मेरी प्यारी कॉफी,
सुमधुर स्मृति,
तुम जहां भी होगी बहुत खुश होगी, ऐसा मेरा विश्वास है क्योंकि तुम थी ही इतनी प्यारी। तुम सबसे इतने प्यार से मिलती थी, हर आने वाले को तुम प्यार की डोर में बाँध लेती थी जैसे तुम्हारा उससे जन्म-जन्मांतर का रिश्ता हो। हमारी कॉलोनी वाले सभी तुमको बहुत प्यार करते थे। जब तुम कार में बैठकर रानी की तरह ठाठ से जाती तो सभी बच्चे हाथ हिला कर तुम्हारा अभिवादन करते। तुम्हारे जाने के बाद भी वे तुम्हारी खोज-खबर लेने हमारे घर आ जाते हैं। कुछ लोग तो अब भी पूछते हैं, जब हमारे घर का गेट खोलते हैं तो सबसे पहले अंदर झांकते हैं, मेरे आश्वासन देने पर की डरने की कोई बात नहीं है, काॅफी चली गई है, तब ही वे अंदर आते हैं। आज कुछ निडर प्राणी हमारे घर में खूब उछल-कूद मचा रहे हैं जो तुम्हारे रहने पर फटकते भी नहीं थे, अब ये बेधड़क नन्हें-मुन्हें बच्चे तुम्हारी जगह धमा-चौकड़ी कर हमारा मन लगाए रहते हैं और म्याऊँ-म्याऊँ की बोली से हमारे कानों में मिश्री-सी घोल जाते हैं । उनका दबे-पांव आना और चुपचाप झांकना मुझे तुम्हारी याद दिलाता रहता है। वैसे भी हम तुमको भूले ही कहां है, बस कुछ इस तरह से तुम्हारी यादें ताजी हो जाती हैं।
तुम्हारी भारी-भरकम आवाज जब पूरे घर में गूंजती तो हम समझ जाते कि कोई आया है और तुम हमें बुला रही हो या आने वाले से उसका नाम पूछ रही हो। तुम्हारे पास तो एक ही भाषा थी, हमें समझना पड़ता था कि तुम क्या कहना चाहती हो? गुस्से के समय तुम्हारा चेहरा बदल जाता था। तुम्हारे अंदर के भाव तुम्हारे प्यारे से चेहरे पर ऐसे आते जैसे कोई बच्चा रूठ गया हो और उस समय मेरी हंसी रोके नहीं रुकती। तुमको अपने गले से लगाए बिना मैं ना रह पाती। जब मैं सितार बजाती तो तुम मेरी गोद में सिर रख कर पूरी तन्मयता से सुनती जैसे सब समझ रही हो और आनंद ले रही हो। तुमने मुझे हर एक प्राणी से प्यार करना सिखा दिया। सभी प्राणियों में मुझे एक ही आत्मा दिखाई देने लगी, यह मेरे लिए तुम्हारी सबसे बड़ी सौगात थी जो मुझे कोई और नहीं दे सकता था, एक आध्यात्मिकता का अहसास जो तुमने करवा दिया। आज इसी वजह से मैं उन प्राणियों से डरने या डराने की जगह उनसे दोस्ती करने की कोशिश कर रही हूं। यह मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि पहले मैं जिनसे भयभीत रहती थी,उनसे आज प्यार करने का मन चाह रहा है, यह सब कुछ हमारी कॉफी रानी की बदौलत ही तो हो रहा है। परिवर्तन ही तो जीवन का नियम है, तभी तो हम अपने आप को बदलते हुए आगे बढ़ते हैं और ऊपर उठते जाते हैं। तुमने मुझमें आध्यात्मिक चेतना जगा दी कि आखिर हम सब भी तो उस एक परमात्मा की संतान ही तो है। बस रूप अलग-अलग है, फिर सभी की मूलभूत जरूरतें भी तो एक ही है इसीलिए तुम हमारे परिवार की सदस्या बन गई थी। पूरे अधिकार से तुम हमारे बीच धंसने में जरा भी नहीं हिचकती। तुम्हारा बस चलता तो तुम गलबाहियां डालकर बैठ जाती। मेरे पति ने इसीलिये तुम्हारा नाम काॅफी रानी रख दिया था। हमारे सोफे पर बैठकर तुम हमारे साथ ही अखबार पढ़ा करती थी हमसे छीन कर, जब हम तुमसे अखबार मांगते तो तुम अजीब-सा मुंह बनाकर हम पर गुस्सा दिखाती। शायद तुमको हमारा अखबार पढ़ना अच्छा नहीं लगता था क्योंकि उस समय हम तुम्हारे साथ होकर भी पेपर पढ़ने में व्यस्त हो जाते थे, यह बात तुमको नागवार गुजरती।
तुम्हारा पालन-पोषण मेरे बेटे सान्निध्य की गोद में और बचपन हमारे साथ खेलकर गुजरा। मस्ती के साथ झूमते हुए तुम बहुत जल्दी बड़ी होने लगी। कभी-कभी अफसोस होता कि तुम इतनी तेजी से क्यों बड़ी हो रही हो? हम लोगों का और हमारे यहां आने वाले सभी लोगों का तुमने मन मोह रखा था, तुम मनमोहिनी बन गई थी। तुम्हारा रंग भी दूध वाली कॉफी जैसा था, व्हाइट और ब्राउन मिक्स, इसीलिए बेटे ने तुम्हारा नाम कॉफी रखा था। कोई यदि हमारे यहां से जाने के बाद बहुत दिनों के बाद हमसे मिलने आया और तुम उसको पहचानती तो बस उसके पास आकर बैठ जाती और वहां से उठने का नाम नहीं लेती क्योंकि उससे प्यार जो करवाना होता, तुम प्यार की प्रतिमूर्ति थी। हर एक से प्यार पाकर तुम्हारे चेहरे पर एक सुकून दिखाई देता और तुम आंखें बंद कर उसका सुखद अहसास सामने वाले को भी करवा देती, जैसे तुम कृतज्ञता व्यक्त कर रही हो। तुम्हारी हर एक गतिविधि ने जैसे हम सबको एक बंधन में बांध दिया था। घर में तुम्हारी बातें ज्यादा होती और दूसरी बातें कम होती। तुम हमारे बीच जैसे एक पुल बन गई थी। बड़ी होने पर भी तुम शायद खुद को बच्ची ही समझती थी। उसी तरह रूठना लेकिन जल्दी मान जाना तुम्हारी बहुत बड़ी विशेषता थी।
उम्र का तकाज़ा अब तुम्हें पहले की तरह उछल-कूद की इजाज़त नहीं दे रहा था। तुम्हारा भागना-दौड़ना भी प्रतिबंधित हो गया। तुम्हारी चंचलता पर भी लगाम लग गई। यह सब हम लोगों के लिए भी कष्टदायी हो गया। तुम हमारे पलंग पर अब भी पहले की तरह सोने के लिए मचल जाती लेकिन लाचार होकर बैठ जाती, हम लोग भी विवश थे क्योंकि तुम्हारा भारी शरीर बाधा बन गया था इसीलिए हम भी तुम्हें पलंग पर नहीं चढ़ा सकते थे। हमें तुम्हारे बिना पलंग सूना लगता था, जबकि शुरू में जब तुम हमारे साथ सोने की जिद करती तो हम तुम्हारी इस जिद से बहुत परेशान और नाराज होते थे। लेकिन तुम जीत जाती और हम हार जाते पर हमें हार कर भी जीत से ज्यादा खुशी मिलती। लेकिन तुमको उदास देखकर हम भी दुखी हो जाते थे। क्या करें कि तुम पहले की तरह ही उछलकर पलंग पर चढ़ जाओ और हम दोनों के बीच धंस जाओ। मेरे पतिदेव के सीने पर ठोड़ी टिकाये बिना तो तुमको नींद ही नहीं आती थी। तुम्हारी गर्दन का बोझ जब बर्दाश्त नहीं होता तो प्यार से हम तुम्हें हटाते, लेकिन यह हमारी कल्पना के भी बाहर था कि हम तुमको बिस्तर पर अपने साथ सुलाएंगे पर तुम्हारे प्यारे से मुखमंडल के आगे हम सबकुछ भूल जाते थे। तुम्हारा बिस्तर हमारे कमरे के कोने में लगा दिया जाता, जहां तुम चुपचाप दुबक कर बैठ जाती, बिना किसी शोर-शराबे के। तुम भी शायद अब उम्र के तकाजे के साथ समझौते का रुख अपना रही थी, तुमको उठने में और चलने में परेशानियां शुरू हो गई। किसी के आने की आहट भी तुमको अब शायद सुनाई नहीं देती। तुम्हारे ऊपर बुढ़ापा तेजी से हावी हो रहा था। धीरे-धीरे तुम्हारी सारी गतिविधियां उम्र के साथ प्रतिबंधित हो रही थी। इससे हम भी परेशान रहने लगे क्योंकि तुम्हारी हालत दिन पर दिन बिगड़ती जा रही थी। तुम्हारी लाचारी ने ही तुम्हें चिड़चिड़ा बना दिया था। हम लोग धैर्य के साथ तुम्हारा उस समय में साथ दे रहे थे और सब मिलकर सेवा करते थे। कभी-कभी हम लोग भी तेजी से गिरते तुम्हारे स्वास्थ्य के लिए परेशान हो जाते। ना जाने तुम कैसे स्वस्थ होगी? लेकिन उम्र का तकाज़ा रोके कहां रुकता है? तुम भी उसकी गिरफ्त में आ गई थी,ये हमें खुद को समझाना पड़ा। जो आया है, उसे जाना ही पड़ेगा। कोई यहां अमरफल खाकर नहीं आया। तुम्हारा शायद अब अंतिम समय आ गया था। बेटे सान्निध्य ने अच्छे से अच्छा इलाज करवाया। लेकिन शायद ईश्वर ने इतने ही समय के लिए हमारे साथ तुम्हारा अद्भुत संबंध जोड़कर हमें एक आध्यात्मिक जगत से जोड़ने के लिए भेजा था। तुम्हारी सारी स्मृतियां अंतिम समय तक हमारे साथ रहेंगी। बेटे ने तुम्हारी समाधि हमारे छोटे से लाॅन में जो तुमको बहुत पसंद था, वही बनवाई है, जिससे तुम मीठी-प्यारी स्मृतियों के रूप में हमारे पास मौजूद रहोगी। मेरे पतिदेव रोज उस जगह धूपबत्ती लगाते हैं। मैंने एक साल तक तुम्हारे लिए वहां दूध रखा क्योंकि तुम दूध पीने के लिए सबसे ज्यादा उछलती हुई आती थी। आज भी मुझे तुम्हारी बड़ी-बड़ी कजरारी आंखों में तुम्हारे अंतिम समय की लाचारी याद आती है। एक अफसोस है, काॅफी काश मैं तुम्हें अपने अंतिम समय तक साथ रख पाती। जब मैंने तुम्हें अंतिम बार गले लगाया, तुम जमीन पर निढाल मेरी तरफ याचना भरी दृष्टि से देख रही थी। तब तुम्हारी आंखें मेरे आलिंगन और चुंबन से धीरे-धीरे हमेशा के लिए जैसे बंद हो गई और वातावरण में खामोशी-सी छाने लगी, तुमको अलविदा करते ही एक सन्नाटा-सा चारों पसर गया हो । जैसे घर का कोई बड़ा बुजुर्ग हमें अकेला और असहाय छोड़कर चला गया हो जो हमारी बहुत प्यारी सुकून देने वाली छाया थी।
तुम कभी-कभी सपनें में अपनी झलक दिखला जाती हो। बेटे सान्निध्य के साथ तुम्हारा लगाव बिल्कुल माँ-बेटे के संबंध जैसा था। आज भी उसे जाने-अनजाने में एक अलौकिक अहसास करवा देती हो तुम। आत्मा के रूप में तुम हमारे साथ ही हो। तुम्हें जो रोज घुमाते थे, आज भी वह कॉलोनी में डॉग्स को घुमाते मिल जाते हैं तो नमस्ते के साथ-साथ तुम्हारी तारीफ किए बिना नहीं रहते। ऐसी डॉगी अभी तक नहीं मिली जो इतनी प्यारी और शांत थी। अब तो तुम्हारी यादें ही प्यारी लगने लगी हैं और इन्हीं यादों के साथ हमने जीना सीख लिया है। एक प्यारा-सा खिलौना भगवान ने पोते के रूप में हमें दिया है। सौभाग्य से उसे भी तुम्हारा स्नेह मिला था। वह जब तुम्हारे ऊपर पैरों से कूदता था तो तुम उसे प्यार से मुड़ कर देखती जैसे दादी एक पोते पर प्यार लुटा रही हो। इससे ज्यादा तुम उसे क्या दे सकती थी? यही तुम्हारी हम सब के लिए सबसे बड़ी सौगात थी प्यार, जो तुम जाते-जाते हम सभी को दे गई। नन्हा-सा पोता अपने नन्हें-नन्हें कदमों से अक्सर तुम्हारी समाधि तक पहुंच कर वैसे ही चढ़ जाता है जैसे तुम्हारी पीठ पर चढ़ा करता था। तुम हमेशा हमारी स्मृतियों में रहोगी कॉफी, यह पंक्तियां तुम्हारी यादों को समर्पित है-
हमारे घर की पहचान थी कॉफी
हम सब का अरमान थी काॅफी
हमारे घर की शान थी कॉफी
हम लोगों की जान थी काॅफी
तुम्हारी अपनी
स्नेहिल प्रीति
डॉ. प्रीति अग्रवाल ने सन् 1984 में हिंदी-साहित्य में स्वर्ण-पदक लिया। सन् 2015 में पी.एच.डी. की उपाधि प्राप्त की। आपने कॉलेज की नौकरी करने के बदले खुद को साहित्य, कला, संस्कृति और सामाजिक कार्यों में शामिल करने का निर्णय लिया।
आपको संस्कार भारती ग्वालियर द्वारा सामाजिक-सांस्कृतिक सेवाओं के लिए वीरांगना लक्ष्मीबाई सम्मान भी दिया गया है। आपने अनेक राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में विभिन्न विषयों पर लेख प्रकाशित किए हैं।
आपकी पुस्तक यात्रा संस्मरण चलो चले अंडमान तथा शोध प्रबंध हिंदी बाल गीतों में लोक संस्कृति और पूर्व सिविल सेवा अधिकारी और माननीय राष्ट्रपति श्री शंकर दयाल शर्मा जी के निजी सचिव जो आपके पति है, उनकी जीवनी तृषित- एक जीवन यात्रा प्रकाशित हो चुकी है।
आपका दूरदर्शन एवं आकाशवाणी से जीवंत जुड़ा रहा है। फिलहाल आप लाइफ काउंसलर के रूप में लोगों को फोन पर निःशुल्क सेवा उपलब्ध करा रही हैं।
आपने लोगों की जटिल से जटिल जीवन संबंधी समस्याओं को सुलझाया है। अनेक लोगों के जीवन को अपने मार्गदर्शन से आत्महत्या से बचाया है तथा उनके जीवन को सार्थकता भी दी है। वे रिश्तें जो तलाक तक पहुंच गए थे आपने उन्हें भी फिर से मिला दिया। आप प्री-मैरिज काउंसलिंग भी निःशुल्क करती हैं।
कोई भी इच्छुक व्यक्ति आपसे बात कर सकता है, यह काउंसलिंग पूरी तरह निःशुल्क है, आपका मोबाइल नंबर 9644624449 है। शाम को 6:00 बजे से 9:00 बजे तक आपसे संपर्क किया जा सकता है।आपातकालीन परिस्थितियों में कभी भी बात कर सकते हैं।
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