"कगार की आग" महिलाओं के शोषण की कहानी कहती किताब
यह किताब हिमांशु जोशी द्वारा 1975 में लिखा गया एक बहुत ही मार्मिक और हृदयविदारक उपन्यास है। जिसमें पहाड़ी पृष्ठभूमि की एक ऐसी महिला की कहानी है,जिसका शोषण और उत्पीड़न उसके ही अपने लोगों द्वारा किया गया।कहानी की मुख्य पात्र गोमती है। जो अपने मानसिक रूप से अस्वस्थ पति और एक छोटे बेेेटे कुन्नू के साथ रहती है।कहानी उस समय लिखी गई है जब पहाड़ में पितृसत्ता,रूढ़िवाद,जातिवाद चरम पर था। महिलाओं को तब सिर्फ घर का काम करने वाली , पति की इच्छा पूरी करने वाली तथा संतान पैदा करने वाली के तौर पर ही देखा जाता था।
जहाँ उसकी अपनी कोई स्वतंत्र पहचान "नहीं" थी। उसके जीवन से जुड़े सारे फैसले उसका पति या घर का पुरुष लेता था। कहानी एक दलित महिला गोमती की है।जो अचानक से रात को भागकर अपनी माँ के पास इसलिए आ गई है कि उसके ककिया ससुर ने उसे इस तरह बेरहमी से किड़मोड़े की लकड़ी से मारा है कि उसके शरीर में नीले निशान रह गए है। उसपे आरोप यह कि उसके घर के बाहर पुरुषों के साथ संबंध है, वह भी बस इसलिए कि जानवरों के डॉक्टर से वह अपने बीमार पति के लिए दवाई मांगती है।
जंगल वह घास, लकड़ी लेने सभी महिलाओं के साथ जाती है, फिर भी जंगल के चौकीदार के साथ संबंध होने की अफवाह हैं। जिसके शक में वह उसे बुरी तरह मारते हैं, उसके चरित्र पर सवाल उठाते हुए उसे बहुत बुरी गालियां भी देते हैं।
पहाड़ी महिला के जीवन संघर्ष को बयां करती कहानी:
कहानी की मुख्य किरदार गोमती है, जो साहसी और विद्रोही है। जब उसका ककिया ससुर उससे सम्बन्ध बनाने की फिराक में आए दिन रात को उसके दरवाजे में आ जाता था, एक दिन जब उसने देखा कि ककिया ससुर दरवाजे के एकदम पास आ गया है तो उसे कुछ नहीं सुझा,अपने सिराने पड़ी हशिया उठाकर दे मारी। जिससे वह चला गया। बीमार पति की देखरेख और रोज का गोमती का अपने ही करीब के सम्बन्धों से चलता संघर्ष, जो कभी उसके पति को ठीक से काम न करने में पीट देते थे, कभी गोमती को चरित्रहीन बताते हुए उसे अपमानित करते थे।
"गरीबी भुखमरी और उत्पीड़न के बीच पलता जीवन"
हिमांशु जोशी का लेखन बहुत गंभीर और मार्मिक है। उनके लिखने में वह दर्द झलकता है,जो एक आम इंसान की व्यथा है।गोमती और उसके परिवार का जीवन बहुत ही दयनीय है। उसका बीमार पति लोगों के फायदे के लिए सबसे ज्यादा उपयोगी है। वह उसे अवैध कार्यों में अपने साथ ले जाते हैं, जहां पुलिस के छापा मारने में उसे जेल भेज देते है, और वह आसानी से सब कुछ कबूल कर लेता जो आरोप उस पर लगाए जाते। अपने खिलाफ होते शोषण के खिलाफ गोमती अकेले ही बोलती, बहुत बार वह बुरी तरह से टूट जाती थी। एक दिन का हो तो कोई सहे लेकिन उसके खिलाफ होने वाले शोषण में कमी नहीं आ रही थी, उसका देवर भी उसके साथ यौन उत्पीड़न करता है, जिससे तंग आकर वह नदी में कूदने जाती है, लेकिन उसके भीतर की मां उसे मरने नहीं देती।इस तरह कहानी स्त्री मन की व्यथा और समाज द्वारा उसे सिर्फ एक देह समझे जाने की है।
"स्त्री जीवन और दुख की कहानी"
मरने का फैसला स्थगित कर वह जिस इंसान के साथ रहने लगती है, गोमती की सुंदरता देख वह भी उससे आकर्षित हो जाता है, जहां वह उसे अपने साथ रख लेता है| सबको लगता है कि गोमती मर गई, लेकिन वह खुशाल नाम के इंसान के साथ रह रही होती है। जिसकी पहले से दो पत्नियां हैं, जिनसे उसे संतान का सुख प्राप्त नहीं हो पाया है। खुशाल उसे बहुत प्रेम करता है,अच्छे गहने बनाता है ,नए कपड़े दिलाता है। हर तरह से उसे खुश रखने की कोशिश करता है, लेकिन उसका मन तब भी अपने बच्चे के लिए दुखी रहता है। सब कुछ होने के बाद भी कुछ था जो गोमती को कचोटता था, उसका मन दुखी रहता,अपने नन्हे बच्चे कुन्नू के बारे में सोच सोच मन बैठ जाता। खुशाल ने उसे 400रूपये देकर अपने पास रखा था। जो उस समय एक बड़ी रकम थी।जब उसका स्त्री मन किसी भी तरह अपने बेटे से नहीं हटा तो खुशाल ने भी उसे बुरी तरह पीट दिया ,उसके चरित्र का हवाला देकर उसे गालियां दी।
"महिलाओं को देह के रूप में देखता समाज"
यह कहानी समाज की उस सच्चाई को सामने रखती है, जिसे वर्षों से ढकने की कोशिश की गई है। जिस समाज ने महिलाओं को चुप रहकर सहना सिखाया है।वह अपनी इस क्रूरता से पर्दा हटाना कभी नहीं चाहेगा। जहां एक भयावह चेहरा स्त्री देह को ही उसकी पहचान समझता है, उसी के हिसाब से उसे अपने लिए उपयोगी समझता है।
यह कहानी मानव समाज में महिलाओं में होने वाले दुखद शोषण को ही नहीं दिखाती, यह बताती है कि कैसे एक औरत जीवन भर उत्पीड़न का शिकार होती है। किसी ने भी स्त्री मन को नहीं जानना चाहा कि उसके अंतर्द्वंद्व क्या है। बल्कि उस पर अपना पुरुषत्व दिखाते रहें। गोमती न सिर्फ अंत तक संघर्ष करती हुई दिखती है, वह दिन रात हाड़तोड़ मेहनत करके खुशाल को 400रुपए वापिस कर अपने घर अपने बच्चे कुन्नू के पास वापिस लौटती है।
हिमांशु जोशी की लेखनी सरल है। पहाड़ी जीवन को करीब से देखा है और उसकी सच्चाई को लिखा है। उनके लेखन में वह पहाड़ झलकता है,जिसके दर्द की कहानी उनके भीतर कुलबुलाती है। उनके लेखन में उन्होंने कुमाऊंनी शब्दों का जो उपयोग किया है वह कहानी को जीवंत बना देता है। "कगार की आग पाठक को झकझोरकर रख देती है", जो सोचने में मजबूर करती है कि महिलाओं की स्थिति हमारे समाज में सिर्फ एक दैहिक और संतान सुख तक सीमित थी, आज की स्थिति का आंकलन मै पाठकों पर छोड़ती हूँ ।
- शीतल
शीतल जी, उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के एक दूरस्थ पहाड़ी गांव भट्टयूडा से आती हैं। आपने अपना परास्नातक, भूगोल विषय में लक्ष्मण सिंह मेहर कैंपस पिथौरागढ़ से किया है। आप सामाजिक खांचों में फिट नहीं होना चाहती, इसे इस परिप्रेक्ष्य मे देखें कि आप हर वह रिवाज नकारना चाहती हैं जो आपको एक लड़की होने का हवाला देकर कम आंकते हो।
किताबें संवेदनशील ,सामाजिक ,निर्भय और वैज्ञानिक चेतना देती हैं, अतः किताबें पढ़ना, नया जानते रहकर अपनी समझ को विस्तार देते रहना आपकी आदत मे शुमार है। आपको फिल्में देखना पसंद है, और घूमना भी। भूगोल आपको अपनी ओर खींचती है साथ ही नए और रचनात्मक लोगों के साथ बात करने और उनके बारे में जानने को उत्सुक रहती हैं |
इस आशा के साथ कि शीतल जी की समझ और लेखनी, सुधी पाठकों की समझ को एक नया आयाम देकर उसको विस्तार देगी और एक संवेदनशील इंसान बनने का मार्ग प्रशस्त करेगी, ढेरों शुभकामनायें
सम्पादक
लवकुश कुमार
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शुभकामनाएं

उपन्यास - दीवार में एक खिड़की रहती थी
लेखक- विनोद कुमार शुक्ल
विनोद कुमार शुक्ल का उपन्यास “दीवार में एक खिड़की रहती थी” हिन्दी साहित्य में साधारण जीवन की असाधारण संवेदनाओं को उजागर करने वाली एक महत्वपूर्ण कृति है। यह उपन्यास किसी बड़े घटनाक्रम, तीव्र संघर्ष या नाटकीय मोड़ों पर आधारित नहीं है, बल्कि मध्यमवर्गीय जीवन की रोज़मर्रा की सच्चाइयों, सीमाओं और छोटी-छोटी खुशियों को बहुत सहजता से प्रस्तुत करता है।
कहानी एक नवविवाहित मध्यमवर्गीय दंपत्ति रघुवर प्रसाद और सोनसी के इर्द-गिर्द घूमती है। रघुवर प्रसाद एक महाविद्यालय में गणित के अध्यापक हैं और शादी के बाद वे एक कमरे के छोटे से मकान में अपनी गृहस्थी बसाते हैं। इसी छोटे से कमरे में उनके सपने, चिंताएँ, आदतें और छोटी-छोटी खुशियाँ धीरे-धीरे आकार लेती हैं। उपन्यास पढ़ते हुए पाठक अनायास ही उनके जीवन से जुड़ने लगता है, मानो वे कोई काल्पनिक पात्र नहीं, बल्कि हमारे आस-पड़ोस में रहने वाले लोग हों। इस एक कमरे के मकान में भीतर की ओर बनी एक खिड़की "उपन्यास की आत्मा" बन जाती है।
यह खिड़की केवल रोशनी या हवा का रास्ता नहीं है, बल्कि यह रघुवर और सोनसी के "मन की दुनिया" से जुड़ने का माध्यम है। यही खिड़की उन्हें एक सीमित जीवन के भीतर भी सपने देखने, सोचने और उम्मीद बनाए रखने का अवसर देती है। प्रकृति और आसपास के वातावरण का चित्रण भी इसी खिड़की के सहारे बड़ी सहजता से कथा में घुल-मिल जाता है।
उपन्यास में दीवार जीवन की उन सीमाओं का प्रतीक है, जो हर आम आदमी के हिस्से में आती हैं—कम जगह, कम साधन और अनकही मजबूरियाँ। लेकिन उसी दीवार में बनी खिड़की यह भरोसा देती है कि सीमाओं के बीच भी उम्मीद के रास्ते मौजूद होते हैं। यही वजह है कि इस किताब को पढ़ते हुए पाठक अपने जीवन की दीवारों और उनमें छिपी खिड़कियों को देखने लगता है।
इस उपन्यास की भाषा बेहद सरल, शांत और आत्मीय है। इसमें जीवन की छोटी-छोटी खुशियों को बड़े सलीके से महत्व दिया गया है। लेखक बिना किसी उपदेश के यह बात कह जाते हैं कि सच्चा सुख भव्यता में नहीं, बल्कि साधारण पलों को जीने की क्षमता में छिपा होता है। रघुवर और सोनसी की सादगी, उनका रहन-सहन और उनका आपसी संबंध पाठक के मन में एक गहरा अपनापन जगा देता है।
हालाँकि यह उपन्यास तेज़ गति से आगे नहीं बढ़ता। कहानी की चाल धीमी है और इसमें कोई बड़ा मोड़ या चौंकाने वाली घटना नहीं मिलती। जो पाठक तेज़ रफ्तार या केवल मनोरंजन की अपेक्षा से किताब उठाते हैं, उन्हें यह थोड़ी भारी लग सकती है। लेकिन जो पाठक "जीवन को ठहरकर देखने और महसूस करने का धैर्य" रखते हैं, उनके लिए यह कृति खास बन जाती है।
कुल मिलाकर, “दीवार में एक खिड़की रहती थी” एक ऐसा उपन्यास है जो शोर नहीं करता, बल्कि चुपचाप दिल के पास बैठ जाता है। यह हमें याद दिलाता है कि "सुख एक कमरे के छोटे से घर में भी पाया जा सकता है, बस ज़रूरत है उस दीवार में बनी खिड़की को देखने की।"
ही इस उपन्यास की सबसे बड़ी खूबी और इसकी सबसे गहरी मानवीय सच्चाई है।
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विशाल चन्द @reading_owl.3
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विशाल चन्द जी समाजशास्त्र के शोधार्थी, पाठक और संवेदनशील शिक्षार्थी हैं। नवीन ज्ञान अर्जन और सतत सीखना आपके व्यक्तित्व का अभिन्न हिस्सा है। पुस्तकों का पठन और संग्रहण आपको विशेष प्रिय है।
आपके भीतर एक घुमक्कड़ चेतना भी सक्रिय है, जो आपको नए लोगों, स्थानों और अनुभवों से जोड़ती रहती है। बागवानी आपके लिए प्रकृति से संवाद का माध्यम है।
आप समाज को अपने स्वतंत्र दृष्टिकोण से देखने और विभिन्न समूहों के साथ मिलकर सामाजिक दायित्वों के निर्वहन को निरंतर प्रयासरत रहते हैं।
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पुस्तक : तुम पहले क्यों नहीं आए?
लेखक : कैलाश सत्यार्थी
प्रकाशन : राजकमल पेपरबैक्स
तुम पहले क्यों नहीं आए नोबेल शांति पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी द्वारा लिखी गई उन बच्चों की सच्ची कहानियों का संग्रह है, जिन्हें उन्होंने अपने संगठन बचपन बचाओ आंदोलन के माध्यम से गुलामी और बाल श्रम से मुक्त कराया। यह किताब पढ़ते हुए बार-बार मन भारी हो जाता है और मन में कई सवाल उठते हैं।
इस पुस्तक में 12 बच्चों की जीवन कथाएँ हैं, जो पत्थर की खदानों, ईंट भट्ठों, घरेलू मजदूरी, कालीन कारखानों और तस्करी जैसे अमानवीय हालात से निकलकर आज़ादी की रोशनी तक पहुँच पाए। ये कहानियाँ किसी कल्पना की उपज नहीं, बल्कि हमारे समाज का कड़वा सच हैं और हर कहानी एक चुप चीख जैसी लगती है। शीर्षक कहानी देवली की है, जो तीसरी पीढ़ी से बंधुआ मजदूरी में जकड़ी हुई थी। जब उसे आज़ादी मिली तो उसके मुँह से निकला सवाल—
“तुम पहले क्यों नहीं आए?”
यह सवाल सिर्फ लेखक से नहीं, बल्कि हम सभी से किया गया सवाल बन जाता है।
किताब में प्रदीप, कालू, भावना और साहिबा जैसे बच्चों की कहानियाँ भी हैं, जिनके साथ अंधविश्वास, हिंसा, यौन शोषण और अमानवीय व्यवहार हुआ। इन किस्सों को पढ़ते हुए कई जगह शब्द साथ छोड़ देते हैं और सन्नाटा बोलने लगता है।इन्हें पढ़ते हुए कई बार मन करता है किताब बंद कर दूँ, लेकिन फिर लगता है—अगर हम पढ़ ही नहीं पाए, तो वे जिए कैसे होंगे?
हालाँकि यह किताब सिर्फ दर्द नहीं, बल्कि उम्मीद भी देती है। बचाए गए कई बच्चे आगे चलकर पढ़े-लिखे, आत्मविश्वासी बने और आज दूसरों के लिए आवाज़ उठा रहे हैं। "यही इस किताब की सबसे बड़ी ताकत है।" कुल मिलाकर, तुम पहले क्यों नहीं आए एक झकझोर देने वाली, लेकिन ज़रूरी किताब है। यह हमें असहज करती है, सोचने पर मजबूर करती है और यह एहसास दिलाती है कि बच्चों की आज़ादी सिर्फ कानूनों से नहीं, हमारी संवेदना से संभव है।
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विशाल चन्द जी समाजशास्त्र के शोधार्थी, पाठक और संवेदनशील शिक्षार्थी हैं। नवीन ज्ञान अर्जन और सतत सीखना आपके व्यक्तित्व का अभिन्न हिस्सा है। पुस्तकों का पठन और संग्रहण आपको विशेष प्रिय है।
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यह मेरे लिए खुशी की बात है कि जिस पुस्तक के लिए, इतने महीनो से प्रयास चल रहा है वह जल्द ही पाठकों के लिए उपलब्ध होगी, उससे पहले मुख्य पुस्तक का एक अंश आप लोगों के समक्ष प्रस्तुत है, परिचय और आपकी प्रतिक्रिया के लिए, जरुर भेजें ईमेल - KCPHYQA@GMAIL.COM
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अंत में एक सन्देश जो किताबों के महत्त्व पर है, मोबाइल फ़ोन और शॉर्ट्स की दुनिया में किताबों से दोस्ती करने की बात पर जोर देते हुए :

किताब अपने उद्देश्यों पर कितनी खरी उतरी जरुर बताएं, उससे पहले अपनी प्रति book कराएँ या अपने निकटतम पुस्तक विक्रेता द्वारा डिमांड सबमिट करवाएं (पुस्तक के लिए अपने पते का फॉर्म भरें )
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आपका
लवकुश कुमार
पुस्तक समीक्षा | तुम्हारे लिए
✍️ लेखक: हिमांशु जोशी
📝 प्रकाशक: किताबघर प्रकाशन
• “तुम्हारे लिए” हिमांशु जोशी की एक अतुलनीय और अत्यंत संवेदनशील कृति है। यह उपन्यास मात्र एक प्रेमकथा नहीं है, न ही कोई साधारण पत्र—बल्कि यह उन अनकहे एहसासों का दस्तावेज़ है, जिन्हें नायक नायिका के रहते हुए कभी शब्द नहीं दे पाया। यह किताब नैनीताल की धरती पर पनपी विराग और अनुमेहा की तरुण, कोमल और अधूरी प्रेमगाथा है।
•उपन्यास की पृष्ठभूमि नैनीताल है और लेखक ने इस शहर को सिर्फ़ एक स्थान की तरह नहीं बल्कि एक जीवित अनुभूति की तरह रचा है। पहाड़, झील, रास्ते, मौसम—सब कुछ ऐसा वर्णित है कि पाठक स्वयं को उसी वातावरण में चलता हुआ महसूस करता है। यह वही नैनीताल है जो कभी शांत, आत्मीय और अपना था—और वही नैनीताल भी जो समय के साथ बदलता चला गया।
• विराग और अनुमेहा का रिश्ता किसी नाटकीय घटना से नहीं बल्कि ट्यूशन जैसी साधारण परिस्थिति से शुरू होता है। पढ़ाते-पढ़ाते उपजा यह आकर्षण धीरे-धीरे गहरे भावनात्मक जुड़ाव में बदलता है।
पाठक समझते हैं कि किसी रिश्ते की विश्वसनीयता और उम्र उस आधार पर निर्भर करती है जिस पर वह आधारित होता है।
• कहानी की एक बड़ी ताक़त इसके सह-पात्र हैं।
डॉ. दत्ता और श्रीमती दत्ता का नायक के प्रति अपनापन,
सुहास का नायिका के प्रति आकर्षण,
और नायक की निम्न पारिवारिक-आर्थिक स्थिति—ये सभी तत्व कहानी को एक सामाजिक यथार्थ प्रदान करते हैं।
नायक का यह द्वंद्व कि पारिवारिक ज़िम्मेदारियाँ और प्रेम/चाहत, दोनों के बीच संतुलन शायद उससे बन ही नहीं पाया या कहिए कि परिस्थितियां ही अनुकूल न थीं—कहानी को और गहरा एवं पेंचीदा बना देता है।
• उपन्यास में कई ऐसे क्षण हैं जहाँ सुख और दुख की रेखा धुंधली हो जाती है। लेखक के शब्दों में—
“कुछ स्मृतियां ऐसी होती हैं जो एक साथ ही दुख की अनुभूति भी देती हैं, सुख की भी। वास्तव में एक बिंदु पर आकर दुख-सुख का भेद ही समाप्त हो जाता है। पीड़ा में भी एक तरह के सुख की अनुभूति होती है—असीम संतुष्टि की।”
यह पंक्तियाँ पूरी किताब की आत्मा को समेट लेती हैं।
• जब नायिका जनजातीय बाहुल्य क्षेत्र में काम कर रही होती है और वहाँ नायक उससे मिलता है, तब गरीबी पर हुआ संवाद झकझोर देता है—
“रोगियों की संख्या यहाँ बहुत दिखती है… कौन-सी बीमारी अधिक है?”
“एक ही बीमारी है—सबसे संक्रामक।”
“कौन-सी?”
“गरीबी… बताइए, इससे भयंकर और कौन-सा रोग है इस संसार में।”
यह संवाद उपन्यास को केवल प्रेमकथा नहीं रहने देता, बल्कि उसे सामाजिक चेतना से जोड़ देता है।
• उपन्यास का अंत आते-आते कहानी एक भावनात्मक और कुछ हद तक फिल्मी मोड़ लेती है। नायिका का चले जाना, और नायक का स्मृतियों के सहारे जीते रह जाना—पाठक को भीतर तक खाली कर देता है। अंतिम पृष्ठ कहानी को समाप्त नहीं करता, बल्कि पाठक के भीतर एक गहरा भावनात्मक जुड़ाव छोड़ जाता है।
लेकिन यहीं इशारा मिलता है परिस्थितियों की बुनावट का, जीवन की वास्तविकता की बात करें तो हमें अंततः शांति को चुनना होता है और अपने लिए आजादी, आत्मनिर्भरता और उत्कृष्टता को जीवन के केंद्र में रखना होता है ताकि इस शरीर की असीम संभावनाओं को पाया जा सके समय का सदुपयोग किया जा सके।
• कुल मिलाकर, "तुम्हारे लिए" एक शांत, पीड़ादायक, सुंदर और मानवीय संवेदनाओं और भावनाओं से परिचय कराने वाला उपन्यास है। यह किताब एक सवाल जगाती है कि क्या हम वास्तव में जानते हैं कि जीवन में सबसे जरूरी क्या है ? क्योंकि इस सवाल का जवाब जाने बिना हम अपने जीवन की प्राथमिकताएं निर्धारित नहीं कर पाते और कब क्या पकड़ना और कब क्या छोड़ना यह निश्चित नहीं कर पाते।
यह उपन्यास आपका परिचय करा सकता है अधूरे रह गए एहसासों की गूँज का—जो पढ़ने के बाद भी देर तक मन में बनी रहती है और बना सकता है, आपको लोगों के मनोभावों और प्राथमिकताओं, स्थितियों को बेहतर समझने के काबिल।
कोई सवाल हो तो लिख भेजिए, फेसबुक लिंक या ईमेल से।
शुभकामनाएं
विशाल चन्द
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विनोद कुमार शुक्ल जी का यह उपन्यास 'खिलेगा तो देखेंगे' अपने-आप में अद्भुत उपन्यास है। इसकी एक-एक पंक्ति कविता की तरह लगती है। और सबसे खूबसूरत बात यह है कि यह उपन्यास पूरी तरह से कथानक पर निर्भर नहीं होते हुए भी एक कथा दृश्य बना देता है अर्थात् कोई ऐसा काथा-सूत्र नहीं है जो उपन्यास के केन्द्र में हो, बावजूद इसके ग्रामीण और सामूहिक जीवन का चित्रण बड़े ही रोचक ढंग से किया गया है। इस उपन्यास में गाँव भी है, गरीबी भी है, पीड़ा भी है और प्रसन्नता भी है। यह उपन्यास पाठकों के बीच उपन्यासों की दुनिया में एक नया अनुभव प्रदान करता है। नये पाठकों को थोड़ा कम अच्छा लगे ऐसा हो सकता है लेकिन इसकी एक-एक पंक्ति हमें गंभीर चिंतन की ओर प्रेरित करती है।
- सुरसेन
युवा साहित्यकार सुरसेन सिंह बहादुर जी, इस बात में विश्वास रखते हैं कि " भोजन, कपड़ा, मकान पैसा सब जरुरी है, सब देना, तुम मुझे कुछ देना चाहो, तो किताबें सबसे पहले देना "
आप एक शिक्षक हैं और देश के प्रतिष्ठित संस्थानों से शिक्षित हैं, आपने काव्य संग्रह -" विरोध चुप्पियों का " की रचना की है।
"यह संग्रह केवल शब्दों का संचयन नहीं है बल्कि यह उन विसंगतियों के विरुद्ध एक वैचारिक युद्ध है जिन्हें हमारा समाज अक्सर 'मौन' रहकर स्वीकार कर लेता है" - साहित्यकार संतोष पटेल जी
सुरसेन सिंह बहादुर जी का फेसबुक प्रोफाइल लिंक
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एक शाम ऐसी भी जब पिथौरागढ़ में स्थित अजीम प्रेमजी फाउंडेशन में पहाड़ी वोकल्स के युवाओं द्वारा आयोजित बुक मीट में शिरकत करने का मौका मिला| कई जिज्ञासु और सुधी पाठकों ने अपने द्वारा पढ़ी गई बेहतरीन पुस्तकों पर चर्चा की|

उन पुस्तकों के महत्व के बारे में बताया उन पुस्तकों को पढ़ कर हम किन सवालों के जवाब पा सकते हैं और किन मानवीय संवेदनाओं और भावनाओं को समझ सकते हैं इस पर बात की गई| कई लोगों ने बताया की कैसे एक किताब ने उनके सोचने के नजरिये को बदल दिया, कैसे वह अपने पॉइंट ऑफ व्यू से हटकर दूसरों के नजरिए से भी दुनिया समाज और लोगों को देख पाने में सक्षम हुए हैं, कैसे उनके पूर्वाग्रह खंडित हुए और सबसे बड़ी बात उन्होंने बात की उस सुकून की जो किताबों को पढ़कर मिलती है हालांकि हमेशा ऐसा नहीं होता कुछ किताबें हमे सवालों से घेर लेती हैं और हमे मानव जीवन के संघर्षों और मार्मिक पहलुओं की तरफ ध्यान खींच ले आती हैं तब सुकून नहीं एक उत्कंठा पैदा होती है, इस पर अलग से बात करेंगे |
कुछ लोगों के लिए किताब पढ़ना एक दूसरी दुनिया में जाने जैसा है जैसे कुछ अच्छी मूवीज हमें तुरंत की तकलीफों से दूर कर देती हैं और हम शांतचित्त होकर समझ पाते हैं और एक उम्मीद और उत्साह के साथ दोबारा अपने काम में लग पाते हैं, वैसे ही कुछ बेहतरीन किताबें भी आपको आपकी समस्याओं को दूर से देखने का मौका देती हैं और फिर आपको उन समस्याओं की पीछे के कारण भी समझ आते हैं और वह अपेक्षाकृत छोटी भी लगती हैं साथ ही यदि आप बेहतर किताबों की संगति में हैं तो आपको हल्का महसूस कराएंगी और आपको आजादी के लिए प्रेरित करेंगी, आपको उदार बना सकती हैं बाकि आप किस तरह की किताबों की संगति में हैं यह निर्भर करता है
किसी पाठक ने बताया कि शुकून मिलता है, कोई कहती हैं कि जीवन और दुनिया को बेहतर समझ सकते हैं, किसी का विश्वास है कि इससे हमारे पूर्वाग्रह टूटते हैं, किसी को आत्मविश्वास मिल रहा तो किसी को स्पष्टता, कोई कहता है कि कोई बदलाव लाना है तो बेहतर तरीके और अनुभव का खजाना है किताबों में, तो कोई कहता है कि किताबें बात करती हैं और किसी के लिए किताबें लोगों को और उनकी अपेक्षाओं और आकांक्षाओं को समझने में मदद करती हैं, कोई लोगों की भावनाओं को समझाने को तो कोई खुद में संवेदनाओं जगाने को किताबों का सहारा लेता है।
अन्य सुधी पाठकों ने बताया की किताबें मानो हमेशा साथ देने वाले दोस्त हो जब कोई आपसे बात करने को ना हो तो किताबें बात करती हैं किताबें आपके काम को और बेहतर करने के लिए स्पष्टता देती हैं|

एक से एक बेहतरीन किताबों की चर्चा हुई और उनमे से कुछ के नामों का यहां पर उल्लेख कर रहा हूं और जल्द ही इनमें से कुछ किताबों पर आपको उनही पाठकों में से कुछ के लेख मिलेंगे जिससे आप और बेहतर समझ पाएंगे संबंधित किताब के बारे में|
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मंटो की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ |
Crime and Punishment
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डार से बिछुड़ी - कृष्णा सोबती
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Becoming by Michelle Obama |
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अग्नि की उड़ान – डॉक्टर एपीजे अब्दुल कलाम |
Invincible Thinking by Ryūhō Ōkawa
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पचपन खम्भे लाल दीवारें- Usha प्रियंवदा
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The art of being alone by |
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तुम्हारे लिए - हिमांशु जोशी |
THE ART OF BEING ALONE: Solitude is My Home Loneliness was My Cage by Renuka Gavrani |
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गबन – मुंशी प्रेमचंद |
Gone Girl Novel by Gillian Flynn
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चश्मिश – मानवी |
Courage to be disliked - Fumitake Koga and Ichiro Kishimi
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सूरज का सातवाँ घोडा- धर्मवीर भारती |
यार पापा – दिव्यप्रकाश दुबे |
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अक्टूबर जंक्शन - दिव्यप्रकाश दुबे |
इब्नेबतूती - दिव्य प्रकाश दुबे
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इस तरह इस बात को बेहतर तरीके समझ पाना आसान होगा कि किसी पुस्तक की थीम क्या है, आपको इससे क्या मिल सकता है, और इस पुस्तक का साहित्य के क्षेत्र में क्या योगदान और महत्व है यह भी आप जान पाएंगे|
एक बार धन्यवाद आदर्श जी और उनकी टीम का जिन्होंने इस परिचर्चा को आयोजित किया और इसे रुचिकर बनाया|

इसी परिचर्चा में मुलाकात हुई श्री करण तिवारी जी से जो देवल थल में एक लाइब्रेरी चलाते हैं जिसमें वहां के कई ग्राम सभाओं के बच्चे पढ़ते हैं और काफी कुछ सीखते हैं|
एक बात और की पहाड़ी वोकल्स में युवा अपना समय और प्रयास बहुत ही जरूरी कार्यों में दे रहे हैं इसके लिए मैं उन्हे साधुवाद और अजीम प्रेमजी फाउंडेशन के प्रति भी आभार कि उन्होंने ऐसे प्रयासों के लिए संसाधन उपलब्ध कारये यह एक प्रेरणादायक कार्य है इस तरह की परिचर्चा देश के और भी शहरों/ जगहों में होनी चाहिए ताकि हमारे युवा साहित्य से जुड़ सकें और देश दुनिया में स्थायित्व और बेहतर शांति ला सकें|
कुछ लिंक
https://kumarchetna.in/article.php?id=801
https://www.facebook.com/profile.php?id=61563266181704
https://www.facebook.com/profile.php?id=61555496220488
किताबें पढ़ना जारी रखिए, समझते रहिए और संवाद भी जारी रखिए |
शुभकामनाएं
लवकुश कुमार
लेखक बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से भौतिकी मे स्नातक और आई आई टी दिल्ली से भौतिकी मे परास्नातक हैं और उनके लेखन का उद्देश्य समाज की उन्नति और बेहतरी के लिए अपने विचार साझा करना है ताकि उत्कृष्टता, अध्ययन और विमर्श को प्रोत्साहित कर देश और समाज के उन्नयन में अपना बेहतर योगदान दिया जा सके, साथ ही वह मानते हैं कि सामाजिक विषयों पर लेखन और चिंतन शिक्षित लोगों का दायित्व है और उन्हें दृढ़ विश्वास है कि स्पष्टता ही मजबूत कदम उठाने मे मदद करती है और इस विश्वास के साथ कि अच्छा साहित्य ही युवाओं को हर तरह से मजबूत करके देश को महाशक्ति और पूर्णतया आत्मनिर्भर बनाने मे बेहतर योगदान दे पाने मे सक्षम करेगा, वह साहित्य अध्ययन को प्रोत्साहित करने को प्रयासरत हैं।
जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना आपके जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट ।
लेखक के विजन के बारे में जानने के लिए यहां क्लिक करें।
अगर आपके पास भी कुछ ऐसा है जो लोगों के साथ साझा करने का मन हो तो हमे लिख भेजें नीचे दिए गए लिंक से टाइप करके या फिर हाथ से लिखकर पेज का फोटो Lovekushchetna@gmail.com पर ईमेल करें।
अपनी रचनाओं से संवेदना और स्पष्टता जगाने वाली विख्यात लेखिका श्रीमती मीरा जैन का जन्म 2 नवबंर 1960 को जगदलपुर (बस्तर) छ.ग. में हुआ, परिचय:
शिक्षा - स्नातक
जीवन साथी- इंजि. वीरचंद जैन
माता - श्रीमती केशर देवी मोदी
पिता - श्री विनयचंद जी मोदी
लेखन विधा- लघुकथा , आलेख व्यंग्य , कहानी, कविताएं , क्षणिकाएं आदि ।
पत्र-प्रत्रिकायें जिनमें रचनायें प्रकाशित हुई है 2000 से अधिक रचनाएं निम्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं-
कादम्बिनी , सरिता , गृहशोभा, हंस , नया ज्ञानोदय , सरस सलिल , अहा !जिदंगी , मेरी सहेली , गृहलक्ष्मी, वनिता , बिंदिया. नवनीत , जागरण सखी , मेरी सजनी , वीणा , नई गुदगुदी , साहित्य अमृत, कथादेश, माधुरी , मनस्वी , वेद अमृत , मनोरमा, विश्व हिंदी साहित्य मारीशस, देवपुत्र , नंदन , बाल भरती, मंगलयात्रा , साक्षात्कार . स्वदेश , पंजाब सौरभ, बाल भास्कर, बाल हंस, बच्चो का देश, शबनम ज्योति,अणुव्रत, द्वीप लहरी, अमृत कलश, प्रभात खबर, समाज्ञा ,नई दुनिया, दैनिक जागरण, अमर उजाला, समान्तर ,दैनिक भास्कर, नव भारत टाइम्स , राजस्थान पत्रिका ,हरिभूमि, प्रभात खबर, भारतदर्शन न्यूजीलैडं, ,हिंदी चेतना(कनाडा) नवनीत , बाल किलकारी(बिहार सरकार), उजाला, पंजाब केसरी, जनवाणी, नवभारत , सेतू-.यू.एस. कथा देश , अक्षरा, लोकमत , अक्षरा , चम्बा न्यूज , द राइजिंग स्टेप, साहित्य समीर दस्तक, विश्व गाथा, अक्षर खबर , संगिनी , साहित्य गुंजन, राज एक्सप्रेस , समावर्तन , दिव्यालोक , दैनिक अग्नि पथ ,अवन्तिका , अक्षर विश्व , शब्द प्रवाह, साहित्य समीर दस्तक , प्रभाश्री ज्ञान सागर आदि अनेक।
वे संग्रह जिनमे मेरी लघुकथाएॅ हैं- तीसरी ऑख , द्वीप लहरी , समान्तर ,क्षितिज ,चर्चित ,मिन्नी (पंजाबी), सेतु , कालीमाटी ,दोहरे चेहरे , महा मानव , सागर के मोती, बुजुर्ग जीवन की, लघुकथाएं , कलश, दृष्टि, मन के मोती, गुलाबी गलियां आदि अनेक।
नेपाली, गुजराती , पंजाबी , सिंधी , ओड़िया, बंगाली, असमिया, भोजपुरी, अंग्रेजी,मलयालम , मराठी ,भाषा मेें भी अनुवाद एंव प्रकाशन।
आकाशवाणी जगदलपुर एवम् इंदौर से व्यंग्य,लघुकथाओं व अन्य रचनाओं का प्रसारण. म.प्र.दूरदर्शन से कविताओं का प्रसारण , बोल हरियाणा बोल तथा रेडियो दस्तक से प्रसारण।
प्रकाशीत किताबें-
1- पुस्तक का नाम - मीरा जैन की सौ लघुकथाएं
प्रकाशन का वर्ष - सन् 2003 ,
प्रकाशक - मानव प्रकाशन
द्वितीय संस्करण - प्रकाशन का वर्ष - सन् 2011
प्रकाश - अध्ययन प्रकाशन ,दिल्ली
तृतीय संस्करण - प्रकाशन का वर्ष - सन् 2013
चतुर्थ संस्करण - प्रकाशन का वर्ष - सन् 2016
2- पुस्तक का नाम - 101 लघुकथाएं
प्रकाशन का वर्ष - सन् 2010दिसम्ब
द्वितीय संस्करण जून2012
तृतीय संस्करण अगस्त 2014
प्रकाशकश- पत्रिका प्रकाशन जयपुर , राज.
3- पुस्तक का नाम - दीन बनाता है दिखावा ,लेख,
प्रकाशन का वर्ष - सितंबर 2013
द्वितीय संस्करण - प्रकाशन का वर्ष -2016
प्रकाशक - बोधि प्रकाशन जयपुर राज.
4- पुस्तक का नाम - मीरा जैन की कवितायें , कविता संग्रह ,
प्रकाशन का वर्ष - 2014
प्रकाशक - अयन प्रकाशन दिल्ली
5- पुस्तक का नाम - सम्यक लघुकथाएं
प्रकाशन का वर्ष - सन् 2016 फरवरी
प्रकाशक - बोधि प्रकाशन जयपुर , राज.
6- पुस्तक का नाम - श्रेष्ठ जीवन की संजीवनी
प्रकाशन का वर्ष - फरवरी 2018
प्रकाशक - बोधि प्रकाशन जयपुर , राज
7- पुस्तक का नाम - हेल्थ हादसा, व्यंग्य संग्रह,
प्रकाशन का वर्ष - मार्च 2019
प्रकाशक - सूर्य मंदिर प्रकाशन
8- पुस्तक का नाम - मानव मीत लघुकथाएं
प्रकाशन का वर्ष - मार्च 2019
प्रकाशक - सूर्य मंदिर प्रकाशन बीकानेर
पुस्तक का नाम-
9-जीवन बन जाए आनंद का पर्याय,
लेख संग्रह
प्रकाशन वर्ष - 2020
प्रकाशक -इंडिया नेट बुक, दिल्ली
पुस्तक का नाम -
10-भोर में भास्कर , लघुकथा संग्रह
प्रकाशन वर्ष - 2022
प्रकाशक इंडिया नेटवर्क नेट बुक दिल्ली
11-मीरा जैन के सदाबहार लघुकथाएं
प्रकाशक- जिज्ञासा प्रकाशन प्रकाशन- वर्ष 2023
विशेष-
2011में ‘‘ मीरा जैन की सौ लघुकथाएं‘‘विक्रम विश्व विद्यालय उज्जैन द्वारा शोध कार्य करावाया जा चुका है ।
2022 - महाराष्ट्र, सावित्रीबाई फूले यूनिवर्सिटी पुणे द्वारा लघुकथाओं पर शोध कार्य जारी।
2024 - विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन द्वारा मेरी लघुकथाओं पर शोधकर जारी है
अनेक लघुकथाओं पर लघु फिल्मों का निर्माण
सम्यक लघुकथाएं पूर्णतया बालकों से संबंधित श्रेष्ठ आचरण पर आधारित है .
सन् 2007-8 में निर्धन वर्ग आयोग म.प्र.शासन राज्य स्तर पर मेरे द्वारा भेजे गये सुझावों को
प्रथम प्रथमिकता में चयनित किया .
केंद्रिय मानव संसाधन विकास मंत्रालय तथा छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा मेरी किताबें क्रय की गई है ।
अनेक भाषाओं में रचनाओं का अनुवाद एवं प्रकाशन
पुरस्कार - अंतर्राष्ट्रीय , राष्ट्र एंव राज्य स्तरीय अनेक पुरस्कार-
नईदुनिया तथा टाटा शक्ति द्वारा लेखन के लिये प्राइड स्टोरी अवार्ड 2014.
युग र्निमाण शिक्षण समिति तथा हिंदी साहित्य परिषद द्वारा हिंदी सेवा सम्मान 2015 से सम्मानित .
पुस्तक 101 लघुकथाएं को राष्ट्रीय स्तर पर प्रथम पुरूस्कार 2011 .
लघुकथा के लिये हस्ताक्षर संस्था द्वारा विशिष्ट पुरस्कार ,
दैनिक अग्नि पथ द्वारा वरिष्ठ लघुकथाकार साहित्य सम्मान 2013 ,
शब्द प्रवाह साहित्य सम्मान 2013 ,
सामाजिक कार्यो में विशिष्ट योगदान एवम् साहित्यक उपलब्धियों हेतू नवकार सेवा संस्थान द्वारा विषिष्ट सम्मान .
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लेख को प्रथम पुरस्कार
महिला एवं बाल विकास उज्जैन संभाग म.प्र. द्वारा अंर्तराष्ट्रीय महिला दिवस 2016 में सम्मान ,
कथादेश द्वारा 2016 में लघुकथा पुरस्कृत .
जे.एस.जी.आई.एफ. म.प्र.रीजन द्वारा विभिन्न क्षेत्रों की उपलब्धियॉ तथा समाज सेवा के क्षेत्र में अद्वितीय कार्यो के लिये अवार्ड 2016-17 से नवाजा गया.
अभिव्यक्ति मंच द्वारा कविता को राष्ट्रीय स्तर पर द्वितीय पुरस्कार
जे.एस.जी.आई.एफ. द्वारा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उत्कृष्ट लेखन व समाज सेवा के क्षेत्र में आउट स्टेंडिंग परफारमेंस हेतू अवार्ड 2017 .
महिला सशक्तिकरण उज्जैन ने बेहतर समाज सेवा , समाजिक एकता व उत्कृष्ट लेखन के लिये अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 2017 पर सम्मानित किया .
अभिव्यक्ति विचार मंच द्वारा राष्ट्रीय प्रतिभा सम्मान 2017-18 से सम्मानित आदि अनेक।
अखिल भारतीय साहित्य साधक मंच बंगलौर द्वारा राजभाषा साहित्य सम्मान
राष्ट्रीय संगठन सखी संगिनी द्वारा 2018 नारी सेवा सम्मान
लघुकथाएं व लेख को विभिन्न संस्थाओं द्वारा 2018 में पुरस्कृत,
भोपाल से प्रकाशित मासिक पत्रिका 'साहित्य समीर दस्तक' एंव श्री विभगूंज वेलफेयर सोसायटी' द्वारा 'सम्यक लघुकथाएं' को 'शब्द गुंजन लघुकथा सम्मान-2018' से सम्मानित किया गया।
विचार प्रवाह मंच इंदौर द्वारा सम्मानित 2020
डॉक्टर एस एन तिवारी सम्मान 2021
अमृत महोत्सव के तहत माधव महाविद्यालय उज्जैन द्वारा श्रेष्ठ साहित्य साधिका सम्मान 2021
मातृ भाषा उन्नयन संस्थान भारत के द्वारा हिंदी दिवस 2022 सम्मानित
हिंदी साहित्य सम्मेलन बदनावर द्वारा साहित्य सम्मान 2022
मथुरा देवी स्मृति वट स्मृति षोडश सम्मान 20 22
हिंदी साहित्य अकादमी भोपाल द्वारा व्यंग्य संग्रह 'हेल्थ हादसा ' को शरद जोशी व्यंग्य सम्मान 2019
भारतीय साहित्य परिषद इंदौर द्वारा प्रादेशिक साहित्य गौरव सम्मान 2023
विचार प्रवाह साहित्यिक मंच इंदौर द्वारा विशिष्ट लघुकथा के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान सम्मान 2023
इंटिग्रेटेड सोसायटी ऑफ मीडिया प्रोफेशनल लखनऊ द्वारा
समग्र सहित्य पर मैथिली शरण गुप्त सम्मान 2022
अथाई समूह द्वारा सर्वश्रेष्ठ कथाकार सम्मान 2023
संस्था विद्यांजलि भारत मंच इंदौर द्वारा समग्र साहित्य पर धरोहर सम्मान 2023
साहित्य संगीति जयपुर द्वारा लघुकथा संग्रह भोर में भास्कर को सर्वोत्कृष्ट कृति जयपुर सम्मान 2024
अभिनव कला परिषद भोपाल द्वारा अभिनव शब्द शिल्पी अलंकरण से सम्मानित 2023
अभ्युदय अंतरराष्ट्रीय महिला लेखन प्रेरणा पुरस्कार 2023
म. प्र लेखिका संघ भोपाल द्वारा लघुकथा संग्रह भोर में भास्कर के लिए राष्ट्रीय स्तर पर श्रीराजकुमार केसवानी सम्मान 2024
माता कौशल्या साहित्य संस्कृति शोध संस्थान वी डॉ.माया ठाकुर फाउंडेशन रायपुर द्वारा
लघुकथा भूषण सम्मान 2024
रक्त मित्र फाउंडेशन मथुरा उत्तर प्रदेश द्वारा नारी शक्ति पद्मश्री सम्मान 2024
पतंजलि योग समिति छत्तीसगढ़ द्वारा साहित्य सम्मान 2024
मां राजपति देवी स्मृति साहित्य सम्मान 2024-प्रयागराज
किस्सा कोतहा सम्मान आगरा 2024
राजराजेश्वरी म्यूजिकल ग्रुप इंदौर साहित्य सम्मान 2024
प्रेस क्लब ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट भोपाल द्वारा साहित्य सम्मान 2024
प्रांति इंडिया साहित्य सम्मान 2024
अभ्युदय अंतरराष्ट्रीय श्लाका
सम्मान 2024
अंतर्राष्ट्रीय सरस्वती साहित्य सम्मान 2025
श्रीमती आशा सुपेकर स्मृति सम्मान 2025
सम्प्रति-पूर्व सदस्य बाल कल्यााण समिति
पद-प्रथम श्रेणी न्यायायिक मजिस्ट्रेट बोर्ड , बा.क.स
चेयर पर्सन-गर्ल सेव चाइल्ड कमेटी जे.एस.जी.आई.एफ. 2016-17-18
2019 गृह मंत्रालय भारत सरकार द्वारा देश के विद्ववानों की सूची में शामिल
अनेक मंचो से बाल साहित्य , बालिका महिला सुरक्षा उनका विकास , कन्या भ्रूण हत्या , बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ , बालकों के लैगिंग यौन शोषण , निराश्रित बालक बालिकाओं को समाज की मुख्य धारा से जोड़ना स्कूल , कॉलेजों के विद्यार्थियों को नैतिक शिक्षा आदि के अनेक विषयो पर उद्बोधन एवं कार्यशाला ।
पता
मीरा जैन
516 साईं नाथ कॉलोनी,सेठीनगर
उज्जैन ,मध्य प्रदेश
पिन-456010
मो. बा-9425918116
https://www.meerajain.in
jainmeera02@gmail.com
इमेज स्रोत - https://bentenbooks.com/
डॉ॰ विजय अग्रवाल द्वारा लिखित यह प्यारी सी पुस्तक, एक आई.ए.एस. अधिकारी ( व्यक्तिगत सचिव के स्तर के ) के व्यवसायिक और व्यक्तिगत जीवन के साथ उसके मनोभावों के आस पास घूमती है, प्रकाशक बेनतेन बुक्स के शब्दों मे - " यह एक ऐसा उपन्यास है जो इस ग्लोबलाइजे़शन के दौर में किसी भी व्यक्ति को रोज़ मर्रा की ज़िन्दगी से हटकर अपनी निजता को खोजने पर मजबूर करता है। कहानी एक आई.ए.एस. अधिकारी के जीवन के चारों ओर घूमती है और हम सभी के जीवन के अंतर द्वंद्वो तथा समस्याओं पर प्रकाश डालती है। कुलमिलाकर यह हास्य-व्यंग से भरपूर, एक रोचक उपन्यास है जिसे पाठक एक बार शुरू करने पर समाप्त करके ही रखेगा।
मैंने क्या बेहतरी महसूस की खुद में इस पुस्तक को पढ़कर:
" और भी बहुत कुछ जो यहाँ लिखने लग जाऊँ तो फिर एक पुस्तिका तैयार हो जाये "
मुझे उम्मीद है कि आपको भी इस पुस्तक को पढ़कर मानसिक स्फूर्ति का अहसास होगा और चीज़ों को बेहतर तरीके से समझ पाने का गर्व तथा आत्मसंतोष भी |
अगर आपको चीज़ों की कार्यपद्धति को समझना, मानव मन और व्यवहार को जानना-समझना रोचक और जरुरी लगता है तो आप भी निराश न होंगे |

डॉ॰ प्रीति अग्रवाल द्वारा लिखित यह प्यारी सी पुस्तक, आदरणीय डॉ॰ विजय अग्रवाल सर के जीवन, संघर्ष, कार्यों और अनुभवों पर आधारित है, प्रकाशक बेनतेन बुक्स के शब्दों मे - " यह एक पिछड़े छोटे से गांव में निम्न-मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मे डॉ. विजय अग्रवाल के जीवन की सच्ची कहानी है। यह उस किसी भी ऐसे व्यक्ति की कहानी है, जो अपनी विपरीत परिस्थितियों से हार मानने से इंकार करके अपनी ज़िन्दगी में निरंतर अग्रसर होता जाता है। इसको पढ़ते समय इसमें आपको कई जगह अपनी झलक दिखाई दे सकती है। इस पुस्तक मे आपकी मुलाक़ात केवल घटनाओं से ही नहीं होगी बल्कि उन घटनाओं को जन्म एवं स्वरूप देने वाले जीवन के सूत्रों से भी होगी | 'तृषित' यानि प्यासा | यह आपके लिए ' जीवन के जलकुंड ' का भी काम कर सकती है, आपके जीवन से जुड़े कुछ प्रश्नो के उत्तर देकर "
मैंने क्या बेहतरी महसूस की इस पुस्तक को पढ़कर:
बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय डॉ॰ प्रीति अग्रवाल को कि उन्होने इस पुस्तक को लिखकर हमारे जैसे युवाओं को अपने अजीज डॉ॰ विजय अग्रवाल सर को और बेहतर तरीके से जानने समझने का मौका दिया |
मुझे पूरा विश्वास है कि पाठक इस पुस्तक को पढ़कर बहुत कुछ बेहतरी की तरफ बढ़ सकते हैं फिर चाहे वो जीवन का मामला हो या प्रातियोगी परीक्षाओं की तैयारी का मामला हो |
शुभकामनायें