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दसवीं ऑनलाइन साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा 10-05-2026

बीते रविवार (10-05-2026) हम सबके सामूहिक प्रयास और वरिष्ठजनों के प्रोत्साहन से दसवीं साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा का ऑनलाइन आयोजन सफल रहा, जिसमें निम्नलिखित पुस्तकों/रचनाओं/विषयों पर सार्थक चर्चा हुयी:

ब्राह्मण की बेटी – शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय

जीत आपकी- शिव खेड़ा

संबंध और क्या है जीवन- आचार्य प्रशांत

  • पढ़ने का उद्देश्य जीवन के लिए रोटी कमाने तक सीमित न हो, बल्कि इससे आगे बढ़कर एक सार्थक जीवन के लिए खुद को तैयार करना हो|
  •  निर्णय निर्माण के लिए समय देकर, स्वयं की जरूरतों की समीक्षा करें, अपने असल जरूरतों को समझें और जो जरूरतें अभी महसूस हो रही हैं उनकी प्रासंगिकता के बारे मे अच्छे से विचार करें, दूसरों को देखकर अपनी प्राथमिकताएँ न बनाएँ, पहले स्वयं को समझें फिर अपनी जरूरतों को
  • जिस दिन आपको अपनी असली जरूरतों का पता चल जाएगा आपको बाहर से प्रेरणा की जरूरत महसूस न होगी
  • हौसला आता है स्पष्टता से, इसीलिए अध्ययन करें
  • सफलता और असफलता की भावना से ऊपर उठ जो जरूरी है वो करें, पूरा प्रयास और सही कार्य के लिए प्रयास अपने आपमें एक जीत है, सबसे पहला कदम सही काम के चुनाव का|

  • परिस्थितियाँ हमे सिखाती हैं, यदि आप एक उचित और जरूरी कार्य के लिए प्रयासरत हैं तो हार न माने
  • अध्ययन के बाद यदि आपकी समझ मे कुछ बेहतरी न आए तो आपको विचार करना चाहिए कि क्या वाकई पढ़ना सार्थक रहा?
  • खुद को खुलकर ईमानदारी से अभिव्यक्त करें ताकि आपसे इत्तेफाक रखने वाले लोग आपसे जुड़ सकें और आपके कार्यों मे सहयोग कर सकें
  • परिचर्चा को ऐसे संचालित करें जैसे कि हम सब एक कमरे मे बैठे बात कर रहे हों |
  • परिचर्चा में, सक्रिय रहें, पूछे जाने पर प्रतिक्रिया जरूर रखें ताकि परिचर्चा को एक दिशा दी जा सके
  • “जिंदा हैं तो जिंदा नज़र आना जरूरी है”- एक शेर का हिस्सा

  • स्वीडन यदि पूरी तरह डिजिटल हो चुकी शिक्षा व्यवस्था को फिर से किताबों पर ला रहा तो क्या इतना काफी नहीं है हमारे लिए किताबों और पुस्तकालय के महत्व को समझने के लिए!
  • साहित्य को प्रोत्साहित करके हम इसी दुनिया को जिसमें हम रहते हैं, एक बेहतर दुनिया बना सकते हैं जहां लोगों में प्रेम हो, संवेदनशीलता और हो आपसी सम्मान
  • फोन देखते देखते सो जाने से बेहतर है एक किताब पढ़ते पढ़ते सो जाना, असर आपको अगले दिन ही दिख जाएगा, साहित्य का चुनाव ढंग का हो|
  • पुस्तकें हमारी भाषा शैली को बेहतर करती हैं, हम लोगों को बेहतर समझ पाते हैं और उनसे तालमेल बिठाना आसान हो जाता है|
  • आप किसी भी विधा के विद्यार्थी हों, हर महीने 2-3 पुस्तकें पढ़ने का उद्देश्य रखना आपको कई मामलो मे बेहतर कर सकता है, जीवन के संघर्षों के लिए आपको तैयार कर सकता है और साथ मे मिल सकती है आंतरिक शांति और स्थिरता|
  • यदि आपमें बातचीत से लोगों के साथ जुड़ाव बनाने की चाहत है तो नियमित पुस्तकें पढ़ना न केवल आपको बेहतर शब्द दे सकता है साथ ही कार्यालय और व्यक्तिगत जीवन मे लोगों के साथ समन्वय बनाते हुये, खुद को अभिव्यक्त करते और दूसरों को समझते हुये आगे बढ़ने मे मदद कर सकता है|
  • पुस्तकें आपकी विश्लेषण क्षमता और कल्पनाशीलता को बढ़ाती हैं जबकि विडियो मे काफी कुछ समझा देने और विजुअल जोड़ देने से हमारे दिमाग़ को जानकारी प्रोसैस करने की जरूरत कम पड़ती है और नतीजा कि हमारी  विश्लेषण क्षमता और कल्पनाशीलता का उपयोग न होने से इनमे बेहतरी कि गुंजाइश घट जाती है और इस तरह कुछ सृजन करने की संभावना भी| इसीलिए पुस्तकों का साथ बनाएँ रखें|
  • हमे विश्वास है कि जब लोग पढ़ना शुरू करेंगे तो समाज बेहतरी की ओर अग्रसर होगा, वही समाज जिससे प्रभावित हुये बिना हम नहीं रह सकते
  • कुछ लोगों मे इतनी स्पष्टता है कि वह सही नियत से एक काम में लगे हैं तो निरंतर अपने प्रयास को बढ़ ही रहे हैं बिना इस बात की परवाह के कि अभी वर्तमान मे उनका प्रयास कितना कारगर है क्योंकि सही नियत से किया गया काम बिलकुल उसी तरह है जैसे एक बीज को माहौल, खाद और पानी देकर पौधे से पेड़ और फिर फलदार पेड़ बनने तक उसके लिए लगे रहना|
  • कभी न भूलें कि आज जिन भी चीजों और मूल्यों का लाभ हम ले रहे हैं वह कहीं न कहीं हमारे पूर्वजों द्वार बहुत त्याग और संघर्ष से अर्जित किया हुआ है, चाहे वह आजादी हो या लोकतंत्र, इसीलिए हमे भी अपने बुढ़ापे और आने वाली पीढ़ी को सही और सुरक्षित हवा, जल और माहौल मिल सके, इसके लिए काम करना होगा, इसमें भी हमारे अकेले से काम न चलेगा, हम अगर एक एक पौधा लगा रहे हैं तो हमें ये देखना होगा कि कोई एक साथ हजारों और लाखों पौधे क्यों उजाड़ रहा? उसकी समझ पर काम करना होगा|
  • प्रयास करें कि रोज कम से कम एक पेज ही पढ़ लो एक पुस्तक से 
  • जब मातापिता और घर के बड़े स्वयं ही पुस्तक लेकर पढेंगे तो उन्हें देख घर के बच्चे भी पुस्तकों के तरफ आकर्षित होंगे, और ये आकर्षण जुड़ाव में बदल पाए इसके लिए जरुरी है कि घर में उम्दा, रोचक बाल साहित्य के रूप में रंगबिरंगी किताबें मौजूद हों|
  • इसे परिचर्चा में शामिल होना भी एक तरीका है अपने जीवन अपने दिन को सार्थक करने का |
  • जीवन सम्बन्ध है। व्यक्ति का व्यक्ति से सम्बन्ध, प्रकृति से सम्बन्ध, समाज से सम्बन्ध।

  • इन सम्बन्धों का आधार क्या है?

  • क्या है हमारे सम्बन्धों की वास्तविकता ?

  • क्या हमारे सम्बन्ध डर, लालच, मोह, आसक्ति की छाया मात्र हैं, या ये प्रेम की अभिव्यक्ति हैं? 

  • क्या हमारे सम्बन्ध अकेलेपन से बचने के उपाय हैं, या आन्तरिक पूर्णता का प्रस्फुटन ? 

  • और क्या है, सच्चा प्रेम? 

उक्त परिचर्चा में निम्नलिखित पुस्तकसाथी शामिल रहे:

अंशिका शर्मा मैम, हिमांशु जोशी जी, उर्मिला जायसवाल, विशाल जायसवाल, अंजना वर्मा, आरती मैम, अरविंद कुमार, धर्मेंद्र शर्मा सर, शोभित, प्रिया शर्मा, लक्ष्मण जोशी, प्रिया जायसवाल, गायत्री जायसवाल, विजय कुमार, प्रिय कश्यप और कर्ण भाईजी|

कुशल और श्रोताओं को परिचर्चा से जोड़े रखने वाला समन्वय और संचालन कर्ण भाईजी ने किया|

पुस्तक परिचर्चा मे शामिल सभी पुस्तक साथियों (Bookmates) ने पुस्तक परिचर्चा मे शामिल होकर/अभिव्यक्ति/सराहना/भागीदारी के माध्यम से इस पहल को पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा देने में, मानवीय मूल्यों के पोषण में, अपनी बात को बेहिचक रखने में महत्वपूर्ण माना एवं एक दूसरे के प्रति आभार व्यक्त किया ताकि इस जरूरी कार्य की नियमितता बनी रहे एवं समाज मे एक सकारात्मक बदलाव में अपना विनम्र योगदान सुनिश्चित किया जा सके |

धन्यवाद ज्ञापन के साथ परिचर्चा को अगली परिचर्चा तक के लिए विराम दिया गया|

इस आशा के साथ कि यह रिपोर्ट पाठकों को पुस्तक परिचर्चा को समझने और उसमे शामिल होने के लिए प्रेरित करेगी |

 

अगली परिचर्चा 17 मई (रविवार रात 09 बजे)  को होगी, शामिल होकर पढ़ने-लिखने की संस्कृति पर काम करने में अपना योगदान सुनिश्चित करें और पुस्तक परिचर्चा से साहित्यिक लाभ लेते हुये अपने दिन की सार्थकता में एक और आयाम जोड़ें|

 

  धन्यवाद 

-लवकुश कुमार

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नौवीं ऑनलाइन साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा 03-05-2026

बीते रविवार (03-05-2026) हम सबके सामूहिक प्रयास और वरिष्ठजनों के प्रोत्साहन से नौवीं साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा का ऑनलाइन आयोजन सफल रहा, जिसमें निम्नलिखित पुस्तकों/रचनाओं/विषयों पर सार्थक चर्चा हुयी:

कबिरा सोई पीर है (उपन्यास) - प्रतिभा कटियार (लोकभारती प्रकाशन, लेखिका अजीम प्रेमजी फाउंडेशन की कार्यकर्ता हैं)

स्मारिका  - उमेश डोभाल स्मृति ट्रस्ट 

अब पहुंची हो तुम (कविता संग्रह) - महेश चन्द्र पुनेठा 

मुसाफिर कैफे  - दिव्य प्रकाश दुबे

खाकी में इंसान  - अशोक कुमार साथ में लोकेश ओहरी 

नचिकेता - महेश चन्द्र पुनेठा 

  • प्रयास करें की घर में कोई एक घंटे का अंतराल निर्धारित करें जब घर के बड़े कोई साहित्यिक पुस्तक लेकर उसका अध्ययन करें, इससे नियमित हमारी समझ को विस्तार मिलेगा और घर में माहौल आएगा पढने लिखने का, हो सकता है कि बड़ों को देख बच्चे भी पुस्तकें लेकर बैठें, बच्चों की रंग बिरंगी आकर्षक पुस्तकें डिस्प्ले रैक में रखें ताकि वो बच्चों को अपनी और आकर्षित कर सकें|
  • किसी साहित्यिक रचना की मार्मिकता, बारीकी, पठनीयता और सामाजिक सरोकार पाठक के मन को बाँध सकती हैं कि वह पूरी पुस्तक पढ़ जाये 
  • जिन्होंने जातिगत भेदभाव कभी झेला नहीं उन्हें जातिगत भेदभाव को उजागर करने वाली रचनाएँ और बातें अतिश्योक्ति लग सकती हैं |
  • 03 मई को विश्व पत्रकारिता दिवस होता है, यइसका उद्देश्य प्रेस की आजादी के महत्व के प्रति जागरूकता बढ़ाना, मीडिया की स्वतंत्रता पर हमलों का विरोध करना और पत्रकारिता के दौरान जान गंवाने वाले पत्रकारों को श्रद्धांजलि देना है। 1993 में संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा घोषित यह दिवस, लोकतंत्र और मानवाधिकारों की रक्षा में निष्पक्ष पत्रकारिता की भूमिका को रेखांकित करता है
  • स्व० उमेश डोभाल (पत्रकार) और गिरीश चंद्र तिवारी (गिर्दा) हैं जैसे अमिट शख्शियतों और उनके योगदान पर बात हुयी |
  • जम्हूर आलम उअर नैनीताल की होली पर भी बात हुयी 
  • हिंदी भाषा में बात रखना ही आपको इसमें और पढने को प्रेरित करेगा, फिर लिखने को और इससे ही भाषा समृद्ध होती ही और हममें निपुणता आती है| 
  • उक्त परिचर्चा में निम्नलिखित पुस्तकसाथी शामिल रहे:

    आदरणीय महेश चन्द्र पुनेठा सर, हिमांशु जोशी जी, आकाश कश्यप, कृष्णा जायसवाल, गुंजन त्यागी मैम, प्रिया शर्मा, अमितेन्द्र सिंह, सौम्या मैम, कपिल देव, अंशुल पाण्डेय, सौम्या वर्मा, प्रिया, लक्ष्मण जोशी, उर्मिला, सिद्धार्थ यादव, विजय कुमार, ममता, गायत्री जायसवाल, अरुण मौर्या और लवकुश|

  • पुस्तक परिचर्चा मे शामिल सभी पुस्तक साथियों (Bookmates) ने पुस्तक परिचर्चा मे शामिल होकर/अभिव्यक्ति/सराहना/भागीदारी के माध्यम से इस पहल को पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा देने में, मानवीय मूल्यों के पोषण में, अपनी बात को बेहिचक रखने में महत्वपूर्ण माना एवं एक दूसरे के प्रति आभार व्यक्त किया ताकि इस जरूरी कार्य की नियमितता बनी रहे एवं समाज मे एक सकारात्मक बदलाव में अपना विनम्र योगदान सुनिश्चित किया जा सके |

    धन्यवाद ज्ञापन के साथ परिचर्चा के संचालक लवकुश कुमार ने परिचर्चा को अगली परिचर्चा तक के लिए विराम दिया |

    इस आशा के साथ कि यह रिपोर्ट पाठकों को पुस्तक परिचर्चा को समझने और उसमे शामिल होने के लिए प्रेरित करेगी |

    अगली परिचर्चा 10 मई, रविवार रात 09 बजे होगी, शामिल होकर पढ़ने-लिखने की संस्कृति पर काम करने में अपना योगदान सुनिश्चित करें और पुस्तक परिचर्चा से साहित्यिक लाभ लेते हुये अपने दिन की सार्थकता में एक और आयाम जोड़ें|

      धन्यवाद 

    -लवकुश कुमार

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पुस्तक परिचर्चा - एक मंच

पुस्तक परिचर्चा में केवल पुस्तकों पर ही बात नहीं होती, इसमें पुस्तकों के महत्व पर भी बात होती है और एक मंच को निरंतरता मिलती है कि कल कोई जुझारू युवा जुड़े और इस मुहिम को और आगे तक ले जाए‌।

शुभकामनाएं 

लवकुश कुमार 

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आठवीं ऑनलाइन साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा 26-04-2026

बीते रविवार (26-04-2026) हम सबके सामूहिक प्रयास और आदरणीय महेश चन्द्र पुनेठा सर के प्रोत्साहन से आठवीं साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा का ऑनलाइन आयोजन सफल रहा, जिसमें निम्नलिखित पुस्तकों/रचनाओं/विषयों पर सार्थक चर्चा हुयी:

सर्जनात्मक शिक्षा – डॉ राघव प्रकाश एवं डॉ सविता पालीवाल

बाघेन – नवीन जोशी

जीव जंतुओं की विचित्र आदतें और प्रवृत्तियाँ - राजेंद्र कुमार राजीव

अविज्ञान – नरेंद्र कोहली

आषाढ़ का एक दिन – मोहन राकेश

प्रफुल्ल चन्द्र राय – पं श्रीराम शर्मा आचार्य

देवेंद्र मेवाड़ी के नाट्य साहित्य में बाल मनोविज्ञान (शोधपत्र)

तुम तो अच्छे मुसलमान थे रहमान

कमरुनिशा का कटोरदान

  • बेहतर समाज के लिए केवल आपका ही सजग और संवेदनशील होना जरूरी नहीं, इसके साथ इतना ही  जरूरी है कि पड़ोस का वातावरण भी बेहतर हो, एक उदाहरण से समझिए- यदि आप सड़क पर यातायात नियमों का पालन कर रहे हैं तो इतने भर से ही आपकी सुरक्षा सुनिश्चित नहीं हो जाती, अन्य चालकों का भी नियमों के प्रति सचेत और जिम्मेदार होना जरूरी है|
  • ये बहुत जरूरी है कि पुस्तक परिचर्चा जैसे जरूरी कार्यों का सिलसिला आगे बढ़े इसके लिए जरूरी हो जाता है कि हम स्वयं भी हिस्सा लें और अन्य साथियों को भी इस मुहिम से जोड़ें
  • बेहतर समाज के लिए जरूरी है कि संवेदनशीलता, सृजनशीलता का विकास और चेतना का उन्नयन हमारी शिक्षा का हिस्सा/उद्देश्य बन जाए
  • आलोचनात्मक दृष्टिकोण के विकास के लिए जरूरी है साहित्य अध्ययन, ऐसा अध्ययन जो विचारोतेजक हो|
  • हमे इस बात पर विचार करने की जरूरत है कि कहीं हम भौतिक संपन्नता, व्यक्तिगत संपत्ति अर्जन की भाग दौड़ मे चीजों को समग्रता मे देखने, या अपनी दृष्टि को समाज केन्द्रित या विश्व केन्द्रित रखने के बजाय व्यक्तिकेंद्रित तो नहीं हो जा रहे! कहीं ऐसा तो नहीं कि अपनी स्वार्थ सिद्धि या विलासिता के लिए हम समाज मे गंदगी, प्रदूषण या अराजकता फैलाने मे योगदान दे रहे हों! अगर ऐसा है तो हम इस गलतफहमी मे हैं कि ज्यादा दिन तक शुकून से रह पाएंगे
  • अगर हम वाकई आने वाली पीढ़ी और अपने बुढ़ापे मे शुकून और व्यवस्था की कामना रखते हैं तो हमे अपने व्यवहार और प्राथमिकताओं से समाज मे समता, स्वतन्त्रता, लोकतन्त्र, गरिमा और बंधुता की भावना बढ़ाने के लिए समुचित और संगठित प्रयास करने होंगे|
  • अर्थकेंद्रित और धनपिपासु रवैया समाज को शोषण और असामनता जनित अव्यवस्था की तरफ ले जाता है|
  • स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि शिक्षा का उद्देश्य मानव की अंतर्निहित शक्तियों का विकास है|
  • आज के समय की बहुत बड़ी और तात्कालिक जरूरत है कि शिक्षा में तकनीकी के साथ मानविकी और साहित्य के अध्ययन को उचित स्थान, उचित वेटेज मिले|
  • शिक्षा ऐसी हो कि जो हमारी क्षुद्रताओं को नंगा कर दे ताकि हम उससे ऊपर उठकर विश्वबोध कर सकें|
  • शिक्षा ऐसी हो कि मनुष्य अपने संकीरंताओं से ऊपर उठकर अपनी विराटता से परिचित हो और “विश्व मानव” बनने की तरफ अग्रसर हो|
  • हमे इस बात का सकल्प लेना होगा कि बतौर एक अभिभावक या शिक्षक हमे शिक्षा को जीवनोन्मुखी बनाने के लिए प्रयत्न करने होंगे|

  • किसी इंसान पर जो आपके ही बीच रहा हो उस पर भी मनगढ़ंत आरोप उसके व्यवहार पर अप्रत्याशित असर कर सकते हैं|
  •  लिखना तब ही सार्थक है जब यह उन तक पहुँच सके जिनहे संबोधित करते हुये लिखा गया हो, इसके लिए जरूरी है साहित्य का प्रचार प्रसार और उपलब्धता को सुनिश्चित करना, इसमे पुस्तक परिचर्चा और सामुदायिक पुस्तकालय एक निर्णायक भूनिका निभा सकते हैं|
  • कोई रचना इफेक्टिव हो, इसके लिए जरूरी हो जाता है कि वह पाठक को बांध सके, कम से कम पाठकों के उस वर्ग को जिसको ध्यान मे रखकर वह रचना रची गयी है|
  • उमेश पंत जी का साहित्य हमे समकालीन मिट्टी की धरातल की सच्चाई से अवगत कराता है|

  • क्या आपको पता है कि खरगोश के बिल में भी अलग अलग कमरे होते हैं, अलग अलग प्रयोजन के लिए ? चमगादड़ उल्टा क्यों लटकता है और कैसे ? ऐसा ही बहुत कुछ पढ़ जा सकता है, “जीव जंतुओं की विचित्र आदतें और प्रवृत्तियाँ - राजेंद्र कुमार राजीव ” में
  • जिज्ञासा और सवाल जरिया बन सकते हैं आविष्कारों के
  • साहित्य अध्ययन का रस ऐसा है कि यदि लग जाए तो समय का पता नहीं चलता और जिज्ञासा बढ़ती जाती है, बस जरूरत है तो एक रोचक किताब के संपर्क मे आ जाओ आप, जैसे हमारी एक पुस्तक साथी गुंजन त्यागी मैम, “आषाढ़ का एक दिन – मोहन राकेश” को एक ही दिन में पूरा पढ़ गईं
  • आधुनिक तरीकों से पौराणिक कहानियों की व्याख्या हमे बहुत कुछ सीखा सकती हैं जो हमे एक बेहतर नागरिक बनने मे मदद कर सकती हैं|
  • शिक्षा कमाई का जरिया नहीं, जीवन को बेहतर तरीके से जीन और खुद कि उच्चतम संभावनाओं को पाने का जरिया है|

उक्त परिचर्चा में निम्नलिखित पुस्तकसाथी शामिल रहे:

आदरणीय महेश चन्द्र पुनेठा सर, हर्षा भंडारी मैम, कृष्णकांन्त वर्मा,आरती मैम, अंकित मिश्रा सर, गुंजन त्यागी मैम, नंदेश्वर, अमितेन्द्र सिंह, सौम्या मैम, सचिन सिंह, अंशुल, शोभित, प्रिया, दिव्याशु, लक्ष्मण जोशी, प्रिया जायसवाल, उर्मिला, सिद्धार्थ यादव, अरुण मौर्या और लवकुश|

पुस्तक परिचर्चा मे शामिल सभी पुस्तक साथियों (Bookmates) ने पुस्तक परिचर्चा मे शामिल होकर/अभिव्यक्ति/सराहना/भागीदारी के माध्यम से इस पहल को पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा देने में, मानवीय मूल्यों के पोषण में, अपनी बात को बेहिचक रखने में महत्वपूर्ण माना एवं एक दूसरे के प्रति आभार व्यक्त किया ताकि इस जरूरी कार्य की नियमितता बनी रहे एवं समाज मे एक सकारात्मक बदलाव में अपना विनम्र योगदान सुनिश्चित किया जा सके |

धन्यवाद ज्ञापन के साथ परिचर्चा के संचालक लवकुश कुमार ने परिचर्चा को अगली परिचर्चा तक के लिए विराम दिया |

इस आशा के साथ कि यह रिपोर्ट पाठकों को पुस्तक परिचर्चा को समझने और उसमे शामिल होने के लिए प्रेरित करेगी |

अगली परिचर्चा 02 मई (रविवार रात 09 बजे)  को होगी, शामिल होकर पढ़ने-लिखने की संस्कृति पर काम करने में अपना योगदान सुनिश्चित करें और पुस्तक परिचर्चा से साहित्यिक लाभ लेते हुये अपने दिन की सार्थकता में एक और आयाम जोड़ें|

  धन्यवाद 

-लवकुश कुमार

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पुस्तक परिचर्चा के मायने, संक्षेप में

प्रस्तुत हैं कुछ पोस्टर:

दूसरा पोस्टर 

तीसरा पोस्टर 

कुछ अन्य लिंक :

सातवीं ऑनलाइन साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा 19-04-2026

छठी ऑनलाइन साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा 12-04-2026

पांचवीं ऑनलाइन साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा 05-04-2026

चौथी पुस्तक परिचर्चा (29-03-2026) का विवरण यथा पुस्तकें एवं शामिल पुस्तक साथियों के नाम और इनपुट्स

मानव हो, न मानविकी से दूर रहो (कविता)

क्यों शामिल हों पुस्तक परिचर्चा मे ? कुछ जरूरी जो पाया जा सकता है, एक दृष्टि |

किताबों से हम क्या पा सकते हैं : Book Meet ( पुस्तकों पर चर्चा ) एक सार्थक प्रयास और जरूरी भी : पहाड़ी वोकल्स - अजीम प्रेमजी फाउंडेशन पिथौरागढ़

शुभकामनाएँ और धन्यवाद

लवकुश कुमार

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सातवीं ऑनलाइन साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा 19-04-2026

बीते रविवार (19-04-2026) को हम सबके सामूहिक प्रयास और आदरणीय महेश चन्द्र पुनेठा सर के प्रोत्साहन से सातवीं साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा का ऑनलाइन आयोजन सफल रहा, जिसमें निम्नलिखित पुस्तकों/रचनाओं/विषयों पर सार्थक चर्चा हुयी:

  1. श्रीमद भगवद्गीता
  2. रेत की मछली - कान्ता भारती
  3. स्वामी – मनु भण्डारी
  4. महाभोज – मनु भण्डारी
  5. आपका बंटी - मनु भण्डारी
  6. चले साथ पहाड़ – अरुण कुकसाल
  7. तीन - अमित श्रीवास्तव , बचपन के पुराने किस्सों को याद करने के लिए पढ़िए यह उपन्यास
  8. अकेलापन और निर्भरता -  आचार्य प्रशांत
  9. The Secret - Rhonda Byrne

  • गीता में हैं जीवन के सूत्र
  • क्या हम वाकई जानते हैं की हमारी भलाई किसमे है ?

  • क्या हम जो भगवान से मांगते हैं, वह वाकई हमारी जरूरत होती है ?
  • कहीं हम समाज सेवा के बाद तारीफ की आकांक्षा तो नहीं रखते हैं ?
  • कहीं ऐसा तो नहीं है कि हम समाज के लिए करते कम और सोचते ज्यादा हैं ?

  • अच्छा काम कर रहे तो उसे जारी रखें, असर दिखेगा, खुद के काम पर विश्वास रखें तारीफ की आकांक्षा न रखें
  • अपने अधिकारों के लिए अपनी बात स्वयं रखेँ और किसी और का इंतज़ार न करें आपकी पैरवी के लिए
  • खुद के लिए खड़े हों और बहस से भी परहेज न करें

न हारा है इश्क़ और न दुनिया थकी है

दिया जल रहा है हवा चल रही है     - ख़ुमार बाराबंकवी

  • पितृसत्तात्मक व्यवस्था से स्त्री पुरुष दोनों को ही नुकसान
  • रिश्ते का आधार, परस्पर उन्नती, जीवन मे शांति और सहयोग
  • नई वाली हिन्दी ताकि ज्यादा से ज्यादा युवाओं को पढ़ने की संस्कृति से जोड़ा जा सके
  • सेक्स एजुकेशन की जरूरत ताकि जीवन के विभिन्न मुद्दों के आनुपातिक महत्व निर्धारित करना आसान हो सके और साथ ही जिज्ञासाओं को समुचित रूप से संबोधित करके, युवाओं को किसी भी भ्रामक स्रोत से बचाया जा सके  
  • दूसरों पर नियंत्रण करने की इच्छा ने इंसान को स्वयं भी गुलाम बनाया है
  • पहाड़ों की दिक्कतों को पुस्तकों के जरिये शब्द मिले
  • जब दिक्कतें और आकांक्षाएँ व्यक्त की जाती हैं तो नीति निर्माताओं के लिए आसानी होती है और नीतियाँ प्रासंगिक बनती हैं
  • यदि आपको शिकायत है कि लोग आपकी बात समझ नहीं पाते तो आपको स्वयं भी साहित्य अध्ययन करना चाहिए और औरों को भी इसके लिए प्रोत्साहित करना चाहिए ताकि खुद की बात को समझाना और दूसरों की बात को समझने के लिए आपको समुचित समझ मिल सके पृष्ठभूमि की |
  • अगर हम समझा नहीं पा रहे तो संभव है कि हम खुद ही अच्छे से नहीं समझे अभी
  • अकेलेपन से डरने वाला इंसान सामाजिक गुलाम बनता है – आचार्य प्रशांत

अकेलेपन का डर हमें अक्सर हमारे जीवन को अन्य वस्तुओं से भरने

पर मजबूर कर देता है। वहीं से उन वस्तुओं के प्रति आसक्ति का जन्म

होता है, जिसके कारण हमें जीवन में न जाने कितना दुःख भोगना

पड़ता है। यदि इस डर को गहराई से समझा जाए तो जीवन सरल

और बोधपूर्ण हो जाएगा। यह किताब हमें उस डर के पार ले जाने का

एक प्रयास है।   - अकेलापन और निर्भरता पुस्तक के कवर पृष्ठ से 

 

उक्त परिचर्चा में निम्नलिखित पुस्तकसाथी शामिल रहे:

योगेश बिष्ट (किताबवाला दोस्त), अवनीश त्रिपाठी, हिमांशु जोशी, लाल बहादुर, अमितेन्द्र सिंह, कर्ण भाईजी(लिटरेरी  लैंड), सौम्या मैम, सिद्धि तिवारी मैम, सचिन सिंह, शिवम राय, अंशुल, शोभित, आशुतोष, राजन वर्मा, आशुतोष श्रीवास्तव,अरविंद कुमार, गायत्री, प्रिया, दिव्याशु, लक्ष्मण जोशी, प्रिया जायसवाल, उर्मिला, उमा जायसवाल और लवकुश|

 

धन्यवाद ज्ञापन के साथ परिचर्चा के संचालक लवकुश कुमार ने परिचर्चा को अगली परिचर्चा तक के लिए विराम दिया |

पुस्तक परिचर्चा मे शामिल सभी पुस्तक साथियों (bookmates) ने पुस्तक परिचर्चा मे शामिल होकर/अभिव्यक्ति/सराहना/भागीदारी के माध्यम से इस पहल को पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा देने में, मानवीय मूल्यों के पोषण में, अपनी बात को बेहिचक रखने में महत्वपूर्ण माना एवं एक दूसरे के प्रति आभार व्यक्त किया ताकि इस जरूरी कार्य की नियमितता बनी रहे एवं समाज मे एक सकारात्मक बदलाव में अपना विनम्र योगदान सुनिश्चित किया जा सके |

इस आशा के साथ कि यह रिपोर्ट पाठकों को पुस्तक परिचर्चा को समझने और उसमे शामिल होने के लिए प्रेरित करेगी |

अगली परिचर्चा 26 अप्रैल को होगी, शामिल होकर पढ़ने-लिखने की संस्कृति पर काम करने में अपना योगदान सुनिश्चित करें।

 

  धन्यवाद 

-लवकुश कुमार

 

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छठी ऑनलाइन साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा 12-04-2026

बीते रविवार (12-04-2026) हम सबके सामूहिक प्रयास और आदरणीय महेश चन्द्र पुनेठा सर के प्रोत्साहन से छठी साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा का ऑनलाइन आयोजन सफल रहा, जिसमें निम्नलिखित पुस्तकों/रचनाओं/विषयों पर सार्थक चर्चा हुयी:

  1. एक अनोखा गुरु (ओशो) - बेनटेन प्रकाशन 
  2. दिल्ली दरबार - सत्य व्यास
  3. शिक्षा के सवाल– महेश चन्द्र पुनेठा, लोकोदय  प्रकाशन लखनऊ 
  4. मनुष्य क्या है - जेम्स पाल गी
  5. शिक्षा और मनुष्य का प्राकृतिक अस्तित्व  - जिनान के बी 
  6. अंतस - जरा ठहरिए (लेखों का संग्रह) – लवकुश कुमार, नोसन प्रकाशन चेन्नई
  • आपसी संबंधों का आधार उन्नति और शांति के लिए परस्पर सहयोग हो।

 

अगली परिचर्चा 19 अप्रैल को होगी, शामिल होकर पढ़ने लिखने की संस्कृति पर काम करने में अपना योगदान सुनिश्चित करें।

 

धन्यवाद ज्ञापन के साथ परिचर्चा के संचालक लवकुश कुमार ने परिचर्चा को अगली परिचर्चा तक के लिए विराम दिया |

उक्त परिचर्चा में निम्नलिखित पुस्तकसाथी शामिल रहे:

सौम्या मैम, आंशिका मैम, प्रदीप छाजेड़ भैया, अंकित, गायत्री, प्रिया, दिव्याशु और लवकुश।

प्रदीप भैया ने कई कविताओं के द्वारा मानवीय संबंधों में समुचित संचार (proper communication) की जरूरत पर प्रकाश डाला।

पुस्तक परिचर्चा मे शामिल सभी पुस्तक साथियों (bookmates) ने पुस्तक परिचर्चा मे शामिल होकर/अभिव्यक्ति/सराहना/भागीदारी के माध्यम से इस पहल को पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा देने में, मानवीय मूल्यों के पोषण में, अपनी बात को बेहिचक रखने में महत्वपूर्ण माना एवं एक दूसरे के प्रति आभार व्यक्त किया ताकि इस जरूरी कार्य की नियमितता बनी रहे एवं समाज मे एक सकारात्मक बदलाव में अपना विनम्र योगदान सुनिश्चित किया जा सके |

इस आशा के साथ कि यह रिपोर्ट पाठकों को पुस्तक परिचर्चा को समझने और उसमे शामिल होने के लिए प्रेरित करेगी |

  धन्यवाद 

-लवकुश कुमार

 

 

 

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पांचवीं ऑनलाइन साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा 05-04-2026

बीते रविवार (05-04-2026) हम सबके सामूहिक प्रयास और आदरणीय महेश चन्द्र पुनेठा सर के प्रोत्साहन से पाँचवीं साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा का ऑनलाइन आयोजन सफल रहा, 

जिसमें निम्नलिखित पुस्तकों/रचनाओं/विषयों/विचारों पर सार्थक चर्चा हुयी:

·हिमांक और क्वथनांक के बीच - शेखर पाठकनवारुण प्रकाशन, गाजियाबाद

·A Doctor's Experiments in Bihar - डॉ. तारू जिंदल, Speaking tiger Books

·अब पहुंची हो तुम (कविता संग्रह) – महेश चन्द्र पुनेठा, समय साक्ष्य प्रकाशन देहरादून  

·परीक्षा कक्ष के बाहर पड़े मोजे जूते (कविता)- महेश चन्द्र पुनेठा

·आपका बंटी – मनु भण्डारी (लघु उपन्यास)

·उमराव जान अदा- मिर्ज़ा हदी रुसवा (उपन्यास)

·अंतस - जरा ठहरिए (लेखों का संग्रह) – लवकुश कुमार, नोसन प्रकाशन चेन्नई

·पुस्तक हिमांक और क्वथनांक के बीच के संबंध में आदरणीय पुनेठा सर के शब्दों में – “इस यात्रा वृत्तांत को पढ़ते हैं तो लगता है कि यह एक कठिन ही नहीं बेहद कठिन यात्रा थी। और ऐसी यात्राएं आदमी को आध्यात्मिक बना देती हैं और इस बात का एहसास करा देती हैं कि प्रकृति की विराटता के सामने मनुष्य एक कण के समान है। उसका सारा का सारा अहंकार चूर-चूर होकर रह जाता है। शेखर पाठक भी इस बात को स्वीकार करते हैं कि प्रकृति की क्षमता और शक्ति के साथ मनुष्य की मर्यादा और सीमा का इतनी गहराई से पहली बार एहसास हुआ। पर इस बात को स्वीकार करना पड़ेगा कि प्रकृति जितनी भी विराट हो लेकिन मनुष्य का साहस उसके सामने कभी भी कम नहीं रहा। वह हार नहीं मानता है। पिछली असफलताओं से सीख लेते हुए फिर नयी चढ़ाई की तैयारी शुरू कर देता है।”

·A Doctor's Experiments in Bihar, डॉ. तारू जिंदल (मुंबई की एक स्त्री रोग विशेषज्ञ) द्वारा लिखी गई एक प्रेरक पुस्तक है, जो बिहार के मोतीहारी के जिला अस्पताल और पटना के पास मसरही गाँव में उनके 2 साल के चुनौतीपूर्ण कार्यकाल का वर्णन करती है यह पुस्तक बिहार की वास्तविक सार्वजनिक स्वास्थ्य स्थिति और एक समर्पित डॉक्टर के संघर्ष की कहानी बताती है, वरिष्ठ साहित्यकार आदरणीय सिद्धेश्वर सिंह सर ने इस किताब को पढ़ने का सुझाव दिया न केवल चिकित्सा के पेशे से जुड़े लोगों को बल्कि अन्य को भी इसे पढ्ना, समझ को विस्तार देने वाला बताया, सर ने आगे कुछ अन्य बातों पर भी ज़ोर दिया वस्तुतः

  • ·क्या क्या पढ़ें और क्या अवॉइड करें
  • ·पुस्तक परिचर्चा में पुस्तकों तक सीमित रहें
  • ·उन्होने बताया कि एक पुस्तक पढ़ने और फोन पर किताब पढ़ने में अंतर को उजागर किया, माने भौतिक पुस्तक का एक साथी की तरह आपके सामने रहना
  • ·पुस्तकें केवल आपके क्षेत्र की ही नहीं, बाहर की पुस्तकें भी पढ़ें ताकि सोच और नजरिए को विस्तार मिले
  • ·शिक्षाविद और चिंतकआदरणीय पुनेठा सर ने पढ़ने की संस्कृति पर निम्नलिखित जरूरी बातें कहीं :
  • · सर ने आरंभ स्टडी सर्कल की बात की, जिसका पढ्ने के संस्कृति को बढ़ाने के लिए उल्लेखनीय योगदान रहा
  • ·आपने इस बात पर ज़ोर दिया कि किताबें पढ़ना हमारी दिनचर्या मे वैसे ही शामिल हो जैसे अन्य महत्वपूर्ण गतिविधियां
  • ·सर ने इस बात पर ध्यान खींचा कि पढ़ने, सोचने विचारने वाला समाज शांति का समर्थक होता है |
  • ·पुस्तकें हमे आलोचनात्मक दृष्टि विकसित करने मे मदद करती हैं और हम कुछ भी यूंही नहीं मानते, फिर हम सवाल करते हैं
  • ·किताबें हमे बुराइयों से लड़ने मे सक्षम बनाती हैं
  • ·लोकतान्त्रिक समाज की स्थापना और स्थायित्व के लिए पुस्तकें पढ़ना और जरूरी है  
  • ·पुस्तक परिचर्चा यदि भौतिक रूप से आयोजित कि जाये तो परिचर्चा मे शामिल पाठक अपने साथ लायी पुस्तकों की अद्ला बदली भी कर सकते हैं
  • ·सर ने उत्तराखंड की एनसाइक्लोपीडिया कहे जाने वाले शेखर पाठक सर जैसी शख्सियत की रचना के बारे मे बात की
  1. ·चर्चा में जुड़े शिक्षक शिवम राय जी ने इस बात पर ज़ोर दिया कि पढ़ना केवल रोजगार प्राप्ति तक सीमित न हो, समाज मे बढ़ रहा नैतिक पतन, हमरी पुस्तकों से दूरी के चलते भी है, क्योंकि हम बुराइयों से लड़ने मे उतने दृढ़ नहीं
  2. ·अब पहुंची हो तुम, एक संवेदना से भरने वाला कविता संग्रह है जो न केवल समाज और मानव मन की दिक्कतों की तरफ ध्यान खीचता है वरन उनके हल भी सुझाता है|
  3. ·मनु भण्डारी कृत आपका बंटी में लेखिका ने शब्दों के चयन पर रचनात्मकता दिखाई है उस पर बैंक ऑफ बड़ौदा मे राजभाषा अधिकारी शिल्पी मैम ने पुस्तकों का ध्यान खींचा की किस तरह यह उपन्यास एक बालमन को प्रभावित करने वाले उसके माता पिता के व्यवहार और जीवन पर केन्द्रित है |
  4. ·उमराव जान अदा पर बात करते हुये निशांत शुक्ल जी गजल के शब्द भंडार हेतु पढ़ने पर ज़ोर देते हैं |
  5. ·पुस्तक परिचर्चा के अंत मे प्रदीप छाजेड़ भैया ने सरस्वती माँ की एक प्रार्थना के माध्यम से इस बात पर ज़ोर दिया कि पढ़ने का उद्देश्य समझ को विस्तार देना हो नकि अहंकार को पुष्ट करना, साथ ही लवकुश कुमार की पुस्तक “अंतस - जरा ठहरिए” आपने इस बात पर ज़ोर दिया कि हमे थोड़ा ठहरकर अपने अंतस को संबोधित करना बहुत जरूरी है एक शांत और उत्कृष्ट जीवन के लिए |

·धन्यवाद ज्ञापन के साथ परिचर्चा के संचालक लवकुश कुमार ने परिचर्चा को अगली परिचर्चा तक के लिए विराम दिया |

उक्त परिचर्चा में निम्नलिखित पुस्तकसाथी मौजूद रहे:

महेश चन्द्र पुनेठा सर, सिद्धेश्वर सिंह सर,अर्चना बेंज्वाल मैम, प्रदीप छाजेड़ भैया, शिल्पी मैम,शिवम राय, सौम्या मैम, सोनम मैम, प्रिया, अरविंद जी, आरती जी, अंशुल पांडे, निशांत शुक्ल जी, गायत्री,अंजना जी, कृष्णकांत जी,उर्मिला,शोभित, दिव्याशु एवं लवकुश|

 

पुस्तक परिचर्चा मे शामिल सभी पुस्तक साथियों (bookmates) ने पुस्तक परिचर्चा मे शामिल होकर/अभिव्यक्ति/सराहना/भागीदारी के माध्यम से इस पहल को पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा देने में, मानवीय मूल्यों के पोषण में, अपनी बात को बेहिचक रखने में महत्वपूर्ण माना एवं एक दूसरे के प्रति आभार व्यक्त किया ताकि इस जरूरी कार्य की नियमितता बनी रहे एवं समाज मे एक सकारात्मक बदलाव में अपना विनम्र योगदान सुनिश्चित किया जा सके |

लिंक - हिमांक से क्वथनांक तक - पुस्तक समीक्षा

इस आशा के साथ कि यह रिपोर्ट पाठकों को पुस्तक परिचर्चा को समझने और उसमे शामिल होने के लिए प्रेरित करेगी |

  धन्यवाद 

-लवकुश कुमार

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