माँ-देवी, नहीं इंसान बने,
चाहती हूँ माँ के अक्षय पात्र में भी कम पड़े,
माँ अब पहले-सी भूखी न रहे।
देवी बोल - बोल कर जो ली गई है बलि उससे,
अब उसे उसका हिसाब मिले।
कभी त्याग की मूरत, कभी देवी-सी सूरत,
कहकर कराये गए है त्याग उससे,
उसे उन त्यागों का प्रतिफल मिले।
तुम तो चुका भी नहीं पाओगे,
कर्ज की इस गठरी का क्या हिसाब लगा पाओगे?
जब चुका सकते नहीं तो कर्ज इतना क्यों लिया?
औरत को माना देवी और दासी बना दिया।
कहा ज्ञान की देवी पर पुस्तक भी न छूने दी,
बोला तुमने है माँ लक्ष्मी पर रोटी भी न कमाने दी,
बोला तुमने जननी है पर क्या केवल बच्चों की?
कब दोगे तुम आजादी उसको, स्व-अस्तित्व के सृजन की।
-सौम्या गुप्ता
बाराबंकी, उत्तर प्रदेश
सौम्या जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं |
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