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चौथी पुस्तक परिचर्चा (29-03-2026) का विवरण यथा पुस्तकें एवं शामिल पुस्तक साथियों के नाम और इनपुट्स

बीते रविवार (29-03-2026) हम सबके सामूहिक प्रयास और आदरणीय महेश चन्द्र पुनेठा सर के प्रोत्साहन से चौथी साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा का ऑनलाइन आयोजन सफल रहा, जिसमें निम्नलिखित पुस्तकों/रचनाओं/विषयों पर सार्थक चर्चा हुयी:

  • ·"कुछ यूँ रचती है हमें किताब"- आर. डी. सैनी 
  • ·जितनी मिट्टी उतना सोना – अशोक पांडे
  • ·तुम पहले क्यों नहीं आए – कैलाश सत्यार्थी
  • ·DSB के गलियारों से – स्मिता कर्नाटक (समय साक्ष्य प्रकाशन)
  • ·खुशहाल जीवन के मंत्र – डॉ विजय अग्रवाल
  • ·Pink मतलब स्त्री नहीं होता (कविता संग्रह)- युवा कवि विकास रमेशानंदी
  • ·चीजों के प्रति सचेत रहकर सुनने का प्रयास
  • ·सर्दियों मे स्तनपान (कविता) - विकास रमेशानंदी
  • ·नापसंद विषय (कविता) - विकास रमेशानंदी
  • ·कलाकार अकिंचन होता है (कविता) - विकास रमेशानंदी
  • लिखने की प्रेरणा

  1. ·एक रंग बिरंगी प्यारी से किताब कैसे एक बच्चे को इतना रमा लेती है कि वह रात का खाना तक नहीं खाता
  2. · कहानी की किताब से पैदा हुयी पढ़ने की रुचि कैसे अकादमिक किताबों के अध्ययन से परीक्षा परिणाम के बेहतर होने से बड़ा होकर राज्य की शिक्षा का मुख्य अधिकारी बनने तक के सफर पर प्रकाश
  3. ·एक किताब लेखक की जिंदगी भर का निचोड़ हो सकती है
  4. ·हर रात एक किताब का कम से कम एक पेज पढ़ने पर ज़ोर, इस तरह साल मे कम से कम 365 पेज
  5. ·यह कहानी रामजी के माध्यम से सामाजिक, शैक्षणिक और व्यक्तिगत संघर्षों को चित्रित करती है, और बताती है कि कैसे एक पुस्तक किसी के जीवन का मार्गदर्शन कर सकती है।
  6. ·कुछ बदलाव सालों का संघर्ष मांगते हैं, जैसे कैलाश सत्यार्थी द्वारा श्रम संहिता मे बदलाव के लिए संघर्ष
  7. ·अपने घर या कार्यालय मे कार्यरत कम पूंजी वाले व्यक्तियों के बच्चों के लिए किताबों और पढ़ने लिखने कि व्यवस्था करना
  8. ·बर्थडे पार्टी मे या कन्या पूजन मे रिटर्न गिफ्ट मे बच्चों को रोचक पुस्तकें देना
  9. ·गिफ्ट मे मिली पुस्तकों से पाठ्यक्रम से इत्तर पढ़ने की नेक शुरुआत
  10. ·लैंगिक भेदभाव पर बात
  11. ·पढ़ने की संस्कृति को बढ़ाने के लिए पुस्तकें भेंट करने के प्रचलन को प्रोत्साहन, शुरुआत मे लघु कथाओं की पुस्तक भेंट करना ताकि एक पेज पढ़ने के बाद अगला पन्ना पलटने का मन करे
  12. ·बिना लाभ हानि की परवाह किए अच्छी पुस्तकें भेंट स्वरूप देना
  13. ·बचपन मे किसी दूसरे को पुरस्कार मे मिली विज्ञान की पुस्तक द्वारा पाठक का विज्ञान के क्षेत्र मे रुचि पैदा होना और फिर परमाणु ऊर्जा विभाग तक का सफर
  14. ·माने पुस्तक जिसको भेंट दी गयी उसके इत्तर भी किसी के काम आ सकती है |
  15. ·कोई भी व्यक्ति जो पढ्ना जानता हो, उसे यदि वक़्त मिल जाए तो वह जरूर भेंट मे मिली हुयी पुस्तक को पढ़ना शुरू करेगा
  16. ·एक पुस्तक साथी ने तो खुद दोस्तों को किताबें भेज दीं ताकि वह उन्हे वापस उसके जन्मदिन पर भेंट स्वरूप भेज सकें

उक्त कार्यक्रम मे निम्नलिखित पुस्तकसाथी मौजूद रहे:

अंशिका, सौम्या, सिद्धि, प्रिया, विशाल चंद,अंकित मिश्रा, लक्ष्मण,कमल, अंशुल, कल्याण, अरविंद, सचिन, गायत्री,अंकित,हिमांशु, राजन,अंजना, कृष्णकांत,उर्मिला, oak ride एवं लवकुश|

पुस्तक परिचर्चा मे शामिल सभी पुस्तक साथियों (bookmates) ने पुस्तक परिचर्चा मे शामिल होकर/अभिव्यक्ति/सराहना/भागीदारी के माध्यम से इस पहल को पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा देने में, मानवीय मूल्यों के पोषण में, अपनी बात को बेहिचक रखने में महत्वपूर्ण माना एवं एक दूसरे के प्रति आभार व्यक्त किया ताकि इस जरूरी कार्य की नियमितता बनी रहे एवं समाज मे एक सकारात्मक बदलाव में अपना विनम्र योगदान सुनिश्चित किया जा सके |

धन्यवाद 

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मिशन ओवर मार्स - फिल्म समीक्षा सह परिचय, सौम्या गुप्ता

मैंने एक बार कहीं पढ़ा था, श्रंगार करती हुई स्त्रियों से ज्यादा सुंदर लगती है संघर्ष करती हुई स्त्रियाँ। ये लाइन मुझे इसलिए पसंद है क्योंकि मैं भी हार नहीं मानती, संघर्ष करती हूं और हर महिला करती है, किसी का संघर्ष जारी रहकर उसे ऊँचाइयों पर ले जाता है और कुछ का संघर्ष बस चार दीवारी में ही खत्म हो जाता है।

आज एक मूवी देखी Mission Over Mars, मुझे लगता है ये उन लोगों को जरूर देखनी चाहिए, जो हार नहीं मानना चाहते और लड़ना चाहते हैं अपनी आखिरी उम्मीद तक।

आप इसमें, कैसे हर मुश्किल का रास्ता निकाला जाता है देख सकते हैं। कैसे डर को भी हथियार बनाया जाता है। मंगल पर जाने वाले मिशन में एक टीम मेंबर को बुरे सपने आते है, और उनकी टीम लीडर उन सपनों को आधार पर जो गलत हो सकता था, उसका तोड़ निकाल लेती है।

जब वो महिलाएँ मिशन के सिवा कुछ नहीं सोचती हो तो किसी को कैसे कम बजट में काम कर सकते है, कैसे अपने पहले के रिसोर्स का उपयोग कर सकते हैं, कैसे मुश्किल में अनजाने ही भगवान हमारे मददगार बन जाते है या प्रकृति का संयोग हमारे पक्ष में होकर हितकारी हो जाता है? आखिरी क्षण जब हमें लगता है कि कुछ नहीं हो सकता तब कुछ ऐसा अचानक से दिख जाता है और लगता है कि ये किया जा सकता है। कैसे यह बात भी ध्यान रखनी चाहिए कि कैसे एक मिशन फेल भी हो सकता है, जब आपको सटीक  गणना से पता चलता है, तभी आप सब सही कर पाते हैं, माने हमारे पास जानकारी और आंकड़े होने चाहिए बेहतर निर्णय निर्माण के लिए, कैसे हम सीमित संसाधनों का बेहतर उपयोग कर सकते हैं, जब हमारे पास काम के लिए सही जुनूनी लोग हो। इससे सीखा जा सकता है, आशा कभी मत खोए, हमेशा नजर समाधान की ओर हो। आपकी काम के प्रति सच्ची भावना आपको सफल बनाती ही है।

देर किस बात की आप भी देख डालिए इस फिल्म को और दे दीजिए एक समावेशी विस्तार अपनी समझ और दृष्टिकोण को।

Happy Movie Watching!

सौम्या गुप्ता 

बाराबंकी उत्तर प्रदेश 


सौम्या गुप्ता जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं, उनकी रचनाओं से जीवन, मानव संवेदना एवं मानव जीवन के संघर्षों की एक बेहतर समझ हांसिल की जा सकती है, वो बताती हैं कि उनकी किसी रचना से यदि कोई एक व्यक्ति भी लाभान्वित हो जाये, उसे कुछ स्पष्टता, कुछ साहस मिल जाये, या उसमे लोगों की/समाज की दिक्कतों के प्रति संवेदना जाग्रत हो जाये तो वो अपनी रचना को सफल मानेंगी, उनका विश्वास है कि समाज से पाने की कामना से बेहतर है समाज को कुछ देने के प्रयास जिससे शांति और स्वतंत्रता का दायरा बढे | 


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समाज की कड़वाहट, नोबेल पुरस्कार, लेखन, अवसाद और जीवन- सौम्या गुप्ता

क्रास्ना होरकाई → 2025 (साहित्य नोबेल पुरस्कार विजेता)

 जब नोबेल कमेटी द्वारा इनसे पूछा गया कि आपके लेखन की प्रेरणा क्या है तो इनका उत्तर था *समाज की कड़वाहट*। 

बड़ा ही अलग सा उत्तर था ये क्योंकि लोग प्रेम के कारण लिखते है, दर्द के कारण लिखते है पर कड़वाहट का प्रेरणा बनना विचारने योग्य बिंदु है। लेकिन यदि हम भारतीय दर्शन देखे तो महर्षि वाल्मीकि, महर्षि वेदव्यास, तुलसीदास, सूरदास ने भी समाज के दिए गए जहर को पीकर अमृत देने का काम किया और ऐसा किया जा सकता है।

 क्रास्ना होरकाई अपने कई -2 पन्नों तक चलने वाले वाक्यों का कारण बताते हुए कहते है कि 

 विचार अंतहीन होते है, जब हम पूर्ण विराम लगाते है तो हमारे विचारों का अबाध प्रवाह बाधित होता है, पूर्णविराम को इंसान तय नहीं करता है, ईश्वर तय करता है, मानवीय अनुभव कभी पूरी तरह खत्म नहीं होते। इसे छोटे या टूटे हुए वाक्यों में कैद नहीं किया जा सकता, जीवन अखंड प्रवाह है, केवल ईश्वर जो संपूर्णता का प्रतीक हैं वही किसी चीज को पूर्ण रूप से खत्म करने का अधिकार रखता है, मनुष्य होने के नाते हम सिर्फ प्रवाह को ही अनुभव कर सकते है।

इसीलिए हम सबको जीवन में आने वाले वो पल जिनमें हम अवसाद से घिर जाते है, हमें किसी से कहना चाहिये और न कह सके तो लिखना चाहिए, खुद के अंदर की, समाज से मिली कड़वाहट को खत्म करने का ये बहुत अच्छा तरीका हो सकता है, जिन लोगों को नहीं सुना गया, उन्होंने लिखा है और ऐसा लिखा है कि हज़ारों साल पहले लिखा गया हम आज भी पढ़ते है, महाभारत के रचयिता व्यास जी भी सबको अपनी बात बताना चाहते थे पर किसी ने नही सुना और भारत को यह अमूल्य धरोहर मिली।

जब कभी जीवन को खत्म करने का विचार भी मन में आये तो एक बार जरूर सोचिये कि यह जिसे आप खत्म करने की बात कर रहे है क्या आपका है, मेरी मत सुनिए, इतने बड़े साहित्यकार की बात पर तो विचार कर लीजिए।

शुभकामनाएं।

- सौम्या गुप्ता 


सौम्या गुप्ता जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं, वो अपनी समझ और लेखन कौशल से समाज में स्पष्टता, दयालुता, संवेदनशीलता और साहस को बढ़ाने के लिए प्रयासरत हैं।


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और हार गया बहुमत (लघुकथा) - संतोष सुपेकर

"दुनिया, समाज सब बहुमत पर ही चलता है पापा, जिसकी ज्यादा सँख्या ज्यादा हो, उसी की तूती बोलती है' नमन पिता से कह रहा था, "अल्पमत को कोई नहीं पूछता।"

"नहीं बेटा" बाहर कम्पाउंड की ओर देखते प्रथमेशजी बोले, "हमेशा ऐसा नहीं होता, एक  अकेला प्रखर बुद्धि, तेजस्वी इंसान भी अपने संकल्प को लेकर दृढ़ हो तो अन्याय की भीड़ को हरा सकता है। दीपक को देखा है न। दिये को। दीया, एक अकेला दीपक, जब प्रकाशित होता है कैसे घनघोर अंधेरे के बहुमत को हरा देता है? वो देखो, बाहर।"

उनकी बातें सुन मुस्कुराती, बाहर अंधेरे कम्पाउंड में खड़ीं मालिनी जी ने तभी दीपक जलाया तो उनके चेहरे के साथ ही *उजले वातावरण ने भी दमक कर* प्रथमेश जी की बात का समर्थन कया।

*और उस रात हार गया अंधेरे का बहुमत।*

© संतोष सुपेकर 

ईमेल- santoshsupekar29@gmail.com


संतोष सुपेकर जी, 1986 से साहित्य जगत से जुड़े हैं, सैकड़ों लघुकथाएं. कविताएँ, समीक्षाएं और लेख लिखे हैं जो समाज में संवेदना और स्पष्टता पैदा करने में सक्षम हैं, आप नियमित अखबार-स्तम्भ और पत्र-पत्रिकाओं (लोकमत समाचार, नवनीत, जनसाहित्य, नायिका नई दुनिया, तरंग नई दुनिया इत्यादि) में लिखते रहे हैं और समाज की बेहतरी हेतु साहित्य कोश में अपना योगदान सुनिश्चित करते रहे हैं | 


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युवाओं द्वारा आत्महत्या ! एक पड़ताल, एक नजरिया

अभी हाल ही में अपने देश के एक विश्वविद्यालय से दुखी करने वाली खबर आई कि इंजीनियरिंग के पहले वर्ष के एक छात्र ने आत्महत्या कर ली और तथाकथित रूप से उसने अपने स्यूसाइड नोट में इसका कारण अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाई के चलते आने वाली दिक्कतों को बताया!

युवा और पढ़ाई, ऐसी ही कुछ खबरें राजस्थान के कोटा से भी आयीं थी कुछ वक़्त पहले कि वहाँ अध्ययनरत कुछ बच्चे पढ़ाई और प्रतियोगी परीक्षाओं के दबाव और सामाजिक दबाव के चलते अवसाद का शिकार हुये और उनमे से कुछ ने आत्महत्या जैसे दुखद कदम उठा लिए |

इन दुखद खबरों के बीच कुछ सवाल हैं, जिन पर मेरी नजर में विचार करना जरूरी हो जाता है हर उस जिम्मेदार इंसान के लिए जो या तो अभिभावक है, या इस देश के भविष्य की चिंता करने वाला नागरिक या खुद कोई युवा, कोई विद्यार्थी |

  • जीवन की असीम संभावनाओं के बावजूद युवा आत्महत्या जैसे कदम क्यों उठा ले रहे?

उन्हे अपने माता पिता और प्रियजनों की इतनी चिंता तो होती है कि स्यूसाइड नोट छोड़ जाते हैं लेकिन खुद के जीवन से इतना निराश क्यों हो जाते हैं ?

कहीं ऐसा तो नहीं कि दुनिया को इतनी ज्यादा अहमियत दे देते हैं कि उसका सामना नहीं कर पाते ! और स्वयं कि असीम संभावना को भूल जीवन को खत्म कर लेते हैं |

एक चुना हुआ काम अगर नहीं हो पा रहा है तो उसके लिए थोड़ा और समय लिया जा सकता है या फिर उसे छोड़कर दूसरा मुफीद काम चुना जा सकता है जो अपनी क्षमताओं में हो, जिसमे मन लगता हो और इतना मन लगता हो कि कम कमाई मे भी उस काम को करने को तैयार हो जाए मन, कोई ऐसा काम जिससे हम समाज के दुखी , जरूरतमंद के लिए कुछ अच्छा काम कर सकते हैं, लेकिन जीवन खत्म कर सारी संभावनाओं को मार देना कहीं से भी बुद्धिमत्तापूर्ण नहीं |

  • लोगों के ताने हमें क्यों परेशान करते हैं ?

कहीं ऐसा तो नहीं कि हमने अपनी आज़ादी को चाहने वाली चेतना के बजाय लोगों द्वारा हमे दिये गए सर्टिफिकेट को ज्यादा मान दे दिया है ! हमारे उपनिषद और आध्यात्मिक साहित्य हमसे कहते हैं कि जीवन का मुख्य उद्देश्य है डर, लालच और मोह से मुक्ति है  लेकिन ये क्या हमने मुक्ति कि तरफ बढ्ने के बजाय खुद को और ज्यादा बांध लिया लोगों कि हमसे अपेक्षाओं से और लोगों को अधिकार दे दिया कि वो हमारा आंकलन करें सतही चीजों पर !


किसी भी इंसान का आंकलन केवल एक बात पर हो कि उसके जीवन मे सच्चाई का क्या स्थान है, रही बात परीक्षा मे परिणाम कि तो उसमे ये हमारा व्यक्तिगत निर्णय होना चाहिए कि हम अपनी जीविका ( जो आत्मनिर्भरता और उत्कृष्टता का साधन है ) के लिए कौन सा काम चुनना चाहते हैं, इसमे ये नहीं होना चाहिए कि दुनिया वाले ज्यादा मान किस काम को देते हैं, दुनिया को ज्यादा मान देने से बचो,

दुनिया से सम्मान मांगने के बजाय देखो कि आपका काम क्या आपको उत्कृष्टता कि तरफ बढ़ा पा रहा है, क्या उसमे सच्चाई है ?, क्या उसमे किसी का शोषण तो नहीं ?

इस बड़ी सी दुनिया मे हर तरह के लोग हैं, बाहरी दिखावा देख प्रभावित होने वाले (मोटी बुद्धि के लोग) और आपके काम की उत्कृष्टता और आपके जीवन मे सच्चाई की स्थान देखने वाले गहरी दृष्टि के लोग भी, इसीलिए काम ऐसा चुनिये जिसमे डूबने का दिल करे, जिसे आप कम पैसे या बिना पैसे मिले भी कर सको फिर फर्क ही नहीं पड़ता कि दुनिया वाले तारीफ कर रहे या नहीं, अगर आपका काम वाकई दुनिया के कुछ लोगों के भी काम का है तो आप न भूखे रहोगे और नहीं गुमनाम, काम मे मज़ा आपको आ ही रही, बाकी रही बात अन्य जरूरतों कि तो वो भी पूरी ही जानी है, पहली जरूरत तो उत्कृष्टता और आज़ादी ही है, रोटी कि व्यवस्था हो जाती है अगर आप वो काम कर रहे जो दुनिया के मतलब  का है, बाकी उस काम को आप कितना महत्व दिलवा पाते हो ये भी आपकी काबिलियत है |


"पेशे से बैंककर्मी अंशिङ्का शर्मा जी कहती हैं कि जीवन आपका है इसके इन-चार्ज आप खुद हो, इसे एक उपयोगी काम मे लगाकर खुद को उत्कृष्टता और आत्मनिर्भरता की मंजिल तक ले जाने का जिम्मा आपका है, लोगों के अनावश्यक सवालों के जवाब देने कि जरूरत नहीं, जरूरत है होश मे काम चुनकर उसमे सही मेहनत करने की |"

-----------------अंशिङ्का शर्मा जी की  शैक्षिक पृष्ठभूमि इंजीनियरिंग की है और वह पेशे से बैंककर्मी हैं |


 

  • क्या अँग्रेजी वाकई बहुत बड़ी दिक्कत है ?

नहीं, बस जरूरत है इसे समय देकर सीखने की, मेहनत करने की |

अमूमन ऐसा देखा गया है कि बारहवीं तक हिन्दी या अन्य माध्यम के जो बच्चे बारहवीं के बाद अँग्रेजी माध्यम वाले कोर्स मे दाखिला लेते ही अँग्रेजी से आतंकित हो जाते हैं उनकी अँग्रेजी और उस विषय दोनों की समझ उस स्तर कि नहीं होती कि वह विषय वो अँग्रेजी मे समझ सकें इसका एक उपाय ये हो सकता है कि अगर ऐसे बच्चे बारहवीं के बाद अँग्रेजी माध्यम मे पढ़ाई को इच्छुक हैं तो पहले ही अपनी अँग्रेजी पर पकड़ को शॉर्ट स्टोरीज की किताब से और उस विषय की महत्वपूर्ण परिभाषाओं और शब्दों का अँग्रेजी रूपान्तरण साथ मे ही मजबूत करें ताकि बारहवीं  के बाद अचानक बोझ न बने और इसके बाद भी अगर कक्षा मे दिक्कत आए तो अपने शिक्षक को अपनी दिक्कत से अवगत कराएं और उनसे मदद मांगे और शिक्षक भी संवेदनशीलता के साथ इस देश के कर्णधार हमारे युवाओं की दिक्कत को समझते हुये उचित व्यवस्था और उपाय करें, लेकिन किसी भी हालत अँग्रेजी या कोई भी विषय न आने पर खुद को हीन न माने, मै फिर इस बात को दोहराता हूँ कि आपकी महत्ता आपकी विषय विशेषज्ञता से नहीं आपके जीवन मे सच्चाई और आपकी आत्मनिर्भरता से होनी है इसीलिए किसी को अधिकार न दें आपको नीचा या इंफीरियर महसूस करने का जब तक आपके जीवन मे सच्चाई और आत्मनिर्भरता है आप ठसक से सीना तानकर चलिये, अपने पैरों पर खड़े हो सकें इसके लिए कोई काम सीखें, कोई ज्ञान हंसिल करें, परंपरागत या गैर परंपरागत इस नेक काम के लिए किसी कि मदद लेनी पड़े तो संकोच न करें, माता-पिता भी बच्चों को ज्ञानवान और काबिल बनाने के लिए पूरे प्रयत्न करें लेकिन दबाव न बनाए बच्चे पर कोई ऐसा कोर्स करने पर जिसमे उसे रुचि न हो, जो कुछ अभिभावक जानते हैं वो बच्चे को जरूर बताएं, फायदे नुकसान, तथ्यों के साथ और इस तरह मदद करें उसकी सही डिसीजन लेने मे और रखेँ गुंजाइश इस बात की कि उनका बच्चा अपनी असहजता पर खुलकर बोल सके,

ऐसा माहौल बिलकुल न बनाएँ कि उसे अपना डिस कम्फर्ट व्यक्त करने मे संकोच हो, बच्चे को बोल दें कि अपना डिस कम्फर्ट या असहजता व्यक्त करना उसका अधिकार है |

“हमें लोगों की नजर में नहीं स्वयं कि नज़र मे ऊंचा उठने की जरूरत है सच्चाई और एक सीमा के बाद के आत्मनिर्भरता लाकर “

“लोग तो अपनी जरूरत और मूड के हिसाब से मान देते हैं ऐसे मान को मान नहीं भी दोगे तो चलेगा लेकिन जीवन मे ईमानदारी रखना, न स्वयं से और न ही दूसरों से कोई झूठ, सच बोलिए चीजों को बेहतर व्यक्त करना सीखिये अभ्यास और विश्लेषण से |”

  • क्या हम जानते भी हैं खुद को ?

हम सबके भीतर दिव्यता है अपने काम मे उत्कृष्टता लाकर उसे मैनीफेस्ट कीजिये, “जो आनंद काम को बेहतर तरीके से करने, और तकलीफ मे या वाकई के जरूरतमंद जीव की मदद मे है वो बड़े बड़े मनोरंजन मे नहीं |”

 

“जो एडवैंचर सच्चाई के लिए काम करने मे हैं वो बड़े बड़े एडवैंचर गेम्स मे नहीं |”

 

  • क्या हम बच्चों को शुरूआत से ऐसा माहौल और समझ दे पा रहे हैं जिससे कि अफसोस करने की स्थितियां कम से कम बने

जीवन मे अफसोस कि सिचुएशन से बचा जा सकता है पहला तो चीजों को गहराई मे समझ कर और खुद के लिए कुछ भी चुनने से पहले दूसरों की नकल करने के बजाय पहले खुद को फिर खुद कि असली जरूरतों को जानकार और निर्णय के आधार मे सच्चाई को रखकर नकि कोई डर या लालच को रखकर |


जब जरूरत हो कोई इंसान चुनने कि तब उस इंसान से जीवन कि गहराई पर बात कर लें, अगर उस इंसान मे जीवन को गहराई से समझने का रुझान होगा तो वो आपके साथ रिश्ते मे भी गहराई ल पाएगा/पाएगी |


- लवकुश कुमार, भौतिकी मे परास्नातक हैं और सामाजिक विषयों पर लेखन और चिंतन अपना दायित्व समझते हैं और दृढ़ विश्वास रखते हैं कि स्पष्टता ही मजबूत कदम उठाने मे मदद करती है और इस विश्वास के साथ कि अच्छा साहित्य ही युवाओं को हर तरह से मजबूत करके देश को महाशक्ति और पूर्णतया आत्मनिर्भर बनाने मे बेहतर योगदान दे पाने मे सक्षम करेगा, वह साहित्य अध्ययन को प्रोत्साहित करने को प्रयासरत हैं :-  

 

युवा आत्महत्या क्यों करते है? इस पर सौम्या जी के विचार और आबजरवेसन इस विषय पर और गहराई देने वाले हैं :

उनके शब्दों मे :

  • मुझे इसका एक कारण, जो बहुत बड़ा कारण लगता है वो है, 'पैरेंटिंग' । क्योंकि बच्चों के दिमाग में क्या जा रहा है और इस समाज को वो किस नजरिए से देखते है वो बहुत हद तक परवरिश पर निर्भर करता है।

 

  • दूसरा प्रमुख कारण है हमारे संस्कार या Value System, आज अगर देखा जाए तो एकल परिवार है, इसीलिए जो नैतिक मूल्यों को और समझ को परिपक्व करने वाली हमारे सच्चे आदर्शों की कहानियाँ उन तक पहले आसानी से  पहुँच सकती थी उनके लिए हमे अलग से प्रयास करना होगा। आज के समय मे जब माता-पिता दोनों ही प्रत्यक्ष रूप मे राष्ट्रनिर्माण मे योगदान दे रहें है, इस परिस्थिति मे एक और परीक्षा है माता पिता के सामने  कि अपनी व्यावसायिक जीवन के साथ सामंजस्य बिठाते हुये अपने बड़े होते बच्चों के भावनात्मक बदलाव को समुचित तरीके से देख पाएँ और उन्हे सही समझ देकर हर चुनौती के लिए तैयार कर पाएँ, इसके लिए जरूरी है कि वो अपने घरों मे जरूरी साहित्य रखें, माने जीवन और दुनिया की समझ पर आधारित जीवनियाँ, कहानियाँ, निबंध, उपन्यास और कविताओं के साथ आध्यात्मिक निबंध और लेख, जिन्हे  माता पिता पहले खुद पढ़ें और फिर  बच्चों को प्रोत्साहित करें और नियमित इस पर चर्चा करें अगर ऐसा न किया जा सका तो  इस  मोबाइल जैसी शक्ति जो विनाशक भी हो सकती है, उनके हाथ में तो रहेगी लेकिन उसका इस्तेमाल कैसे करना है उसमे क्या देखना है और किस चीज़ से बचना है इसकी समझ उनमे न होगी और फिर उनके भटकने की और अनुचित प्रभावों और प्रचारों मे फँसने की संभावनाएं बढ़ जाएंगी |

 

तीसरा प्रमुख कारण है बढ़ता भौतिकवाद -> ऐसा देखने को मिला है कि कुछ लोगों द्वारा आज संतोष और शांति जैसे मूल्यों को बहुत नकारात्मकता के साथ लिया जाता है, और ऐसे लोगों को संख्या संक्रामक रोग की तरह तेजी से बढ़ रही है। अगर हम अपनी सच्ची जरूरतों की बात करे तो वो है रोटी, कपड़ा, मकान, ज्ञान ( इंटरनेट/ किताबें )। इन जरूरतों के लिए हमें करोड़ो - लाखों के पैकेज की जरूरत नहीं होती। हाँ लेकिन अगर आप इतने महत्वाकांक्षी हैं कि स्वयं की आज़ादी और जीवन मे सच्चाई से ज्यादा बाहरी सम्मान को ही सब कुछ समझते हैं तो ये अवसाद का एक कारण बन जाता है। अन्यथा भारतीय चेतना हमेशा से ही इतना चाहती है कि आत्मनिर्भता, सचाई और ईमानदारी बनी रहे जीवन मे और हम अच्छे से जीवन यापन कर सके।

“हमें बाजारवाद, वाणिज्यवाद में फंसाया जाता है और दुर्भाग्य ये है कि हम फंसते है।“

  • चौथा कारण अपनी जड़ों से अलग होना - धर्म व अध्यात्म हमारी जड़ें है। अगर हम एक बार सच्चे धर्म व अध्यात्म को समझ ले तो जिंदगी सिर्फ आसान नहीं होगी बल्कि आप लोगों को और उससे पहले स्वयं को जान सकेंगे और इस समाज के लिए कुछ कर सकेंगे जो लोगों के जीवन मे आत्मनिर्भरता और समृद्धता ला सके उन्हे संवेदनशील बना सकें
  •  
  • ऐसा होने का कारण क्या हो सकते हैं ? आइये प्रयास करते हैं जानने का :

आज के संदर्भ में कहीं इसका सबसे बड़ा कारण हमारे हाथ में छोटी सी device मोबाइल का होना और फिर इस पर अत्यधिक निर्भरता तो नहीं ? इसी मोबाइल की वजह से आज न हमारे पास अपने साथ के लोगों के साथ बैठ चर्चा का समय है और न ही चीजों को सूक्ष्मता मे देख पाने का धैर्य, बस लगें हैं सतही मनोरंजन मे और उस ज्ञान को पाने मे जो चार लोगों के बीच शेखी बघारने मे तो काम आ सकता है लेकिन असल जीवन और कार्यक्षेत्र मे किसी काम का नहीं | नतीजा ये कि जब उच्च साहित्य से संपर्क नहीं रहा तो हमारी संवेदनशीलता भी कम हो गयी और हम दूसरों की तकलीफ के प्रति कम संवेदनशील हो गए इसीलिए उन्हे हल करने के प्रयास भी कम हो गए और दूसरों कि तकलीफ कम करके जो आनंद मिलता है उससे भी हम अछूते रह गए, पास क्या रह गया उथला मनोरंजन !

  • आज न जाने कितनी बीमारियाँ हद से ज्यादा स्क्रीन टाइम से हो रही और हम है  कि Reels scrolling मे लगें, ये तक नहीं पता कि हम ढूंढ क्या रहे हैं उनमे, कारण ? जीवन मे उत्कृष्टता कि चाह न रहना इसीलिए काम मे जी न लगना और खुद को शांत करने के लिए सतही मनोरंजन और नशा की शरण लेना
  • इस समस्या का एक हल ये हो सकता है कि युवाओं के महान लोगों कि जीवनियां पढ़वाई जाएँ जिसके दो फायदे होंगे पहला ये कि वो इन महान लोगो की तकलीफ़ों से परिचित होंगे और ये जान पाएंगे कि इनकी तकलीफ़ें कितनी कम या छोटी हैं उन तकलीफ़ों और कठिनाइयों से जो महान लोगों ने झेली |

दूसरा ये कि वो ये जान पाएंगे कि जीवन का असली और टिकाऊ आनंद है अपने काम की उत्कृष्टता और जरूरतमंद लोगों के लिए काम करना है, लोगों का जीवन आसान और सुविधाजनक हो सके इसके लिए काम करने मे, लोगों के जीवन मे गरिमा, बंधुता और आत्मनिर्भरता के लिए काम करने मे है |

 

  • एक बात और जो समझनी बहुत जरूरी है वो है कि आजकल के जीवन में बाजारवाद और वाणिज्यवाद के कई नुकसान हैं:

बाजारवाद और वाणिज्यवाद आजकल के जीवन में कई तरह के नुकसान लाते हैं। ये हमें भौतिक सुखों के पीछे भागने के लिए प्रेरित करते हैं, जिससे हम अपनी असली ज़रूरतों और मूल्यों से दूर हो जाते हैं। अस्वस्थ प्रतिस्पर्धा और असमानता बढ़ती है, जिससे सामाजिक तनाव और असंतोष पैदा होता है। इसके अलावा, ये हमारी मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर भी बुरा असर डालते हैं, क्योंकि हम लगातार दूसरों से तुलना करते रहते हैं और तनाव में जीते हैं।


 

  • मोबाइल फोन के अत्यधिक उपयोग के कुछ अन्य नकारात्मक प्रभाव:

मोबाइल फोन का अत्यधिक उपयोग कई नकारात्मक प्रभाव डालता है। यह हमारी नींद को बाधित करता है, जिससे थकान और एकाग्रता की कमी होती है। सोशल मीडिया और अन्य ऐप्स पर लगातार लगे रहने से हमारा ध्यान भटकता है और हम वास्तविक दुनिया से कट जाते हैं। शारीरिक निष्क्रियता और आंखों की समस्याएँ भी बढ़ती हैं। इसके अलावा, मोबाइल फोन की लत हमें सामाजिक रूप से अलग कर सकती है और हमारी अन्य लोगों के साथ तालमेल बैठा पाने कि क्षमता को प्रभावित कर सकती है जिससे तनाव आ सकता है जो हमारे सोंचने समझने की क्षमता ओर नकारात्मक प्रभाव डालता है और हम घातक कदम उठाने कि तरफ बढ़ सकते हैं |


 

  • अपने जीवन में आध्यात्मिकता को उचित महत्व न देना भी ज़्यादातर मानवीय समस्याओं की जड़ है :

आध्यात्मिकता हमारे जीवन में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह हमें आंतरिक शांति, संतोष और उद्देश्य की भावना प्रदान करती है। यह हमें तनाव और चिंता से दूर रहने में मदद करता है, जिससे हमारी मानसिक स्वास्थ्य बेहतर होता है। आध्यात्मिकता हमें नैतिक मूल्यों और सही-गलत की समझ देती है, जिससे हम बेहतर इंसान बनते हैं। यह हमें दूसरों के प्रति सहानुभूति और दयालुता विकसित करने में भी मदद करता है, जिससे सामाजिक संबंध मजबूत होते हैं।

  • हम और क्या - क्या कर सकते हैं एक सफल और सार्थक जीवन के लिए ? आइये विचार करते हैं :

आप एक बार अपना सच्चा विश्लेषण कीजिए कि आपके हाथों में मोबाइल है ? या आप मोबाइल के हाथों में है ?आप 24 घंटे के लिए अपना मोवाइल Switch off करके रख दीजिए और उस समय अपने मस्तिष्क पर प्रभाव का विश्लेषण कीजिए।

दयानंद सरस्वती ने कहा था 'वेदों की और लौटो', आप सीधे वेद नहीं पढ़ पा रहे तो कम से कम अन्य सरलीकृत आध्यात्मिक साहित्य से (गायत्री परिवार वैबसाइट लिंक) अध्यात्म को जान लीजिए। इंटरनेट पर ब्रम्हाकुमारी, गायत्री परिवार जैसे  बहुत से संस्थानों के प्रोग्राम आते है, आप उनसे सीख सकते है।

आप महात्वाकांक्षी बनिए। लेकिन टार्गेट मे इस दुनिया की किसी चीज के बजाय सबसे पहले उत्कृष्टता, ईमानदारी और आत्मनिर्भरता को रखिए, इतना कर लेने के बाद आपको एहसास हो जाएगा कि दुनिया मे ऐसा बहुत कुछ या कहिए ज़्यादातर चीज़ें ऐसी हैं जिनको टैस्ट करने या हांसिल करने की बिलकुल भी जरूरत नहीं हैं |

“इंसान की ज़्यादातर परेशानियों का कारण ही उन चीजों को चाहना है जिसकी उसे बिलकुल भी जरूरत नहीं है”

 न ही जरूरत से ज्यादा पाने की आशा रखिए। महत्व देना है तो चेतना को दीजिए, शरीर को नहीं। जरूरी नहीं है कि बाजारवाद के नाम पर आपको जो परोसा जाए वो सब आप कंज्यूम ही कर लें |

  • अपनी दृष्टि को विस्तार दीजिए। दुनिया को सिर्फ अपने चश्मे से मत देखिए। अच्छा साहित्य पढ़िये , महान् व्यक्तित्वों के बारे में पढ़िए । अपने से कमतर जीवन जीने वाले लोगों के विषय में सोचिए। उनके लिए कुछ कीजिए। मदद हमेशा धन से नहीं होती। कभी-2 प्यारे-मीठे बोल धन से ज्यादा कारगर होते हैं। पहले खुद से, फिर अपनों से और फिर समाज से आप कुछ अच्छा करने का वादा कीजिए। और इस सच्चे उद्देश्य के लिए लग जाइए।
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  • मुझे व्यक्तिगत रूप से लगता है कि इस दुनिया का सबसे बड़ा सुख किसी की मदद करके ही मिल सकता है और इससे आप किसी भी अवसाद से पार पा सकते हैं।“
  • प्यारे और मीठे बोल हमें दूसरों के साथ बेहतर संबंध बनाने और सकारात्मक वातावरण बनाने में मदद करता है।
  • दूसरों की मदद करने से हमें खुशी मिलती है और हम अपने जीवन को सार्थक बना सकते हैं।
  • मेरा मानना है कि हम दूसरों की मदद करके अवसाद से पार पा सकते हैं। दूसरों की मदद करने से हमें सकारात्मक भावनाएं मिलती हैं और हम अपने जीवन में एक उद्देश्य प्राप्त करते हैं, जिससे अवसाद कम होता है।

 

सौम्या गुप्ता जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ सामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन की आदत भी रखती हैं |




 

इस आशा के साथ कि यह लेख पाठकों को स्पष्टता देगा|

बातों को तर्क और व्यावहारिकता की कसौटी पर परखें और संतुष्ट होने पर ही लागू करें |

शुभकामनाओं के साथ |

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ये वेबसाइट क्यों और इसमे इतनी कैटेगरीज क्यों ? – एक पहल

इस तरह की वेबसाइट पहले ही कई हैं जिसमे अपना अनुभव या ज्ञान साझा करते हैं लोग, उसी तरह यह भी एक वेबसाइट है बस अंतर इस बात का है कि इंसान के अनुभवों मे जो कुछ अंतर होता है वो होता है अलग-अलग परिस्थितियों के चलते, इसीलिए यहाँ मै अपने तरीके से अपने अनुभव व्यक्त करने का प्रयास कर रहा हूँ  जो उनके लिए तो उपयोगी होंगे ही जिन्हे वही माहौल मिल रहा जो मुझे मिल रहा और उनके लिए भी उपयोगी हो सकता है जो अन्य माहौल से हैं और अपनी समझ को और समावेशी करना चाहते हैं |


जैसे एक ही बात को कहने के तरीके अलग अलग होते हैं, कोई कविता, कोई शायरी, कोई व्यंग तो कोई सपाट लेख लिखकर व्यक्त करता है अपने विचार और संदेश वैसे ही पाठक भी कई तरह के होते हैं कोई कविता तो कोई कोई लेख या कोई और किसी अन्य साहित्यिक विधा मे बात सुनना/पढ़ना पसंद करता/करती है, मुझे विश्वास है कुछ पाठक/श्रोता ऐसे भी होंगे जिन्हे मेरी लेखन शैली प्रभावित करेगी और मेरी बात और संदेश/अनुभव को सही परिप्रेक्ष्य मे समझ सकेंगे, जिन पाठकों को कोई बात अजीब लगे, निसंकोच मुझे लिख भेजे ( वेबसाइट  पर दिये कांटैक्ट फॉर्म से  ) |


एक समय था जब मेरे युवा और संवेदनशील मन में समाज और स्वयं को लेकर बहुत सवाल थे और मेरे समय का एक महत्वपूर्ण हिस्सा इन बातों पर मंथन पर खर्च होता था, लोगों और स्वयं के मन को समझने के लिए मै लोगों से बात करता था, कभी लोग न मिलें तो किताबें पढ़ता था और कभी ये ही न पता हो कि इस मामले के लिए कौन सी पुस्तक पढ़नी है तो ऐसे ही स्वयं सोचना, विचारना और वस्तुस्थिति का विश्लेषण करता था।

कुछ किताबों को पढ़कर मानो ऐसा लगा जैसे मेरे लिए ही लिखी गयी हों, मेरा भी ऐसा ही कुछ प्रयास है की कोई दुविधा और बेचैनी मे फंसा हुआ इंसान मेरे लेख, मेरे अनुभव या संदेश पढे और उसे लगे की अरे ये तो लग रहा कि उसके लिए ही लिखा हुआ लेख है|


मेरा प्रयास है कि जो युवा एक सीधा, सरल और समृद्ध जीवन जीना चाहते हैं मै इस मंच से उनकी जिज्ञासाओं को हल कर पाऊँ, मै अपने प्रयास मे कितना सफल रहा यह तो आप पाठक ही निर्धारित कर पाएंगे, प्रयास जारी रहेगा |

खासकर वो लोग जो सीधा और सरल जीवन जीना चाहते हैं लेकिन उन्हें इधर उधर से सुनने को मिलता है कि दुनिया में सीधा और सरल रहकर जीना मुश्किल है और लोग तमाम तरह के झूठ बोलने को उकसाते हैं और तरह तरह के दिखावे करने को बोलते हैं।

"जबकि बात केवल इतनी सी है कि सीधा और सरल होने के साथ हमें समझदार होना है और काबिल ( कौशल युक्त, सजग और जागरूक ) भी ताकि स्पष्टता रहे और हम अपनी क्षमताओं के अनुरूप आत्मनिर्भर बन सकें |"


एक बात स्पष्ट रूप से समझनी होगी कि आप अगर बात - बात पर झूठ बोलते हैं तो आपके लिए सच असहनीय हो जाता है और नतीजतन सच्चे लोग आपसे दूर होने लगते हैं और आप झूठे लोगों से घिर जाते हैं।

जो इंसान स्वयं ही झूठे बहाने बनाता हो उसके लिए झूठे और सच्चे इंसान में फर्क करना मुश्किल हो जाता है और किसी पर यकीन करना भी, या फिर कोई लंबे अरसे तक झूठे लोगों के बीच रहे जो बार-बार वादा करके तोड़ते हों या फिर कहते कुछ हों और करते कुछ इस तरह की परिस्थितियों का भुक्तभोगी इंसान  भी किसी पर जल्द यकीन नहीं कर पाता |


"अगर इंसान जीवन में एक सही उद्देश्य, सही काम को पकड़ ले तो उसे बाहरी परिस्थितियां और लोगों की बातें उस सीमा तक प्रभावित नहीं कर पाती कि वह अशांत हो जाए |"


क्रोध आपकी मजबूरी और आपके ऊपर दबाव (अपेक्षाओं का, डर का या आकांक्षाओं का ) को व्यक्त करने कि प्रक्रिया है, आपका जीवन जितना दबावमुक्त होगा और आप जितना खुलकर अपना पक्ष रखते होंगे उतना ही आपके अंदर क्रोध कम पनपता है, क्रोध अंदर ही होता है उसे भड़काने का काम करती हैं बाहर कि घटनाएँ, जरूरत है स्वयं पर नज़र रखने की|


दुनिया से धोखा तब मिलता है जब हम या तो डर या लालचवश या फिर अशांत अवस्था मे कोई कदम उठाते हैं या फिर कोई चुनाव ( पसंद/नापसंद ) करते हैं, ज्ञान और स्पष्टता के माध्यम से हम डर, लालच और मोह से मुक्त हो सकते हैं और अभ्यास से खुद को संयत रख सकते हैं ताकि अशांति की अवस्थाएँ कम हों और हम ठगे जाने से बच सकें |

ध्यान रखें की जब हमारे निर्णयों के केंद्र मे डर या लालच के बजाय असली जरूरत होगी तो ठगे जाने की संभावना कम होगी |


ये सब कुछ हमे सीखने, जानने को मिलता है आत्मवलोकन, साहित्य और आध्यात्मिक साहित्य के अध्ययन से, जिसके महत्व को रेखांकित करके यहाँ अध्ययन के लिए लोगों को प्रेरित करने का प्रयास किया जा रहा है |

"हमारी समझ और स्पष्टता के साथ हमारे आदर्श, चुनाव और पसंद-नापसंद ही हमारे जीवन की दिशा निर्धारित करते हैं |"  


इन्हीं सब बातों के दृष्टिगत, मैंने यह वेबसाइट बनाई ताकि युवाओं से अपने अनुभव साझा कर सकूं जिससे  ज्यादा से ज्यादा युवा, फिजूल कार्यों, दिखावों और सतही समस्याओं से उलझे बिना खुद की ऊर्जा और संसाधनों को स्वयं की और देश की समृद्धि में लगा सकें।


पढ़ें, सुने, अवलोकन करें और तर्क की कसौटी पर कसें फिर स्वीकार करें |

 

शुभकामनायें

-लवकुश कुमार

 

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समाज की बेहतरी के लिए कुछ बड़ा करना चाहते हैं ? एक विकल्प

कई रास्ते हो सकते हैं ऐसा करने के, कुछ आपने सोंचे/देखे होंगे 

एक रास्ते की बात मै करना चाहता हूँ, शायद आपको पसंद आ जाये:

एक संयत और ठसक वाला संतुलित जीवन जीकर आप एक आदर्श पेश कर सकते हो 

इससे क्या होगा ? इससे ये हो सकता है कि

  1. आपके जैसी ही इच्छा रखने वाले लोगों को एक रास्ता मिल जायेगा
  2. जब आप एक संयमित और संतुलित जीवन जियेंगे, कसरत, वित्तीय आत्मनिर्भरता और अध्यात्मिक अध्ययन जिसमे शामिल हो 

तो मानसिक शांति और उत्कृष्टता हांसिल होगी |

       3. ईमानदारी के साथ ठसक (बिना किसी अनुचित दबाव में आये ) वाला जीवन जीकर आप एक आदर्श जीवन की मिशाल बन सकते हैं 

आपको  और आपके जीवन की शांति को देख और लोग भी प्रेरित हो सकते हैं |

        4. जब आप अपने जीवन में ईमानदार होते हो माने कथनी और करनी में एक होते हो और अपने हर एक निर्णय के पीछे के केंद्र पर नज़र रखते हो तो उत्कृष्टता आती है जीवन में / कार्यों में जो दूसरों के लिए प्रेरणा बनती है |

इस तरह आपके काम में नए लोगों का साथ भी जुड़ सकता है और अगर लोगों का साथ मिलने में वक़्त भी लगा तो कम से कम आप एक प्रेरणादायक जीवन जी पाओगे और

इतनी संतुष्टि रहेगी की आपने किसी अव्यवस्था को बढ़ाने में सहयोग नहीं किया, बाकि संयोग होते चले गये और जरूरी कौशल विकसित होते गये तो कारवां आगे बढेगा लोग जुड़ते जायेंगे 

आखिरकार समाज के लिए काम करना है तो आगे बढ़ते रहेंगे जैसा समाज का साथ मिलेगा वैसी गति रहेगी, किसी भी हालत में एक बेहतर जीवन जीना है जिसका ध्येय उच्च मानक स्थापित करना हो, लोगों का साथ या पहचान मिले या न मिले, हाँ अपने काम को बड़े मंच पर लाकर हम इसे ज्यादा लोगों की नज़र में ला सकते हैं, इससे ज्यादा लोगों का साथ मिलने की गुंजाइश बन जाएगी |

यहाँ पर मै साहिर लुधियानवी साहब की कुछ पंक्तियाँ उद्धृत करना चाहूँगा :

माना कि इस ज़मीं को न गुलज़ार कर सके
कुछ ख़ार कम तो कर गए गुज़रे जिधर से हम

चर्चा के लिए राय जरूर साझा करें - lovekush@kumarchetna.in

शुभकामनायें

-लवकुश कुमार  

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दुनिया और जीवन को लेकर समझ और स्पष्टता के लिए कुछ उक्तियाँ - भाग -3

इन उक्तियों को मैंने अपने बेटे और भतीजे के जन्मदिन वाले वीडियो मे डाला था, ज्यों का त्यों आपके सामने प्रस्तुत है 

बेटे आज तुम्हारे जन्मदिन पर मेरी तरफ से मेरी समझ और मेरे अनुभव से कुछ बातें-

  • न चिंता, न चाहत, स्वभाव तुम्हारा है बादशाहत
  • एक बात याद रखना बेटा की

           जो भयानक है, वो कुछ छीन नहीं सकता

           और जो आकर्षक है, वो कुछ दे नहीं सकता

  • व्यर्थ है मन को बांधना, समझदार बनना
  • न एकाग्रता, न नियंत्रण, मात्र होश
  •  यथार्थ है सहज जानना
  • जवानी अकेले दहाड़ती है शेर की तरह, ऐसे जवान बनना
  • आदर्शों को अस्वीकार करना
  • बड़े होगे तो प्रेम को समझना बेटा :
  • दूसरे की चिंता करते रहने को प्रेम नहीं कहते
  • प्रेम की भीख नहीं मांगते, न प्रेम को दया मे देते हैं
  • प्रेम और मोह मे फर्क समझना बेटा
  • जो बढ़े घटे, आकर्षित करे, वो प्रेम नहीं
  • घटनाएँ बहायेंगी, तुम अडिग रहना
  • ऐसा कर्म जो आज़ादी दे दे
  • आज़ादी किससे ? डर और लालच से 
  • इस बात को समझना की जहां आशक्ति वहाँ दुख
  • जिज्ञासा करो , संशय नहीं
  • सुख और दुख मे फर्क ना महसूस हो जहां दिल को उस मुकाम पर लेते  जाना  बेटा
  • सपने से बाहर आकार स्वयं का अवलोकन करना बेटा
  • मान अपमान से परे हटकर सत्य और शांति के लिए काम करना
  • इस बात को समझना बेटा की बुद्धि नहीं, बुद्धि का संचालक महत्वपूर्ण है  

जन्मदिन की शुभकामनाएं और बधाई बेटा

संदर्भ - आचार्य प्रशांत  की शिक्षाओं और अन्य आध्यात्मिक साहित्य के साथ स्वयं की अनुभवजनित समझ पर आधारित 

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दुनिया और जीवन को लेकर समझ और स्पष्टता के लिए कुछ उक्तियाँ - भाग -2

इन उक्तियों को मैंने अपने बेटे और भतीजे के जन्मदिन वाले वीडियो मे डाला था, ज्यों का त्यों आपके सामने प्रस्तुत है 

बेटे आज तुम्हारे जन्मदिन पर मेरी तरफ से मेरी समझ और मेरे अनुभव से कुछ बातें-

 

  • जितना जीना बहादुरी और आज़ादी से जीना बेटा
  • समाज के हर तबके की दिक्कत और आकांक्षाएँ समझना
  • ना दुख से घबराना ना सुख की तरफ झुकना
  • सुख लालच देता है और दुख देता है डर
  • जीवन का सीमित ईंधन कामनाओ वासनाओ मे मत जलाना बेटा
  • लोगों के जीवन मे स्पष्टता, शांति और प्रेम लाने के प्रयास करना बेटा
  • लोगों को अपना आदर्श बनाने से पहले पड़ताल करना बेटा
  • आनंद और सुख मे अंतर करना सीखना बेटा
  • शांति को खुशी से ऊपर रखना और झूठे आनन्द से बचना
  • मन नए से डरता है, नए की समझ हंसिल करना बेटा
  • सहायता की प्रतीक्षा व्यर्थ है, जो संसाधन हों उनके साथ आगे बढ़ना
  • साहसी मन समस्या को नहीं स्वयं को सुलझाता है
  • अपने प्रति ईमानदार और अपने प्रति हल्के रहना बेटा

जन्मदिन की शुभकामनाएं और बधाई बेटा

संदर्भ - आचार्य प्रशांत  की शिक्षाओं और अन्य आध्यात्मिक साहित्य के साथ स्वयं की अनुभवजनित समझ पर आधारित 

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दुनिया और जीवन को लेकर समझ और स्पष्टता के लिए कुछ उक्तियाँ - भाग -1

इन उक्तियों को मैंने अपने बेटे और भतीजे के जन्मदिन वाले वीडियो मे डाला था, ज्यों का त्यों आपके सामने प्रस्तुत है 

बेटे आज तुम्हारे जन्मदिन पर मेरी तरफ से मेरी समझ और मेरे अनुभव से कुछ बातें-

  • ज्ञान हंसिल करो और निडर बनो
  • काबिलियत हांसिल करो और आत्मनिर्भर बनो
  • यथार्थ तुम उतरो यथार्थ के धरातल पर
  • स्वयं की समझ से जीवन को सही दिशा देना
  • ज़िंदगी झेलने के लिए नहीं खेलने के लिए है , खूब खेलो बेटा, मैदान हम देंगे, माहौल हम देंगे
  • न छोटे हो न कमजोर हो, अपनी ताकत जगाओ तो सही
  • अच्छे की तारीफ करना बेटा, साथी पाओगे, अच्छे लोग पाओगे
  • बुरे की आलोचना करना एक अलग नाम बनाओगे
  • छोटे से छोटे काम को भी अच्छे से करना, उत्कृष्टता पाओगे, शांति पाओगे
  • अनुभवी लोगों की बात को सुन लेना, सही लगे तो मान लेना, नुकसान से बचोगे
  • परिवार से इतर जनसमान्य के लिए भी काम करना
  • सत्य को अपना साथ देना और मजबूत करना
  • शिक्षा से खुद की और दुनिया की समझ हंसिल करना
  • बूढ़े और कमज़ोरों की रक्षा करना

जन्मदिन की शुभकामनाएं और बधाई बेटा

संदर्भ - आचार्य प्रशांत  की शिक्षाओं और अन्य आध्यात्मिक साहित्य के साथ स्वयं की अनुभवजनित समझ पर आधारित 

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