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संघर्ष की अनिच्छा और समाज में गिरते मूल्य! अवलोकन शृंखला | लेख सं - 003

हम अक्सर अपने से बड़ों के मुँह से सुनते हैं कि आजकल के बच्चों में जीवन-मूल्य, सामाजिक मूल्य या नैतिक मूल्य कम होते जा रहे हैं। झूठ का बोलबाला है, ईमानदारी कम हो रही है और लोगों में संवेदनशीलता भी घटती जा रही है।

लेकिन यहाँ मैं इसकी जड़ तक जाने की कोशिश कर रहा हूँ।

ईमानदारी, सत्यनिष्ठा, साहस, दया और उदारता—ये केवल अच्छी बातें या किताबों में लिखे आदर्श नहीं हैं। इन्हें अपने जीवन में बनाए रखने के लिए कई बार मेहनत करनी पड़ती है, धैर्य रखना पड़ता है और यहाँ तक कि अपने अधिकारों के लिए संघर्ष भी करना पड़ सकता है।

मसलन, ईमानदार रहना हमेशा आसान रास्ता नहीं होता। सच बोलने की कीमत चुकानी पड़ सकती है। किसी के साथ खड़े होने के लिए अपनी सुविधा छोड़नी पड़ सकती है। सही बात पर टिके रहने के लिए अकेले खड़ा होना पड़ सकता है।

लेकिन अगर हमारी जीवनशैली का उद्देश्य ही यह हो जाए कि सब कुछ आराम से मिले, तुरंत मिले और हमें किसी तरह का संघर्ष न करना पड़े, तो धीरे-धीरे हम उस संघर्ष के लिए आवश्यक क्षमता विकसित करना ही बंद कर देंगे।

और शायद यहीं से मूल्यों का क्षरण शुरू होता है।

क्योंकि मूल्य केवल सिखाए नहीं जाते, उन्हें परिस्थितियों में निभाया जाता है।
और उन्हें निभाने के लिए कभी-कभी असुविधा, धैर्य और संघर्ष—तीनों को स्वीकार करना पड़ता है।

इसलिए शायद सवाल केवल यह नहीं है कि “आज की पीढ़ी में मूल्य क्यों कम हो रहे हैं?”

एक सवाल यह भी होना चाहिए—

“क्या हमने उन्हें उन मूल्यों के लिए संघर्ष करना सिखाया है?”

 

प्रतिक्रिया का इंतज़ार रहेगा 

धन्यवाद

-लवकुश कुमार  

लेखक भौतिकी में परास्नातक हैं और अपने कार्यालयी दायित्व से इत्तर संवेदनशीलता के प्रवाह हेतु साहित्य के प्रचार प्रसार हेतु प्रयासरत हैं| 

जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना अपने जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट। वेबसाइट के उद्देश्य के बारे में जानने के लिए यहां क्लिक करें।


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सुविधाओं की राह की लंबी डगर! अवलोकन शृंखला | लेख सं - 002

जब भी किसी से बात होती है कि अमुक क्षेत्र में कोई सुविधा नहीं है, या जनता को किसी तरह की असुविधा हो रही है—तो अक्सर तुरंत कई सुझाव आने लगते हैं:

“इसे ऐसे कर देना चाहिए था…”
“वैसे कर देते तो समस्या ही नहीं होती…”

ऐसी बातें सुनकर कभी-कभी लगता है कि लोगों की नज़र में उस काम के लिए जिम्मेदार व्यक्ति को शायद तरीका ही नहीं पता!

लेकिन मुझे बात कुछ और लगती है।

मैं अभी इसके कारणों में नहीं जाना चाहता। बस एक सवाल की तरफ ध्यान खींचना चाहता हूँ—

जब एक आम आदमी के पास किसी काम को पूरा करने के लिए कई तरह के उपाय, तरकीबें और रास्ते हो सकते हैं, तो वही रास्ते उन लोगों को क्यों नहीं सूझते जिन्हें उस काम को करने की जिम्मेदारी दी गई है?

और अगर सचमुच कोई रास्ता नहीं सूझ रहा, तो फिर उस क्षेत्र की जनता से ही क्यों न पूछ लिया जाए?

आख़िर जिस व्यक्ति को रोज़ उस असुविधा से गुजरना पड़ रहा है, संभव है उसके पास समस्या का कोई सरल और व्यावहारिक समाधान हो।

यहीं से एक असहज सवाल खड़ा होता है—

कहीं ऐसा तो नहीं कि बहाने ऊपर की बात हों, और फिलहाल सुविधा को पंक्ति में खड़े आख़िरी इंसान तक पहुँचाने की नीयत ही नीचे हो?

क्योंकि किसी सुविधा का होना और उसका वास्तव में अंतिम व्यक्ति तक पहुँच जाना, दो बिल्कुल अलग बातें हैं और इसमें समय और नियत दोनों चाहिए|

-लवकुश कुमार  

लेखक भौतिकी में परास्नातक हैं और अपने कार्यालयी दायित्व से इत्तर संवेदनशीलता के प्रवाह हेतु साहित्य के प्रचार प्रसार हेतु प्रयासरत हैं| 

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रचनात्मकता अपेक्षाकृत कम लोगों में क्यों दिखती है? अवलोकन शृंखला | लेख सं - 001

अगर आपको भी लगता है कि हमारे आसपास की चीज़ें बहुत ज़्यादा एक जैसी होती जा रही हैं—वही विचार, वही तरीके, वही पसंद और वही तरह के काम—तो एक सवाल स्वाभाविक है:

आख़िर रचनात्मकता या कुछ नया करने की कोशिश हमें इतनी कम क्यों दिखाई देती है?

इसका एक कारण शायद यह है कि हम बतौर इंसान भीड़ में रहना सुरक्षित महसूस करते हैं। वही काम करना आसान लगता है, जो दूसरे कर रहे हैं। जिस रास्ते पर पहले से लोग चल रहे हों, वहाँ जोखिम कम महसूस होता है और समाज से validation भी जल्दी मिल जाता है।

इसके उलट, कुछ नया करने का मतलब अक्सर अनिश्चितता को स्वीकार करना होता है। आपको यह भी पता नहीं होता कि लोग आपके विचार को समझेंगे या नहीं, पसंद करेंगे या उसका मज़ाक उड़ाएँगे।

विडंबना यह है कि इसकी शुरुआत कई बार समाज से भी पहले हमारे अपने परिवारों से होती है। अगर परिवार में कोई व्यक्ति सामान्य रास्ते से अलग कुछ करने लगे, तो उसे प्रोत्साहित करने के बजाय अक्सर सवाल, संदेह या मज़ाक का सामना करना पड़ता है—
“इससे क्या मिलेगा?”
“लोग क्या कहेंगे?”
“सब यही कर रहे हैं, तुम भी वही करो।”

शायद इसी वजह से बहुत-से नए विचार जन्म लेने से पहले ही दब जाते हैं।

रचनात्मकता केवल प्रतिभा का मामला नहीं है। इसके लिए अलग सोचने की आज़ादी, असफल होने की गुंजाइश और थोड़ी-सी सामाजिक असहमति सहने का साहस भी चाहिए।

और शायद इसी कारण रचनात्मक लोग कम नहीं होते—बस उनमें से बहुत-से लोग अपनी रचनात्मकता को सुरक्षित रहने के लिए छिपा लेते हैं।

-लवकुश कुमार  

लेखक भौतिकी में परास्नातक हैं और अपने कार्यालयी दायित्व से इत्तर संवेदनशीलता के प्रवाह हेतु साहित्य के प्रचार प्रसार हेतु प्रयासरत हैं| 

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