लगभग हर दौर में दो तरह के लेखक रहे हैं—एक वे जो भाषा की अंतिम चमक-दमक और शिल्प पर वर्षों काम करते हैं, और दूसरे वे जो समय की पुकार सुनकर तत्काल बोलते हैं। समाज को दोनों की आवश्यकता होती है।
मेरी पुस्तक "अंतस – ज़रा ठहरिए" पर पिछले कुछ दिनों में अनेक प्रतिक्रियाएँ मिलीं। इन प्रतिक्रियाओं में एक रोचक अंतर दिखाई दिया।
किशोर और युवा पाठकों का एक बड़ा वर्ग कह रहा है—
"सर, यही तो हम ढूँढ़ रहे थे।"
"बहुत से ऐसे सवाल पहली बार पढ़ने को मिले जिन पर हमने कभी सोचा ही नहीं था, या इस तरह से नहीं सोचा था।"
"यह किताब जैसे हमारी पीढ़ी के लिए ही लिखी गई है।"
इन प्रतिक्रियाओं को पढ़कर संतोष होता है, क्योंकि पुस्तक का उद्देश्य भी यही था—युवाओं/किशोरों को कुछ महत्वपूर्ण प्रश्नों की ओर ले जाना।
लेकिन दूसरी ओर कुछ वरिष्ठ और गंभीर पाठकों ने भाषा, शैली, संपादन, टाइपिंग तथा अभिव्यक्ति की कमियों/विस्तार/गहराई की ओर भी ध्यान दिलाया है। मैं उनका भी उतना ही आभारी हूँ।
वास्तव में, दोनों प्रकार की प्रतिक्रियाएँ मेरे लिए मूल्यवान हैं।
फिर भी, इस अवसर पर मैं अपनी लेखकीय दृष्टि स्पष्ट करना चाहता हूँ।
मैंने यह पुस्तक भाषा का चमत्कार दिखाने के लिए नहीं लिखी।
मैंने यह पुस्तक इसलिए लिखी क्योंकि मुझे लगा कि आज का किशोर और युवा बहुत सारी सूचनाओं के बीच रहकर भी बहुत से बुनियादी प्रश्नों से दूर होता जा रहा है।
मुझे ऐसा लगता है, या कहिए कि मैंने अपनी सीमित दृष्टि में ऐसा देखा है कि:
वह करियर पर बात करता है,
लेकिन जीवन पर कम।
वह सफलता पर चर्चा करता है,
लेकिन संतोष पर नहीं।
वह प्रतियोगिता समझता है,
लेकिन स्वयं को कम समझता है।
वह दुनिया को बदलना चाहता है,
लेकिन अपने भीतर झाँकने का समय नहीं निकाल पाता।
यदि यह पुस्तक उसे थोड़ी देर रुककर सोचने पर विवश करती है, तो मुझे लगता है कि इसका सबसे बड़ा उद्देश्य पूरा हो जाता है।
निश्चित रूप से हैं।
मैं यह दावा कभी नहीं करूँगा कि यह एक परिपूर्ण पुस्तक है।
भाषा की सीमाएँ हो सकती हैं।
संपादन में त्रुटियाँ हो सकती हैं।
टाइपिंग की गलतियाँ भी हो सकती हैं।
जो मित्र इन कमियों की ओर संकेत कर रहे हैं, वे वास्तव में मेरी सहायता कर रहे हैं। अगली आवृत्तियों में इन्हें सुधारना मेरी जिम्मेदारी है।
लेकिन मैं एक बात अवश्य कहना चाहूँगा—
हर प्रकार की त्रुटि समान महत्व की नहीं होती।
एक त्रुटि भाषा में हो सकती है।
दूसरी त्रुटि समय पर न बोलने की हो सकती है।
मेरे लिए दूसरी त्रुटि अधिक गंभीर है।
मै मानता हूँ कि, समय पर कही गई अपूर्ण बात, देर से कही गई परिपूर्ण बात से अधिक उपयोगी हो सकती है।
दूसरा यदि मेरे द्वारा उठाए गए किसी प्रश्न पर गहराई से नहीं भी लिखा गया तो उसका कारण, एक ही किताब में कई सारे जरूरी प्रश्न शामिल करना था, कहते हैं समझदार के लिए इशारा काफी होता है, वैसे जिज्ञासु पाठक के लिए इच्छित विषय पर गहनता से जानने के लिए वरिष्ठ लेखकों का साहित्य भी मौजूद है, इसी के दृष्टिगत ही तो मैंने पुस्तकों की एक सूची भी दे रखी है मेरी पुस्तक के अंत में|
आज का समय तेजी से बदल रहा है।
बच्चे और युवा प्रतिदिन हजारों संदेशों, वीडियो और विचारों से घिरे हैं।
ऐसे समय में यदि कोई लेखक यह सोचकर वर्षों तक चुप रहे कि अभी भाषा और बेहतर हो जाए, शैली और निखर जाए, प्रत्येक वाक्य पूर्ण हो जाए, तब तक शायद जिन प्रश्नों पर बात करनी थी, वे और अधिक जटिल हो चुके होंगे।
मैं पूर्णता का विरोध नहीं करता।
बल्कि मैं स्वयं उसे पाने की दिशा में उन्मुख हूँ।
लेकिन मैं यह भी मानता हूँ कि जरूरी बात समय पर कही जानी चाहिए।
पूर्णता की यात्रा चलती रह सकती है।
मौन की भरपाई बाद में नहीं हो सकती।
अक्सर हम मान लेते हैं कि लेखक पुस्तक लिखने के बाद पूर्ण हो जाता है।
मेरा अनुभव इससे बिल्कुल अलग है।
मेरे लिए हर पाठक एक शिक्षक है।
कोई भाषा सिखाता है।
कोई विचारों की गहराई दिखाता है।
कोई संपादन की आवश्यकता बताता है।
कोई यह विश्वास दिलाता है कि पुस्तक ने उसके जीवन में कुछ बदल दिया।
इन सभी से मैं सीख रहा हूँ।
तो मेरे लिए यह उपलब्धि किसी भी भाषाई प्रशंसा से कम नहीं है।
साहित्य का अंतिम उद्देश्य केवल भाषा का सौंदर्य नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर चेतना जगाना भी है।
मैं अपने सभी आलोचकों और शुभचिंतकों का हृदय से धन्यवाद करता हूँ।
जो कमियाँ बता रहे हैं, वे भी मेरी यात्रा के साथी हैं।
जो पुस्तक के उद्देश्य को समझ रहे हैं, वे भी।
मैं भविष्य में भाषा, शिल्प और संपादन—सभी पर अधिक मेहनत करूँगा।
लेकिन यदि मुझे फिर कभी चुनाव करना पड़े कि एक जरूरी बात आज कहूँ या उसे पूर्ण बनाने के लिए वर्षों तक रोककर रखूँ, तो संभवतः मैं फिर वही करूँगा जो इस पुस्तक के साथ किया—
समय की पुकार को प्राथमिकता दूँगा।
क्योंकि मेरा विश्वास है—
पूर्णता एक सतत यात्रा है, पर समय पर की गई सार्थक अभिव्यक्ति कभी-कभी एक पूरी पीढ़ी की दिशा बदल सकती है।
मैं आलोचना को स्वीकार करता हूँ, सुधार के लिए प्रतिबद्ध हूँ, लेकिन समय पर आवश्यक संवाद को पूर्णता की प्रतीक्षा में स्थगित करना उचित नहीं मानता।
सादर धन्यवाद
लवकुश कुमार
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प्रोफेसर की डायरी एक जरूरी पढ़ी जाने योग्य पुस्तक है।
यह डायरी एक प्रोफेसर का अनुभव और आप बीती मात्र नहीं बल्कि शिक्षक वर्ग की व्यथा कथा भी है।
एक ईमानदारी के साथ लिखा गया अपना निजी अनुभव,जो उन्होंने महसूस किया है। वह लिखते है कि इस दौर में बोलने की कीमत चुकानी होती है। यह एक तथ्य है कि सवालों से घबराने वाली सत्ताएं चाहती है कि सवाल पैदा करने वाली जगहों को ही कमजोर कर दिया जाए। इसलिए ऐसी सत्ता की कोशिश रहती है कि शिक्षक हमेशा डर में रहें क्योंकि एक डरा हुआ शिक्षक अपनी कक्षाओं में रीढ़ विहीन विद्यार्थी तैयार करता है, जो समाज में जाकर मुर्दा नागारिक में तब्दील हो जाता है।"
यह पंक्ति ऐसी सच्चाई है, जो कहीं भीतर तक सोचने को मजबूर कर देती है। यह पुस्तक बहुत से भावावेगों से भर देती है। गुस्सा उस सिस्टम के खिलाफ जो छात्रों की उम्मीदों का गला घोंटने में लगा है। इसके साथ ही पुस्तक हमें प्रश्न पूछने का साहस, लड़ने का साहस, बोलने का साहस देती है।
यह डायरी मन को बहुत विचलित कर देती है। हमारी उच्च शिक्षा में सीनियर शिक्षकों द्वारा अपने जूनियरों से किस तरह बर्ताव किया जाता है, इसका उदाहरण है वह "लाइन" जब वहीं काम करने वाले कर्मचारी से पूछा जाता है कि कमरे में कौन है तो वह जवाब देता है कि कमरे में 2आदमी है और 3 एडहॉक है।यह पक्ति अपने आप में बहुत कुछ कह देती है।
प्रोफेसर लक्ष्मण को दिल्ली विश्वविद्याल जैसे प्रतिष्ठित विश्वविद्याल में 14साल पढ़ाने के बाद एक दिन उन्हें बताया जाता है कि अब आपकी जरूरत नहीं है। उन्हें अंदेशा था कि उन्हें बोलने की कीमत चुकानी होगी,उनके बहुत से सीनियरों ने उन्हें पहले ही आगाह कर दिया था कि आप ऐसे परमानेंट नहीं हो पाएंगें।
बार बार उन्हें ही नहीं उनकी तरह बहुत से शिक्षकों को प्रताड़ित किया जाता है। उन्हें 3 महीने के अस्थाई समय के लिए रखा जाता है, अगली बार उन्हें नियुक्ति मिलेगी या नहीं यह उनके द्वारा की गई या ना की गई जी हुजूरी पर निर्भर करता है।
वह शिक्षा जिससे उम्मीद की जाती है कि वह समाज में सभी के लिए समानता का वातावरण तैयार करेगी, सभी को समान अवसर देगीं। लेकिन यह संस्थान भी जातिवाद भाई-भतीजावाद, सामंतवाद का केंद्र बनते जा रहे हैं|
यह पुस्तक रोहित वेमुला जैसे तमाम छात्रों की कहानी है जो सिस्टम की भेंट चढ़ गए। जिनके सामने ऐसी परिस्थितियां तैयार करी गई, जिससे वह पूरी तरह टूट गए और अपनी लड़ाई अधूरी छोड़ गए।
अंत में पुस्तक में उनके द्वारा लिखी लाइन " मेरे लहजे में जी - हुजूर न था, और मेरा कोई कसूर न था।उनकी हिम्मत साहस और दृढ़संकल्प को दिखाता है। उनके पास परमानेंट होने के बहुत अवसर थे,लेकिन उन्होंने अपनी ईमानदारी को चुना और अंत तक लड़ते रहें। यह पुस्तक आज मूक हो चुकी आवाजों को स्वर देती है।उस साहस को जगाती है,जो भीतर कहीं दब गया है।
सच ही लिखते है "आज हमारे देश की शिक्षा व्यवस्था वेंटिलेटर पर है, जिसे अस्थाई शिक्षकों के जरिए ऑक्सीजन दिया जा रहा है।"
एक बहुत जरूरी और खोखली होती शिक्षा व्यवस्था की सच्चाई को सामने रखती पुस्तक, जो हमें भी अपनी आवाज बुलंद करने का साहस देती है, और हर हाल में अपने अधिकारों के लिए बोलने और लड़ने की हिम्मत देती है।
- शीतल भट्ट
शीतल जी, उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के एक दूरस्थ पहाड़ी गांव भट्टयूडा से आती हैं। आपने अपना परास्नातक, भूगोल विषय में लक्ष्मण सिंह मेहर कैंपस पिथौरागढ़ से किया है। आप सामाजिक खांचों में फिट नहीं होना चाहती, इसे इस परिप्रेक्ष्य मे देखें कि आप हर वह रिवाज नकारना चाहती हैं जो आपको एक लड़की होने का हवाला देकर कम आंकते हो।
किताबें संवेदनशील ,सामाजिक ,निर्भय और वैज्ञानिक चेतना देती हैं, अतः किताबें पढ़ना, नया जानते रहकर अपनी समझ को विस्तार देते रहना आपकी आदत मे शुमार है। आपको फिल्में देखना पसंद है, और घूमना भी। भूगोल आपको अपनी ओर खींचती है साथ ही नए और रचनात्मक लोगों के साथ बात करने और उनके बारे में जानने को उत्सुक रहती हैं |
पुस्तक का नाम – अनारको के आठ दिन
लेखक - सत्यु
"अनारको का बहुत बहुत मन था कि पापा से कहे. पापा एक सवाल और पूछूं? और फिर पूछे कि आप जब भी कोई चीज जानते नहीं तो यह क्यों कह देते हैं कि उल्टा सवाल मत कर|"
प्रस्तुत पुस्तक में इसी प्रकार से बच्चों के सवालों, उनकी जिज्ञासाओं के उठने, अपने आसपास के माहौल को देखने, चल रही प्रक्रियाओं के कारण को समझने से जुड़े अनुभवों और बच्चों के इन व्यवहारों पर माता-पिता, विद्यालय और समाज की प्रतिक्रियाओं को बड़े ही सुन्दर तरीके व्यक्त किया गया है।
इस पूरे कथानक की नायिका अनारको है जो हर बात को जानने को जिज्ञासु है। लेखक ने कथानक को कुछ इस तरह बुना है कि अधिकतर बातें अनारको के सपनों में पूरी हो जाती हैं जो अलग-अलग दिनों में घटित होते हैं।
पहले दिन में उससे कहा जाता है कि लोटे में पानी लेकर ठाकुर जी को चढ़ा आओ तो वह सवाल करती है कि ठाकुर जी को पानी चढ़ाना या उन्हें खुश करना क्यों जरुरी है? फिर दादी के बताने पर कि ठाकुर जी तो पेड़ पौधे, कंकर पत्थर में हर जगह हैं, वह तर्क रखती है तो क्या मैं ये पानी बाहर भिंडी के पौधे में डाल दूँ।
दूसरे दिन में स्कूल की प्रक्रियाओं पर मछलियों की एक सभा द्वारा सवाल उठाये गए हैं जो बच्चों को मशीनीकृत वातावरण या अनुशासन के नाम पर दंडात्मक विधानों, कई तरह की बंदिशें लगाये जाने की ओर उन्मुख करते हैं। कई विद्यालयों में भी ऐसी बातें दिख जाती हैं नहीं अनुशासन के नाम पर बच्चों को बोलने की आजादी नहीं दी जाती। सवाल पूछने वाले बच्चों को अक्सर डांट मिल जाती है या उनके सवालों को टाल दिया जाता है। ऐसे ही एक विद्यालय में बच्चों से बातचीत के दौरान उनका बोलना ऐसे हो रहा था जैसे वे किसी खेल में बोल रहे हों और उनकी बात दूसरा सुन नहीं सके। "जबकि मध्यावकाश में उनकी आवाज में जबरदस्त तेजी देखने को मिली|
बच्चे हां या ना बोलने में सकुचा रहे थे। पूरी कक्षा एक दम शांत-शांत थी।"
तीसरे दिन में सामाजिक ताने-बाने और "पर उपदेश कुशल बहुतेरे" की समस्या दिखाई गई है जिसमें पितृसत्तात्मक परिवारों में जेंडर आधारित भेदभाव पर तंज कसा गया है। अनारको घर से भाग रही है तो गोलू के पापा उसे कहते हैं कि अपनी मौसी को भेज देना, नल आ रहा है, पानी भर ले आकर, जबकि वे खुद नल के पास में ही लेटे हुए हैं, लेकिन पानी भरना या घर से जुड़े काम तो केवल महिलाएं ही करेंगी, वे उठकर पानी नहीं भर सकते।
हमारे समाज में जेंडर आधारित भेदभाव एक बड़ी समस्या है, जिसमें समाज ने लिंग के आधार पर कामों का बंटवारा कर दिया है। कामाने घर से बाहर सिर्फ पुरुष ही जाएंगे और घर के कामों को महिलाएं ही करेंगी, ऐसी सोच और व्यवस्था हमारी सामाजिक और आर्थिक उन्नति के लिए बाधक है। साथ ही ऐसे लोगों की भी कमी नहीं जो खुद भले ही गलत व्यवहार करें लेकिन दूसरों को उपदेश देने में कोई कसर नहीं छोड़ते।
चौथे दिन के सपने के माध्यम से विभिन्न सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक मुद्दों पर बात की गयी है। हमारे समाज में अमीर-गरीब और ऊँच-नीच की जो खाई है वह समाज के लिए घातक है, इस पर बात की गयी है|
लेखक के ही शब्दों में अनारको ने देखा "जो ज्यादा अच्छे कपड़े पहने था वह ज्यादा बदमाशी कर रहा था।"
अनारको ने बहुत से लोगों ऐसे देखे थे। ऐसे- सब उन जैसे लगते थे जो गर्मी की दोपहर में कहीं से आकर घर के बाहर बैठे रहते थे और जब अनारको उनको पीने के लिए गिलास भरकर पानी देने जाती तो हमेशा मुँह के पास हाथ ले जाकर कहते 'डाल दो गुड़िया' कभी गिलास को हाथ में नहीं लेते।
पांचवें दिन में शिक्षा के उद्देश्य और आकलन को बेहतर तरीके से समझाया गया है। मम्मी के ये कहने पर कि पास होकर अच्छी नौकरी की जा सकती है तो अनारको कहती है कि ये काम तो मैं फेल होकर भी कर सकती हूँ। और यह कौन तय करता है कि कौन पास होगा और कौन फेल और यह तय करना जरुरी क्यों है? साथ ही आकलन के लिए अपनाई जाने वाली प्रक्रियाएं क्या समझने में ठीक तरह से मदद कर पाती हैं कि किसने क्या सीखा?
छठवें दिन में भूतों को लेकर समाज में व्याप्त अंधविश्वासों और बच्चों पर इनके प्रभाव को दर्शाया गया है। पहाड़ी सन्दर्भ में तो यह समस्या और बड़ी है। यहाँ तो बच्चे ढेरों ऐसी कहानियाँ जानते हैं जो भूतों के बारे में हैं। अमूमन इस अवधारणा की शुरुआत बाल्यकाल में ही हो जाती है। पालन पोषण के दौरान बच्चों को अलग-अलग तरीके से भय दिखाया जाना हमारी परम्पराओं में शामिल रहा है। जैसे शाम हो गयी, बाहर न जाना, नहीं तो भूत पकड़ ले जायेगा| इन बातों का बच्चों पर बहुत प्रभाव पड़ता है।
सातवें दिन में भी बहुत ही संवेदनशील बात को उकेरा गया है। बच्चों को अक्सर प्रदर्शन की वस्तु मान लिया जाता है। जैसे घर में कोई मेहमान आया तो बच्चों से कहा जाता है कि पोयम सुनाओ, डांस करो आदि। इस दिन प्रधानमंत्री आने वाले हैं तो सब लगे हैं उनकी आवभगत के लिए। घंटों के लिए सड़कों पर रास्ते बंद कर दिए जाते हैं और लोगों को कितनी परेशानी झेलनी पड़ती है।
आठवें दिन में किसी नई वस्तु के बारे में बच्चों की जिज्ञासा किस कदर बढ़ जाती है, वे वस्तु विशेष के बारे में जानने के लिए कई तरह के यत्न करते हैं। यह बात पुस्तकों के बारे में बहुत अच्छे से लागू होती है। कोई पुस्तक जब बच्चे को अच्छी लग जाए तो वह उसे पढ़े बिना नहीं रहेगा। लेकिन इसके लिए जरुरी है बच्चों को किताबों में रूचि पैदा की जा सके।
अनारको के आठ दिन पुस्तक बच्चों के व्यवहार, उनके कल्पना संसार, उनकी जिज्ञासाओं तथा हमारे कौन से व्यवहार बच्चों को पसंद नहीं आते, यह समझने के लिए बहुत ही उपयुक्त है।
-अंकित
अंकित मिश्रा जी हिन्दी विषय के विद्यार्थी हैं| उनका काम कक्षा- कक्ष में ऐसे हिन्दी शिक्षण को लेकर उन्मुख है जिसमें भाषाई कौशलों की सर्वोत्तम स्थिति बच्चों को हासिल कराई जा सके| उन्हें सम- सामयिक विषयों पर कविताएँ लिखना भी पसंद है|
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"अंतस - जरा ठहरिए"
लेखक - लवकुश कुमार
प्रकाशक - नोशन (Notion) प्रेस चेन्नई
"अंतस - जरा ठहरिए" लवकुश कुमार जी द्वारा लिखी गई पहली साहित्यिक पुस्तक है,जो हॉल ही में प्रकाशित हुई है।
यह सरल शब्दों में जीवन मूल्यों की तरफ़ पाठक का ध्यान खींचती है। जो बहुत ही संवेदनशील तरीके से लिखी गई है।
जो किसी क्षेत्र या किसी एक विषय के बारे में भले ही आपको पूर्ण ज्ञान न दे सकें। लेकिन आम जीवन में छोटी छोटी चीजों का क्या महत्व है, उस ओर आपको जरा देर खींचकर रोक देती है।
बहुत सामान्य से विषय है,जहां सूक्ष्म चीजों को लेकर उन्होंने अपना लेखन किया है। एक तरह से यह पुस्तक मन में उठते तूफान को शांत कर देती है, खुद के लिए अपराधबोध, समाज के लिए ईर्ष्या,खुद के ही आगे बढ़ने की लालसा को ठहर कर सोचने को कहती है। उनका मुख्य चिंतन समाज के लिए है जो यह कहते हैं कि अपनी एक जिम्मेदारी समाज के लिए भी रखो।अपनी जिंदगी में इतने परेशान रहने की जरूरत नहीं है, किसी जरूरत मंद इंसान की मदद करो वह किसी भी तरह से की जा सकती है। दूसरों की मदद करने से बड़ा कोई सुख नहीं है।
आज जब जिंदगी बहुत तेजी से भाग रही है, आए दिन तरह-तरह की घटनाएं हमें सुनाई देती है, जब मानव सभ्यता को एक अलग दिशा में प्रवाहित किया जा रहा है।मनुष्य के लालच और भोग विलास को ही जीवन का उद्देश्य मान लिया गया है, ऐसे में लवकुश जी बहुत से उदाहरण देकर जीवन का उद्देश्य समझाते है।
जब मनुष्य, मनुष्य होने के नाते कुछ न कर पाने के अपराधबोध से खुद को दबाएं हुए है, ऐसे में आज के वातावरण का सूक्ष्म अवलोकन के लिए मानो कोई जगह ही नहीं रह गई है और परिणामतः हम कोई कार्य इसलिए नहीं कर रहे कि उससे हमें आनंद की प्राप्ति हो।
जीवन के मूलभूत पहलुओं में यह किताब एक मनुष्य को स्पष्टता देती है कि अभी कुछ भी नहीं छूटा, एक तसल्ली देती है कि अभी कुछ भी नहीं बिगड़ा,अगर किसी कारण से पढ़ाई छूट गई या कुछ परिस्थिति बदल गई तो उसका विकल्प फिर से शुरू करना है न कि आत्मघाती कदम उठा लेना|
जीवन की बारीकियों को समझाती हुई यह पुस्तक जीवन की खूबसूरती से पाठक का परिचय कराती है। वह स्पष्ट रूप से कहते हैं कि यह पुस्तक उनके द्वारा दुनिया और स्वयं को देखे और समझे जाने का प्रतिफल है।
यह पुस्तक पाठक के दिमाग में बहुत प्रभाव डालती है। मुझे स्वयं इसे पढ़ते हुए लग रहा था कि हां मुझे भी जरूरत थी इस तरह की पुस्तक की, जो आपको प्रेरित करें, लिखने को ,पढ़ने को अपने विचार खुल कर रखने को,अपनी असहमति दर्ज करने को और सामने वाले की बातों का सम्मान करने के लिए।
- शीतल
शीतल जी, उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के एक दूरस्थ पहाड़ी गांव भट्टयूडा से आती हैं। आपने अपना परास्नातक, भूगोल विषय में लक्ष्मण सिंह मेहर कैंपस पिथौरागढ़ से किया है। आप सामाजिक खांचों में फिट नहीं होना चाहती, इसे इस परिप्रेक्ष्य मे देखें कि आप हर वह रिवाज नकारना चाहती हैं जो आपको एक लड़की होने का हवाला देकर कम आंकते हो।
किताबें संवेदनशील ,सामाजिक ,निर्भय और वैज्ञानिक चेतना देती हैं, अतः किताबें पढ़ना, नया जानते रहकर अपनी समझ को विस्तार देते रहना आपकी आदत मे शुमार है। आपको फिल्में देखना पसंद है, और घूमना भी। भूगोल आपको अपनी ओर खींचती है साथ ही नए और रचनात्मक लोगों के साथ बात करने और उनके बारे में जानने को उत्सुक रहती हैं |
उक्त पुस्तक निम्नलिखित लिंक से क्रय की जा सकती है :- https://notionpress.com/in/read/antas
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लेखिका – शिवानी 
प्रकाशक – राधाकृष्ण पेपरबैक्स
“कालिंदी” सिर्फ एक उपन्यास नहीं हैं बल्कि एक गहरी अनुभूति की शुरुआत है जो पाठक को भीतर तक छू जाती है।
यह कृति एक स्त्री के आत्मसम्मान, संघर्ष और समाज से टकराने की कहानी को बेहद संवेदनशीलता और सजीवता के साथ प्रस्तुत करती है। नायिका डॉ. कालिंदी का व्यक्तित्व दृढ़, स्वाभिमानी और आत्मनिर्भर है। वह अपने जीवन के निर्णय स्वयं लेती है और उन निर्णयों की कीमत भी पूरी दृढ़ता से चुकाती है। यही उसे एक साधारण पात्र से असाधारण बना देता है।
उपन्यास में कालिंदी की मां (ईजा) अन्नपूर्णा का निःस्वार्थ त्याग, देवेंद्र का आंतरिक द्वंद्व और रिश्तों की जटिल परतें मिलकर एक ऐसा यथार्थ रचती हैं, जो कहीं न कहीं हर पाठक को अपना-सा लगता है। पुस्तक में कुमाऊँ की पृष्ठभूमि विशेषकर अल्मोड़ा और उसके आसपास के अंचल का जीवंत चित्रण इस रचना की आत्मा है। यहां की मिट्टी, हवा, संस्कृति और लोकजीवन शब्दों के माध्यम से जैसे सजीव हो उठते हैं।
“कालिंदी” केवल एक स्त्री की कथा नहीं हैं। इसमें तो अनेकों अनगिनत स्त्रियों की सामूहिक गाथा है जो आधुनिकता और परंपरा के बीच संतुलन बनाने की कोशिश में निरंतर स्वयं को खोजती रहती हैं। यह उपन्यास यह एहसास कराता है कि नारी केवल सहने के लिए नहीं बनी है। उपन्यास के नारी पात्रों का अपने निर्णयों पर अडिग रहना और अपनी पहचान गढ़ना इसका मजबूत पहलू है।
एक पाठक के शब्द इस कृति के प्रभाव को बेहद खूबसूरती से व्यक्त करते हैं—
"कालिंदी पढ़ते हुए ऐसा लगता है मानो मैं फिर से उसी पुराने अल्मोड़ा में लौट गया हूँ।"
स्वयं लेखिका के शब्द—
"मुझे लगा जैसे मुझे कुमाऊँ का सर्वोच्च साहित्य पुरस्कार मिल गया।"
यह लेखिका के पाठकों के प्रति उनके गहरे जुड़ाव और समर्पण को दर्शाते हैं।
डॉ. कालिंदी एक स्वयंसिद्धा स्त्री है, जो जीवन के हर झंझावात का सामना अपनी शर्तों पर करती है। यह उपन्यास कुमाऊँ की स्त्री शक्ति, उसके लंबे शोषण, उसकी अदम्य सहनशीलता और जिजीविषा का सशक्त दस्तावेज़ है। साथ ही यह नए और पुराने मूल्यों के टकराव और उनके पुनर्सृजन की कथा भी कहता है।
अन्नपूर्णा और कालिंदी जैसे पात्र आज भी हमारे समाज के हर कोने में मौजूद हैं जो लिए हुए हैं अपने भीतर अपार प्रेम, त्याग और संघर्ष को। यही इस उपन्यास को कालजयी बनाता है।
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विशाल चन्द जी समाजशास्त्र के शोधार्थी, पाठक और संवेदनशील शिक्षार्थी हैं। नवीन ज्ञान अर्जन और सतत सीखना आपके व्यक्तित्व का अभिन्न हिस्सा है। पुस्तकों का पठन और संग्रहण आपको विशेष प्रिय है।
आपके भीतर एक घुमक्कड़ चेतना भी सक्रिय है, जो आपको नए लोगों, स्थानों और अनुभवों से जोड़ती रहती है। बागवानी आपके लिए प्रकृति से संवाद का माध्यम है।
आप समाज को अपने स्वतंत्र दृष्टिकोण से देखने और विभिन्न समूहों के साथ मिलकर सामाजिक दायित्वों के निर्वहन को निरंतर प्रयासरत रहते हैं।
जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना आपके जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट ।
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आइये ले चलते हैं आपको उक्त पुस्तक की समीक्षा और परिचय की तरफ जिसे लिखा है वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद आदरणीय महेश चन्द्र पुनेठा जी ने, और जिसे पढ़ने के बाद मुझे भी लगा कि अब तो यात्रा वृत्तान्त भी पढ़ने हैं, आपको कैसा लगा जरूर बताइएगा| तो आइये मिलते हैं इस परिचय और समीक्षा यात्रा में:
गंगोत्री कालिंदीखाल यात्रा मार्ग उच्च हिमालय के कठिनतम यात्रा मार्गों में से एक है, जिसके चलते इस मार्ग पर कम ही यात्री जाते हैं। इतिहासकार, पर्यावरणविद और घुमक्कड़ शेखर पाठक ने वर्ष 2008 में अपने साथियों के साथ इस मार्ग में यात्रा की। वर्ष 2023 में इस यात्रा पर नवारुण प्रकाशन से उनकी एक किताब "हिमांक और क्वथनांक के बीच" नाम से आयी है।
शेखर पाठक अपनी भूमिका में कहते हैं कि - “यह हमारे जीवन की सबसे कठिन यात्रा थी। उच्च हिमालय ने कभी इस तरह नहीं डराया था हमें।”
इस यात्रा वृत्तांत को पढ़ते हैं तो लगता है कि यह एक कठिन ही नहीं बेहद कठिन यात्रा थी। और ऐसी यात्राएं आदमी को आध्यात्मिक बना देती हैं और इस बात का एहसास करा देती हैं कि प्रकृति की विराटता के सामने मनुष्य एक कण के समान है। उसका सारा का सारा अहंकार चूर-चूर होकर रह जाता है। शेखर पाठक भी इस बात को स्वीकार करते हैं कि प्रकृति की क्षमता और शक्ति के साथ मनुष्य की मर्यादा और सीमा का इतनी गहराई से पहली बार एहसास हुआ। पर इस बात को स्वीकार करना पड़ेगा कि प्रकृति जितनी भी विराट हो लेकिन मनुष्य का साहस उसके सामने कभी भी कम नहीं रहा। वह हार नहीं मानता है। पिछली असफलताओं से सीख लेते हुए फिर नयी चढ़ाई की तैयारी शुरू कर देता है।
वरिष्ठ कवि शैलेय की कविता यहां याद आती है...हताश निराश लोगों से/बस एक सवाल/एवरेस्ट ऊंचा कि बछेंद्री पाल।
यह किताब तेरह अध्यायों में बंटी है। इस मार्ग के साथ-साथ उत्तराखंड नेपाल हिमालय के बारे में बहुत कुछ बताती है। शेखर पाठक किताब में पिछली यात्राओं और उस दौरान मिले हुए लोगों को भी याद करते हैं। उच्च हिमालयी क्षेत्र में की गयी अपनी पुरानी यात्राओं का विवरण भी देते हुए चलते हैं। पूरी किताब में अतीत और वर्तमान के बीच यह आवाजाही चलती रहती है, जिसके चलते यह काफ़ी रोचक और उपयोगी बन गयी है।
नयी-नयी आवाज़ों, दृश्यों और घटनाओं से हमारा परिचय होता है। इस यात्रा वृत्तांत को पढ़ते हुए एकदम नये अनुभव मिलते हैं, जो केवल यात्रा करते हुए ही मिल सकते थे। यहीं पर मुझे किताबों का महत्व दिखाई देता है। किताबें हमें उन जगहों तक भी पहुंचा देती हैं, जहां हम स्वयं नहीं पहुंच पाते हैं। इतने कठिन मार्ग की यात्रा करना हरेक के लिए संभव नहीं होता है लेकिन ऐसे यात्रा वृत्तांतों के माध्यम से हम इन मार्गों के बारे में जान सकते हैं। अत्यंत निर्मम और निर्मोही एकांत में प्रकृति के कितने सारे रूपों को लेखक की नज़र से देख और सुन सकते हैं।
हमें इस यात्रा वृत्तांत में एक इतिहासकार भी दिखाई देता है। एक पर्यावरणविद भी, प्रकृति प्रेमी भी, सामाजिक सरोकारों से लैस एक जागरुक नागरिक भी, उच्च हिमालय के भूगोल का जानकार भी, साहित्य का अध्येता भी और एक आंदोलनकारी भी। पुस्तक में दिखाई देता है कि जब कोई इतिहासकार यात्रा वृत्तांत लिखता है तो उसके यात्रा वृत्तांत में एक सामान्य लेखक के यात्रा वृत्तांत से काफ़ी अंतर होता है। वह इस रूप में कि एक इतिहासकार द्वारा लिखे गये यात्रा वृत्तांत में जब भी किसी जगह, व्यक्ति या घटना का जिक्र आता है तो उससे जुड़ी हुई पुरानी घटनाओं का जिक्र भी प्रामाणिक तथ्यों सहित उसके साथ जुड़ता चला जाता है। शेखर पाठक बार-बार हमें इतिहास की ओर ले जाते हैं।
उनके द्वारा गंगोत्री कालिंदीखाल यात्रा मार्ग में पहली बार 24 जुलाई 1931 को आए कैप्टन इजी बरनी से लेकर 2007 में नीरज पंत द्वारा की गई यात्राओं का संक्षिप्त इतिहास और उनके संघर्षों तथा उनके द्वारा लिखे यात्रा साहित्य को इस पुस्तक में रेखांकित किया गया है। उन तमाम लोगों को याद किया गया है, जिन्हें इस यात्रा के दौरान अपनी जान गंवानी पड़ी। जानकारी के लिहाज से यह पुस्तक का महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो आने वाले पथारोहियों और हिमालय साहित्य के पाठकों के लिए बहुत उपयोगी सिद्ध होगा।
हमें विभिन्न स्थानों की ही यात्रा नहीं बल्कि उन स्थानों से जुड़े हुए व्यक्तित्वों की जीवन यात्रा भी करा देते हैं। जैसे जब वह उत्तरकाशी पहुंचते हैं तो वहां पर उन्हें विल्सन की याद आती है और इस बहाने वह विल्सन के बारे में बहुत कुछ बताते हुए चलते हैं। जोंकों द्वारा खून चूसने के प्रसंग तक का वर्णन कि कैसे जोंक चुपके से छिपकर खून चूसते हैं? कैसे उनसे बचाव होता है? बड़े रोचक ढंग से किताब में करते हैं।
इसी तरह यात्रा की पीड़ा परेशानियों के साथ-साथ लोगों द्वारा मिले हुए स्नेह को भी याद करते हैं। उनका यह याद करना बड़ा प्रीतिकर लगता है। जब वह पुरानी घटनाओं को बताते हैं तो ऐसा लगता है कि हम छोटी-छोटी कथाएं पढ़ रहे हों। इन कथाओं में स्मृतियों के साथ-साथ पूरी आत्मीयता और संवेदनशीलता झलकती है। यह तरीका यात्रा वृत्तांत को बहुआयामी और उपयोगी बना देता है। इतिहास के विद्यार्थियों को तो उसे बहुत सारी नयी जानकारियां मिल जाती हैं।
एक अच्छी बात यह है कि शेखर पाठक जी अपनी बात कहने का कोई न कोई बहाना ढूंढ लेते हैं। जैसे चतुरंगी के साथ चलते हुए वह एक जगह से शिवलिंग शिखर के ऊपर बादलों को उड़ते हुए देखकर सागरमाथा और तेनजिंग का जिक्र करने लग जाते हैं। इसी तरह चिड़िया उड़ती देखते हैं तो अनूप साह और सालिम अली को याद करने लग जाते हैं। यात्रा में साथ चल रहे पोटर्स बलबीर कार्की, पूर्ण बहादुर शाही और अन्य के बहाने पोटर्स की स्थितियों, संघर्षों और नेपाल की राजनीति का जिक्र ले आते हैं। यह यात्रा वृतांत की इकरसता को तोड़ने और उसे अपने समय और समाज के सवालों से जोड़ने का अच्छा तरीका है। नमक लगी ककड़ी खाने जैसी लेखक के जीवन की छोटी-छोटी स्मृतियां, इस वृत्तांत में एक नया रस पैदा करती हैं।
साथ ही यात्रा मार्ग के बाहर के जीवन की झांकियां भी हमें यहां दिखाई देती हैं। जो लेखक की जीवन के प्रति गहरी रागात्मकता को बताती है। यहां यात्रा करते हुए लेखक के मन में तमाम जिज्ञासाएं, उत्सुकताएं और प्रश्न पैदा होते हैं। प्रकृति के रहस्यों को समझने की कोशिश में लेखक के मन में बाल सुलभ प्रश्न उठते हैं कि यह गल पहले बना होगा या यह शिखर? यहां शेखर पाठक एक चुटकी लेते हैं कि वही (बच्चे ही) सवाल पूछते हैं। हम बड़े ना सवाल पूछते हैं और न जवाब देते हैं। देश के सबसे जिम्मेदार लोगों में जवाब देने का निकम्मापन सबसे ज्यादा प्रकट हुआ है। इस तरह की पंक्तियां बताती हैं, वह किताब में मौजूदा समय और देश की राजनीतिक व्यवस्था पर टिप्पणी भी करते हैं। यहां उनके भीतर का एक सचेत नागरिक कुलबुलाने लगता है।
कहीं-कहीं वह व्यंग्य में भी अपनी बातें कहते हैं। जैसे एक जगह वह एवरेस्ट बेस कैंप का जिक्र करते हुए लिखते हैं कि एवरेस्ट बेस कैंप में जाते हुए शोपियां के पास मैंने ऐसा ही निडर कस्तूरा मृग देखा था। जब मैंने उससे कहा, "अब तू चला जा कोई मार सकता है तो उसने पलट कर कहा कि क्या मैं उत्तराखंड में हूं कि जो मार दिया जाऊंगा। मैं शेरपाओं के इलाके में हूं और वह मेरे जीवित होने का अर्थ जानते हैं। मैं अपना सा मुंह लेकर रह गया। पर मैं उसे आंख भर देखता रहा फिर वह चलते-चलते दूसरी ओर निकल गया।" यह बात उनके ध्यान में भरलों के समूह को देखकर आया। वह लिखते हैं, "भरल निर्भय घूम रहे थे। हमें तीन दिन में चार या पांच भरल दल मिल गए थे। उन्हें गिनने का उत्साह घट गया था। उनका निर्भय होना दरअसल राहत देता था।
जनतंत्र में नागरिक भी यदि इसी तरह निर्भय हो जाए तो ठगी करने वाली राजनीति समाप्त हो सकती है या कहें कि ऐसी राजनीति के समाप्त होने पर ही ठगी बंद होगी।" इस तरह की चुटकियां लेना शेखर पाठक के स्वभाव में है। इस किताब में भी जगह जगह उनका यह स्वभाव प्रकट होता है।
शेखर पाठक यात्रा के दौरान नींद में देखे गये सपनों का भी जिक्र इस किताब में करते हैं। अधिकांश सपने तो नींद खुलने के बाद याद नहीं रह पाए ऐसा बताते हैं। इन सपनों को पढ़ना भी रोचक है। लेखक की मनोदशा का अनुमान लगाया जा सकता है। शेखर पाठक यह भी बताते हैं कि जब भी उच्च हिमालय की यात्रा करते हैं तो उन्हें इस तरह के सपने अक्सर आते हैं। कोई मनोविश्लेषक इनको पढ़े तो मन की हलचलों और दबावों के बारे में बहुत कुछ विश्लेषित कर सकता है।
यात्रा वृत्तांतकार यदि भूगोल का जानकार होता है तो पहाड़, नदी, नाले, गधेरे, झील, ग्लेशियर आदि स्थलाकृतियां अपने नामों के साथ उतर आती हैं जैसे वे सारे लेखक के बचपन के यार दोस्त हों। यही बात पाठक जी के संदर्भ में सटीक बैठती है। वह खुद को गंगोत्री कालिंदीखाल बद्रीनाथ यात्रा मार्ग तक सीमित नहीं रखते हैं, बल्कि हिमालय क्षेत्र के अन्य भागों के भूगोल पर भी बात करते हैं। अन्य गलों, नदियों, शिखरों, तालों का जिक्र भी इस किताब में हमें मिलता है। केवल गंगा ही नहीं उसकी अन्य बहनों के बारे में भी सोचते हैं और पाठकों को उस बारे में बताते हैं। इस बात पर भी प्रकाश डालते हैं कि गंगा नदी का इतना मान क्यों है पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में।
वह इस बात पर आश्चर्य व्यक्त करते हैं कि जिस गंगा नदी को हम इतना पवित्र मानते हैं, उसी नदी को प्रदूषित करने से पीछे नहीं रहते हैं। हमने गंगा को दुनिया की सबसे प्रदूषित दर्जन भर नदियों में से एक बना दिया है। वह हमारी आस्था पर भी सवाल उठाते हैं कि आखिर काल्पनिक उद्धार के चक्कर में प्रकृति के सुंदर स्थानों को कब तक गंदा करते रहेंगे? किताब में वह जगह-जगह उच्च हिमालय क्षेत्र और तीर्थ स्थान में आने को लेकर जो विश्वास और मान्यताएं प्रचलित हैं उनका उल्लेख करते हुए उन पर ज़रूरी प्रश्न खड़े करते हैं।
एक प्रकृति प्रेमी के द्वारा लिखा यह यात्रा वृत्तांत हमें हिमालय के चित्ताकर्षक प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर स्थानों को देखने के लिए प्रेरित करता है क्योंकि जगह-जगह शेखर पाठक जी ने उन स्थानों का जिक्र अपने इस यात्रा वृत्तांत में किया है, जहां का जादू उनको बहुत प्रभावित करता रहा है, जो उनके मन में स्थाई स्मृति की तरह पसरी है, जिसे वह हिमालय यात्री की पूंजी कहते हैं, जो सिर्फ बांटने से बढ़ती है। वह लिखते हैं कि खूबसूरत जगहें हमारे मन मस्तिष्क में अपना नाम लिख देती हैं और वह एक कविता, गीत या चित्र की तरह हमारे साथ सदैव रहती हैं।
ऐसी जगहें शायद हममें अधिक मानवीय गुण भरती हैं और प्रकृति के आगे विनम्र होने की समझ देती हैं। यह जगहें आदमी की रचनाएं नहीं हैं। आदमी और उसकी व्यवस्थाओं ने तो उनको कुछ न कुछ नष्ट करने की ज़रूर कोशिश की है| पर आत्मसात भी लगातार किया। एक प्रकृति प्रेमी ही इतनी आत्मीयता, गहरे सौंदर्यबोध और संवेदनशीलता से प्रकृति को देख सकता है।
शेखर पाठक साहित्य के गहरे अध्येता होने के चलते इस किताब में स्थान-स्थान पर न केवल चर्चित कविता पंक्तियां या कविता शीर्षकों को याद करते हैं बल्कि खुद कविता सी रचते चलते हैं। जो दृश्य वह रचते हैं, वे पाठक के मन और आंखों दोनों में बस जाते हैं। वह अभिभूत हो उठता है।
प्रकृति के प्रति गहरे लगाव के चलते शेखर पाठक, पत्थर मिट्टी के साथ पानी, हवा और सूरज के खेलों को न केवल खुद देखते और आनंदित होते हैं, बल्कि उन खेलों का आनंद पाठकों तक पहुंचाने में भी सफल रहते हैं। कितना सुंदर बिंब खड़ा करते हैं कि पत्थर, मिट्टी, रेत पर पानी का सूरज और हवा के बाजे के साथ गाया जा रहा कोरस आश्चर्य की तरह है। हैलो करती वनस्पतियां। उतार चढ़ाव ... आवाज़ पर भीतर लगातार बोलता हुआ यह विराट गल हमारे सामने था। अब हम सभी इसका हिस्सा हो गये थे। अग्नि से जीवन इसके ऊपर चल रहे थे। ये पंक्तियां बताती हैं कि लेखक कैसे प्रकृति से पूरा तादात्मीकरण स्थापित कर लेता है। तभी वह प्रकृति के रूप, रंग, गंध, स्पर्श, ध्वनि और स्वाद को पाठकों तक पहुंचाने में सफल होता है। इस तादात्म्य का ही प्रतिफल है यह यात्रा वृतांत।
एक अच्छा यात्रा वृतांत तब तक लिखना संभव नहीं है, जब तक यात्रा के दौरान दिखाई देने वाले दृश्यों, घटनाओं, लोगों और प्रकृति को पूरी तरह आत्मसात न कर लिया जाए।
प्रकृति का जहां-जहां चित्रण हुआ है, उनको बार-बार पढ़ने और महसूस करने का मन करता है। ऐसा अनुभव होता है कि पंख होते तो अभी उड़ कर वहां पहुंच जाते। ऐसा लगता है कि हम प्रकृति पर लिखी गयी कोई कविता पढ़ रहे हों। वह सही कहते हैं कि मनुष्य के लिए यह ज़रूरी है कि प्रकृति को सुनने के लिए वह स्वयं चुप रहना सीखे।
उच्च हिमालय क्षेत्र में पाए जाने वाले भरल, हिमचितुवा, पीली चोंच वाले कौव्वे, दाढ़ी वाले गिद्ध ,गौरैया जैसी घने पंखों वाली चिड़िया, कठफोड़वा, रेड स्टार्ट बड़वा, रोजी पीट, गोल्डन स्टेटस रेड स्टार्ट, चूहा पीक जैसे पशु पक्षियों और कीट पतंगों का जिक्र इस यात्रा वृत्तांत में आता है। कुछ से तो पहली बार परिचय होता है। बहुत सारी ऐसी अजनबी चिड़ियों का भी जिक्र हुआ है, जिनके नाम भले लेखक को पता ना हों लेकिन उनका वह रूप, रंग, आकार, प्रकार बताते हुए चलते हैं। यह वृत्तांत उनके सौंदर्य और आदतों को जानने के प्रति हमें उत्सुकता से भर देता है। भरल तो इस किताब में बार-बार आता है। फूल जैसे सींगों के साथ आता है। उसी तरह कौवा भी। जैसे सहयात्री हो। यात्रा मार्ग में पशुओं को देख लेखक के मन में ये विचार उठते हैं कि हमारे समाज में मासूमियत कम बची है, जो बची हुई थी उसे धूर्त राजनीति में साफ कर दिया है। हम आजकल आक्रामकता से आगे प्रत्यक्ष हिंसा तक चले गये हैं। आदमी की जान की कोई कीमत नहीं। काश हम पशुओं में बची मासूमियत और विश्वास से ही द्रवित हो पाते।
एक पर्यावरणविद के नाते वह उच्च हिमालय क्षेत्र में जमा होते जा रहे प्लास्टिक, कूड़ा करकट, शराब और पानी की खाली बोतलों तथा अन्य तरह के अवशिष्ट को लेकर भी अपनी चिंता व्यक्त करते हैं। वह कहते हैं कि हमें सागरमाथा क्षेत्र के लोगों से सीखना होगा कि किस तरह अपने जंगली जीव बचाए जा सकते हैं? कैसे सौर ऊर्जा और केरोसिन का इस्तेमाल कर प्रकृति पर पड़ने वाले दबाव को घटाया जा सकता है? वह बार-बार वहां के लोगों विशेषकर शेरपाओं का उदाहरण देते हैं। इस किताब में बहुत सारे तथ्य भी हमें मिलते हैं। जैसे, गंगोत्री गल का 1818 से आज तक का आंकड़ा देते हैं, जिसके अनुसार 200 सालों में यह गाल 15 किमी से अधिक पीछे गया है। इस तरह के आंकड़े न केवल भविष्य के प्रति डराते हैं बल्कि सचेत भी करते हैं। सोचने को मजबूर करते हैं कि इसी तरह यदि गल सूखते चले गये तो हिमालय से निकलने वाली सदानीरा नदियों का क्या होगा? कहां से उनमें पानी आएगा? एक ओर गल पीछे खिसक रहे हैं दूसरी ओर इस क्षेत्र में पाए जाने वाले नौले, धारे और गधेरे मानवीय उपेक्षा और अनियंत्रित निर्माण कार्यों के चलते सूखते जा रहे हैं जो हिमालय की नदियों को रिचार्ज करने में सहायक होते हैं।
प्रकृति के साथ हो रही छेड़छाड़ और जबरदस्ती को लेकर शेखर पाठक सरकारों और समाज से तीखे प्रश्न करते हैं कि सरकारों या समाज को किसी नदी की हत्या करने या अधमरा बनाने का हक किससे मिला था? इस तरह के प्रश्न किताब में जगह-जगह मिलते हैं, जो लेखक की पर्यावरण की प्रति गहरी संवेदनशीलता, सरोकारों तथा चिंताओं को व्यक्त करते हैं। साथ ही वह प्रकृति और समाज में आ रहे बदलावों को रेखांकित करते हैं। उसके कारणों की पड़ताल करने की भी कोशिश हमें यहां दिखाई देती है। शेखर पाठक जी उत्तराखंड में समय-समय पर हुए भूस्खलनों का जिक्र करते हुए पाठकों को याद दिलाते हैं कि जो व्यक्ति, समाज या सरकार प्राकृतिक या अन्य मानव जनित आपदाओं या राजनीतिक तथा आर्थिक आपदाओं को भुलाते हैं, वह उन्हें पुनः पुनः भुगतने के लिए अभिशप्त रहते हैं और आगामी समय में भी रहेंगे। इस तरह वह हमें सचेत भी करते हैं। प्रकृति के साथ हो रही छेड़छाड़ और अवैज्ञानिक दोहन को लेकर एक जिम्मेदार नागरिक के दायित्व का निर्वहन भी करते हैं।
इस तरह से यह केवल विशुद्ध यात्रा वृतांत नहीं है, बल्कि अपने समय के सवालों से सीधे मुठभेड़ करता हुआ एक दस्तावेज है। किताब बीच-बीच में घुम्मकड़ी के दर्शन और उसके उद्देश्य पर भी बात करती है और बहुत सारे ज़रूरी सुझाव भी देती है। इन पर विचार किया जाए तो हिमालय क्षेत्र में की जाने वाली यात्राओं को यहां की प्रकृति और संस्कृति की दृष्टि से मित्रवत बनाया जा सकता है। उनकी सार्थकता को बढ़ाया जा सकता है।
किताब का 11वां और 12वां अध्याय इस किताब का केंद्रीय हिस्सा है। सबसे अधिक कौतूहल पैदा करने वाला हिस्सा। कुछ इस तरह का दृश्य है...लगातार 24 घंटे से एक ही स्पीड से गिरती हुई बर्फ। बर्फ के कुछ कम होने पर बढ़ती हुई बारिश। चारों ओर होते हुए भूस्खलन। पीछे लौटने और आगे बढ़ने दोनों में खतरा ही खतरा। यात्रा दल के साथियों के दिवंगत होने की घटनाएं। यात्रा दल में थे जो इधर-उधर बिखर चुके थे। कौन आगे गया और कौन पीछे रह गया इसका अंदाजा कोई नहीं कर पा रहा था। सभी इतने आत्म केंद्रित हो गये थे कि कभी-कभी किसी और का ख्याल ही नहीं आता था। पानी काट खाने को आ रहा था। यात्रियों की आंखों में भय था। मौत की आहट बिल्कुल नजदीक से सुनाई दे रही थी। पास में बहती नदी में इतना पानी बढ़ गया था कि वह अपना विकराल रूप दिखा रही थी। ठंड से यात्री थर थर कांप रहे थे। रोशनी बहुत कम हो चुकी थी। कुछ साथियों को दिखाई देना भी बंद हो गया था। कुछ साथियों का सामान नदी में गिर गया था। सामने ही यात्री दल के सदस्यों को ठंड से अकड़ते हुए और दिवंगत होते हुए देख रहे थे। असहाय से कोई किसी को बचाने की स्थिति में नहीं था। सामान भीग कर भारी हो रहा था। कुछ साथी अपने सामान को रास्ते में ही छोड़कर आगे बढ़ गये थे। महीन ओले पड़ रहे थे। फिसलने की संभावना ज्यादा बढ़ गयी थी। चलने की गति भी नहीं बढ़ाई जा सकती थी। सहायता के लिए आईटीबीपी के जवानों के आने की उम्मीद भी खत्म जैसी हो गई थी। पहाड़ के दोनों तरफ से पत्थर ही लुढ़क रहे थे।
ऐसा लगता है कि जैसे शेखर पाठक मृत्यु का रेखाचित्र हम लोगों के सामने प्रस्तुत कर रहे हों। इतने नजदीक से मृत्यु का साक्षात्कार अपने आप में दुर्लभ अनुभव है। मौत अट्टहास कर रही है और जीवन उसके सामने दया की मांग कर रहा है। मृत्यु हजार वेश धर रही है। यहां मृत्यु और जीवन जैसे दोनों अपनी-अपनी चालें चल रहे हैं। दोनों ही अपनी अपनी जीत को सुनिश्चित करने की कोशिश कर रहे हों। जीवन, गीत संगीत को मृत्यु से लड़ने के हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रहा है। यह संघर्ष रोमांचित करने वाला भी है और डराने वाला भी। उस संघर्ष का आंखों देखा हाल पाठकों के सामने रखने में वह पूरी तरह सफल रहे हैं। उतार चढ़ाव भरी मनस्थिति का बहुत ही जीवंत और मर्मस्पर्शी चित्रण किया है। जितना बारीकी से बाहर का उससे भी अधिक बारीकी से भीतर का भी। एक उदाहरण देखिए..."मौत हमारे आसपास मंडरा रही थी। वह किसी को भी दबोच सकती थी। यहां आज उसी का राज था। हमारे शरीर लगातार हिमांक के पास थे और हमारे मन मस्तिष्क में भावनाओं का उबाल क्वथनांक से ऊपर पहुंच रहा था।....हम शब्दों में कोई संवाद नहीं कर पा रहे थे। शब्द भी नहीं ढूंढ़ पा रहे थे। शब्द जैसे गायब हो गए थे और भावनाएं जैसे पथरा गई थी। यह लाटा हो जाने की निरीहता थी।....मैंने इतना बदहवास पराजित और हतप्रभ अपने को जीवन में कभी नहीं पाया था। बेचैनी और विडंबना भाव से मचलता मेरा चेतन अवचेतन क्वथनांक को पार कर रहा था। यह हम सब के मानस के ध्वस्त होने जैसा था। हमारा एक साथी हमारे साथ न था। शायद हम सब का मन मस्तिष्क ठहर सा गया था। जैसे एकाएक बिजली चली गयी हो या फ्यूज उड़ गया हो और टॉर्च या दियासलाई पास में न हो।"
किताब में यह सारा विवरण पढ़ते हुए भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं। बार-बार मन में यह प्रश्न उठता है कि आखिर इतनी कठिन परिस्थितियों और जान को जोखिम में डालकर कोई भला क्यों यात्रा करने इतने कठिन क्षेत्र में जाते होंगे? कैसे कोई इतनी कठिन परिस्थितियों से बचकर आने के बाद फिर से एक नई यात्रा में निकल पड़ता होगा?
यह किताब यात्रा किए जाने के लगभग 12 वर्ष बाद लिखी गई है, लेकिन आश्चर्य होता है कि इतने समय अंतराल के बाद लिखने के बावजूद यात्रा के विवरण इतनी बारीकी से आए हुए हैं। छोटी-छोटी बातों का उल्लेख हुआ है। लगता है जैसे कल की ही बात हो। निश्चित रूप से यह कमाल यात्रा के दौरान डायरी लिखने की उनकी आदत के चलते ही संभव हुआ होगा। यह यात्रा वृत्तांत लिखने वालों के लिए एक सीख है कि यात्रा के दौरान डायरी अवश्य लिखी जानी चाहिए, तभी "हिमांक और क्वथनांक के बीच" जैसी यात्रा पुस्तक संभव हो सकती है। इसी के चलते यह किताब हर आयु वर्ग के पाठकों के लिए इतनी उपयोगी बन पाई है। मैं पाठक जी की जिजीविषा, दृढ़ता, अनुशासन और काम के प्रति गंभीरता की दाद दूंगा कि उन्होंने तमाम प्रतिकूल परिस्थितियों के बीच भी डायरी लिखना नहीं छोड़ा। चलते-चलते थोड़ी देर सुस्ताने के दौरान ही वह डायरी लिखने लग जाते।
पुस्तक को पढ़ते हुए कहना पड़ेगा कि शेखर पाठक जी का भाषा को बरतने का अंदाज़ कमाल का है। छोटे-छोटे वाक्यों में बड़ी और गंभीर बात करने वाली भाषा। वह टकसाली भाषा में नहीं लिखते हैं। भाषा के साथ नये प्रयोग करते हैं। संदर्भ के अनुसार उनकी भाषा नये अर्थ देती है। एक सहज प्रवाह है उनकी भाषा में। कविता की तरह दृश्य बिंब खड़े करती है। रूपकात्मकता मन मोह लेती है। एक गद्य काव्य का जैसा आनंद आता है। किताब के नाम सहित, भीतर जितने भी अध्याय हैं, उनके शीर्षक बहुत काव्यात्मक हैं, जो पाठक को बहुत देर तक उस पर सोचने और उसके भीतर प्रवेश करने को आमंत्रित करते हैं। किताब में कहीं कहीं पर लोक बोली के शब्दों का आना भी बड़ा प्रीतिकर लगता है। वैसे शेखर पाठक जी का कहने का अंदाज़ भी कम प्रीतिकर नहीं है! वह बिल्कुल इस तरह से लिखते हैं, जैसे वह बोलते हैं। जिस तरह से उनके व्याख्यान बहुत सम्मोहित करने वाले होते हैं। इस यात्रा वृत्तांत की भाषा भी उसी तरह सम्मोहक है। किस्सागोई के अंदाज़ में अपने साथ बहाकर ले जाते हैं।
इस पुस्तक की एक खासियत यात्रा से संबंधित रंगीन एल्बम है, जिसमें चित्र बिल्कुल जीवंत से प्रतीत होते हैं। हिमालय के अभिभूत कर देने वाले सुंदर दृश्य इस एल्बम में मौजूद हैं। वहां के गल, झील, झरनों, हिमाच्छादित शिखरों, जीव जंतु और वनस्पतियों को देखने का प्रत्यक्ष सा आनंद घर बैठे ही ले सकते हैं। अद्भुत फ़ोटोग्राफ़ी है। कुछ ऐसे दुर्लभ जानवरों के फोटो भी हैं, जिन्हें देखने का बहुत सारे पाठकों को पहली बार अवसर मिलता है। इन चित्रों को देखकर यात्रा की दुरूहता और भयावहता को भी अधिक गहराई से समझा जा सकता है। इस पुस्तक के लगभग हर पेज में उपस्थित श्वेत श्याम चित्र भी कम सुंदर नहीं हैं। हर चित्र बहुत देर तक नज़रें गढ़ाए रखने के लिए विवश करता है। हर चित्र सही स्थान पर लगाए भी गए हैं। विवरण और चित्र दोनों एक दूसरे के पूरक की तरह आए हैं।
कुल मिलाकर इस पुस्तक में उच्च हिमालय क्षेत्र की प्राकृतिक सुषमा, यात्रा मार्ग की दुरूहता, साहसिक यात्राओं का रोमांस, उनकी कठिनाइयां, आसन्न मृत्यु की भयावहता, उससे लड़ने की जीवटता, साहस, प्रयत्न, जीवन की जिजीविषा, उम्मीद, हताशा, उत्साह जैसे मनोभावों के तमाम शेड्स, जीवन के अंतर्द्वंद्व, जीवन दर्शन, विकास और पर्यावरण का संघर्ष, इस तरह के तमाम भावों, विचारों और इंद्रियबोधों से इस किताब में गुज़रना होता है। एक ऐसी किताब जो बार-बार पढ़ने को आमंत्रित करती है और हर बार पहली बार पढ़ने सा आनंद देती है। कहीं-कहीं इसे पढ़ते हुए किसी हॉरर फ़िल्म को देखने जैसी अनुभूति होती है। दिल की धड़कन बढ़ जाती है। यह एक मुकम्मल यात्रा वृत्तांत है। इस सब के बावजूद इस किताब में बहुत कुछ आने से रह गया होगा जिसके बारे में खुद शेखर पाठक किताब में एक स्थान पर लिखते हैं, "बहुत कुछ हम सतत यात्रियों की आंखों और अनुभव में आने से इस बार भी रह जाएगा। हम कायनात के कुछ हिस्से ही देख पाते हैं और समझ तो और भी कम को पाते होंगे। कुछ रह भी जाना चाहिए। पूरी प्रकृति का डॉक्यूमेंटेशन मनुष्य द्वारा संभव नहीं है और यह उसे पा भी नहीं पाएगा।
- महेश चन्द्र पुनेठा
आदरणीय महेश चन्द्र पुनेठा जी एक चिंतक, शिक्षाविद और वरिष्ठ साहित्यकार हैं जो पढ़ने की संस्कृति के विकास, भयमुक्त और रचनात्मक शैक्षिक वातावरण और शैक्षिक दखल के अपने प्रयासों के लिए जाने जाते हैं, इनकी कवितायें संवेदित करने वाली और नींद से जगाने वाली रहती हैं, ऊपर आपने देखा कि पुस्तक समीक्षा इतनी जीवंत और समावेशी है कि बस तुरंत पुस्तक पढ़ने की तीव्र अच्छा उत्पन्न हो जाए| लेखक के बारे मे विस्तार से जानने के लिए यहाँ पर क्लिक करें |
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शुभकामनाएँ
-लवकुश कुमार
#इनदिनोंमेरीकिताब
इरफ़ान : और कुछ पन्ने कोरे रह गए
वरिष्ठ पत्रकार , फ़िल्म आलोचक, समीक्षक अजय ब्रह्मात्मज के द्वारा लिखी गई यह किताब लेखक और अभिनेता इरफान के बीच एक प्रोफेशनल और आत्मीय संवाद संस्मरण है जो इरफ़ान को सिर्फ़ एक सुपरस्टार ही नहीं बल्कि एक संवेदनशील, गहरा सोच रखने वाले इंसान के रूप में पेश करती है। किताब इरफान को दो तरह से जानने का अवसर देती है । एक, बड़े अभिनेता के रूप में और दूसरे, बड़ी शख्सियत के रूप में ।
किताब इरफान और इरफ़ानियत दो खण्डों में विभाजित है । पहले खण्ड में लेखक द्वारा इरफान के अलग अलग समयों पर लिए गए साक्षात्कार, उनके फिल्मों पर चर्चा, निजी अनुभव आदि शामिल हैं और दूसरे खण्ड में प्रसिद्ध लेखकों, पत्रकारों , अभिनेताओं के साथ इरफान से जुड़े संस्मरण दर्ज हैं ।
किताब के जरिये इरफान तीन तरह से पाठकों को अप्रोच करते हैं -
व्यक्तिगत इरफान, जो सीधे संवाद के जरिये अपने बचपन , परिवेश , शहर और उनसे जुड़े जीवन के घुमावदार अनुभवों को साझा करते हैं। वे कई फिल्मों का जिक्र करते हैं जहां बताते हैं कि किस तरह चरित्र को उन्होंने अपने अनुभवों से जोड़कर दिखाया है। पाठक उनकी अभिनय प्रक्रिया की गहराई से परिचित होते हैं । यह हिस्सा बताता है कि वे फ़िल्म नहीं चरित्रों की दुनिया बनाना चाहते थे।
पेशेवर इरफान जो अपने पेशे की बारीकियों को भी दर्ज कर रहे हैं । उद्योग-पूँजी सम्बन्धों की भी आलोचना भी कर रहे हैं जब वो कहते हैं कि यहां टैलेंट से नहीं नेटवर्किंग से काम मिलता है । बुरे प्रसंगों को भी दर्ज कर रहे हैं जब प्रोड्यूसर बुरी एक्टिंग का बहाना बनाकर पूरे पैसे नहीं दे रहा है। फ़िल्म जगत की तस्वीर को ग्लैमर और चकाचोंध से आगे जाकर शोषण व्यवस्था और निर्भरता के स्याह हिस्से को भी दर्ज करना नहीं भूलते।
दार्शनिक इरफान जो पाठकों को अभिनेता के पीछे छिपे एक शख्सियत इरफान को जानने का अवसर देता है। जो बताता है कि कोई किरदार निभाते हुए जब आपके व्यक्तित्व में कुछ जुड़ जाए, या कुछ हल्का सा क्षरण हो जाये वही असली इनाम या रिटर्न है, पैसा तो बाइप्रोडक्ट है। यह दृष्टि उन्हें सांस्कृतिक आलोचक के रूप में भी खड़ा करती है और कहीं न कहीं पाठकों की चेतना को भी घेरती है । यही दृष्टि परदे पर दर्शकों के भीतर सवाल भी पैदा करती है। इस हिस्से में उनकी फ़िल्मों और स्टारडम से जुड़ी गहरी टिप्पणियों के साथ साथ उनके धार्मिक‑सामाजिक राजनैतिक विचार और दर्द‑संवेदना के स्वर भी सामने आते हैं।
अचानक 2018 में उन्हें न्यूरोएंडोक्राइन ट्यूमर (Neuroendocrine Tumour) नाम का एक दुर्लभ कैंसर होने का पता चलता है । इरफान इलाज के लिए लंदन जाते हैं । कुछ वक्त बाद लंदन से उनका एक पत्र आता है जिसे सोशल मीडिया पर , उनके तमाम फैन्स साझा करते हैं। उनके लिए दुआएं करते हैं ।
यह भावभीना पत्र इरफ़ान ने लंदन के एक अस्पताल की बालकनी से अपने मानसिक और शारीरिक दर्द के बीच वहां की परिस्थितियों, दर्द, शुक्रिया और उम्मीद की भावना को शांत लफ़्ज़ों में पिरोकर लिखा है, जब वे इस दुर्लभ बीमारी का इलाज करवा रहे थे । किताब में दर्ज इस पत्र को पढ़कर पाठक भावुक हुए बिना न रह सकेंगे । आत्म‑संवादात्मक शैली में लिखे गए इस पत्र में वह न सिर्फ़ अपनी बीमारी बता रहे हैं, बल्कि ज़िंदगी के “मोड़”, अनिश्चितता , दर्द और जीवन के दार्शनिक पक्ष को भी छू रहे हैं। इरफ़ान के लिए ज़िंदगी फ़िल्म नहीं है, बल्कि एक अनियोजित, अनिश्चित सफ़र है, जिसका अंत उनकी मर्ज़ी से नहीं होता। इरफान मनुष्य की सीमाओं और जीवन की अनिश्चितता के बीच संघर्ष अपने संदेश में प्रकट करते है।
इरफ़ान लिखते हैं कि वह एक “तेज़ ट्रेन‑सफ़र” पर थे- अपनी योजनाओं, आकांक्षाओं, फ़िल्मों, सफ़लता के बीच- जब अचानक किसी ने कहा : “आपका गंतव्य आ गया, अगले स्टॉप पर उतरना है।”
लंदन प्रवास के दिनों में जब लेखक इरफान के संघर्ष के दिनों की एक पुरानी तस्वीर भेजते हैं तो इरफान कहते हैं -
“यह मेरा मुम्बई का पहला 10 बाई 10 का कमरा है और आज फिर मैं वापस 10 बाई 10 के कमरे में पहुंच गया हूँ। इंटरेस्टिंग बात यह है कि तब मैं अपने रहने की जगह बड़ी से बड़ी करने के सफर में था और आज मैं चाहूंगा कि यह जितना छोटा और सिंपल हो सके उतना मैं खुश हूँ।”
और इस तरह दो साल तक बीमारी से लड़ते लड़ते इरफान अपने फैन्स को निराश करते हुए 2020 में अलविदा कह गए और जिंदगी की किताब के कुछ पन्ने कोरे रह गए !
अर्चना बेन्ज्वाल मैम की फेसबुक वाल से साभार
प्रस्तुत है किताबों की सूची आपके संज्ञान के लिए :
आजादी मेरा ब्रांड - अनुराधा बेनीवाल, अकेली लड़की के यूरोप घूमने की कहानी।
बेहया -विनीता अस्थाना, स्वतंत्र स्त्री का जीवन, घरेलू हिंसा और उसके चरित्र पर सवाल उठता समाज।
जितनी मिट्टी उतना सोना - अशोक पांडे उत्तराखंड के सुदूर हिमालय में बसी रं जनजाति की परंपरा को समझने में मददगार।
उसके हिस्से की धूप -मृदुला गर्ग, विवाह से इतर प्रेम और आत्मतलाश में भटकती स्त्री की कहानी
तुम्हारे लिए -हिमांशु जोशी, छात्र जीवन, संघर्ष, प्रेम और शहर से जुड़ाव।
डार से बिछुड़ी -कृष्णा सोबती, अपनो द्वारा त्याग और स्त्री जीवन की त्रासदी की कहानी।
- शीतल
शीतल जी, उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के एक दूरस्थ पहाड़ी गांव भट्टयूडा से आती हैं। आपने अपना परास्नातक, भूगोल विषय में लक्ष्मण सिंह मेहर कैंपस पिथौरागढ़ से किया है। आप सामाजिक खांचों में फिट नहीं होना चाहती, इसे इस परिप्रेक्ष्य मे देखें कि आप हर वह रिवाज नकारना चाहती हैं जो आपको एक लड़की होने का हवाला देकर कम आंकते हो।
किताबें संवेदनशील ,सामाजिक ,निर्भय और वैज्ञानिक चेतना देती हैं, अतः किताबें पढ़ना, नया जानते रहकर अपनी समझ को विस्तार देते रहना आपकी आदत मे शुमार है। आपको फिल्में देखना पसंद है, और घूमना भी। भूगोल आपको अपनी ओर खींचती है साथ ही नए और रचनात्मक लोगों के साथ बात करने और उनके बारे में जानने को उत्सुक रहती हैं |
इस आशा के साथ कि शीतल जी की समझ और लेखनी, सुधी पाठकों की समझ को एक नया आयाम देकर उसको विस्तार देगी और एक संवेदनशील इंसान बनने का मार्ग प्रशस्त करेगी, ढेरों शुभकामनायें
सम्पादक
लवकुश कुमार
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शुभकामनाएं
सबसे पहले बात कि कौन-कौन शामिल होता है
"कुछ समन्वयक, सुधी पाठक, वरिष्ठ लेखक और समाज के अध्येता"
क्या होता है?
समन्वयक अपनी मन बांध लेने वाली भाषा शैली में सभी को संबोधित करते हैं फिर शामिल पाठक स्वयं द्वारा पढ़ी हुयी पुस्तक पर चर्चा करने की इच्छा व्यक्त करते हैं और समन्वयक उनसे बारी-बारी से आग्रह करते हैं अपनी पुस्तक पर अवलोकन, अनुभव और सीख साझा करने को |
क्या-क्या मिल सकता है जो आपके लिए उपयोगी हो
सबसे पहले उन्हे संबोधित करता हूँ जो किसी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं, उन्हे लग सकता है कि प्रतियोगी परीक्षा मे इन साहित्यिक किताबों का क्या महत्व :महत्व है, खूब महत्व है
सोंच व्यापक होगी, एक से एक मेहनती और त्यागशील, न्यायशील और बहादुर लोगों के बारे मे पढ़कर और सुनकर जो स्पष्टता आएगी वो आपको बेहतर और नियमित तैयारी के लिए प्रेरित करेगी
अगर आपके जीवन मे संघर्ष हैं तो हो सकता है कि आप ऐसे इंसान के बारे मे पढ़ लें या सुन लें जिन्होने विकट परिस्थितियों मे भी हिम्मत बांधकर मेहनत की और अपने साथ दूसरों का भी भला कर सके, माने फिर आपको अपनी दिक्कतें छोटी लगने लगेंगी|
हो सकता है कि आपको जीवन उद्देश्यहीन लग रहा हो, सब कुछ खत्म सा दिख रहा हो, तब भी आपको अपने जीवन को अर्थ देने के कई तरीके मिल सकते हैं
हो सकता है कि पढ़ाई के दौरान भी जीवन या पढ़ाई से जुड़ी कोई बात आपके पढ़ाई के हिस्से का वक़्त जाया कर रही हो, उस अवस्था मे एक अच्छी किताब के साथ बिताए नियमित कुछ मिनट्स आपके मन को शांति प्रदान कर आपकी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी को और बेहतर/दक्ष कर सकते हैं
हो सकता है कि किसी उधेड़बुन मे हों और आपको कोई रास्ता दिखाने वाली पुस्तक का नाम मिल जाए
हो सकता है कि आप कोई निर्णय न ले पा रही हों और कोई ऐसी पुस्तक के बारे मे चर्चा हो जाए जो आपको उस विषय पर स्पष्टता दे सके
हो सकता है कि आप कोई नया काम करना चाहते हों, तरीका न सूझ रहा हो और आपको किसी ऐसे इंसान कि पुस्तक के बारे मे पता चले जो उसी काम पर अपने अनुभव साझा किए हों |
एक जागरूक, जिम्मेदार और शिक्षित नागरिक के तौर पर आपका ध्यान जरूरी मुद्दों की तरफ जाएगा, जो हमारे परिवेश या हमारे लोगों को / उनके मन को प्रभावित करते हों
विभिन्न परिप्रेक्ष्य मे चीजों को समझने के लिए अलग अलग किताबों के बारे मे जानने का मौका
उम्र भर के अनुभवों का निचोड़ होता है किताबों में, आप उस समझ को हासिल कर लोगों के साथ बेहतर ताल मेल बैठा कर कार्य कर सकते/सकती हैं |
हम सबके जीवन मे कोई दोस्त होता है जिसका साथ अच्छा लगता है, क्योंकि उसकी बातें रुचिकर लगती हैं, कितना अच्छा हो कि इतिहास के किसी महान इंसान का आपको साथ मिल पाये, उनकी किताब पढ़कर |
एक समूह से परिचय होगा जो आपकी ही तरह साहित्य अध्ययन को अपनी दिनचर्या मे स्थान देकर, समाज की एक समवेशी छवि चाहता है अपने मन मे, लोगों को उनके संघर्षों और आकांक्षाओं के साथ स्वीकार करना चाहता है, कुछ बदलाव की बात और फिर अपने स्तर पर काम ताकि लोगों के जीवन मे गरिमा, स्वतन्त्रता, उत्कृष्टता और संपन्नता मिल पाये और ज्यादा से ज्यादा लोग देश के विकास और स्थायित्व मे अपने योगदान दे सकें |
और क्या सीख सकते हैं आपमें क्या बेहतरी हो सकती है पुस्तक परिचर्चा के बाद इसके लिए मेरा ये एक लेख पढ़ा जा सकता है, लिंक नीचे है :
किताबों से हम क्या पा सकते हैं : Book Meet ( पुस्तकों पर चर्चा ) एक सार्थक प्रयास और जरूरी भी
एक रोचक लेख विशाल चंद जी की तरफ से - आप जो ढूंढ रहे हैं वह मिलेगा लाइब्रेरी में (मिचिको आओयामा) - लघु समीक्षा सह परिचय - समीक्षक विशाल चंद
मिलते हैं परिचर्चा मे |
शुभकामनायें
-लवकुश कुमार
जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना आपके जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट ।
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पुस्तक समीक्षा :आप जो ढूंढ रहे हैं वह मिलेगा लाइब्रेरी में
लेखिका : मिचिको आओयामा | प्रकाशक : पेंगुइन स्वदेश
टोक्यो की एक शांत-सी सामुदायिक लाइब्रेरी पर आधारित उपन्यास, आप जो ढूंढ रहे हैं वह मिलेगा लाइब्रेरी में केवल किताबों की कहानी नहीं है, बल्कि उन इंसानों की कथा है जो अपने जीवन के किसी न किसी मोड़ पर ठहर गए हैं।
इस लाइब्रेरी की रहस्यमयी लाइब्रेरियन सायूरी कोमाची पाठकों को सिर्फ़ किताबें नहीं देतीं, बल्कि उनके भीतर छिपे सवालों और उलझनों को पढ़ लेती हैं। अक्सर वह ऐसी किताब थमा देती हैं, जिसकी ज़रूरत सामने वाले को होती है—भले ही उसे खुद इसका एहसास न हो।
यह उपन्यास पाँच अलग-अलग पात्रों की कहानियों के माध्यम से आगे बढ़ता है। कोई अपने काम से ऊब चुका है, कोई मातृत्व और अपने अधूरे सपनों के बीच झूल रहा है, तो कोई जीवन के अगले अर्थ की तलाश में भटक रहा है। ये सभी पात्र अपने जीवन के ऐसे पड़ाव पर खड़े हैं जहाँ एक छोटा-सा बदलाव, एक सही सवाल या एक किताब उनका सोचने का नज़रिया बदल देती है।
कहानी में जीवन को ‘merry-go-round’ यानी झूले की तरह दिखाया गया है—जहाँ हर इंसान किसी और की स्थिति से ईर्ष्या करता है, जबकि असल में सुख की कोई स्थायी अवस्था होती ही नहीं। यह विचार बड़े सरल और सहज ढंग से जीवन की गहरी सच्चाइयों को सामने रखता है, बिना किसी भारी दर्शन के।
पढ़ते समय महसूस होता है कि किताब की गति काफ़ी शांत है। कहीं-कहीं विचारों में दोहराव भी लगता है और तेज़ रफ्तार कहानी पसंद करने वाले पाठकों को इसका धीमापन खटक सकता है। लेकिन जो पाठक ठहरकर, मन से पढ़ना पसंद करते हैं, उनके लिए यह किताब एक सुकून भरा अनुभव बन जाती है।
इस उपन्यास की सबसे बड़ी ताक़त इसकी "we" feeling यानी “हम” की भावना है—छोटे-छोटे रिश्ते, अजनबियों के बीच पनपती दयालुता, और संवाद की अहमियत।
किताब यह याद दिलाती है कि जीवन हमेशा हमारी योजनाओं के अनुसार नहीं चलता, लेकिन कई बार अनपेक्षित मोड़ हमें ठीक वहीं पहुँचा देते हैं, जहाँ हमें होना चाहिए।
कुल मिलाकर, आप जो ढूंढ रहे हैं वह मिलेगा लाइब्रेरी में एक हल्की, संवेदनशील और दिल को छू लेने वाली किताब है। यह जीवन बदल देने का दावा नहीं करती, लेकिन पढ़ते-पढ़ते मन को थोड़ा शांत ज़रूर कर देती है—और शायद यही इसकी सबसे बड़ी खूबी है।
" पढ़ें, समझें, बात करें और साझा भी "
शुभकामनाएं
विशाल चन्द @reading_owl.3
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विशाल चन्द जी समाजशास्त्र के शोधार्थी, पाठक और संवेदनशील शिक्षार्थी हैं। नवीन ज्ञान अर्जन और सतत सीखना आपके व्यक्तित्व का अभिन्न हिस्सा है। पुस्तकों का पठन और संग्रहण आपको विशेष प्रिय है।
आपके भीतर एक घुमक्कड़ चेतना भी सक्रिय है, जो आपको नए लोगों, स्थानों और अनुभवों से जोड़ती रहती है। बागवानी आपके लिए प्रकृति से संवाद का माध्यम है।
आप समाज को अपने स्वतंत्र दृष्टिकोण से देखने और विभिन्न समूहों के साथ मिलकर सामाजिक दायित्वों के निर्वहन को निरंतर प्रयासरत रहते हैं।
जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना आपके जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट ।
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