
"अंतस - जरा ठहरिए"
लेखक - लवकुश कुमार
प्रकाशक - नोशन (Notion) प्रेस चेन्नई
"अंतस - जरा ठहरिए" लवकुश कुमार जी द्वारा लिखी गई पहली साहित्यिक पुस्तक है,जो हॉल ही में प्रकाशित हुई है।
यह सरल शब्दों में जीवन मूल्यों की तरफ़ पाठक का ध्यान खींचती है। जो बहुत ही संवेदनशील तरीके से लिखी गई है।
जो किसी क्षेत्र या किसी एक विषय के बारे में भले ही आपको पूर्ण ज्ञान न दे सकें। लेकिन आम जीवन में छोटी छोटी चीजों का क्या महत्व है, उस ओर आपको जरा देर खींचकर रोक देती है।
बहुत सामान्य से विषय है,जहां सूक्ष्म चीजों को लेकर उन्होंने अपना लेखन किया है। एक तरह से यह पुस्तक मन में उठते तूफान को शांत कर देती है, खुद के लिए अपराधबोध, समाज के लिए ईर्ष्या,खुद के ही आगे बढ़ने की लालसा को ठहर कर सोचने को कहती है। उनका मुख्य चिंतन समाज के लिए है जो यह कहते हैं कि अपनी एक जिम्मेदारी समाज के लिए भी रखो।अपनी जिंदगी में इतने परेशान रहने की जरूरत नहीं है, किसी जरूरत मंद इंसान की मदद करो वह किसी भी तरह से की जा सकती है। दूसरों की मदद करने से बड़ा कोई सुख नहीं है।
आज जब जिंदगी बहुत तेजी से भाग रही है, आए दिन तरह-तरह की घटनाएं हमें सुनाई देती है, जब मानव सभ्यता को एक अलग दिशा में प्रवाहित किया जा रहा है।मनुष्य के लालच और भोग विलास को ही जीवन का उद्देश्य मान लिया गया है, ऐसे में लवकुश जी बहुत से उदाहरण देकर जीवन का उद्देश्य समझाते है।
जब मनुष्य, मनुष्य होने के नाते कुछ न कर पाने के अपराधबोध से खुद को दबाएं हुए है, ऐसे में आज के वातावरण का सूक्ष्म अवलोकन के लिए मानो कोई जगह ही नहीं रह गई है और परिणामतः हम कोई कार्य इसलिए नहीं कर रहे कि उससे हमें आनंद की प्राप्ति हो।
जीवन के मूलभूत पहलुओं में यह किताब एक मनुष्य को स्पष्टता देती है कि अभी कुछ भी नहीं छूटा, एक तसल्ली देती है कि अभी कुछ भी नहीं बिगड़ा,अगर किसी कारण से पढ़ाई छूट गई या कुछ परिस्थिति बदल गई तो उसका विकल्प फिर से शुरू करना है न कि आत्मघाती कदम उठा लेना|
जीवन की बारीकियों को समझाती हुई यह पुस्तक जीवन की खूबसूरती से पाठक का परिचय कराती है। वह स्पष्ट रूप से कहते हैं कि यह पुस्तक उनके द्वारा दुनिया और स्वयं को देखे और समझे जाने का प्रतिफल है।
यह पुस्तक पाठक के दिमाग में बहुत प्रभाव डालती है। मुझे स्वयं इसे पढ़ते हुए लग रहा था कि हां मुझे भी जरूरत थी इस तरह की पुस्तक की, जो आपको प्रेरित करें, लिखने को ,पढ़ने को अपने विचार खुल कर रखने को,अपनी असहमति दर्ज करने को और सामने वाले की बातों का सम्मान करने के लिए।
- शीतल
शीतल जी, उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के एक दूरस्थ पहाड़ी गांव भट्टयूडा से आती हैं। आपने अपना परास्नातक, भूगोल विषय में लक्ष्मण सिंह मेहर कैंपस पिथौरागढ़ से किया है। आप सामाजिक खांचों में फिट नहीं होना चाहती, इसे इस परिप्रेक्ष्य मे देखें कि आप हर वह रिवाज नकारना चाहती हैं जो आपको एक लड़की होने का हवाला देकर कम आंकते हो।
किताबें संवेदनशील ,सामाजिक ,निर्भय और वैज्ञानिक चेतना देती हैं, अतः किताबें पढ़ना, नया जानते रहकर अपनी समझ को विस्तार देते रहना आपकी आदत मे शुमार है। आपको फिल्में देखना पसंद है, और घूमना भी। भूगोल आपको अपनी ओर खींचती है साथ ही नए और रचनात्मक लोगों के साथ बात करने और उनके बारे में जानने को उत्सुक रहती हैं |
उक्त पुस्तक निम्नलिखित लिंक से क्रय की जा सकती है :- https://notionpress.com/in/read/antas
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