Recent Articles Related To कविताएं

बेरोजगारी की जंजीरें और समाज (कविता) - गरिमा जोशी

हाय! यह बेरोज़गारी की जंजीरें
बड़ी कस के पकड़ लेती हैं,
लड़का हो चाहे लड़की,
ये जंजीरें सबको जकड़ लेती हैं!
एक बिन ब्याही लड़की, जो सबको खटकती है,
तैयारी का हवाला देकर वो मर-मर के जीती है।
“बस कुछ साल का मौका है तेरे पास”, यह कहकर बख्श दी जाती है!
दुनिया की आँखों में वो बस चुभती चली जाती है।
वहीं, दूसरी ओर, एक लड़का है; अब वो भी सबको खटकता है।
“कौन तुझे अपनी लड़की देगा?” यह कहकर आँखों में बड़ा चटकता है।
“तेरे पास लड़की से ज्यादा मौके हैं”, यह कहकर बख्श दिया जाता है,
पर दुनिया की नज़रों में तू थोड़ा कम सबको चुभता है।
एक लड़की, जो शादी से बचने के लिए पढ़ रही है,
वहीं वो लड़का शादी हो जाने के लिए पढ़ता है।
दोनों का मुद्दा एक ही है, वो है ‘बेरोज़गारी’,
पर दोनों की परिस्थिति अलग हैं, वो हैं खुद की लाचारी!
मैं तो कहती हूँ, लोग परिस्थिति देख कर हमें सम्मान देते हैं,
मानो एक साँप को शिवलिंग पर स्थान देते हैं।
शिवलिंग पर साँप दिखते ही लोग उस पर दूध और फूल चढ़ाते हैं,
वहीं साँप अगर घर में घुस जाए, लाठी-डंडों से उसे भगाते हैं।
था दोनों जगह साँप ही...
पर परिस्थिति ने रुतबा उसका बदल दिया।
मानो शिवलिंग पर चढ़ा साँप ‘रोज़गार’ में था,
और घर में आया साँप ‘बेरोज़गार’ बन गया।
बेरोज़गारी थी दोनों के लिए एक-सी,
मायने उसके सबने बदल दिए।
किसी के लिए वह अच्छी, तो किसी के लिए नासूर-सी बन गई।
हाय! यह बेरोज़गारी की जंजीरें
बड़ी कस के पकड़ लेती हैं,
लड़का हो चाहे लड़की,
ये जंजीरें सबको जकड़ लेती हैं!
- गरिमा जोशी

संपादकीय टिप्पणी - "कविता में प्रयुक्त शब्द प्रतीकात्मक हैं और समाज की दोहरी मानसिकता की तरफ ध्यान खींचने के प्रयोजन से उपयोग में लिए गए हैं, किसी भी इंसान की किसी भी भावना को आहत करने का कतई प्रयोजन नहीं है।" - लवकुश कुमार 


युवा रचनाकार गरिमा जोशी जी की लेखन शैली सामाजिक मुद्दों पर केंद्रित होती है और वह समाज में मौजूद रूढ़िवादी सोच पर सवाल उठाती हैं। 

आप एक ऐसे न्यायपूर्ण और समानता वाले समाज का सपना देखती हैं जहाँ लिंग, जाति, पंथ या धर्म के आधार पर कोई भेदभाव न हो। 

कवयित्री से garimaji0814@gmail.com के जरिए संपर्क साधा जा सकता

है। रचनाकार के बारे में और जानने के लिए यहां पर क्लिक करें


अगर आपके पास भी कुछ ऐसा है जो लोगों के साथ  साझा करने का मन हो तो हमे लिख भेजें  नीचे दिए गए लिंक से टाइप करके या फिर हाथ से लिखकर पेज का फोटो  kumarchetnapsw@gmail.com पर ईमेल कर दें

फीडबैक / प्रतिक्रिया या फिर आपकी राय, के लिए यहाँ क्लिक करें |

Read More
हर महीने की दस्तक (कविता)- गरिमा जोशी

मासिक धर्म, रजोधर्म, ऋतु चक्र हूँ।
कुछ के लिए महावारी हूँ, तो
कुछ के लिए लाल चक्र हूँ।

अंग्रेज़ी में कह दो मुझे, तो पीरियड्स मैं हूँ।
कुछ मान लेते हैं मुझे कि छूत भी मैं हूँ।

कहते हैं मुझे कि एक नारी का गहना मैं हूँ।
मैं ना अगर हूँ, तो फिर ना जाने क्या ही हूँ।

मिलता है सम्मान मुझे कहीं तो, जब मैं पहली बार आती हूँ।
पूजते हैं लोग उस नारी को, जहाँ भी मैं जाती हूँ।

मैं ना आऊँ, तो चिंता तुम्हारी बढ़ जाती है।
कहीं तो मेरे आते ही वो नारी नज़रों से हटा दी जाती है।
एक कोने में बैठे, आँखों से जुदा कर दी जाती है।
थाली भी उसकी बड़ी अलग कर दी जाती है।

चादर, कम्बल, यहाँ तक कि अपने बच्चे से भी वो
बिल्कुल अलग कर दी जाती है।

कहीं न जाने, न छूने की उसकी आदत कर दी जाती है।
मंदिर के दरवाज़े से वो पूरी ही आउट कर दी जाती है।

पूछती है वो नारी मुझे, “क्यों तुम हर महीने आ जाती हो?”
और मेरे न आने पर उस नारी की हालत
बड़ी ही टाइट कर दी जाती है।

सोचती हूँ मैं कभी-कभी, मेरे आने पर
क्यों वो नारी बिल्कुल अपवित्र कर दी जाती है?
पीछे से मुझे चेक करने की उसकी फ़ितरत कर दी जाती है।

हर महीने मैं आती हूँ, ये बताने कि
मैं एक नारी को पूरा करने आती हूँ।
पूरा कर उसे, फिर भी मैं अधूरा ही पाती हूँ।

हर महीने की दस्तक देना मेरा काम है,
पर एक सवाल मेरा तुमसे है-
कि जिस नारी को मेरे आने पर
तुम अपवित्र कहते हो,
उसी नारी की कोख से जन्म लेकर
फिर तुम पवित्र कैसे हो जाते हो?

मैं अभिशाप नहीं, प्रकृति का सबसे सुंदर सत्य हूँ।
मैं अपवित्र नहीं, सृजन की पहली सीढ़ी हूँ।
मुझे छूने से धर्म नहीं टूटता, मुझे समझने से समाज बनता है।

हर महीने की दस्तक देना मेरा काम है,
और हर महीने उस दस्तक का सम्मान करना तुम्हारा!

 - गरिमा जोशी 


युवा रचनाकार गरिमा जोशी जी की लेखन शैली सामाजिक मुद्दों पर केंद्रित होती है और वह समाज में मौजूद रूढ़िवादी सोच पर सवाल उठाती हैं। 

आप एक ऐसे न्यायपूर्ण और समानता वाले समाज का सपना देखती हैं जहाँ लिंग, जाति, पंथ या धर्म के आधार पर कोई भेदभाव न हो। 

कवयित्री से garimaji0814@gmail.com के जरिए संपर्क साधा जा सकता

है। रचनाकार के बारे में और जानने के लिए यहां पर क्लिक करें


अगर आपके पास भी कुछ ऐसा है जो लोगों के साथ  साझा करने का मन हो तो हमे लिख भेजें  नीचे दिए गए लिंक से टाइप करके या फिर हाथ से लिखकर पेज का फोटो  kumarchetnapsw@gmail.com पर ईमेल कर दें

फीडबैक / प्रतिक्रिया या फिर आपकी राय, के लिए यहाँ क्लिक करें |

शुभकामनाएं

Read More
पितृसत्ता (कविता) - सौम्या

पुरुषों ने नहीं रहने दिया इंसान किसी को 

स्त्री को बनाया देवी कि वो सब सह जाए 

किन्नर में कहा कि देवता वास करते हैं इनके हृदय में 

जिससे इस व्यवस्था में रह सके सिर्फ वहीं इंसान 

और बने रहे अन्य सभी लिंगों के स्वामी 

क्योंकि इंसान बने रहना ही था सबसे अच्छा 

इसीलिए उन्होंने अपने लिए चुना इंसान रहना 

पुरुषत्व पर भी रखा सिर्फ अपना वर्चस्व 

सारे कल्याण के काम खुद ही करने लगे 

स्त्रियों की सुरक्षा से पालन पोषण तक 

उसके तन से लेकर मन तक 

किया अपना ही अधिकार 

पर इस वर्चस्व से सबसे ज्यादा मुसीबत में पड़ा भी पुरुष 

महिला तो दासी बनी ही 

पर पुरुष ने भी महिला को इतना दुर्लभ बनाया 

कि वो भी उसका दास हो गया 

कभी मानसिक तौर पर तो कभी शारीरिक

 

-सौम्या 

बाराबंकी उत्तर प्रदेश 

सौम्या जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं |


अगर आपके पास भी कुछ ऐसा है जो लोगों के साथ  साझा करने का मन हो तो हमे लिख भेजें  नीचे दिए गए लिंक से टाइप करके या फिर हाथ से लिखकर पेज का फोटो  kumarchetnapsw@gmail.com पर ईमेल कर दें

फीडबैक / प्रतिक्रिया या फिर आपकी राय, के लिए यहाँ क्लिक करें |

शुभकामनाएं

Read More
गुमनाम शहीद (कविता) संजय सिंह “अवध”

इस स्वतंत्रता दिवस पढ़िए, कुछ अलग और विचार कीजिए कि आप किस तरह योगदान कर रहे हमारे देश की स्वतंत्रता को बनाए रखने में। और हां क्या आपको पता है कि हमारे देश के स्वतंत्रता संग्राम के आदर्श क्या हैं ? अगर नहीं तो पढ़ें।

आइये संवेदनशील कवि संजय सर की कविता से मुलाकात करते हैं:

गुमनाम शहीद 
गुमनाम शहीदों को मेरा सलाम भेजना,
अनजान मसीहों को मेरा सलाम भेजना,
उनकी शहादतों के क्या हैं मायने रहे,
हासिल हुए हैं जो उन्हें मुकाम भेजना।

गुमनाम शहीदों को मेरा सलाम भेजना……….

ए वक़्त तू गवाह शहादत के दौर का, 
सो तू ही उनसे मिलके ये पैग़ाम भेजना,
उनकी वतन परस्ती से ये देश है कामिल,
जो चाहता है आज वो हो जाता है हासिल,
उनकी ही वफ़ाएँ हैं की ये गुलिस्ताँ बना,
इसकी महक के उनको तू गुलफाम भेजना।

गुमनाम शहीदों को मेरा सलाम भेजना……….

ना हमको याद है, ना ज़माने को याद है,
कुछ नाम जिनसे सज रहा ये माहताब है,
मौजूद हैं तुझमें वो नाम आज भी कहीं,
ए हवा हमको भी ज़रा वो नाम भेजना।

गुमनाम शहीदों को मेरा सलाम भेजना……….

अपनी किताब में सभी वो नाम लिखेंगे,
भूली हुई वो दास्ताँ भी याद करेंगे,
जी लेंगे हम भी दर्द वो,वो परेशानियां,
गुमनाम ए वफ़ा को दिल से दाद करेंगे,
ए वक़्त, ए हवा, ए चाँद सितारों,
वो याद हैं हमें सदा ये कह के बहारों,
मेरी सुबह, मेरे दिन-ओ-शाम भेजना,
लिख के यहाँ लाया हूँ शहीदों की याद में,
गुमनाम शहीदों को मेरा क़लाम भेजना ।

गुमनाम शहीदों को मेरा सलाम भेजना……….

- संजय सिंह 'अवध' 

ईमेल- green2main@yahoo.co.in

वाट्सऐप चैनल

यूट्यूब चैनल


उक्त मन को छूने वाली कविता के रचयिता भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण में ATC अधिकारी हैं और अपने कालेज के दिनों से ही, जैसा कि इनकी रचनाओं से घोतक है, जन जन में संवेदना, करूणा और साहस भरने के साथ अंतर्विषयक समझ द्वारा उत्कृष्टता के पथ पर युवाओं को अग्रसर करने को प्रयासरत हैं।

कवि के बारे में विस्तार से जानने के लिए यहां क्लिक करें।

 

Read More
आधुनिक समाज की सच्चाई (कविता) - विजयीप्रिया शर्मा

हम इतने सभ्य हो चुके हैं,

इतने सभ्य कि अब इंसान इंसान को देखकर मुस्कुराना भूल रहा है,

और कुछ यूं हुआ है

चारों तरफ उजाला है, पर अधिकतर अपनी अपनी स्क्रीन के अंधेरे में डूबे हुए हैं।

अंगूठे चल रहे हैं लगातार......

लाइक शेयर और स्क्रोल की अंधी दौड़ में, हम औंधे मुंह व्यस्त हैं फोन चलाने में,

बिना यह जाने कि .....

सामने बैठी बूढ़ी आंखें बात करना चाहती हैं,

वो अपना बुढ़ापा खोना चाहती हैं,

हमारी खिलती जवानी के साथ, 

पर हम रील के पंद्रह सेकंड के क्षणिक सुख में व्यस्त हैं।

रिश्तों के धागे अब वाई-फाई से जुड़ते हैं,

नेटवर्क कमजोर होते ही टूट जाते हैं। 

हजारों फ्रेंड्स है वर्चुअल दुनिया में, 

पर आधी रात को उदास दिल एक कंधा, दिल की सुनने वाला एक इंसान ढूंढने के लिए तरस जाता है।

यहां मशीनें इंसानों की तरह सोच रही है,

और इंसान रोबोट की तरह बिना सोचे जी रहा है। 

यह हमारी सबसे बड़ी प्रगति है। 

हमने चांद पर कदम रख दिया, 

पर जमीन पर अपनों का हाथ छोड़ दिया।

हम चालाक हो गए हैं। 

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से बात कर लेते हैं,

मगर पड़ोस के घर का हाल नहीं जानते हैं।

हम पत्थरों के दौर से निकल कर कांच और सिलिकॉन के नए पाषाण युग में आ खड़े हुए हैं,

पर उनमें अब कोई आहट नहीं होती है।

यह तरक्की का शिकार है यह संवेदनाओं का पतन?

हमारा चरित्र अब प्रोफाइल पिक्चर करती है,

और हमारी योग्यता.....

लाइक और कॉमेंट्स की गिनती।

 

- विजयीप्रिया शर्मा 


विजयीप्रिया जी स्नातक में मानविकी की छात्रा हैं और सामाजिक विषयों पर लिखती रहती हैं, वह वर्तमान में लखनऊ विश्वविद्यालय में अध्ययनरत हैं और पढ़ने लिखने की संस्कृति को बढ़ाने के लिए प्रयासरत हैं| उनका मानना है कि पढ़ने लिखने वालों को एक मंच पर लाकर हम अपने विचार और जीवन/दुनिया को लेकर अपने अवलोकन ज्यादा से ज्यादा लोगों से साझा कर पाएंगे और इस तरह दुनिया और स्वयं को लेकर एक व्यापक दृष्टिकोण बना पाएंगे, महान लेखिका महादेवी वर्मा जी की रचनाएँ और व्यक्तित्व उन्हे खास पसंद हैं|


जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना आपके जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट ।

वेबसाइट के उद्देश्य के बारे में जानने के लिए यहां क्लिक करें।


अगर आपके पास भी कुछ ऐसा है जो लोगों के साथ साझा करने का मन हो तो हमे लिख भेजें नीचे दिए गए लिंक से टाइप करके या फिर हाथ से लिखकर पेज का फोटो Lovekushchetna@gmail.com पर ईमेल करें।

Read More
घोंसला और पिंजरा (एक कविता) - सौम्या गुप्ता

तुम बनाओ अपने महल अटारी,

मुझे अपने घोंसले में रहने दो,

मत रोको मुझको अब पिंजरे में,

मुझे गगन में उड़ने दो।

 

जानती हूँ तुम मुझे पिंजरा भी सोने का दोगे,

चुगने के लिए मोती से दाने भी दोगे,

पर जानती हूँ ये भी कि,

फिर तुम मुझे उड़ने भी नहीं दोगे,

मुझसे कीमत वसूलोगे,

मेरे पंखों को कुतरोगे।

 

इसीलिए मैं तिनका-तिनका जोड़कर बनाऊँगी अपना घोंसला,

चुगने के लिए दाना भी खुद ले आऊँगी,

लड़ूगी चील-बाज अन्य पक्षियों से अकेले,

कभी हार जाऊँगी, कभी संघर्ष कर पार पाऊँगी,

है सब मंजूर मुझे,

पर मैं तुम्हारे पिंजरे में नहीं आऊँगी।

 

 

- सौम्या गुप्ता 

बाराबंकी, उत्तर प्रदेश 


सौम्या जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं |


अगर आपके पास भी कुछ ऐसा है जो लोगों के साथ  साझा करने का मन हो तो हमे लिख भेजें  नीचे दिए गए लिंक से टाइप करके या फिर हाथ से लिखकर पेज का फोटो  kumarchetnapsw@gmail.com पर ईमेल कर दें

फीडबैक / प्रतिक्रिया या फिर आपकी राय, के लिए यहाँ क्लिक करें |

शुभकामनाएं

Read More
समर्पण (एक कविता) - सौम्या गुप्ता

समर्पण गलत नहीं होता

पर सच है यह कि,

यह भाव सबके लिए

 लाना भी नहीं होता।

 

हो समर्पण सत्य के प्रति

सत्यवादी तुम बनोगे,

हो समर्पण कृष्ण के प्रति

तो कृष्ण जैसे तुम बनोगे।

 

तुम बनोगे कंस या कृष्ण

यह भी होगा इसी से निश्चित,

कि समर्पण किसके प्रति है?

 

कर्ण भी तो था समर्पित

पर समर्पण असत्य के प्रति,

दानवीर था वो ऐसा कि

जैसा न कोई और जगत् में,

 

कुरु वंश भी ठना हुआ था

पर ठना था अन्याय के प्रति,

नारायणी सेना थी पाई

फिर भी हारे महाभारत में,

 

आज भी वो निंदनीय हैं 

क्योंकि वो थे समर्पित गलत के प्रति।

 

हनुमान का भी था समर्पण

पर समर्पण राम के प्रति,

अर्जुन भी तो था समर्पित

पर समर्पण कृष्ण के प्रति,

 

दोनों की होती प्रशंसा

 दोनों ही हैं पूजनीय,

क्योंकि ये थे समर्पित सत्य के प्रति

 

कोई पूजनीय होगा

या कि होगी सिर्फ निंदा,

इसका निर्धारण होगा इससे

कि समर्पण है उनका किसके प्रति।

 

- सौम्या गुप्ता 

बाराबंकी, उत्तर प्रदेश 


सौम्या जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं |


अगर आपके पास भी कुछ ऐसा है जो लोगों के साथ  साझा करने का मन हो तो हमे लिख भेजें  नीचे दिए गए लिंक से टाइप करके या फिर हाथ से लिखकर पेज का फोटो  kumarchetnapsw@gmail.com पर ईमेल कर दें

फीडबैक / प्रतिक्रिया या फिर आपकी राय, के लिए यहाँ क्लिक करें |

शुभकामनाएं

Read More
माँ- देवी और इंसान (सम्मान से अधिकार तक) - सौम्या गुप्ता

माँ-देवी, नहीं इंसान बने,

चाहती हूँ माँ के अक्षय पात्र में भी कम पड़े,

माँ अब पहले-सी भूखी न रहे।

 

देवी बोल - बोल कर जो ली गई है बलि उससे,

अब उसे उसका हिसाब मिले।

 

कभी त्याग की मूरत, कभी देवी-सी सूरत,

कहकर कराये गए है त्याग उससे,

उसे उन त्यागों का प्रतिफल मिले। 

 

तुम तो चुका भी नहीं पाओगे,

कर्ज की इस गठरी का क्या हिसाब लगा पाओगे?

जब चुका सकते नहीं तो कर्ज इतना क्यों लिया?

औरत को माना देवी और दासी बना दिया।

 

कहा ज्ञान की देवी पर पुस्तक भी न छूने दी,

बोला तुमने है माँ लक्ष्मी पर रोटी भी न कमाने दी,

बोला तुमने जननी है पर क्या केवल बच्चों की?

कब दोगे तुम आजादी उसको, स्व-अस्तित्व के सृजन की।

-सौम्या गुप्ता

बाराबंकी, उत्तर प्रदेश 


सौम्या जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं |


अगर आपके पास भी कुछ ऐसा है जो लोगों के साथ  साझा करने का मन हो तो हमे लिख भेजें  नीचे दिए गए लिंक से टाइप करके या फिर हाथ से लिखकर पेज का फोटो  kumarchetnapsw@gmail.com पर ईमेल कर दें

फीडबैक / प्रतिक्रिया या फिर आपकी राय, के लिए यहाँ क्लिक करें |

शुभकामनाएं

Read More
खुद से जंग (कविता) - सौम्या गुप्ता

खुद से खुद की जंग है,

कई बार मैं हार जाती हूँ,

कई बार मन हार जाता है।

 

पर कोशिश है मन को

ज़्यादा हराने की,

 

हर बार एक कदम

मन से जीत जाने को,

 

जानती हूँ मन मेरा हर बार

प्रतिस्पर्धी नहीं होगा,

 

कई बार बनेगा यह मेरा मित्र,

कई बार खुद ही आदत हो जाएगी

इसे मुझसे हार जाने की।

 

-सौम्या गुप्ता 

बाराबंकी, उत्तर प्रदेश 

 

संपादकीय टिप्पणी:

 

इस कविता का मूल विषय क्या है?

इस कविता का मूल विषय आंतरिक संघर्ष है, जो व्यक्ति के मन के साथ होने वाली लड़ाई को दर्शाता है, जब मन हमें हमारी वृत्ति की और खींचता है और हम अपने शरीर से वह काम लेना चाहते हैं जो हमें उत्थान, आत्मनिर्भरता और मुक्ति की और ले जाएँ। यह हार और जीत के चक्र, और खुद को बेहतर बनाने की निरंतर कोशिश के बारे में है।


सौम्या जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं |


अगर आपके पास भी कुछ ऐसा है जो लोगों के साथ  साझा करने का मन हो तो हमे लिख भेजें  नीचे दिए गए लिंक से टाइप करके या फिर हाथ से लिखकर पेज का फोटो  kumarchetnapsw@gmail.com पर ईमेल कर दें

फीडबैक / प्रतिक्रिया या फिर आपकी राय, के लिए यहाँ क्लिक करें |

शुभकामनाएं

Read More
ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति है माँ (कविता)- सुषमा सिन्हा

माँ पर कविता (mother's day)
(अतुकांत कविता)

----------
हम सब हैं तुम्हारी रचना ,
तुम पर क्या रचे हम माँ!
न शब्द ,न शास्त्र, न लेखनी कोई,
जो तुम्हें परिभाषित कर सके माँ ।
ऐसी दीया जो खुद जलकर ,
हमे रौशन करती हो माँ. 
आकांक्षा आसमान से  ऊंचा,
ममता तेरी पृथ्वी से भारी है माँ. 
गर्मी में सघन साया बन जाती, 
जाड़े की नर्म धूप हो माँ.
तेरे स्नेह रसधार के आगे,
सागर भी 'कूप' दिखता है माँ .
कलेजे के टुकड़े को  अपनी मौत तक ,
कलेजे से लगाए रखती हो माँ. 
चोट हमें जब-जब लगती ,
घायल तुम होती हो माँ. 
ईश्वर प्रार्थना सुने 
न सुने ,
बिन बताए इच्छा पूरी करती हो माँ .
प्रभु क्षमा करें ना करें, तुम हर खता माफ करती हो माँ .
परमात्मा नतमस्तक तेरे आगे,
उन्हें भी तो, तुम पाली हो माँ ,
मौत के लाख बहाने होते,
जन्म के लिए सिर्फ तुम ही हो माँ.
हर मुश्किल में साथ निभाती,
निस्वार्थ प्रेम की मिसाल हो माँ .
इंसान के रूप में ही नहीं,
प्राणी मात्र के लिए देवी हो माँ. 
संसार का नजारा बहुत   प्यारा होता,
काश!' किस्मत की लेखनी' पा जाती माँ.  परमात्मा ने भी यही कहा है,
उनकी सर्वश्रेष्ठ कृति तुमही हो माँ.
बच्चों के लिए हर पल बेचैन रहती,
चैन की नींद, चिता पर सोती है माँ. 
फौजी देश पर कुर्बान होते,
प्रथम कुर्बानी देती है माँ. 
"मदर्स डे"क्या मनाना!  
हर क्षण तुम्हारे नाम है माँ. 

सुषमा सिन्हा 
वाराणसी 
मोबाईल 9369998405 

Read More