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राजेश यादव - एक दोस्त जिसने हमेशा ही, लेखनी द्वारा अपनी समझ को साझा करने को प्रोत्साहित किया

यह लेख लिख रहा हूँ ताकि पाठक यह बेहतर समझ सकें कि मेरी लेखनयात्रा में प्रोत्साहन के विभिन्न रूपों या आयामों क्या महत्व है|

इस तरह की यात्रा में जहां हम कोई बात दूसरों तक पहुंचा रहे हों, यह बात बहुत मायने रखती है कि लेखक जो बात कह रहा है या जो सवाल उठा रहा है और पाठकों के जिस वर्ग को संबोधित कर रहा हो, उन तक वो बातें और सवाल पहुंचे, वह भी अपने सही अर्थों में|

इस एक उद्देश्य की दृष्टि से कुछ बातें बहुत महत्वपूर्ण हो जाती हैं:

पहली है फीडबैक या प्रतिक्रिया - इससे हमे पता चलता है कि लोगों को हमारे लेख कितने उपयोगी लगे और उनका अर्थ किस तरह लिया गया, इसका उपयोग लेखनी मे सुधार के लिए किया जा सकता है

दूसरी बात है समर्थन या प्रोत्साहन जिससे पता चलता है कि किसी लेख या पुस्तक के अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचकर उनको लाभन्वित कर सकें और लेखन को सार्थकता दे सकने की संभावना क्या है|

एक बात और, जब आप गैर साहित्यिक पृष्ठभूमि से हों और आपके साथ वाले अपनी नियमित ड्यूटी के बाद अन्य शौक में लगे हों या किसी मनोरंजन में, तो उस वक़्त लिखते रहने पर साथ वालों से उस स्तर का प्रोत्साहन नहीं मिल पाता और कभी कभी लगता है कि कहीं लिखना निरर्थक तो नहीं! 

इस बीच यदि कोई दोस्त यह कह दे कि "बढ़िया कर रहे हो भाई, इससे जरुर कई लोगों को रास्ता मिलेगा और कॉन्फिडेंस भी", तब जो संतुष्टि मिलती है उससे आने वाले कई महीने तक लिखते रहना और ज्यादा आसान हो जाता है, माने एक निरंतरता आ जाती है, अन्यथा लेखन के मूल में तो कुछ जरूरी बातें और अनुभव पहुंचाना है इसीलिए काम तो होगा ही, लेकिन साथ मे यदि प्रोत्साहन मिल जाए तो निरंतरता और बल मिलता है लेखन में|

 

"बढ़िया कर रहे हो भाई, इससे जरुर कई लोगों को रास्ता मिलेगा और कॉन्फिडेंस भी", यही बोल थे राजेश भाई के कुछ दिन पहले मेरी पुस्तक पर बातचीत के दौरान, और यह भी कहा कि जैसे-जैसे यह पुस्तक और लोगों के बीच पहुंचेगी इस पर फीडबैक आना शुरू होगा|

प्रोत्साहन के साथ सहयोग भी मिल जाए तो काम की तीव्रता और स्केल दोनों बढ़ जाते हैं, बच्चों में बाल जिज्ञासा की निशुल्क प्रतियाँ वितरित करने के वक़्त भी दोस्तों ने कई तरह से सहयोग किया|

कभी कभी चीज़ों को वक़्त पर करने के लिए वित्तीय संसाधन उधार लेने की आवश्यकता आ बनती है, ऐसी अवस्था में किसी ऐसे काम के लिए पैसे उधार देना, जिससे कोई आय नहीं होनी, हर किसी के विवेक में नहीं होता है, लेकिन राजेश भाई जैसे कुछ दोस्तों ने इस नेक कार्य के ससमय पूरा होने के निमित्त इस मौके पर साथ खड़े रहे, यह साथ आत्मविश्वास को बढाता है कि हाँ मैं जिस काम में लगा हूँ, वह वाकई लोकहित में है| और यह बढ़ा हुआ आत्मविश्वास और लोगों का हम पर विश्वास हमसे थकान में भी काम करवा लेता है वो भी ख़ुशी ख़ुशी और रचनात्मकता के साथ|

अपने चॉइस ऐसी जरुर रखें कि ऐसे साथी सबको मिलें, जो केवल तारीफ ही ना करें, हर संभव और उचित सहयोग भी करें|

राजेश भाई का उदाहरण मन में रहेगा, जैसे एक मकान की नींव|

 

शुभेच्छा 

लवकुश कुमार


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शुभकामनाएं

 

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