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सातवीं ऑनलाइन साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा 19-04-2026
छठी ऑनलाइन साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा 12-04-2026
पांचवीं ऑनलाइन साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा 05-04-2026
चौथी पुस्तक परिचर्चा (29-03-2026) का विवरण यथा पुस्तकें एवं शामिल पुस्तक साथियों के नाम और इनपुट्स
मानव हो, न मानविकी से दूर रहो (कविता)
क्यों शामिल हों पुस्तक परिचर्चा मे ? कुछ जरूरी जो पाया जा सकता है, एक दृष्टि |
शुभकामनाएँ और धन्यवाद
लवकुश कुमार
बीते रविवार (19-04-2026) को हम सबके सामूहिक प्रयास और आदरणीय महेश चन्द्र पुनेठा सर के प्रोत्साहन से सातवीं साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा का ऑनलाइन आयोजन सफल रहा, जिसमें निम्नलिखित पुस्तकों/रचनाओं/विषयों पर सार्थक चर्चा हुयी:




न हारा है इश्क़ और न दुनिया थकी है
दिया जल रहा है हवा चल रही है - ख़ुमार बाराबंकवी

अकेलेपन का डर हमें अक्सर हमारे जीवन को अन्य वस्तुओं से भरने
पर मजबूर कर देता है। वहीं से उन वस्तुओं के प्रति आसक्ति का जन्म
होता है, जिसके कारण हमें जीवन में न जाने कितना दुःख भोगना
पड़ता है। यदि इस डर को गहराई से समझा जाए तो जीवन सरल
और बोधपूर्ण हो जाएगा। यह किताब हमें उस डर के पार ले जाने का
एक प्रयास है। - अकेलापन और निर्भरता पुस्तक के कवर पृष्ठ से
उक्त परिचर्चा में निम्नलिखित पुस्तकसाथी शामिल रहे:
योगेश बिष्ट (किताबवाला दोस्त), अवनीश त्रिपाठी, हिमांशु जोशी, लाल बहादुर, अमितेन्द्र सिंह, कर्ण भाईजी(लिटरेरी लैंड), सौम्या मैम, सिद्धि तिवारी मैम, सचिन सिंह, शिवम राय, अंशुल, शोभित, आशुतोष, राजन वर्मा, आशुतोष श्रीवास्तव,अरविंद कुमार, गायत्री, प्रिया, दिव्याशु, लक्ष्मण जोशी, प्रिया जायसवाल, उर्मिला, उमा जायसवाल और लवकुश|

धन्यवाद ज्ञापन के साथ परिचर्चा के संचालक लवकुश कुमार ने परिचर्चा को अगली परिचर्चा तक के लिए विराम दिया |
पुस्तक परिचर्चा मे शामिल सभी पुस्तक साथियों (bookmates) ने पुस्तक परिचर्चा मे शामिल होकर/अभिव्यक्ति/सराहना/भागीदारी के माध्यम से इस पहल को पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा देने में, मानवीय मूल्यों के पोषण में, अपनी बात को बेहिचक रखने में महत्वपूर्ण माना एवं एक दूसरे के प्रति आभार व्यक्त किया ताकि इस जरूरी कार्य की नियमितता बनी रहे एवं समाज मे एक सकारात्मक बदलाव में अपना विनम्र योगदान सुनिश्चित किया जा सके |
इस आशा के साथ कि यह रिपोर्ट पाठकों को पुस्तक परिचर्चा को समझने और उसमे शामिल होने के लिए प्रेरित करेगी |
अगली परिचर्चा 26 अप्रैल को होगी, शामिल होकर पढ़ने-लिखने की संस्कृति पर काम करने में अपना योगदान सुनिश्चित करें।
धन्यवाद
-लवकुश कुमार
बीते रविवार (12-04-2026) हम सबके सामूहिक प्रयास और आदरणीय महेश चन्द्र पुनेठा सर के प्रोत्साहन से छठी साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा का ऑनलाइन आयोजन सफल रहा, जिसमें निम्नलिखित पुस्तकों/रचनाओं/विषयों पर सार्थक चर्चा हुयी:
अगली परिचर्चा 19 अप्रैल को होगी, शामिल होकर पढ़ने लिखने की संस्कृति पर काम करने में अपना योगदान सुनिश्चित करें।

धन्यवाद ज्ञापन के साथ परिचर्चा के संचालक लवकुश कुमार ने परिचर्चा को अगली परिचर्चा तक के लिए विराम दिया |
उक्त परिचर्चा में निम्नलिखित पुस्तकसाथी शामिल रहे:
सौम्या मैम, आंशिका मैम, प्रदीप छाजेड़ भैया, अंकित, गायत्री, प्रिया, दिव्याशु और लवकुश।

प्रदीप भैया ने कई कविताओं के द्वारा मानवीय संबंधों में समुचित संचार (proper communication) की जरूरत पर प्रकाश डाला।

पुस्तक परिचर्चा मे शामिल सभी पुस्तक साथियों (bookmates) ने पुस्तक परिचर्चा मे शामिल होकर/अभिव्यक्ति/सराहना/भागीदारी के माध्यम से इस पहल को पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा देने में, मानवीय मूल्यों के पोषण में, अपनी बात को बेहिचक रखने में महत्वपूर्ण माना एवं एक दूसरे के प्रति आभार व्यक्त किया ताकि इस जरूरी कार्य की नियमितता बनी रहे एवं समाज मे एक सकारात्मक बदलाव में अपना विनम्र योगदान सुनिश्चित किया जा सके |
इस आशा के साथ कि यह रिपोर्ट पाठकों को पुस्तक परिचर्चा को समझने और उसमे शामिल होने के लिए प्रेरित करेगी |
धन्यवाद
-लवकुश कुमार

बीते रविवार (05-04-2026) हम सबके सामूहिक प्रयास और आदरणीय महेश चन्द्र पुनेठा सर के प्रोत्साहन से पाँचवीं साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा का ऑनलाइन आयोजन सफल रहा,

जिसमें निम्नलिखित पुस्तकों/रचनाओं/विषयों/विचारों पर सार्थक चर्चा हुयी:
·हिमांक और क्वथनांक के बीच - शेखर पाठक, नवारुण प्रकाशन, गाजियाबाद
·A Doctor's Experiments in Bihar - डॉ. तारू जिंदल, Speaking tiger Books
·अब पहुंची हो तुम (कविता संग्रह) – महेश चन्द्र पुनेठा, समय साक्ष्य प्रकाशन देहरादून
·परीक्षा कक्ष के बाहर पड़े मोजे जूते (कविता)- महेश चन्द्र पुनेठा
·आपका बंटी – मनु भण्डारी (लघु उपन्यास)
·उमराव जान अदा- मिर्ज़ा हदी रुसवा (उपन्यास)
·अंतस - जरा ठहरिए (लेखों का संग्रह) – लवकुश कुमार, नोसन प्रकाशन चेन्नई

·पुस्तक हिमांक और क्वथनांक के बीच के संबंध में आदरणीय पुनेठा सर के शब्दों में – “इस यात्रा वृत्तांत को पढ़ते हैं तो लगता है कि यह एक कठिन ही नहीं बेहद कठिन यात्रा थी। और ऐसी यात्राएं आदमी को आध्यात्मिक बना देती हैं और इस बात का एहसास करा देती हैं कि प्रकृति की विराटता के सामने मनुष्य एक कण के समान है। उसका सारा का सारा अहंकार चूर-चूर होकर रह जाता है। शेखर पाठक भी इस बात को स्वीकार करते हैं कि प्रकृति की क्षमता और शक्ति के साथ मनुष्य की मर्यादा और सीमा का इतनी गहराई से पहली बार एहसास हुआ। पर इस बात को स्वीकार करना पड़ेगा कि प्रकृति जितनी भी विराट हो लेकिन मनुष्य का साहस उसके सामने कभी भी कम नहीं रहा। वह हार नहीं मानता है। पिछली असफलताओं से सीख लेते हुए फिर नयी चढ़ाई की तैयारी शुरू कर देता है।”

·A Doctor's Experiments in Bihar, डॉ. तारू जिंदल (मुंबई की एक स्त्री रोग विशेषज्ञ) द्वारा लिखी गई एक प्रेरक पुस्तक है, जो बिहार के मोतीहारी के जिला अस्पताल और पटना के पास मसरही गाँव में उनके 2 साल के चुनौतीपूर्ण कार्यकाल का वर्णन करती है यह पुस्तक बिहार की वास्तविक सार्वजनिक स्वास्थ्य स्थिति और एक समर्पित डॉक्टर के संघर्ष की कहानी बताती है, वरिष्ठ साहित्यकार आदरणीय सिद्धेश्वर सिंह सर ने इस किताब को पढ़ने का सुझाव दिया न केवल चिकित्सा के पेशे से जुड़े लोगों को बल्कि अन्य को भी इसे पढ्ना, समझ को विस्तार देने वाला बताया, सर ने आगे कुछ अन्य बातों पर भी ज़ोर दिया वस्तुतः


·धन्यवाद ज्ञापन के साथ परिचर्चा के संचालक लवकुश कुमार ने परिचर्चा को अगली परिचर्चा तक के लिए विराम दिया |
उक्त परिचर्चा में निम्नलिखित पुस्तकसाथी मौजूद रहे:
महेश चन्द्र पुनेठा सर, सिद्धेश्वर सिंह सर,अर्चना बेंज्वाल मैम, प्रदीप छाजेड़ भैया, शिल्पी मैम,शिवम राय, सौम्या मैम, सोनम मैम, प्रिया, अरविंद जी, आरती जी, अंशुल पांडे, निशांत शुक्ल जी, गायत्री,अंजना जी, कृष्णकांत जी,उर्मिला,शोभित, दिव्याशु एवं लवकुश|
पुस्तक परिचर्चा मे शामिल सभी पुस्तक साथियों (bookmates) ने पुस्तक परिचर्चा मे शामिल होकर/अभिव्यक्ति/सराहना/भागीदारी के माध्यम से इस पहल को पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा देने में, मानवीय मूल्यों के पोषण में, अपनी बात को बेहिचक रखने में महत्वपूर्ण माना एवं एक दूसरे के प्रति आभार व्यक्त किया ताकि इस जरूरी कार्य की नियमितता बनी रहे एवं समाज मे एक सकारात्मक बदलाव में अपना विनम्र योगदान सुनिश्चित किया जा सके |
लिंक - हिमांक से क्वथनांक तक - पुस्तक समीक्षा
इस आशा के साथ कि यह रिपोर्ट पाठकों को पुस्तक परिचर्चा को समझने और उसमे शामिल होने के लिए प्रेरित करेगी |
धन्यवाद
-लवकुश कुमार