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कौन-से कारक पढ़ने-लिखने की संस्कृति को नुकसान पहुँचा सकते हैं? — एक चिंता : लवकुश कुमार

कुछ दिन पहले सोशल मीडिया पर एक पोस्ट पढ़ी। उसमें एक लेखिका ने लिखा कि उन्होंने किसी की प्रशंसा सुनकर एक पुस्तक खरीदी, लेकिन उन्हें वह पसंद नहीं आई। उन्होंने अपना अनुभव फेसबुक पर साझा किया। यह उनका व्यक्तिगत अनुभव था और उसे व्यक्त करने का अधिकार भी उन्हें है। लेकिन उस पोस्ट को पढ़ते हुए मेरे मन में एक बड़ा प्रश्न उठा—क्या हमारी अभिव्यक्ति का तरीका कभी-कभी अनजाने में पढ़ने-लिखने की संस्कृति को भी नुकसान पहुँचा सकता है?

यह लेख किसी व्यक्ति के पक्ष या विपक्ष में नहीं है। यह उस व्यापक चिंता पर विचार करने का प्रयास है कि जिस समाज में वैसे ही पुस्तकें कम पढ़ी जाती हों, वहाँ हम अपने शब्दों से कैसी साहित्यिक संस्कृति बना रहे हैं।

हम अक्सर कहते हैं कि लोग किताबें नहीं पढ़ते। मोबाइल, सोशल मीडिया और त्वरित मनोरंजन ने पढ़ने की आदत को कमज़ोर कर दिया है। लेकिन क्या केवल यही कारण हैं? या हम स्वयं भी अनजाने में ऐसी मानसिकता बना रहे हैं जिसमें पुस्तकें, लेखक और पढ़ने की प्रक्रिया कम महत्वपूर्ण दिखाई देने लगती है?

जब मैं लोगों से किताबों पर बात करता हूँ तो कई बार एक वाक्य सुनने को मिलता है—"फलाँ वक्ता तो बस अपनी किताब बेचने की फिराक में है।"

यह सुनकर मुझे आश्चर्य होता है। यदि कोई व्यक्ति तर्कपूर्ण बातें कर रहा है, हमें अपने अंतर्विरोधों से परिचित करा रहा है, हमारी सोच को चुनौती दे रहा है, या हमारे भीतर छिपी संभावनाओं को पहचानने में मदद कर रहा है, तो फिर उसकी पुस्तक बेचने में समस्या क्या है? क्या किसी लेखक को अपनी वर्षों की मेहनत का पाठक मिलना अपराध है?

हम पुस्तक को संवाद का माध्यम मानने के बजाय केवल एक उत्पाद क्यों मानने लगे हैं?

एक अच्छी पुस्तक केवल सूचना नहीं देती, वह हमारे अनुभव का विस्तार करती है। वह हमें अपने से भिन्न लोगों, संस्कृतियों, विचारों और समयों से मिलाती है। कई बार वह हमारे भीतर ऐसे प्रश्न पैदा करती है जिनका उत्तर हमें वर्षों बाद मिलता है। पुस्तक का मूल्य केवल इस बात से नहीं आँका जा सकता कि उसने पढ़ते ही हमें "वाह!" कहने पर मजबूर किया या नहीं।

आज एक और प्रवृत्ति दिखाई देती है। यदि किसी पुस्तक से तुरंत आनंद नहीं मिला, कोई बिल्कुल नया विचार नहीं मिला, या वह हमारी अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतरी, तो हम सार्वजनिक रूप से उसके बारे में नकारात्मक टिप्पणी कर देते हैं। इसमें कोई बुराई नहीं कि हम अपनी असहमति व्यक्त करें। स्वस्थ आलोचना साहित्य की आवश्यकता है। लेकिन आलोचना और निरुत्साहन में एक सूक्ष्म अंतर होता है।

हमें स्वयं से पूछना चाहिए—हम पढ़ते किसलिए हैं?

क्या केवल नया जानने के लिए?

क्या केवल मनोरंजन के लिए?

क्या केवल सौन्दर्यबोध के लिए?

या फिर स्वयं को थोड़ा और समझने के लिए?

कई बार कोई पुस्तक हमें नया कुछ नहीं बताती, बल्कि वही बात अधिक स्पष्टता, संवेदनशीलता या गहराई से समझाती है जिसे हम पहले से जानते थे। क्या यह कम उपलब्धि है? हर पुस्तक का उद्देश्य क्रांतिकारी विचार प्रस्तुत करना नहीं होता। कुछ पुस्तकें प्रश्न जगाती हैं, कुछ अनुभव बाँटती हैं, कुछ भाषा का सौन्दर्य दिखाती हैं, कुछ प्रेरित करती हैं, और कुछ केवल यह एहसास कराती हैं कि हम अपनी उलझनों में अकेले नहीं हैं।

हर पुस्तक हर पाठक के लिए नहीं होती।

जो पुस्तक किसी को साधारण लगे, वही किसी दूसरे व्यक्ति के जीवन की दिशा बदल सकती है। जिस कविता में एक व्यक्ति को कुछ न मिले, वही दूसरे के भीतर वर्षों से दबे भावों को शब्द दे सकती है। इसलिए किसी पुस्तक पर अंतिम निर्णय देने से पहले यह स्वीकार करना भी आवश्यक है कि हमारी प्रतिक्रिया एक व्यक्तिगत अनुभव है, सार्वभौमिक सत्य नहीं।

आज के समय में पुस्तकों के सामने एक और चुनौती है—प्रचार।

अक्सर कहा जाता है कि अच्छी पुस्तक को प्रचार की आवश्यकता नहीं होती। यह बात शायद उस समय सही रही होगी जब पुस्तकों के अलावा ज्ञान के बहुत कम माध्यम थे। लेकिन आज लाखों सूचनाओं के बीच यदि किसी पुस्तक की चर्चा ही न हो, तो पाठक उसके अस्तित्व से भी परिचित नहीं हो पाएगा।

प्रचार और अतिशयोक्ति में अंतर है।

यदि कोई पाठक किसी पुस्तक की अच्छाइयों की चर्चा करता है, तो वह केवल लेखक का नहीं, बल्कि पढ़ने की संस्कृति का भी समर्थन करता है। मैं स्वयं इसका अनुभव कर चुका हूँ। मेरी अपनी वेबसाइट को मित्रों का सहज समर्थन मिलने में लगभग दो वर्ष लग गए। तब मैंने सोचा—हम अपने मित्रों के अच्छे कार्यों का उल्लेख करने में इतना संकोच क्यों करते हैं? क्या हमें डर रहता है कि कहीं लोग इसे पक्षपात न समझ लें? या फिर हमने प्रशंसा को भी संदेह की दृष्टि से देखना शुरू कर दिया है?

एक समाज की बौद्धिक संस्कृति केवल लेखकों से नहीं बनती; वह पाठकों, शिक्षकों, मित्रों, पुस्तकालयों, समीक्षकों और संवादों से मिलकर बनती है।

यदि लेखक ही लगातार एक-दूसरे को छोटा सिद्ध करने में लगे रहें, तो उन लोगों की दृष्टि में लेखकों की छवि कैसी बनेगी जो पहले से ही पुस्तकों को अनावश्यक मानते हैं? स्वस्थ असहमति और कठोर अवमानना में अंतर होता है। साहित्य का विकास बहस से होता है, उपहास से नहीं।

इसका अर्थ यह नहीं कि पुस्तकों की आलोचना बंद कर दी जाए। बिल्कुल नहीं। बल्कि आलोचना और भी अधिक होनी चाहिए—पर वह ऐसी हो जो पाठक को सोचने के लिए प्रेरित करे, न कि पढ़ने से ही विमुख कर दे।

शायद पुस्तकों की समीक्षा लिखते समय कुछ बातें ध्यान रखी जा सकती हैं—

  • यह स्पष्ट किया जाए कि यह मेरा व्यक्तिगत पाठकीय अनुभव है।

  • पुस्तक किन पाठकों के लिए अधिक उपयोगी हो सकती है, इसका उल्लेख किया जाए।

  • केवल कमियाँ नहीं, उसकी विशेषताओं पर भी बात की जाए।

  • यदि पुस्तक हमारी अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतरी, तो उसके कारण बताए जाएँ।

  • लेखक के व्यक्तित्व और पुस्तक की समीक्षा को अलग रखा जाए।

कभी-कभी मुझे लगता है कि पुस्तकों पर एक प्रकार का "अस्वीकरण" होना चाहिए—यह पुस्तक किन पाठकों के लिए लिखी गई है, इसका संकेत दिया जाए। जैसे विज्ञान की पुस्तक और कविता की पुस्तक का उद्देश्य अलग होता है; वैसे ही आत्मकथा, दर्शन, उपन्यास, शोध और प्रेरक साहित्य की अपेक्षाएँ भी अलग-अलग होती हैं। इससे पाठक अपनी रुचि और आवश्यकता के अनुसार चयन कर सकेगा और अनावश्यक निराशा भी कम होगी।

यह बात सत्य है कि लोग एक दूसरे की पुस्तकों के सकारात्मक पहलू को पाठकों के सामने लाते हैं, क्या कोई और भी तरीका है? इससे बेहतर और क्या तरीका हो सकता है पुस्तकों के बारे मे अधिक से अधिक लोगों को बताने का? क्या इसमें कुछ गलत है? गलत तो तब है जब झूठी तारीफ की जाए, इसीलिए अब जब पुस्तक छपवाना आसान होता जा रहा है तो इस बात की जरूरत आन पड़ी है कि भूमिका से पहले एक पृष्ठ इस बात पर हो कि पुस्तक किनके लिए फायदेमंद हो सकती है और पाठकों के किस वर्ग के लिए लिखी गयी है|

अंततः प्रश्न किसी एक पुस्तक या एक लेखक का नहीं है। प्रश्न यह है कि क्या हम ऐसा वातावरण बना रहे हैं जहाँ अधिक लोग पढ़ने के लिए प्रेरित हों, या ऐसा वातावरण जहाँ लोग पुस्तक खरीदने से पहले ही संदेह से भर जाएँ।

यदि हम चाहते हैं कि आने वाली पीढ़ियाँ अधिक पढ़ें, अधिक सोचें और अधिक संवेदनशील बनें, तो हमें केवल अच्छी पुस्तकें लिखने की नहीं, बल्कि पढ़ने की संस्कृति को भी सहेजने की आवश्यकता है।

क्योंकि पुस्तकें केवल पन्नों का संग्रह नहीं होतीं; वे मनुष्य और मनुष्य के बीच चलने वाला सबसे लंबा, सबसे शांत और सबसे गहरा संवाद होती हैं। और किसी भी सभ्यता का भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि वह इस संवाद को कितना जीवित रख पाती है।

 

शुभकामनाएँ

लवकुश कुमार

 अस्वीकरण - इस लेख को सँवारने के लिए, chatgpt का इस्तेमाल किया गया है|


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सत्रहवीं ऑनलाइन साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा 27-06-2026

बीते शनिवार (27-06-2026) हम सबके सामूहिक प्रयास और वरिष्ठजनों के प्रोत्साहन से सत्रहवीं साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा का ऑनलाइन आयोजन सफल रहा, जिसमें निम्नलिखित पुस्तकों/रचनाओं/विषयों पर सार्थक चर्चा हुयी:

  • रूपतिल्ली की कथा – श्री प्रकाश मिश्र (पूर्वोत्तर भारत पर आधारित)
  • ठहरो दु:शाषन – राजीव जोशी (शैक्षिक दखल पत्रिका के जून अंक से एक लेख )
  • जल थल मल – सोपान जोशी
  • एवरेस्ट की कहानी – प्रो० आल अहमद सुरदर (बाल साहित्य)
  • पीपल की छांव में-  पीपल बाबा (स्वामी प्रेम परिवर्तन)
  • शादी होने तक ही पढ़ पाती थीं लड़कियाँ” - हर्षा भंडारी (शैक्षिक दखल पत्रिका के जून अंक से एक लेख )
  • शर्ट का बटन- प्रियंका जोशी (शैक्षिक दखल पत्रिका के जून अंक से एक लेख )
  • 'इकिगाई' (Ikigai) - हेक्टर गार्सिया और फ्रांसिस मिरालेस

  • ·         केवल पढना ही काफी नहीं, जरुरत है पढ़े हुए को साझा करने की, ताकि और लोग भी लाभान्वित हो सकें और इस तरह हमारे लिए भी उनके साथ सामंजस्य बिठाना आसान होगा
  • ·         प्रो पीटर ग्रे, शिक्षा मनोविज्ञान के अमेरिकी अध्येता हैं, जो मुख्यतः शिक्षा और खेलों के अंतर्संबंधों पर उनके गहन शोध के लिए जाने जाते हैं|
  • ·         शिक्षा को समझने के लिए उसके इतिहास को भी समझना होगा
  • ·         हमें उन विद्यालयों की विधि को भी समझना होगा जो परंपरागत विद्यालयों से भिन्न होते हुए भी कुशल नागरिक दे रहे हैं
  • ·         दो कार्यों का लक्ष्य यदि एक ही है तो ताल मेल बिठाकर चलने से अभीष्ट उद्देश्य को पाना आसान हो जाता है|
  • ·         लिखना जरुरी है, इसे एक उदाहरण से समझिये कि यदि आप आज अपने शहर के बारे में कुछ लिखते हैं तो आज के बीस साल बाद वह एक दस्तावेज का कार्य करेगा जो हमें उन बीस सालों में शहर के विकास की यात्रा को समझने में मदद करेगा|
  • ·         अगर आज आप चीज़ों को एक डायरी के रूप में भी दर्ज कर रहे हैं तो कालांतर में एक पुस्तक तैयार हो सकती है|
  • ·         पुस्तक परिचर्चा, चाहे किसी समिति के द्वारा आयोजित हो या किसी व्यक्ति के द्वारा इसका प्रयोजन पढने लिखने और समझ को साझा करने का वातावरण(माहौल) तैयार करना है ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों में पढने की ललक जागे, अतः आयोजक बधाई और सहयोग के पात्र हैं और साथ वह साथी भी धन्यवाद के पात्र हैं जो परिचर्चा में शामिल होकर इसके महत्व और प्रासंगिकता का समर्थन करते हैं|
  • ·         किसी भी चीज़ पर बात रखना तब ही सहज और सार्थक होता है जब हम उसे भली भाँति समझ चुके हों|
  • ·         यदि आप समाज में बेहतरी का बदलाव चाहते हैं तो पढने लिखने की संस्कृति को बढ़ावा देने का कार्य एक अच्छा विकल्प हो सकता है, जिसमें पढने लिखने और किताबों पर बात वाले आयोजनों में सक्रियता से भागीदारी करके, बेहतर माहौल सुनिश्चित किया जा सकता है|
  • ·         आज पिथौरागढ़ के साथ बेरिनाग और बागेश्वर तक भी पुस्तक परिचर्चा के आयोजन पहुँच चुके हैं, यह कार्य आगे बढ़ते रहे इसके लिए समर्पित युवाओं को आगे आना होगा
  • ·         अगर किताब पढ़कर आप उस पर चर्चा नहीं करेंगे तो बात आगे कैसे बढ़ेगी|

 केदारनाथ और पर्यटन, जरूरत इस बात पर सोचने की कि अब आस्था ही खींच रही या फिर रील संस्कृति भी 

तेनजिंग से पहले के अभियानों का इतिहास, ताकि हम बेहतर समझ सकें एवरेस्ट पर फतेह को 

पीपल बाबा को नानी द्वारा बचपन में  ही प्रकृति-प्रेमी बना दिया (सीधे नहीं परोक्ष रूप से)

उत्तर पूर्व के हमारे देशवासियों के साथ जो भी भेदभाव की खबरें हमे सुनने को मिलती हैं इसका कारण है उनके बारे में हमारी जानकारी कम होना, क्योंकि इन पर आधारित साहित्यिक पुस्तकों की संख्या अपेक्षाकृत बहुत कम है|

श्री प्रकाश मिश्र के और भी उपन्यास हैं उत्तर पूर्वी भारत की जनजातियों पर, जिन्हे जरूर पढ़ा जाना चाहिए ताकि हम खुद से अलग एक समाज के बारे में जान सकें ताकि उनके साथ सहज हो सकें और जान सकें कि क्यों किसी के लिए अपनी पहचान बनाए रखने का संघर्ष, उसके जीवन एक एक अंग होता है|

एक बात जो जरूरी है वह है कि ऐसा साहित्य केवल इच्छा की दृष्टि से नहीं, एक जरूरत समझकर पढ़ा जाना चाहिए ताकि आपसी तालमेल, सहजता, एकता और सम्मान सुनिश्चित किया जा सके|

शैक्षिक दखल पत्रिका का प्रकाशन शैक्षिक दखल समिति द्वारा हर छमाही किया जाता है, जोकि शैक्षिक सरोकारों को समर्पित शिक्षकों तथा नागरिकों का साझा मंच है|

पुस्तक परिचर्चा में किसी भी पुस्तक पर बोलने के लिए किताब खत्म होने का इंतज़ार न करें, जितना पढ़ा है उसका संदर्भ देकर भी अपनी बात रखी जा सकता है|

कोई लेख पढ़ा है तो उस पर भी अपनी बात/अवलोकन साझा किया जा सकता है|

लाल बहादुर वर्मा का आदिवासी साहित्य हमे इस तबके को बेहतर समझने और इनके साथ संवेदित होने में मदद कर सकता है|

सोपान जोशी जी की किताब हम सबके के लिए जरूरी होनी चाहिए ताकि हम समझ सकें पर्यावरण और समाज के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी को, 

ह्वेल का मल, अन्य समुद्री प्रजातियों के लिए पोषक तत्व का काम करता है|

ये समय है कि हम विचार करें और अध्ययन भी कि पहाड़ों पर बढ़ते सैलानियों का वहाँ की परिस्थितिकी पर क्या प्रभाव पड़ रहा है|

शिक्षकों को चाहिए कि यदि उन्हे विद्यार्थियों के किसी प्रश्न का जवाब नहीं आता तो उन्हें डांटने के बजाय (ऐसे प्रकरण सुनने को मिलते हैं) उनसे उस पर चर्चा कि जाए और अगर जरूरत पड़े तो समय भी मांगा जाये लेकिन उन्हे डांटकर प्रश्न पूछने के लिए हतोत्साहित न किया जाए, तब ही हम उनके अंदर की जिज्ञासा और सृजनशीलता को सही पोषण दे पाएंगे|

अगर किसी छात्र या छात्रा कि गणित या और कोई विषय कमजोर है और उसके द्वारा उस विषय को आगे चलकर छोड़ दिया जाता है तो कोई जरूरी नहीं कि इसमें उस विद्यार्थी की ही अक्षमता है, बहुत संभावना है कि उस विषय के अध्यापक उतने सक्षम न मिलें हों|

उक्त परिचर्चा में निम्नलिखित पुस्तकसाथी शामिल रहे:
आदरणीय महेश पुनेठा सर, हर्षा भण्डारी मैम,प्रियंका जोशी मैम, विशाल दा (विशाल चंद जी), कर्ण भाईजी,अंशुल मैम, कृष्णा जायसवाल, प्रिया कश्यप, प्रिया जायसवाल, प्रीति जायसवाल, शुभम गुप्ता, और लवकुश कुमार

परिचर्चा का कुशल संचालन, लिटरेरी लैंड, कानपुर के हमारे पुस्तक साथी कर्ण भाई जी ने किया, जोकि परिचर्चा को रोचक और यादगार बनाने वाला रहा|

पुस्तक परिचर्चा मे शामिल सभी पुस्तक साथियों (Bookmates) ने पुस्तक परिचर्चा मे शामिल होकर/अभिव्यक्ति/सराहना/भागीदारी के माध्यम से इस पहल को पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा देने में, मानवीय मूल्यों के पोषण में, अपनी बात को बेहिचक रखने में महत्वपूर्ण माना एवं एक दूसरे के प्रति आभार व्यक्त किया ताकि इस जरूरी कार्य की नियमितता बनी रहे एवं समाज मे एक सकारात्मक बदलाव में अपना विनम्र योगदान सुनिश्चित किया जा सके |

धन्यवाद ज्ञापन के साथ परिचर्चा को अगली परिचर्चा तक के लिए विराम दिया गया|

इस आशा के साथ कि यह रिपोर्ट पाठकों को पुस्तक परिचर्चा को समझने और उसमे शामिल होने के लिए प्रेरित करेगी |

अगली परिचर्चा 04 जुलाई (शनिवार रात 09:00 बजे)  को होगी, शामिल होकर पढ़ने-लिखने की संस्कृति पर काम करने में अपना योगदान सुनिश्चित करें और पुस्तक परिचर्चा से साहित्यिक लाभ लेते हुये अपने दिन की सार्थकता में एक और आयाम जोड़ें|

  धन्यवाद 

-लवकुश कुमार

 

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ग्यारहवीं ऑनलाइन साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा 17-05-2026

बीते रविवार (17-05-2026) हम सबके सामूहिक प्रयास और वरिष्ठजनों के प्रोत्साहन से ग्यारहवीं साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा का ऑनलाइन आयोजन सफल रहा, जिसमें निम्नलिखित पुस्तकों/रचनाओं/विषयों पर सार्थक चर्चा हुयी:

बूढ़ा आदमी और समुद्र - अर्नेस्ट हेमिंग्वे

सांसो को पढ़ता कवि (केशव तिवारी) - सम्पादन डॉ जीवन सिंह 

गबन - मुंशी प्रेमचंद

इकिगाई - लम्बे और स्वस्थ जीवन का जापानी रहस्य 

अखंड ज्योति पत्रिका - गायत्री पीठ 

त्यागपत्र  - जैनेन्द्र कुमार

सही और जरुरी काम में लगें हैं तो हताशा या निराशा में न फंसे

पुस्तक परिचर्चा का सिलसिला जारी रहे ताकि एक मंच मौजूद रहे, साहित्य प्रेमियों के लिए, पुस्तक प्रेमियों के लिए 

परिचर्चा के दौरान समीक्षा ज्यादा लम्बी न रखी जाए और तीन बिंदुओं पर ही अपनी बात में जरुर शामिल किये जाएँ यथा पुस्तक में क्या है, आपको क्यों पसंद आयी और दूसरों को यह पुस्तक क्यों पढ़नी चाहिए|

डॉ जीवन सिंह एक प्रतिष्ठित आलोचक हैं जिन्होंने कविताओं की आलोचना का पैमाना इनका तेवर, जनवादी और लोकधर्मी स्वरुप रखा

केशव तिवारी जी ने अपनी एक कविता में कहा कि यदि वह अपनी कविता के माध्यम से किसी बेईमान आदमी की आँखों में ना खटके तो कविकर्म का दायित्व अपूर्ण रह जाये

केशव तिवारी जी के काव्य में बुंदेलखंड का लोकजीवन, भूगोल, इतिहास और संघर्ष समाहित है|

क्यों पढ़ी जानी चाहिए, सांसो को पढ़ता कवि (केशव तिवारी) - सम्पादन डॉ जीवन सिंह ? ताकि काव्यशास्त्र की समझ आये, कविता विधा के शर्तों का पता चले जिनके बिना कविता अर्थ नहीं पाती, माने कौन से गुण एक रचना को कविता बनाते हैं, न तो छंदयुक्त और न तो छंदमुक्त, कविता को अर्थ मिलता है सन्दर्भ, अंदाज और कथ्य तथा शिल्प के बीच सम्बन्ध से|

मुक्तिबोध की कविताओं की अंतर्वस्तु तक पहुँचने में मददगार हो सकती हैं ऐसे समालोचनात्मक पुस्तकें

ऐसे भी साहसी विद्यार्थी हैं जो पुस्तक परिचर्चा के महत्व और निरंतरता को समझते हुए परीक्षा वाले दिन से पहले दिन भी परिचर्चा में शामिल होने के लिए व्यवस्थित रहते हैं|

 उक्त परिचर्चा में निम्नलिखित पुस्तकसाथी शामिल रहे:

आदरणीय महेश चन्द्र पुनेठा सर, मुकेश जोशी जी, अंशुल मैम, सौम्या मैम,  उर्मिला जायसवाल, विशाल जायसवाल, अरविंद कुमार, प्रिया शर्मा, प्रिया कश्यप, प्रिया जायसवाल, गायत्री जायसवाल, प्रीति जायसवाल, और लवकुश कुमार|

श्रोताओं को परिचर्चा से जोड़े रखने वाला समन्वय और संचालन सौम्या गुप्ता मैम और लवकुश कुमार ने किया|

पुस्तक परिचर्चा मे शामिल सभी पुस्तक साथियों (Bookmates) ने पुस्तक परिचर्चा मे शामिल होकर/अभिव्यक्ति/सराहना/भागीदारी के माध्यम से इस पहल को पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा देने में, मानवीय मूल्यों के पोषण में, अपनी बात को बेहिचक रखने में महत्वपूर्ण माना एवं एक दूसरे के प्रति आभार व्यक्त किया ताकि इस जरूरी कार्य की नियमितता बनी रहे एवं समाज मे एक सकारात्मक बदलाव में अपना विनम्र योगदान सुनिश्चित किया जा सके |

धन्यवाद ज्ञापन के साथ परिचर्चा को अगली परिचर्चा तक के लिए विराम दिया गया|

इस आशा के साथ कि यह रिपोर्ट पाठकों को पुस्तक परिचर्चा को समझने और उसमे शामिल होने के लिए प्रेरित करेगी |

 

अगली परिचर्चा 24 मई (रविवार रात 09 बजे)  को होगी, शामिल होकर पढ़ने-लिखने की संस्कृति पर काम करने में अपना योगदान सुनिश्चित करें और पुस्तक परिचर्चा से साहित्यिक लाभ लेते हुये अपने दिन की सार्थकता में एक और आयाम जोड़ें|

 

  धन्यवाद 

-लवकुश कुमार

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