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दसवीं ऑनलाइन साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा 10-05-2026

बीते रविवार (10-05-2026) हम सबके सामूहिक प्रयास और वरिष्ठजनों के प्रोत्साहन से दसवीं साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा का ऑनलाइन आयोजन सफल रहा, जिसमें निम्नलिखित पुस्तकों/रचनाओं/विषयों पर सार्थक चर्चा हुयी:

ब्राह्मण की बेटी – शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय

जीत आपकी- शिव खेड़ा

संबंध और क्या है जीवन- आचार्य प्रशांत

  • पढ़ने का उद्देश्य जीवन के लिए रोटी कमाने तक सीमित न हो, बल्कि इससे आगे बढ़कर एक सार्थक जीवन के लिए खुद को तैयार करना हो|
  •  निर्णय निर्माण के लिए समय देकर, स्वयं की जरूरतों की समीक्षा करें, अपने असल जरूरतों को समझें और जो जरूरतें अभी महसूस हो रही हैं उनकी प्रासंगिकता के बारे मे अच्छे से विचार करें, दूसरों को देखकर अपनी प्राथमिकताएँ न बनाएँ, पहले स्वयं को समझें फिर अपनी जरूरतों को
  • जिस दिन आपको अपनी असली जरूरतों का पता चल जाएगा आपको बाहर से प्रेरणा की जरूरत महसूस न होगी
  • हौसला आता है स्पष्टता से, इसीलिए अध्ययन करें
  • सफलता और असफलता की भावना से ऊपर उठ जो जरूरी है वो करें, पूरा प्रयास और सही कार्य के लिए प्रयास अपने आपमें एक जीत है, सबसे पहला कदम सही काम के चुनाव का|

  • परिस्थितियाँ हमे सिखाती हैं, यदि आप एक उचित और जरूरी कार्य के लिए प्रयासरत हैं तो हार न माने
  • अध्ययन के बाद यदि आपकी समझ मे कुछ बेहतरी न आए तो आपको विचार करना चाहिए कि क्या वाकई पढ़ना सार्थक रहा?
  • खुद को खुलकर ईमानदारी से अभिव्यक्त करें ताकि आपसे इत्तेफाक रखने वाले लोग आपसे जुड़ सकें और आपके कार्यों मे सहयोग कर सकें
  • परिचर्चा को ऐसे संचालित करें जैसे कि हम सब एक कमरे मे बैठे बात कर रहे हों |
  • परिचर्चा में, सक्रिय रहें, पूछे जाने पर प्रतिक्रिया जरूर रखें ताकि परिचर्चा को एक दिशा दी जा सके
  • “जिंदा हैं तो जिंदा नज़र आना जरूरी है”- एक शेर का हिस्सा

  • स्वीडन यदि पूरी तरह डिजिटल हो चुकी शिक्षा व्यवस्था को फिर से किताबों पर ला रहा तो क्या इतना काफी नहीं है हमारे लिए किताबों और पुस्तकालय के महत्व को समझने के लिए!
  • साहित्य को प्रोत्साहित करके हम इसी दुनिया को जिसमें हम रहते हैं, एक बेहतर दुनिया बना सकते हैं जहां लोगों में प्रेम हो, संवेदनशीलता और हो आपसी सम्मान
  • फोन देखते देखते सो जाने से बेहतर है एक किताब पढ़ते पढ़ते सो जाना, असर आपको अगले दिन ही दिख जाएगा, साहित्य का चुनाव ढंग का हो|
  • पुस्तकें हमारी भाषा शैली को बेहतर करती हैं, हम लोगों को बेहतर समझ पाते हैं और उनसे तालमेल बिठाना आसान हो जाता है|
  • आप किसी भी विधा के विद्यार्थी हों, हर महीने 2-3 पुस्तकें पढ़ने का उद्देश्य रखना आपको कई मामलो मे बेहतर कर सकता है, जीवन के संघर्षों के लिए आपको तैयार कर सकता है और साथ मे मिल सकती है आंतरिक शांति और स्थिरता|
  • यदि आपमें बातचीत से लोगों के साथ जुड़ाव बनाने की चाहत है तो नियमित पुस्तकें पढ़ना न केवल आपको बेहतर शब्द दे सकता है साथ ही कार्यालय और व्यक्तिगत जीवन मे लोगों के साथ समन्वय बनाते हुये, खुद को अभिव्यक्त करते और दूसरों को समझते हुये आगे बढ़ने मे मदद कर सकता है|
  • पुस्तकें आपकी विश्लेषण क्षमता और कल्पनाशीलता को बढ़ाती हैं जबकि विडियो मे काफी कुछ समझा देने और विजुअल जोड़ देने से हमारे दिमाग़ को जानकारी प्रोसैस करने की जरूरत कम पड़ती है और नतीजा कि हमारी  विश्लेषण क्षमता और कल्पनाशीलता का उपयोग न होने से इनमे बेहतरी कि गुंजाइश घट जाती है और इस तरह कुछ सृजन करने की संभावना भी| इसीलिए पुस्तकों का साथ बनाएँ रखें|
  • हमे विश्वास है कि जब लोग पढ़ना शुरू करेंगे तो समाज बेहतरी की ओर अग्रसर होगा, वही समाज जिससे प्रभावित हुये बिना हम नहीं रह सकते
  • कुछ लोगों मे इतनी स्पष्टता है कि वह सही नियत से एक काम में लगे हैं तो निरंतर अपने प्रयास को बढ़ ही रहे हैं बिना इस बात की परवाह के कि अभी वर्तमान मे उनका प्रयास कितना कारगर है क्योंकि सही नियत से किया गया काम बिलकुल उसी तरह है जैसे एक बीज को माहौल, खाद और पानी देकर पौधे से पेड़ और फिर फलदार पेड़ बनने तक उसके लिए लगे रहना|
  • कभी न भूलें कि आज जिन भी चीजों और मूल्यों का लाभ हम ले रहे हैं वह कहीं न कहीं हमारे पूर्वजों द्वार बहुत त्याग और संघर्ष से अर्जित किया हुआ है, चाहे वह आजादी हो या लोकतंत्र, इसीलिए हमे भी अपने बुढ़ापे और आने वाली पीढ़ी को सही और सुरक्षित हवा, जल और माहौल मिल सके, इसके लिए काम करना होगा, इसमें भी हमारे अकेले से काम न चलेगा, हम अगर एक एक पौधा लगा रहे हैं तो हमें ये देखना होगा कि कोई एक साथ हजारों और लाखों पौधे क्यों उजाड़ रहा? उसकी समझ पर काम करना होगा|
  • प्रयास करें कि रोज कम से कम एक पेज ही पढ़ लो एक पुस्तक से 
  • जब मातापिता और घर के बड़े स्वयं ही पुस्तक लेकर पढेंगे तो उन्हें देख घर के बच्चे भी पुस्तकों के तरफ आकर्षित होंगे, और ये आकर्षण जुड़ाव में बदल पाए इसके लिए जरुरी है कि घर में उम्दा, रोचक बाल साहित्य के रूप में रंगबिरंगी किताबें मौजूद हों|
  • इसे परिचर्चा में शामिल होना भी एक तरीका है अपने जीवन अपने दिन को सार्थक करने का |
  • जीवन सम्बन्ध है। व्यक्ति का व्यक्ति से सम्बन्ध, प्रकृति से सम्बन्ध, समाज से सम्बन्ध।

  • इन सम्बन्धों का आधार क्या है?

  • क्या है हमारे सम्बन्धों की वास्तविकता ?

  • क्या हमारे सम्बन्ध डर, लालच, मोह, आसक्ति की छाया मात्र हैं, या ये प्रेम की अभिव्यक्ति हैं? 

  • क्या हमारे सम्बन्ध अकेलेपन से बचने के उपाय हैं, या आन्तरिक पूर्णता का प्रस्फुटन ? 

  • और क्या है, सच्चा प्रेम? 

उक्त परिचर्चा में निम्नलिखित पुस्तकसाथी शामिल रहे:

अंशिका शर्मा मैम, हिमांशु जोशी जी, उर्मिला जायसवाल, विशाल जायसवाल, अंजना वर्मा, आरती मैम, अरविंद कुमार, धर्मेंद्र शर्मा सर, शोभित, प्रिया शर्मा, लक्ष्मण जोशी, प्रिया जायसवाल, गायत्री जायसवाल, विजय कुमार, प्रिय कश्यप और कर्ण भाईजी|

कुशल और श्रोताओं को परिचर्चा से जोड़े रखने वाला समन्वय और संचालन कर्ण भाईजी ने किया|

पुस्तक परिचर्चा मे शामिल सभी पुस्तक साथियों (Bookmates) ने पुस्तक परिचर्चा मे शामिल होकर/अभिव्यक्ति/सराहना/भागीदारी के माध्यम से इस पहल को पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा देने में, मानवीय मूल्यों के पोषण में, अपनी बात को बेहिचक रखने में महत्वपूर्ण माना एवं एक दूसरे के प्रति आभार व्यक्त किया ताकि इस जरूरी कार्य की नियमितता बनी रहे एवं समाज मे एक सकारात्मक बदलाव में अपना विनम्र योगदान सुनिश्चित किया जा सके |

धन्यवाद ज्ञापन के साथ परिचर्चा को अगली परिचर्चा तक के लिए विराम दिया गया|

इस आशा के साथ कि यह रिपोर्ट पाठकों को पुस्तक परिचर्चा को समझने और उसमे शामिल होने के लिए प्रेरित करेगी |

 

अगली परिचर्चा 17 मई (रविवार रात 09 बजे)  को होगी, शामिल होकर पढ़ने-लिखने की संस्कृति पर काम करने में अपना योगदान सुनिश्चित करें और पुस्तक परिचर्चा से साहित्यिक लाभ लेते हुये अपने दिन की सार्थकता में एक और आयाम जोड़ें|

 

  धन्यवाद 

-लवकुश कुमार

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अनारको के आठ दिन: पुस्तक परिचय सह समीक्षा - अंकित मिश्रा

पुस्तक का नाम – अनारको के आठ दिन

लेखक - सत्यु

"अनारको का बहुत बहुत मन था कि पापा से कहे. पापा एक सवाल और पूछूं? और फिर पूछे कि आप जब भी कोई चीज जानते नहीं तो यह क्यों कह देते हैं कि उल्टा सवाल मत कर|"

 

प्रस्तुत पुस्तक में इसी प्रकार से बच्चों के सवालों, उनकी जिज्ञासाओं के उठने, अपने आसपास के माहौल को देखने, चल रही प्रक्रियाओं के कारण को समझने से जुड़े अनुभवों और बच्चों के इन व्यवहारों पर माता-पिता, विद्यालय और समाज की प्रतिक्रियाओं को बड़े ही सुन्दर तरीके व्यक्त किया गया है।

 

इस पूरे कथानक की नायिका अनारको है जो हर बात को जानने को जिज्ञासु है। लेखक ने कथानक को कुछ इस तरह बुना है कि अधिकतर बातें अनारको के सपनों में पूरी हो जाती हैं जो अलग-अलग दिनों में घटित होते हैं।

 

पहले दिन में उससे कहा जाता है कि लोटे में पानी लेकर ठाकुर जी को चढ़ा आओ तो वह सवाल करती है कि ठाकुर जी को पानी चढ़ाना या उन्हें खुश करना क्यों जरुरी है? फिर दादी के बताने पर कि ठाकुर जी तो पेड़ पौधे, कंकर पत्थर में हर जगह हैं, वह तर्क रखती है तो क्या मैं ये पानी बाहर भिंडी के पौधे में डाल दूँ।

 

दूसरे दिन में स्कूल की प्रक्रियाओं पर मछलियों की एक सभा द्वारा सवाल उठाये गए हैं जो बच्चों को मशीनीकृत वातावरण या अनुशासन के नाम पर दंडात्मक विधानों, कई तरह की बंदिशें लगाये जाने की ओर उन्मुख करते हैं। कई विद्यालयों में भी ऐसी बातें दिख जाती हैं नहीं अनुशासन के नाम पर बच्चों को बोलने की आजादी नहीं दी जाती। सवाल पूछने वाले बच्चों को अक्सर डांट मिल जाती है या उनके सवालों को टाल दिया जाता है। ऐसे ही एक विद्यालय में बच्चों से बातचीत के दौरान उनका बोलना ऐसे हो रहा था जैसे वे किसी खेल में बोल रहे हों और उनकी बात दूसरा सुन नहीं सके। "जबकि मध्यावकाश में उनकी आवाज में जबरदस्त तेजी देखने को मिली|

बच्चे हां या ना बोलने में सकुचा रहे थे। पूरी कक्षा एक दम शांत-शांत थी।"

 

तीसरे दिन में सामाजिक ताने-बाने और "पर उपदेश कुशल बहुतेरे" की समस्या दिखाई गई है जिसमें पितृसत्तात्मक परिवारों में जेंडर आधारित भेदभाव पर तंज कसा गया है। अनारको घर से भाग रही है तो गोलू के पापा उसे कहते हैं कि अपनी मौसी को भेज देना, नल आ रहा है, पानी भर ले आकर, जबकि वे खुद नल के पास में ही लेटे हुए हैं, लेकिन पानी भरना या घर से जुड़े काम तो केवल महिलाएं ही करेंगी, वे उठकर पानी नहीं भर सकते।

हमारे समाज में जेंडर आधारित भेदभाव एक बड़ी समस्या है, जिसमें समाज ने लिंग के आधार पर कामों का बंटवारा कर दिया है। कामाने घर से बाहर सिर्फ पुरुष ही जाएंगे और घर के कामों को महिलाएं ही करेंगी, ऐसी सोच और व्यवस्था हमारी सामाजिक और आर्थिक उन्नति के लिए बाधक है। साथ ही ऐसे लोगों की भी कमी नहीं जो खुद भले ही गलत व्यवहार करें लेकिन दूसरों को उपदेश देने में कोई कसर नहीं छोड़ते

 

चौथे दिन के सपने के माध्यम से विभिन्न सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक मुद्दों पर बात की गयी है। हमारे समाज में अमीर-गरीब और ऊँच-नीच की जो खाई है वह समाज के लिए घातक है, इस पर बात की गयी है|

लेखक के ही शब्दों में अनारको ने देखा "जो ज्यादा अच्छे कपड़े पहने था वह ज्यादा बदमाशी कर रहा था।"

 

अनारको ने बहुत से लोगों ऐसे देखे थे। ऐसे- सब उन जैसे लगते थे जो गर्मी की दोपहर में कहीं से आकर घर के बाहर बैठे रहते थे और जब अनारको उनको पीने के लिए गिलास भरकर पानी देने जाती तो हमेशा मुँह के पास हाथ ले जाकर कहते 'डाल दो गुड़िया' कभी गिलास को हाथ में नहीं लेते

 

पांचवें दिन में शिक्षा के उद्देश्य और आकलन को बेहतर तरीके से समझाया गया है। मम्मी के ये कहने पर कि पास होकर अच्छी नौकरी की जा सकती है तो अनारको कहती है कि ये काम तो मैं फेल होकर भी कर सकती हूँ। और यह कौन तय करता है कि कौन पास होगा और कौन फेल और यह तय करना जरुरी क्यों है? साथ ही आकलन के लिए अपनाई जाने वाली प्रक्रियाएं क्या समझने में ठीक तरह से मदद कर पाती हैं कि किसने क्या सीखा?

 

छठवें दिन में भूतों को लेकर समाज में व्याप्त अंधविश्वासों और बच्चों पर इनके प्रभाव को दर्शाया गया है। पहाड़ी सन्दर्भ में तो यह समस्या और बड़ी है। यहाँ तो बच्चे ढेरों ऐसी कहानियाँ जानते हैं जो भूतों के बारे में हैं। अमूमन इस अवधारणा की शुरुआत बाल्यकाल में ही हो जाती है। पालन पोषण के दौरान बच्चों को अलग-अलग तरीके से भय दिखाया जाना हमारी परम्पराओं में शामिल रहा है। जैसे शाम हो गयी, बाहर न जाना, नहीं तो भूत पकड़ ले जायेगा| इन बातों का बच्चों पर बहुत प्रभाव पड़ता है।

 

सातवें दिन में भी बहुत ही संवेदनशील बात को उकेरा गया है। बच्चों को अक्सर प्रदर्शन की वस्तु मान लिया जाता है। जैसे घर में कोई मेहमान आया तो बच्चों से कहा जाता है कि पोयम सुनाओ, डांस करो आदि। इस दिन प्रधानमंत्री आने वाले हैं तो सब लगे हैं उनकी आवभगत के लिए। घंटों के लिए सड़कों पर रास्ते बंद कर दिए जाते हैं और लोगों को कितनी परेशानी झेलनी पड़ती है।

 

आठवें दिन में किसी नई वस्तु के बारे में बच्चों की जिज्ञासा किस कदर बढ़ जाती है, वे वस्तु विशेष के बारे में जानने के लिए कई तरह के यत्न करते हैं। यह बात पुस्तकों के बारे में बहुत अच्छे से लागू होती है। कोई पुस्तक जब बच्चे को अच्छी लग जाए तो वह उसे पढ़े बिना नहीं रहेगा। लेकिन इसके लिए जरुरी है बच्चों को किताबों में रूचि पैदा की जा सके।

 

अनारको के आठ दिन पुस्तक बच्चों के व्यवहार, उनके कल्पना संसार, उनकी जिज्ञासाओं तथा हमारे कौन से व्यवहार बच्चों को पसंद नहीं आते, यह समझने के लिए बहुत ही उपयुक्त है।

-अंकित 

 

अंकित  मिश्रा जी हिन्दी विषय के विद्यार्थी हैं| उनका काम कक्षा- कक्ष में ऐसे हिन्दी शिक्षण को लेकर उन्मुख है जिसमें भाषाई कौशलों की सर्वोत्तम स्थिति बच्चों को हासिल कराई जा सके| उन्हें सम- सामयिक विषयों पर कविताएँ लिखना भी पसंद है|


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अनारको के आठ दिन - सत्यु (बाल साहित्य) : पुस्तक सामग्री से कुछ टिप्पणियां

मुख्य पात्र - अनारको

पुस्तक में बच्चों के सवालों और व्यवहारों को किस प्रकार से प्रस्तुत किया गया है?

पुस्तक में बच्चों की जिज्ञासाओं, उनके आसपास की दुनिया को समझने की कोशिशों, और माता-पिता, विद्यालय और समाज की प्रतिक्रियाओं को सुंदर तरीके से व्यक्त किया गया है। बच्चों के अनुभवों और उनके व्यवहारों को समझने में मदद मिलती है।

पुस्तक में जेंडर आधारित भेदभाव को किस प्रकार दर्शाया गया है?

पुस्तक में जेंडर आधारित भेदभाव को दर्शाने के लिए, अनारको के परिवार की घटनाओं और बातचीत का उपयोग किया गया है। इसमें दिखाया गया है कि कैसे घर के कामों को महिलाओं के लिए निर्धारित किया जाता है, जबकि पुरुष इससे दूर रहते हैं। यह समाज में मौजूद लैंगिक असमानता को उजागर करता है।

बच्चों पर अंधविश्वासों का क्या प्रभाव पड़ता है?

अंधविश्वास बच्चों के मन में डर और अनिश्चितता पैदा करते हैं। वे उन्हें दुनिया को एक डरावनी जगह के रूप में देखने के लिए प्रेरित कर सकते हैं, जहाँ हर चीज का जवाब नहीं है। इससे बच्चों में आत्मविश्वास की कमी और दूसरों पर निर्भरता की भावना भी आ सकती है। अंधविश्वास बच्चों को गलत जानकारी पर विश्वास करने और तर्कसंगत सोच से दूर रहने के लिए भी प्रोत्साहित कर सकते हैं।

बच्चों को शिक्षा में कैसे रुचि पैदा की जा सकती है?

बच्चों को शिक्षा में रुचि पैदा करने के लिए कई तरीके हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि शिक्षा को बच्चों के लिए मजेदार और मनोरंजक बनाया जाए। इसके लिए, शिक्षकों को बच्चों की रुचियों और जरूरतों को ध्यान में रखना चाहिए। उन्हें खेल, कहानियों, और अन्य रचनात्मक गतिविधियों का उपयोग करना चाहिए।

इसके अतिरिक्त, माता-पिता को भी बच्चों को शिक्षा के प्रति प्रोत्साहित करना चाहिए। उन्हें बच्चों को पढ़ने और सीखने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए, और उनके सवालों का जवाब देना चाहिए। माता-पिता को बच्चों के स्कूल के काम में भी रुचि लेनी चाहिए और उनकी सफलता में मदद करनी चाहिए।

बच्चों को प्रदर्शन की वस्तु मानने से क्या नकारात्मक प्रभाव पड़ते हैं?

बच्चों को प्रदर्शन की वस्तु मानना उनके आत्म-सम्मान और विकास के लिए हानिकारक हो सकता है। इससे उन्हें ऐसा महसूस हो सकता है कि उन्हें प्यार और स्वीकृति पाने के लिए प्रदर्शन करना होगा। इससे उनमें आत्मविश्वास की कमी, सामाजिक चिंता और दूसरों को खुश करने की निरंतर आवश्यकता भी पैदा हो सकती है।

इसके अतिरिक्त, बच्चों को प्रदर्शन की वस्तु मानने से उनकी रचनात्मकता और जिज्ञासा भी कम हो सकती है। वे डर सकते हैं कि अगर वे गलतियाँ करते हैं तो उन्हें डांटा जाएगा, इसलिए वे नए विचारों और अनुभवों से डरेंगे।


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अंतस - जरा ठहरिए (लवकुश कुमार) - पुस्तक परिचय सह समीक्षा - शीतल

"अंतस - जरा ठहरिए"

लेखक - लवकुश कुमार

प्रकाशक  - नोशन (Notion) प्रेस चेन्नई 

"अंतस - जरा ठहरिए" लवकुश कुमार जी द्वारा लिखी गई पहली साहित्यिक पुस्तक है,जो हॉल ही में प्रकाशित हुई है।

यह सरल शब्दों में जीवन मूल्यों की तरफ़ पाठक का ध्यान खींचती है। जो बहुत ही संवेदनशील तरीके से लिखी गई है।

जो किसी क्षेत्र या किसी एक विषय के बारे में भले ही आपको पूर्ण ज्ञान न दे सकें। लेकिन आम जीवन में छोटी छोटी चीजों का क्या महत्व है, उस ओर आपको जरा देर खींचकर रोक देती है।

बहुत सामान्य से विषय है,जहां सूक्ष्म चीजों को लेकर उन्होंने अपना लेखन किया है। एक तरह से यह पुस्तक मन में उठते तूफान को शांत कर देती है, खुद के लिए अपराधबोध, समाज के लिए ईर्ष्या,खुद के ही आगे बढ़ने की लालसा को ठहर कर सोचने को कहती है। उनका मुख्य चिंतन समाज के लिए है जो यह कहते हैं कि अपनी एक जिम्मेदारी समाज के लिए भी रखो।अपनी जिंदगी में इतने परेशान रहने की जरूरत नहीं है, किसी जरूरत मंद इंसान की मदद करो वह किसी भी तरह से की जा सकती है। दूसरों की मदद करने से बड़ा कोई सुख नहीं है।

"क्यों पढ़नी चाहिए"

आज जब जिंदगी बहुत तेजी से भाग रही है, आए दिन तरह-तरह की घटनाएं हमें सुनाई देती है, जब मानव सभ्यता को एक अलग दिशा में प्रवाहित किया जा रहा है।मनुष्य के लालच और भोग विलास को ही जीवन का उद्देश्य मान लिया गया है, ऐसे में लवकुश जी बहुत से उदाहरण देकर जीवन का उद्देश्य समझाते है

जब मनुष्य, मनुष्य होने के नाते कुछ न कर पाने के अपराधबोध से खुद को दबाएं हुए है, ऐसे में आज के वातावरण का सूक्ष्म अवलोकन के लिए मानो कोई जगह ही नहीं रह गई है और परिणामतः हम कोई कार्य इसलिए नहीं कर रहे कि उससे हमें आनंद की प्राप्ति हो।

जीवन के मूलभूत पहलुओं में यह किताब एक मनुष्य को स्पष्टता देती है कि अभी कुछ भी नहीं छूटा, एक तसल्ली देती है कि अभी कुछ भी नहीं बिगड़ा,अगर किसी कारण से पढ़ाई छूट गई या कुछ परिस्थिति बदल गई तो उसका विकल्प फिर से शुरू करना है न कि आत्मघाती कदम उठा लेना| 

जीवन की बारीकियों को समझाती हुई यह पुस्तक जीवन की खूबसूरती से पाठक का परिचय कराती है। वह स्पष्ट रूप से कहते हैं कि यह पुस्तक उनके द्वारा दुनिया और स्वयं को देखे और समझे जाने का प्रतिफल है।

यह पुस्तक पाठक के दिमाग में बहुत प्रभाव डालती है। मुझे स्वयं इसे पढ़ते हुए लग रहा था कि हां मुझे भी जरूरत थी इस तरह की पुस्तक की, जो आपको प्रेरित करें, लिखने को ,पढ़ने को अपने विचार खुल कर रखने को,अपनी असहमति दर्ज करने को और सामने वाले की बातों का सम्मान करने के लिए

"पुस्तक एक स्पष्ट दस्तावेज है जो जीवन की उधेड़बुन से आपको न सिर्फ निकालेगी बल्कि हौसला और साहस देगी।"

  • किताब में हर एक अध्याय के शुरू होने से पहले लिखे गए महान व्यक्तियों के वाक्य बहुत ही प्रेरणा देते हैं, यह दिमाग के लिए किसी औषधी की तरह काम कर रहे हैं। इस तरह यह समृद्धता से हमारा परिचय कराते हैं।
  • वह काम को सम्मान देने की बात करते है न कि किसी की हां में हां मिलाने वाले इंसान को।
  • अंत में उनके द्वारा बहुत जरूरी फिल्मों, साहित्य, कविताओं की सूची दी गई है, जो काफी उपयोगी हैं। महेश पुनेठा जी की कविताएं ,आशुतोष जी की कविताएं भी शामिल हैं, जो इस माध्यम से ज्यादा लोगों तक पहुंच पाएंगी, जो आज के समय की जरूरत है।
  • इस तरफ भी ध्यान खींचा गया कि आज मानव जहां खुद के स्वार्थों से घिर चुका है,अपने आप की समस्याओं में उलझ चुका है, उसे किन्ही बातों से तब तक मतलब नहीं रहता जब तक वह उसके ऊपर न बीती हो, इस दृष्टि से  यह पुस्तक संवेदनशीलता को जीवन का जरूरी गुण मानते हुये पाठकों का ध्यान इसके महत्त्व की तरफ खींचती है।
  • पुस्तक में कहीं कुछ वर्तनी संबंधी गलतियां है, लेकिन यह पाठक के पढ़ने की लय नहीं तोड़ती। 
  • बाकी यह पुस्तक हमारे युवाओं के लिए एक मार्गदर्शक का काम करेगी ,जीवन की राहों में अच्छा करने, समाज के लिए अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन करने को प्रेरित करेगी, किसी से कुढ़ने की बजाय काम की प्रशंसा से मिली ऊर्जा को महत्व देगी।
  • लेखक का यह सोचना कि आप जो देखते हैं सोचते हैं उसे लिखना चाहिए,  बहुत सार्थक निर्णय है। लेखक का समाज के लिए कुछ करने का उत्साह उनके लेखन में झलकता है, जो इसे एक जीवंत दस्तावेज बना देता है।

"आसान और स्पष्ट भाषा में लिखी यह पुस्तक भटके राही के लिए पथ-प्रदर्शक, हताश व्यक्ति के लिए उम्मीद बनकर उभरती है।"

 

शीतल 


शीतल जी, उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के एक दूरस्थ पहाड़ी गांव भट्टयूडा से आती हैं। आपने अपना परास्नातक, भूगोल विषय में लक्ष्मण सिंह मेहर कैंपस पिथौरागढ़ से किया है। आप सामाजिक खांचों में फिट नहीं होना चाहती, इसे इस परिप्रेक्ष्य मे देखें कि आप हर वह रिवाज नकारना चाहती हैं जो आपको एक लड़की होने का हवाला देकर कम आंकते हो।

किताबें संवेदनशील ,सामाजिक ,निर्भय और वैज्ञानिक चेतना देती हैं, अतः किताबें पढ़ना, नया जानते रहकर अपनी समझ को विस्तार देते रहना आपकी आदत मे शुमार है। आपको फिल्में देखना पसंद है, और घूमना भी। भूगोल आपको अपनी ओर खींचती है साथ ही  नए और रचनात्मक लोगों के साथ बात करने और उनके बारे में जानने को उत्सुक रहती हैं |


उक्त पुस्तक निम्नलिखित लिंक से क्रय की जा सकती है :- https://notionpress.com/in/read/antas

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"कालिंदी"- शिवानी कृत: स्त्री अस्मिता, संघर्ष और संवेदनाओं की गहन कथा - पुस्तक परिचय सह समीक्षा - विशाल चंद

लेखिका – शिवानी ✍️

प्रकाशक – राधाकृष्ण पेपरबैक्स 

 “कालिंदी” सिर्फ एक उपन्यास नहीं हैं बल्कि एक गहरी अनुभूति की शुरुआत है जो पाठक को भीतर तक छू जाती है।

यह कृति एक स्त्री के आत्मसम्मान, संघर्ष और समाज से टकराने की कहानी को बेहद संवेदनशीलता और सजीवता के साथ प्रस्तुत करती है। नायिका डॉ. कालिंदी का व्यक्तित्व दृढ़, स्वाभिमानी और आत्मनिर्भर है। वह अपने जीवन के निर्णय स्वयं लेती है और उन निर्णयों की कीमत भी पूरी दृढ़ता से चुकाती है। यही उसे एक साधारण पात्र से असाधारण बना देता है।

उपन्यास में कालिंदी की मां (ईजा) अन्नपूर्णा का निःस्वार्थ त्याग, देवेंद्र का आंतरिक द्वंद्व और रिश्तों की जटिल परतें मिलकर एक ऐसा यथार्थ रचती हैं, जो कहीं न कहीं हर पाठक को अपना-सा लगता है। पुस्तक में कुमाऊँ की पृष्ठभूमि विशेषकर अल्मोड़ा और उसके आसपास के अंचल का जीवंत चित्रण इस रचना की आत्मा है। यहां की मिट्टी, हवा, संस्कृति और लोकजीवन शब्दों के माध्यम से जैसे सजीव हो उठते हैं।

“कालिंदी” केवल एक स्त्री की कथा नहीं हैं। इसमें तो अनेकों अनगिनत स्त्रियों की सामूहिक गाथा है जो आधुनिकता और परंपरा के बीच संतुलन बनाने की कोशिश में निरंतर स्वयं को खोजती रहती हैं। यह उपन्यास यह एहसास कराता है कि नारी केवल सहने के लिए नहीं बनी है‌। उपन्यास के नारी पात्रों का अपने निर्णयों पर अडिग रहना और अपनी पहचान गढ़ना इसका मजबूत पहलू है।

एक पाठक के शब्द इस कृति के प्रभाव को बेहद खूबसूरती से व्यक्त करते हैं—

"कालिंदी पढ़ते हुए ऐसा लगता है मानो मैं फिर से उसी पुराने अल्मोड़ा में लौट गया हूँ।"

स्वयं लेखिका के शब्द—

"मुझे लगा जैसे मुझे कुमाऊँ का सर्वोच्च साहित्य पुरस्कार मिल गया।"

यह लेखिका के पाठकों के प्रति उनके गहरे जुड़ाव और समर्पण को दर्शाते हैं।

 

डॉ. कालिंदी एक स्वयंसिद्धा स्त्री है, जो जीवन के हर झंझावात का सामना अपनी शर्तों पर करती है। यह उपन्यास कुमाऊँ की स्त्री शक्ति, उसके लंबे शोषण, उसकी अदम्य सहनशीलता और जिजीविषा का सशक्त दस्तावेज़ है। साथ ही यह नए और पुराने मूल्यों के टकराव और उनके पुनर्सृजन की कथा भी कहता है।

अन्नपूर्णा और कालिंदी जैसे पात्र आज भी हमारे समाज के हर कोने में मौजूद हैं जो लिए हुए हैं अपने भीतर अपार प्रेम, त्याग और संघर्ष कोयही इस उपन्यास को कालजयी बनाता है।

 

विशाल चन्द  @reading_owl.3

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विशाल चन्द जी समाजशास्त्र के शोधार्थी, पाठक और संवेदनशील शिक्षार्थी हैं। नवीन ज्ञान अर्जन और सतत सीखना आपके व्यक्तित्व का अभिन्न हिस्सा है। पुस्तकों का पठन और संग्रहण आपको विशेष प्रिय है।

आपके भीतर एक घुमक्कड़ चेतना भी सक्रिय है, जो आपको नए लोगों, स्थानों और अनुभवों से जोड़ती रहती है। बागवानी आपके लिए प्रकृति से संवाद का माध्यम है।

आप समाज को अपने स्वतंत्र दृष्टिकोण से देखने और विभिन्न समूहों के साथ मिलकर सामाजिक दायित्वों के निर्वहन को निरंतर प्रयासरत रहते हैं।


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देवेंद्र मेवाड़ी सर की पुस्तकें : विज्ञान आधारित बाल साहित्य एवं अन्य उम्दा रचनाएँ (प्रकाशन और संपर्क सूत्र के साथ)

मेरी पुस्तकें

देवेंद्र मेवाड़ी

  1. सुनो बात विज्ञान की, प्रकाशक: साहित्य अकादमी, नई दिल्ली, सम्पर्क : विक्रय अनुभाग,'स्वाति', मंदिर मार्ग, नई दिल्ली-110001, फोन:011-23745297, 23364204, (sales@sahitya-akademi.gov.in), वर्ष 2025 में प्रकाशित, मूल्य: 125 रूपए, पृष्ठ संख्या: 84  
  2. यायावर की यादें, संभावना प्रकाशन, 64, रेवती कुंज, हापुड़ -245101, (उ.प्र.), संपर्कः अभिषेक, फोनः 7017437410,  अमेजॉन से इस लिंक पर क्लिक करके मंगा सकते हैं: https://amzn.in/d/h5Cg1xt , वर्ष 2025 में प्रकाशित, मूल्य: रू.395।
  3. मेरी यादों का पहाड़ (बचपन के आत्मकथात्मक संस्मरण) नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया, नेहरू भवन, 5- इंस्ट्यिूशनल एरिया, फेज-2, वसंत कुंज, नई दिल्ली- 110070, आनलाइन पता- http://www.nbtindia.gov.in/books_detail__6__general-titles__791__meri-yadoon-ka-pahad-hindi-.nbt,  वर्ष 2013  में प्रकाशित। अमेजॉन से https://www.amazon.com/Meri-Yadoon-Ka-Pahad-HINDI/dp/B00JKO04HG
  4. छूटा पीछे पहाड़, संभावना प्रकाशन, 64, रेवती कुंज, हापुड़ -245101, (उ.प्र.), संपर्कः अभिषेक, फोनः 7017437410,  अमेजॉन से इस लिंक पर क्लिक करके मंगा सकते हैं: https://www.amazon.in/dp/9392621256?ref=myi_title_dp, वर्ष 2021 में प्रकाशित
  5. जीवन जैसे पहाड़, संभावना प्रकाशन, 64, रेवती कुंज, हापुड़ -245101, (उ.प्र.), संपर्कः अभिषेक, फोनः 7017437410,  अमेजॉन से इस लिंक पर क्लिक करके मंगा सकते हैं:  https://amzn.eu/d/25dP5VY, वर्ष 2022 में प्रकाशित
  6. दस कहानियां, (आइसेक्ट पब्लिकेशन, ई-7/27, एस. बी. आई., अरेरा कालोनी, भोपाल-462016, (भारत)  फोन: 0755-4851056, वर्ष 2023 में प्रकाशित , मूल्य: 150
  7. मोनू मोनाल (बाल साहित्य), रूम-टू-रीड ट्रस्ट, कार्यालय नंबर सी-21, कुतुब इंस्टिट्यूशनल एरिया, नई दिल्ली- 110016,  वर्ष 2022 में प्रकाशित।
  8. कथा कहो यायावर, संभावना प्रकाशन, 64, रेवती कुंज, हापुड़ -245101, (उ.प्र.), संपर्कः अभिषेक, फोनः 7017437410,  अमेजॉन से इस लिंक पर क्लिक करके मंगा सकते हैं: https://www.amazon.in/dp/8195294944?ref=myi_title_dp, वर्ष 2021 में प्रकाशित
  9. विज्ञान वेला में, नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया, नेहरू भवन, 5- इंस्ट्यिूशनल एरिया, फेज-2, वसंत कुंज, नई दिल्ली- 110070,  वर्ष 2018  में प्रकाशित। आनलाइन पता- http://www.nbtindia.gov.in/books_detail__20__popular-social-science__2745__vigyan-vela-mein.nbt
  10. दिल्ली से तुंगनाथ वाया नागनाथ (यात्रा संस्मरण), ‘आधार प्रकाशन प्रा. लिमि., एस.सी.एफ. 267, सैक्टर-16, पंचकूला- 134113 (हरियाणा), संपर्कः श्री देश निर्मोही, प्रकाशक फोनः 09417267004, 0172-2566952, वर्ष 2018  में प्रकाशित।ई.मेलः aadhar_prakashan@yahoo.com, आनलाइन पता- अमेज़ॅन लिंक
  11. विज्ञान की दुनिया  (बालोपयोगी लेखों का संकलन), ‘नवारुण’ प्रकाशन, संपर्क: संजय जोशी, फोनः 9811577426, मेल: navarun.publication@gmail.com, वर्ष 2018  में प्रकाशित।
  12. राही मैं विज्ञान का (मेरे साक्षात्कार), ‘आर. के. पब्लिकेशन’, मुंबई, मोबाइलः 9022521190, ई-मेल:publicationrk@gmail.com, संपर्कः रामकुमार, वर्ष 2019 में प्रकाशित, आनलाइन पता: अमेज़ॅन लिंक
  13. विज्ञान और हम, लेखक मंच प्रकाशन, 433, नीतिखंड-3, इंदिरापुरम, गाजियाबाद-201014, मूल्य रू. 140, संपर्कः अनुराग शर्मा, मोबाइलः 09871344533ईमेल : anuraglekhak@gmail.com, वर्ष 2016  में प्रकाशित।
  14. नाटक-नाटक में विज्ञान, विज्ञान प्रसार, ए-50, इंस्टीट्यूशनल एरिया, सेक्टर -62, नोएडा, उत्तर प्रदेश- 201309, वर्ष 2018  में प्रकाशित। आनलाइन पताविज्ञान प्रसार की वैबसाइट पर , ईमेल :publication@vigyanprasar.gov.in
  15. विज्ञाननामा,  ‘आधार प्रकाशन प्रा. लिमि., एस.सी.एफ. 267, सैक्टर-16, पंचकूला- 134113 (हरियाणा), 2014, संपर्कः श्री देश निर्मोही, प्रकाशक फोनः 09417267004, 0172-2566952, वर्ष 2014  में प्रकाशित। .मेलः aadhar_prakashan@yahoo.com,  आनलाइन पता-  http://www.amazon.in/Vigyannama-Devendra-Mewari/dp/8176754722/ref=sr_1_1?s=books&ie=UTF8&qid=1482761058&sr=1-1
  16. सौरमंडल की सैर, नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया, नेहरू भवन, 5- इंस्ट्यिूशनल एरिया, फेज-2, वसंत कुंज, नई दिल्ली- 110070, वर्ष  2009  में प्रकाशित।आनलाइन पता- http://www.nbtindia.gov.in/books_detail__10__nehru-bal-pustakalaya__273__sourmandal-ki-sair-hindi-.nbt
  17. विज्ञान बारहमासा,  प्रकाशन विभाग, भारत सरकार, पृष्ठ 108, मूल्य 155 रू. प्रकाशकः विक्रय अधिकारी प्रकाशन विभाग, भारत सरकार सूचना भवन, सी जी ओ काम्पलैक्स लोधी रोड, नई दिल्ली-110003, वर्ष  2008  में प्रकाशित। ईमेलः dpd@sb.nic.in (कृपया पुस्तक के लिए आदेश देते समय इस ईमेल पर भी संदेश भेजे singhpiks.comm@gmail.com)
  18. मेरी विज्ञान डायरी, भाग-1,  ‘आधार प्रकाशन प्रा. लिमि., एस.सी.एफ. 267, सैक्टर-16, पंचकूला- 134113 (हरियाणा) संपर्कः श्री देश निर्मोही, प्रकाशक फोनः 09417267004, 0172-2566952, वर्ष 2012 में प्रकाशित| .मेलः  aadhar_prakashan@yahoo.comआनलाइन पता- http://www.amazon.in/Meri-Vigyan-dairy-Devendra-Mewari/dp/8176753416/ref=sr_1_2?s=books&ie=UTF8&qid=1482761058&sr=1-2
  19. मेरी विज्ञान डायरी, भाग-2 , ‘आधार प्रकाशन प्रा. लिमि., एस.सी.एफ. 267, सैक्टर-16, पंचकूला- 134113 (हरियाणा) संपर्कः श्री देश निर्मोही, प्रकाशक फोनः 09417267004, 0172-2566952, ई.मेलः  aadhar_prakashan@yahoo.com, वर्ष 2013 में प्रकाशित ।
  20. मेरी प्रिय विज्ञान कथाएं , ‘आधार प्रकाशन प्रा. लिमि., एस.सी.एफ. 267, सैक्टर-16, पंचकूला- 134113 (हरियाणा) संपर्कः श्री देश निर्मोही, प्रकाशक फोनः 09417267004, 0172-2566952, .मेलः aadhar_prakashan@yahoo.com,   वर्ष 2011 में प्रकाशित । आनलाइन पता- http://www.amazon.in/Priya-Vigyan-Kathayen-DevendraMewari/dp/8176753084/ref=sr_1_3?s=books&ie=UTF8&qid=1482761058&sr=1-3
  21. विज्ञान प्रसंग,   ‘आधार प्रकाशन प्रा. लिमि., एस.सी.एफ. 267, सैक्टर-16, पंचकूला- 134113 (हरियाणा) संपर्कः श्री देश निर्मोही, प्रकाशक फोनः 09417267004, 0172-2566952, वर्ष 2005 में प्रकाशित , ई.मेलः aadhar_prakashan@yahoo.com,  आनलाइन पता- http://www.amazon.in/Vigyan-Prasang-Devendra-Mewari/dp/8176752894/ref=sr_1_5?s=books&ie=UTF8&qid=1482761058&sr=1-5
  22. कोख (विज्ञान कथाएं) , नेशनल पब्लिशिंग हाउस, 2/35, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली, nationalpublishinghouse@ymail.com, वर्ष 1998 में प्रकाशित ।
  23. भविष्य (विज्ञान कथाएं) , नेशनल पब्लिशिंग हाउस, 2/35, अंसारी रोड, दरियागंज, नई  दिल्ली, nationalpublishinghouse@ymail.com,  वर्ष 1994 में प्रकाशित ।
  24. फसलें कहें कहानी (हिंदी, पंजाबी), आधार प्रकाशन प्रा. लिमि., एस.सी.एफ. 267, सैक्टर-16, पंचकूला- 134113 (हरियाणा) संपर्कः श्री देश निर्मोही, प्रकाशक फोनः 09417267004 0172-2566952, ई.मेलः aadhar_prakashan@yahoo.com, वर्ष 1994 में प्रकाशित ।
  25. अनोखा सौरमंडल, सारांश प्रकाशन, नई दिल्ली, वर्ष 1998 में प्रकाशित ।
  26. विज्ञान जिनका ऋणी है, भाग-1, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, 2/35, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली, nationalpublishinghouse@ymail.com, वर्ष 1996 में प्रकाशित ।
  27. विज्ञान जिनका ऋणी है, भाग-2नेशनल पब्लिशिंग हाउस, 2/35, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली, nationalpublishinghouse@ymail.com, वर्ष 1996 में प्रकाशित ।
  28. सूरज के आंगन में , राष्ट्रीय विज्ञान संचार एवं सूचना स्रोत संस्थान, नई दिल्ली, 1994
  29. पशुओं की प्यारी दुनिया, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, वर्ष 1979 में प्रकाशित ।
  30. फसलें कहिण कहाणी (पंजाबी),अनुवाद- खुशवंद बरगाडी, तरकभारती प्रकाशन, बरनाला, पंजाब, वर्ष 2002 में प्रकाशित ।
  31. विज्ञानी जिन्हां दुनिया बदल दित्ती (पंजाबी), अनुवाद-सुरिंदर कौर कोहरवाला, पीपल्ज फोरम (रजि.), बरगाडी, फरीदकोट-151208 (फोन- 01635-244053, 09872989313), पंजाब, वर्ष 2014 में प्रकाशित ।

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स्रोत - आदरणीय देवेंद्र मेवाड़ी सर से प्राप्त सूची की फाइल से साभार 

ई-मेल : dmewari@yahoo.com


 लेखक परिचय - विज्ञान को साहित्य की सरसता और सरलता में पिरो कर देवेंद्र मेवाड़ी समाज को नई रोशनी दे रहे हैं। बीते 50 वर्षों से भी अधिक समय से वह अपनी किताबों, कहानी, विज्ञान साहित्य के लेखों से बच्चों को विज्ञान की बारीकियां सिखा रहे हैं। अब तक आधा दर्जन से अधिक राष्ट्रीय पुरस्कार अर्जित कर चुके देवेंद्र के आत्मकथा संस्मरण मेरी यादों का पहाड़ के लिए उन्हें साहित्य अकादमी 2021 के युवा एवं बाल साहित्य पुरस्कार के लिए चुना गया।

मूल रूप से नैनीताल जनपद के ओखलकांडा कालाआगर निवासी देवेंद्र मेवाड़ी का जन्म 1944 में हुआ। 12वीं तक पढ़ाई ओखलकांडा में पूरी करने डीएसबी परिसर से वनस्पति विज्ञान में एमएससी की पढ़ाई पूरी की। पढ़ाई पूरी कर भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान दिल्ली में तीन वर्षों तक अनुसंधान कार्य करने के बाद उन्होंने इस्तीफा दिया। इसके बाद जीबी पंत कृषि विवि पंतनगर में बतौर विज्ञान लेखक कार्य करना शुरू किया। जहां 13 वर्षों तक उन्होंने किसान भारती पत्रिका का संपादन किया। इसके बाद 22 वर्षों तक वह बैंकिंग क्षेत्र से जुड़े रहे। वर्तमान में वह दिल्ली में रहकर मुक्त रूप से विज्ञान साहित्य का लेखन कर पाठकों की जिज्ञासा शांत कर रहे हैं।

स्रोत - साभार दैनिक जागरण, पूरी रिपोर्ट के लिए यहाँ क्लिक करें |

 

 

 

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सातवीं ऑनलाइन साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा 19-04-2026

बीते रविवार (19-04-2026) को हम सबके सामूहिक प्रयास और आदरणीय महेश चन्द्र पुनेठा सर के प्रोत्साहन से सातवीं साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा का ऑनलाइन आयोजन सफल रहा, जिसमें निम्नलिखित पुस्तकों/रचनाओं/विषयों पर सार्थक चर्चा हुयी:

  1. श्रीमद भगवद्गीता
  2. रेत की मछली - कान्ता भारती
  3. स्वामी – मनु भण्डारी
  4. महाभोज – मनु भण्डारी
  5. आपका बंटी - मनु भण्डारी
  6. चले साथ पहाड़ – अरुण कुकसाल
  7. तीन - अमित श्रीवास्तव , बचपन के पुराने किस्सों को याद करने के लिए पढ़िए यह उपन्यास
  8. अकेलापन और निर्भरता -  आचार्य प्रशांत
  9. The Secret - Rhonda Byrne

  • गीता में हैं जीवन के सूत्र
  • क्या हम वाकई जानते हैं की हमारी भलाई किसमे है ?

  • क्या हम जो भगवान से मांगते हैं, वह वाकई हमारी जरूरत होती है ?
  • कहीं हम समाज सेवा के बाद तारीफ की आकांक्षा तो नहीं रखते हैं ?
  • कहीं ऐसा तो नहीं है कि हम समाज के लिए करते कम और सोचते ज्यादा हैं ?

  • अच्छा काम कर रहे तो उसे जारी रखें, असर दिखेगा, खुद के काम पर विश्वास रखें तारीफ की आकांक्षा न रखें
  • अपने अधिकारों के लिए अपनी बात स्वयं रखेँ और किसी और का इंतज़ार न करें आपकी पैरवी के लिए
  • खुद के लिए खड़े हों और बहस से भी परहेज न करें

न हारा है इश्क़ और न दुनिया थकी है

दिया जल रहा है हवा चल रही है     - ख़ुमार बाराबंकवी

  • पितृसत्तात्मक व्यवस्था से स्त्री पुरुष दोनों को ही नुकसान
  • रिश्ते का आधार, परस्पर उन्नती, जीवन मे शांति और सहयोग
  • नई वाली हिन्दी ताकि ज्यादा से ज्यादा युवाओं को पढ़ने की संस्कृति से जोड़ा जा सके
  • सेक्स एजुकेशन की जरूरत ताकि जीवन के विभिन्न मुद्दों के आनुपातिक महत्व निर्धारित करना आसान हो सके और साथ ही जिज्ञासाओं को समुचित रूप से संबोधित करके, युवाओं को किसी भी भ्रामक स्रोत से बचाया जा सके  
  • दूसरों पर नियंत्रण करने की इच्छा ने इंसान को स्वयं भी गुलाम बनाया है
  • पहाड़ों की दिक्कतों को पुस्तकों के जरिये शब्द मिले
  • जब दिक्कतें और आकांक्षाएँ व्यक्त की जाती हैं तो नीति निर्माताओं के लिए आसानी होती है और नीतियाँ प्रासंगिक बनती हैं
  • यदि आपको शिकायत है कि लोग आपकी बात समझ नहीं पाते तो आपको स्वयं भी साहित्य अध्ययन करना चाहिए और औरों को भी इसके लिए प्रोत्साहित करना चाहिए ताकि खुद की बात को समझाना और दूसरों की बात को समझने के लिए आपको समुचित समझ मिल सके पृष्ठभूमि की |
  • अगर हम समझा नहीं पा रहे तो संभव है कि हम खुद ही अच्छे से नहीं समझे अभी
  • अकेलेपन से डरने वाला इंसान सामाजिक गुलाम बनता है – आचार्य प्रशांत

अकेलेपन का डर हमें अक्सर हमारे जीवन को अन्य वस्तुओं से भरने

पर मजबूर कर देता है। वहीं से उन वस्तुओं के प्रति आसक्ति का जन्म

होता है, जिसके कारण हमें जीवन में न जाने कितना दुःख भोगना

पड़ता है। यदि इस डर को गहराई से समझा जाए तो जीवन सरल

और बोधपूर्ण हो जाएगा। यह किताब हमें उस डर के पार ले जाने का

एक प्रयास है।   - अकेलापन और निर्भरता पुस्तक के कवर पृष्ठ से 

 

उक्त परिचर्चा में निम्नलिखित पुस्तकसाथी शामिल रहे:

योगेश बिष्ट (किताबवाला दोस्त), अवनीश त्रिपाठी, हिमांशु जोशी, लाल बहादुर, अमितेन्द्र सिंह, कर्ण भाईजी(लिटरेरी  लैंड), सौम्या मैम, सिद्धि तिवारी मैम, सचिन सिंह, शिवम राय, अंशुल, शोभित, आशुतोष, राजन वर्मा, आशुतोष श्रीवास्तव,अरविंद कुमार, गायत्री, प्रिया, दिव्याशु, लक्ष्मण जोशी, प्रिया जायसवाल, उर्मिला, उमा जायसवाल और लवकुश|

 

धन्यवाद ज्ञापन के साथ परिचर्चा के संचालक लवकुश कुमार ने परिचर्चा को अगली परिचर्चा तक के लिए विराम दिया |

पुस्तक परिचर्चा मे शामिल सभी पुस्तक साथियों (bookmates) ने पुस्तक परिचर्चा मे शामिल होकर/अभिव्यक्ति/सराहना/भागीदारी के माध्यम से इस पहल को पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा देने में, मानवीय मूल्यों के पोषण में, अपनी बात को बेहिचक रखने में महत्वपूर्ण माना एवं एक दूसरे के प्रति आभार व्यक्त किया ताकि इस जरूरी कार्य की नियमितता बनी रहे एवं समाज मे एक सकारात्मक बदलाव में अपना विनम्र योगदान सुनिश्चित किया जा सके |

इस आशा के साथ कि यह रिपोर्ट पाठकों को पुस्तक परिचर्चा को समझने और उसमे शामिल होने के लिए प्रेरित करेगी |

अगली परिचर्चा 26 अप्रैल को होगी, शामिल होकर पढ़ने-लिखने की संस्कृति पर काम करने में अपना योगदान सुनिश्चित करें।

 

  धन्यवाद 

-लवकुश कुमार

 

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छठी ऑनलाइन साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा 12-04-2026

बीते रविवार (12-04-2026) हम सबके सामूहिक प्रयास और आदरणीय महेश चन्द्र पुनेठा सर के प्रोत्साहन से छठी साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा का ऑनलाइन आयोजन सफल रहा, जिसमें निम्नलिखित पुस्तकों/रचनाओं/विषयों पर सार्थक चर्चा हुयी:

  1. एक अनोखा गुरु (ओशो) - बेनटेन प्रकाशन 
  2. दिल्ली दरबार - सत्य व्यास
  3. शिक्षा के सवाल– महेश चन्द्र पुनेठा, लोकोदय  प्रकाशन लखनऊ 
  4. मनुष्य क्या है - जेम्स पाल गी
  5. शिक्षा और मनुष्य का प्राकृतिक अस्तित्व  - जिनान के बी 
  6. अंतस - जरा ठहरिए (लेखों का संग्रह) – लवकुश कुमार, नोसन प्रकाशन चेन्नई
  • आपसी संबंधों का आधार उन्नति और शांति के लिए परस्पर सहयोग हो।

 

अगली परिचर्चा 19 अप्रैल को होगी, शामिल होकर पढ़ने लिखने की संस्कृति पर काम करने में अपना योगदान सुनिश्चित करें।

 

धन्यवाद ज्ञापन के साथ परिचर्चा के संचालक लवकुश कुमार ने परिचर्चा को अगली परिचर्चा तक के लिए विराम दिया |

उक्त परिचर्चा में निम्नलिखित पुस्तकसाथी शामिल रहे:

सौम्या मैम, आंशिका मैम, प्रदीप छाजेड़ भैया, अंकित, गायत्री, प्रिया, दिव्याशु और लवकुश।

प्रदीप भैया ने कई कविताओं के द्वारा मानवीय संबंधों में समुचित संचार (proper communication) की जरूरत पर प्रकाश डाला।

पुस्तक परिचर्चा मे शामिल सभी पुस्तक साथियों (bookmates) ने पुस्तक परिचर्चा मे शामिल होकर/अभिव्यक्ति/सराहना/भागीदारी के माध्यम से इस पहल को पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा देने में, मानवीय मूल्यों के पोषण में, अपनी बात को बेहिचक रखने में महत्वपूर्ण माना एवं एक दूसरे के प्रति आभार व्यक्त किया ताकि इस जरूरी कार्य की नियमितता बनी रहे एवं समाज मे एक सकारात्मक बदलाव में अपना विनम्र योगदान सुनिश्चित किया जा सके |

इस आशा के साथ कि यह रिपोर्ट पाठकों को पुस्तक परिचर्चा को समझने और उसमे शामिल होने के लिए प्रेरित करेगी |

  धन्यवाद 

-लवकुश कुमार

 

 

 

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हिमांक और क्वथनांक के बीच (शेखर पाठक) : परिचय सह समीक्षा - महेश चन्द्र पुनेठा

आइये ले चलते हैं आपको उक्त पुस्तक की समीक्षा और परिचय की तरफ जिसे लिखा है वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद आदरणीय महेश चन्द्र पुनेठा जी ने, और जिसे पढ़ने के बाद मुझे भी लगा कि अब तो यात्रा वृत्तान्त भी पढ़ने हैं, आपको कैसा लगा जरूर बताइएगा| तो आइये मिलते हैं इस परिचय और समीक्षा यात्रा में:

गंगोत्री कालिंदीखाल यात्रा मार्ग उच्च हिमालय के कठिनतम यात्रा मार्गों में से एक है, जिसके चलते इस मार्ग पर कम ही यात्री जाते हैं। इतिहासकार, पर्यावरणविद और घुमक्कड़ शेखर पाठक ने वर्ष 2008 में अपने साथियों के साथ इस मार्ग में यात्रा की। वर्ष 2023 में इस यात्रा पर नवारुण प्रकाशन से उनकी एक किताब "हिमांक और क्वथनांक के बीच" नाम से आयी है।

शेखर पाठक अपनी भूमिका में कहते हैं कि - “यह हमारे जीवन की सबसे कठिन यात्रा थी। उच्च हिमालय ने कभी इस तरह नहीं डराया था हमें।”

इस यात्रा वृत्तांत को पढ़ते हैं तो लगता है कि यह एक कठिन ही नहीं बेहद कठिन यात्रा थी। और ऐसी यात्राएं आदमी को आध्यात्मिक बना देती हैं और इस बात का एहसास करा देती हैं कि प्रकृति की विराटता के सामने मनुष्य एक कण के समान है। उसका सारा का सारा अहंकार चूर-चूर होकर रह जाता है। शेखर पाठक भी इस बात को स्वीकार करते हैं कि प्रकृति की क्षमता और शक्ति के साथ मनुष्य की मर्यादा और सीमा का इतनी गहराई से पहली बार एहसास हुआ। पर इस बात को स्वीकार करना पड़ेगा कि प्रकृति जितनी भी विराट हो लेकिन मनुष्य का साहस उसके सामने कभी भी कम नहीं रहा। वह हार नहीं मानता है। पिछली असफलताओं से सीख लेते हुए फिर नयी चढ़ाई की तैयारी शुरू कर देता है।

वरिष्ठ कवि शैलेय की कविता यहां याद आती है...हताश निराश लोगों से/बस एक सवाल/एवरेस्ट ऊंचा कि बछेंद्री पाल

 

यह किताब तेरह अध्यायों में बंटी है। इस मार्ग के साथ-साथ उत्तराखंड नेपाल हिमालय के बारे में बहुत कुछ बताती है। शेखर पाठक किताब में पिछली यात्राओं और उस दौरान मिले हुए लोगों को भी याद करते हैं। उच्च हिमालयी क्षेत्र में की गयी अपनी पुरानी यात्राओं का विवरण भी देते हुए चलते हैं। पूरी किताब में अतीत और वर्तमान के बीच यह आवाजाही चलती रहती है, जिसके चलते यह काफ़ी रोचक और उपयोगी बन गयी है।

 

नयी-नयी आवाज़ों, दृश्यों और घटनाओं से हमारा परिचय होता है। इस यात्रा वृत्तांत को पढ़ते हुए एकदम नये अनुभव मिलते हैं, जो केवल यात्रा करते हुए ही मिल सकते थे। यहीं पर मुझे किताबों का महत्व दिखाई देता है। किताबें हमें उन जगहों तक भी पहुंचा देती हैं, जहां हम स्वयं नहीं पहुंच पाते हैं। इतने कठिन मार्ग की यात्रा करना हरेक के लिए संभव नहीं होता है लेकिन ऐसे यात्रा वृत्तांतों के माध्यम से हम इन मार्गों के बारे में जान सकते हैं। अत्यंत निर्मम और निर्मोही एकांत में प्रकृति के कितने सारे रूपों को लेखक की नज़र से देख और सुन सकते हैं।

हमें इस यात्रा वृत्तांत में एक इतिहासकार भी दिखाई देता है। एक पर्यावरणविद भी, प्रकृति प्रेमी भी, सामाजिक सरोकारों से लैस एक जागरुक नागरिक भी, उच्च हिमालय के भूगोल का जानकार भी, साहित्य का अध्येता भी और एक आंदोलनकारी भी। पुस्तक में दिखाई देता है कि जब कोई इतिहासकार यात्रा वृत्तांत लिखता है तो उसके यात्रा वृत्तांत में एक सामान्य लेखक के यात्रा वृत्तांत से काफ़ी अंतर होता है। वह इस रूप में कि एक इतिहासकार द्वारा लिखे गये यात्रा वृत्तांत में जब भी किसी जगह, व्यक्ति या घटना का जिक्र आता है तो उससे जुड़ी हुई पुरानी घटनाओं का जिक्र भी प्रामाणिक तथ्यों सहित उसके साथ जुड़ता चला जाता है। शेखर पाठक बार-बार हमें इतिहास की ओर ले जाते हैं।

उनके द्वारा गंगोत्री कालिंदीखाल यात्रा मार्ग में पहली बार 24 जुलाई 1931 को आए कैप्टन इजी बरनी से लेकर 2007 में नीरज पंत द्वारा की गई यात्राओं का संक्षिप्त इतिहास और उनके संघर्षों तथा उनके द्वारा लिखे यात्रा साहित्य को इस पुस्तक में रेखांकित किया गया है। उन तमाम लोगों को याद किया गया है, जिन्हें इस यात्रा के दौरान अपनी जान गंवानी पड़ी। जानकारी के लिहाज से यह पुस्तक का महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो आने वाले पथारोहियों और हिमालय साहित्य के पाठकों के लिए बहुत उपयोगी सिद्ध होगा।

हमें विभिन्न स्थानों की ही यात्रा नहीं बल्कि उन स्थानों से जुड़े हुए व्यक्तित्वों की जीवन यात्रा भी करा देते हैं। जैसे जब वह उत्तरकाशी पहुंचते हैं तो वहां पर उन्हें विल्सन की याद आती है और इस बहाने वह विल्सन के बारे में बहुत कुछ बताते हुए चलते हैं। जोंकों द्वारा खून चूसने के प्रसंग तक का वर्णन कि कैसे जोंक चुपके से छिपकर खून चूसते हैं? कैसे उनसे बचाव होता है? बड़े रोचक ढंग से किताब में करते हैं।

इसी तरह यात्रा की पीड़ा परेशानियों के साथ-साथ लोगों द्वारा मिले हुए स्नेह को भी याद करते हैं। उनका यह याद करना बड़ा प्रीतिकर लगता है। जब वह पुरानी घटनाओं को बताते हैं तो ऐसा लगता है कि हम छोटी-छोटी कथाएं पढ़ रहे हों। इन कथाओं में स्मृतियों के साथ-साथ पूरी आत्मीयता और संवेदनशीलता झलकती है। यह तरीका यात्रा वृत्तांत को बहुआयामी और उपयोगी बना देता है। इतिहास के विद्यार्थियों को तो उसे बहुत सारी नयी जानकारियां मिल जाती हैं।

 

एक अच्छी बात यह है कि शेखर पाठक जी अपनी बात कहने का कोई न कोई बहाना ढूंढ लेते हैं। जैसे चतुरंगी के साथ चलते हुए वह एक जगह से शिवलिंग शिखर के ऊपर बादलों को उड़ते हुए देखकर सागरमाथा और तेनजिंग का जिक्र करने लग जाते हैं। इसी तरह चिड़िया उड़ती देखते हैं तो अनूप साह और सालिम अली को याद करने लग जाते हैं। यात्रा में साथ चल रहे पोटर्स बलबीर कार्की, पूर्ण बहादुर शाही और अन्य के बहाने पोटर्स की स्थितियों, संघर्षों और नेपाल की राजनीति का जिक्र ले आते हैं। यह यात्रा वृतांत की इकरसता को तोड़ने और उसे अपने समय और समाज के सवालों से जोड़ने का अच्छा तरीका है। नमक लगी ककड़ी खाने जैसी लेखक के जीवन की छोटी-छोटी स्मृतियां, इस वृत्तांत में एक नया रस पैदा करती हैं। 

साथ ही यात्रा मार्ग के बाहर के जीवन की झांकियां भी हमें यहां दिखाई देती हैं। जो लेखक की जीवन के प्रति गहरी रागात्मकता को बताती है। यहां यात्रा करते हुए लेखक के मन में तमाम जिज्ञासाएं, उत्सुकताएं और प्रश्न पैदा होते हैं। प्रकृति के रहस्यों को समझने की कोशिश में लेखक के मन में बाल सुलभ प्रश्न उठते हैं कि यह गल पहले बना होगा या यह शिखर? यहां शेखर पाठक एक चुटकी लेते हैं कि वही (बच्चे ही) सवाल पूछते हैं। हम बड़े ना सवाल पूछते हैं और न जवाब देते हैं। देश के सबसे जिम्मेदार लोगों में जवाब देने का निकम्मापन सबसे ज्यादा प्रकट हुआ है। इस तरह की पंक्तियां बताती हैं, वह किताब में मौजूदा समय और देश की राजनीतिक व्यवस्था पर टिप्पणी भी करते हैं। यहां उनके भीतर का एक सचेत नागरिक कुलबुलाने लगता है।

कहीं-कहीं वह व्यंग्य में भी अपनी बातें कहते हैं। जैसे एक जगह वह एवरेस्ट बेस कैंप का जिक्र करते हुए लिखते हैं कि एवरेस्ट बेस कैंप में जाते हुए शोपियां के पास मैंने ऐसा ही निडर कस्तूरा मृग देखा था। जब मैंने उससे कहा, "अब तू चला जा कोई मार सकता है तो उसने पलट कर कहा कि क्या मैं उत्तराखंड में हूं कि जो मार दिया जाऊंगा। मैं शेरपाओं के इलाके में हूं और वह मेरे जीवित होने का अर्थ जानते हैं। मैं अपना सा मुंह लेकर रह गया। पर मैं उसे आंख भर देखता रहा फिर वह चलते-चलते दूसरी ओर निकल गया।" यह बात उनके ध्यान में भरलों के समूह को देखकर आया। वह लिखते हैं, "भरल निर्भय घूम रहे थे। हमें तीन दिन में चार या पांच भरल दल मिल गए थे। उन्हें गिनने का उत्साह घट गया था। उनका निर्भय होना दरअसल राहत देता था।

जनतंत्र में नागरिक भी यदि इसी तरह निर्भय हो जाए तो ठगी करने वाली राजनीति समाप्त हो सकती है या कहें कि ऐसी राजनीति के समाप्त होने पर ही ठगी बंद होगी।" इस तरह की चुटकियां लेना शेखर पाठक के स्वभाव में है। इस किताब में भी जगह जगह उनका यह स्वभाव प्रकट होता है।

शेखर पाठक यात्रा के दौरान नींद में देखे गये सपनों का भी जिक्र इस किताब में करते हैं। अधिकांश सपने तो नींद खुलने के बाद याद नहीं रह पाए ऐसा बताते हैं। इन सपनों को पढ़ना भी रोचक है। लेखक की मनोदशा का अनुमान लगाया जा सकता है। शेखर पाठक यह भी बताते हैं कि जब भी उच्च हिमालय की यात्रा करते हैं तो उन्हें इस तरह के सपने अक्सर आते हैं। कोई मनोविश्लेषक इनको पढ़े तो मन की हलचलों और दबावों के बारे में बहुत कुछ विश्लेषित कर सकता है।

यात्रा वृत्तांतकार यदि भूगोल का जानकार होता है तो पहाड़, नदी, नाले, गधेरे, झील, ग्लेशियर आदि स्थलाकृतियां अपने नामों के साथ उतर आती हैं जैसे वे सारे लेखक के बचपन के यार दोस्त हों। यही बात पाठक जी के संदर्भ में सटीक बैठती है। वह खुद को गंगोत्री कालिंदीखाल बद्रीनाथ यात्रा मार्ग तक सीमित नहीं रखते हैं, बल्कि हिमालय क्षेत्र के अन्य भागों के भूगोल पर भी बात करते हैं। अन्य गलों, नदियों, शिखरों, तालों का जिक्र भी इस किताब में हमें मिलता है। केवल गंगा ही नहीं उसकी अन्य बहनों के बारे में भी सोचते हैं और पाठकों को उस बारे में बताते हैं। इस बात पर भी प्रकाश डालते हैं कि गंगा नदी का इतना मान क्यों है पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में। 

वह इस बात पर आश्चर्य व्यक्त करते हैं कि जिस गंगा नदी को हम इतना पवित्र मानते हैं, उसी नदी को प्रदूषित करने से पीछे नहीं रहते हैं। हमने गंगा को दुनिया की सबसे प्रदूषित दर्जन भर नदियों में से एक बना दिया है। वह हमारी आस्था पर भी सवाल उठाते हैं कि आखिर काल्पनिक उद्धार के चक्कर में प्रकृति के सुंदर स्थानों को कब तक गंदा करते रहेंगे? किताब में वह जगह-जगह उच्च हिमालय क्षेत्र और तीर्थ स्थान में आने को लेकर जो विश्वास और मान्यताएं प्रचलित हैं उनका उल्लेख करते हुए उन पर ज़रूरी प्रश्न खड़े करते हैं।

एक प्रकृति प्रेमी के द्वारा लिखा यह यात्रा वृत्तांत हमें हिमालय के चित्ताकर्षक प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर स्थानों को देखने के लिए प्रेरित करता है क्योंकि जगह-जगह शेखर पाठक जी ने उन स्थानों का जिक्र अपने इस यात्रा वृत्तांत में किया है, जहां का जादू उनको बहुत प्रभावित करता रहा है, जो उनके मन में स्थाई स्मृति की तरह पसरी है, जिसे वह हिमालय यात्री की पूंजी कहते हैं, जो सिर्फ बांटने से बढ़ती है। वह लिखते हैं कि खूबसूरत जगहें हमारे मन मस्तिष्क में अपना नाम लिख देती हैं और वह एक कविता, गीत या चित्र की तरह हमारे साथ सदैव रहती हैं।

ऐसी जगहें शायद हममें अधिक मानवीय गुण भरती हैं और प्रकृति के आगे विनम्र होने की समझ देती हैं। यह जगहें आदमी की रचनाएं नहीं हैं। आदमी और उसकी व्यवस्थाओं ने तो उनको कुछ न कुछ नष्ट करने की ज़रूर कोशिश की है| पर आत्मसात भी लगातार किया। एक प्रकृति प्रेमी ही इतनी आत्मीयता, गहरे सौंदर्यबोध और संवेदनशीलता से प्रकृति को देख सकता है।

 

शेखर पाठक साहित्य के गहरे अध्येता होने के चलते इस किताब में स्थान-स्थान पर न केवल चर्चित कविता पंक्तियां या कविता शीर्षकों को याद करते हैं बल्कि खुद कविता सी रचते चलते हैं। जो दृश्य वह रचते हैं, वे पाठक के मन और आंखों दोनों में बस जाते हैं। वह अभिभूत हो उठता है।

  

प्रकृति के प्रति गहरे लगाव के चलते शेखर पाठक, पत्थर मिट्टी के साथ पानी, हवा और सूरज के खेलों को न केवल खुद देखते और आनंदित होते हैं, बल्कि उन खेलों का आनंद पाठकों तक पहुंचाने में भी सफल रहते हैं। कितना सुंदर बिंब खड़ा करते हैं कि पत्थर, मिट्टी, रेत पर पानी का सूरज और हवा के बाजे के साथ गाया जा रहा कोरस आश्चर्य की तरह है। हैलो करती वनस्पतियां। उतार चढ़ाव ... आवाज़ पर भीतर लगातार बोलता हुआ यह विराट गल हमारे सामने था। अब हम सभी इसका हिस्सा हो गये थे। अग्नि से जीवन इसके ऊपर चल रहे थे। ये पंक्तियां बताती हैं कि लेखक कैसे प्रकृति से पूरा तादात्मीकरण स्थापित कर लेता है। तभी वह प्रकृति के रूप, रंग, गंध, स्पर्श, ध्वनि और स्वाद को पाठकों तक पहुंचाने में सफल होता है। इस तादात्म्य का ही प्रतिफल है यह यात्रा वृतांत।

एक अच्छा यात्रा वृतांत तब तक लिखना संभव नहीं है, जब तक यात्रा के दौरान दिखाई देने वाले दृश्यों, घटनाओं, लोगों और प्रकृति को पूरी तरह आत्मसात न कर लिया जाए।

 

प्रकृति का जहां-जहां चित्रण हुआ है, उनको बार-बार पढ़ने और महसूस करने का मन करता है। ऐसा अनुभव होता है कि पंख होते तो अभी उड़ कर वहां पहुंच जाते। ऐसा लगता है कि हम प्रकृति पर लिखी गयी कोई कविता पढ़ रहे हों। वह सही कहते हैं कि मनुष्य के लिए यह ज़रूरी है कि प्रकृति को सुनने के लिए वह स्वयं चुप रहना सीखे।

 

उच्च हिमालय क्षेत्र में पाए जाने वाले भरल, हिमचितुवा, पीली चोंच वाले कौव्वे, दाढ़ी वाले गिद्ध ,गौरैया जैसी घने पंखों वाली चिड़िया, कठफोड़वा, रेड स्टार्ट बड़वा, रोजी पीट, गोल्डन स्टेटस रेड स्टार्ट, चूहा पीक जैसे पशु पक्षियों और कीट पतंगों का जिक्र इस यात्रा वृत्तांत में आता है। कुछ से तो पहली बार परिचय होता है। बहुत सारी ऐसी अजनबी चिड़ियों का भी जिक्र हुआ है, जिनके नाम भले लेखक को पता ना हों लेकिन उनका वह रूप, रंग, आकार, प्रकार बताते हुए चलते हैं। यह वृत्तांत उनके सौंदर्य और आदतों को जानने के प्रति हमें उत्सुकता से भर देता है। भरल तो इस किताब में बार-बार आता है। फूल जैसे सींगों के साथ आता है। उसी तरह कौवा भी। जैसे सहयात्री हो। यात्रा मार्ग में पशुओं को देख लेखक के मन में ये विचार उठते हैं कि हमारे समाज में मासूमियत कम बची है, जो बची हुई थी उसे धूर्त राजनीति में साफ कर दिया है। हम आजकल आक्रामकता से आगे प्रत्यक्ष हिंसा तक चले गये हैं। आदमी की जान की कोई कीमत नहीं। काश हम पशुओं में बची मासूमियत और विश्वास से ही द्रवित हो पाते।

 

एक पर्यावरणविद के नाते वह उच्च हिमालय क्षेत्र में जमा होते जा रहे प्लास्टिक, कूड़ा करकट, शराब और पानी की खाली बोतलों तथा अन्य तरह के अवशिष्ट को लेकर भी अपनी चिंता व्यक्त करते हैं। वह कहते हैं कि हमें सागरमाथा क्षेत्र के लोगों से सीखना होगा कि किस तरह अपने जंगली जीव बचाए जा सकते हैं? कैसे सौर ऊर्जा और केरोसिन का इस्तेमाल कर प्रकृति पर पड़ने वाले दबाव को घटाया जा सकता है? वह बार-बार वहां के लोगों विशेषकर शेरपाओं का उदाहरण देते हैं। इस किताब में बहुत सारे तथ्य भी हमें मिलते हैं। जैसे, गंगोत्री गल का 1818 से आज तक का आंकड़ा देते हैं, जिसके अनुसार 200 सालों में यह गाल 15 किमी से अधिक पीछे गया है। इस तरह के आंकड़े न केवल भविष्य के प्रति डराते हैं बल्कि सचेत भी करते हैं। सोचने को मजबूर करते हैं कि इसी तरह यदि गल सूखते चले गये तो हिमालय से निकलने वाली सदानीरा नदियों का क्या होगा? कहां से उनमें पानी आएगा? एक ओर गल पीछे खिसक रहे हैं दूसरी ओर इस क्षेत्र में पाए जाने वाले नौले, धारे और गधेरे मानवीय उपेक्षा और अनियंत्रित निर्माण कार्यों के चलते सूखते जा रहे हैं जो हिमालय की नदियों को रिचार्ज करने में सहायक होते हैं।

 

प्रकृति के साथ हो रही छेड़छाड़ और जबरदस्ती को लेकर शेखर पाठक सरकारों और समाज से तीखे प्रश्न करते हैं कि सरकारों या समाज को किसी नदी की हत्या करने या अधमरा बनाने का हक किससे मिला था? इस तरह के प्रश्न किताब में जगह-जगह मिलते हैं, जो लेखक की पर्यावरण की प्रति गहरी संवेदनशीलता, सरोकारों तथा चिंताओं को व्यक्त करते हैं। साथ ही वह प्रकृति और समाज में आ रहे बदलावों को रेखांकित करते हैं। उसके कारणों की पड़ताल करने की भी कोशिश हमें यहां दिखाई देती है। शेखर पाठक जी उत्तराखंड में समय-समय पर हुए भूस्खलनों का जिक्र करते हुए पाठकों को याद दिलाते हैं कि जो व्यक्ति, समाज या सरकार प्राकृतिक या अन्य मानव जनित आपदाओं या राजनीतिक तथा आर्थिक आपदाओं को भुलाते हैं, वह उन्हें पुनः पुनः भुगतने के लिए अभिशप्त रहते हैं और आगामी समय में भी रहेंगे। इस तरह वह हमें सचेत भी करते हैं। प्रकृति के साथ हो रही छेड़छाड़ और अवैज्ञानिक दोहन को लेकर एक जिम्मेदार नागरिक के दायित्व का निर्वहन भी करते हैं।

 

इस तरह से यह केवल विशुद्ध यात्रा वृतांत नहीं है, बल्कि अपने समय के सवालों से सीधे मुठभेड़ करता हुआ एक दस्तावेज है। किताब बीच-बीच में घुम्मकड़ी के दर्शन और उसके उद्देश्य पर भी बात करती है और बहुत सारे ज़रूरी सुझाव भी देती है। इन पर विचार किया जाए तो हिमालय क्षेत्र में की जाने वाली यात्राओं को यहां की प्रकृति और संस्कृति की दृष्टि से मित्रवत बनाया जा सकता है। उनकी सार्थकता को बढ़ाया जा सकता है।

 

किताब का 11वां और 12वां अध्याय इस किताब का केंद्रीय हिस्सा है। सबसे अधिक कौतूहल पैदा करने वाला हिस्सा। कुछ इस तरह का दृश्य है...लगातार 24 घंटे से एक ही स्पीड से गिरती हुई बर्फ। बर्फ के कुछ कम होने पर बढ़ती हुई बारिश। चारों ओर होते हुए भूस्खलन। पीछे लौटने और आगे बढ़ने दोनों में खतरा ही खतरा। यात्रा दल के साथियों के दिवंगत होने की घटनाएं। यात्रा दल में थे जो इधर-उधर बिखर चुके थे। कौन आगे गया और कौन पीछे रह गया इसका अंदाजा कोई नहीं कर पा रहा था। सभी इतने आत्म केंद्रित हो गये थे कि कभी-कभी किसी और का ख्याल ही नहीं आता था। पानी काट खाने को आ रहा था। यात्रियों की आंखों में भय था। मौत की आहट बिल्कुल नजदीक से सुनाई दे रही थी। पास में बहती नदी में इतना पानी बढ़ गया था कि वह अपना विकराल रूप दिखा रही थी। ठंड से यात्री थर थर कांप रहे थे। रोशनी बहुत कम हो चुकी थी। कुछ साथियों को दिखाई देना भी बंद हो गया था। कुछ साथियों का सामान नदी में गिर गया था। सामने ही यात्री दल के सदस्यों को ठंड से अकड़ते हुए और दिवंगत होते हुए देख रहे थे। असहाय से कोई किसी को बचाने की स्थिति में नहीं था। सामान भीग कर भारी हो रहा था। कुछ साथी अपने सामान को रास्ते में ही छोड़कर आगे बढ़ गये थे। महीन ओले पड़ रहे थे। फिसलने की संभावना ज्यादा बढ़ गयी थी। चलने की गति भी नहीं बढ़ाई जा सकती थी। सहायता के लिए आईटीबीपी के जवानों के आने की उम्मीद भी खत्म जैसी हो गई थी। पहाड़ के दोनों तरफ से पत्थर ही लुढ़क रहे थे।

 

ऐसा लगता है कि जैसे शेखर पाठक मृत्यु का रेखाचित्र हम लोगों के सामने प्रस्तुत कर रहे हों। इतने नजदीक से मृत्यु का साक्षात्कार अपने आप में दुर्लभ अनुभव है। मौत अट्टहास कर रही है और जीवन उसके सामने दया की मांग कर रहा है। मृत्यु हजार वेश धर रही है। यहां मृत्यु और जीवन जैसे दोनों अपनी-अपनी चालें चल रहे हैं। दोनों ही अपनी अपनी जीत को सुनिश्चित करने की कोशिश कर रहे हों। जीवन, गीत संगीत को मृत्यु से लड़ने के हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रहा है। यह संघर्ष रोमांचित करने वाला भी है और डराने वाला भी। उस संघर्ष का आंखों देखा हाल पाठकों के सामने रखने में वह पूरी तरह सफल रहे हैं। उतार चढ़ाव भरी मनस्थिति का बहुत ही जीवंत और मर्मस्पर्शी चित्रण किया है। जितना बारीकी से बाहर का उससे भी अधिक बारीकी से भीतर का भी। एक उदाहरण देखिए..."मौत हमारे आसपास मंडरा रही थी। वह किसी को भी दबोच सकती थी। यहां आज उसी का राज था। हमारे शरीर लगातार हिमांक के पास थे और हमारे मन मस्तिष्क में भावनाओं का उबाल क्वथनांक से ऊपर पहुंच रहा था।....हम शब्दों में कोई संवाद नहीं कर पा रहे थे। शब्द भी नहीं ढूंढ़ पा रहे थे। शब्द जैसे गायब हो गए थे और भावनाएं जैसे पथरा गई थी। यह लाटा हो जाने की निरीहता थी।....मैंने इतना बदहवास पराजित और हतप्रभ अपने को जीवन में कभी नहीं पाया था। बेचैनी और विडंबना भाव से मचलता मेरा चेतन अवचेतन क्वथनांक को पार कर रहा था। यह हम सब के मानस के ध्वस्त होने जैसा था। हमारा एक साथी हमारे साथ न था। शायद हम सब का मन मस्तिष्क ठहर सा गया था। जैसे एकाएक बिजली चली गयी हो या फ्यूज उड़ गया हो और टॉर्च या दियासलाई पास में न हो।"

 

किताब में यह सारा विवरण पढ़ते हुए भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं। बार-बार मन में यह प्रश्न उठता है कि आखिर इतनी कठिन परिस्थितियों और जान को जोखिम में डालकर कोई भला क्यों यात्रा करने इतने कठिन क्षेत्र में जाते होंगे? कैसे कोई इतनी कठिन परिस्थितियों से बचकर आने के बाद फिर से एक नई यात्रा में निकल पड़ता होगा?

 

यह किताब यात्रा किए जाने के लगभग 12 वर्ष बाद लिखी गई है, लेकिन आश्चर्य होता है कि इतने समय अंतराल के बाद लिखने के बावजूद यात्रा के विवरण इतनी बारीकी से आए हुए हैं। छोटी-छोटी बातों का उल्लेख हुआ है। लगता है जैसे कल की ही बात हो। निश्चित रूप से यह कमाल यात्रा के दौरान डायरी लिखने की उनकी आदत के चलते ही संभव हुआ होगा। यह यात्रा वृत्तांत लिखने वालों के लिए एक सीख है कि यात्रा के दौरान डायरी अवश्य लिखी जानी चाहिए, तभी "हिमांक और क्वथनांक के बीच" जैसी यात्रा पुस्तक संभव हो सकती है। इसी के चलते यह किताब हर आयु वर्ग के पाठकों के लिए इतनी उपयोगी बन पाई है। मैं पाठक जी की जिजीविषा, दृढ़ता, अनुशासन और काम के प्रति गंभीरता की दाद दूंगा कि उन्होंने तमाम प्रतिकूल परिस्थितियों के बीच भी डायरी लिखना नहीं छोड़ा। चलते-चलते थोड़ी देर सुस्ताने के दौरान ही वह डायरी लिखने लग जाते।

 

पुस्तक को पढ़ते हुए कहना पड़ेगा कि शेखर पाठक जी का भाषा को बरतने का अंदाज़ कमाल का है। छोटे-छोटे वाक्यों में बड़ी और गंभीर बात करने वाली भाषा। वह टकसाली भाषा में नहीं लिखते हैं। भाषा के साथ नये प्रयोग करते हैं। संदर्भ के अनुसार उनकी भाषा नये अर्थ देती है। एक सहज प्रवाह है उनकी भाषा में। कविता की तरह दृश्य बिंब खड़े करती हैरूपकात्मकता मन मोह लेती है। एक गद्य काव्य का जैसा आनंद आता है। किताब के नाम सहित, भीतर जितने भी अध्याय हैं, उनके शीर्षक बहुत काव्यात्मक हैं, जो पाठक को बहुत देर तक उस पर सोचने और उसके भीतर प्रवेश करने को आमंत्रित करते हैं। किताब में कहीं कहीं पर लोक बोली के शब्दों का आना भी बड़ा प्रीतिकर लगता है। वैसे शेखर पाठक जी का कहने का अंदाज़ भी कम प्रीतिकर नहीं है! वह बिल्कुल इस तरह से लिखते हैं, जैसे वह बोलते हैं। जिस तरह से उनके व्याख्यान बहुत सम्मोहित करने वाले होते हैं। इस यात्रा वृत्तांत की भाषा भी उसी तरह सम्मोहक है। किस्सागोई के अंदाज़ में अपने साथ बहाकर ले जाते हैं।

 

इस पुस्तक की एक खासियत यात्रा से संबंधित रंगीन एल्बम है, जिसमें चित्र बिल्कुल जीवंत से प्रतीत होते हैं। हिमालय के अभिभूत कर देने वाले सुंदर दृश्य इस एल्बम में मौजूद हैं। वहां के गल, झील,‌ झरनों, हिमाच्छादित शिखरों, जीव जंतु और वनस्पतियों को देखने का प्रत्यक्ष सा आनंद घर बैठे ही ले सकते हैं। अद्भुत फ़ोटोग्राफ़ी है। कुछ ऐसे दुर्लभ जानवरों के फोटो भी हैं, जिन्हें देखने का बहुत सारे पाठकों को पहली बार अवसर मिलता है। इन चित्रों को देखकर यात्रा की दुरूहता और भयावहता को भी अधिक गहराई से समझा जा सकता है। इस पुस्तक के लगभग हर पेज में उपस्थित श्वेत श्याम चित्र भी कम सुंदर नहीं हैं। हर चित्र बहुत देर तक नज़रें गढ़ाए रखने के लिए विवश करता है। हर चित्र सही स्थान पर लगाए भी गए हैं। विवरण और चित्र दोनों एक दूसरे के पूरक की तरह आए हैं।

 

कुल मिलाकर इस पुस्तक में उच्च हिमालय क्षेत्र की प्राकृतिक सुषमा, यात्रा मार्ग की दुरूहता, साहसिक यात्राओं का रोमांस, उनकी कठिनाइयां, आसन्न मृत्यु की भयावहता, उससे लड़ने की जीवटता, साहस, प्रयत्न, जीवन की जिजीविषा, उम्मीद, हताशा, उत्साह जैसे मनोभावों के तमाम शेड्स, जीवन के अंतर्द्वंद्व, जीवन दर्शन, विकास और पर्यावरण का संघर्ष, इस तरह के तमाम भावों, विचारों और इंद्रियबोधों से इस किताब में गुज़रना होता है। एक ऐसी किताब जो बार-बार पढ़ने को आमंत्रित करती है और हर बार पहली बार पढ़ने सा आनंद देती है। कहीं-कहीं इसे पढ़ते हुए किसी हॉरर फ़िल्म को देखने जैसी अनुभूति होती है। दिल की धड़कन बढ़ जाती है। यह एक मुकम्मल यात्रा वृत्तांत है। इस सब के बावजूद इस किताब में बहुत कुछ आने से रह गया होगा जिसके बारे में खुद शेखर पाठक किताब में एक स्थान पर लिखते हैं, "बहुत कुछ हम सतत यात्रियों की आंखों और अनुभव में आने से इस बार भी रह जाएगा। हम कायनात के कुछ हिस्से ही देख पाते हैं और समझ तो और भी कम को पाते होंगे। कुछ रह भी जाना चाहिए। पूरी प्रकृति का डॉक्यूमेंटेशन मनुष्य द्वारा संभव नहीं है और यह उसे पा भी नहीं पाएगा।

 

महेश चन्द्र पुनेठा

आदरणीय महेश चन्द्र पुनेठा जी एक चिंतक, शिक्षाविद और वरिष्ठ साहित्यकार हैं जो पढ़ने की संस्कृति के विकास, भयमुक्त और रचनात्मक शैक्षिक वातावरण और शैक्षिक दखल के अपने प्रयासों के लिए जाने जाते हैं, इनकी कवितायें संवेदित करने वाली और नींद से जगाने वाली रहती हैं, ऊपर आपने देखा कि पुस्तक समीक्षा इतनी जीवंत और समावेशी है कि बस तुरंत पुस्तक पढ़ने की तीव्र अच्छा उत्पन्न हो जाए| लेखक के बारे मे विस्तार से जानने के लिए यहाँ पर क्लिक करें |


आइए पढ़ते हैं, समझते हैं और साझा करते हैं |

शुभकामनाएँ

-लवकुश कुमार

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अंतस - लवकुश कुमार : पुस्तक परिचय

यह मेरी पहली साहित्यिक पुस्तक है, जो मेरे कुछ पुराने और कुछ नए लेखों का संकलन है और साथ ही इसमें शामिल हैं अतिथि लेखकों की कुछ बेहतरीन रचनाएं |

यह पुस्तक समर्पित है "उन सभी साहसी लोगों को जो सच्चाई का साथ देने और उसे अभिव्यक्त करने की जरूरत को सुविधा से ऊपर रखते हैं |"

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“यह एक ऐसी किताब है जो आपका ध्यान उन बातों की ओर ले जाएगी, जो न केवल आपकी दुविधाओं और भ्रम को दूर करेंगी, बल्कि आपको जीवन, दुनिया और स्वयं के बारे में ऐसी स्पष्टता देंगी कि आप एक साहसी और आत्मविश्वासी इंसान बनकर जीवन को बेहतर ढंग से जी सकें।”

मेरा मानना है कि यह पुस्तक विशेष रूप से उन विद्यार्थियों के लिए उपयोगी सिद्ध होगी जो निर्णय लेने, जीवन को समझने और दुनिया व उसकी व्यवस्थाओं को समझने में दुविधा या कठिनाइयों का सामना करते हैं।

भारत के अग्रणी शैक्षणिक संस्थानों और कार्यालयों में प्राप्त अनुभवों के साथ-साथ एक पाठक, चिंतक और ब्लॉगर के रूप में लेखक का अनुभव और ज्ञान भी पाठकों के लिए उपयोगी सिद्ध होगा।

इस पुस्तक में कई विषयों पर समझ को विस्तार देने एवं जरुरी मुद्दों की तरफ ध्यान देते हेतु निम्नलिखित विषयों पर लेख शामिल हैं :

पढ़ने लिखने की संस्कृति पर
आवश्यकता
लेखक के बारे में
स्वीकारोक्ति
प्रस्तावना
भूमिका
पावती (स्वीकृति)
साहित्य और मानविकी अत्यंत जरूरी
मुद्दे और विषय जिन्हे संबोधित करने का प्रयास किया
1.
कार्य को सम्मान और जरूरी श्रेय
2.
कार्य को व्यवहार से ऊपर रखना
3.
आपसी सम्मान की नींव
4.
अभिव्यक्ति के लिए माहौल
5.
शरीर नहीं, कार्य से हो आंकलन और उससे भी पहले मानव
होने की गरिमा
6.
हमारे आदर्श और युवा
7.
क्या हमारे अंदर कोई तानाशाह है ?
8.
ईमानदारी की रक्षा
9.
लिखना, अपना पक्ष रखना, सही बात को आगे बढ़ाना जरूरी
क्यों: एक सोंच
10.
लिखने के फायदे- एक संक्षिप्त समीक्षा
11.
साहित्य जरूरी क्यों?
12.
दोहराव - एक लघुकथा
13.

सड़क हादसों पर एक लघुकथा - थ्रिल
14.
उपदेशक, जरूरत जाँचें
15.
गलतियाँ और तिरस्कार
16.
नवाचार का माहौल
17.
क्या देर हो गयी ? जीवन अर्थहीन लग रहा ?
18.
जीवन में कुछ अच्छा करना चाहते हैं? तरीका ?
19.
मधुरिमा, चेतन और करप्सन - एक लघुकथा
20.
पड़ोसी की दिक्कत आपकी दिक्कत बन सकती है
21.
मेरे सपनों की दुनिया
22.
अपनी बात या अनुभव लिखने/कहने मे संकोच?
23.
कितनों को प्रोत्साहित किया आपने ? और आपको ?
24.
प्रशंसा एक टॉनिक
25.
कठिन परिस्थितियों में चीजों की परीक्षा
26.
युवाओं द्वारा आत्महत्या ! एक पड़ताल, एक नजरिया
27.
सम्यक जीवन और प्राथमिकताएं -1
28.
सम्यक जीवन और प्राथमिकताएं -2
29.
सम्यक जीवन और प्राथमिकताएं -3
30.
सम्यक जीवन और प्राथमिकताएं -4
31.
अध्ययन को लेकर रुझान, बात अंदर की

32.
दूसरों की परवाह या खुद को आराम
33.
मानव व्यवहार और समाज
34.
जिम्मेदारी और जवाबदेही का भाव
35.
Hatsapp स्टेटस
36.
दो टूक और वन लाइनर
37.
नाम में क्या रखा है ! वाकई ?
38.
जिंदगी को अर्थ और एडवेंचर देना चाहते हो- एक विकल्प
39.
ठसक वाला जीवन एक समाज सेवा
40.
सच बोलने वाले लोग कम क्यों दिखते हैं ?
41.
सुकून के पल और सृजन
42.
सियाटिका- एक लघुकथा
43.
पिता – एक लघुकथा
44.
केवल आप ही सही !
45.
केवल मीठा सुनने की आदत है ?
46.
अपनी बात समझना
47.
सड़क दुर्घटना
48.
वादा
49.
कुछ अन्य सवाल
50.

पढ़ने की संस्कृति का अभाव
51.
पुरस्कार न लेने का निर्णय
52.
अंतस से सवाल करती कविताएं
53.
बाल विज्ञान खोजशाला
कुछ बेहतरीन पुस्तकें
कुछ बेहतरीन फिल्में
कुछ बेहतरीन कविताएं
उद्धरण - डॉ विजय अग्रवाल
उद्धरण - शिक्षा के सवाल
उक्तियाँ - आचार्य प्रशांत
स्पष्टता और समझ के लिए उक्तियाँ

पुस्तक की शुरुआत होती है - कवि भवानी प्रसाद मिश्र एवं - कवि महेश चन्द्र पुनेठा की कविताओं से जो क्रमशः इस प्रकार हैं 

कुछ लिख के सो,
कुछ पढ़ के सो,
तू जिस जगह जागा सवेरे,
उस जगह से बढ़ के सो
- कवि भवानी प्रसाद मिश्र

मैं न लिख पाऊँ एक अच्छी कविता
दुनिया एक इंच इधर से उधर नहीं होगी
गर मैं न जी पाऊँ कविता
दुनिया में अंधेरा कुछ और बढ़ जाएगा
इसलिए मेरी पहली कोशिश है
कि मरने न पाए मेरे भीतर की कविता।
- कवि महेश चन्द्र पुनेठा

देखते हैं 

भूमिका

"चाहत है तो उस चाहत को पूरा करने के लिए माहौल
बनाने पर भी  काम करना होगा|"


हम सब चाहते हैं ऐसा समाज जिसमे
 लोग अपना काम बहुत अच्छे से कर रहे हों
 लोग अपने काम से काम रखते हों और एक दूसरे को
परेशान न करते हों
 सड़कों पर लोग नियम से चल रहे हों, दुर्घटनाएँ कम से
कम हों
 सभी अपना काम ईमानदारी से कर रहे हों
 लोग अपने वादों पर खरे उतरते हों
 लोग किसी को उसकी जाति, समुदाय, वंश, शारीरिक
सुंदरता से न पहचान उसे उसके काम से पहचानते हों
 अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करने का अवसर सबको मिलता
हो

 लोग नयी जगह भी सुरक्षित महसूस करते हों
 लोग एक दूसरे से सलीके से और प्रेम के साथ पेश आयें
 लोग अपने अधिकार के साथ अपने कर्तव्यों को भी समझें
 लोग अपनी स्वतन्त्रता का दुरुपयोग न करें
 लोग कमजोर पर हसने के बजाय उनके साथ करुणा का
बर्ताव करें
 तकलीफ मे फंसे इंसान को यथासंभव मदद मिले नाकि
लोग खड़े होकर बस वीडियो बनाएँ
 काम करने वाले को काम का श्रेय दें नकि चापलूसी करने
वाले और बातें बनाने वालों को
 सबको उनके हिस्से का श्रेय और प्रतिष्ठा मिले
 हिंसा का स्थान न हो, लोगों को आजादी हो "न" कहने की
 स्वतन्त्रता हो जबरदस्ती नहीं, सबसे उनका पक्ष या
अनुभव सुना जाए
 साझा हितों के कार्यक्रमों मे सभी साझेदारों से उनकी राय
जानी जाये और उसे उचित स्थान भी दिया जाए
 शिक्षकों का उचित सम्मान हो
 लोग एक दूसरे का आंकलन सतही बातों पर न करें
 अपराध कम से कम हों
 मजबूत द्वारा कमजोर का शोषण न हो
 भेदभाव न हो, परिवारवाद न हो
 ज्यादा से ज्यादा लोगों में अपनी गलती स्वीकार करने का
और ज़िम्मेदारी लेने का साहस हो
इत्यादि
आइए देखते हैं कि क्या दिक्कतें हैं कि कई जगहों पर ऐसा
नहीं हो पा रहा और ठहरकर अवलोकन करें कि कहीं हम
स्वयं ही तो अंजाने मे गलत उदाहरण पेश कर उस माहौल को
बिगाड़ रहे हैं, जिसमे जरूरी मानवीय मूल्य फलते फूलते हैं |
स्वयं मे झाँकने का प्रयास, प्रयास विरोधाभासों को
पकड़ने का, अगर दिक्कत को हल करना है तो पहले उसे
समझिए|

 

भूमिका से एक अनुमान लग सकता है पुस्तक की सामग्री का, अब देखते हैं कुछ लेख जो इसकी भाषा शैली का कलेवर प्रदान करेंगे :

कार्य को व्यवहार से ऊपर रखना

“नम्र व्यवहार और ईमानदार कार्य किसी भी व्यक्ति को

सम्मान दिलाते हैं।”
— डेल कार्नेगी

लोगों से बात करते वक़्त आपको सुनने को मिल सकता है
कि मैंने काम खूब किया लेकिन श्रेय नहीं मिला, श्रेय तो
अमुक इंसान को मिल गया क्योंकि वो अमुक, साहब/रिश्तेदार
के हाँ मे हाँ मिलाते रहता हैं उनका मनोरंजन किया करता है!
आइए कुछ चीजों पर गौर करते हैं: यदि इसे पिछले
अध्याय से जोड़ें तो हम पाएंगे कि जब इंसान कर्म को उचित
स्थान नही देता अपने जीवन मे, तो वह कर्म करने वाले को
कैसे उसका श्रेय दे सकता है ? दूसरा अगर कोई इंसान
चापलूसी पसंद है, उसे हर वक्त अपने आस पास चापलूसों की
भीड़ चाहिए हो जो उसके अहम को पुष्ट कर उसका मनोरंजन
कर सकें, फिर ऐसे इंसान के लिए अपने चापलूसों को नाराज
कर पाना संभव नही हो पाता, क्योंकि वह उनकी
अनुपस्थिति मे खुद को महत्वहीन और अकेला महसूस करता
है, इसीलिए वह इस भावनात्मक दबाव कि कहीं वह अकेला
न पड़ जाए, किसी के कार्य का श्रेय किसी और को दे देता है |
एक और कारण हो सकता है की कार्य कि गुणवत्ता का
आंकलन कर पाने कि क्षमता का न होना, नतीजतन ऐसे लोग
व्यवहार के आधार पर लोगों का मूल्यांकन करते हैं और यह
भूल जाते हैं कि जो इंसान खूब काम करता हो, उसके लिए
अपने व्यवहार को संयत रखना या मीठी मीठी बातें करना
अपेक्षाकृत मुश्किल होता है, उन लोगों की अपेक्षा जिनकी

दिनचर्या का अधिकतम वक़्त ही मन बहलाने वाली और
टाइम पास बातें करना होता है|
अगर इसकी तह तक जाएँ तो मेरे ध्यान मे दो बातें आती
हैं पहला कि कार्य को और उसकी गुणवत्ता को जीवन मे
उचित स्थान मिले और दूसरा

कार्य पहले और व्यवहार बाद
में का उसूल  आपके पास कोई और उपाय हो तो लिख भेजें 


काम स्वयं मे पुरस्कार है, नकि पुरस्कार पाने का रास्ता
- डॉ विजय अग्रवाल

 

अभिव्यक्ति के लिए माहौल


असहमति से असुरक्षा की भावना पैदा होती है, लेकिन
इसे व्यक्त करना जरूरी ताकि इस बार बात हो सके और
एकमत होने की संभावनाओं पर विचार भी |
किसी काम को करने मे कितनी सहजता होगी यह इस
बात पर निर्भर करता है कि काम करने वाला व्यक्ति किस हद
तक उस काम के पीछे के तर्क से सहमत है, यदि कोई
असहमति है तो असहजता भी होगी और उसका प्रतिकूल
प्रभाव कार्य की गुणवत्ता पर पड़ेगा, इसीलिए जरूरी है हम
उस इंसान की असहमति, दिक्कतों को सुनें, उसे अपनी बात,
दृष्टि, समझ और मत को अभिव्यक्त करने के लिए प्रोत्साहित
करें, और जब वह अपनी बात रख रहा हो तो उसे बिना बीच
मे टोंके, उसकी पूरी बात सुने और जहां पर आप असहमत हों
वहाँ विनम्रतापूर्वक उस असहमति को दर्ज करने और सामने
वाले व्यक्ति से अपनी बात फिर से समझाने का आग्रह करें
और उसकी बातों को उसकी पृष्ठभूमि से जोड़कर समझने का
प्रयास करें, खुद को उसकी जगह रखकर सोंचे|
अभिव्यक्ति का माहौल तब ही बनता है जब हम सामने
वाले इंसान की बातों को इत्मीनान से सुनें और बिना किसी
पूर्वाग्रह के उसकी भावनाओं की कद्र करते     हुये, उस इंसान
पर बिना कोई लेबल लगाए, बात की जड़ मे जाकर उससे
अपनेपन के साथ बात करते हैं |

असहमति से असुरक्षा की भावना पैदा होती है अतः इस
पर बात करें और इस बात का ध्यान रखें कि दो लोग साथ
क्यों हैं, माने वो साझा हित क्या हैं या फिर जिन बिन्दुओं पर
पहले ही सहमति है उनका महत्व क्या है आपके जीवन में,
इस तरह असहमतियों पर बात करना सहज होगा|
एक बात और जोड़ना चाहूँगा कि अगर हमे किसी का
सहयोग चाहिए तो उसकी बात और नजरिए को भी उचित
स्थान देना जरूरी है, यदि हमने उसकी बात को सिरे से नकार
दिया तब तो उसे यही लगेगा कि वो उस काम मे हितधारक
ही नहीं, इसीलिए चर्चा जरूरी है
और जब सारे संशय दूर होते हैं तो कार्य हो या उस इंसान
का साथ, हमे पूरा मिलता है और इससे जन्म होता है सुरक्षा
की भावना का|
“जहाँ सम्मान होता है, वहाँ विश्वास भी जन्म लेता है।”

— महात्मा गांधी

 

आशा है कि पुस्तक अपने अभीष्ट उद्देश्य को पाए, मैं अपने प्रयास में कितना सफल रहा, यह आपकी प्रतिक्रिया से ही पता चलेगा, इंतज़ार रहेगा|

आपका लवकुश 

ईमेल आई डी - lovekush@iitdalumni.com

Lovekushchetna@gmail.com

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