भी कुछ दिन विज्ञान पढ़ने गई, एकदम वह उदास पड़ने लग गई। सोमेश सर की कक्षा उसे रह रहकर याद आती,उसका वहां न होने का विचार उसे उदास कर जाता। उसने किसी से बात करना छोड़ दिया था। घर में भी किसी से बात नहीं करती थी। एक दिन हताश होकर वह स्कूल से जाते ही बिस्तर में जाकर सो गई, कंबल के अंदर मुंह छिपाकर रोती रही। उस रात घर वालों के बहुत मनाने पर भी उसने खाना नहीं खाया। उसकी जिद्द के आगे घर वालों को हार माननी पड़ी। दूसरे दिन सुबह स्कूल जाते वक्त पापा ने उसे मानविकी पढ़ने की इजाजत दे दी। वह दिन उसके लिए किसी उपलब्धि की तरह था। मानो उसने अपनी कोई जरूरी मांग मनवाई हो। इस तरह उसने मानविकी में अपना एडमिशन लिया। वह खुश तो थी, लेकिन उसके सभी साथियों ने विज्ञान विषय ले लिए थे। वह अकेली पड़ गई थी। बाकी जो थे वह अभी उसके लिए नए थे। पूरे स्कूल में एक तरह की हवा फैल गई कि शालिनी ने मानविकी ले ली। वह भी सोमेश सर के विषय के कारण। घर जाते वक्त उसके कुछ साथियों ने कहा भी था यह पागल हो गई है, सोमेश सर ने इसमें काला जादू कर लिया है।
जहां सब विज्ञान पढ़ रहे हैं और यह कला वर्ग में जा रही है। पहले पहले उसे यह बताने में शर्म सी आती या संकोच होता की वह कला वर्ग की छात्रा है।लोग भी उसे शक की नजरों से देखते। बाकी धीरे धीरे उसे वहां वहीं सुकून मिलने लगा था, जिसके लिए उसने संघर्ष किया था। सोमेश सर राजनीति विज्ञान पढ़ाते। वह लाइब्रेरी जाने लगी। लिखना,पढ़ना दोनों साथ साथ चलता रहा। उसे याद है एक बार सर ने उसे "आजादी मेरा ब्रांड" पुस्तक पढ़ने को दी,जो अनुराधा बेनीवाल का यात्रा वृतांत है। उसे पढ़कर उसे बहुत आजादी का अनुभव हुआ। जहां पहले वह कहीं भी अकेले जाने से डरती थी,अब उसने अकेले चलना शुरू कर दिया। उसने इस पुस्तक की समीक्षा भी लिखी। जिसे काफी सराहना मिली।
इस तरह पढ़ना लिखना उसकी आदतों का हिस्सा बन गया। 12वीं तक वह लगातार सोमेश सर से पढ़ती रहीं और चीजों को जानती रही। लिखना पढ़ना उसके पसंदीदा कामों में एक बन गया।सोमेश सर का ही असर था कि शालिनी के व्यवहार में बहुत सकारात्मक परिवर्तन आएं। बाकी विषयों में भी उसने मन लगाकर पढ़ना शुरू किया।
एक बार जब वह इंटरवल के बाद होने वाली क्लास में थोड़ी देरी से पहुंची तो इंग्लिश के अध्यापक ने उसे बुरी तरह डांटते हुए कहा कि तुम्हारा यही रवैया रहा तो तुम इंग्लिश में फेल हो जाओगी। यह सुनकर वह सहम गई और चुपचाप अपनी जगह में जाकर बैठ गई। जब 12वीं का रिजल्ट आया तो शालिनी न सिर्फ अंग्रेजी में उत्तीर्ण हुई थी बल्कि बहुत अच्छे नंबर लेकर आई। यह देखकर उसके आंखों में आंसू आ गए । यह पल उसके लिए भावुक करने वाला था। यह सिर्फ परीक्षा का ही रिजल्ट नहीं था , शालिनी के टूटने, बिखरने बनने, सीखने, अपने डर से लड़ने, खुद को लेकर हीन भावना से निकलने का सफर था। उन सभी लोगों की उपेक्षाओं के बावजूद सोमेश सर की अपेक्षाओं ने उसे बचा लिया था। सोमेश सर ने अपने प्रेम और मृदु स्वभाव से न सिर्फ पढ़ने को रुचि में बदल दिया बल्कि कभी भी किसी प्रश्न का जवाब नहीं बताते थे, बल्कि स्वयं खोज लाने को कहते थे। जिससे बच्चों को स्वयं जूझना पड़ता। इसी ने शालिनी को मजबूत और स्वयं कुछ खोजने सीखने को उत्साहित किया।
-शीतल भट्ट
शीतल जी, उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के एक दूरस्थ पहाड़ी गांव भट्टयूडा से आती हैं। आपने अपना परास्नातक, भूगोल विषय में लक्ष्मण सिंह मेहर कैंपस पिथौरागढ़ से किया है। आप सामाजिक खांचों में फिट नहीं होना चाहती, इसे इस परिप्रेक्ष्य मे देखें कि आप हर वह रिवाज नकारना चाहती हैं जो आपको एक लड़की होने का हवाला देकर कम आंकते हो।
किताबें संवेदनशील ,सामाजिक ,निर्भय और वैज्ञानिक चेतना देती हैं, अतः किताबें पढ़ना, नया जानते रहकर अपनी समझ को विस्तार देते रहना आपकी आदत मे शुमार है। आपको फिल्में देखना पसंद है, और घूमना भी। भूगोल आपको अपनी ओर खींचती है साथ ही नए और रचनात्मक लोगों के साथ बात करने और उनके बारे में जानने को उत्सुक रहती हैं |
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