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अनारको के आठ दिन: पुस्तक परिचय सह समीक्षा - अंकित मिश्रा

पुस्तक का नाम – अनारको के आठ दिन

लेखक - सत्यु

"अनारको का बहुत बहुत मन था कि पापा से कहे. पापा एक सवाल और पूछूं? और फिर पूछे कि आप जब भी कोई चीज जानते नहीं तो यह क्यों कह देते हैं कि उल्टा सवाल मत कर|"

 

प्रस्तुत पुस्तक में इसी प्रकार से बच्चों के सवालों, उनकी जिज्ञासाओं के उठने, अपने आसपास के माहौल को देखने, चल रही प्रक्रियाओं के कारण को समझने से जुड़े अनुभवों और बच्चों के इन व्यवहारों पर माता-पिता, विद्यालय और समाज की प्रतिक्रियाओं को बड़े ही सुन्दर तरीके व्यक्त किया गया है।

 

इस पूरे कथानक की नायिका अनारको है जो हर बात को जानने को जिज्ञासु है। लेखक ने कथानक को कुछ इस तरह बुना है कि अधिकतर बातें अनारको के सपनों में पूरी हो जाती हैं जो अलग-अलग दिनों में घटित होते हैं।

 

पहले दिन में उससे कहा जाता है कि लोटे में पानी लेकर ठाकुर जी को चढ़ा आओ तो वह सवाल करती है कि ठाकुर जी को पानी चढ़ाना या उन्हें खुश करना क्यों जरुरी है? फिर दादी के बताने पर कि ठाकुर जी तो पेड़ पौधे, कंकर पत्थर में हर जगह हैं, वह तर्क रखती है तो क्या मैं ये पानी बाहर भिंडी के पौधे में डाल दूँ।

 

दूसरे दिन में स्कूल की प्रक्रियाओं पर मछलियों की एक सभा द्वारा सवाल उठाये गए हैं जो बच्चों को मशीनीकृत वातावरण या अनुशासन के नाम पर दंडात्मक विधानों, कई तरह की बंदिशें लगाये जाने की ओर उन्मुख करते हैं। कई विद्यालयों में भी ऐसी बातें दिख जाती हैं नहीं अनुशासन के नाम पर बच्चों को बोलने की आजादी नहीं दी जाती। सवाल पूछने वाले बच्चों को अक्सर डांट मिल जाती है या उनके सवालों को टाल दिया जाता है। ऐसे ही एक विद्यालय में बच्चों से बातचीत के दौरान उनका बोलना ऐसे हो रहा था जैसे वे किसी खेल में बोल रहे हों और उनकी बात दूसरा सुन नहीं सके। "जबकि मध्यावकाश में उनकी आवाज में जबरदस्त तेजी देखने को मिली|

बच्चे हां या ना बोलने में सकुचा रहे थे। पूरी कक्षा एक दम शांत-शांत थी।"

 

तीसरे दिन में सामाजिक ताने-बाने और "पर उपदेश कुशल बहुतेरे" की समस्या दिखाई गई है जिसमें पितृसत्तात्मक परिवारों में जेंडर आधारित भेदभाव पर तंज कसा गया है। अनारको घर से भाग रही है तो गोलू के पापा उसे कहते हैं कि अपनी मौसी को भेज देना, नल आ रहा है, पानी भर ले आकर, जबकि वे खुद नल के पास में ही लेटे हुए हैं, लेकिन पानी भरना या घर से जुड़े काम तो केवल महिलाएं ही करेंगी, वे उठकर पानी नहीं भर सकते।

हमारे समाज में जेंडर आधारित भेदभाव एक बड़ी समस्या है, जिसमें समाज ने लिंग के आधार पर कामों का बंटवारा कर दिया है। कामाने घर से बाहर सिर्फ पुरुष ही जाएंगे और घर के कामों को महिलाएं ही करेंगी, ऐसी सोच और व्यवस्था हमारी सामाजिक और आर्थिक उन्नति के लिए बाधक है। साथ ही ऐसे लोगों की भी कमी नहीं जो खुद भले ही गलत व्यवहार करें लेकिन दूसरों को उपदेश देने में कोई कसर नहीं छोड़ते

 

चौथे दिन के सपने के माध्यम से विभिन्न सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक मुद्दों पर बात की गयी है। हमारे समाज में अमीर-गरीब और ऊँच-नीच की जो खाई है वह समाज के लिए घातक है, इस पर बात की गयी है|

लेखक के ही शब्दों में अनारको ने देखा "जो ज्यादा अच्छे कपड़े पहने था वह ज्यादा बदमाशी कर रहा था।"

 

अनारको ने बहुत से लोगों ऐसे देखे थे। ऐसे- सब उन जैसे लगते थे जो गर्मी की दोपहर में कहीं से आकर घर के बाहर बैठे रहते थे और जब अनारको उनको पीने के लिए गिलास भरकर पानी देने जाती तो हमेशा मुँह के पास हाथ ले जाकर कहते 'डाल दो गुड़िया' कभी गिलास को हाथ में नहीं लेते

 

पांचवें दिन में शिक्षा के उद्देश्य और आकलन को बेहतर तरीके से समझाया गया है। मम्मी के ये कहने पर कि पास होकर अच्छी नौकरी की जा सकती है तो अनारको कहती है कि ये काम तो मैं फेल होकर भी कर सकती हूँ। और यह कौन तय करता है कि कौन पास होगा और कौन फेल और यह तय करना जरुरी क्यों है? साथ ही आकलन के लिए अपनाई जाने वाली प्रक्रियाएं क्या समझने में ठीक तरह से मदद कर पाती हैं कि किसने क्या सीखा?

 

छठवें दिन में भूतों को लेकर समाज में व्याप्त अंधविश्वासों और बच्चों पर इनके प्रभाव को दर्शाया गया है। पहाड़ी सन्दर्भ में तो यह समस्या और बड़ी है। यहाँ तो बच्चे ढेरों ऐसी कहानियाँ जानते हैं जो भूतों के बारे में हैं। अमूमन इस अवधारणा की शुरुआत बाल्यकाल में ही हो जाती है। पालन पोषण के दौरान बच्चों को अलग-अलग तरीके से भय दिखाया जाना हमारी परम्पराओं में शामिल रहा है। जैसे शाम हो गयी, बाहर न जाना, नहीं तो भूत पकड़ ले जायेगा| इन बातों का बच्चों पर बहुत प्रभाव पड़ता है।

 

सातवें दिन में भी बहुत ही संवेदनशील बात को उकेरा गया है। बच्चों को अक्सर प्रदर्शन की वस्तु मान लिया जाता है। जैसे घर में कोई मेहमान आया तो बच्चों से कहा जाता है कि पोयम सुनाओ, डांस करो आदि। इस दिन प्रधानमंत्री आने वाले हैं तो सब लगे हैं उनकी आवभगत के लिए। घंटों के लिए सड़कों पर रास्ते बंद कर दिए जाते हैं और लोगों को कितनी परेशानी झेलनी पड़ती है।

 

आठवें दिन में किसी नई वस्तु के बारे में बच्चों की जिज्ञासा किस कदर बढ़ जाती है, वे वस्तु विशेष के बारे में जानने के लिए कई तरह के यत्न करते हैं। यह बात पुस्तकों के बारे में बहुत अच्छे से लागू होती है। कोई पुस्तक जब बच्चे को अच्छी लग जाए तो वह उसे पढ़े बिना नहीं रहेगा। लेकिन इसके लिए जरुरी है बच्चों को किताबों में रूचि पैदा की जा सके।

 

अनारको के आठ दिन पुस्तक बच्चों के व्यवहार, उनके कल्पना संसार, उनकी जिज्ञासाओं तथा हमारे कौन से व्यवहार बच्चों को पसंद नहीं आते, यह समझने के लिए बहुत ही उपयुक्त है।

-अंकित 

 

अंकित  मिश्रा जी हिन्दी विषय के विद्यार्थी हैं| उनका काम कक्षा- कक्ष में ऐसे हिन्दी शिक्षण को लेकर उन्मुख है जिसमें भाषाई कौशलों की सर्वोत्तम स्थिति बच्चों को हासिल कराई जा सके| उन्हें सम- सामयिक विषयों पर कविताएँ लिखना भी पसंद है|


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मानव हो, न मानविकी से दूर रहो (कविता) - लवकुश कुमार

मानव होन मानविकी से दूर रहो

पढ़ो तुम विज्ञान, लेकिन समझना समाज को भी

ताकि कर सको आविष्कार,

समाज के स्थायित्व के लिए |

है जरूरी गणित,

आदान-प्रदान और विज्ञान तथा आकाश मे यात्राओं के लिए,

लेकिन पढ़ो तुम साहित्य भी,

ताकि हर यात्रा को एक उचित उद्देश्य दे सको

मानव हो, न मानविकी से दूर रहो |

पढ़ो तुम सांख्यिकी और जुटाओ आकड़ें,

इंसान की व्यवस्थाओं और दिक्कतों को समझकर

हल करने के लिए,

लेकिन भूल न जाना साहित्य और इतिहास की ओर रुख करना

जो तुम्हें, वाकिफ कराएगी इंसान की आकांक्षाओं, व्यवहार और असली जरूरतों से

मानव हो, न मानविकी से दूर रहो|

तुम भौतिकी भी पढना, रसायन शास्त्र और जन्तु विज्ञान भी,

लेकिन साथ मे समझना कला और सुंदरता को भी,

ताकि जान सको इंसान के जीवन मे सहूलियत और सुरक्षा के साथ

सृजनात्मकता, अभिव्यक्ति, उत्साह और रचनात्मकता के महत्व को भी,

इंजीनियर बनो, डॉक्टर बनो और साथ मे बनना एक संवेदनशील इंसान भी,

ताकि अपने काम के केंद्र मे रख सको, काम से मिलने वाला आनंद,

ना कि कभी ना ख़त्म होने वाली नंबर वन बनने की भूख,

इसके लिए जरूरी है की आप उनकी भी कहानियाँ पढ़ो

जिनसे कभी मिले नहीं, जिनके बीच कभी रहे नहीं,

ताकि जान सको उनकी भी तकलीफ़ें और समझ सको

उनकी व्यवहार के पीछे की परिस्थिति, आकांक्षाओं और प्राथमिकताओं को भी,

और तब कहीं जान पाओगे कि जीवन के उद्देश्य मे केवल आराम,

मन मुताबिक इंसान और चीज़ों का पाना ही नहीं होता,

इसमे हो सकता है समाज मे असमानता को कम करना,

और लोगों को गरिमामय जीवन देकर, 

अच्छा स्वास्थ्य और आवास देकर

उनके चेहरे पर मुस्कान और जीवन मे उत्कृष्टता लाना भी |

बन जाना तुम वकील, पढ़कर कानून की किताबें,

लेकिन न भूलना इतिहास और मनोविज्ञान की आधारभूत समझ हासिल करना

ताकि समझ सको कि हम यहाँ तक कैसे पहुंचे और भावनाओं मे बहकर या दबाव और लालच मे आकर किये गए अनुचित के समर्थन,

ने हमे कहाँ लाकर खड़ा कर दिया है !

ताकि बचा सको खुद को किसी अनुचित इंसान को समर्थन देने से,

क्योंकि जिसे इंसान मज़बूरी कहता है, वह एक चुना हुआ विकल्प होता है,

जिसमे इंसान अपने क्षुद्र स्वार्थों और सुविधा के चलते समाज मे अन्याय होने के रास्ते को अनजाने में समर्थन दे देता है,

और भूल जाता है कि इस तरह यदि संघर्ष और मानवीय मूल्यों के ऊपर हर कोई सुविधा को तरजीह देने लगे तो एक दिन भारी असुविधाओं और दिक्कतें उसे भी घेर सकती हैं,

इस बात को और अच्छे से समझना है तो मानविकी से ना दूर रहो|

बन जाना तुम एक प्रशासनिक अधिकारी

पर साथ मे बनना समाज के अध्येता भी, 

हो सकता है कि तुम्हें अधिकारी बनने

मे वक़्त लग जाए, 

लेकिन एक बात तय होगी कि तुम

लोगों को उनकी परिस्थितियों के प्रकाश मे देख पाने मे सक्षम होगी

और ले पाओगी ऐसे निर्णय जो लोगों में प्रेम,

उम्मीद और विश्वास जगा सकें

ना कि नफरत और निराशा के भाव,

मानव हो, न मानविकी से दूर रहो |

बन सको तो शिक्षक बनना,

बस एक बात याद रखना

अपने विषय तक सीमित न रहना,

समझना मानविकी के विषयों को भी

माने साहित्य, इतिहास, दर्शनशास्त्र, भाषाविज्ञान, धर्म, और कला,

ताकि वक़्त जरूरत अपने विद्यार्थियों के समग्र और समावेशी विकास

और आलोचनात्मक रूप से सोचने मे योगदान दे सको,

ताकि सुनिश्चित हो सके,

समाज मे मनुष्य की सांस्कृतिक और बौद्धिक विरासत का अध्ययन

मानव हो, न मानविकी से दूर रहो|

बन जाना तुम उद्यमी और व्यापारी,

लेकिन वक़्त रखना, आध्यात्मिक अध्ययन के लिए भी,

ताकि समझ सको कि पैसे का उद्देश्य,

केवल काम और संपत्ति का विस्तार ही नहीं,

इसे अध्ययन और समसरता के प्रसार मे भी लगाया जा सकता है,

और समझ लेना इस बात को भी कि भोगने से शांति नहीं मिलती

शांति मिलती है, चाहत के मिटने से,

व्यापार करना सामान का, ना कि विश्वास, असुरक्षा और दिखावे का

मानव हो, न मानविकी से दूर रहो |

तुम जरूर समझना कि आकाश नीला क्यों होता है,

और कैसे होता है चंद्रग्रहण और सूर्यग्रहण,

लेकिन मत चूकना तुम यह समझने  से कि इंसान कैसे सोचता है,

कैसे व्यवहार करता है, और कैसे करता है अपनी अभिव्यक्ति,

क्योंकि ये जाने बिना तुम अपने विज्ञान का एक सीमित उपयोग

ही कर पाओगे, इंसान की मदद करने में

मानव हो, न मानविकी से दूर रहो |

लोगों ने अपनी जीवन को निचोड़ा है साहित्य कोश को समृद्ध करने को,

ताकि न चूकें हम विभिन्न संस्कृतियों को समझने,

आलोचनात्मक रूप से सोचने और मानवीय अनुभवों

यथा सुख-दुःख, प्रेम-घृणा की गहरी समझ विकसित करने में,

इसीलिए आओ जरा संग करो उनका भी,

जो अब नहीं हैं हमारे बीच, लेकिन उनकी लेखनी है मौजूद,

लगता है अच्छा किसी का साथ और बातें तो किताबों की खिड़की में भी झाँकों,

इसमें भी है एक साथी जिससे आप कह सकती हैं कि,

आपसे मिलकर, आपको पढ़कर अच्छा लगा,

और इस तरह तय करना एक रास्ता,

एक संवेदनशील, करुण और साहसी इंसान बनने का,

मानव हो, न मानविकी से दूर रहना |

लवकुश कुमार


कवि भौतिकी में परास्नातक हैं और उनके लेखन का उद्देश्य समाज की उन्नति और बेहतरी के लिए अपने विचार साझा करना है ताकि उत्कृष्टता, अध्ययन और विमर्श को प्रोत्साहित कर देश और समाज के उन्नयन में अपना बेहतर योगदान दिया जा सके, साथ ही वह मानते हैं कि सामाजिक विषयों पर लेखन और चिंतन शिक्षित लोगों का दायित्व है और उन्हें दृढ़ विश्वास है कि स्पष्टता ही मजबूत कदम उठाने मे मदद करती है और इस विश्वास के साथ कि अच्छा साहित्य ही युवाओं को हर तरह से मजबूत करके देश को महाशक्ति और पूर्णतया आत्मनिर्भर बनाने मे बेहतर योगदान दे पाने मे सक्षम करेगा, वह साहित्य अध्ययन को प्रोत्साहित करने को प्रयासरत हैं, 

जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना आपके जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट ।


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 चिम्मी और जिम्मी ( समझ को विस्तार देने वाली बालकथा ) - मीरा जैन

चिम्मी खरगोश ने जब से होश संभाला स्वयं को चाची के साथ छोटे से बगीचे की मुलायम घास पर या फिर बारिक तारों से बने पिंजरे में ही पाया।

बाहर की दुनिया से वह बिल्कुल अंजान था, दोस्त के नाम पर केवल घर की मालकिन अर्थात् चाची ही थी| चाची उसका पूरा ख्याल रखती थी उसे नहलाती धुलाती , खाना खिलाती यहां तक की उसके साथ खूब खेलती भी थी इसीलिए चिम्मी को कभी अकेलापन महसूस नही होता फिर भी बाहर की दुनिया देखने की लालसा उसके मन में सदैव बनी रहती , सोचता- ' चाची तो ले नहीं जाती हैं कभी मौका मिला तो बाहर अकेले ही घूम आऊंगा'

यूं तो वह हमेशा खुश रहता किंतु जब भी पड़ोसी के भारी-भरकम कुत्ते जिम्मी पर नजर पड़ती तो उसका डील-डौल और आंखें देख यह सोच डर जाता कि कभी इसे मौका मिला तो निश्चित ही मुझे खा जाएगा, इसीलिए वह कभी जिम्मी की ओर देखता ही नहीं, कभी अनायास उससे नजरें मिल जाती तो भयभीत हो जाता। अपने और चाची में मस्त चिम्मी आराम से अपना जीवन व्यतीत कर रहा था। लगभग यही बंधी बंधाई जिंदगी जिम्मी की भी थी फर्क बस इतना था उसका मालिक दोनों टाइम उसे बाहर घूमाने ले जाता , बस ! यही बात चिम्मी को अखरती कि चाची उसे भी बाहर घूमाने क्यों नहीं ले जाती है ?

       एक दिन की बात है चिम्मी, चाची के साथ बगीचे में उछल-कूद कर ही रहा था तभी अचानक चाची से मिलने कोई आ गया, चाची गेट खोल उससे बात करने लगी ही थी कि मौका देख चाची से नजर बचाते हुए चिम्मी बिना सोचे समझे चुपचाप गेट से बाहर निकल गया और सामने खुला मैदान देख दौड़ लगा दी, अपनी इस सफलता पर वह फूले नहीं समा रहा था उसे ऐसा महसूस हो रहा था कि जैसे सारा जहां उसके कदमों में समा गया है। 

          कुछ देर पश्चात चाची को चिम्मी का ध्यान आया उसे बगीचे में न पा वह चिंतित हो गई और उसे घर से लेकर आस-पास बाहर तक ढूंढ लिया किंतु वह कहीं नजर नहीं आया , चाची को समझ में आ गया कि गेट खुला था और वह बाहर कहीं दूर निकल गया है, चाची उसके जान के खतरे को भांप पसीने से तरबतर गेट बंद कर उसे ढूंढने निकल पड़ी। 

            चिम्मी यहां-वहां कुलाचे भर ही रहा था कि सड़क के एक कुत्ते की नजर उस पर पड़ गई और वह ललचाई नजरों से चिम्मी की ओर बढ़ने लगा, कुत्ते को अपनी ओर आता देख चिम्मी घबरा गया, उसे अपनी मौत सामने दिखाई दे रही थी, उसे बेहद पछतावा हो रहा था कि इस तरह चुपचाप अकेले घर से बाहर क्यों निकल आया उसने चाची को नहीं बल्कि खुद को ही धोखा दिया है , अब क्या करें? उसने मन ही मन प्रार्थना की-

" हे भगवान ! इस बार मुझे बचा लो फिर कभी ऐसी गलती नहीं करूंगा ।"

इसके साथ उसने साहस जुटा घर की ओर दौड़ लगा दी , आगे-आगे चिम्मी, पीछे-पीछे कुत्ता , चिम्मी ने हिम्मत नहीं हारी और पूरी ताकत के साथ दौड़ते हुए अपने घर तक पहुंच गया किंतु घर का गेट बंद देख वह हताश हो गया, अब क्या करें ? कुत्ता निश्चित ही मुझे खा जाएगा, यह सोच ही रहा था कि उसे पड़ोस का गेट थोड़ा सा खुला दिखाई दिया, मरता क्या न करता, वह उसी के अंदर घुस गया, आगे कुआं पीछे खाई देख उसका शरीर थरथर कांपने लगा क्योंकि सामने जिम्मी खड़ा था चिम्मी को देखते ही जिम्मी ने उसे आगे बढ़ दबोच लिया और तब तक दबोचे रखा जब तक सड़क का कुत्ता वहां से दूर नहीं चला गया फिर जिम्मी ने अपनी पकड़ ढीली की। चिम्मी स्वयं को जीवित पा आश्चर्यचकित रह गया उसने पूछा-

" जिम्मी भाई! आज तो बहुत अच्छा मौका था तुम मुझे खा सकते थे लेकिन उल्टे तुमने तो मेरे प्राणों की रक्षा की ।"

जिम्मी ने सहृदयता पूर्वक जवाब दिया- 

"चिम्मी भाई! आखिर पड़ोसी धर्म भी तो कुछ होता है मुसीबत में अड़ोसी-पड़ोसी ही एक दूसरे की सहायता नहीं करेंगे तो और कौन करेगा।"

 जिम्मी की उदारता देख चिम्मी उसके चरणों में गिर गया और अपनी गलत सोच के लिए हाथ जोड़ माफी मांगते हुए बोला-

" जिम्मी ! भाई मैने आपके लिए क्या सोचा और क्या पाया मुझे क्षमा करें।"

- मीरा जैन 

उज्जैन, मध्य प्रदेश 


अपनी रचनाओं से संवेदना और स्पष्टता जगाने वाली विख्यात लेखिका श्रीमती मीरा जैन का जन्म 2 नवबंर 1960 को जगदलपुर  (बस्तर) छ.ग. में हुआ, आपने  लघुकथा , आलेख व्यंग्य , कहानी, कविताएं , क्षणिकाएं जैसी लेखन विधाओं में रचनाएं रचकर साहित्य कोश में अमूल्य योगदान दिया है और आपकी 2000 से अधिक रचनाएं विभिन्न भाषाओं की देशी- विदेशी पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। और आकाशवाणी सरीखे माध्यमों से जनसामान्य के लिए प्रसारित भी।          
आप अनेक मंचो से बाल साहित्य , बालिका महिला सुरक्षा उनका विकास , कन्या भ्रूण हत्या , बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ , बालकों के लैगिंग यौन शोषण , निराश्रित बालक बालिकाओं  को समाज की मुख्य धारा से जोड़ना स्कूल , कॉलेजों के विद्यार्थियों को नैतिक शिक्षा आदि के अनेक विषयो पर उद्बोधन एवं कार्यशालाएं आयोजित कर चुकी हैं।


मो.9425918116
jainmeera02@gmail.com

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ईदी (लघुकथा) - सुनीता त्यागी

"अब्बू हमें इस बार ईदी में गिफ्ट और पैसे नहीं चाहियें"।  नौ वर्षीय सुहेल ने अपने अब्बा सेे कहा, तो रहमत खां हैरान रह गये। 
" मेरे बच्चे,तुझे ईदी नहीं चाहिये, तो और क्या चाहिए,तू बता मुझे! तू कहे तो मैं तेरे कदमों में जन्नत ला कर रख दूं "।

रहमत मियां  बेटे को गोद में उठा कर उसे प्यार से चूमने लगे।
सुहेल ठुनते हुए कहने लगा " नहीं अब्बू!!  जन्नत नहीं, एक वादा चाहिये आपसे। और सुहेल की हां में हां मिलाते हुए सारे बच्चों ने भी शोर मचा दिया " हांं हमें वादा चाहिये, वादा "।
" कैसा वादा मेरे बच्चों"!! बताओ तो सही?
"अब्बू हमने सुना है कि  खुदा पाक ने हजरत इब्राहिम से उनकी सबसे अज़ीज़ चीज़ कुर्बान करने के लिये कहा था  और उन्होंने अपने बेटे को कुर्बानी के लिए पेश किया था।"
" हांs.. मगर इससे तोहफे का क्या रिश्ता है बच्चों?"
"अब्बू तब खुदा पाक ने खुश होकर उनके बेटे की जगह बकरा रख दिया था।  क्या ये सच है अब्बू" ।
"हां ये सच है, तो तुम क्या चाहते हो"।
"अब्बू हम चाहते हैं कि आप भी अपने अज़ीज़ बच्चों को कुर्बानी पर रखें और खुदा पाक खुश होकरउसके बदले बकरा रख देंगे"।
बच्चों के मासूम सवाल से रहमत मियां कांप उठे।दोनों हाथ कानों पर रख लिये " ला-हौल-बिला-कुव्वत!! ये क्या बोल रहे हो!! कहीं ऐसा होता है भला! वो दौर और था बच्चो!यदि तुम्हें कुछ हो गया तो हम जीते जी मर जायेंगे।  नहीं नहीं..."।

अच्छा!!   बच्चों ने कुछ सोचते हुए कहा "तो फिर एक वादा करो कि इस बार आप मासूम जानवरों का खून नहीं बहाओगे, आप कुर्बानी के लिए आटे,गुड़, मिट्टी या कागज से बने  बकरे को ही हलाल करोगे"

"हाँ ये बात मानली तुम्हारी!"  कह कर रहमत खां ने राहत की सांस ली। 

 सुनीता त्यागी
 राजनगर एक्सटेंशन गाजियाबाद 
 ईमेल : sunitatyagi2014@gmail.com


आदरणीय सुनीता जी की रचनाएं हमे मानवीय संवेदना, मानवीय भावना के विभिन्न रूप और तीव्रताएं यथा प्रेम, परवाह, चाह और संकल्प इत्यादि, नज़र की सूक्ष्मता, सामाजिक संघर्ष और विसंगतियों पर प्रकाश डालती और लोगों मे संवेदना और जागरूकता जगाने का सफल प्रयत्न करती दिखती हैं, इनकी रचनाएँ पढ़कर खुद को एक संवेदी और व्यापक सोंच और दृष्टिकोण वाला इंसान बनाने मे मदद मिलती है |


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मां की ममता और मामा का दुलार (एक लघुकथा) - सुनीता त्यागी

सविता अपने बच्चों के स्वास्थ्य के प्रति सजग रहती थी। इसलिए वह सदैव उन्हें पौष्टिक भोजन ही कराती थी। सर्दी के मौसम में हल्दी युक्त दूध और विटामिन्स  से भरपूर फल खाने के लिए देती और गर्मियों में आम का पन्ना और नींबू की शिकंजी देना न भूलती थी।
लेकिन उसका बेटा आयुष जब से टीनएजर हुआ है और नए स्कूल में जाने लगा है तभी से मित्रों के साथ पीजा - बर्गर, चाईनीज़, इटैलियन  जैसे जंक फूड खाने लगा। अब उसे माँ के हाथों का बना खाना बेस्वाद लगने लगा था।
  नतीजा यह हुआ कि आयुष की इम्युनिटी बहुत कमजोर हो गयी और आए दिन उसे नजला जुकाम रहने लगे। सुबह सोकर उठता तो उसे एक साथ बहुत सारी छींके आतीं और पूरे दिन नाक से पानी बहता रहता ।
अब यह उसकी रोज की बात हो गई थी।
कुछ महीने पहले आयुष गर्मियों की छुट्टियों में अपने मामा जी घर रहने गया। उसने देखा उसके मामाजी सुबह उठते ही गुनगुने पानी में सेंधा नमक डाल कर एक नली वाले लोटे की सहायता से नाक के एक छिद्र से पानी अन्दर पहुंचा कर दूसरे छिद्र से बाहर निकाल रहे थे।
उनके नजदीक खड़ा आयुष आश्चर्य से ये सब देख रहा था, और साथ ही छींकता भी  जा रहा था । 
" मामाजी आप ये क्या कर रहे हैं"। उसने मामा जी से पूछा।
" बेटा ये जल नेति की क्रिया है, वही कर रहा हूं "
" मामा जी इसको करने से क्या लाभ होता है "।
, " बेटा यह नाक की सफाई करती है और सांस नली सम्बन्धी परेशानी, पुरानी सर्दी, दमा, सांस लेने में होने वाली समस्या को दूर करती है।
इससेआंखों में पानी आना और आंख में जलन की समस्या कम होती है। और यह कान, और गले को बीमारियों से भी बचाती है। सिरदर्द, अनिद्रा, सुस्ती में जलनेति करना फायदेमंद है।तुम्हें भी यह नित्य ही करनी चाहिए। "मामा जी ने विस्तार से जानकारी दी।"
परन्तु मुझे तो यह करनी आती ही नहीं
मामा जी"
" कोई बात नहीं मैं सिखाउंगा तुम्हें। क्यों कि यदि जल नेति गलत तरीके से कर ली जाये तो उससे हानि भी हो सकती है"
" कैसी हानि मामाजी" आयुष ने हैरानी से पूछा।
देखो बेटा यदि हम पानी को अधिक गर्म कर लेंगे या नमक अधिक डाल देंगे तो उससे हमारी नाक में जलन हो सकती है, नाक से खून भी आ सकता है। और यदि हमने नासिका के अन्दर से पूरा पानी बाहर नहीं निकाला तो कान नाक में दर्द भी हो सकता है। और यदि लोटा गंदा है तो संक्रमण भी हो सकता है, इसलिए इसे किसी विशेषज्ञ की देखरेख में ही करना चाहिए "।
ठीक है मामाजी आप मुझे भी सिखाइये ये जलनेति"
" ठीक है बेटा"
अगले दिन से मामाजी लम्बी नलकी वाले दो लोटों में चुटकी भर नमक और एक लीटर हल्का गर्म पानी डाल कर ले आये फिर उन्होंने धीरे-धीरे आयुष को नली से नाक में पानी डालने का और बाहर निकलने का अभ्यास कराया।  
आयुष जब तक उनके घर रहा तब तक उन्होंने आयुष को जलनेति की क्रिया कराई व उसको ठीक प्रकार से करने की सावधानियां भी समझायीं।
आयुष को अब इससे कुछ लाभ दिखाई देने लगा था तो वह स्वयं ही सुबह उठकर गुनगुने पानी में नमक डालकर जलनेति की क्रिया करने लगा तथा साथ में कपालभाति भी करने लगा।
देखते ही देखते कुछ महीनों में ही उसे छींकें आनी व नाक से पानी आना भी बंद हो गया, साथ ही जुकाम के कारण सिर में जो दर्द रहता था वह भी ठीक हो गया।
अब तो आयुष के घर में भी उसकी देखा देखी सभी लोग इस क्रिया को करने लगे। व मित्रों को भी जलनेति के फायदे समझाने लगे।

सुनीता त्यागी 
 राजनगर एक्सटेंशन गाजियाबाद 
 ईमेल : sunitatyagi2014@gmail.com


आदरणीय सुनीता जी की रचनाएं हमे मानवीय संवेदना, मानवीय भावना के विभिन्न रूप और तीव्रताएं यथा प्रेम, परवाह, चाह और संकल्प इत्यादि, नज़र की सूक्ष्मता, सामाजिक संघर्ष और विसंगतियों पर प्रकाश डालती और लोगों मे संवेदना और जागरूकता जगाने का सफल प्रयत्न करती दिखती हैं, इनकी रचनाएँ पढ़कर खुद को एक संवेदी और व्यापक सोंच और दृष्टिकोण वाला इंसान बनाने मे मदद मिलती है |


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शुभकामनाएं


 

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बच्चों के लिए साहित्य और भाषा का महत्त्व, बच्चों में पढ़ने की आदत कैसे लाएं? योगेन्द्र यादव की जुबानी

लगभग, सबकुछ योगेन्द्र यादव सर ने कहा दिया, वीडियो देख लीजिए:

https://youtu.be/C2T153GAmKo?si=0DtS5GjmHKmr6E0G

 

शुभकामनाएं 

लवकुश कुमार 

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उम्र ( लघुकथा ) - लवकुश कुमार

जीवन में बहुत से संयोग होते हैं, सुखद भी और दुखद भी, ऐसा ही एक संयोग मेरे साथ हुआ। सड़क दुर्घटना में मेरे बाएं हाथ की कालर बोन टूट गयी,हालत ये हुई कि, कुछ देर लेटना, कुछ देर बैठना। ऐसे ही एक दिन पत्नी मुझे बिस्तर पर लिटाकर गई और मेरा फोन चार्जिंग पर मुझसे कुछ दूरी पर लगा हुआ था, फोन की घण्टी बजती है। पत्नी मेरे बेटे को मुझे मोबाइल देने के लिए भेजती है पर जब तक बेटा आता है, फोन कट जाता है। इसीलिए बेटा मोबाइल मेरे पास रखकर चल देता है, मैं अपना मोबाइल उठाने की कोशिश में अपना हांथ बेड पर इधर उधर रख रहा था पर दोनों कंधों में क्लैविकल ब्रेस बंधा होने के चलते मेरे हाथ की गति ठीक से नहीं हो पा रही थी, मैं बस कोशिश कर रहा था, इतने में खेलने के लिए वापस जाते हुए मेरे बेटे ने अपने पिता को देख, दिक्कत को समझ लिया, वह आता है और मोबाइल को बेड से उठाकर मेरे हाथ में रखकर फिर खेलने चला जाता है। मैं अपने 6 साल के बेटे की संवेदनशीलता, तत्परता को देख मुग्ध हो जाता हूँ और सोचता हूँ कि क्या संवेदनएं हममें जन्म से होती हैं शायद जरूरत है तो सही माहौल और प्रोत्साहन देकर इन्हें बनाए रखने की, शायद बच्चों की संवेदनाओं को सामाजिक व्यवहार ही भ्रष्ट कर देता है। सच ही कहा जाता है कि अपने बच्चे को कुछ भी बड़ा बनाने से पहले उसे नेक इंसान बनाएं। वह समाज के साथ साथ आपके भी काम आएगा, हां अगर आपने उसे मतलबी बना दिया तो हो सकता है कि जरूरत निकल जाने पर वो आपसे भी परायों की तरह व्यवहार करें।

लवकुश कुमार 


लेखक भौतिकी में परास्नातक हैं और उनके लेखन का उद्देश्य समाज की उन्नति और बेहतरी के लिए अपने विचार साझा करना है ताकि उत्कृष्टता, अध्ययन और विमर्श को प्रोत्साहित कर देश और समाज के उन्नयन में अपना बेहतर योगदान दिया जा सके, साथ ही वह मानते हैं कि सामाजिक विषयों पर लेखन और चिंतन शिक्षित लोगों का दायित्व है और उन्हें दृढ़ विश्वास है कि स्पष्टता ही मजबूत कदम उठाने मे मदद करती है और इस विश्वास के साथ कि अच्छा साहित्य ही युवाओं को हर तरह से मजबूत करके देश को महाशक्ति और पूर्णतया आत्मनिर्भर बनाने मे बेहतर योगदान दे पाने मे सक्षम करेगा, वह साहित्य अध्ययन को प्रोत्साहित करने को प्रयासरत हैं, 

जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना आपके जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट ।


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बचपन की मुस्कान - संजय सिंह 'अवध' ( बाल दिवस विशेष )

चलो जवानी की गलियों में,
बचपन की मुस्कानखोजने,
चालाकी से भरे स्वरों में,
वो मासूम ज़ुबान खोजने,

"आँखों में" खिलते सपनों से,
नींदें जो भी टूट गई थी,
चलो आज फिर उन
"नींदों में" फिर से 
वही उड़ान खोजने।

 संजय सिंह 'अवध'


ईमेल- green2main@yahoo.co.in

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उक्त मन को छूने वाली कविता के रचयिता भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण में ATC अधिकारी हैं और अपने कालेज के दिनों से ही, जैसा कि इनकी रचनाओं से घोतक है, जन जन में संवेदना, करूणा और साहस भरने के साथ अंतर्विषयक समझ द्वारा उत्कृष्टता के पथ पर युवाओं को अग्रसर करने को प्रयासरत हैं।

कवि के बारे में विस्तार से जानने के लिए यहां क्लिक करें।


कविता में 'ज़ुबान खोजने' का क्या अर्थ है?

'ज़ुबान खोजने' का अर्थ है, बचपन की भोली-भाली बातों और मासूमियत को वापस पाना। यह उन शब्दों और भावनाओं को खोजने की बात करता है जो हम बड़े होते हुए खो देते हैं।

इस कविता का केंद्रीय विचार क्या है?

इस कविता का केंद्रीय विचार जीवन के सफर में बचपन की यादों को संजोना, सपनों को पुनर्जीवित करना और फिर से उड़ान भरने की प्रेरणा लेना है।


इस कविता पर अपनी राय या प्रतिक्रिया आप संपर्क फॉर्म से भेज सकते हैं या lovekushchetna@gmail.com पर ईमेल कर सकते हैं।

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एक बचपन का जमाना था - डॉ अनिल वर्मा ( बाल दिवस विशेष )

एक बचपन का जमाना था,

जिस में खुशियों का खजाना था..

चाहत चाँद को पाने की थी,

पर दिल तितली का दिवाना था..

खबर ना थी कुछ सुबहा की,

ना शाम का ठिकाना था..

थक कर आना स्कूल से,

पर खेलने भी जाना था..

माँ की कहानी थी,

परीयों का फसाना था..

बारीश में कागज की नाव थी,

हर मौसम सुहाना था..

हर खेल में साथी थे,

हर रिश्ता निभाना था..

गम की जुबान ना होती थी,

ना जख्मों का पैमाना था..

रोने की वजह ना थी,

ना हँसने का बहाना था..

क्युँ हो गऐे हम इतने बडे,

इससे अच्छा तो वो बचपन का जमाना था।

इसलिए चाहे सिर पर न हो बाल

तब भी जीवन जियो बच्चों सा धमाल

 यदि है जीवन में कुछ उमंग 

कुछ शौक, कुछ तरंग

लगते हो तब ही जीवित से

वरना लगे जीवन में है बैरंग 

बाल दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं 

- डॉ अनिल वर्मा 


डॉ अनिल वर्मा, कृषि रसायन में परास्नातक हैं और गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय पंतनगर उत्तराखंड में कृषि रसायन पर शोध कार्य कर चुके हैं।

इनके द्वारा शिक्षण और साहित्य के अध्ययन/अध्यापन का अनुभव एक बेहतर समाज के लिए उपयोगी है |

इस वेबसाइट पर लेखक द्वारा व्यक्त विचार लेखक/कवि के निजी विचार हैं और लेखों पर प्रतिक्रियाएं, फीडबैक फॉर्म के जरिये दी जा सकती हैं|

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भारत और विश्व के महान व्यक्तित्व -2

बच्चों को इन महान विभूतियों के बारें में पढ़ायें और उन्हें गुणवान तथा उच्च आदर्शों वाला इंसान बनाये, फिर वो ना छोटी बातों पर परेशान होंगे और ना ही छोटी बातों में फंसेंगे, फिर उनके उद्देश्य भी बड़े होएँगे और उनके काम में उत्कृष्टता दिखेगी और साथ ही वो दूसरों की दिक्कत के प्रति संवेदनशील भी होंगे और परिस्थितियों के साथ सामंजस्य बिठाकर सही और त्वरित निर्णय ले पाएंगे |

अच्छा हो कि इनकी जीवनी पर आधारित पुस्तकें एक डिस्प्ले रैक में लगा दें बच्चों के अध्ययन कक्ष में |

स्वयं भी पढ़ें और बच्चों के साथ प्रेरणादायक प्रसंग साझा करें |

1

डॉ राजेंद्र प्रसाद - भारत के प्रथम राष्ट्रपति

2

गणेश शंकर विद्यार्थी - त्याग और बलिदान के आराधक

3

सेठ जमनलाल बजाज-एक और भामाशाह

4

कार्ल मार्क्स - दास कैपिटल के लेखक और प्रतिनिधित्व के हिमायती 

5

राष्ट्रमाता कस्तूरबा गांधी - भारतीय नारियों के लिए आदर्श 

6

महावीर स्वामी- अहिंसा और अपरिग्रह के प्रतीक (जैन सिद्धांत )

7

प्रफुल्ल चंद्र राय- विद्या और पदवी लोक कल्याण के उद्देश्य के लिए 

8

जगद्गुरु शंकराचार्य- अपनी माँ से कहते हैं सैकडो, लाखों माताओं की रक्षा, बालकों को अज्ञान और आडंबर के महापाप से बचाने के लिए यदि तुझे अपने बेटे का बलिदान करना पड़े, तो क्या तुझे प्रसन्नता नहीं होगी ?

9

स्वामी दयानंद सरस्वती - आर्य समाज की स्थापना 

10

महात्मा बुद्ध - बौद्ध धर्म की स्थापना - अप्पो दीपो भव

11

रानी लक्ष्मी बाई - आदर्श वीरांगना

12

बहन निवेदिता - भारतीय संस्कृति की अनन्य आराधिका

13

गुरुनानकदेव - व्यवहारिक अध्यात्मवाद, एक महान समाज सुधारक

14

स्वामी रामतीर्थ - व्यावहारिक वेदांत के प्रचारक, त्याग और तपस्या का विद्यार्थी जीवन, परोपकार की सक्रिय साधना

15

महायोगी अरविंद - नव जागरण के देवदूत

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

इन जीवनियों को आप किफायती लागत में गायत्री परिवार की वेबसाइट से भी प्राप्त कर सकते हैं |

ऐसी ही किताबों के लिए लिंक

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