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आठवीं ऑनलाइन साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा 26-04-2026

बीते रविवार (26-04-2026) हम सबके सामूहिक प्रयास और आदरणीय महेश चन्द्र पुनेठा सर के प्रोत्साहन से आठवीं साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा का ऑनलाइन आयोजन सफल रहा, जिसमें निम्नलिखित पुस्तकों/रचनाओं/विषयों पर सार्थक चर्चा हुयी:

सर्जनात्मक शिक्षा – डॉ राघव प्रकाश एवं डॉ सविता पालीवाल

बाघेन – नवीन जोशी

जीव जंतुओं की विचित्र आदतें और प्रवृत्तियाँ - राजेंद्र कुमार राजीव

अविज्ञान – नरेंद्र कोहली

आषाढ़ का एक दिन – मोहन राकेश

प्रफुल्ल चन्द्र राय – पं श्रीराम शर्मा आचार्य

देवेंद्र मेवाड़ी के नाट्य साहित्य में बाल मनोविज्ञान (शोधपत्र)

तुम तो अच्छे मुसलमान थे रहमान

कमरुनिशा का कटोरदान

  • बेहतर समाज के लिए केवल आपका ही सजग और संवेदनशील होना जरूरी नहीं, इसके साथ इतना ही  जरूरी है कि पड़ोस का वातावरण भी बेहतर हो, एक उदाहरण से समझिए- यदि आप सड़क पर यातायात नियमों का पालन कर रहे हैं तो इतने भर से ही आपकी सुरक्षा सुनिश्चित नहीं हो जाती, अन्य चालकों का भी नियमों के प्रति सचेत और जिम्मेदार होना जरूरी है|
  • ये बहुत जरूरी है कि पुस्तक परिचर्चा जैसे जरूरी कार्यों का सिलसिला आगे बढ़े इसके लिए जरूरी हो जाता है कि हम स्वयं भी हिस्सा लें और अन्य साथियों को भी इस मुहिम से जोड़ें
  • बेहतर समाज के लिए जरूरी है कि संवेदनशीलता, सृजनशीलता का विकास और चेतना का उन्नयन हमारी शिक्षा का हिस्सा/उद्देश्य बन जाए
  • आलोचनात्मक दृष्टिकोण के विकास के लिए जरूरी है साहित्य अध्ययन, ऐसा अध्ययन जो विचारोतेजक हो|
  • हमे इस बात पर विचार करने की जरूरत है कि कहीं हम भौतिक संपन्नता, व्यक्तिगत संपत्ति अर्जन की भाग दौड़ मे चीजों को समग्रता मे देखने, या अपनी दृष्टि को समाज केन्द्रित या विश्व केन्द्रित रखने के बजाय व्यक्तिकेंद्रित तो नहीं हो जा रहे! कहीं ऐसा तो नहीं कि अपनी स्वार्थ सिद्धि या विलासिता के लिए हम समाज मे गंदगी, प्रदूषण या अराजकता फैलाने मे योगदान दे रहे हों! अगर ऐसा है तो हम इस गलतफहमी मे हैं कि ज्यादा दिन तक शुकून से रह पाएंगे
  • अगर हम वाकई आने वाली पीढ़ी और अपने बुढ़ापे मे शुकून और व्यवस्था की कामना रखते हैं तो हमे अपने व्यवहार और प्राथमिकताओं से समाज मे समता, स्वतन्त्रता, लोकतन्त्र, गरिमा और बंधुता की भावना बढ़ाने के लिए समुचित और संगठित प्रयास करने होंगे|
  • अर्थकेंद्रित और धनपिपासु रवैया समाज को शोषण और असामनता जनित अव्यवस्था की तरफ ले जाता है|
  • स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि शिक्षा का उद्देश्य मानव की अंतर्निहित शक्तियों का विकास है|
  • आज के समय की बहुत बड़ी और तात्कालिक जरूरत है कि शिक्षा में तकनीकी के साथ मानविकी और साहित्य के अध्ययन को उचित स्थान, उचित वेटेज मिले|
  • शिक्षा ऐसी हो कि जो हमारी क्षुद्रताओं को नंगा कर दे ताकि हम उससे ऊपर उठकर विश्वबोध कर सकें|
  • शिक्षा ऐसी हो कि मनुष्य अपने संकीरंताओं से ऊपर उठकर अपनी विराटता से परिचित हो और “विश्व मानव” बनने की तरफ अग्रसर हो|
  • हमे इस बात का सकल्प लेना होगा कि बतौर एक अभिभावक या शिक्षक हमे शिक्षा को जीवनोन्मुखी बनाने के लिए प्रयत्न करने होंगे|

  • किसी इंसान पर जो आपके ही बीच रहा हो उस पर भी मनगढ़ंत आरोप उसके व्यवहार पर अप्रत्याशित असर कर सकते हैं|
  •  लिखना तब ही सार्थक है जब यह उन तक पहुँच सके जिनहे संबोधित करते हुये लिखा गया हो, इसके लिए जरूरी है साहित्य का प्रचार प्रसार और उपलब्धता को सुनिश्चित करना, इसमे पुस्तक परिचर्चा और सामुदायिक पुस्तकालय एक निर्णायक भूनिका निभा सकते हैं|
  • कोई रचना इफेक्टिव हो, इसके लिए जरूरी हो जाता है कि वह पाठक को बांध सके, कम से कम पाठकों के उस वर्ग को जिसको ध्यान मे रखकर वह रचना रची गयी है|
  • उमेश पंत जी का साहित्य हमे समकालीन मिट्टी की धरातल की सच्चाई से अवगत कराता है|

  • क्या आपको पता है कि खरगोश के बिल में भी अलग अलग कमरे होते हैं, अलग अलग प्रयोजन के लिए ? चमगादड़ उल्टा क्यों लटकता है और कैसे ? ऐसा ही बहुत कुछ पढ़ जा सकता है, “जीव जंतुओं की विचित्र आदतें और प्रवृत्तियाँ - राजेंद्र कुमार राजीव ” में
  • जिज्ञासा और सवाल जरिया बन सकते हैं आविष्कारों के
  • साहित्य अध्ययन का रस ऐसा है कि यदि लग जाए तो समय का पता नहीं चलता और जिज्ञासा बढ़ती जाती है, बस जरूरत है तो एक रोचक किताब के संपर्क मे आ जाओ आप, जैसे हमारी एक पुस्तक साथी गुंजन त्यागी मैम, “आषाढ़ का एक दिन – मोहन राकेश” को एक ही दिन में पूरा पढ़ गईं
  • आधुनिक तरीकों से पौराणिक कहानियों की व्याख्या हमे बहुत कुछ सीखा सकती हैं जो हमे एक बेहतर नागरिक बनने मे मदद कर सकती हैं|
  • शिक्षा कमाई का जरिया नहीं, जीवन को बेहतर तरीके से जीन और खुद कि उच्चतम संभावनाओं को पाने का जरिया है|

उक्त परिचर्चा में निम्नलिखित पुस्तकसाथी शामिल रहे:

आदरणीय महेश चन्द्र पुनेठा सर, हर्षा भंडारी मैम, कृष्णकांन्त वर्मा,आरती मैम, अंकित मिश्रा सर, गुंजन त्यागी मैम, नंदेश्वर, अमितेन्द्र सिंह, सौम्या मैम, सचिन सिंह, अंशुल, शोभित, प्रिया, दिव्याशु, लक्ष्मण जोशी, प्रिया जायसवाल, उर्मिला, सिद्धार्थ यादव, अरुण मौर्या और लवकुश|

पुस्तक परिचर्चा मे शामिल सभी पुस्तक साथियों (Bookmates) ने पुस्तक परिचर्चा मे शामिल होकर/अभिव्यक्ति/सराहना/भागीदारी के माध्यम से इस पहल को पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा देने में, मानवीय मूल्यों के पोषण में, अपनी बात को बेहिचक रखने में महत्वपूर्ण माना एवं एक दूसरे के प्रति आभार व्यक्त किया ताकि इस जरूरी कार्य की नियमितता बनी रहे एवं समाज मे एक सकारात्मक बदलाव में अपना विनम्र योगदान सुनिश्चित किया जा सके |

धन्यवाद ज्ञापन के साथ परिचर्चा के संचालक लवकुश कुमार ने परिचर्चा को अगली परिचर्चा तक के लिए विराम दिया |

इस आशा के साथ कि यह रिपोर्ट पाठकों को पुस्तक परिचर्चा को समझने और उसमे शामिल होने के लिए प्रेरित करेगी |

अगली परिचर्चा 02 मई (रविवार रात 09 बजे)  को होगी, शामिल होकर पढ़ने-लिखने की संस्कृति पर काम करने में अपना योगदान सुनिश्चित करें और पुस्तक परिचर्चा से साहित्यिक लाभ लेते हुये अपने दिन की सार्थकता में एक और आयाम जोड़ें|

  धन्यवाद 

-लवकुश कुमार