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कौन-से कारक पढ़ने-लिखने की संस्कृति को नुकसान पहुँचा सकते हैं? — एक चिंता : लवकुश कुमार

कुछ दिन पहले सोशल मीडिया पर एक पोस्ट पढ़ी। उसमें एक लेखिका ने लिखा कि उन्होंने किसी की प्रशंसा सुनकर एक पुस्तक खरीदी, लेकिन उन्हें वह पसंद नहीं आई। उन्होंने अपना अनुभव फेसबुक पर साझा किया। यह उनका व्यक्तिगत अनुभव था और उसे व्यक्त करने का अधिकार भी उन्हें है। लेकिन उस पोस्ट को पढ़ते हुए मेरे मन में एक बड़ा प्रश्न उठा—क्या हमारी अभिव्यक्ति का तरीका कभी-कभी अनजाने में पढ़ने-लिखने की संस्कृति को भी नुकसान पहुँचा सकता है?

यह लेख किसी व्यक्ति के पक्ष या विपक्ष में नहीं है। यह उस व्यापक चिंता पर विचार करने का प्रयास है कि जिस समाज में वैसे ही पुस्तकें कम पढ़ी जाती हों, वहाँ हम अपने शब्दों से कैसी साहित्यिक संस्कृति बना रहे हैं।

हम अक्सर कहते हैं कि लोग किताबें नहीं पढ़ते। मोबाइल, सोशल मीडिया और त्वरित मनोरंजन ने पढ़ने की आदत को कमज़ोर कर दिया है। लेकिन क्या केवल यही कारण हैं? या हम स्वयं भी अनजाने में ऐसी मानसिकता बना रहे हैं जिसमें पुस्तकें, लेखक और पढ़ने की प्रक्रिया कम महत्वपूर्ण दिखाई देने लगती है?

जब मैं लोगों से किताबों पर बात करता हूँ तो कई बार एक वाक्य सुनने को मिलता है—"फलाँ वक्ता तो बस अपनी किताब बेचने की फिराक में है।"

यह सुनकर मुझे आश्चर्य होता है। यदि कोई व्यक्ति तर्कपूर्ण बातें कर रहा है, हमें अपने अंतर्विरोधों से परिचित करा रहा है, हमारी सोच को चुनौती दे रहा है, या हमारे भीतर छिपी संभावनाओं को पहचानने में मदद कर रहा है, तो फिर उसकी पुस्तक बेचने में समस्या क्या है? क्या किसी लेखक को अपनी वर्षों की मेहनत का पाठक मिलना अपराध है?

हम पुस्तक को संवाद का माध्यम मानने के बजाय केवल एक उत्पाद क्यों मानने लगे हैं?

एक अच्छी पुस्तक केवल सूचना नहीं देती, वह हमारे अनुभव का विस्तार करती है। वह हमें अपने से भिन्न लोगों, संस्कृतियों, विचारों और समयों से मिलाती है। कई बार वह हमारे भीतर ऐसे प्रश्न पैदा करती है जिनका उत्तर हमें वर्षों बाद मिलता है। पुस्तक का मूल्य केवल इस बात से नहीं आँका जा सकता कि उसने पढ़ते ही हमें "वाह!" कहने पर मजबूर किया या नहीं।

आज एक और प्रवृत्ति दिखाई देती है। यदि किसी पुस्तक से तुरंत आनंद नहीं मिला, कोई बिल्कुल नया विचार नहीं मिला, या वह हमारी अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतरी, तो हम सार्वजनिक रूप से उसके बारे में नकारात्मक टिप्पणी कर देते हैं। इसमें कोई बुराई नहीं कि हम अपनी असहमति व्यक्त करें। स्वस्थ आलोचना साहित्य की आवश्यकता है। लेकिन आलोचना और निरुत्साहन में एक सूक्ष्म अंतर होता है।

हमें स्वयं से पूछना चाहिए—हम पढ़ते किसलिए हैं?

क्या केवल नया जानने के लिए?

क्या केवल मनोरंजन के लिए?

क्या केवल सौन्दर्यबोध के लिए?

या फिर स्वयं को थोड़ा और समझने के लिए?

कई बार कोई पुस्तक हमें नया कुछ नहीं बताती, बल्कि वही बात अधिक स्पष्टता, संवेदनशीलता या गहराई से समझाती है जिसे हम पहले से जानते थे। क्या यह कम उपलब्धि है? हर पुस्तक का उद्देश्य क्रांतिकारी विचार प्रस्तुत करना नहीं होता। कुछ पुस्तकें प्रश्न जगाती हैं, कुछ अनुभव बाँटती हैं, कुछ भाषा का सौन्दर्य दिखाती हैं, कुछ प्रेरित करती हैं, और कुछ केवल यह एहसास कराती हैं कि हम अपनी उलझनों में अकेले नहीं हैं।

हर पुस्तक हर पाठक के लिए नहीं होती।

जो पुस्तक किसी को साधारण लगे, वही किसी दूसरे व्यक्ति के जीवन की दिशा बदल सकती है। जिस कविता में एक व्यक्ति को कुछ न मिले, वही दूसरे के भीतर वर्षों से दबे भावों को शब्द दे सकती है। इसलिए किसी पुस्तक पर अंतिम निर्णय देने से पहले यह स्वीकार करना भी आवश्यक है कि हमारी प्रतिक्रिया एक व्यक्तिगत अनुभव है, सार्वभौमिक सत्य नहीं।

आज के समय में पुस्तकों के सामने एक और चुनौती है—प्रचार।

अक्सर कहा जाता है कि अच्छी पुस्तक को प्रचार की आवश्यकता नहीं होती। यह बात शायद उस समय सही रही होगी जब पुस्तकों के अलावा ज्ञान के बहुत कम माध्यम थे। लेकिन आज लाखों सूचनाओं के बीच यदि किसी पुस्तक की चर्चा ही न हो, तो पाठक उसके अस्तित्व से भी परिचित नहीं हो पाएगा।

प्रचार और अतिशयोक्ति में अंतर है।

यदि कोई पाठक किसी पुस्तक की अच्छाइयों की चर्चा करता है, तो वह केवल लेखक का नहीं, बल्कि पढ़ने की संस्कृति का भी समर्थन करता है। मैं स्वयं इसका अनुभव कर चुका हूँ। मेरी अपनी वेबसाइट को मित्रों का सहज समर्थन मिलने में लगभग दो वर्ष लग गए। तब मैंने सोचा—हम अपने मित्रों के अच्छे कार्यों का उल्लेख करने में इतना संकोच क्यों करते हैं? क्या हमें डर रहता है कि कहीं लोग इसे पक्षपात न समझ लें? या फिर हमने प्रशंसा को भी संदेह की दृष्टि से देखना शुरू कर दिया है?

एक समाज की बौद्धिक संस्कृति केवल लेखकों से नहीं बनती; वह पाठकों, शिक्षकों, मित्रों, पुस्तकालयों, समीक्षकों और संवादों से मिलकर बनती है।

यदि लेखक ही लगातार एक-दूसरे को छोटा सिद्ध करने में लगे रहें, तो उन लोगों की दृष्टि में लेखकों की छवि कैसी बनेगी जो पहले से ही पुस्तकों को अनावश्यक मानते हैं? स्वस्थ असहमति और कठोर अवमानना में अंतर होता है। साहित्य का विकास बहस से होता है, उपहास से नहीं।

इसका अर्थ यह नहीं कि पुस्तकों की आलोचना बंद कर दी जाए। बिल्कुल नहीं। बल्कि आलोचना और भी अधिक होनी चाहिए—पर वह ऐसी हो जो पाठक को सोचने के लिए प्रेरित करे, न कि पढ़ने से ही विमुख कर दे।

शायद पुस्तकों की समीक्षा लिखते समय कुछ बातें ध्यान रखी जा सकती हैं—

  • यह स्पष्ट किया जाए कि यह मेरा व्यक्तिगत पाठकीय अनुभव है।

  • पुस्तक किन पाठकों के लिए अधिक उपयोगी हो सकती है, इसका उल्लेख किया जाए।

  • केवल कमियाँ नहीं, उसकी विशेषताओं पर भी बात की जाए।

  • यदि पुस्तक हमारी अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतरी, तो उसके कारण बताए जाएँ।

  • लेखक के व्यक्तित्व और पुस्तक की समीक्षा को अलग रखा जाए।

कभी-कभी मुझे लगता है कि पुस्तकों पर एक प्रकार का "अस्वीकरण" होना चाहिए—यह पुस्तक किन पाठकों के लिए लिखी गई है, इसका संकेत दिया जाए। जैसे विज्ञान की पुस्तक और कविता की पुस्तक का उद्देश्य अलग होता है; वैसे ही आत्मकथा, दर्शन, उपन्यास, शोध और प्रेरक साहित्य की अपेक्षाएँ भी अलग-अलग होती हैं। इससे पाठक अपनी रुचि और आवश्यकता के अनुसार चयन कर सकेगा और अनावश्यक निराशा भी कम होगी।

यह बात सत्य है कि लोग एक दूसरे की पुस्तकों के सकारात्मक पहलू को पाठकों के सामने लाते हैं, क्या कोई और भी तरीका है? इससे बेहतर और क्या तरीका हो सकता है पुस्तकों के बारे मे अधिक से अधिक लोगों को बताने का? क्या इसमें कुछ गलत है? गलत तो तब है जब झूठी तारीफ की जाए, इसीलिए अब जब पुस्तक छपवाना आसान होता जा रहा है तो इस बात की जरूरत आन पड़ी है कि भूमिका से पहले एक पृष्ठ इस बात पर हो कि पुस्तक किनके लिए फायदेमंद हो सकती है और पाठकों के किस वर्ग के लिए लिखी गयी है|

अंततः प्रश्न किसी एक पुस्तक या एक लेखक का नहीं है। प्रश्न यह है कि क्या हम ऐसा वातावरण बना रहे हैं जहाँ अधिक लोग पढ़ने के लिए प्रेरित हों, या ऐसा वातावरण जहाँ लोग पुस्तक खरीदने से पहले ही संदेह से भर जाएँ।

यदि हम चाहते हैं कि आने वाली पीढ़ियाँ अधिक पढ़ें, अधिक सोचें और अधिक संवेदनशील बनें, तो हमें केवल अच्छी पुस्तकें लिखने की नहीं, बल्कि पढ़ने की संस्कृति को भी सहेजने की आवश्यकता है।

क्योंकि पुस्तकें केवल पन्नों का संग्रह नहीं होतीं; वे मनुष्य और मनुष्य के बीच चलने वाला सबसे लंबा, सबसे शांत और सबसे गहरा संवाद होती हैं। और किसी भी सभ्यता का भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि वह इस संवाद को कितना जीवित रख पाती है।

 

शुभकामनाएँ

लवकुश कुमार

 अस्वीकरण - इस लेख को सँवारने के लिए, chatgpt का इस्तेमाल किया गया है|


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