"चेली, अगले रविवार को लोग तुझे देखने आ रहे हैं।"
रसोई में आटा गूँधते हुए माधवी के हाथ एक पल के लिए रुक गए। उसने धीरे से ईजा की ओर देखा। ईजा की नज़रें झुकी हुई थीं, जैसे यह बात कहते हुए वे स्वयं भी भीतर से टूट रही हों।
"लेकिन ईजा... मैं अभी पढ़ना चाहती हूँ।"
ईजा ने बस इतना कहा—"सब ठीक हो जाएगा चेली... शादी के बाद भी पढ़ाई कर लेना।"
माधवी हल्का-सा मुस्कुराई। वह जानती थी कि यह मुस्कान केवल उसके चेहरे पर थी, मन में नहीं।
उस छोटे-से पहाड़ी गाँव में लड़कियों के सपनों की उम्र अक्सर बारहवीं की परीक्षा तक ही मानी जाती थी।
कुछ ही दिन पहले बोर्ड परीक्षा का परिणाम आया था।
"रिजल्ट आ गया?" पड़ोस की चाची ने आँगन से आवाज़ लगाई।
माधवी ने धीरे से सिर झुका दिया।
"एक विषय में रह गई..."
बस इतना सुनना था कि घर का माहौल बदल गया। ईजा (मां) चुप रहीं। बौजू(पिताजी) देर तक कुछ नहीं बोले। लेकिन शाम होते-होते अम्मा की आवाज़ पूरे आँगन में गूँज उठी— "अब पढ़ाई-लिखाई बहुत हो गई। चेली जवान हो गई है। कोई अच्छा लड़का देखो। पढ़-लिखकर कौन-सा कलेक्टर बनना है?"
उस दिन माधवी ने पहली बार महसूस किया कि परीक्षा में असफल होने से भी बड़ा डर उसके सामने खड़ा है—कहीं उसकी शादी तय न कर दी जाए और वही हुआ।
अगले ही सप्ताह दो रिश्तेदार घर आए। उनके हाथ में मिठाई का डिब्बा था और बातों में एक सरकारी नौकरी में कार्यरत लड़के का ज़िक्र। किसी ने माधवी से नहीं पूछा कि वह क्या चाहती है। उससे केवल इतना कहा गया—
"चेली, मेहमानों के लिए चाय बना दे।"
चाय की ट्रे लेकर जब वह कमरे में पहुँची तो उसे लगा जैसे वहाँ उसकी नहीं। उसके भविष्य की कीमत तय की जा रही हो।
रिश्तेदार जाते-जाते बौजू से कह गए— "ऐसे रिश्ते बार-बार नहीं मिलते। फ़ौज में नौकरी है। चेली की ज़िंदगी बन जाएगी।"
अम्मा कई महीनों से एक ही बात दोहराती थीं— "मरने से पहले अपनी पोती का ब्याह अपनी आँखों से देख लूँ, फिर भगवान जब चाहे बुला ले।" बौजू चुप रहते। ईजा की आँखें भर आतीं और माधवी... वह बस सब सुनती रहती।
वह पढ़ना चाहती थी। उसका सपना था कि वह अध्यापिका बने। उसे लगता था कि शिक्षा केवल नौकरी पाने का साधन नहीं बल्कि अपने पैरों पर खड़े होने और अपने जीवन के फैसले स्वयं लेने की ताक़त भी देती है। लेकिन गाँव में आज भी यह मान लिया जाता था कि चेली की सबसे बड़ी मंज़िल उसकी शादी है।
कुछ दिनों बाद बौजू ने धीरे से कहा— "माधवी, लड़का अच्छा है। सरकारी नौकरी करता है। हमें लगता है कि यही ठीक रहेगा।"
माधवी बहुत देर तक खिड़की से पहाड़ों को देखती रही। सामने दूर तक फैले चीड़ और बांज के जंगल हवा के साथ झूम रहे थे। उसे लगा जैसे पहाड़ों के ऊपर उड़ते पक्षी उससे पूछ रहे हों—"क्या सपनों की भी कोई उम्र होती है?"
उसने चाहा कि एक बार कह दे— "मैं अभी शादी नहीं करना चाहती। मैं पढ़ना चाहती हूँ।"लेकिन शब्द गले में ही अटक गए। शायद इसलिए कि वह जानती थी—उसके एक "ना" के सामने अम्मा की आख़िरी इच्छा, ईजा की मजबूरियाँ, बौजू की सामाजिक चिंता और रिश्तेदारों की सलाह खड़ी थी।
धीरे-धीरे शादी की तैयारियाँ शुरू हो गईं। कॉलेज की फीस के लिए जो पैसे उसने बचाकर रखे थे, उन्हीं पैसों से उसके लिए शादी की साड़ी खरीदी गई।
रिश्तेदार आते और कहते— "चेली भाग्यशाली है। फ़ौजी लड़का मिला है।" अब इससे अच्छा रिश्ता कहाँ मिलेगा?
हर कोई उसकी किस्मत की बातें कर रहा था, लेकिन किसी ने उसके सपनों के बारे में नहीं पूछा।
शादी का दिन आ गया। मंडप में मंत्र गूँज रहे थे। अग्नि साक्षी थी। रिश्तेदार मुस्कुरा रहे थे। तभी उसकी दोस्त लक्ष्मी ने पूछा— तू इस विवाह से खुश तो हैं न ?
माधवी ने सामने देखा। अम्मा के चेहरे पर संतोष था।
ईजा की आँखों में आँसू थे।
बौजू के चेहरे पर वर्षों की चिंता उतरती दिखाई दे रही थी।
उसने धीमे से कहा— "हाँ..."
उस एक शब्द के साथ सबके चेहरे खिल उठे। लेकिन किसी ने यह जानने की कोशिश नहीं की कि वह "हाँ" उसकी इच्छा थी या परिस्थितियों के आगे उसका मौन समर्पण।
समय बीत गया।
एक दिन माधवी अपनी छोटी-सी चेली को स्कूल छोड़ने जा रही थी। पहाड़ की वही पगडंडी थी, वही चीड़ के पेड़ और वही सुबह की धूप।
रास्ते में चेली ने मासूमियत से पूछा— "ईजा, मेरी शादी भी आप लोग ही तय करोगे?"
माधवी कुछ पल के लिए ठिठक गई। उसने अपनी चेली का हाथ थामा और मुस्कुराकर कहा— "नहीं चेली। शादी तेरी होगी, इसलिए फैसला भी तेरा होगा। हमारा काम तुझे समझाना होगा, तेरे लिए फैसला लेना नहीं।"
चेली मुस्कुरा दी और आगे दौड़ गई।
माधवी वहीं खड़ी पहाड़ों की ओर देखने लगी। उसे लगा कि उसकी अपनी उड़ान भले ही अधूरी रह गई हो, लेकिन अब उसकी चेली के पंख कोई नहीं काट पाएगा।
शायद बदलाव ऐसे ही शुरू होता है—जब एक पीढ़ी अपने हिस्से का दर्द अगली पीढ़ी को विरासत में देने से इनकार कर देती है।
विशाल चन्द @reading_owl.3
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लेखक की टिप्पणी
यह कहानी मेरे द्वारा वर्ष 2021 में लिखे गए ब्लॉग लेख "लड़की, विवाह और सहमति" से प्रेरित है। उस समय उठाए गए सामाजिक प्रश्नों को इस कहानी के माध्यम से एक नए साहित्यिक रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है। कहानी के पात्र और घटनाएँ काल्पनिक हैं, किन्तु इसके सामाजिक संदर्भ वास्तविक अनुभवों और अवलोकनों से जुड़े हैं।
यदि यह कहानी पाठकों को विवाह में सहमति, शिक्षा और बेटियों के सपनों पर एक बार फिर सोचने के लिए प्रेरित करे, तो इसका उद्देश्य सार्थक होगा।
विशाल चन्द जी समाजशास्त्र के शोधार्थी, पाठक और संवेदनशील शिक्षार्थी हैं। नवीन ज्ञान अर्जन और सतत सीखना आपके व्यक्तित्व का अभिन्न हिस्सा है। पुस्तकों का पठन और संग्रहण आपको विशेष प्रिय है।
आपके भीतर एक घुमक्कड़ चेतना भी सक्रिय है, जो आपको नए लोगों, स्थानों और अनुभवों से जोड़ती रहती है। बागवानी आपके लिए प्रकृति से संवाद का माध्यम है।
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जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना आपके जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट ।
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तुम बनाओ अपने महल अटारी,
मुझे अपने घोंसले में रहने दो,
मत रोको मुझको अब पिंजरे में,
मुझे गगन में उड़ने दो।
जानती हूँ तुम मुझे पिंजरा भी सोने का दोगे,
चुगने के लिए मोती से दाने भी दोगे,
पर जानती हूँ ये भी कि,
फिर तुम मुझे उड़ने भी नहीं दोगे,
मुझसे कीमत वसूलोगे,
मेरे पंखों को कुतरोगे।
इसीलिए मैं तिनका-तिनका जोड़कर बनाऊँगी अपना घोंसला,
चुगने के लिए दाना भी खुद ले आऊँगी,
लड़ूगी चील-बाज अन्य पक्षियों से अकेले,
कभी हार जाऊँगी, कभी संघर्ष कर पार पाऊँगी,
है सब मंजूर मुझे,
पर मैं तुम्हारे पिंजरे में नहीं आऊँगी।
- सौम्या गुप्ता
बाराबंकी, उत्तर प्रदेश
सौम्या जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं |
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शुभकामनाएं
माँ-देवी, नहीं इंसान बने,
चाहती हूँ माँ के अक्षय पात्र में भी कम पड़े,
माँ अब पहले-सी भूखी न रहे।
देवी बोल - बोल कर जो ली गई है बलि उससे,
अब उसे उसका हिसाब मिले।
कभी त्याग की मूरत, कभी देवी-सी सूरत,
कहकर कराये गए है त्याग उससे,
उसे उन त्यागों का प्रतिफल मिले।
तुम तो चुका भी नहीं पाओगे,
कर्ज की इस गठरी का क्या हिसाब लगा पाओगे?
जब चुका सकते नहीं तो कर्ज इतना क्यों लिया?
औरत को माना देवी और दासी बना दिया।
कहा ज्ञान की देवी पर पुस्तक भी न छूने दी,
बोला तुमने है माँ लक्ष्मी पर रोटी भी न कमाने दी,
बोला तुमने जननी है पर क्या केवल बच्चों की?
कब दोगे तुम आजादी उसको, स्व-अस्तित्व के सृजन की।
-सौम्या गुप्ता
बाराबंकी, उत्तर प्रदेश
सौम्या जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं |
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"कगार की आग" महिलाओं के शोषण की कहानी कहती किताब
यह किताब हिमांशु जोशी द्वारा 1975 में लिखा गया एक बहुत ही मार्मिक और हृदयविदारक उपन्यास है। जिसमें पहाड़ी पृष्ठभूमि की एक ऐसी महिला की कहानी है,जिसका शोषण और उत्पीड़न उसके ही अपने लोगों द्वारा किया गया।कहानी की मुख्य पात्र गोमती है। जो अपने मानसिक रूप से अस्वस्थ पति और एक छोटे बेेेटे कुन्नू के साथ रहती है।कहानी उस समय लिखी गई है जब पहाड़ में पितृसत्ता,रूढ़िवाद,जातिवाद चरम पर था। महिलाओं को तब सिर्फ घर का काम करने वाली , पति की इच्छा पूरी करने वाली तथा संतान पैदा करने वाली के तौर पर ही देखा जाता था।
जहाँ उसकी अपनी कोई स्वतंत्र पहचान "नहीं" थी। उसके जीवन से जुड़े सारे फैसले उसका पति या घर का पुरुष लेता था। कहानी एक दलित महिला गोमती की है।जो अचानक से रात को भागकर अपनी माँ के पास इसलिए आ गई है कि उसके ककिया ससुर ने उसे इस तरह बेरहमी से किड़मोड़े की लकड़ी से मारा है कि उसके शरीर में नीले निशान रह गए है। उसपे आरोप यह कि उसके घर के बाहर पुरुषों के साथ संबंध है, वह भी बस इसलिए कि जानवरों के डॉक्टर से वह अपने बीमार पति के लिए दवाई मांगती है।
जंगल वह घास, लकड़ी लेने सभी महिलाओं के साथ जाती है, फिर भी जंगल के चौकीदार के साथ संबंध होने की अफवाह हैं। जिसके शक में वह उसे बुरी तरह मारते हैं, उसके चरित्र पर सवाल उठाते हुए उसे बहुत बुरी गालियां भी देते हैं।
पहाड़ी महिला के जीवन संघर्ष को बयां करती कहानी:
कहानी की मुख्य किरदार गोमती है, जो साहसी और विद्रोही है। जब उसका ककिया ससुर उससे सम्बन्ध बनाने की फिराक में आए दिन रात को उसके दरवाजे में आ जाता था, एक दिन जब उसने देखा कि ककिया ससुर दरवाजे के एकदम पास आ गया है तो उसे कुछ नहीं सुझा,अपने सिराने पड़ी हशिया उठाकर दे मारी। जिससे वह चला गया। बीमार पति की देखरेख और रोज का गोमती का अपने ही करीब के सम्बन्धों से चलता संघर्ष, जो कभी उसके पति को ठीक से काम न करने में पीट देते थे, कभी गोमती को चरित्रहीन बताते हुए उसे अपमानित करते थे।
"गरीबी भुखमरी और उत्पीड़न के बीच पलता जीवन"
हिमांशु जोशी का लेखन बहुत गंभीर और मार्मिक है। उनके लिखने में वह दर्द झलकता है,जो एक आम इंसान की व्यथा है।गोमती और उसके परिवार का जीवन बहुत ही दयनीय है। उसका बीमार पति लोगों के फायदे के लिए सबसे ज्यादा उपयोगी है। वह उसे अवैध कार्यों में अपने साथ ले जाते हैं, जहां पुलिस के छापा मारने में उसे जेल भेज देते है, और वह आसानी से सब कुछ कबूल कर लेता जो आरोप उस पर लगाए जाते। अपने खिलाफ होते शोषण के खिलाफ गोमती अकेले ही बोलती, बहुत बार वह बुरी तरह से टूट जाती थी। एक दिन का हो तो कोई सहे लेकिन उसके खिलाफ होने वाले शोषण में कमी नहीं आ रही थी, उसका देवर भी उसके साथ यौन उत्पीड़न करता है, जिससे तंग आकर वह नदी में कूदने जाती है, लेकिन उसके भीतर की मां उसे मरने नहीं देती।इस तरह कहानी स्त्री मन की व्यथा और समाज द्वारा उसे सिर्फ एक देह समझे जाने की है।
"स्त्री जीवन और दुख की कहानी"
मरने का फैसला स्थगित कर वह जिस इंसान के साथ रहने लगती है, गोमती की सुंदरता देख वह भी उससे आकर्षित हो जाता है, जहां वह उसे अपने साथ रख लेता है| सबको लगता है कि गोमती मर गई, लेकिन वह खुशाल नाम के इंसान के साथ रह रही होती है। जिसकी पहले से दो पत्नियां हैं, जिनसे उसे संतान का सुख प्राप्त नहीं हो पाया है। खुशाल उसे बहुत प्रेम करता है,अच्छे गहने बनाता है ,नए कपड़े दिलाता है। हर तरह से उसे खुश रखने की कोशिश करता है, लेकिन उसका मन तब भी अपने बच्चे के लिए दुखी रहता है। सब कुछ होने के बाद भी कुछ था जो गोमती को कचोटता था, उसका मन दुखी रहता,अपने नन्हे बच्चे कुन्नू के बारे में सोच सोच मन बैठ जाता। खुशाल ने उसे 400रूपये देकर अपने पास रखा था। जो उस समय एक बड़ी रकम थी।जब उसका स्त्री मन किसी भी तरह अपने बेटे से नहीं हटा तो खुशाल ने भी उसे बुरी तरह पीट दिया ,उसके चरित्र का हवाला देकर उसे गालियां दी।
"महिलाओं को देह के रूप में देखता समाज"
यह कहानी समाज की उस सच्चाई को सामने रखती है, जिसे वर्षों से ढकने की कोशिश की गई है। जिस समाज ने महिलाओं को चुप रहकर सहना सिखाया है।वह अपनी इस क्रूरता से पर्दा हटाना कभी नहीं चाहेगा। जहां एक भयावह चेहरा स्त्री देह को ही उसकी पहचान समझता है, उसी के हिसाब से उसे अपने लिए उपयोगी समझता है।
यह कहानी मानव समाज में महिलाओं में होने वाले दुखद शोषण को ही नहीं दिखाती, यह बताती है कि कैसे एक औरत जीवन भर उत्पीड़न का शिकार होती है। किसी ने भी स्त्री मन को नहीं जानना चाहा कि उसके अंतर्द्वंद्व क्या है। बल्कि उस पर अपना पुरुषत्व दिखाते रहें। गोमती न सिर्फ अंत तक संघर्ष करती हुई दिखती है, वह दिन रात हाड़तोड़ मेहनत करके खुशाल को 400रुपए वापिस कर अपने घर अपने बच्चे कुन्नू के पास वापिस लौटती है।
हिमांशु जोशी की लेखनी सरल है। पहाड़ी जीवन को करीब से देखा है और उसकी सच्चाई को लिखा है। उनके लेखन में वह पहाड़ झलकता है,जिसके दर्द की कहानी उनके भीतर कुलबुलाती है। उनके लेखन में उन्होंने कुमाऊंनी शब्दों का जो उपयोग किया है वह कहानी को जीवंत बना देता है। "कगार की आग पाठक को झकझोरकर रख देती है", जो सोचने में मजबूर करती है कि महिलाओं की स्थिति हमारे समाज में सिर्फ एक दैहिक और संतान सुख तक सीमित थी, आज की स्थिति का आंकलन मै पाठकों पर छोड़ती हूँ ।
- शीतल
शीतल जी, उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के एक दूरस्थ पहाड़ी गांव भट्टयूडा से आती हैं। आपने अपना परास्नातक, भूगोल विषय में लक्ष्मण सिंह मेहर कैंपस पिथौरागढ़ से किया है। आप सामाजिक खांचों में फिट नहीं होना चाहती, इसे इस परिप्रेक्ष्य मे देखें कि आप हर वह रिवाज नकारना चाहती हैं जो आपको एक लड़की होने का हवाला देकर कम आंकते हो।
किताबें संवेदनशील ,सामाजिक ,निर्भय और वैज्ञानिक चेतना देती हैं, अतः किताबें पढ़ना, नया जानते रहकर अपनी समझ को विस्तार देते रहना आपकी आदत मे शुमार है। आपको फिल्में देखना पसंद है, और घूमना भी। भूगोल आपको अपनी ओर खींचती है साथ ही नए और रचनात्मक लोगों के साथ बात करने और उनके बारे में जानने को उत्सुक रहती हैं |
इस आशा के साथ कि शीतल जी की समझ और लेखनी, सुधी पाठकों की समझ को एक नया आयाम देकर उसको विस्तार देगी और एक संवेदनशील इंसान बनने का मार्ग प्रशस्त करेगी, ढेरों शुभकामनायें
सम्पादक
लवकुश कुमार
अगर आपके पास भी कुछ ऐसा है जो लोगों के साथ साझा करने का मन हो तो हमे लिख भेजें नीचे दिए गए लिंक से टाइप करके या फिर हाथ से लिखकर पेज का फोटो Lovekushchetna@gmail.com पर ईमेल कर दें
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