Article

सत्रहवीं ऑनलाइन साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा 27-06-2026

बीते शनिवार (27-06-2026) हम सबके सामूहिक प्रयास और वरिष्ठजनों के प्रोत्साहन से सत्रहवीं साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा का ऑनलाइन आयोजन सफल रहा, जिसमें निम्नलिखित पुस्तकों/रचनाओं/विषयों पर सार्थक चर्चा हुयी:

  • रूपतिल्ली की कथा – श्री प्रकाश मिश्र (पूर्वोत्तर भारत पर आधारित)
  • ठहरो दु:शाषन – राजीव जोशी (शैक्षिक दखल पत्रिका के जून अंक से एक लेख )
  • जल थल मल – सोपान जोशी
  • एवरेस्ट की कहानी – प्रो० आल अहमद सुरदर (बाल साहित्य)
  • पीपल की छांव में-  पीपल बाबा (स्वामी प्रेम परिवर्तन)
  • शादी होने तक ही पढ़ पाती थीं लड़कियाँ” - हर्षा भंडारी (शैक्षिक दखल पत्रिका के जून अंक से एक लेख )
  • शर्ट का बटन- प्रियंका जोशी (शैक्षिक दखल पत्रिका के जून अंक से एक लेख )
  • 'इकिगाई' (Ikigai) - हेक्टर गार्सिया और फ्रांसिस मिरालेस

  • ·         केवल पढना ही काफी नहीं, जरुरत है पढ़े हुए को साझा करने की, ताकि और लोग भी लाभान्वित हो सकें और इस तरह हमारे लिए भी उनके साथ सामंजस्य बिठाना आसान होगा
  • ·         प्रो पीटर ग्रे, शिक्षा मनोविज्ञान के अमेरिकी अध्येता हैं, जो मुख्यतः शिक्षा और खेलों के अंतर्संबंधों पर उनके गहन शोध के लिए जाने जाते हैं|
  • ·         शिक्षा को समझने के लिए उसके इतिहास को भी समझना होगा
  • ·         हमें उन विद्यालयों की विधि को भी समझना होगा जो परंपरागत विद्यालयों से भिन्न होते हुए भी कुशल नागरिक दे रहे हैं
  • ·         दो कार्यों का लक्ष्य यदि एक ही है तो ताल मेल बिठाकर चलने से अभीष्ट उद्देश्य को पाना आसान हो जाता है|
  • ·         लिखना जरुरी है, इसे एक उदाहरण से समझिये कि यदि आप आज अपने शहर के बारे में कुछ लिखते हैं तो आज के बीस साल बाद वह एक दस्तावेज का कार्य करेगा जो हमें उन बीस सालों में शहर के विकास की यात्रा को समझने में मदद करेगा|
  • ·         अगर आज आप चीज़ों को एक डायरी के रूप में भी दर्ज कर रहे हैं तो कालांतर में एक पुस्तक तैयार हो सकती है|
  • ·         पुस्तक परिचर्चा, चाहे किसी समिति के द्वारा आयोजित हो या किसी व्यक्ति के द्वारा इसका प्रयोजन पढने लिखने और समझ को साझा करने का वातावरण(माहौल) तैयार करना है ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों में पढने की ललक जागे, अतः आयोजक बधाई और सहयोग के पात्र हैं और साथ वह साथी भी धन्यवाद के पात्र हैं जो परिचर्चा में शामिल होकर इसके महत्व और प्रासंगिकता का समर्थन करते हैं|
  • ·         किसी भी चीज़ पर बात रखना तब ही सहज और सार्थक होता है जब हम उसे भली भाँति समझ चुके हों|
  • ·         यदि आप समाज में बेहतरी का बदलाव चाहते हैं तो पढने लिखने की संस्कृति को बढ़ावा देने का कार्य एक अच्छा विकल्प हो सकता है, जिसमें पढने लिखने और किताबों पर बात वाले आयोजनों में सक्रियता से भागीदारी करके, बेहतर माहौल सुनिश्चित किया जा सकता है|
  • ·         आज पिथौरागढ़ के साथ बेरिनाग और बागेश्वर तक भी पुस्तक परिचर्चा के आयोजन पहुँच चुके हैं, यह कार्य आगे बढ़ते रहे इसके लिए समर्पित युवाओं को आगे आना होगा
  • ·         अगर किताब पढ़कर आप उस पर चर्चा नहीं करेंगे तो बात आगे कैसे बढ़ेगी|

 केदारनाथ और पर्यटन, जरूरत इस बात पर सोचने की कि अब आस्था ही खींच रही या फिर रील संस्कृति भी 

तेनजिंग से पहले के अभियानों का इतिहास, ताकि हम बेहतर समझ सकें एवरेस्ट पर फतेह को 

पीपल बाबा को नानी द्वारा बचपन में  ही प्रकृति-प्रेमी बना दिया (सीधे नहीं परोक्ष रूप से)

उत्तर पूर्व के हमारे देशवासियों के साथ जो भी भेदभाव की खबरें हमे सुनने को मिलती हैं इसका कारण है उनके बारे में हमारी जानकारी कम होना, क्योंकि इन पर आधारित साहित्यिक पुस्तकों की संख्या अपेक्षाकृत बहुत कम है|

श्री प्रकाश मिश्र के और भी उपन्यास हैं उत्तर पूर्वी भारत की जनजातियों पर, जिन्हे जरूर पढ़ा जाना चाहिए ताकि हम खुद से अलग एक समाज के बारे में जान सकें ताकि उनके साथ सहज हो सकें और जान सकें कि क्यों किसी के लिए अपनी पहचान बनाए रखने का संघर्ष, उसके जीवन एक एक अंग होता है|

एक बात जो जरूरी है वह है कि ऐसा साहित्य केवल इच्छा की दृष्टि से नहीं, एक जरूरत समझकर पढ़ा जाना चाहिए ताकि आपसी तालमेल, सहजता, एकता और सम्मान सुनिश्चित किया जा सके|

शैक्षिक दखल पत्रिका का प्रकाशन शैक्षिक दखल समिति द्वारा हर छमाही किया जाता है, जोकि शैक्षिक सरोकारों को समर्पित शिक्षकों तथा नागरिकों का साझा मंच है|

पुस्तक परिचर्चा में किसी भी पुस्तक पर बोलने के लिए किताब खत्म होने का इंतज़ार न करें, जितना पढ़ा है उसका संदर्भ देकर भी अपनी बात रखी जा सकता है|

कोई लेख पढ़ा है तो उस पर भी अपनी बात/अवलोकन साझा किया जा सकता है|

लाल बहादुर वर्मा का आदिवासी साहित्य हमे इस तबके को बेहतर समझने और इनके साथ संवेदित होने में मदद कर सकता है|

सोपान जोशी जी की किताब हम सबके के लिए जरूरी होनी चाहिए ताकि हम समझ सकें पर्यावरण और समाज के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी को, 

ह्वेल का मल, अन्य समुद्री प्रजातियों के लिए पोषक तत्व का काम करता है|

ये समय है कि हम विचार करें और अध्ययन भी कि पहाड़ों पर बढ़ते सैलानियों का वहाँ की परिस्थितिकी पर क्या प्रभाव पड़ रहा है|

शिक्षकों को चाहिए कि यदि उन्हे विद्यार्थियों के किसी प्रश्न का जवाब नहीं आता तो उन्हें डांटने के बजाय (ऐसे प्रकरण सुनने को मिलते हैं) उनसे उस पर चर्चा कि जाए और अगर जरूरत पड़े तो समय भी मांगा जाये लेकिन उन्हे डांटकर प्रश्न पूछने के लिए हतोत्साहित न किया जाए, तब ही हम उनके अंदर की जिज्ञासा और सृजनशीलता को सही पोषण दे पाएंगे|

अगर किसी छात्र या छात्रा कि गणित या और कोई विषय कमजोर है और उसके द्वारा उस विषय को आगे चलकर छोड़ दिया जाता है तो कोई जरूरी नहीं कि इसमें उस विद्यार्थी की ही अक्षमता है, बहुत संभावना है कि उस विषय के अध्यापक उतने सक्षम न मिलें हों|

उक्त परिचर्चा में निम्नलिखित पुस्तकसाथी शामिल रहे:
आदरणीय महेश पुनेठा सर, हर्षा भण्डारी मैम,प्रियंका जोशी मैम, विशाल दा (विशाल चंद जी), कर्ण भाईजी,अंशुल मैम, कृष्णा जायसवाल, प्रिया कश्यप, प्रिया जायसवाल, प्रीति जायसवाल, शुभम गुप्ता, और लवकुश कुमार

परिचर्चा का कुशल संचालन, लिटरेरी लैंड, कानपुर के हमारे पुस्तक साथी कर्ण भाई जी ने किया, जोकि परिचर्चा को रोचक और यादगार बनाने वाला रहा|

पुस्तक परिचर्चा मे शामिल सभी पुस्तक साथियों (Bookmates) ने पुस्तक परिचर्चा मे शामिल होकर/अभिव्यक्ति/सराहना/भागीदारी के माध्यम से इस पहल को पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा देने में, मानवीय मूल्यों के पोषण में, अपनी बात को बेहिचक रखने में महत्वपूर्ण माना एवं एक दूसरे के प्रति आभार व्यक्त किया ताकि इस जरूरी कार्य की नियमितता बनी रहे एवं समाज मे एक सकारात्मक बदलाव में अपना विनम्र योगदान सुनिश्चित किया जा सके |

धन्यवाद ज्ञापन के साथ परिचर्चा को अगली परिचर्चा तक के लिए विराम दिया गया|

इस आशा के साथ कि यह रिपोर्ट पाठकों को पुस्तक परिचर्चा को समझने और उसमे शामिल होने के लिए प्रेरित करेगी |

अगली परिचर्चा 04 जुलाई (शनिवार रात 09:00 बजे)  को होगी, शामिल होकर पढ़ने-लिखने की संस्कृति पर काम करने में अपना योगदान सुनिश्चित करें और पुस्तक परिचर्चा से साहित्यिक लाभ लेते हुये अपने दिन की सार्थकता में एक और आयाम जोड़ें|

  धन्यवाद 

-लवकुश कुमार