बीते शनिवार (27-06-2026) हम सबके सामूहिक प्रयास और वरिष्ठजनों के प्रोत्साहन से सत्रहवीं साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा का ऑनलाइन आयोजन सफल रहा, जिसमें निम्नलिखित पुस्तकों/रचनाओं/विषयों पर सार्थक चर्चा हुयी:


केदारनाथ और पर्यटन, जरूरत इस बात पर सोचने की कि अब आस्था ही खींच रही या फिर रील संस्कृति भी
तेनजिंग से पहले के अभियानों का इतिहास, ताकि हम बेहतर समझ सकें एवरेस्ट पर फतेह को
पीपल बाबा को नानी द्वारा बचपन में ही प्रकृति-प्रेमी बना दिया (सीधे नहीं परोक्ष रूप से)
उत्तर पूर्व के हमारे देशवासियों के साथ जो भी भेदभाव की खबरें हमे सुनने को मिलती हैं इसका कारण है उनके बारे में हमारी जानकारी कम होना, क्योंकि इन पर आधारित साहित्यिक पुस्तकों की संख्या अपेक्षाकृत बहुत कम है|
श्री प्रकाश मिश्र के और भी उपन्यास हैं उत्तर पूर्वी भारत की जनजातियों पर, जिन्हे जरूर पढ़ा जाना चाहिए ताकि हम खुद से अलग एक समाज के बारे में जान सकें ताकि उनके साथ सहज हो सकें और जान सकें कि क्यों किसी के लिए अपनी पहचान बनाए रखने का संघर्ष, उसके जीवन एक एक अंग होता है|
एक बात जो जरूरी है वह है कि ऐसा साहित्य केवल इच्छा की दृष्टि से नहीं, एक जरूरत समझकर पढ़ा जाना चाहिए ताकि आपसी तालमेल, सहजता, एकता और सम्मान सुनिश्चित किया जा सके|

शैक्षिक दखल पत्रिका का प्रकाशन शैक्षिक दखल समिति द्वारा हर छमाही किया जाता है, जोकि शैक्षिक सरोकारों को समर्पित शिक्षकों तथा नागरिकों का साझा मंच है|
पुस्तक परिचर्चा में किसी भी पुस्तक पर बोलने के लिए किताब खत्म होने का इंतज़ार न करें, जितना पढ़ा है उसका संदर्भ देकर भी अपनी बात रखी जा सकता है|
कोई लेख पढ़ा है तो उस पर भी अपनी बात/अवलोकन साझा किया जा सकता है|
लाल बहादुर वर्मा का आदिवासी साहित्य हमे इस तबके को बेहतर समझने और इनके साथ संवेदित होने में मदद कर सकता है|

सोपान जोशी जी की किताब हम सबके के लिए जरूरी होनी चाहिए ताकि हम समझ सकें पर्यावरण और समाज के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी को,
ह्वेल का मल, अन्य समुद्री प्रजातियों के लिए पोषक तत्व का काम करता है|
ये समय है कि हम विचार करें और अध्ययन भी कि पहाड़ों पर बढ़ते सैलानियों का वहाँ की परिस्थितिकी पर क्या प्रभाव पड़ रहा है|
शिक्षकों को चाहिए कि यदि उन्हे विद्यार्थियों के किसी प्रश्न का जवाब नहीं आता तो उन्हें डांटने के बजाय (ऐसे प्रकरण सुनने को मिलते हैं) उनसे उस पर चर्चा कि जाए और अगर जरूरत पड़े तो समय भी मांगा जाये लेकिन उन्हे डांटकर प्रश्न पूछने के लिए हतोत्साहित न किया जाए, तब ही हम उनके अंदर की जिज्ञासा और सृजनशीलता को सही पोषण दे पाएंगे|
अगर किसी छात्र या छात्रा कि गणित या और कोई विषय कमजोर है और उसके द्वारा उस विषय को आगे चलकर छोड़ दिया जाता है तो कोई जरूरी नहीं कि इसमें उस विद्यार्थी की ही अक्षमता है, बहुत संभावना है कि उस विषय के अध्यापक उतने सक्षम न मिलें हों|
उक्त परिचर्चा में निम्नलिखित पुस्तकसाथी शामिल रहे:
आदरणीय महेश पुनेठा सर, हर्षा भण्डारी मैम,प्रियंका जोशी मैम, विशाल दा (विशाल चंद जी), कर्ण भाईजी,अंशुल मैम, कृष्णा जायसवाल, प्रिया कश्यप, प्रिया जायसवाल, प्रीति जायसवाल, शुभम गुप्ता, और लवकुश कुमार
परिचर्चा का कुशल संचालन, लिटरेरी लैंड, कानपुर के हमारे पुस्तक साथी कर्ण भाई जी ने किया, जोकि परिचर्चा को रोचक और यादगार बनाने वाला रहा|

पुस्तक परिचर्चा मे शामिल सभी पुस्तक साथियों (Bookmates) ने पुस्तक परिचर्चा मे शामिल होकर/अभिव्यक्ति/सराहना/भागीदारी के माध्यम से इस पहल को पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा देने में, मानवीय मूल्यों के पोषण में, अपनी बात को बेहिचक रखने में महत्वपूर्ण माना एवं एक दूसरे के प्रति आभार व्यक्त किया ताकि इस जरूरी कार्य की नियमितता बनी रहे एवं समाज मे एक सकारात्मक बदलाव में अपना विनम्र योगदान सुनिश्चित किया जा सके |

धन्यवाद ज्ञापन के साथ परिचर्चा को अगली परिचर्चा तक के लिए विराम दिया गया|
इस आशा के साथ कि यह रिपोर्ट पाठकों को पुस्तक परिचर्चा को समझने और उसमे शामिल होने के लिए प्रेरित करेगी |
अगली परिचर्चा 04 जुलाई (शनिवार रात 09:00 बजे) को होगी, शामिल होकर पढ़ने-लिखने की संस्कृति पर काम करने में अपना योगदान सुनिश्चित करें और पुस्तक परिचर्चा से साहित्यिक लाभ लेते हुये अपने दिन की सार्थकता में एक और आयाम जोड़ें|
धन्यवाद
-लवकुश कुमार
बीते रविवार (24-05-2026) हम सबके सामूहिक प्रयास और वरिष्ठजनों के प्रोत्साहन से बारहवीं साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा का ऑनलाइन आयोजन सफल रहा, जिसमें निम्नलिखित पुस्तकों/रचनाओं/विषयों पर सार्थक चर्चा हुयी:
अकार - पत्रिका (दिलरस प्रियंवद द्वारा संपादित)
चीफ़ की दावत – भीष्म साहनी
The Trial Week – a wellness Programme
12 Week Fitness Project –
The autobiography of Paramhansh Yoganand




उक्त परिचर्चा में निम्नलिखित पुस्तकसाथी शामिल रहे:
आदरणीय महेश पुनेठा सर, हर्षा भण्डारी मैम, गुंजन त्यागी मैम, सौम्या मैम, अरविंद कुमार, रंजीत ठाकुर, प्रिया शर्मा, अनुपम जायसवाल, प्रीति जायसवाल, गायत्री जायसवाल, अंकित जायसवाल, रंजीत कुमार, प्रिया कश्यप,विशाल जायसवाल, c सिंह और लवकुश कुमार|
पुस्तक परिचर्चा मे शामिल सभी पुस्तक साथियों (Bookmates) ने पुस्तक परिचर्चा मे शामिल होकर/अभिव्यक्ति/सराहना/भागीदारी के माध्यम से इस पहल को पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा देने में, मानवीय मूल्यों के पोषण में, अपनी बात को बेहिचक रखने में महत्वपूर्ण माना एवं एक दूसरे के प्रति आभार व्यक्त किया ताकि इस जरूरी कार्य की नियमितता बनी रहे एवं समाज मे एक सकारात्मक बदलाव में अपना विनम्र योगदान सुनिश्चित किया जा सके |
धन्यवाद ज्ञापन के साथ परिचर्चा को अगली परिचर्चा तक के लिए विराम दिया गया|
इस आशा के साथ कि यह रिपोर्ट पाठकों को पुस्तक परिचर्चा को समझने और उसमे शामिल होने के लिए प्रेरित करेगी |
अगली परिचर्चा 06 जून (शनिवार रात 08:30 बजे) को होगी, शामिल होकर पढ़ने-लिखने की संस्कृति पर काम करने में अपना योगदान सुनिश्चित करें और पुस्तक परिचर्चा से साहित्यिक लाभ लेते हुये अपने दिन की सार्थकता में एक और आयाम जोड़ें|
धन्यवाद
-लवकुश कुमार
बीते रविवार (17-05-2026) हम सबके सामूहिक प्रयास और वरिष्ठजनों के प्रोत्साहन से ग्यारहवीं साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा का ऑनलाइन आयोजन सफल रहा, जिसमें निम्नलिखित पुस्तकों/रचनाओं/विषयों पर सार्थक चर्चा हुयी:
बूढ़ा आदमी और समुद्र - अर्नेस्ट हेमिंग्वे
सांसो को पढ़ता कवि (केशव तिवारी) - सम्पादन डॉ जीवन सिंह
गबन - मुंशी प्रेमचंद
इकिगाई - लम्बे और स्वस्थ जीवन का जापानी रहस्य
अखंड ज्योति पत्रिका - गायत्री पीठ
त्यागपत्र - जैनेन्द्र कुमार

सही और जरुरी काम में लगें हैं तो हताशा या निराशा में न फंसे
पुस्तक परिचर्चा का सिलसिला जारी रहे ताकि एक मंच मौजूद रहे, साहित्य प्रेमियों के लिए, पुस्तक प्रेमियों के लिए

परिचर्चा के दौरान समीक्षा ज्यादा लम्बी न रखी जाए और तीन बिंदुओं पर ही अपनी बात में जरुर शामिल किये जाएँ यथा पुस्तक में क्या है, आपको क्यों पसंद आयी और दूसरों को यह पुस्तक क्यों पढ़नी चाहिए|

डॉ जीवन सिंह एक प्रतिष्ठित आलोचक हैं जिन्होंने कविताओं की आलोचना का पैमाना इनका तेवर, जनवादी और लोकधर्मी स्वरुप रखा

केशव तिवारी जी ने अपनी एक कविता में कहा कि यदि वह अपनी कविता के माध्यम से किसी बेईमान आदमी की आँखों में ना खटके तो कविकर्म का दायित्व अपूर्ण रह जाये
केशव तिवारी जी के काव्य में बुंदेलखंड का लोकजीवन, भूगोल, इतिहास और संघर्ष समाहित है|
क्यों पढ़ी जानी चाहिए, सांसो को पढ़ता कवि (केशव तिवारी) - सम्पादन डॉ जीवन सिंह ? ताकि काव्यशास्त्र की समझ आये, कविता विधा के शर्तों का पता चले जिनके बिना कविता अर्थ नहीं पाती, माने कौन से गुण एक रचना को कविता बनाते हैं, न तो छंदयुक्त और न तो छंदमुक्त, कविता को अर्थ मिलता है सन्दर्भ, अंदाज और कथ्य तथा शिल्प के बीच सम्बन्ध से|
मुक्तिबोध की कविताओं की अंतर्वस्तु तक पहुँचने में मददगार हो सकती हैं ऐसे समालोचनात्मक पुस्तकें
ऐसे भी साहसी विद्यार्थी हैं जो पुस्तक परिचर्चा के महत्व और निरंतरता को समझते हुए परीक्षा वाले दिन से पहले दिन भी परिचर्चा में शामिल होने के लिए व्यवस्थित रहते हैं|
उक्त परिचर्चा में निम्नलिखित पुस्तकसाथी शामिल रहे:
आदरणीय महेश चन्द्र पुनेठा सर, मुकेश जोशी जी, अंशुल मैम, सौम्या मैम, उर्मिला जायसवाल, विशाल जायसवाल, अरविंद कुमार, प्रिया शर्मा, प्रिया कश्यप, प्रिया जायसवाल, गायत्री जायसवाल, प्रीति जायसवाल, और लवकुश कुमार|
श्रोताओं को परिचर्चा से जोड़े रखने वाला समन्वय और संचालन सौम्या गुप्ता मैम और लवकुश कुमार ने किया|
पुस्तक परिचर्चा मे शामिल सभी पुस्तक साथियों (Bookmates) ने पुस्तक परिचर्चा मे शामिल होकर/अभिव्यक्ति/सराहना/भागीदारी के माध्यम से इस पहल को पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा देने में, मानवीय मूल्यों के पोषण में, अपनी बात को बेहिचक रखने में महत्वपूर्ण माना एवं एक दूसरे के प्रति आभार व्यक्त किया ताकि इस जरूरी कार्य की नियमितता बनी रहे एवं समाज मे एक सकारात्मक बदलाव में अपना विनम्र योगदान सुनिश्चित किया जा सके |
धन्यवाद ज्ञापन के साथ परिचर्चा को अगली परिचर्चा तक के लिए विराम दिया गया|
इस आशा के साथ कि यह रिपोर्ट पाठकों को पुस्तक परिचर्चा को समझने और उसमे शामिल होने के लिए प्रेरित करेगी |
अगली परिचर्चा 24 मई (रविवार रात 09 बजे) को होगी, शामिल होकर पढ़ने-लिखने की संस्कृति पर काम करने में अपना योगदान सुनिश्चित करें और पुस्तक परिचर्चा से साहित्यिक लाभ लेते हुये अपने दिन की सार्थकता में एक और आयाम जोड़ें|
धन्यवाद
-लवकुश कुमार
बीते रविवार (10-05-2026) हम सबके सामूहिक प्रयास और वरिष्ठजनों के प्रोत्साहन से दसवीं साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा का ऑनलाइन आयोजन सफल रहा, जिसमें निम्नलिखित पुस्तकों/रचनाओं/विषयों पर सार्थक चर्चा हुयी:
ब्राह्मण की बेटी – शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय
जीत आपकी- शिव खेड़ा
संबंध और क्या है जीवन- आचार्य प्रशांत



जीवन सम्बन्ध है। व्यक्ति का व्यक्ति से सम्बन्ध, प्रकृति से सम्बन्ध, समाज से सम्बन्ध।
इन सम्बन्धों का आधार क्या है?
क्या है हमारे सम्बन्धों की वास्तविकता ?
क्या हमारे सम्बन्ध डर, लालच, मोह, आसक्ति की छाया मात्र हैं, या ये प्रेम की अभिव्यक्ति हैं?
क्या हमारे सम्बन्ध अकेलेपन से बचने के उपाय हैं, या आन्तरिक पूर्णता का प्रस्फुटन ?
और क्या है, सच्चा प्रेम?

उक्त परिचर्चा में निम्नलिखित पुस्तकसाथी शामिल रहे:
अंशिका शर्मा मैम, हिमांशु जोशी जी, उर्मिला जायसवाल, विशाल जायसवाल, अंजना वर्मा, आरती मैम, अरविंद कुमार, धर्मेंद्र शर्मा सर, शोभित, प्रिया शर्मा, लक्ष्मण जोशी, प्रिया जायसवाल, गायत्री जायसवाल, विजय कुमार, प्रिय कश्यप और कर्ण भाईजी|
कुशल और श्रोताओं को परिचर्चा से जोड़े रखने वाला समन्वय और संचालन कर्ण भाईजी ने किया|
पुस्तक परिचर्चा मे शामिल सभी पुस्तक साथियों (Bookmates) ने पुस्तक परिचर्चा मे शामिल होकर/अभिव्यक्ति/सराहना/भागीदारी के माध्यम से इस पहल को पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा देने में, मानवीय मूल्यों के पोषण में, अपनी बात को बेहिचक रखने में महत्वपूर्ण माना एवं एक दूसरे के प्रति आभार व्यक्त किया ताकि इस जरूरी कार्य की नियमितता बनी रहे एवं समाज मे एक सकारात्मक बदलाव में अपना विनम्र योगदान सुनिश्चित किया जा सके |
धन्यवाद ज्ञापन के साथ परिचर्चा को अगली परिचर्चा तक के लिए विराम दिया गया|
इस आशा के साथ कि यह रिपोर्ट पाठकों को पुस्तक परिचर्चा को समझने और उसमे शामिल होने के लिए प्रेरित करेगी |
अगली परिचर्चा 17 मई (रविवार रात 09 बजे) को होगी, शामिल होकर पढ़ने-लिखने की संस्कृति पर काम करने में अपना योगदान सुनिश्चित करें और पुस्तक परिचर्चा से साहित्यिक लाभ लेते हुये अपने दिन की सार्थकता में एक और आयाम जोड़ें|
धन्यवाद
-लवकुश कुमार
बीते रविवार (03-05-2026) हम सबके सामूहिक प्रयास और वरिष्ठजनों के प्रोत्साहन से नौवीं साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा का ऑनलाइन आयोजन सफल रहा, जिसमें निम्नलिखित पुस्तकों/रचनाओं/विषयों पर सार्थक चर्चा हुयी:
कबिरा सोई पीर है (उपन्यास) - प्रतिभा कटियार (लोकभारती प्रकाशन, लेखिका अजीम प्रेमजी फाउंडेशन की कार्यकर्ता हैं)
स्मारिका - उमेश डोभाल स्मृति ट्रस्ट
अब पहुंची हो तुम (कविता संग्रह) - महेश चन्द्र पुनेठा
मुसाफिर कैफे - दिव्य प्रकाश दुबे
खाकी में इंसान - अशोक कुमार साथ में लोकेश ओहरी
नचिकेता - महेश चन्द्र पुनेठा


उक्त परिचर्चा में निम्नलिखित पुस्तकसाथी शामिल रहे:
आदरणीय महेश चन्द्र पुनेठा सर, हिमांशु जोशी जी, आकाश कश्यप, कृष्णा जायसवाल, गुंजन त्यागी मैम, प्रिया शर्मा, अमितेन्द्र सिंह, सौम्या मैम, कपिल देव, अंशुल पाण्डेय, सौम्या वर्मा, प्रिया, लक्ष्मण जोशी, उर्मिला, सिद्धार्थ यादव, विजय कुमार, ममता, गायत्री जायसवाल, अरुण मौर्या और लवकुश|


पुस्तक परिचर्चा मे शामिल सभी पुस्तक साथियों (Bookmates) ने पुस्तक परिचर्चा मे शामिल होकर/अभिव्यक्ति/सराहना/भागीदारी के माध्यम से इस पहल को पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा देने में, मानवीय मूल्यों के पोषण में, अपनी बात को बेहिचक रखने में महत्वपूर्ण माना एवं एक दूसरे के प्रति आभार व्यक्त किया ताकि इस जरूरी कार्य की नियमितता बनी रहे एवं समाज मे एक सकारात्मक बदलाव में अपना विनम्र योगदान सुनिश्चित किया जा सके |
धन्यवाद ज्ञापन के साथ परिचर्चा के संचालक लवकुश कुमार ने परिचर्चा को अगली परिचर्चा तक के लिए विराम दिया |
इस आशा के साथ कि यह रिपोर्ट पाठकों को पुस्तक परिचर्चा को समझने और उसमे शामिल होने के लिए प्रेरित करेगी |
अगली परिचर्चा 10 मई, रविवार रात 09 बजे होगी, शामिल होकर पढ़ने-लिखने की संस्कृति पर काम करने में अपना योगदान सुनिश्चित करें और पुस्तक परिचर्चा से साहित्यिक लाभ लेते हुये अपने दिन की सार्थकता में एक और आयाम जोड़ें|
धन्यवाद
-लवकुश कुमार
पुस्तक परिचर्चा में केवल पुस्तकों पर ही बात नहीं होती, इसमें पुस्तकों के महत्व पर भी बात होती है और एक मंच को निरंतरता मिलती है कि कल कोई जुझारू युवा जुड़े और इस मुहिम को और आगे तक ले जाए।
शुभकामनाएं
लवकुश कुमार
बीते रविवार (26-04-2026) हम सबके सामूहिक प्रयास और आदरणीय महेश चन्द्र पुनेठा सर के प्रोत्साहन से आठवीं साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा का ऑनलाइन आयोजन सफल रहा, जिसमें निम्नलिखित पुस्तकों/रचनाओं/विषयों पर सार्थक चर्चा हुयी:
सर्जनात्मक शिक्षा – डॉ राघव प्रकाश एवं डॉ सविता पालीवाल
बाघेन – नवीन जोशी
जीव जंतुओं की विचित्र आदतें और प्रवृत्तियाँ - राजेंद्र कुमार राजीव
अविज्ञान – नरेंद्र कोहली
आषाढ़ का एक दिन – मोहन राकेश
प्रफुल्ल चन्द्र राय – पं श्रीराम शर्मा आचार्य
देवेंद्र मेवाड़ी के नाट्य साहित्य में बाल मनोविज्ञान (शोधपत्र)
तुम तो अच्छे मुसलमान थे रहमान
कमरुनिशा का कटोरदान




उक्त परिचर्चा में निम्नलिखित पुस्तकसाथी शामिल रहे:
आदरणीय महेश चन्द्र पुनेठा सर, हर्षा भंडारी मैम, कृष्णकांन्त वर्मा,आरती मैम, अंकित मिश्रा सर, गुंजन त्यागी मैम, नंदेश्वर, अमितेन्द्र सिंह, सौम्या मैम, सचिन सिंह, अंशुल, शोभित, प्रिया, दिव्याशु, लक्ष्मण जोशी, प्रिया जायसवाल, उर्मिला, सिद्धार्थ यादव, अरुण मौर्या और लवकुश|
पुस्तक परिचर्चा मे शामिल सभी पुस्तक साथियों (Bookmates) ने पुस्तक परिचर्चा मे शामिल होकर/अभिव्यक्ति/सराहना/भागीदारी के माध्यम से इस पहल को पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा देने में, मानवीय मूल्यों के पोषण में, अपनी बात को बेहिचक रखने में महत्वपूर्ण माना एवं एक दूसरे के प्रति आभार व्यक्त किया ताकि इस जरूरी कार्य की नियमितता बनी रहे एवं समाज मे एक सकारात्मक बदलाव में अपना विनम्र योगदान सुनिश्चित किया जा सके |
धन्यवाद ज्ञापन के साथ परिचर्चा के संचालक लवकुश कुमार ने परिचर्चा को अगली परिचर्चा तक के लिए विराम दिया |
इस आशा के साथ कि यह रिपोर्ट पाठकों को पुस्तक परिचर्चा को समझने और उसमे शामिल होने के लिए प्रेरित करेगी |
अगली परिचर्चा 02 मई (रविवार रात 09 बजे) को होगी, शामिल होकर पढ़ने-लिखने की संस्कृति पर काम करने में अपना योगदान सुनिश्चित करें और पुस्तक परिचर्चा से साहित्यिक लाभ लेते हुये अपने दिन की सार्थकता में एक और आयाम जोड़ें|
धन्यवाद
-लवकुश कुमार
प्रस्तुत हैं कुछ पोस्टर:

दूसरा पोस्टर

तीसरा पोस्टर

कुछ अन्य लिंक :
सातवीं ऑनलाइन साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा 19-04-2026
छठी ऑनलाइन साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा 12-04-2026
पांचवीं ऑनलाइन साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा 05-04-2026
चौथी पुस्तक परिचर्चा (29-03-2026) का विवरण यथा पुस्तकें एवं शामिल पुस्तक साथियों के नाम और इनपुट्स
मानव हो, न मानविकी से दूर रहो (कविता)
क्यों शामिल हों पुस्तक परिचर्चा मे ? कुछ जरूरी जो पाया जा सकता है, एक दृष्टि |
शुभकामनाएँ और धन्यवाद
लवकुश कुमार
बीते रविवार (19-04-2026) को हम सबके सामूहिक प्रयास और आदरणीय महेश चन्द्र पुनेठा सर के प्रोत्साहन से सातवीं साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा का ऑनलाइन आयोजन सफल रहा, जिसमें निम्नलिखित पुस्तकों/रचनाओं/विषयों पर सार्थक चर्चा हुयी:




न हारा है इश्क़ और न दुनिया थकी है
दिया जल रहा है हवा चल रही है - ख़ुमार बाराबंकवी

अकेलेपन का डर हमें अक्सर हमारे जीवन को अन्य वस्तुओं से भरने
पर मजबूर कर देता है। वहीं से उन वस्तुओं के प्रति आसक्ति का जन्म
होता है, जिसके कारण हमें जीवन में न जाने कितना दुःख भोगना
पड़ता है। यदि इस डर को गहराई से समझा जाए तो जीवन सरल
और बोधपूर्ण हो जाएगा। यह किताब हमें उस डर के पार ले जाने का
एक प्रयास है। - अकेलापन और निर्भरता पुस्तक के कवर पृष्ठ से
उक्त परिचर्चा में निम्नलिखित पुस्तकसाथी शामिल रहे:
योगेश बिष्ट (किताबवाला दोस्त), अवनीश त्रिपाठी, हिमांशु जोशी, लाल बहादुर, अमितेन्द्र सिंह, कर्ण भाईजी(लिटरेरी लैंड), सौम्या मैम, सिद्धि तिवारी मैम, सचिन सिंह, शिवम राय, अंशुल, शोभित, आशुतोष, राजन वर्मा, आशुतोष श्रीवास्तव,अरविंद कुमार, गायत्री, प्रिया, दिव्याशु, लक्ष्मण जोशी, प्रिया जायसवाल, उर्मिला, उमा जायसवाल और लवकुश|

धन्यवाद ज्ञापन के साथ परिचर्चा के संचालक लवकुश कुमार ने परिचर्चा को अगली परिचर्चा तक के लिए विराम दिया |
पुस्तक परिचर्चा मे शामिल सभी पुस्तक साथियों (bookmates) ने पुस्तक परिचर्चा मे शामिल होकर/अभिव्यक्ति/सराहना/भागीदारी के माध्यम से इस पहल को पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा देने में, मानवीय मूल्यों के पोषण में, अपनी बात को बेहिचक रखने में महत्वपूर्ण माना एवं एक दूसरे के प्रति आभार व्यक्त किया ताकि इस जरूरी कार्य की नियमितता बनी रहे एवं समाज मे एक सकारात्मक बदलाव में अपना विनम्र योगदान सुनिश्चित किया जा सके |
इस आशा के साथ कि यह रिपोर्ट पाठकों को पुस्तक परिचर्चा को समझने और उसमे शामिल होने के लिए प्रेरित करेगी |
अगली परिचर्चा 26 अप्रैल को होगी, शामिल होकर पढ़ने-लिखने की संस्कृति पर काम करने में अपना योगदान सुनिश्चित करें।
धन्यवाद
-लवकुश कुमार
बीते रविवार (12-04-2026) हम सबके सामूहिक प्रयास और आदरणीय महेश चन्द्र पुनेठा सर के प्रोत्साहन से छठी साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा का ऑनलाइन आयोजन सफल रहा, जिसमें निम्नलिखित पुस्तकों/रचनाओं/विषयों पर सार्थक चर्चा हुयी:
अगली परिचर्चा 19 अप्रैल को होगी, शामिल होकर पढ़ने लिखने की संस्कृति पर काम करने में अपना योगदान सुनिश्चित करें।

धन्यवाद ज्ञापन के साथ परिचर्चा के संचालक लवकुश कुमार ने परिचर्चा को अगली परिचर्चा तक के लिए विराम दिया |
उक्त परिचर्चा में निम्नलिखित पुस्तकसाथी शामिल रहे:
सौम्या मैम, आंशिका मैम, प्रदीप छाजेड़ भैया, अंकित, गायत्री, प्रिया, दिव्याशु और लवकुश।

प्रदीप भैया ने कई कविताओं के द्वारा मानवीय संबंधों में समुचित संचार (proper communication) की जरूरत पर प्रकाश डाला।

पुस्तक परिचर्चा मे शामिल सभी पुस्तक साथियों (bookmates) ने पुस्तक परिचर्चा मे शामिल होकर/अभिव्यक्ति/सराहना/भागीदारी के माध्यम से इस पहल को पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा देने में, मानवीय मूल्यों के पोषण में, अपनी बात को बेहिचक रखने में महत्वपूर्ण माना एवं एक दूसरे के प्रति आभार व्यक्त किया ताकि इस जरूरी कार्य की नियमितता बनी रहे एवं समाज मे एक सकारात्मक बदलाव में अपना विनम्र योगदान सुनिश्चित किया जा सके |
इस आशा के साथ कि यह रिपोर्ट पाठकों को पुस्तक परिचर्चा को समझने और उसमे शामिल होने के लिए प्रेरित करेगी |
धन्यवाद
-लवकुश कुमार
