बीते शनिवार (27-06-2026) हम सबके सामूहिक प्रयास और वरिष्ठजनों के प्रोत्साहन से सत्रहवीं साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा का ऑनलाइन आयोजन सफल रहा, जिसमें निम्नलिखित पुस्तकों/रचनाओं/विषयों पर सार्थक चर्चा हुयी:


केदारनाथ और पर्यटन, जरूरत इस बात पर सोचने की कि अब आस्था ही खींच रही या फिर रील संस्कृति भी
तेनजिंग से पहले के अभियानों का इतिहास, ताकि हम बेहतर समझ सकें एवरेस्ट पर फतेह को
पीपल बाबा को नानी द्वारा बचपन में ही प्रकृति-प्रेमी बना दिया (सीधे नहीं परोक्ष रूप से)
उत्तर पूर्व के हमारे देशवासियों के साथ जो भी भेदभाव की खबरें हमे सुनने को मिलती हैं इसका कारण है उनके बारे में हमारी जानकारी कम होना, क्योंकि इन पर आधारित साहित्यिक पुस्तकों की संख्या अपेक्षाकृत बहुत कम है|
श्री प्रकाश मिश्र के और भी उपन्यास हैं उत्तर पूर्वी भारत की जनजातियों पर, जिन्हे जरूर पढ़ा जाना चाहिए ताकि हम खुद से अलग एक समाज के बारे में जान सकें ताकि उनके साथ सहज हो सकें और जान सकें कि क्यों किसी के लिए अपनी पहचान बनाए रखने का संघर्ष, उसके जीवन एक एक अंग होता है|
एक बात जो जरूरी है वह है कि ऐसा साहित्य केवल इच्छा की दृष्टि से नहीं, एक जरूरत समझकर पढ़ा जाना चाहिए ताकि आपसी तालमेल, सहजता, एकता और सम्मान सुनिश्चित किया जा सके|

शैक्षिक दखल पत्रिका का प्रकाशन शैक्षिक दखल समिति द्वारा हर छमाही किया जाता है, जोकि शैक्षिक सरोकारों को समर्पित शिक्षकों तथा नागरिकों का साझा मंच है|
पुस्तक परिचर्चा में किसी भी पुस्तक पर बोलने के लिए किताब खत्म होने का इंतज़ार न करें, जितना पढ़ा है उसका संदर्भ देकर भी अपनी बात रखी जा सकता है|
कोई लेख पढ़ा है तो उस पर भी अपनी बात/अवलोकन साझा किया जा सकता है|
लाल बहादुर वर्मा का आदिवासी साहित्य हमे इस तबके को बेहतर समझने और इनके साथ संवेदित होने में मदद कर सकता है|

सोपान जोशी जी की किताब हम सबके के लिए जरूरी होनी चाहिए ताकि हम समझ सकें पर्यावरण और समाज के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी को,
ह्वेल का मल, अन्य समुद्री प्रजातियों के लिए पोषक तत्व का काम करता है|
ये समय है कि हम विचार करें और अध्ययन भी कि पहाड़ों पर बढ़ते सैलानियों का वहाँ की परिस्थितिकी पर क्या प्रभाव पड़ रहा है|
शिक्षकों को चाहिए कि यदि उन्हे विद्यार्थियों के किसी प्रश्न का जवाब नहीं आता तो उन्हें डांटने के बजाय (ऐसे प्रकरण सुनने को मिलते हैं) उनसे उस पर चर्चा कि जाए और अगर जरूरत पड़े तो समय भी मांगा जाये लेकिन उन्हे डांटकर प्रश्न पूछने के लिए हतोत्साहित न किया जाए, तब ही हम उनके अंदर की जिज्ञासा और सृजनशीलता को सही पोषण दे पाएंगे|
अगर किसी छात्र या छात्रा कि गणित या और कोई विषय कमजोर है और उसके द्वारा उस विषय को आगे चलकर छोड़ दिया जाता है तो कोई जरूरी नहीं कि इसमें उस विद्यार्थी की ही अक्षमता है, बहुत संभावना है कि उस विषय के अध्यापक उतने सक्षम न मिलें हों|
उक्त परिचर्चा में निम्नलिखित पुस्तकसाथी शामिल रहे:
आदरणीय महेश पुनेठा सर, हर्षा भण्डारी मैम,प्रियंका जोशी मैम, विशाल दा (विशाल चंद जी), कर्ण भाईजी,अंशुल मैम, कृष्णा जायसवाल, प्रिया कश्यप, प्रिया जायसवाल, प्रीति जायसवाल, शुभम गुप्ता, और लवकुश कुमार
परिचर्चा का कुशल संचालन, लिटरेरी लैंड, कानपुर के हमारे पुस्तक साथी कर्ण भाई जी ने किया, जोकि परिचर्चा को रोचक और यादगार बनाने वाला रहा|

पुस्तक परिचर्चा मे शामिल सभी पुस्तक साथियों (Bookmates) ने पुस्तक परिचर्चा मे शामिल होकर/अभिव्यक्ति/सराहना/भागीदारी के माध्यम से इस पहल को पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा देने में, मानवीय मूल्यों के पोषण में, अपनी बात को बेहिचक रखने में महत्वपूर्ण माना एवं एक दूसरे के प्रति आभार व्यक्त किया ताकि इस जरूरी कार्य की नियमितता बनी रहे एवं समाज मे एक सकारात्मक बदलाव में अपना विनम्र योगदान सुनिश्चित किया जा सके |

धन्यवाद ज्ञापन के साथ परिचर्चा को अगली परिचर्चा तक के लिए विराम दिया गया|
इस आशा के साथ कि यह रिपोर्ट पाठकों को पुस्तक परिचर्चा को समझने और उसमे शामिल होने के लिए प्रेरित करेगी |
अगली परिचर्चा 04 जुलाई (शनिवार रात 09:00 बजे) को होगी, शामिल होकर पढ़ने-लिखने की संस्कृति पर काम करने में अपना योगदान सुनिश्चित करें और पुस्तक परिचर्चा से साहित्यिक लाभ लेते हुये अपने दिन की सार्थकता में एक और आयाम जोड़ें|
धन्यवाद
-लवकुश कुमार