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अभिव्यक्ति का समय और पूर्णता का प्रश्न - मेरी पहली साहित्यिक पुस्तक, अंतस पर प्रतिक्रियाओं को लेकर एक स्पष्टीकरण: लवकुश कुमार

लगभग हर दौर में दो तरह के लेखक रहे हैं—एक वे जो भाषा की अंतिम चमक-दमक और शिल्प पर वर्षों काम करते हैं, और दूसरे वे जो समय की पुकार सुनकर तत्काल बोलते हैं। समाज को दोनों की आवश्यकता होती है।

मेरी पुस्तक "अंतस – ज़रा ठहरिए" पर पिछले कुछ दिनों में अनेक प्रतिक्रियाएँ मिलीं। इन प्रतिक्रियाओं में एक रोचक अंतर दिखाई दिया।

 

किशोर और युवा पाठकों का एक बड़ा वर्ग कह रहा है—

 

"सर, यही तो हम ढूँढ़ रहे थे।"

 

"बहुत से ऐसे सवाल पहली बार पढ़ने को मिले जिन पर हमने कभी सोचा ही नहीं था, या इस तरह से नहीं सोचा था।"

 

"यह किताब जैसे हमारी पीढ़ी के लिए ही लिखी गई है।"

 

इन प्रतिक्रियाओं को पढ़कर संतोष होता है, क्योंकि पुस्तक का उद्देश्य भी यही था—युवाओं/किशोरों को कुछ महत्वपूर्ण प्रश्नों की ओर ले जाना।

 

लेकिन दूसरी ओर कुछ वरिष्ठ और गंभीर पाठकों ने भाषा, शैली, संपादन, टाइपिंग तथा अभिव्यक्ति की कमियों/विस्तार/गहराई की ओर भी ध्यान दिलाया है। मैं उनका भी उतना ही आभारी हूँ।

 

वास्तव में, दोनों प्रकार की प्रतिक्रियाएँ मेरे लिए मूल्यवान हैं।

 

फिर भी, इस अवसर पर मैं अपनी लेखकीय दृष्टि स्पष्ट करना चाहता हूँ।

 

 मैं क्या लिखना चाहता था?

 

मैंने यह पुस्तक भाषा का चमत्कार दिखाने के लिए नहीं लिखी।

 

मैंने यह पुस्तक इसलिए लिखी क्योंकि मुझे लगा कि आज का किशोर और युवा बहुत सारी सूचनाओं के बीच रहकर भी बहुत से बुनियादी प्रश्नों से दूर होता जा रहा है।

मुझे ऐसा लगता है, या कहिए कि मैंने अपनी सीमित दृष्टि में ऐसा देखा है कि:

वह करियर पर बात करता है,

लेकिन जीवन पर कम।

 

वह सफलता पर चर्चा करता है,

लेकिन संतोष पर नहीं।

 

वह प्रतियोगिता समझता है,

लेकिन स्वयं को कम समझता है।

 

वह दुनिया को बदलना चाहता है,

लेकिन अपने भीतर झाँकने का समय नहीं निकाल पाता।

 

यदि यह पुस्तक उसे थोड़ी देर रुककर सोचने पर विवश करती है, तो मुझे लगता है कि इसका सबसे बड़ा उद्देश्य पूरा हो जाता है।

 

 क्या पुस्तक में कमियाँ हैं?

 

निश्चित रूप से हैं।

 

मैं यह दावा कभी नहीं करूँगा कि यह एक परिपूर्ण पुस्तक है।

 

भाषा की सीमाएँ हो सकती हैं।

संपादन में त्रुटियाँ हो सकती हैं।

टाइपिंग की गलतियाँ भी हो सकती हैं।

 

जो मित्र इन कमियों की ओर संकेत कर रहे हैं, वे वास्तव में मेरी सहायता कर रहे हैं। अगली आवृत्तियों में इन्हें सुधारना मेरी जिम्मेदारी है।

 

लेकिन मैं एक बात अवश्य कहना चाहूँगा—

 

हर प्रकार की त्रुटि समान महत्व की नहीं होती।

 

एक त्रुटि भाषा में हो सकती है।

दूसरी त्रुटि समय पर न बोलने की हो सकती है।

 

मेरे लिए दूसरी त्रुटि अधिक गंभीर है।

 

मै मानता हूँ कि, समय पर कही गई अपूर्ण बात, देर से कही गई परिपूर्ण बात से अधिक उपयोगी हो सकती है।

दूसरा यदि मेरे द्वारा उठाए गए किसी प्रश्न पर गहराई से नहीं भी लिखा गया तो उसका कारण, एक ही किताब में कई सारे जरूरी प्रश्न शामिल करना था, कहते हैं समझदार के लिए इशारा काफी होता है, वैसे जिज्ञासु पाठक के लिए इच्छित विषय पर गहनता से जानने के लिए वरिष्ठ लेखकों का साहित्य भी मौजूद है, इसी के दृष्टिगत ही तो मैंने पुस्तकों की एक सूची भी दे रखी है मेरी पुस्तक के अंत में| 

 

आज का समय तेजी से बदल रहा है।

 

बच्चे और युवा प्रतिदिन हजारों संदेशों, वीडियो और विचारों से घिरे हैं।

 

ऐसे समय में यदि कोई लेखक यह सोचकर वर्षों तक चुप रहे कि अभी भाषा और बेहतर हो जाए, शैली और निखर जाए, प्रत्येक वाक्य पूर्ण हो जाए, तब तक शायद जिन प्रश्नों पर बात करनी थी, वे और अधिक जटिल हो चुके होंगे।

 

मैं पूर्णता का विरोध नहीं करता।

 

बल्कि मैं स्वयं उसे पाने की दिशा में उन्मुख हूँ।

 

लेकिन मैं यह भी मानता हूँ कि जरूरी बात समय पर कही जानी चाहिए।

 

पूर्णता की यात्रा चलती रह सकती है।

 

मौन की भरपाई बाद में नहीं हो सकती।

 

 लेखक भी सीखता है

 

अक्सर हम मान लेते हैं कि लेखक पुस्तक लिखने के बाद पूर्ण हो जाता है।

 

मेरा अनुभव इससे बिल्कुल अलग है।

 

मेरे लिए हर पाठक एक शिक्षक है।

 

कोई भाषा सिखाता है।

 

कोई विचारों की गहराई दिखाता है।

 

कोई संपादन की आवश्यकता बताता है।

 

कोई यह विश्वास दिलाता है कि पुस्तक ने उसके जीवन में कुछ बदल दिया।

 

इन सभी से मैं सीख रहा हूँ।

 

मैं किस कसौटी पर अपनी पुस्तक को देखता हूँ?

 

  • यदि कोई विद्यार्थी पहली बार किसी महत्वपूर्ण प्रश्न पर सोचने लगे...
  • यदि कोई युवा सोशल मीडिया की निरर्थक दौड़ से निकलकर पुस्तक पढ़ने लगे...
  • यदि कोई अपने माता-पिता को नए दृष्टिकोण से समझने लगे...
  • यदि कोई अपने जीवन को केवल नौकरी नहीं, बल्कि जिम्मेदारी की तरह देखने लगे...
  • यदि किसी को अपनी तकलीफ के इतर दूसरों की तकलीफ में भी तकलीफ हो 
  • पाठक यह समझ पाए कि जीवन में आज़ादी सबसे ऊपर होती है, किसी भी सुविधा से ऊपर
  • पाठक में यह हिम्मत आ सके कि वह कार्य की गुणवत्ता को व्यवहार कुशलता से ऊपर रख सके 
  • युवाओं में गलत की आलोचना करने की हिम्मत भरपूर रहे भले ही इसके लिए उसे अकेले ही क्यों न हो जाना पड़े 

 

तो मेरे लिए यह उपलब्धि किसी भी भाषाई प्रशंसा से कम नहीं है।

 

साहित्य का अंतिम उद्देश्य केवल भाषा का सौंदर्य नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर चेतना जगाना भी है।

 

अंत में

 

मैं अपने सभी आलोचकों और शुभचिंतकों का हृदय से धन्यवाद करता हूँ।

 

जो कमियाँ बता रहे हैं, वे भी मेरी यात्रा के साथी हैं।

 

जो पुस्तक के उद्देश्य को समझ रहे हैं, वे भी।

 

मैं भविष्य में भाषा, शिल्प और संपादन—सभी पर अधिक मेहनत करूँगा।

 

लेकिन यदि मुझे फिर कभी चुनाव करना पड़े कि एक जरूरी बात आज कहूँ या उसे पूर्ण बनाने के लिए वर्षों तक रोककर रखूँ,  तो संभवतः मैं फिर वही करूँगा जो इस पुस्तक के साथ किया—

 

समय की पुकार को प्राथमिकता दूँगा।

 

क्योंकि मेरा विश्वास है—

 पूर्णता एक सतत यात्रा है, पर समय पर की गई सार्थक अभिव्यक्ति कभी-कभी एक पूरी पीढ़ी की दिशा बदल सकती है।

मैं आलोचना को स्वीकार करता हूँ, सुधार के लिए प्रतिबद्ध हूँ, लेकिन समय पर आवश्यक संवाद को पूर्णता की प्रतीक्षा में स्थगित करना उचित नहीं मानता।

 

सादर धन्यवाद

लवकुश कुमार

अस्वीकरण - इस लेख को सँवारने के लिए, chatgpt का इस्तेमाल किया गया है|


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सत्रहवीं ऑनलाइन साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा 27-06-2026

बीते शनिवार (27-06-2026) हम सबके सामूहिक प्रयास और वरिष्ठजनों के प्रोत्साहन से सत्रहवीं साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा का ऑनलाइन आयोजन सफल रहा, जिसमें निम्नलिखित पुस्तकों/रचनाओं/विषयों पर सार्थक चर्चा हुयी:

  • रूपतिल्ली की कथा – श्री प्रकाश मिश्र (पूर्वोत्तर भारत पर आधारित)
  • ठहरो दु:शाषन – राजीव जोशी (शैक्षिक दखल पत्रिका के जून अंक से एक लेख )
  • जल थल मल – सोपान जोशी
  • एवरेस्ट की कहानी – प्रो० आल अहमद सुरदर (बाल साहित्य)
  • पीपल की छांव में-  पीपल बाबा (स्वामी प्रेम परिवर्तन)
  • शादी होने तक ही पढ़ पाती थीं लड़कियाँ” - हर्षा भंडारी (शैक्षिक दखल पत्रिका के जून अंक से एक लेख )
  • शर्ट का बटन- प्रियंका जोशी (शैक्षिक दखल पत्रिका के जून अंक से एक लेख )
  • 'इकिगाई' (Ikigai) - हेक्टर गार्सिया और फ्रांसिस मिरालेस

  • ·         केवल पढना ही काफी नहीं, जरुरत है पढ़े हुए को साझा करने की, ताकि और लोग भी लाभान्वित हो सकें और इस तरह हमारे लिए भी उनके साथ सामंजस्य बिठाना आसान होगा
  • ·         प्रो पीटर ग्रे, शिक्षा मनोविज्ञान के अमेरिकी अध्येता हैं, जो मुख्यतः शिक्षा और खेलों के अंतर्संबंधों पर उनके गहन शोध के लिए जाने जाते हैं|
  • ·         शिक्षा को समझने के लिए उसके इतिहास को भी समझना होगा
  • ·         हमें उन विद्यालयों की विधि को भी समझना होगा जो परंपरागत विद्यालयों से भिन्न होते हुए भी कुशल नागरिक दे रहे हैं
  • ·         दो कार्यों का लक्ष्य यदि एक ही है तो ताल मेल बिठाकर चलने से अभीष्ट उद्देश्य को पाना आसान हो जाता है|
  • ·         लिखना जरुरी है, इसे एक उदाहरण से समझिये कि यदि आप आज अपने शहर के बारे में कुछ लिखते हैं तो आज के बीस साल बाद वह एक दस्तावेज का कार्य करेगा जो हमें उन बीस सालों में शहर के विकास की यात्रा को समझने में मदद करेगा|
  • ·         अगर आज आप चीज़ों को एक डायरी के रूप में भी दर्ज कर रहे हैं तो कालांतर में एक पुस्तक तैयार हो सकती है|
  • ·         पुस्तक परिचर्चा, चाहे किसी समिति के द्वारा आयोजित हो या किसी व्यक्ति के द्वारा इसका प्रयोजन पढने लिखने और समझ को साझा करने का वातावरण(माहौल) तैयार करना है ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों में पढने की ललक जागे, अतः आयोजक बधाई और सहयोग के पात्र हैं और साथ वह साथी भी धन्यवाद के पात्र हैं जो परिचर्चा में शामिल होकर इसके महत्व और प्रासंगिकता का समर्थन करते हैं|
  • ·         किसी भी चीज़ पर बात रखना तब ही सहज और सार्थक होता है जब हम उसे भली भाँति समझ चुके हों|
  • ·         यदि आप समाज में बेहतरी का बदलाव चाहते हैं तो पढने लिखने की संस्कृति को बढ़ावा देने का कार्य एक अच्छा विकल्प हो सकता है, जिसमें पढने लिखने और किताबों पर बात वाले आयोजनों में सक्रियता से भागीदारी करके, बेहतर माहौल सुनिश्चित किया जा सकता है|
  • ·         आज पिथौरागढ़ के साथ बेरिनाग और बागेश्वर तक भी पुस्तक परिचर्चा के आयोजन पहुँच चुके हैं, यह कार्य आगे बढ़ते रहे इसके लिए समर्पित युवाओं को आगे आना होगा
  • ·         अगर किताब पढ़कर आप उस पर चर्चा नहीं करेंगे तो बात आगे कैसे बढ़ेगी|

 केदारनाथ और पर्यटन, जरूरत इस बात पर सोचने की कि अब आस्था ही खींच रही या फिर रील संस्कृति भी 

तेनजिंग से पहले के अभियानों का इतिहास, ताकि हम बेहतर समझ सकें एवरेस्ट पर फतेह को 

पीपल बाबा को नानी द्वारा बचपन में  ही प्रकृति-प्रेमी बना दिया (सीधे नहीं परोक्ष रूप से)

उत्तर पूर्व के हमारे देशवासियों के साथ जो भी भेदभाव की खबरें हमे सुनने को मिलती हैं इसका कारण है उनके बारे में हमारी जानकारी कम होना, क्योंकि इन पर आधारित साहित्यिक पुस्तकों की संख्या अपेक्षाकृत बहुत कम है|

श्री प्रकाश मिश्र के और भी उपन्यास हैं उत्तर पूर्वी भारत की जनजातियों पर, जिन्हे जरूर पढ़ा जाना चाहिए ताकि हम खुद से अलग एक समाज के बारे में जान सकें ताकि उनके साथ सहज हो सकें और जान सकें कि क्यों किसी के लिए अपनी पहचान बनाए रखने का संघर्ष, उसके जीवन एक एक अंग होता है|

एक बात जो जरूरी है वह है कि ऐसा साहित्य केवल इच्छा की दृष्टि से नहीं, एक जरूरत समझकर पढ़ा जाना चाहिए ताकि आपसी तालमेल, सहजता, एकता और सम्मान सुनिश्चित किया जा सके|

शैक्षिक दखल पत्रिका का प्रकाशन शैक्षिक दखल समिति द्वारा हर छमाही किया जाता है, जोकि शैक्षिक सरोकारों को समर्पित शिक्षकों तथा नागरिकों का साझा मंच है|

पुस्तक परिचर्चा में किसी भी पुस्तक पर बोलने के लिए किताब खत्म होने का इंतज़ार न करें, जितना पढ़ा है उसका संदर्भ देकर भी अपनी बात रखी जा सकता है|

कोई लेख पढ़ा है तो उस पर भी अपनी बात/अवलोकन साझा किया जा सकता है|

लाल बहादुर वर्मा का आदिवासी साहित्य हमे इस तबके को बेहतर समझने और इनके साथ संवेदित होने में मदद कर सकता है|

सोपान जोशी जी की किताब हम सबके के लिए जरूरी होनी चाहिए ताकि हम समझ सकें पर्यावरण और समाज के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी को, 

ह्वेल का मल, अन्य समुद्री प्रजातियों के लिए पोषक तत्व का काम करता है|

ये समय है कि हम विचार करें और अध्ययन भी कि पहाड़ों पर बढ़ते सैलानियों का वहाँ की परिस्थितिकी पर क्या प्रभाव पड़ रहा है|

शिक्षकों को चाहिए कि यदि उन्हे विद्यार्थियों के किसी प्रश्न का जवाब नहीं आता तो उन्हें डांटने के बजाय (ऐसे प्रकरण सुनने को मिलते हैं) उनसे उस पर चर्चा कि जाए और अगर जरूरत पड़े तो समय भी मांगा जाये लेकिन उन्हे डांटकर प्रश्न पूछने के लिए हतोत्साहित न किया जाए, तब ही हम उनके अंदर की जिज्ञासा और सृजनशीलता को सही पोषण दे पाएंगे|

अगर किसी छात्र या छात्रा कि गणित या और कोई विषय कमजोर है और उसके द्वारा उस विषय को आगे चलकर छोड़ दिया जाता है तो कोई जरूरी नहीं कि इसमें उस विद्यार्थी की ही अक्षमता है, बहुत संभावना है कि उस विषय के अध्यापक उतने सक्षम न मिलें हों|

उक्त परिचर्चा में निम्नलिखित पुस्तकसाथी शामिल रहे:
आदरणीय महेश पुनेठा सर, हर्षा भण्डारी मैम,प्रियंका जोशी मैम, विशाल दा (विशाल चंद जी), कर्ण भाईजी,अंशुल मैम, कृष्णा जायसवाल, प्रिया कश्यप, प्रिया जायसवाल, प्रीति जायसवाल, शुभम गुप्ता, और लवकुश कुमार

परिचर्चा का कुशल संचालन, लिटरेरी लैंड, कानपुर के हमारे पुस्तक साथी कर्ण भाई जी ने किया, जोकि परिचर्चा को रोचक और यादगार बनाने वाला रहा|

पुस्तक परिचर्चा मे शामिल सभी पुस्तक साथियों (Bookmates) ने पुस्तक परिचर्चा मे शामिल होकर/अभिव्यक्ति/सराहना/भागीदारी के माध्यम से इस पहल को पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा देने में, मानवीय मूल्यों के पोषण में, अपनी बात को बेहिचक रखने में महत्वपूर्ण माना एवं एक दूसरे के प्रति आभार व्यक्त किया ताकि इस जरूरी कार्य की नियमितता बनी रहे एवं समाज मे एक सकारात्मक बदलाव में अपना विनम्र योगदान सुनिश्चित किया जा सके |

धन्यवाद ज्ञापन के साथ परिचर्चा को अगली परिचर्चा तक के लिए विराम दिया गया|

इस आशा के साथ कि यह रिपोर्ट पाठकों को पुस्तक परिचर्चा को समझने और उसमे शामिल होने के लिए प्रेरित करेगी |

अगली परिचर्चा 04 जुलाई (शनिवार रात 09:00 बजे)  को होगी, शामिल होकर पढ़ने-लिखने की संस्कृति पर काम करने में अपना योगदान सुनिश्चित करें और पुस्तक परिचर्चा से साहित्यिक लाभ लेते हुये अपने दिन की सार्थकता में एक और आयाम जोड़ें|

  धन्यवाद 

-लवकुश कुमार

 

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प्रोफेसर की डायरी - डॉ लक्ष्मण यादव : पुस्तक परिचय सह समीक्षा (शीतल भट्ट)

प्रोफेसर की डायरी एक जरूरी पढ़ी जाने योग्य पुस्तक है।

यह डायरी एक प्रोफेसर का अनुभव और आप बीती मात्र नहीं बल्कि शिक्षक वर्ग की व्यथा कथा भी है।

एक ईमानदारी के साथ लिखा गया अपना निजी अनुभव,जो उन्होंने महसूस किया है। वह लिखते है कि इस दौर में बोलने की कीमत चुकानी होती है। यह एक तथ्य है कि सवालों से घबराने वाली सत्ताएं चाहती है कि सवाल पैदा करने वाली जगहों को ही कमजोर कर दिया जाए। इसलिए  ऐसी सत्ता की कोशिश रहती है कि शिक्षक हमेशा डर में रहें क्योंकि एक डरा हुआ शिक्षक अपनी कक्षाओं में रीढ़ विहीन विद्यार्थी तैयार करता है, जो समाज में जाकर मुर्दा नागारिक में तब्दील हो जाता है।"

यह पंक्ति ऐसी सच्चाई है, जो कहीं भीतर तक सोचने को मजबूर कर देती है। यह पुस्तक बहुत से भावावेगों से भर देती है। गुस्सा उस सिस्टम के खिलाफ जो छात्रों की उम्मीदों का गला घोंटने में लगा है। इसके साथ ही पुस्तक हमें प्रश्न पूछने का साहस, लड़ने का साहस, बोलने का साहस देती है।

यह डायरी मन को बहुत विचलित कर देती है। हमारी उच्च शिक्षा में सीनियर शिक्षकों द्वारा अपने जूनियरों से किस तरह बर्ताव किया जाता है, इसका उदाहरण है वह "लाइन" जब वहीं काम करने वाले कर्मचारी से पूछा जाता है कि कमरे में कौन है तो वह जवाब देता है कि कमरे में 2आदमी है और 3 एडहॉक है।यह पक्ति अपने आप में बहुत कुछ कह देती है।

प्रोफेसर लक्ष्मण को दिल्ली विश्वविद्याल जैसे प्रतिष्ठित विश्वविद्याल में 14साल पढ़ाने के बाद एक दिन उन्हें बताया जाता है कि अब आपकी जरूरत नहीं है। उन्हें अंदेशा था कि उन्हें बोलने की कीमत चुकानी होगी,उनके बहुत से सीनियरों ने उन्हें पहले ही आगाह कर दिया था कि आप ऐसे परमानेंट नहीं हो पाएंगें।

बार बार उन्हें ही नहीं उनकी तरह बहुत से शिक्षकों को प्रताड़ित किया जाता है। उन्हें 3 महीने के अस्थाई समय के लिए रखा जाता है, अगली बार उन्हें नियुक्ति मिलेगी या नहीं यह उनके द्वारा की गई या ना की गई जी हुजूरी पर निर्भर करता है।

वह शिक्षा जिससे उम्मीद की जाती है कि वह समाज में सभी के लिए समानता का वातावरण तैयार करेगी, सभी को समान अवसर देगीं। लेकिन यह संस्थान भी जातिवाद भाई-भतीजावाद, सामंतवाद का केंद्र बनते जा रहे हैं|

यह पुस्तक रोहित वेमुला जैसे तमाम छात्रों की कहानी है जो सिस्टम की भेंट चढ़ गए। जिनके सामने ऐसी परिस्थितियां तैयार करी गई, जिससे वह पूरी तरह टूट गए और अपनी लड़ाई अधूरी छोड़ गए।

अंत में पुस्तक में उनके द्वारा लिखी लाइन " मेरे लहजे में जी - हुजूर न था, और मेरा कोई कसूर न था।उनकी हिम्मत साहस और दृढ़संकल्प को दिखाता है। उनके पास परमानेंट होने के बहुत अवसर थे,लेकिन उन्होंने अपनी ईमानदारी को चुना और अंत तक लड़ते रहें। यह पुस्तक आज मूक हो चुकी आवाजों को स्वर देती है।उस साहस को जगाती है,जो भीतर कहीं दब गया है।

सच ही लिखते है "आज हमारे देश की शिक्षा व्यवस्था वेंटिलेटर पर है, जिसे अस्थाई शिक्षकों के जरिए ऑक्सीजन दिया जा रहा है।"

एक बहुत जरूरी और खोखली होती शिक्षा व्यवस्था की सच्चाई को सामने रखती पुस्तक, जो हमें भी अपनी आवाज बुलंद करने का साहस देती है, और हर हाल में अपने अधिकारों के लिए बोलने और लड़ने की हिम्मत देती है।

 

- शीतल भट्ट


शीतल जी, उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के एक दूरस्थ पहाड़ी गांव भट्टयूडा से आती हैं। आपने अपना परास्नातक, भूगोल विषय में लक्ष्मण सिंह मेहर कैंपस पिथौरागढ़ से किया है। आप सामाजिक खांचों में फिट नहीं होना चाहती, इसे इस परिप्रेक्ष्य मे देखें कि आप हर वह रिवाज नकारना चाहती हैं जो आपको एक लड़की होने का हवाला देकर कम आंकते हो।

किताबें संवेदनशील ,सामाजिक ,निर्भय और वैज्ञानिक चेतना देती हैं, अतः किताबें पढ़ना, नया जानते रहकर अपनी समझ को विस्तार देते रहना आपकी आदत मे शुमार है। आपको फिल्में देखना पसंद है, और घूमना भी। भूगोल आपको अपनी ओर खींचती है साथ ही  नए और रचनात्मक लोगों के साथ बात करने और उनके बारे में जानने को उत्सुक रहती हैं |


 

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बारहवीं ऑनलाइन साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा 24-05-2026

बीते रविवार (24-05-2026) हम सबके सामूहिक प्रयास और वरिष्ठजनों के प्रोत्साहन से बारहवीं साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा का ऑनलाइन आयोजन सफल रहा, जिसमें निम्नलिखित पुस्तकों/रचनाओं/विषयों पर सार्थक चर्चा हुयी:

अकार - पत्रिका  (दिलरस प्रियंवद द्वारा संपादित)

चीफ़ की दावत – भीष्म साहनी

The Trial Weeka wellness Programme

12 Week Fitness Project

The autobiography of Paramhansh Yoganand

  • शिक्षा के उद्देश्य में एक है सीखने और समझने की ललक को जिंदा रखना
  • जानकारी भरना और पढ़ाना मूल उद्देश्य नहीं
  • ज्ञान का निर्माण और सृजन स्वयं कर सकें विद्यार्थी यह है अंतिम उद्देश्य
  • बच्चे बचपन से स्वाभाविक रूप से ही सीखने की पृवत्ति रखते हैं, जिज्ञासा रखते हैं
  • बीज को हम खींचकर नहीं बढ़ाते वरन उसे अंकुरित और पोषित होने का उचित माहौल देते हैं वैसे ही हो बच्चों की शिक्षा व्यवस्था भी
  • अभिभावक तो सबसे पहले अध्यापक हैं

  • जो लोग साहित्य अध्ययन की शुरुआत करना चाहते हैं और उन्हे यदि मोटी किताबें डराती हैं तो वह पत्रिका से शुरुआत कर सकते हैं|
  • पत्रिका का सुझाव इसलिए क्योंकि हर पाठक की अपनी रुचि होती है, किसी को कहानी तो किसी को कविताएं और किसी को संस्मरण या यात्रा वृत्तान्त पसंद आते हैं, पत्रिकाओं में इस तरह कई विधाओं पर रचनाएँ होती हैं|  दूसरा कि एक रचना मन को न भाने पर आगे बढ़ा जा सकता और कोई दूसरी रचना पर ध्यान दिया जा सकता है| इस तरह एक रचना ही सही लेकिन मुकम्मल पढ़ा जा सकता है |
  • अकार संगमम – 3 दिन का आयोजन, जहां पर साहित्यकारों के बीच चर्चा
  • यह एक वैचारिक पत्रिका इसीलिए इससे भी आसान के लिए पाखी, हंस, मधुमती और आजकल जैसी कुछ बेहतरीन पत्रिकाओं से शुरुआत की जा सकती है|
  • यदि आप कुछ लिखती/लिखते हैं तो रचनाएँ प्रेषित की जा सकती हैं पत्रिकाओं को इस तरह आपका एक पाठक वर्ग तैयार हो सकता है जो भविष्य में आपके द्वारा किसी पुस्तक के लिखे जाने पर, पाठकों तक उसकी पहुँच सुनिश्चित करने में मददगार हो सकता है|

  •  आज की जो भी हालत है हमारी उसे स्वीकार करना चाहिए और बेहतरी के लिए प्रयास लेकिन उस हालत को अपने साथ के लोगों से छिपाकर उनके सामने बेहतर होने का ढोंग इंसान को अपनी ही खूबियाँ भूल जाने की तरफ धकेल देता है, आपकी भाषा और आपका पहनावा जैसी भी हो उसके लिए खुद को कभी हीन न समझें और इस बात को समझें की जीवन की सफलता, आंतरिक सच्चाई, करुणामय हृदय और चीजों की समझ के साथ जीने में है नाकी बाहरी दिखावे में|
  • जब तक हम अपनी कमियों को छिपाते रहेंगे, उन्हे दूर करना मुश्किल ही रहेगा
  • हम सबमें अपार संभावनाएं हैं, किसी इंसान को कमतर बोलकर उसे छिपा देना उसकी मानवीय गरिमा के खिलाफ है, जैसा की चीफ की दावत में दिखाया गया है|
  • व्यायाम में, पूर्णता हो, केवल शाम का टहलना पर्याप्त नहीं
  • पढ़ाई भी तब ही होगी जब शरीर स्वस्थ हो, स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मष्तिस्क का निवास होता है |
  • औरतों के लिए तो उचित व्यायाम बहुत ही जरूरी है|
  • आपकी छवि दूसरों के मन मे कैसी है, इसका अगर दबाव रहेगा तो इंसान अपनी सहजता खो देता है, सभ्य दिखने के दबाव में सहजता न खोएँ और पूर्वाग्रह में न रहें|
  • स्वयं को खुलकर व्यक्त करना, यह सुनिश्चित करता है कि लोग आपको लेकर कम से कम भ्रम मे रहेंगे|

उक्त परिचर्चा में निम्नलिखित पुस्तकसाथी शामिल रहे:

आदरणीय महेश पुनेठा सर, हर्षा भण्डारी मैम, गुंजन त्यागी मैम, सौम्या मैम, अरविंद कुमार, रंजीत ठाकुर,  प्रिया शर्मा, अनुपम जायसवाल, प्रीति जायसवाल, गायत्री जायसवाल, अंकित जायसवाल, रंजीत कुमार, प्रिया कश्यप,विशाल जायसवाल, c सिंह और लवकुश कुमार|

पुस्तक परिचर्चा मे शामिल सभी पुस्तक साथियों (Bookmates) ने पुस्तक परिचर्चा मे शामिल होकर/अभिव्यक्ति/सराहना/भागीदारी के माध्यम से इस पहल को पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा देने में, मानवीय मूल्यों के पोषण में, अपनी बात को बेहिचक रखने में महत्वपूर्ण माना एवं एक दूसरे के प्रति आभार व्यक्त किया ताकि इस जरूरी कार्य की नियमितता बनी रहे एवं समाज मे एक सकारात्मक बदलाव में अपना विनम्र योगदान सुनिश्चित किया जा सके |

धन्यवाद ज्ञापन के साथ परिचर्चा को अगली परिचर्चा तक के लिए विराम दिया गया|

इस आशा के साथ कि यह रिपोर्ट पाठकों को पुस्तक परिचर्चा को समझने और उसमे शामिल होने के लिए प्रेरित करेगी |

अगली परिचर्चा 06 जून (शनिवार रात 08:30 बजे)  को होगी, शामिल होकर पढ़ने-लिखने की संस्कृति पर काम करने में अपना योगदान सुनिश्चित करें और पुस्तक परिचर्चा से साहित्यिक लाभ लेते हुये अपने दिन की सार्थकता में एक और आयाम जोड़ें|

  धन्यवाद 

-लवकुश कुमार

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मुझे इंतज़ार है उस दिन का जब ...

"अगर चाहत है तो उस चाहत को पूरा करने के लिए माहौल बनाने पर भी काम करना होगा|"

क्या आप चाहते/चाहती हैं 


ऐसा समाज जिसमे
 लोग अपना काम बहुत अच्छे से कर रहे हों
 लोग अपने काम से काम रखते हों और एक दूसरे को
परेशान न करते हों
 सड़कों पर लोग नियम से चल रहे हों, दुर्घटनाएँ कम से
कम हों
 सभी अपना काम ईमानदारी से कर रहे हों
 लोग अपने वादों पर खरे उतरते हों
 लोग किसी को उसकी जाति, समुदाय, वंश, शारीरिक
सुंदरता से न पहचान उसे उसके काम से पहचानते हों
 अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करने का अवसर सबको मिलता
हो

 लोग नयी जगह भी सुरक्षित महसूस करते हों
 लोग एक दूसरे से सलीके से और प्रेम के साथ पेश आयें
 लोग अपने अधिकार के साथ अपने कर्तव्यों को भी समझें
 लोग अपनी स्वतन्त्रता का दुरुपयोग न करें
 लोग कमजोर पर हसने के बजाय उनके साथ करुणा का
बर्ताव करें
 तकलीफ मे फंसे इंसान को यथासंभव मदद मिले नाकि
लोग खड़े होकर बस वीडियो बनाएँ
 काम करने वाले को काम का श्रेय दें नकि चापलूसी करने
वाले और बातें बनाने वालों को
 सबको उनके हिस्से का श्रेय और प्रतिष्ठा मिले
 हिंसा का स्थान न हो, लोगों को आजादी हो "न" कहने की
 स्वतन्त्रता हो जबरदस्ती नहीं, सबसे उनका पक्ष या
अनुभव सुना जाए
 साझा हितों के कार्यक्रमों मे सभी साझेदारों से उनकी राय
जानी जाये और उसे उचित स्थान भी दिया जाए
 शिक्षकों का उचित सम्मान हो
 लोग एक दूसरे का आंकलन सतही बातों पर न करें
 अपराध कम से कम हों
 मजबूत द्वारा कमजोर का शोषण न हो
 भेदभाव न हो, परिवारवाद न हो
 ज्यादा से ज्यादा लोगों में अपनी गलती स्वीकार करने का
और ज़िम्मेदारी लेने का साहस हो

 

वगैरह वगैरह......

फिर यह लेख आपके लिए है, बिना किसी पूर्वाग्रह में आए, या बिना ये सोचे कि आपको सब पता है, इसे पूरा पढ़ डालिए, रिवीजन ही सही|

बहुत तकलीफ होती है ये देखकर जब प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले अभ्यर्थियों को सुनता हूँ, ये कहते हुए कि अभी तो नौकरी की तैयारी कर रहे, अभी तो बिज़नेस को खड़ा करना है, साहित्य कहाँ! 

कुछ तो इस अति प्रतियोगी समय की बात है और कुछ तो ओढ़ी हुयी बेचारगी, बेचारगी इसलिए कहना चाहता हूँ कि खुद को जानना और खुद की असली जरूरतों को समझना, हमारे जीवन का उद्देश्य होना चाहिए और साहित्य इसमें मदद करता है इसीलिए साहित्य तो जीवन का अभिन्न अंग होना चाहिए, उसके लिए नौकरी पाने या बहुत ज्यादा पैसा इकठ्ठा कर लेने का इंतज़ार क्यों!

हम अक्सर लोगों को कहते हुये सुनते हैं कि अमुक इंसान बहुत ही छोटी या संकीर्ण सोच का इंसान है, लेकिन क्या हमने कभी सोचा है कि और लोग भी हमारे बारे में ऐसी ही बाते हैं करते होंगे, कारण? एक दूसरे को न समझ पाना, कितना अच्छा हो कि हमारे आस पास देश दुनिया से, चहुं ओर का साहित्य मौजूद हो फिर जरूरत कम हो जाएगी किसी को संकीर्ण सोच वाला इंसान कहने की|

जब मायूसी में खुद को मोटीवेट करने के अन्य सतही उपायों में, अन्दर की तकलीफ ढकने के लिए मनोरंजन में समय लगाया जा सकता है तो फिर बेहतरीन साहित्य के अध्ययन में क्यों नहीं, जिससे एक दिशा और क्लैरिटी मिलेगी जो बार-बार मोटिवेशन की जरूरत को भी खत्म कर देगी|

ये साहित्य भी आपके लिए ही है, आपकी जरूरतों और दुविधाओं को ध्यान में रखकर, आपके आवेगों और भावनाओं को संबोधित करते हुये लिखा गया साहित्य|

किसी ने यदि अपना समय और जीवन देकर लिखा हो तो क्या आप इसे कोई व्यापार समझते हैं, क्योंकि कुछ लोगों का पूर्वाग्रह रहता है कि पुस्तकें भी एक वाणिज्य का हिस्सा हैं, इस पर मै एक ही बात कहना चाहता हूँ कि पुस्तकें यदि आपकी दुविधा को कम कर सकें, आपके जीवन को सार्थक दिशा दे सकें या फिर लेखकों के अनुभव और अभिव्यक्ति आपको सुकून दे सकें या मन को शांति दे सकें, समाज में सौहार्द बढ़े और लोगों मे संवेदनशीलता (ताकि वह एक दूसरे की तकलीफ समझ उनके साथ खड़े हो पाएँ) और करुणा बढ़े तो हमे ऐसी किताबों को खुद भी पढ़नी चाहिए और अन्य लोगों को भी पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए|  

हर तरफ हर जगह बेशुमार आदमी, फिर भी तन्हाइयों का शिकार आदमी- निदा फ़ाजली     आखिर ऐसा क्यों? जवाब साहित्य मे मिलेगा  कि हम क्यों नहीं सहज हो पाते लोगों से जुडने में!

पुस्तकें निचोड़ होती हैं जीवन के अनुभवों का और प्रेम का प्रतीक होती हैं, उनके प्रेम का प्रतीक जिन्होने अपने जीवन के अहम पल में आपके लिए लेखन किया और फिर हमें उपलब्ध कराया| 

बेचारगी वाली बात पर वापस आते हैं - ऐसी ही बेचारगी कुछ ऐसे लोगों ने भी ओढ़ रखी है जो एक नौकरी में पहले से हैं और दूसरी की तैयारी कर रहें, उनसे भी यही कहना है कि जिस तरह हम तैयारी के साथ सोना और आराम नहीं छोड़ देते और न ही छोड़ पाते हैं सोशल मीडिया और दोस्तों के साथ गपशप या मन बहलाने के अन्य शौक तो फिर क्यों हम दिन का आधा या एक घंटा साहित्य को नहीं दे सकते!, क्या केवल हर वक़्त प्रतियोगी परीक्षा के लिए पढ़ते रहने से हमारे सफल होने की संभावना 100% हो जाएगी, नहीं, फिर क्यों जीवन और दिनचर्या के संतुलन को बिगाड़ना? क्या ऐसा करना समझदारी है!

मैंने ऐसे काफी लोगों को देखा है जो सब कुछ छोड़कर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं और फिर चयन न होने पर जीवन से हताश हो जाते हैं उसका कारण साफ है क्योंकि उन्होने जीवन के केंद्र में ही उस परीक्षा को ही रख लिया, जबकि करने के लिए और भी बहुत कुछ है जीवन में, साहित्य अध्ययन से स्वयं की समझ को विस्तार देना भी उनमे से एक काम है, जो न केवल आपको समझ देता है बल्कि निर्णय लेने और विकट परिस्थितियों का सामना करने के लिए मानसिक रूप से तैयार करता है| और साथ ही मदद करते हैं लोगों के साथ तालमेल बैठाकर चलने में क्योंकि जीवन मे यह भी तो सीखना ही है तो इसे भी उचित महत्व दें, जब जीवन में और भी प्राथमिकताएँ होगी तो परीक्षा मे असफलता आपको तोड़ेगी नहीं, जीवन से निराश नहीं करेगी|

 

एक सवाल अक्सर आता है मन में कि बड़े-बड़े पढ़े-लिखे लोग भी क्यों भ्रष्टाचार मे संलिप्त पाये जाते हैं, क्यों उनमे भी साहस की कमी मिलती है अन्याय के खिलाफ लड़ने को? उसका जवाब यही है कि वो उत्कृष्ट साहित्य से दूर रहे और कभी जान ही न पाये स्वयं को! वो बस अपने आपको एक शरीर मानकर रह गए, काश! उन्होने महान लोगों को पढ़ा होता है और जान पाते कि कैसे महान आत्माओं ने सत्य और न्याय को व्यक्तिगत हित-अहित और मोह से ऊपर रखकर जीवन मे डटकर संघर्ष किया और केवल अपने परिवार तक सीमित न रहकर, जन सामान्य को भी अपना अंश मानकर कभी अन्याय और भेदभाव के रास्ते नहीं चले|

बहुत बार नासमझी में हम ऐसी प्राथमिकताएँ निर्धारित कर लेते हैं खुद के लिए (अमूमन समाज की देखा देखी में) कि हमेशा दबाव में रहते हैं और लोगों से प्रेमवत पेश नहीं आ पाते, साहित्य ऐसी अवस्था में आपको वह दृष्टि दे सकता है, जिससे आप समझ सको कि क्या है जो आपके जीवन मे वाकई जरूरी है और क्या है जो बिलकुल गैर जरूरी है और इस तरह आप समाज के दबाव मे आकर "सामाजिक गुलामी" करने से बच जाते हो|

कभी कभी हम दूसरों को समझ नहीं पाते और दूसरे हमे नहीं समझ पाते, कभी कभी ऐसा भी होता है कि हम देखते हैं कि कोई एक फर्जी इंसान पर भरोसा कर लेता है बल्कि एक सच्चे इंसान से दूर भागता है| क्या है ये सब ?- ये है समझ का अभाव और है दूसरों को समझ पाने या खुद को अभिव्यक्त कर पाने की कुशलता न हो होना|

साहित्य अध्ययन इसमे भी आपकी मदद कर सकता है क्योंकि कभी-कभी खुद को अभिव्यक्त करने का पूरा समय नहीं मिल पाता हमें, उस स्थिति में यदि सामने वाला साहित्य अध्ययन करने वाला इंसान हुआ तो संभावना है कि उसकी समझ इतनी विस्तृत होगी कि इशारे में ही आपकी बात समझ जाए, जैसे एक डॉक्टर अमूमन लक्षणों से हमारी दिक्कत समझ जाता है|

  • एक अलग लेख में हम इस पर बात करेंगे कि कौन सी किताब किस तरह के लोगों को समझने में हमे मदद कर सकती है|
  • कौन सी किताब अमुक तरह के लोगों के साथ तालमेल बिठाने में हमारी मदद कर सकती है|
  • कौन सी किताब किस तरह की परिस्थितियों से निपटने के लिए हमे तैयार कर सकता है |

मुझे इंतज़ार है उस दिन का जब...............

  • दो दोस्त मिलें तो हाल चाल के साथ ये भी पूछें कि कौन सी किताब पढ़ रहे/रही हो आजकल
  • दोस्तों की बातचीत का हिस्सा हो कि सुना है तुम पिछले सप्ताह फलां साहित्यिक संगोष्ठी मे गए थे, बताओ कौन कौन से लेखक/कवि मिले वहाँ पर, क्या किसी से व्यक्तिगत रूप से मिलने का अवसर हुआ?
  • दोस्तों के बीच इस बात पर चर्चा हो कि कौन किस पुस्तक परिचर्चा समूह में भाग ले रहा/रही
  • यह भी बात हो कि एक मित्र बोले कि वह मासिक पुस्तक परिचर्चा में भाग ले रहा, तो दूसरा बोले कि वह तो हर सप्ताह साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा में भाग ले पा रहा है, जिसकी उसको खुशी है|
  • अभिव्यक्ति का तरीका बेहतर हो लोगों का, लोग कुछ गलत बोल जाने के डर से खुद को अभिव्यक्त करने से न रोकें, यह आत्मविश्वास आएगा साहित्य अध्ययन से 
  • लोग उधेद्बुन में न उलझे और खुलकर अपनी बात, अपने पूर्वाग्रह और आशंकाएँ व्यक्त कर सकें|

  • परिचर्चा मे लेखकों से मिलने का चलन हो और रचनाओं पर बात हो सके
  • पुस्तकों के पीछे की प्रेरणा/परिस्थिति और जरूरत पर बात हो सके
  • एक से एक सुलझे हुए और समझदार लोगों से मुलाक़ात हो पाने का माहौल बने
  • दिन का सफल हो जाना जैसी फीलिंग आए कोई बेहतरीन किताब पूरी करने पर और बहुत से लोग ऐसी फीलिंग ले पाएँ
  • पुस्तकालय खुलने की चर्चा हो, हर घर में एक कोना पुस्तकों का हो
  • पुस्तकों के विमोचन मे जाना खास हो
  • किसने किस पुस्तक की समीक्षा लिखी, इस पर बात हो
  • जरूरी घटनाओं को दर्ज करने की बात हो
  • जब लोग संध्या भ्रमण पर केवल गपशाप न करें, कविता पाठ करें एक से एक बेहतरीन कविताओं का
  • पति पत्नी केवल साथ बैठकर फिल्म ही न देखें, बल्कि बेहतरीन उपन्यास और नाटकों के पात्रों के संवादों को बोलकर उन रचनाओं को गहराई से महसूस करें
  • घर के बच्चे साथ बैठकर अपने अपने मन की कविताएं और कहानियाँ पढ़ें
  • घरों में कोई न कोई पत्रिका नियमित रूप से आए

  • शहर मे कोई यदि लेखक/कवि या रचनाकार का निवास हो तो वह गर्व का विषय हो शहरवासियों के लिए
  •  स्कूल में केवल तकनीकी विषयों मे ही अच्छा होना पैमाना न हो मूल्यांकन का, उसमें शामिल हो खुद को अभिव्यक्ति करने की क्षमता और अपने लिए ज्ञान सृजित करने की क्षमता भी|
  • युवाओं को ये स्पष्टता आ जाए कि नौकरी/व्यवसाय की तैयारी चलती रहेगी लेकिन एक बेहतर काम जो हो सकता है जीवन में वो है अच्छा साहित्य पढ़ना, ये चलता रहे नियमित
  • ये क्लैरिटी भी आ जाए कि असर हो न हों, जब भी बात आए तो अपनी राय/प्रतिक्रिया जरूर व्यक्त की जाये| 

  • हर गाँव या मोहल्ले में एक सामुदायिक पुस्तकालय हो।

  • उपहार के रूप में लोग पुस्तकें भेंट करें।

  • शैक्षणिक संस्थाओं में पुरस्कार के रूप में अनिवार्य रूप से पुस्तकें दी जाय।

  • समाज सेवा केवल शादी करने, मंदिर मस्जिद बनवाने या अस्पताल बनवाने या भंडारा करने तक सीमित न हो, बल्कि इसमें विद्यालयों में रंग बिरंगे बाल साहित्य का वितरण  करना भी शामिल हों
  • पढ़ी हुई अच्छी बात/उद्धरण रोज़ सोशल मीडिया पर शेयर करें
  • परिवार में रात के खाने के बाद सामूहिक पाठ का नियमित आयोजन करें
  • स्थानीय पुस्तकालय को सक्रिय बनाने में मदद करें
  • अच्छी साहित्यिक पत्रिकाएँ घर-घर सुझाएँ
  • गुलदस्ते की जगह पुस्तकें भेंट की जाएं।
  • सोशल मीडिया में ही वाट्सऐप स्टेटस पर घूमने टहलने के फोटो के साथ पढ़ी जा रही किताबों के उद्धरण और अंश भी साझा किए जाएं  और साथ ही पढ़े हुए को जीवन में कैसे उतारा जाए, इसके उदाहरण भी।
  • रिटर्न गिफ्ट में रंग बिरंगी चित्रों वाली किताबें दी जाएँ बच्चों के जन्मदिन पर 
  • शादी में जीवन की समझ और स्त्री पुरुष की मानवीय समझ पर आधारित पुस्तकें भी दी जाएँ

साहित्य हमे एक दूसरे को समझने में मदद करता है, और इस तरह से एक दूसरे से जुड़ने में भी और जब हम खुद को समाज से जुड़ा हुआ पाते हैं, तो हमारे अंदर प्रेम का भाव आता है जो हमसे एक से एक बेहतर काम करवा लेता है और हमारे लिए आनंद की अवस्था में रहना आसान होता है, इसीलिए साहित्य अध्ययन हमारी समझ को बेहतर करके हमारे मन को भी बेहतर कर सकता है|

क्यों इन्तजार है उस दिन का?

बताये देता हूँ :- 

  • क्योंकि तब ही लोग लोग समझ पाएंगे कि लोग ऐसे क्यों होते हैं 
  • लोग सहमत हो पाएंगे कि जीवन की सफलता सबसे आगे रहने में नहीं सबके साथ चलने मे हैं
  • जीवन की सफलता, स्वतन्त्रता और सुकून मे है भोग में नहीं
  • आनंद लोगों के उत्पीड़न और दोहन मे नहीं, करुणा और उपकार मे है 
  • लोगों को समझ आएगा कि डर के चलते किसी पर हमला कर देना, माहौल को गंदा करना है
  • लोग इस बात से एकमत हो पाएंगे कि माहौल अच्छा करने और अपराध कम करने के लिए इंसान के अंतस और समाज के ताने बाने में परिवर्तन की जरूरत होती  है न कि केवल नियम कायदे बना देने से, क्योंकि कई बार देखा गया है कि रक्षक ही भक्षक बन गया इसीलिए बदलाव अंदर से आना जरूरी है|

  • यह बात समझ आएगी कि जो लोग इंसान के मन और समझ को बदले बिना केवल डंडे और नियमों के दम पर समाज को बादल देना चाहते हैं वह केवल सपने ले रहे हैं| 
  • आप समझ जाओगे कि बोल बोलकर लोगों को बदला नहीं जा सकता लेकिन खुद मे बदलाव की शुरुआत से एक अच्छा उदाहरण पेश किया जा सकता है और खुद पर गर्व किया जा सकता है |
  • साथ ही हम जान पाएंगे कि हर कोई बोलकर भले ही लोगों को प्रभावित न कर पाएँ लेकिन बेहतरीन पुस्तकें और साहित्य इंसान को अंदर तक छूकर हृदय परिवर्तन करने की क्षमता रखते हैं|
  • हम इस बात से सहमत हो पाएंगे कि जब तक समाज में पढ़ने लिखने की संस्कृति नहीं आएगी लोगों को एक सूत्र में बांधना बहुत मुश्किल है(हाँ डर का माहौल बनाकर लोगों को लामबंद किया जा सकता है जिसके परिणाम कभी भी समाज के हित में नहीं होते )

इसीलिए अंत में इस बात पर अपनी बात खत्म करता हूँ कि यदि सामाज की बेहतरी के लिए कुछ बदलाव करने की चाहत है आपमें,  तो बिना किस बड़े पद या खूब पैसे कमाकर लोगों का भला सोंचने से पहले अभी से अपनी दैनिक दिनचर्या में साहित्य अध्ययन को स्थान दें और अन्य लोगों को भी अपने कर्मों द्वारा प्रेरित करें|

याद रखिए, किसी पीड़ित की मदद से बड़ा और जरूरी काम है, उस इंसान का हृदय परिवर्तन जो लोगों को पीड़ा देने मे खुशी पाता है|

उससे भी पहले उस मानसिकता पर वार जो इंसान को उत्पीड़क और क्रूर बनाती है|

किसी गरीब की मदद से भी महत्वपूर्ण काम ये है कि उसे अपनी गरीबी मिटाने के अवसर मिलें, उसे उसकी मेहनत और जरूरत भर की आमदनी मिले, और ये तब ही संभव है जब लोगों में  खुद के उन्नयन के लिए दूसरों को लूटने और एक्सप्लोइट करने की मानसिकता न हो|

एक उत्पीड़क केवल दूसरों का उत्पीड़न ही नहीं करता वह दूसरों के चेहरे की हंसी और जीवन की शांति छीनकर अपने आस पास के माहौल को भी दुख और तड़प से भर देता है!

इन सबके पीछे कौन है ?

हमारी पाश्विक प्रवृत्ति, असंवेदनशीलता और अधिक से अधिक भोगने की हवश और लोगों पर राज करने की असीमित भूख!

कौन मिलाएगे हमें अपने से पाशविक रूप से, कौन जगाएगा हमारे अंदर संवेदना?

जवाब है, "उत्कृष्ट साहित्य- दिल को छूती कहानियाँ, उपन्यास, तकलीफ और तड़प को अभिव्यक्त करती कविताएँ, सच्चाई उजागर करते संस्मरण और बहुत कुछ"

तो क्या आप संकल्प ले रहे/रहीं  कि आज से तमाम व्यस्तताओं के बीच साहित्य को वक़्त देना सुनिश्चित करेंगे/करेंगी, अगर नहीं कर सकते/सकतीं तो फिर समाज में बदलाव कि बात करना  या लोगों पर दोष मढ़ते रहने की आपकी टेंडेसी केवल खुद को धोखा देने और मन बहलाने वाली बात  भर है, उसमें कोई सच्चाई नहीं |

"याद रखिए जलते हुये जंगल को देखकर अफसोस करने और विडियो बनाने वाले लोगों से से वह चिड़िया बेहतर जो अपनी चोंच में पानी लाकर आग को बुझाने का प्रयास अपनी क्षमता में करती हो|"

 

यदि असहमत हैं तो लिख भेजें, ईमेल नीचे है - 

 

कुछ नहीं तो एक पत्रिका से ही शुरुआत कर लें, भले ही कुछ खर्चें प्रबंधित करने हों|

 

शुभेच्छा 

'कुमार' लवकुश कुमार


आदरणीय महेश चन्द्र पुनेठा सर का आभार ज़ो समय-समय उपाय सुझाते रहते हैं, समाज में पढ़ने लिखने की संस्कृति को आगे बढ़ाने के लिए ताकि हम एक संवेदनशील और साहसी समाज का निर्माण कर सकें|

आपके द्वारा शुरू किया गया "दीवार पत्रिका - एक अभियान " इस दिशा में एक सशक्त कदम है| आपकी पुस्तक "शिक्षा के सवाल, लोकोदय प्रकाशन लखनऊ" न केवल आपके शैक्षिक अनुभवों का संकलन हैं वरन उन दिक्कतों को अभिव्यक्त करता दस्तावेज़ भी है जो शिक्षा को उसके असली उद्देश्य को पाने यथा बच्चों में सृजनशीलता, रचनात्मकता, स्वतंत्र सोच, स्पष्टता और साहस जगाने/निखारने को पामे में बाधा बन रही हैं|

आपका कविता संग्रह "अब पहुंची हो तुम - समय साक्ष्य प्रकाशन, देहरादून" एक संकलन है ऐसी कविताओं का जो न केवल हमे संवेदित करती हैं बल्कि स्पष्टता और साहस भी देती हैं|

आपके द्वारा संपादित, "शैक्षिक दखल" एक बेहतरीन और जरूरी प्रयास है शिक्षा के समग्र पहलूओं को समझने का और उसके अंतिम उद्देश्य को पाने के लिए जरूरी उपाय करने हेतु माहौल तैयार करने का|

"समाज के सवाल शिक्षा के सवालों से भिन्न नहीं हैं|"- महेश चन्द्र पुनेठा


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शुभकामनाएं

 

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ग्यारहवीं ऑनलाइन साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा 17-05-2026

बीते रविवार (17-05-2026) हम सबके सामूहिक प्रयास और वरिष्ठजनों के प्रोत्साहन से ग्यारहवीं साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा का ऑनलाइन आयोजन सफल रहा, जिसमें निम्नलिखित पुस्तकों/रचनाओं/विषयों पर सार्थक चर्चा हुयी:

बूढ़ा आदमी और समुद्र - अर्नेस्ट हेमिंग्वे

सांसो को पढ़ता कवि (केशव तिवारी) - सम्पादन डॉ जीवन सिंह 

गबन - मुंशी प्रेमचंद

इकिगाई - लम्बे और स्वस्थ जीवन का जापानी रहस्य 

अखंड ज्योति पत्रिका - गायत्री पीठ 

त्यागपत्र  - जैनेन्द्र कुमार

सही और जरुरी काम में लगें हैं तो हताशा या निराशा में न फंसे

पुस्तक परिचर्चा का सिलसिला जारी रहे ताकि एक मंच मौजूद रहे, साहित्य प्रेमियों के लिए, पुस्तक प्रेमियों के लिए 

परिचर्चा के दौरान समीक्षा ज्यादा लम्बी न रखी जाए और तीन बिंदुओं पर ही अपनी बात में जरुर शामिल किये जाएँ यथा पुस्तक में क्या है, आपको क्यों पसंद आयी और दूसरों को यह पुस्तक क्यों पढ़नी चाहिए|

डॉ जीवन सिंह एक प्रतिष्ठित आलोचक हैं जिन्होंने कविताओं की आलोचना का पैमाना इनका तेवर, जनवादी और लोकधर्मी स्वरुप रखा

केशव तिवारी जी ने अपनी एक कविता में कहा कि यदि वह अपनी कविता के माध्यम से किसी बेईमान आदमी की आँखों में ना खटके तो कविकर्म का दायित्व अपूर्ण रह जाये

केशव तिवारी जी के काव्य में बुंदेलखंड का लोकजीवन, भूगोल, इतिहास और संघर्ष समाहित है|

क्यों पढ़ी जानी चाहिए, सांसो को पढ़ता कवि (केशव तिवारी) - सम्पादन डॉ जीवन सिंह ? ताकि काव्यशास्त्र की समझ आये, कविता विधा के शर्तों का पता चले जिनके बिना कविता अर्थ नहीं पाती, माने कौन से गुण एक रचना को कविता बनाते हैं, न तो छंदयुक्त और न तो छंदमुक्त, कविता को अर्थ मिलता है सन्दर्भ, अंदाज और कथ्य तथा शिल्प के बीच सम्बन्ध से|

मुक्तिबोध की कविताओं की अंतर्वस्तु तक पहुँचने में मददगार हो सकती हैं ऐसे समालोचनात्मक पुस्तकें

ऐसे भी साहसी विद्यार्थी हैं जो पुस्तक परिचर्चा के महत्व और निरंतरता को समझते हुए परीक्षा वाले दिन से पहले दिन भी परिचर्चा में शामिल होने के लिए व्यवस्थित रहते हैं|

 उक्त परिचर्चा में निम्नलिखित पुस्तकसाथी शामिल रहे:

आदरणीय महेश चन्द्र पुनेठा सर, मुकेश जोशी जी, अंशुल मैम, सौम्या मैम,  उर्मिला जायसवाल, विशाल जायसवाल, अरविंद कुमार, प्रिया शर्मा, प्रिया कश्यप, प्रिया जायसवाल, गायत्री जायसवाल, प्रीति जायसवाल, और लवकुश कुमार|

श्रोताओं को परिचर्चा से जोड़े रखने वाला समन्वय और संचालन सौम्या गुप्ता मैम और लवकुश कुमार ने किया|

पुस्तक परिचर्चा मे शामिल सभी पुस्तक साथियों (Bookmates) ने पुस्तक परिचर्चा मे शामिल होकर/अभिव्यक्ति/सराहना/भागीदारी के माध्यम से इस पहल को पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा देने में, मानवीय मूल्यों के पोषण में, अपनी बात को बेहिचक रखने में महत्वपूर्ण माना एवं एक दूसरे के प्रति आभार व्यक्त किया ताकि इस जरूरी कार्य की नियमितता बनी रहे एवं समाज मे एक सकारात्मक बदलाव में अपना विनम्र योगदान सुनिश्चित किया जा सके |

धन्यवाद ज्ञापन के साथ परिचर्चा को अगली परिचर्चा तक के लिए विराम दिया गया|

इस आशा के साथ कि यह रिपोर्ट पाठकों को पुस्तक परिचर्चा को समझने और उसमे शामिल होने के लिए प्रेरित करेगी |

 

अगली परिचर्चा 24 मई (रविवार रात 09 बजे)  को होगी, शामिल होकर पढ़ने-लिखने की संस्कृति पर काम करने में अपना योगदान सुनिश्चित करें और पुस्तक परिचर्चा से साहित्यिक लाभ लेते हुये अपने दिन की सार्थकता में एक और आयाम जोड़ें|

 

  धन्यवाद 

-लवकुश कुमार

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दसवीं ऑनलाइन साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा 10-05-2026

बीते रविवार (10-05-2026) हम सबके सामूहिक प्रयास और वरिष्ठजनों के प्रोत्साहन से दसवीं साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा का ऑनलाइन आयोजन सफल रहा, जिसमें निम्नलिखित पुस्तकों/रचनाओं/विषयों पर सार्थक चर्चा हुयी:

ब्राह्मण की बेटी – शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय

जीत आपकी- शिव खेड़ा

संबंध और क्या है जीवन- आचार्य प्रशांत

  • पढ़ने का उद्देश्य जीवन के लिए रोटी कमाने तक सीमित न हो, बल्कि इससे आगे बढ़कर एक सार्थक जीवन के लिए खुद को तैयार करना हो|
  •  निर्णय निर्माण के लिए समय देकर, स्वयं की जरूरतों की समीक्षा करें, अपने असल जरूरतों को समझें और जो जरूरतें अभी महसूस हो रही हैं उनकी प्रासंगिकता के बारे मे अच्छे से विचार करें, दूसरों को देखकर अपनी प्राथमिकताएँ न बनाएँ, पहले स्वयं को समझें फिर अपनी जरूरतों को
  • जिस दिन आपको अपनी असली जरूरतों का पता चल जाएगा आपको बाहर से प्रेरणा की जरूरत महसूस न होगी
  • हौसला आता है स्पष्टता से, इसीलिए अध्ययन करें
  • सफलता और असफलता की भावना से ऊपर उठ जो जरूरी है वो करें, पूरा प्रयास और सही कार्य के लिए प्रयास अपने आपमें एक जीत है, सबसे पहला कदम सही काम के चुनाव का|

  • परिस्थितियाँ हमे सिखाती हैं, यदि आप एक उचित और जरूरी कार्य के लिए प्रयासरत हैं तो हार न माने
  • अध्ययन के बाद यदि आपकी समझ मे कुछ बेहतरी न आए तो आपको विचार करना चाहिए कि क्या वाकई पढ़ना सार्थक रहा?
  • खुद को खुलकर ईमानदारी से अभिव्यक्त करें ताकि आपसे इत्तेफाक रखने वाले लोग आपसे जुड़ सकें और आपके कार्यों मे सहयोग कर सकें
  • परिचर्चा को ऐसे संचालित करें जैसे कि हम सब एक कमरे मे बैठे बात कर रहे हों |
  • परिचर्चा में, सक्रिय रहें, पूछे जाने पर प्रतिक्रिया जरूर रखें ताकि परिचर्चा को एक दिशा दी जा सके
  • “जिंदा हैं तो जिंदा नज़र आना जरूरी है”- एक शेर का हिस्सा

  • स्वीडन यदि पूरी तरह डिजिटल हो चुकी शिक्षा व्यवस्था को फिर से किताबों पर ला रहा तो क्या इतना काफी नहीं है हमारे लिए किताबों और पुस्तकालय के महत्व को समझने के लिए!
  • साहित्य को प्रोत्साहित करके हम इसी दुनिया को जिसमें हम रहते हैं, एक बेहतर दुनिया बना सकते हैं जहां लोगों में प्रेम हो, संवेदनशीलता और हो आपसी सम्मान
  • फोन देखते देखते सो जाने से बेहतर है एक किताब पढ़ते पढ़ते सो जाना, असर आपको अगले दिन ही दिख जाएगा, साहित्य का चुनाव ढंग का हो|
  • पुस्तकें हमारी भाषा शैली को बेहतर करती हैं, हम लोगों को बेहतर समझ पाते हैं और उनसे तालमेल बिठाना आसान हो जाता है|
  • आप किसी भी विधा के विद्यार्थी हों, हर महीने 2-3 पुस्तकें पढ़ने का उद्देश्य रखना आपको कई मामलो मे बेहतर कर सकता है, जीवन के संघर्षों के लिए आपको तैयार कर सकता है और साथ मे मिल सकती है आंतरिक शांति और स्थिरता|
  • यदि आपमें बातचीत से लोगों के साथ जुड़ाव बनाने की चाहत है तो नियमित पुस्तकें पढ़ना न केवल आपको बेहतर शब्द दे सकता है साथ ही कार्यालय और व्यक्तिगत जीवन मे लोगों के साथ समन्वय बनाते हुये, खुद को अभिव्यक्त करते और दूसरों को समझते हुये आगे बढ़ने मे मदद कर सकता है|
  • पुस्तकें आपकी विश्लेषण क्षमता और कल्पनाशीलता को बढ़ाती हैं जबकि विडियो मे काफी कुछ समझा देने और विजुअल जोड़ देने से हमारे दिमाग़ को जानकारी प्रोसैस करने की जरूरत कम पड़ती है और नतीजा कि हमारी  विश्लेषण क्षमता और कल्पनाशीलता का उपयोग न होने से इनमे बेहतरी कि गुंजाइश घट जाती है और इस तरह कुछ सृजन करने की संभावना भी| इसीलिए पुस्तकों का साथ बनाएँ रखें|
  • हमे विश्वास है कि जब लोग पढ़ना शुरू करेंगे तो समाज बेहतरी की ओर अग्रसर होगा, वही समाज जिससे प्रभावित हुये बिना हम नहीं रह सकते
  • कुछ लोगों मे इतनी स्पष्टता है कि वह सही नियत से एक काम में लगे हैं तो निरंतर अपने प्रयास को बढ़ ही रहे हैं बिना इस बात की परवाह के कि अभी वर्तमान मे उनका प्रयास कितना कारगर है क्योंकि सही नियत से किया गया काम बिलकुल उसी तरह है जैसे एक बीज को माहौल, खाद और पानी देकर पौधे से पेड़ और फिर फलदार पेड़ बनने तक उसके लिए लगे रहना|
  • कभी न भूलें कि आज जिन भी चीजों और मूल्यों का लाभ हम ले रहे हैं वह कहीं न कहीं हमारे पूर्वजों द्वार बहुत त्याग और संघर्ष से अर्जित किया हुआ है, चाहे वह आजादी हो या लोकतंत्र, इसीलिए हमे भी अपने बुढ़ापे और आने वाली पीढ़ी को सही और सुरक्षित हवा, जल और माहौल मिल सके, इसके लिए काम करना होगा, इसमें भी हमारे अकेले से काम न चलेगा, हम अगर एक एक पौधा लगा रहे हैं तो हमें ये देखना होगा कि कोई एक साथ हजारों और लाखों पौधे क्यों उजाड़ रहा? उसकी समझ पर काम करना होगा|
  • प्रयास करें कि रोज कम से कम एक पेज ही पढ़ लो एक पुस्तक से 
  • जब मातापिता और घर के बड़े स्वयं ही पुस्तक लेकर पढेंगे तो उन्हें देख घर के बच्चे भी पुस्तकों के तरफ आकर्षित होंगे, और ये आकर्षण जुड़ाव में बदल पाए इसके लिए जरुरी है कि घर में उम्दा, रोचक बाल साहित्य के रूप में रंगबिरंगी किताबें मौजूद हों|
  • इसे परिचर्चा में शामिल होना भी एक तरीका है अपने जीवन अपने दिन को सार्थक करने का |
  • जीवन सम्बन्ध है। व्यक्ति का व्यक्ति से सम्बन्ध, प्रकृति से सम्बन्ध, समाज से सम्बन्ध।

  • इन सम्बन्धों का आधार क्या है?

  • क्या है हमारे सम्बन्धों की वास्तविकता ?

  • क्या हमारे सम्बन्ध डर, लालच, मोह, आसक्ति की छाया मात्र हैं, या ये प्रेम की अभिव्यक्ति हैं? 

  • क्या हमारे सम्बन्ध अकेलेपन से बचने के उपाय हैं, या आन्तरिक पूर्णता का प्रस्फुटन ? 

  • और क्या है, सच्चा प्रेम? 

उक्त परिचर्चा में निम्नलिखित पुस्तकसाथी शामिल रहे:

अंशिका शर्मा मैम, हिमांशु जोशी जी, उर्मिला जायसवाल, विशाल जायसवाल, अंजना वर्मा, आरती मैम, अरविंद कुमार, धर्मेंद्र शर्मा सर, शोभित, प्रिया शर्मा, लक्ष्मण जोशी, प्रिया जायसवाल, गायत्री जायसवाल, विजय कुमार, प्रिय कश्यप और कर्ण भाईजी|

कुशल और श्रोताओं को परिचर्चा से जोड़े रखने वाला समन्वय और संचालन कर्ण भाईजी ने किया|

पुस्तक परिचर्चा मे शामिल सभी पुस्तक साथियों (Bookmates) ने पुस्तक परिचर्चा मे शामिल होकर/अभिव्यक्ति/सराहना/भागीदारी के माध्यम से इस पहल को पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा देने में, मानवीय मूल्यों के पोषण में, अपनी बात को बेहिचक रखने में महत्वपूर्ण माना एवं एक दूसरे के प्रति आभार व्यक्त किया ताकि इस जरूरी कार्य की नियमितता बनी रहे एवं समाज मे एक सकारात्मक बदलाव में अपना विनम्र योगदान सुनिश्चित किया जा सके |

धन्यवाद ज्ञापन के साथ परिचर्चा को अगली परिचर्चा तक के लिए विराम दिया गया|

इस आशा के साथ कि यह रिपोर्ट पाठकों को पुस्तक परिचर्चा को समझने और उसमे शामिल होने के लिए प्रेरित करेगी |

 

अगली परिचर्चा 17 मई (रविवार रात 09 बजे)  को होगी, शामिल होकर पढ़ने-लिखने की संस्कृति पर काम करने में अपना योगदान सुनिश्चित करें और पुस्तक परिचर्चा से साहित्यिक लाभ लेते हुये अपने दिन की सार्थकता में एक और आयाम जोड़ें|

 

  धन्यवाद 

-लवकुश कुमार

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अनारको के आठ दिन: पुस्तक परिचय सह समीक्षा - अंकित मिश्रा

पुस्तक का नाम – अनारको के आठ दिन

लेखक - सत्यु

"अनारको का बहुत बहुत मन था कि पापा से कहे. पापा एक सवाल और पूछूं? और फिर पूछे कि आप जब भी कोई चीज जानते नहीं तो यह क्यों कह देते हैं कि उल्टा सवाल मत कर|"

 

प्रस्तुत पुस्तक में इसी प्रकार से बच्चों के सवालों, उनकी जिज्ञासाओं के उठने, अपने आसपास के माहौल को देखने, चल रही प्रक्रियाओं के कारण को समझने से जुड़े अनुभवों और बच्चों के इन व्यवहारों पर माता-पिता, विद्यालय और समाज की प्रतिक्रियाओं को बड़े ही सुन्दर तरीके व्यक्त किया गया है।

 

इस पूरे कथानक की नायिका अनारको है जो हर बात को जानने को जिज्ञासु है। लेखक ने कथानक को कुछ इस तरह बुना है कि अधिकतर बातें अनारको के सपनों में पूरी हो जाती हैं जो अलग-अलग दिनों में घटित होते हैं।

 

पहले दिन में उससे कहा जाता है कि लोटे में पानी लेकर ठाकुर जी को चढ़ा आओ तो वह सवाल करती है कि ठाकुर जी को पानी चढ़ाना या उन्हें खुश करना क्यों जरुरी है? फिर दादी के बताने पर कि ठाकुर जी तो पेड़ पौधे, कंकर पत्थर में हर जगह हैं, वह तर्क रखती है तो क्या मैं ये पानी बाहर भिंडी के पौधे में डाल दूँ।

 

दूसरे दिन में स्कूल की प्रक्रियाओं पर मछलियों की एक सभा द्वारा सवाल उठाये गए हैं जो बच्चों को मशीनीकृत वातावरण या अनुशासन के नाम पर दंडात्मक विधानों, कई तरह की बंदिशें लगाये जाने की ओर उन्मुख करते हैं। कई विद्यालयों में भी ऐसी बातें दिख जाती हैं नहीं अनुशासन के नाम पर बच्चों को बोलने की आजादी नहीं दी जाती। सवाल पूछने वाले बच्चों को अक्सर डांट मिल जाती है या उनके सवालों को टाल दिया जाता है। ऐसे ही एक विद्यालय में बच्चों से बातचीत के दौरान उनका बोलना ऐसे हो रहा था जैसे वे किसी खेल में बोल रहे हों और उनकी बात दूसरा सुन नहीं सके। "जबकि मध्यावकाश में उनकी आवाज में जबरदस्त तेजी देखने को मिली|

बच्चे हां या ना बोलने में सकुचा रहे थे। पूरी कक्षा एक दम शांत-शांत थी।"

 

तीसरे दिन में सामाजिक ताने-बाने और "पर उपदेश कुशल बहुतेरे" की समस्या दिखाई गई है जिसमें पितृसत्तात्मक परिवारों में जेंडर आधारित भेदभाव पर तंज कसा गया है। अनारको घर से भाग रही है तो गोलू के पापा उसे कहते हैं कि अपनी मौसी को भेज देना, नल आ रहा है, पानी भर ले आकर, जबकि वे खुद नल के पास में ही लेटे हुए हैं, लेकिन पानी भरना या घर से जुड़े काम तो केवल महिलाएं ही करेंगी, वे उठकर पानी नहीं भर सकते।

हमारे समाज में जेंडर आधारित भेदभाव एक बड़ी समस्या है, जिसमें समाज ने लिंग के आधार पर कामों का बंटवारा कर दिया है। कामाने घर से बाहर सिर्फ पुरुष ही जाएंगे और घर के कामों को महिलाएं ही करेंगी, ऐसी सोच और व्यवस्था हमारी सामाजिक और आर्थिक उन्नति के लिए बाधक है। साथ ही ऐसे लोगों की भी कमी नहीं जो खुद भले ही गलत व्यवहार करें लेकिन दूसरों को उपदेश देने में कोई कसर नहीं छोड़ते

 

चौथे दिन के सपने के माध्यम से विभिन्न सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक मुद्दों पर बात की गयी है। हमारे समाज में अमीर-गरीब और ऊँच-नीच की जो खाई है वह समाज के लिए घातक है, इस पर बात की गयी है|

लेखक के ही शब्दों में अनारको ने देखा "जो ज्यादा अच्छे कपड़े पहने था वह ज्यादा बदमाशी कर रहा था।"

 

अनारको ने बहुत से लोगों ऐसे देखे थे। ऐसे- सब उन जैसे लगते थे जो गर्मी की दोपहर में कहीं से आकर घर के बाहर बैठे रहते थे और जब अनारको उनको पीने के लिए गिलास भरकर पानी देने जाती तो हमेशा मुँह के पास हाथ ले जाकर कहते 'डाल दो गुड़िया' कभी गिलास को हाथ में नहीं लेते

 

पांचवें दिन में शिक्षा के उद्देश्य और आकलन को बेहतर तरीके से समझाया गया है। मम्मी के ये कहने पर कि पास होकर अच्छी नौकरी की जा सकती है तो अनारको कहती है कि ये काम तो मैं फेल होकर भी कर सकती हूँ। और यह कौन तय करता है कि कौन पास होगा और कौन फेल और यह तय करना जरुरी क्यों है? साथ ही आकलन के लिए अपनाई जाने वाली प्रक्रियाएं क्या समझने में ठीक तरह से मदद कर पाती हैं कि किसने क्या सीखा?

 

छठवें दिन में भूतों को लेकर समाज में व्याप्त अंधविश्वासों और बच्चों पर इनके प्रभाव को दर्शाया गया है। पहाड़ी सन्दर्भ में तो यह समस्या और बड़ी है। यहाँ तो बच्चे ढेरों ऐसी कहानियाँ जानते हैं जो भूतों के बारे में हैं। अमूमन इस अवधारणा की शुरुआत बाल्यकाल में ही हो जाती है। पालन पोषण के दौरान बच्चों को अलग-अलग तरीके से भय दिखाया जाना हमारी परम्पराओं में शामिल रहा है। जैसे शाम हो गयी, बाहर न जाना, नहीं तो भूत पकड़ ले जायेगा| इन बातों का बच्चों पर बहुत प्रभाव पड़ता है।

 

सातवें दिन में भी बहुत ही संवेदनशील बात को उकेरा गया है। बच्चों को अक्सर प्रदर्शन की वस्तु मान लिया जाता है। जैसे घर में कोई मेहमान आया तो बच्चों से कहा जाता है कि पोयम सुनाओ, डांस करो आदि। इस दिन प्रधानमंत्री आने वाले हैं तो सब लगे हैं उनकी आवभगत के लिए। घंटों के लिए सड़कों पर रास्ते बंद कर दिए जाते हैं और लोगों को कितनी परेशानी झेलनी पड़ती है।

 

आठवें दिन में किसी नई वस्तु के बारे में बच्चों की जिज्ञासा किस कदर बढ़ जाती है, वे वस्तु विशेष के बारे में जानने के लिए कई तरह के यत्न करते हैं। यह बात पुस्तकों के बारे में बहुत अच्छे से लागू होती है। कोई पुस्तक जब बच्चे को अच्छी लग जाए तो वह उसे पढ़े बिना नहीं रहेगा। लेकिन इसके लिए जरुरी है बच्चों को किताबों में रूचि पैदा की जा सके।

 

अनारको के आठ दिन पुस्तक बच्चों के व्यवहार, उनके कल्पना संसार, उनकी जिज्ञासाओं तथा हमारे कौन से व्यवहार बच्चों को पसंद नहीं आते, यह समझने के लिए बहुत ही उपयुक्त है।

-अंकित 

 

अंकित  मिश्रा जी हिन्दी विषय के विद्यार्थी हैं| उनका काम कक्षा- कक्ष में ऐसे हिन्दी शिक्षण को लेकर उन्मुख है जिसमें भाषाई कौशलों की सर्वोत्तम स्थिति बच्चों को हासिल कराई जा सके| उन्हें सम- सामयिक विषयों पर कविताएँ लिखना भी पसंद है|


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अनारको के आठ दिन - सत्यु (बाल साहित्य) : पुस्तक सामग्री से कुछ टिप्पणियां

मुख्य पात्र - अनारको

पुस्तक में बच्चों के सवालों और व्यवहारों को किस प्रकार से प्रस्तुत किया गया है?

पुस्तक में बच्चों की जिज्ञासाओं, उनके आसपास की दुनिया को समझने की कोशिशों, और माता-पिता, विद्यालय और समाज की प्रतिक्रियाओं को सुंदर तरीके से व्यक्त किया गया है। बच्चों के अनुभवों और उनके व्यवहारों को समझने में मदद मिलती है।

पुस्तक में जेंडर आधारित भेदभाव को किस प्रकार दर्शाया गया है?

पुस्तक में जेंडर आधारित भेदभाव को दर्शाने के लिए, अनारको के परिवार की घटनाओं और बातचीत का उपयोग किया गया है। इसमें दिखाया गया है कि कैसे घर के कामों को महिलाओं के लिए निर्धारित किया जाता है, जबकि पुरुष इससे दूर रहते हैं। यह समाज में मौजूद लैंगिक असमानता को उजागर करता है।

बच्चों पर अंधविश्वासों का क्या प्रभाव पड़ता है?

अंधविश्वास बच्चों के मन में डर और अनिश्चितता पैदा करते हैं। वे उन्हें दुनिया को एक डरावनी जगह के रूप में देखने के लिए प्रेरित कर सकते हैं, जहाँ हर चीज का जवाब नहीं है। इससे बच्चों में आत्मविश्वास की कमी और दूसरों पर निर्भरता की भावना भी आ सकती है। अंधविश्वास बच्चों को गलत जानकारी पर विश्वास करने और तर्कसंगत सोच से दूर रहने के लिए भी प्रोत्साहित कर सकते हैं।

बच्चों को शिक्षा में कैसे रुचि पैदा की जा सकती है?

बच्चों को शिक्षा में रुचि पैदा करने के लिए कई तरीके हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि शिक्षा को बच्चों के लिए मजेदार और मनोरंजक बनाया जाए। इसके लिए, शिक्षकों को बच्चों की रुचियों और जरूरतों को ध्यान में रखना चाहिए। उन्हें खेल, कहानियों, और अन्य रचनात्मक गतिविधियों का उपयोग करना चाहिए।

इसके अतिरिक्त, माता-पिता को भी बच्चों को शिक्षा के प्रति प्रोत्साहित करना चाहिए। उन्हें बच्चों को पढ़ने और सीखने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए, और उनके सवालों का जवाब देना चाहिए। माता-पिता को बच्चों के स्कूल के काम में भी रुचि लेनी चाहिए और उनकी सफलता में मदद करनी चाहिए।

बच्चों को प्रदर्शन की वस्तु मानने से क्या नकारात्मक प्रभाव पड़ते हैं?

बच्चों को प्रदर्शन की वस्तु मानना उनके आत्म-सम्मान और विकास के लिए हानिकारक हो सकता है। इससे उन्हें ऐसा महसूस हो सकता है कि उन्हें प्यार और स्वीकृति पाने के लिए प्रदर्शन करना होगा। इससे उनमें आत्मविश्वास की कमी, सामाजिक चिंता और दूसरों को खुश करने की निरंतर आवश्यकता भी पैदा हो सकती है।

इसके अतिरिक्त, बच्चों को प्रदर्शन की वस्तु मानने से उनकी रचनात्मकता और जिज्ञासा भी कम हो सकती है। वे डर सकते हैं कि अगर वे गलतियाँ करते हैं तो उन्हें डांटा जाएगा, इसलिए वे नए विचारों और अनुभवों से डरेंगे।


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अंतस - जरा ठहरिए (लवकुश कुमार) - पुस्तक परिचय सह समीक्षा - शीतल

"अंतस - जरा ठहरिए"

लेखक - लवकुश कुमार

प्रकाशक  - नोशन (Notion) प्रेस चेन्नई 

"अंतस - जरा ठहरिए" लवकुश कुमार जी द्वारा लिखी गई पहली साहित्यिक पुस्तक है,जो हॉल ही में प्रकाशित हुई है।

यह सरल शब्दों में जीवन मूल्यों की तरफ़ पाठक का ध्यान खींचती है। जो बहुत ही संवेदनशील तरीके से लिखी गई है।

जो किसी क्षेत्र या किसी एक विषय के बारे में भले ही आपको पूर्ण ज्ञान न दे सकें। लेकिन आम जीवन में छोटी छोटी चीजों का क्या महत्व है, उस ओर आपको जरा देर खींचकर रोक देती है।

बहुत सामान्य से विषय है,जहां सूक्ष्म चीजों को लेकर उन्होंने अपना लेखन किया है। एक तरह से यह पुस्तक मन में उठते तूफान को शांत कर देती है, खुद के लिए अपराधबोध, समाज के लिए ईर्ष्या,खुद के ही आगे बढ़ने की लालसा को ठहर कर सोचने को कहती है। उनका मुख्य चिंतन समाज के लिए है जो यह कहते हैं कि अपनी एक जिम्मेदारी समाज के लिए भी रखो।अपनी जिंदगी में इतने परेशान रहने की जरूरत नहीं है, किसी जरूरत मंद इंसान की मदद करो वह किसी भी तरह से की जा सकती है। दूसरों की मदद करने से बड़ा कोई सुख नहीं है।

"क्यों पढ़नी चाहिए"

आज जब जिंदगी बहुत तेजी से भाग रही है, आए दिन तरह-तरह की घटनाएं हमें सुनाई देती है, जब मानव सभ्यता को एक अलग दिशा में प्रवाहित किया जा रहा है।मनुष्य के लालच और भोग विलास को ही जीवन का उद्देश्य मान लिया गया है, ऐसे में लवकुश जी बहुत से उदाहरण देकर जीवन का उद्देश्य समझाते है

जब मनुष्य, मनुष्य होने के नाते कुछ न कर पाने के अपराधबोध से खुद को दबाएं हुए है, ऐसे में आज के वातावरण का सूक्ष्म अवलोकन के लिए मानो कोई जगह ही नहीं रह गई है और परिणामतः हम कोई कार्य इसलिए नहीं कर रहे कि उससे हमें आनंद की प्राप्ति हो।

जीवन के मूलभूत पहलुओं में यह किताब एक मनुष्य को स्पष्टता देती है कि अभी कुछ भी नहीं छूटा, एक तसल्ली देती है कि अभी कुछ भी नहीं बिगड़ा,अगर किसी कारण से पढ़ाई छूट गई या कुछ परिस्थिति बदल गई तो उसका विकल्प फिर से शुरू करना है न कि आत्मघाती कदम उठा लेना| 

जीवन की बारीकियों को समझाती हुई यह पुस्तक जीवन की खूबसूरती से पाठक का परिचय कराती है। वह स्पष्ट रूप से कहते हैं कि यह पुस्तक उनके द्वारा दुनिया और स्वयं को देखे और समझे जाने का प्रतिफल है।

यह पुस्तक पाठक के दिमाग में बहुत प्रभाव डालती है। मुझे स्वयं इसे पढ़ते हुए लग रहा था कि हां मुझे भी जरूरत थी इस तरह की पुस्तक की, जो आपको प्रेरित करें, लिखने को ,पढ़ने को अपने विचार खुल कर रखने को,अपनी असहमति दर्ज करने को और सामने वाले की बातों का सम्मान करने के लिए

"पुस्तक एक स्पष्ट दस्तावेज है जो जीवन की उधेड़बुन से आपको न सिर्फ निकालेगी बल्कि हौसला और साहस देगी।"

  • किताब में हर एक अध्याय के शुरू होने से पहले लिखे गए महान व्यक्तियों के वाक्य बहुत ही प्रेरणा देते हैं, यह दिमाग के लिए किसी औषधी की तरह काम कर रहे हैं। इस तरह यह समृद्धता से हमारा परिचय कराते हैं।
  • वह काम को सम्मान देने की बात करते है न कि किसी की हां में हां मिलाने वाले इंसान को।
  • अंत में उनके द्वारा बहुत जरूरी फिल्मों, साहित्य, कविताओं की सूची दी गई है, जो काफी उपयोगी हैं। महेश पुनेठा जी की कविताएं ,आशुतोष जी की कविताएं भी शामिल हैं, जो इस माध्यम से ज्यादा लोगों तक पहुंच पाएंगी, जो आज के समय की जरूरत है।
  • इस तरफ भी ध्यान खींचा गया कि आज मानव जहां खुद के स्वार्थों से घिर चुका है,अपने आप की समस्याओं में उलझ चुका है, उसे किन्ही बातों से तब तक मतलब नहीं रहता जब तक वह उसके ऊपर न बीती हो, इस दृष्टि से  यह पुस्तक संवेदनशीलता को जीवन का जरूरी गुण मानते हुये पाठकों का ध्यान इसके महत्त्व की तरफ खींचती है।
  • पुस्तक में कहीं कुछ वर्तनी संबंधी गलतियां है, लेकिन यह पाठक के पढ़ने की लय नहीं तोड़ती। 
  • बाकी यह पुस्तक हमारे युवाओं के लिए एक मार्गदर्शक का काम करेगी ,जीवन की राहों में अच्छा करने, समाज के लिए अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन करने को प्रेरित करेगी, किसी से कुढ़ने की बजाय काम की प्रशंसा से मिली ऊर्जा को महत्व देगी।
  • लेखक का यह सोचना कि आप जो देखते हैं सोचते हैं उसे लिखना चाहिए,  बहुत सार्थक निर्णय है। लेखक का समाज के लिए कुछ करने का उत्साह उनके लेखन में झलकता है, जो इसे एक जीवंत दस्तावेज बना देता है।

"आसान और स्पष्ट भाषा में लिखी यह पुस्तक भटके राही के लिए पथ-प्रदर्शक, हताश व्यक्ति के लिए उम्मीद बनकर उभरती है।"

 

शीतल 


शीतल जी, उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के एक दूरस्थ पहाड़ी गांव भट्टयूडा से आती हैं। आपने अपना परास्नातक, भूगोल विषय में लक्ष्मण सिंह मेहर कैंपस पिथौरागढ़ से किया है। आप सामाजिक खांचों में फिट नहीं होना चाहती, इसे इस परिप्रेक्ष्य मे देखें कि आप हर वह रिवाज नकारना चाहती हैं जो आपको एक लड़की होने का हवाला देकर कम आंकते हो।

किताबें संवेदनशील ,सामाजिक ,निर्भय और वैज्ञानिक चेतना देती हैं, अतः किताबें पढ़ना, नया जानते रहकर अपनी समझ को विस्तार देते रहना आपकी आदत मे शुमार है। आपको फिल्में देखना पसंद है, और घूमना भी। भूगोल आपको अपनी ओर खींचती है साथ ही  नए और रचनात्मक लोगों के साथ बात करने और उनके बारे में जानने को उत्सुक रहती हैं |


उक्त पुस्तक निम्नलिखित लिंक से क्रय की जा सकती है :- https://notionpress.com/in/read/antas

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