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आधुनिक समाज की सच्चाई (कविता) - विजयीप्रिया शर्मा

हम इतने सभ्य हो चुके हैं,

इतने सभ्य कि अब इंसान इंसान को देखकर मुस्कुराना भूल रहा है,

और कुछ यूं हुआ है

चारों तरफ उजाला है, पर अधिकतर अपनी अपनी स्क्रीन के अंधेरे में डूबे हुए हैं।

अंगूठे चल रहे हैं लगातार......

लाइक शेयर और स्क्रोल की अंधी दौड़ में, हम औंधे मुंह व्यस्त हैं फोन चलाने में,

बिना यह जाने कि .....

सामने बैठी बूढ़ी आंखें बात करना चाहती हैं,

वो अपना बुढ़ापा खोना चाहती हैं,

हमारी खिलती जवानी के साथ, 

पर हम रील के पंद्रह सेकंड के क्षणिक सुख में व्यस्त हैं।

रिश्तों के धागे अब वाई-फाई से जुड़ते हैं,

नेटवर्क कमजोर होते ही टूट जाते हैं। 

हजारों फ्रेंड्स है वर्चुअल दुनिया में, 

पर आधी रात को उदास दिल एक कंधा, दिल की सुनने वाला एक इंसान ढूंढने के लिए तरस जाता है।

यहां मशीनें इंसानों की तरह सोच रही है,

और इंसान रोबोट की तरह बिना सोचे जी रहा है। 

यह हमारी सबसे बड़ी प्रगति है। 

हमने चांद पर कदम रख दिया, 

पर जमीन पर अपनों का हाथ छोड़ दिया।

हम चालाक हो गए हैं। 

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से बात कर लेते हैं,

मगर पड़ोस के घर का हाल नहीं जानते हैं।

हम पत्थरों के दौर से निकल कर कांच और सिलिकॉन के नए पाषाण युग में आ खड़े हुए हैं,

पर उनमें अब कोई आहट नहीं होती है।

यह तरक्की का शिकार है यह संवेदनाओं का पतन?

हमारा चरित्र अब प्रोफाइल पिक्चर करती है,

और हमारी योग्यता.....

लाइक और कॉमेंट्स की गिनती।

 

- विजयीप्रिया शर्मा 


विजयीप्रिया जी स्नातक में मानविकी की छात्रा हैं और सामाजिक विषयों पर लिखती रहती हैं, वह वर्तमान में लखनऊ विश्वविद्यालय में अध्ययनरत हैं और पढ़ने लिखने की संस्कृति को बढ़ाने के लिए प्रयासरत हैं| उनका मानना है कि पढ़ने लिखने वालों को एक मंच पर लाकर हम अपने विचार और जीवन/दुनिया को लेकर अपने अवलोकन ज्यादा से ज्यादा लोगों से साझा कर पाएंगे और इस तरह दुनिया और स्वयं को लेकर एक व्यापक दृष्टिकोण बना पाएंगे, महान लेखिका महादेवी वर्मा जी की रचनाएँ और व्यक्तित्व उन्हे खास पसंद हैं|


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घोंसला और पिंजरा (एक कविता) - सौम्या गुप्ता

तुम बनाओ अपने महल अटारी,

मुझे अपने घोंसले में रहने दो,

मत रोको मुझको अब पिंजरे में,

मुझे गगन में उड़ने दो।

 

जानती हूँ तुम मुझे पिंजरा भी सोने का दोगे,

चुगने के लिए मोती से दाने भी दोगे,

पर जानती हूँ ये भी कि,

फिर तुम मुझे उड़ने भी नहीं दोगे,

मुझसे कीमत वसूलोगे,

मेरे पंखों को कुतरोगे।

 

इसीलिए मैं तिनका-तिनका जोड़कर बनाऊँगी अपना घोंसला,

चुगने के लिए दाना भी खुद ले आऊँगी,

लड़ूगी चील-बाज अन्य पक्षियों से अकेले,

कभी हार जाऊँगी, कभी संघर्ष कर पार पाऊँगी,

है सब मंजूर मुझे,

पर मैं तुम्हारे पिंजरे में नहीं आऊँगी।

 

 

- सौम्या गुप्ता 

बाराबंकी, उत्तर प्रदेश 


सौम्या जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं |


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समर्पण (एक कविता) - सौम्या गुप्ता

समर्पण गलत नहीं होता

पर सच है यह कि,

यह भाव सबके लिए

 लाना भी नहीं होता।

 

हो समर्पण सत्य के प्रति

सत्यवादी तुम बनोगे,

हो समर्पण कृष्ण के प्रति

तो कृष्ण जैसे तुम बनोगे।

 

तुम बनोगे कंस या कृष्ण

यह भी होगा इसी से निश्चित,

कि समर्पण किसके प्रति है?

 

कर्ण भी तो था समर्पित

पर समर्पण असत्य के प्रति,

दानवीर था वो ऐसा कि

जैसा न कोई और जगत् में,

 

कुरु वंश भी ठना हुआ था

पर ठना था अन्याय के प्रति,

नारायणी सेना थी पाई

फिर भी हारे महाभारत में,

 

आज भी वो निंदनीय हैं 

क्योंकि वो थे समर्पित गलत के प्रति।

 

हनुमान का भी था समर्पण

पर समर्पण राम के प्रति,

अर्जुन भी तो था समर्पित

पर समर्पण कृष्ण के प्रति,

 

दोनों की होती प्रशंसा

 दोनों ही हैं पूजनीय,

क्योंकि ये थे समर्पित सत्य के प्रति

 

कोई पूजनीय होगा

या कि होगी सिर्फ निंदा,

इसका निर्धारण होगा इससे

कि समर्पण है उनका किसके प्रति।

 

- सौम्या गुप्ता 

बाराबंकी, उत्तर प्रदेश 


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माँ- देवी और इंसान (सम्मान से अधिकार तक) - सौम्या गुप्ता

माँ-देवी, नहीं इंसान बने,

चाहती हूँ माँ के अक्षय पात्र में भी कम पड़े,

माँ अब पहले-सी भूखी न रहे।

 

देवी बोल - बोल कर जो ली गई है बलि उससे,

अब उसे उसका हिसाब मिले।

 

कभी त्याग की मूरत, कभी देवी-सी सूरत,

कहकर कराये गए है त्याग उससे,

उसे उन त्यागों का प्रतिफल मिले। 

 

तुम तो चुका भी नहीं पाओगे,

कर्ज की इस गठरी का क्या हिसाब लगा पाओगे?

जब चुका सकते नहीं तो कर्ज इतना क्यों लिया?

औरत को माना देवी और दासी बना दिया।

 

कहा ज्ञान की देवी पर पुस्तक भी न छूने दी,

बोला तुमने है माँ लक्ष्मी पर रोटी भी न कमाने दी,

बोला तुमने जननी है पर क्या केवल बच्चों की?

कब दोगे तुम आजादी उसको, स्व-अस्तित्व के सृजन की।

-सौम्या गुप्ता

बाराबंकी, उत्तर प्रदेश 


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खुद से जंग (कविता) - सौम्या गुप्ता

खुद से खुद की जंग है,

कई बार मैं हार जाती हूँ,

कई बार मन हार जाता है।

 

पर कोशिश है मन को

ज़्यादा हराने की,

 

हर बार एक कदम

मन से जीत जाने को,

 

जानती हूँ मन मेरा हर बार

प्रतिस्पर्धी नहीं होगा,

 

कई बार बनेगा यह मेरा मित्र,

कई बार खुद ही आदत हो जाएगी

इसे मुझसे हार जाने की।

 

-सौम्या गुप्ता 

बाराबंकी, उत्तर प्रदेश 

 

संपादकीय टिप्पणी:

 

इस कविता का मूल विषय क्या है?

इस कविता का मूल विषय आंतरिक संघर्ष है, जो व्यक्ति के मन के साथ होने वाली लड़ाई को दर्शाता है, जब मन हमें हमारी वृत्ति की और खींचता है और हम अपने शरीर से वह काम लेना चाहते हैं जो हमें उत्थान, आत्मनिर्भरता और मुक्ति की और ले जाएँ। यह हार और जीत के चक्र, और खुद को बेहतर बनाने की निरंतर कोशिश के बारे में है।


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ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति है माँ (कविता)- सुषमा सिन्हा

माँ पर कविता (mother's day)
(अतुकांत कविता)

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हम सब हैं तुम्हारी रचना ,
तुम पर क्या रचे हम माँ!
न शब्द ,न शास्त्र, न लेखनी कोई,
जो तुम्हें परिभाषित कर सके माँ ।
ऐसी दीया जो खुद जलकर ,
हमे रौशन करती हो माँ. 
आकांक्षा आसमान से  ऊंचा,
ममता तेरी पृथ्वी से भारी है माँ. 
गर्मी में सघन साया बन जाती, 
जाड़े की नर्म धूप हो माँ.
तेरे स्नेह रसधार के आगे,
सागर भी 'कूप' दिखता है माँ .
कलेजे के टुकड़े को  अपनी मौत तक ,
कलेजे से लगाए रखती हो माँ. 
चोट हमें जब-जब लगती ,
घायल तुम होती हो माँ. 
ईश्वर प्रार्थना सुने 
न सुने ,
बिन बताए इच्छा पूरी करती हो माँ .
प्रभु क्षमा करें ना करें, तुम हर खता माफ करती हो माँ .
परमात्मा नतमस्तक तेरे आगे,
उन्हें भी तो, तुम पाली हो माँ ,
मौत के लाख बहाने होते,
जन्म के लिए सिर्फ तुम ही हो माँ.
हर मुश्किल में साथ निभाती,
निस्वार्थ प्रेम की मिसाल हो माँ .
इंसान के रूप में ही नहीं,
प्राणी मात्र के लिए देवी हो माँ. 
संसार का नजारा बहुत   प्यारा होता,
काश!' किस्मत की लेखनी' पा जाती माँ.  परमात्मा ने भी यही कहा है,
उनकी सर्वश्रेष्ठ कृति तुमही हो माँ.
बच्चों के लिए हर पल बेचैन रहती,
चैन की नींद, चिता पर सोती है माँ. 
फौजी देश पर कुर्बान होते,
प्रथम कुर्बानी देती है माँ. 
"मदर्स डे"क्या मनाना!  
हर क्षण तुम्हारे नाम है माँ. 

सुषमा सिन्हा 
वाराणसी 
मोबाईल 9369998405 

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बदलतीं स्त्रियाँ (कविता)- सौम्या

प्रस्तुत है, कवयित्री सौम्या जी की एक कविता, जो महिलाओं की बदलते हुए सामाजिक भूमिकाओं के बारे में है। यह प्रश्न उठाती  है कि क्या समाज इस बदलाव के लिए तैयार है, और यह परंपरागत मान्यताओं और पितृसत्तात्मक अपेक्षाओं पर भी सवाल उठाती है।

 

मैंने सुना है एक प्रश्न जिसमें पूछा जाता है

कि जब आज स्त्रियां बदल रही हैं, 

वो अब दूसरों से पहले स्वयं को चुन रही हैं 

वो अब रसोईघर से पहले अपने अन्य हुनर को चुन रही हैं 

अब वो खुद का अलग अस्तित्व भी ढूंढ रही हैं 

बेबाक होकर बोल रही हैं, खेल रही है, उड़ भी रही हैं 

क्या समाज इस परिवर्तन के लिए तैयार है? 

तो मुझे ऐसा लगता है, कि नहीं

समाज का एक वर्ग आज भी इस परिवर्तन को नहीं देखना चाहता 

वह चाहता है वही पुरानी रुढियों में लिपटी स्त्री 

जिसके मुंह में न जुबान हो और न दिमाग़ में अपने कोई विचार 

पिता, पति और पुत्र पर निर्भर स्त्री 

जो एक कदम भी बिना किसी के सहारे के न चल सके 

जो हमेशा चले पुरुषों से एक कदम पीछे 

जो समर्पित कर दे अपने जीवन का एक-एक पल 

पुरुषों के लिए 

चाहे वह पुरुष दो पल भी न निकाल सके औरत के लिए 

चाहे वह पुरुष, औरत का सम्मान भी करना न जानता हो 

पर पुरुषों को आज भी चाहिए गूंगी गुड़िया|

 

-सौम्या 

बाराबंकी, उत्तर प्रदेश 


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आइए कुछ प्रश्नों के माध्यम से कविता के निहित अर्थ को अच्छे से समझने का प्रयास करते हैं:

इस कविता  में महिलाओं के विषय में क्या विचार व्यक्त किए गए हैं?

इस कविता  में महिलाओं के बदलते सामाजिक भूमिकाओं और स्वतंत्रता की खोज पर विचार व्यक्त किए गए हैं। यह उन पुरानी परंपराओं पर सवाल उठाता है जो महिलाओं को पुरुषों पर निर्भर रहने और खुद को सीमित करने के लिए मजबूर करती हैं। कविता  में इस बात पर भी जोर दिया गया है कि समाज इस बदलाव के लिए तैयार नहीं है और अब भी कुछ लोग महिलाओं को पुरानी रूढ़ियों में देखना चाहते हैं।

इस कविता में समाज के प्रति क्या सवाल उठाया गया है?

इस कविता में समाज से यह सवाल पूछा गया है कि क्या वह महिलाओं के इस बदलाव को स्वीकार करने के लिए तैयार है। यह सवाल समाज की मानसिकता और महिलाओं के प्रति उसके दृष्टिकोण पर प्रकाश डालता है। कविता में इस बात पर जोर दिया गया है कि समाज का एक वर्ग अब भी महिलाओं को पुरानी भूमिकाओं में देखना चाहता है, जो उनके विकास और स्वतंत्रता में बाधा डालता है।

कवयित्री  महिलाओं के लिए किस प्रकार की स्वतंत्रता की वकालत करती है?

कवयित्री महिलाओं के लिए एक ऐसी स्वतंत्रता की वकालत करती  है जिसमें वे अपनी पसंद खुद कर सकें, अपने काम को चुन सकें, और एक अलग अस्तित्व ढूंढ सकें। यह स्वतंत्रता उन्हें बेबाक होकर बोलने, खेलने और उड़ने का अधिकार देती है, जिसका अर्थ है कि वे बिना किसी डर के अपनी इच्छाओं और सपनों को पूरा कर सकें।

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मानव हो, न मानविकी से दूर रहो (कविता) - लवकुश कुमार

मानव होन मानविकी से दूर रहो

पढ़ो तुम विज्ञान, लेकिन समझना समाज को भी

ताकि कर सको आविष्कार,

समाज के स्थायित्व के लिए |

है जरूरी गणित,

आदान-प्रदान और विज्ञान तथा आकाश मे यात्राओं के लिए,

लेकिन पढ़ो तुम साहित्य भी,

ताकि हर यात्रा को एक उचित उद्देश्य दे सको

मानव हो, न मानविकी से दूर रहो |

पढ़ो तुम सांख्यिकी और जुटाओ आकड़ें,

इंसान की व्यवस्थाओं और दिक्कतों को समझकर

हल करने के लिए,

लेकिन भूल न जाना साहित्य और इतिहास की ओर रुख करना

जो तुम्हें, वाकिफ कराएगी इंसान की आकांक्षाओं, व्यवहार और असली जरूरतों से

मानव हो, न मानविकी से दूर रहो|

तुम भौतिकी भी पढना, रसायन शास्त्र और जन्तु विज्ञान भी,

लेकिन साथ मे समझना कला और सुंदरता को भी,

ताकि जान सको इंसान के जीवन मे सहूलियत और सुरक्षा के साथ

सृजनात्मकता, अभिव्यक्ति, उत्साह और रचनात्मकता के महत्व को भी,

इंजीनियर बनो, डॉक्टर बनो और साथ मे बनना एक संवेदनशील इंसान भी,

ताकि अपने काम के केंद्र मे रख सको, काम से मिलने वाला आनंद,

ना कि कभी ना ख़त्म होने वाली नंबर वन बनने की भूख,

इसके लिए जरूरी है की आप उनकी भी कहानियाँ पढ़ो

जिनसे कभी मिले नहीं, जिनके बीच कभी रहे नहीं,

ताकि जान सको उनकी भी तकलीफ़ें और समझ सको

उनकी व्यवहार के पीछे की परिस्थिति, आकांक्षाओं और प्राथमिकताओं को भी,

और तब कहीं जान पाओगे कि जीवन के उद्देश्य मे केवल आराम,

मन मुताबिक इंसान और चीज़ों का पाना ही नहीं होता,

इसमे हो सकता है समाज मे असमानता को कम करना,

और लोगों को गरिमामय जीवन देकर, 

अच्छा स्वास्थ्य और आवास देकर

उनके चेहरे पर मुस्कान और जीवन मे उत्कृष्टता लाना भी |

बन जाना तुम वकील, पढ़कर कानून की किताबें,

लेकिन न भूलना इतिहास और मनोविज्ञान की आधारभूत समझ हासिल करना

ताकि समझ सको कि हम यहाँ तक कैसे पहुंचे और भावनाओं मे बहकर या दबाव और लालच मे आकर किये गए अनुचित के समर्थन,

ने हमे कहाँ लाकर खड़ा कर दिया है !

ताकि बचा सको खुद को किसी अनुचित इंसान को समर्थन देने से,

क्योंकि जिसे इंसान मज़बूरी कहता है, वह एक चुना हुआ विकल्प होता है,

जिसमे इंसान अपने क्षुद्र स्वार्थों और सुविधा के चलते समाज मे अन्याय होने के रास्ते को अनजाने में समर्थन दे देता है,

और भूल जाता है कि इस तरह यदि संघर्ष और मानवीय मूल्यों के ऊपर हर कोई सुविधा को तरजीह देने लगे तो एक दिन भारी असुविधाओं और दिक्कतें उसे भी घेर सकती हैं,

इस बात को और अच्छे से समझना है तो मानविकी से ना दूर रहो|

बन जाना तुम एक प्रशासनिक अधिकारी

पर साथ मे बनना समाज के अध्येता भी, 

हो सकता है कि तुम्हें अधिकारी बनने

मे वक़्त लग जाए, 

लेकिन एक बात तय होगी कि तुम

लोगों को उनकी परिस्थितियों के प्रकाश मे देख पाने मे सक्षम होगी

और ले पाओगी ऐसे निर्णय जो लोगों में प्रेम,

उम्मीद और विश्वास जगा सकें

ना कि नफरत और निराशा के भाव,

मानव हो, न मानविकी से दूर रहो |

बन सको तो शिक्षक बनना,

बस एक बात याद रखना

अपने विषय तक सीमित न रहना,

समझना मानविकी के विषयों को भी

माने साहित्य, इतिहास, दर्शनशास्त्र, भाषाविज्ञान, धर्म, और कला,

ताकि वक़्त जरूरत अपने विद्यार्थियों के समग्र और समावेशी विकास

और आलोचनात्मक रूप से सोचने मे योगदान दे सको,

ताकि सुनिश्चित हो सके,

समाज मे मनुष्य की सांस्कृतिक और बौद्धिक विरासत का अध्ययन

मानव हो, न मानविकी से दूर रहो|

बन जाना तुम उद्यमी और व्यापारी,

लेकिन वक़्त रखना, आध्यात्मिक अध्ययन के लिए भी,

ताकि समझ सको कि पैसे का उद्देश्य,

केवल काम और संपत्ति का विस्तार ही नहीं,

इसे अध्ययन और समसरता के प्रसार मे भी लगाया जा सकता है,

और समझ लेना इस बात को भी कि भोगने से शांति नहीं मिलती

शांति मिलती है, चाहत के मिटने से,

व्यापार करना सामान का, ना कि विश्वास, असुरक्षा और दिखावे का

मानव हो, न मानविकी से दूर रहो |

तुम जरूर समझना कि आकाश नीला क्यों होता है,

और कैसे होता है चंद्रग्रहण और सूर्यग्रहण,

लेकिन मत चूकना तुम यह समझने  से कि इंसान कैसे सोचता है,

कैसे व्यवहार करता है, और कैसे करता है अपनी अभिव्यक्ति,

क्योंकि ये जाने बिना तुम अपने विज्ञान का एक सीमित उपयोग

ही कर पाओगे, इंसान की मदद करने में

मानव हो, न मानविकी से दूर रहो |

लोगों ने अपनी जीवन को निचोड़ा है साहित्य कोश को समृद्ध करने को,

ताकि न चूकें हम विभिन्न संस्कृतियों को समझने,

आलोचनात्मक रूप से सोचने और मानवीय अनुभवों

यथा सुख-दुःख, प्रेम-घृणा की गहरी समझ विकसित करने में,

इसीलिए आओ जरा संग करो उनका भी,

जो अब नहीं हैं हमारे बीच, लेकिन उनकी लेखनी है मौजूद,

लगता है अच्छा किसी का साथ और बातें तो किताबों की खिड़की में भी झाँकों,

इसमें भी है एक साथी जिससे आप कह सकती हैं कि,

आपसे मिलकर, आपको पढ़कर अच्छा लगा,

और इस तरह तय करना एक रास्ता,

एक संवेदनशील, करुण और साहसी इंसान बनने का,

मानव हो, न मानविकी से दूर रहना |

लवकुश कुमार


कवि भौतिकी में परास्नातक हैं और उनके लेखन का उद्देश्य समाज की उन्नति और बेहतरी के लिए अपने विचार साझा करना है ताकि उत्कृष्टता, अध्ययन और विमर्श को प्रोत्साहित कर देश और समाज के उन्नयन में अपना बेहतर योगदान दिया जा सके, साथ ही वह मानते हैं कि सामाजिक विषयों पर लेखन और चिंतन शिक्षित लोगों का दायित्व है और उन्हें दृढ़ विश्वास है कि स्पष्टता ही मजबूत कदम उठाने मे मदद करती है और इस विश्वास के साथ कि अच्छा साहित्य ही युवाओं को हर तरह से मजबूत करके देश को महाशक्ति और पूर्णतया आत्मनिर्भर बनाने मे बेहतर योगदान दे पाने मे सक्षम करेगा, वह साहित्य अध्ययन को प्रोत्साहित करने को प्रयासरत हैं, 

जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना आपके जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट ।


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औरत (संवेदना को जगाती एक कविता) - पूजा कुमारी

बचपन से न जाने कैसे गुजर कर
बेटियां
औरत बन जाती हैं 
और
बना दी जाती हैं 
पहले से ज्यादा मजबूत
जिन औरतों की हथेलियों पर तैरकर
बच्चे जवान हुए
जिसने अपनी पीठ को घिसकर
उन्हे और मुलायम बनाया,
जिनकी धरती रह ही नहीं सकती कभी सहज 
जो दिन-रात
अपने बच्चों के लिये
खड़ी रही
दिहाड़ी के मजदूरों की तरह
वे आज खुद बंट रही है अपने ही घरों में
ले रही हैं मुर्दा सांसें

और
लगातार स्थानांतरित की जा रही हैं आश्रमों की ओर
यह दंश हमारे विभाजन से ज्यादा गहरा है
कोई कह दे कि
दुनियों की कोई माँए सहनशील नहीं रही
जिसने घर को जोड़ने के लिये
मशक्कत न की हो
जिसने कभी गद्दारी की हो अपने बच्चों के लिये
जो औरते ताप के दिनों में भी
अपने बच्चों को पीठ पर ढोया करती हैं
वे ही ज्यादा शिकार हुई है घरों में
औरतें औरत होती नहीं
बल्कि
सामाजिक मर्यादाओं को पालते-पालते
बना दी जाती हैं।

पूजा कुमारी
coolpooja311@gmail.com


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निरन्तरता और लक्ष्य (एक कविता) - ममता

अपनी तुम राह से भटके हुए,मंजिल भुला बैठे।

जो पाना चाहते थे तुम, खोकर सोंचते रोते।।

मुश्किलें राह में होंगी,अगर मुँह मोड़ लोगे तुम।

हँसेगे राह के पत्थर, और कायर बनोगे तुम।।

चाहे कितनी मुश्किलें हों,अपनी तुम राह मत छोड़ो।

न देखो राह के काँटे,हों चाहे आग के शोले।।

रहे बस याद यह तुमको, कोई गुमराह न कर दे।

खिले जो फूल गुलशन के,उन्हें झंखाड़ न कर दे।।

भला क्या बिन तपाये आग में,सोना निखरता है।

गुजर कर मुश्किलों से ही,कोई मंजिल पकड़ता है।।

अरे तुम हो नये राही,नजर इतिहास पर डालो।

परिश्रम में सफलता है,यही तुम तर्क अपनालो। ।

बढ़ो तुम वेग से आगे,मन में संकल्प तुम कर लो।

छोड़ दो जिन्दगी का सुख,लक्ष्य पाने का दम भर लो।।

एक कछुआ निरन्तर वेग से, निज लक्ष्य पा जाता।

मगर ठहरे हुए खरहे का,घमण्ड उसे चूर कर जाता।।

हुनर कोई अगर तुममे,जरा है कामयाबी की।

दिखा दो सुनहरी रंगत, अपने कारनामों की।।

कोशिशें लाख तुम कर लो,अपनी कमियाँ छिपाने की।

न बगुला हंस बन सकता, करे कोशिश बनाने की।।

अगर है अहमियत तुममें,खुद को बेहतर बनाने की।

करो तुम काम भी वैसा,कोशिशें आजमाने की।।

ममता

लखीमपुर खीरी उत्तर प्रदेश


ममता जी हिंदी में परास्नातक हैं और इसके साथ अपने स्नातक में इनके पास संस्कृत और दर्शनशास्त्र भी रहा है और आपने शिक्षा शास्त्र में भी स्नातक किया है, इस तरह लोगों को जीवन और स्वयं को लेकर स्पष्टता देने हेतु इनके पास प्रासंगिक सामग्री होने का बोध उनकी रचनाओं से झलकता है। 
आप एक शिक्षिका भी है बाल मन की एक बेहतर समझ भी है आप में। 
आपकी रचनाएं पाठकों में स्पष्टता, सही काम को लेकर निरंतरता का भाव जगाने में सक्षम हैं।

आपके द्वारा रचित साहित्य, पाठकों को हर संघर्ष के लिए तैयार कर उन्हें एक संवेदनशील, जागरूक और उत्कृष्ट बनाएगा, ऐसा विश्वास है।


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