किताबें सिर्फ़ पढ़ी नहीं जातीं…
वे हमारे भीतर नए विचारों को जन्म देती हैं।
इसी विचार-यात्रा को आगे बढ़ाते हुए कुमार चेतना मंच एवं लिटरेरी लैंड रीडर्स क्लब, कानपुर द्वारा आयोजित 24वीं पुस्तक परिचर्चा में आप सभी पुस्तक-प्रेमियों, पाठकों एवं साहित्य-रसिकों को सादर आमंत्रण।
दिनांक: 06 सितंबर 2026
समय: शाम 8:30 बजे
माध्यम: Google Meet
लिंक - https://meet.google.com/ntu-cpvm-miw
संपर्क:
9792492227 | 9795675065
Website: kumarchetna.in
Facebook: Literary Land Readers Club
Instagram: https://www.instagram.com/_aksharam__?igsh=MWd3NHB2cnZlemtkbg==
YouTube: https://youtube.com/@literaryland_bft?si=OQjCkcOAJhVsx_R1
https://www.youtube.com/@kumarCHETNAPSW
आपकी सहभागिता ही इस पुस्तक-यात्रा की सबसे बड़ी उपलब्धि है।

बीते रविवार (02/08/2026 ) हम सबके सामूहिक प्रयास और वरिष्ठजनों के प्रोत्साहन से 22वीं साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा का ऑनलाइन आयोजन सफल रहा, जिसमें निम्नलिखित पुस्तकों पर सार्थक चर्चा हुयी:
अब पहुंची हो तुम – महेश चन्द्र पुनेठा : शिक्षाविद, समाज के अध्येता और साहित्यकार, आदरणीय पुनेठा सर की सामाजिक सरोकारों, मानवीय अहसासों और असंगतियों को लेकर संवेदित करने वाली कविताओं का संग्रह| प्रकाशक – समय साक्ष्य प्रकाशन देहारादून
प्रस्तावक – लवकुश कुमार
101 लघुकथाएँ– डॉ विजय अग्रवाल : हमारे रोज़मर्रा जीवन की छोटी छोटी लेकिन महत्वपूर्ण घटनाओ पर पूर्व आई ए एस अधिकारी और शिक्षाविद आदरणीय डॉ अग्रवाल सर की बारीक नज़र के अवलोकन पर आधारित स्पष्टता देने वाली और संवेदित करने वाला एक बेहतरीन लघुकथा संग्रह| प्रकाशक – बेनतेन प्रकाशन, भोपाल वेबसाइट- afeias.com
प्रस्तावक – सौम्या गुप्ता मैम
शिक्षा में प्रयोग: अनुभवों की दास्तान – अरविंद गुप्ता (चंद्रकला जोशी- शेखर जोशी स्मृति व्याख्यान -2 ): जाने माने प्रयोगिक विज्ञानी अरविंद गुप्ता सर द्वारा देश दुनिया के विभिन्न वैकल्पिक स्कूलों (परंपरागत स्कूल से अलग) के बारे जानकारी देने वाली और बच्चों के समुचित और अबाधित विकास के लिए जरूरी शैक्षणिक बदलावों पर बात करती एक पढ़ी जाने योग्य पुस्तक| प्रकाशक – नवारुण प्रकाशन, गाजियाबाद , वेबसाइट- arvindguptatoys.com
प्रस्तावक – लवकुश कुमार
कबीरा सोई पीर है- प्रतिभा कटियार : जातीय दंश और समाज में महिलाओं की स्थिति की धरातल की सच्चाई से रूबरू कराता एक बेहतरीन उपन्यास जिसमें बताया गया है कि जिस पर बीतती है वही जानता है कि क्या होता है जातिगत भेदभाव और क्यों एक औरत ही दूसरी औरत की आजादी को बांध देती है| सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी करते कुछ युवाओं को लेकर लिखा गया एक बेहतरीन उपन्यास|
प्रस्तावक – आरती मैम
अंतस जरा ठहरिए – लवकुश कुमार : इस पुस्तक में युवाओं/किशोरों को ध्यान में रखकर रोज़मर्रा के मामलों को लेकर संवेदित करने वाले और जागरूक करने वाले लेखों का संकलन है और साथ ही अतिथि लेखकों की कविताएं और लेख तथा बेहतरीन पुस्तकों एवं फिल्मों की सूची, पाठकों को एक जिम्मेदार, साहसी और संवेदनशील इंसान बनने में मदद कर सकती है|
प्रकाशक – notion प्रकाशन चेन्नई के प्लैटफ़ार्म पर स्व प्रकाशन
प्रस्तावक – अवनीश त्रिपाठी जी, राष्ट्रीय विज्ञान शिक्षा एवं शोध संस्थान
मेरी दोस्त हवा- आचार्य प्रशांत
स्वच्छ हवा की महत्ता, इसके प्रदूषण के कारण और दुष्परिणामों को रेखांकित एक बेहतरीन सचित्र बाल कविता|
प्रस्तावक – पार्थ कुमार

उक्त परिचर्चा में निम्नलिखित पुस्तकसाथी शामिल रहे:
सौम्या मैम, अवनीश त्रिपाठी जी, आरती मैम, गायत्री जायसवाल, उमा मैम, उर्मिला जायसवाल, पार्थ कुमार और लवकुश कुमार |
जिनके द्वारा मुख्यतः निम्नलिखित बिन्दुओं/विषयों/रचनाओं पर बात रखी गयी:
सौम्या मैम :
अवनीश त्रिपाठी जी:
उम्र भर ख्याली भूतों से अगर मैं न डरता,
खुदा! मै क्या ज़ोर से जीता,
खुदा! मैं क्या चैन से मरता!”

आरती मैम:
पार्थ कुमार:
कई बाल कविताओं (खासकर आचार्य प्रशांत द्वारा लिखित, “मेरी दोस्त हवा” ) का पाठ किया और कुछ कहानियों का वाचन भी किया, जो सभी पुस्तक साथियों के लिए रोचक रहा और यह बात भी साबित हुयी कि बच्चों के पास कहने के लिए बहुत कुछ है बशर्ते आपके पास सुनने के लिए समय हो|

लवकुश कुमार (परिचर्चा समन्वयक):
किस मिट्टी के बने हैं पिताजी
कितना खतरनाक है

पुस्तक परिचर्चा मे शामिल सभी पुस्तक साथियों (Bookmates) ने पुस्तक परिचर्चा मे शामिल होकर/अभिव्यक्ति/सराहना/भागीदारी के माध्यम से इस पहल को पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा देने में, मानवीय मूल्यों के पोषण में, अपनी बात को बेहिचक रखने में महत्वपूर्ण माना एवं एक दूसरे के प्रति आभार व्यक्त किया ताकि इस जरूरी कार्य की नियमितता बनी रहे एवं समाज मे एक सकारात्मक बदलाव में अपना विनम्र योगदान सुनिश्चित किया जा सके |
धन्यवाद ज्ञापन के साथ परिचर्चा को अगली कड़ी तक के लिए विराम दिया गया|
इस आशा के साथ कि यह रिपोर्ट पाठकों को पुस्तक परिचर्चा को समझने और उसमे शामिल होने के लिए प्रेरित करेगी |
जिसमें जुड़ने का लिंक https://meet.google.com/swt-bgrq-xup है, शामिल होकर पढ़ने-लिखने की संस्कृति पर काम करने में अपना योगदान सुनिश्चित करें और पुस्तक परिचर्चा से साहित्यिक लाभ लेते हुये अपने दिन की सार्थकता में एक और आयाम जोड़ें|
यदि आप भी समाज मे एक बेहतर बदलाव की आकांक्षा रखते हैं/ रखती हैं तो लोगों को अच्छी पुस्तकों से जोड़ना बहुत जरूरी है, उसी प्रयास का एक हिस्सा है यह परिचर्चा शृंखला|
केवल पढ़ें ही नहीं उसे अन्य लोगों के साथ साझा भी करें|
धन्यवाद
-लवकुश कुमार

कल शनिवार (25-07-2026) हम सबके सामूहिक प्रयास और वरिष्ठजनों के प्रोत्साहन से इकीसवीं साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा का ऑनलाइन आयोजन सफल रहा, जिसमें निम्नलिखित पुस्तकों पर सार्थक चर्चा हुयी:
मैडम सर – मंजरी जारूहार : बिहार की पहली महिला आई पी एस अधिकारी की आत्मकथा और संस्मरण, जीवन के संघर्षों और चुनौतियों को समझने का एक झरोखा
प्रस्तावक – जीशान अंसारी जी
तोतो चान – तेत्सुको कुरोयानागी : एक बच्ची की आत्मकथा के रूप में एक बेहतरीन और गैर परंपरागत जापानी विद्यालय की कहानी, प्राथमिक शिक्षा के शिक्षकों और माता-पिता के लिए एक बहुत जरूरी किताब|
प्रस्तावक – लवकुश कुमार
धुप्पल – भगवती चरण वर्मा : जाने माने साहित्यकार और चित्रलेखा सरीखे उपन्यास के रचयिता भगवती चरण वर्मा के जीवन के कुछ किस्से जिसमें उन्होने इस बात को रेखांकित करने का प्रयास किया है कि उनके जीवन की उपलब्धियां, मेल मिलाप उनकी लेखकीय क्षमता से ज्यादा इत्तेफाक और परिस्थितियों की दें हैं, एक पढे जाने योग्य बेबाकी से लिखी हुयी पुस्तक|
प्रस्तावक – लवकुश कुमार
कबीरा सोई पीर है- प्रतिभा कटियार : जातीय दंश और समाज में महिलाओं की स्थिति की धरातल की सच्चाई से रूबरू कराता एक बेहतरीन उपन्यास जिसमें बताया गया है कि जिस पर बीतती है वही जानता है कि क्या होता है जातिगत भेदभाव और क्यों एक औरत ही दूसरी औरत की आजादी को बांध देती है| सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी करते कुछ युवाओं को लेकर लिखा गया एक बेहतरीन उपन्यास|
प्रस्तावक – लवकुश कुमार
अमृता इमरोज – उमा त्रिलोक : इस पुस्तक में अमृता जी का साक्षात्कार है, जिसमें उन्होने अपने और इमरोज जी के रिश्ते पर बात की है और बात की है कि क्यों उन्हे अपने रिश्ते को सामाजिक स्वीकृति की जरूरत महसूस नहीं और उन्होने शादी नहीं की, और भी बहुत कुछ जो पाठकों को स्पष्टता दे सकता है, संस्थाओं की सार्थकता पर|
प्रस्तावक – प्रिया कश्यप
चेकमेट जिंदगी (जियो जी भर के) – प्रदीप “पंकज” : जीवन के संघर्षों, भावनात्मक पहलुओं, विविध रंगो और इसे बेहतरीन तरीके से जीने के फलसफ़ों के जानने के लिए जरूर पढ़ें या कविता संग्रह|
प्रस्तावक – आरती मैम
संघर्ष (अपने विरुद्ध) – आचार्य प्रशांत : दूसरों के विरुद्ध जाना हमेशा आसान होता है लेकिन अपने विरुद्ध जाना नहीं| जिस दिन हम अपने भीतर की लड़ाइयों को जीत लेंगे हम पाएंगे कि बाहर की लड़ाइयाँ आसान हो गयी हैं| ऐसी ही बहुत सारी स्पष्टता वाली बातों से परिचित होने के लिए जरूर पढ़ें यह पुस्तक|
प्रस्तावक – सौम्या मैम


उक्त परिचर्चा में निम्नलिखित पुस्तकसाथी शामिल रहे:
जीशान अंशारी जी, सौम्या मैम, शाश्वतम, प्रीति जायसवाल, आरती मैम, गायत्री जायसवाल, प्रिया कश्यप, उर्मिला जायसवाल, पार्थ कुमार और लवकुश कुमार |

जिनके द्वारा निम्नलिखित बिन्दु/विषय/रचनाओं का रेखांकन किया गया:
जीशान अंसारी जी :
• बिहार की पहली महिला आई पी एस अधिकारी आगे चलकर सरदार वल्लभ भाई पटेल पुलिस अकादमी की निदेशक बनती हैं यह उनकी दृढ़ता, अपने काम को लेकर सजगता और काबिलियत का ही फल है और साथ में इस देश में संविधान से मिली हमे ताकत और अवसरों में समानता का भी|
सौम्या मैम :
• सोशल मीडिया पर प्रदर्शित किया गया जीवन अक्सर झूठ होता है|
• हम जिन बातों की वजह से दुख में होते हैं कहीं न कहीं हम दुखों से तो छुटकारा चाहते हैं लेकिन बिना बातों/आदतों/चॉइस को छोड़े बिना!
प्रिया कश्यप:
• अमृता-इमरोज पुस्तक से एक अंश को उद्धृत करती हुयी कहती हैं कि शादी के बाद भी जीवन मे शांति और ईमानदारी नहीं देखने को मिलती उस अवस्था मे अगर अमृता इमरोज ने बिना शादी के भी यदि ईमानदारी से एक दूसरे का सहारा बनते हुये, एक दुसे का ख्याल रखते हुये अपना जीवन जिया है तो यह बात पहले पहल भले ही अजीब लगे लेकिन बाद में इसमे कोई खामी नहीं दिखती|
आरती मैम:
• जीवन में सघर्षों से न घबराने पर एक कविता का पाठ किया जिसका एक अंश निम्नलिखित है
ये जरूरी नहीं कि तुम जीतों ही हर बार
गलती जो भी की है उसको करो स्वीकार
बस एक रास्ता गर कभी हो भी गया बंद
तुम रोना धोना नहीं बस मुस्कुराओ मंद मंद
अब शुरू होगा तुम्हारा असली वाला इम्तिहान
जो देगा तुम्हें मौका बनाने का खुद की पहचान
मिलेगा अनुभव यहीं और पैनी होगी धार
चाहे फिर इस पार हो या हो फिर उस पार
पार्थ कुमार:
कई बाल कविताओं का पाठ किया और कुछ कहानियों का वाचन भी किया, जो सभी पुस्तक साथियों के लिए रोचक रहा और यह बात भी साबित हुयी कि बच्चों के पास कहने के लिए बहुत कुछ है बशर्ते आपके पास सुनने के लिए समय हो|
लवकुश कुमार (परिचर्चा समन्वयक):
• किसी क्षेत्र में काम करने वाले पहले इंसान को क्या क्या दिक्कतें होती हैं और वह कैसे अपनी आंतरिक दृढ़ता और स्पष्टता से इन चुनौतियों से पार पाता है या यूं कह लें कि एक पितृसत्तामक समाज में पहली महिला आई पी एस अधिकारी को कौन सी चुनौतियों से दो चार होना पड़ता है और वह उनसे कैसे पार पाती है, इस पर यदि किताब और साहित्य मौजूद हैं तो हम अन्य क्षेत्रों के लिए भी खुद को तैयार कर सकते हैं|
• बच्चों के साथ सहज होकर उन्हे समझते हुये, खेल खेल में उन्हे सिखाने, अमूमन प्रकृति के बीच सैर के दौरान फूल और फल का बनना समझाना, पौष्टिक भोजन के महत्व को इस तरह व्यक्त करना कि हर रोज टिफ़िन में कुछ समुद्र से और कुछ पहाड़ से होना जरूरी है और उन्हे अच्छा एवं खास महसूस कराते हुये और उनकी रुचियों के अनुरूप विद्यालय बनाने को लेकर लिखी गयी पुस्तक पर अपने विचार रखे|
• उक्त पुस्तक से दो पोस्टर शामिल किए जा रहे हैं, अन्य पोस्टर के लिए kumarchetna.in/poster.php पर विजिट किया जा सकता है|


पुस्तक परिचर्चा मे शामिल सभी पुस्तक साथियों (Bookmates) ने पुस्तक परिचर्चा मे शामिल होकर/अभिव्यक्ति/सराहना/भागीदारी के माध्यम से इस पहल को पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा देने में, मानवीय मूल्यों के पोषण में, अपनी बात को बेहिचक रखने में महत्वपूर्ण माना एवं एक दूसरे के प्रति आभार व्यक्त किया ताकि इस जरूरी कार्य की नियमितता बनी रहे एवं समाज मे एक सकारात्मक बदलाव में अपना विनम्र योगदान सुनिश्चित किया जा सके |
धन्यवाद ज्ञापन के साथ परिचर्चा को अगली कड़ी तक के लिए विराम दिया गया|

इस आशा के साथ कि यह रिपोर्ट पाठकों को पुस्तक परिचर्चा को समझने और उसमे शामिल होने के लिए प्रेरित करेगी |
अगली परिचर्चा 01 अगस्त, शनिवार रात 08:30 बजे होगी(जिसका ,लिंक निम्नलिखित है - https://meet.google.com/oko-yodo-zqc ), शामिल होकर पढ़ने-लिखने की संस्कृति पर काम करने में अपना योगदान सुनिश्चित करें और पुस्तक परिचर्चा से साहित्यिक लाभ लेते हुये अपने दिन की सार्थकता में एक और आयाम जोड़ें|
केवल पढ़ें ही नहीं उसे अन्य लोगों के साथ साझा भी करें|
धन्यवाद
-लवकुश कुमार

बीते शनिवार (27-06-2026) हम सबके सामूहिक प्रयास और वरिष्ठजनों के प्रोत्साहन से सत्रहवीं साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा का ऑनलाइन आयोजन सफल रहा, जिसमें निम्नलिखित पुस्तकों/रचनाओं/विषयों पर सार्थक चर्चा हुयी:


केदारनाथ और पर्यटन, जरूरत इस बात पर सोचने की कि अब आस्था ही खींच रही या फिर रील संस्कृति भी
तेनजिंग से पहले के अभियानों का इतिहास, ताकि हम बेहतर समझ सकें एवरेस्ट पर फतेह को
पीपल बाबा को नानी द्वारा बचपन में ही प्रकृति-प्रेमी बना दिया (सीधे नहीं परोक्ष रूप से)
उत्तर पूर्व के हमारे देशवासियों के साथ जो भी भेदभाव की खबरें हमे सुनने को मिलती हैं इसका कारण है उनके बारे में हमारी जानकारी कम होना, क्योंकि इन पर आधारित साहित्यिक पुस्तकों की संख्या अपेक्षाकृत बहुत कम है|
श्री प्रकाश मिश्र के और भी उपन्यास हैं उत्तर पूर्वी भारत की जनजातियों पर, जिन्हे जरूर पढ़ा जाना चाहिए ताकि हम खुद से अलग एक समाज के बारे में जान सकें ताकि उनके साथ सहज हो सकें और जान सकें कि क्यों किसी के लिए अपनी पहचान बनाए रखने का संघर्ष, उसके जीवन एक एक अंग होता है|
एक बात जो जरूरी है वह है कि ऐसा साहित्य केवल इच्छा की दृष्टि से नहीं, एक जरूरत समझकर पढ़ा जाना चाहिए ताकि आपसी तालमेल, सहजता, एकता और सम्मान सुनिश्चित किया जा सके|

शैक्षिक दखल पत्रिका का प्रकाशन शैक्षिक दखल समिति द्वारा हर छमाही किया जाता है, जोकि शैक्षिक सरोकारों को समर्पित शिक्षकों तथा नागरिकों का साझा मंच है|
पुस्तक परिचर्चा में किसी भी पुस्तक पर बोलने के लिए किताब खत्म होने का इंतज़ार न करें, जितना पढ़ा है उसका संदर्भ देकर भी अपनी बात रखी जा सकता है|
कोई लेख पढ़ा है तो उस पर भी अपनी बात/अवलोकन साझा किया जा सकता है|
लाल बहादुर वर्मा का आदिवासी साहित्य हमे इस तबके को बेहतर समझने और इनके साथ संवेदित होने में मदद कर सकता है|

सोपान जोशी जी की किताब हम सबके के लिए जरूरी होनी चाहिए ताकि हम समझ सकें पर्यावरण और समाज के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी को,
ह्वेल का मल, अन्य समुद्री प्रजातियों के लिए पोषक तत्व का काम करता है|
ये समय है कि हम विचार करें और अध्ययन भी कि पहाड़ों पर बढ़ते सैलानियों का वहाँ की परिस्थितिकी पर क्या प्रभाव पड़ रहा है|
शिक्षकों को चाहिए कि यदि उन्हे विद्यार्थियों के किसी प्रश्न का जवाब नहीं आता तो उन्हें डांटने के बजाय (ऐसे प्रकरण सुनने को मिलते हैं) उनसे उस पर चर्चा कि जाए और अगर जरूरत पड़े तो समय भी मांगा जाये लेकिन उन्हे डांटकर प्रश्न पूछने के लिए हतोत्साहित न किया जाए, तब ही हम उनके अंदर की जिज्ञासा और सृजनशीलता को सही पोषण दे पाएंगे|
अगर किसी छात्र या छात्रा कि गणित या और कोई विषय कमजोर है और उसके द्वारा उस विषय को आगे चलकर छोड़ दिया जाता है तो कोई जरूरी नहीं कि इसमें उस विद्यार्थी की ही अक्षमता है, बहुत संभावना है कि उस विषय के अध्यापक उतने सक्षम न मिलें हों|
उक्त परिचर्चा में निम्नलिखित पुस्तकसाथी शामिल रहे:
आदरणीय महेश पुनेठा सर, हर्षा भण्डारी मैम,प्रियंका जोशी मैम, विशाल दा (विशाल चंद जी), कर्ण भाईजी,अंशुल मैम, कृष्णा जायसवाल, प्रिया कश्यप, प्रिया जायसवाल, प्रीति जायसवाल, शुभम गुप्ता, और लवकुश कुमार
परिचर्चा का कुशल संचालन, लिटरेरी लैंड, कानपुर के हमारे पुस्तक साथी कर्ण भाई जी ने किया, जोकि परिचर्चा को रोचक और यादगार बनाने वाला रहा|

पुस्तक परिचर्चा मे शामिल सभी पुस्तक साथियों (Bookmates) ने पुस्तक परिचर्चा मे शामिल होकर/अभिव्यक्ति/सराहना/भागीदारी के माध्यम से इस पहल को पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा देने में, मानवीय मूल्यों के पोषण में, अपनी बात को बेहिचक रखने में महत्वपूर्ण माना एवं एक दूसरे के प्रति आभार व्यक्त किया ताकि इस जरूरी कार्य की नियमितता बनी रहे एवं समाज मे एक सकारात्मक बदलाव में अपना विनम्र योगदान सुनिश्चित किया जा सके |

धन्यवाद ज्ञापन के साथ परिचर्चा को अगली परिचर्चा तक के लिए विराम दिया गया|
इस आशा के साथ कि यह रिपोर्ट पाठकों को पुस्तक परिचर्चा को समझने और उसमे शामिल होने के लिए प्रेरित करेगी |
अगली परिचर्चा 04 जुलाई (शनिवार रात 09:00 बजे) को होगी, शामिल होकर पढ़ने-लिखने की संस्कृति पर काम करने में अपना योगदान सुनिश्चित करें और पुस्तक परिचर्चा से साहित्यिक लाभ लेते हुये अपने दिन की सार्थकता में एक और आयाम जोड़ें|
धन्यवाद
-लवकुश कुमार
बीते रविवार (24-05-2026) हम सबके सामूहिक प्रयास और वरिष्ठजनों के प्रोत्साहन से बारहवीं साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा का ऑनलाइन आयोजन सफल रहा, जिसमें निम्नलिखित पुस्तकों/रचनाओं/विषयों पर सार्थक चर्चा हुयी:
अकार - पत्रिका (दिलरस प्रियंवद द्वारा संपादित)
चीफ़ की दावत – भीष्म साहनी
The Trial Week – a wellness Programme
12 Week Fitness Project –
The autobiography of Paramhansh Yoganand




उक्त परिचर्चा में निम्नलिखित पुस्तकसाथी शामिल रहे:
आदरणीय महेश पुनेठा सर, हर्षा भण्डारी मैम, गुंजन त्यागी मैम, सौम्या मैम, अरविंद कुमार, रंजीत ठाकुर, प्रिया शर्मा, अनुपम जायसवाल, प्रीति जायसवाल, गायत्री जायसवाल, अंकित जायसवाल, रंजीत कुमार, प्रिया कश्यप,विशाल जायसवाल, c सिंह और लवकुश कुमार|
पुस्तक परिचर्चा मे शामिल सभी पुस्तक साथियों (Bookmates) ने पुस्तक परिचर्चा मे शामिल होकर/अभिव्यक्ति/सराहना/भागीदारी के माध्यम से इस पहल को पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा देने में, मानवीय मूल्यों के पोषण में, अपनी बात को बेहिचक रखने में महत्वपूर्ण माना एवं एक दूसरे के प्रति आभार व्यक्त किया ताकि इस जरूरी कार्य की नियमितता बनी रहे एवं समाज मे एक सकारात्मक बदलाव में अपना विनम्र योगदान सुनिश्चित किया जा सके |
धन्यवाद ज्ञापन के साथ परिचर्चा को अगली परिचर्चा तक के लिए विराम दिया गया|
इस आशा के साथ कि यह रिपोर्ट पाठकों को पुस्तक परिचर्चा को समझने और उसमे शामिल होने के लिए प्रेरित करेगी |
अगली परिचर्चा 06 जून (शनिवार रात 08:30 बजे) को होगी, शामिल होकर पढ़ने-लिखने की संस्कृति पर काम करने में अपना योगदान सुनिश्चित करें और पुस्तक परिचर्चा से साहित्यिक लाभ लेते हुये अपने दिन की सार्थकता में एक और आयाम जोड़ें|
धन्यवाद
-लवकुश कुमार
बीते रविवार (17-05-2026) हम सबके सामूहिक प्रयास और वरिष्ठजनों के प्रोत्साहन से ग्यारहवीं साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा का ऑनलाइन आयोजन सफल रहा, जिसमें निम्नलिखित पुस्तकों/रचनाओं/विषयों पर सार्थक चर्चा हुयी:
बूढ़ा आदमी और समुद्र - अर्नेस्ट हेमिंग्वे
सांसो को पढ़ता कवि (केशव तिवारी) - सम्पादन डॉ जीवन सिंह
गबन - मुंशी प्रेमचंद
इकिगाई - लम्बे और स्वस्थ जीवन का जापानी रहस्य
अखंड ज्योति पत्रिका - गायत्री पीठ
त्यागपत्र - जैनेन्द्र कुमार

सही और जरुरी काम में लगें हैं तो हताशा या निराशा में न फंसे
पुस्तक परिचर्चा का सिलसिला जारी रहे ताकि एक मंच मौजूद रहे, साहित्य प्रेमियों के लिए, पुस्तक प्रेमियों के लिए

परिचर्चा के दौरान समीक्षा ज्यादा लम्बी न रखी जाए और तीन बिंदुओं पर ही अपनी बात में जरुर शामिल किये जाएँ यथा पुस्तक में क्या है, आपको क्यों पसंद आयी और दूसरों को यह पुस्तक क्यों पढ़नी चाहिए|

डॉ जीवन सिंह एक प्रतिष्ठित आलोचक हैं जिन्होंने कविताओं की आलोचना का पैमाना इनका तेवर, जनवादी और लोकधर्मी स्वरुप रखा

केशव तिवारी जी ने अपनी एक कविता में कहा कि यदि वह अपनी कविता के माध्यम से किसी बेईमान आदमी की आँखों में ना खटके तो कविकर्म का दायित्व अपूर्ण रह जाये
केशव तिवारी जी के काव्य में बुंदेलखंड का लोकजीवन, भूगोल, इतिहास और संघर्ष समाहित है|
क्यों पढ़ी जानी चाहिए, सांसो को पढ़ता कवि (केशव तिवारी) - सम्पादन डॉ जीवन सिंह ? ताकि काव्यशास्त्र की समझ आये, कविता विधा के शर्तों का पता चले जिनके बिना कविता अर्थ नहीं पाती, माने कौन से गुण एक रचना को कविता बनाते हैं, न तो छंदयुक्त और न तो छंदमुक्त, कविता को अर्थ मिलता है सन्दर्भ, अंदाज और कथ्य तथा शिल्प के बीच सम्बन्ध से|
मुक्तिबोध की कविताओं की अंतर्वस्तु तक पहुँचने में मददगार हो सकती हैं ऐसे समालोचनात्मक पुस्तकें
ऐसे भी साहसी विद्यार्थी हैं जो पुस्तक परिचर्चा के महत्व और निरंतरता को समझते हुए परीक्षा वाले दिन से पहले दिन भी परिचर्चा में शामिल होने के लिए व्यवस्थित रहते हैं|
उक्त परिचर्चा में निम्नलिखित पुस्तकसाथी शामिल रहे:
आदरणीय महेश चन्द्र पुनेठा सर, मुकेश जोशी जी, अंशुल मैम, सौम्या मैम, उर्मिला जायसवाल, विशाल जायसवाल, अरविंद कुमार, प्रिया शर्मा, प्रिया कश्यप, प्रिया जायसवाल, गायत्री जायसवाल, प्रीति जायसवाल, और लवकुश कुमार|
श्रोताओं को परिचर्चा से जोड़े रखने वाला समन्वय और संचालन सौम्या गुप्ता मैम और लवकुश कुमार ने किया|
पुस्तक परिचर्चा मे शामिल सभी पुस्तक साथियों (Bookmates) ने पुस्तक परिचर्चा मे शामिल होकर/अभिव्यक्ति/सराहना/भागीदारी के माध्यम से इस पहल को पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा देने में, मानवीय मूल्यों के पोषण में, अपनी बात को बेहिचक रखने में महत्वपूर्ण माना एवं एक दूसरे के प्रति आभार व्यक्त किया ताकि इस जरूरी कार्य की नियमितता बनी रहे एवं समाज मे एक सकारात्मक बदलाव में अपना विनम्र योगदान सुनिश्चित किया जा सके |
धन्यवाद ज्ञापन के साथ परिचर्चा को अगली परिचर्चा तक के लिए विराम दिया गया|
इस आशा के साथ कि यह रिपोर्ट पाठकों को पुस्तक परिचर्चा को समझने और उसमे शामिल होने के लिए प्रेरित करेगी |
अगली परिचर्चा 24 मई (रविवार रात 09 बजे) को होगी, शामिल होकर पढ़ने-लिखने की संस्कृति पर काम करने में अपना योगदान सुनिश्चित करें और पुस्तक परिचर्चा से साहित्यिक लाभ लेते हुये अपने दिन की सार्थकता में एक और आयाम जोड़ें|
धन्यवाद
-लवकुश कुमार
बीते रविवार (10-05-2026) हम सबके सामूहिक प्रयास और वरिष्ठजनों के प्रोत्साहन से दसवीं साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा का ऑनलाइन आयोजन सफल रहा, जिसमें निम्नलिखित पुस्तकों/रचनाओं/विषयों पर सार्थक चर्चा हुयी:
ब्राह्मण की बेटी – शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय
जीत आपकी- शिव खेड़ा
संबंध और क्या है जीवन- आचार्य प्रशांत



जीवन सम्बन्ध है। व्यक्ति का व्यक्ति से सम्बन्ध, प्रकृति से सम्बन्ध, समाज से सम्बन्ध।
इन सम्बन्धों का आधार क्या है?
क्या है हमारे सम्बन्धों की वास्तविकता ?
क्या हमारे सम्बन्ध डर, लालच, मोह, आसक्ति की छाया मात्र हैं, या ये प्रेम की अभिव्यक्ति हैं?
क्या हमारे सम्बन्ध अकेलेपन से बचने के उपाय हैं, या आन्तरिक पूर्णता का प्रस्फुटन ?
और क्या है, सच्चा प्रेम?

उक्त परिचर्चा में निम्नलिखित पुस्तकसाथी शामिल रहे:
अंशिका शर्मा मैम, हिमांशु जोशी जी, उर्मिला जायसवाल, विशाल जायसवाल, अंजना वर्मा, आरती मैम, अरविंद कुमार, धर्मेंद्र शर्मा सर, शोभित, प्रिया शर्मा, लक्ष्मण जोशी, प्रिया जायसवाल, गायत्री जायसवाल, विजय कुमार, प्रिय कश्यप और कर्ण भाईजी|
कुशल और श्रोताओं को परिचर्चा से जोड़े रखने वाला समन्वय और संचालन कर्ण भाईजी ने किया|
पुस्तक परिचर्चा मे शामिल सभी पुस्तक साथियों (Bookmates) ने पुस्तक परिचर्चा मे शामिल होकर/अभिव्यक्ति/सराहना/भागीदारी के माध्यम से इस पहल को पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा देने में, मानवीय मूल्यों के पोषण में, अपनी बात को बेहिचक रखने में महत्वपूर्ण माना एवं एक दूसरे के प्रति आभार व्यक्त किया ताकि इस जरूरी कार्य की नियमितता बनी रहे एवं समाज मे एक सकारात्मक बदलाव में अपना विनम्र योगदान सुनिश्चित किया जा सके |
धन्यवाद ज्ञापन के साथ परिचर्चा को अगली परिचर्चा तक के लिए विराम दिया गया|
इस आशा के साथ कि यह रिपोर्ट पाठकों को पुस्तक परिचर्चा को समझने और उसमे शामिल होने के लिए प्रेरित करेगी |
अगली परिचर्चा 17 मई (रविवार रात 09 बजे) को होगी, शामिल होकर पढ़ने-लिखने की संस्कृति पर काम करने में अपना योगदान सुनिश्चित करें और पुस्तक परिचर्चा से साहित्यिक लाभ लेते हुये अपने दिन की सार्थकता में एक और आयाम जोड़ें|
धन्यवाद
-लवकुश कुमार
बीते रविवार (03-05-2026) हम सबके सामूहिक प्रयास और वरिष्ठजनों के प्रोत्साहन से नौवीं साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा का ऑनलाइन आयोजन सफल रहा, जिसमें निम्नलिखित पुस्तकों/रचनाओं/विषयों पर सार्थक चर्चा हुयी:
कबिरा सोई पीर है (उपन्यास) - प्रतिभा कटियार (लोकभारती प्रकाशन, लेखिका अजीम प्रेमजी फाउंडेशन की कार्यकर्ता हैं)
स्मारिका - उमेश डोभाल स्मृति ट्रस्ट
अब पहुंची हो तुम (कविता संग्रह) - महेश चन्द्र पुनेठा
मुसाफिर कैफे - दिव्य प्रकाश दुबे
खाकी में इंसान - अशोक कुमार साथ में लोकेश ओहरी
नचिकेता - महेश चन्द्र पुनेठा


उक्त परिचर्चा में निम्नलिखित पुस्तकसाथी शामिल रहे:
आदरणीय महेश चन्द्र पुनेठा सर, हिमांशु जोशी जी, आकाश कश्यप, कृष्णा जायसवाल, गुंजन त्यागी मैम, प्रिया शर्मा, अमितेन्द्र सिंह, सौम्या मैम, कपिल देव, अंशुल पाण्डेय, सौम्या वर्मा, प्रिया, लक्ष्मण जोशी, उर्मिला, सिद्धार्थ यादव, विजय कुमार, ममता, गायत्री जायसवाल, अरुण मौर्या और लवकुश|


पुस्तक परिचर्चा मे शामिल सभी पुस्तक साथियों (Bookmates) ने पुस्तक परिचर्चा मे शामिल होकर/अभिव्यक्ति/सराहना/भागीदारी के माध्यम से इस पहल को पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा देने में, मानवीय मूल्यों के पोषण में, अपनी बात को बेहिचक रखने में महत्वपूर्ण माना एवं एक दूसरे के प्रति आभार व्यक्त किया ताकि इस जरूरी कार्य की नियमितता बनी रहे एवं समाज मे एक सकारात्मक बदलाव में अपना विनम्र योगदान सुनिश्चित किया जा सके |
धन्यवाद ज्ञापन के साथ परिचर्चा के संचालक लवकुश कुमार ने परिचर्चा को अगली परिचर्चा तक के लिए विराम दिया |
इस आशा के साथ कि यह रिपोर्ट पाठकों को पुस्तक परिचर्चा को समझने और उसमे शामिल होने के लिए प्रेरित करेगी |
अगली परिचर्चा 10 मई, रविवार रात 09 बजे होगी, शामिल होकर पढ़ने-लिखने की संस्कृति पर काम करने में अपना योगदान सुनिश्चित करें और पुस्तक परिचर्चा से साहित्यिक लाभ लेते हुये अपने दिन की सार्थकता में एक और आयाम जोड़ें|
धन्यवाद
-लवकुश कुमार
पुस्तक परिचर्चा में केवल पुस्तकों पर ही बात नहीं होती, इसमें पुस्तकों के महत्व पर भी बात होती है और एक मंच को निरंतरता मिलती है कि कल कोई जुझारू युवा जुड़े और इस मुहिम को और आगे तक ले जाए।
शुभकामनाएं
लवकुश कुमार
बीते रविवार (26-04-2026) हम सबके सामूहिक प्रयास और आदरणीय महेश चन्द्र पुनेठा सर के प्रोत्साहन से आठवीं साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा का ऑनलाइन आयोजन सफल रहा, जिसमें निम्नलिखित पुस्तकों/रचनाओं/विषयों पर सार्थक चर्चा हुयी:
सर्जनात्मक शिक्षा – डॉ राघव प्रकाश एवं डॉ सविता पालीवाल
बाघेन – नवीन जोशी
जीव जंतुओं की विचित्र आदतें और प्रवृत्तियाँ - राजेंद्र कुमार राजीव
अविज्ञान – नरेंद्र कोहली
आषाढ़ का एक दिन – मोहन राकेश
प्रफुल्ल चन्द्र राय – पं श्रीराम शर्मा आचार्य
देवेंद्र मेवाड़ी के नाट्य साहित्य में बाल मनोविज्ञान (शोधपत्र)
तुम तो अच्छे मुसलमान थे रहमान
कमरुनिशा का कटोरदान




उक्त परिचर्चा में निम्नलिखित पुस्तकसाथी शामिल रहे:
आदरणीय महेश चन्द्र पुनेठा सर, हर्षा भंडारी मैम, कृष्णकांन्त वर्मा,आरती मैम, अंकित मिश्रा सर, गुंजन त्यागी मैम, नंदेश्वर, अमितेन्द्र सिंह, सौम्या मैम, सचिन सिंह, अंशुल, शोभित, प्रिया, दिव्याशु, लक्ष्मण जोशी, प्रिया जायसवाल, उर्मिला, सिद्धार्थ यादव, अरुण मौर्या और लवकुश|
पुस्तक परिचर्चा मे शामिल सभी पुस्तक साथियों (Bookmates) ने पुस्तक परिचर्चा मे शामिल होकर/अभिव्यक्ति/सराहना/भागीदारी के माध्यम से इस पहल को पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा देने में, मानवीय मूल्यों के पोषण में, अपनी बात को बेहिचक रखने में महत्वपूर्ण माना एवं एक दूसरे के प्रति आभार व्यक्त किया ताकि इस जरूरी कार्य की नियमितता बनी रहे एवं समाज मे एक सकारात्मक बदलाव में अपना विनम्र योगदान सुनिश्चित किया जा सके |
धन्यवाद ज्ञापन के साथ परिचर्चा के संचालक लवकुश कुमार ने परिचर्चा को अगली परिचर्चा तक के लिए विराम दिया |
इस आशा के साथ कि यह रिपोर्ट पाठकों को पुस्तक परिचर्चा को समझने और उसमे शामिल होने के लिए प्रेरित करेगी |
अगली परिचर्चा 02 मई (रविवार रात 09 बजे) को होगी, शामिल होकर पढ़ने-लिखने की संस्कृति पर काम करने में अपना योगदान सुनिश्चित करें और पुस्तक परिचर्चा से साहित्यिक लाभ लेते हुये अपने दिन की सार्थकता में एक और आयाम जोड़ें|
धन्यवाद
-लवकुश कुमार