Recent Articles Related To कविताएं

ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति है माँ (कविता)- सुषमा सिन्हा

माँ पर कविता (mother's day)
(अतुकांत कविता)

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हम सब हैं तुम्हारी रचना ,
तुम पर क्या रचे हम माँ!
न शब्द ,न शास्त्र, न लेखनी कोई,
जो तुम्हें परिभाषित कर सके माँ ।
ऐसी दीया जो खुद जलकर ,
हमे रौशन करती हो माँ. 
आकांक्षा आसमान से  ऊंचा,
ममता तेरी पृथ्वी से भारी है माँ. 
गर्मी में सघन साया बन जाती, 
जाड़े की नर्म धूप हो माँ.
तेरे स्नेह रसधार के आगे,
सागर भी 'कूप' दिखता है माँ .
कलेजे के टुकड़े को  अपनी मौत तक ,
कलेजे से लगाए रखती हो माँ. 
चोट हमें जब-जब लगती ,
घायल तुम होती हो माँ. 
ईश्वर प्रार्थना सुने 
न सुने ,
बिन बताए इच्छा पूरी करती हो माँ .
प्रभु क्षमा करें ना करें, तुम हर खता माफ करती हो माँ .
परमात्मा नतमस्तक तेरे आगे,
उन्हें भी तो, तुम पाली हो माँ ,
मौत के लाख बहाने होते,
जन्म के लिए सिर्फ तुम ही हो माँ.
हर मुश्किल में साथ निभाती,
निस्वार्थ प्रेम की मिसाल हो माँ .
इंसान के रूप में ही नहीं,
प्राणी मात्र के लिए देवी हो माँ. 
संसार का नजारा बहुत   प्यारा होता,
काश!' किस्मत की लेखनी' पा जाती माँ.  परमात्मा ने भी यही कहा है,
उनकी सर्वश्रेष्ठ कृति तुमही हो माँ.
बच्चों के लिए हर पल बेचैन रहती,
चैन की नींद, चिता पर सोती है माँ. 
फौजी देश पर कुर्बान होते,
प्रथम कुर्बानी देती है माँ. 
"मदर्स डे"क्या मनाना!  
हर क्षण तुम्हारे नाम है माँ. 

सुषमा सिन्हा 
वाराणसी 
मोबाईल 9369998405 

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बदलतीं स्त्रियाँ (कविता)- सौम्या

प्रस्तुत है, कवयित्री सौम्या जी की एक कविता, जो महिलाओं की बदलते हुए सामाजिक भूमिकाओं के बारे में है। यह प्रश्न उठाती  है कि क्या समाज इस बदलाव के लिए तैयार है, और यह परंपरागत मान्यताओं और पितृसत्तात्मक अपेक्षाओं पर भी सवाल उठाती है।

 

मैंने सुना है एक प्रश्न जिसमें पूछा जाता है

कि जब आज स्त्रियां बदल रही हैं, 

वो अब दूसरों से पहले स्वयं को चुन रही हैं 

वो अब रसोईघर से पहले अपने अन्य हुनर को चुन रही हैं 

अब वो खुद का अलग अस्तित्व भी ढूंढ रही हैं 

बेबाक होकर बोल रही हैं, खेल रही है, उड़ भी रही हैं 

क्या समाज इस परिवर्तन के लिए तैयार है? 

तो मुझे ऐसा लगता है, कि नहीं

समाज का एक वर्ग आज भी इस परिवर्तन को नहीं देखना चाहता 

वह चाहता है वही पुरानी रुढियों में लिपटी स्त्री 

जिसके मुंह में न जुबान हो और न दिमाग़ में अपने कोई विचार 

पिता, पति और पुत्र पर निर्भर स्त्री 

जो एक कदम भी बिना किसी के सहारे के न चल सके 

जो हमेशा चले पुरुषों से एक कदम पीछे 

जो समर्पित कर दे अपने जीवन का एक-एक पल 

पुरुषों के लिए 

चाहे वह पुरुष दो पल भी न निकाल सके औरत के लिए 

चाहे वह पुरुष, औरत का सम्मान भी करना न जानता हो 

पर पुरुषों को आज भी चाहिए गूंगी गुड़िया|

 

-सौम्या 

बाराबंकी, उत्तर प्रदेश 


सौम्या जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं |


आइए कुछ प्रश्नों के माध्यम से कविता के निहित अर्थ को अच्छे से समझने का प्रयास करते हैं:

इस कविता  में महिलाओं के विषय में क्या विचार व्यक्त किए गए हैं?

इस कविता  में महिलाओं के बदलते सामाजिक भूमिकाओं और स्वतंत्रता की खोज पर विचार व्यक्त किए गए हैं। यह उन पुरानी परंपराओं पर सवाल उठाता है जो महिलाओं को पुरुषों पर निर्भर रहने और खुद को सीमित करने के लिए मजबूर करती हैं। कविता  में इस बात पर भी जोर दिया गया है कि समाज इस बदलाव के लिए तैयार नहीं है और अब भी कुछ लोग महिलाओं को पुरानी रूढ़ियों में देखना चाहते हैं।

इस कविता में समाज के प्रति क्या सवाल उठाया गया है?

इस कविता में समाज से यह सवाल पूछा गया है कि क्या वह महिलाओं के इस बदलाव को स्वीकार करने के लिए तैयार है। यह सवाल समाज की मानसिकता और महिलाओं के प्रति उसके दृष्टिकोण पर प्रकाश डालता है। कविता में इस बात पर जोर दिया गया है कि समाज का एक वर्ग अब भी महिलाओं को पुरानी भूमिकाओं में देखना चाहता है, जो उनके विकास और स्वतंत्रता में बाधा डालता है।

कवयित्री  महिलाओं के लिए किस प्रकार की स्वतंत्रता की वकालत करती है?

कवयित्री महिलाओं के लिए एक ऐसी स्वतंत्रता की वकालत करती  है जिसमें वे अपनी पसंद खुद कर सकें, अपने काम को चुन सकें, और एक अलग अस्तित्व ढूंढ सकें। यह स्वतंत्रता उन्हें बेबाक होकर बोलने, खेलने और उड़ने का अधिकार देती है, जिसका अर्थ है कि वे बिना किसी डर के अपनी इच्छाओं और सपनों को पूरा कर सकें।

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मानव हो, न मानविकी से दूर रहो (कविता) - लवकुश कुमार

मानव होन मानविकी से दूर रहो

पढ़ो तुम विज्ञान, लेकिन समझना समाज को भी

ताकि कर सको आविष्कार,

समाज के स्थायित्व के लिए |

है जरूरी गणित,

आदान-प्रदान और विज्ञान तथा आकाश मे यात्राओं के लिए,

लेकिन पढ़ो तुम साहित्य भी,

ताकि हर यात्रा को एक उचित उद्देश्य दे सको

मानव हो, न मानविकी से दूर रहो |

पढ़ो तुम सांख्यिकी और जुटाओ आकड़ें,

इंसान की व्यवस्थाओं और दिक्कतों को समझकर

हल करने के लिए,

लेकिन भूल न जाना साहित्य और इतिहास की ओर रुख करना

जो तुम्हें, वाकिफ कराएगी इंसान की आकांक्षाओं, व्यवहार और असली जरूरतों से

मानव हो, न मानविकी से दूर रहो|

तुम भौतिकी भी पढना, रसायन शास्त्र और जन्तु विज्ञान भी,

लेकिन साथ मे समझना कला और सुंदरता को भी,

ताकि जान सको इंसान के जीवन मे सहूलियत और सुरक्षा के साथ

सृजनात्मकता, अभिव्यक्ति, उत्साह और रचनात्मकता के महत्व को भी,

इंजीनियर बनो, डॉक्टर बनो और साथ मे बनना एक संवेदनशील इंसान भी,

ताकि अपने काम के केंद्र मे रख सको, काम से मिलने वाला आनंद,

ना कि कभी ना ख़त्म होने वाली नंबर वन बनने की भूख,

इसके लिए जरूरी है की आप उनकी भी कहानियाँ पढ़ो

जिनसे कभी मिले नहीं, जिनके बीच कभी रहे नहीं,

ताकि जान सको उनकी भी तकलीफ़ें और समझ सको

उनकी व्यवहार के पीछे की परिस्थिति, आकांक्षाओं और प्राथमिकताओं को भी,

और तब कहीं जान पाओगे कि जीवन के उद्देश्य मे केवल आराम,

मन मुताबिक इंसान और चीज़ों का पाना ही नहीं होता,

इसमे हो सकता है समाज मे असमानता को कम करना,

और लोगों को गरिमामय जीवन देकर, 

अच्छा स्वास्थ्य और आवास देकर

उनके चेहरे पर मुस्कान और जीवन मे उत्कृष्टता लाना भी |

बन जाना तुम वकील, पढ़कर कानून की किताबें,

लेकिन न भूलना इतिहास और मनोविज्ञान की आधारभूत समझ हासिल करना

ताकि समझ सको कि हम यहाँ तक कैसे पहुंचे और भावनाओं मे बहकर या दबाव और लालच मे आकर किये गए अनुचित के समर्थन,

ने हमे कहाँ लाकर खड़ा कर दिया है !

ताकि बचा सको खुद को किसी अनुचित इंसान को समर्थन देने से,

क्योंकि जिसे इंसान मज़बूरी कहता है, वह एक चुना हुआ विकल्प होता है,

जिसमे इंसान अपने क्षुद्र स्वार्थों और सुविधा के चलते समाज मे अन्याय होने के रास्ते को अनजाने में समर्थन दे देता है,

और भूल जाता है कि इस तरह यदि संघर्ष और मानवीय मूल्यों के ऊपर हर कोई सुविधा को तरजीह देने लगे तो एक दिन भारी असुविधाओं और दिक्कतें उसे भी घेर सकती हैं,

इस बात को और अच्छे से समझना है तो मानविकी से ना दूर रहो|

बन जाना तुम एक प्रशासनिक अधिकारी

पर साथ मे बनना समाज के अध्येता भी, 

हो सकता है कि तुम्हें अधिकारी बनने

मे वक़्त लग जाए, 

लेकिन एक बात तय होगी कि तुम

लोगों को उनकी परिस्थितियों के प्रकाश मे देख पाने मे सक्षम होगी

और ले पाओगी ऐसे निर्णय जो लोगों में प्रेम,

उम्मीद और विश्वास जगा सकें

ना कि नफरत और निराशा के भाव,

मानव हो, न मानविकी से दूर रहो |

बन सको तो शिक्षक बनना,

बस एक बात याद रखना

अपने विषय तक सीमित न रहना,

समझना मानविकी के विषयों को भी

माने साहित्य, इतिहास, दर्शनशास्त्र, भाषाविज्ञान, धर्म, और कला,

ताकि वक़्त जरूरत अपने विद्यार्थियों के समग्र और समावेशी विकास

और आलोचनात्मक रूप से सोचने मे योगदान दे सको,

ताकि सुनिश्चित हो सके,

समाज मे मनुष्य की सांस्कृतिक और बौद्धिक विरासत का अध्ययन

मानव हो, न मानविकी से दूर रहो|

बन जाना तुम उद्यमी और व्यापारी,

लेकिन वक़्त रखना, आध्यात्मिक अध्ययन के लिए भी,

ताकि समझ सको कि पैसे का उद्देश्य,

केवल काम और संपत्ति का विस्तार ही नहीं,

इसे अध्ययन और समसरता के प्रसार मे भी लगाया जा सकता है,

और समझ लेना इस बात को भी कि भोगने से शांति नहीं मिलती

शांति मिलती है, चाहत के मिटने से,

व्यापार करना सामान का, ना कि विश्वास, असुरक्षा और दिखावे का

मानव हो, न मानविकी से दूर रहो |

तुम जरूर समझना कि आकाश नीला क्यों होता है,

और कैसे होता है चंद्रग्रहण और सूर्यग्रहण,

लेकिन मत चूकना तुम यह समझने  से कि इंसान कैसे सोचता है,

कैसे व्यवहार करता है, और कैसे करता है अपनी अभिव्यक्ति,

क्योंकि ये जाने बिना तुम अपने विज्ञान का एक सीमित उपयोग

ही कर पाओगे, इंसान की मदद करने में

मानव हो, न मानविकी से दूर रहो |

लोगों ने अपनी जीवन को निचोड़ा है साहित्य कोश को समृद्ध करने को,

ताकि न चूकें हम विभिन्न संस्कृतियों को समझने,

आलोचनात्मक रूप से सोचने और मानवीय अनुभवों

यथा सुख-दुःख, प्रेम-घृणा की गहरी समझ विकसित करने में,

इसीलिए आओ जरा संग करो उनका भी,

जो अब नहीं हैं हमारे बीच, लेकिन उनकी लेखनी है मौजूद,

लगता है अच्छा किसी का साथ और बातें तो किताबों की खिड़की में भी झाँकों,

इसमें भी है एक साथी जिससे आप कह सकती हैं कि,

आपसे मिलकर, आपको पढ़कर अच्छा लगा,

और इस तरह तय करना एक रास्ता,

एक संवेदनशील, करुण और साहसी इंसान बनने का,

मानव हो, न मानविकी से दूर रहना |

लवकुश कुमार


कवि भौतिकी में परास्नातक हैं और उनके लेखन का उद्देश्य समाज की उन्नति और बेहतरी के लिए अपने विचार साझा करना है ताकि उत्कृष्टता, अध्ययन और विमर्श को प्रोत्साहित कर देश और समाज के उन्नयन में अपना बेहतर योगदान दिया जा सके, साथ ही वह मानते हैं कि सामाजिक विषयों पर लेखन और चिंतन शिक्षित लोगों का दायित्व है और उन्हें दृढ़ विश्वास है कि स्पष्टता ही मजबूत कदम उठाने मे मदद करती है और इस विश्वास के साथ कि अच्छा साहित्य ही युवाओं को हर तरह से मजबूत करके देश को महाशक्ति और पूर्णतया आत्मनिर्भर बनाने मे बेहतर योगदान दे पाने मे सक्षम करेगा, वह साहित्य अध्ययन को प्रोत्साहित करने को प्रयासरत हैं, 

जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना आपके जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट ।


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औरत (संवेदना को जगाती एक कविता) - पूजा कुमारी

बचपन से न जाने कैसे गुजर कर
बेटियां
औरत बन जाती हैं 
और
बना दी जाती हैं 
पहले से ज्यादा मजबूत
जिन औरतों की हथेलियों पर तैरकर
बच्चे जवान हुए
जिसने अपनी पीठ को घिसकर
उन्हे और मुलायम बनाया,
जिनकी धरती रह ही नहीं सकती कभी सहज 
जो दिन-रात
अपने बच्चों के लिये
खड़ी रही
दिहाड़ी के मजदूरों की तरह
वे आज खुद बंट रही है अपने ही घरों में
ले रही हैं मुर्दा सांसें

और
लगातार स्थानांतरित की जा रही हैं आश्रमों की ओर
यह दंश हमारे विभाजन से ज्यादा गहरा है
कोई कह दे कि
दुनियों की कोई माँए सहनशील नहीं रही
जिसने घर को जोड़ने के लिये
मशक्कत न की हो
जिसने कभी गद्दारी की हो अपने बच्चों के लिये
जो औरते ताप के दिनों में भी
अपने बच्चों को पीठ पर ढोया करती हैं
वे ही ज्यादा शिकार हुई है घरों में
औरतें औरत होती नहीं
बल्कि
सामाजिक मर्यादाओं को पालते-पालते
बना दी जाती हैं।

पूजा कुमारी
coolpooja311@gmail.com


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निरन्तरता और लक्ष्य (एक कविता) - ममता

अपनी तुम राह से भटके हुए,मंजिल भुला बैठे।

जो पाना चाहते थे तुम, खोकर सोंचते रोते।।

मुश्किलें राह में होंगी,अगर मुँह मोड़ लोगे तुम।

हँसेगे राह के पत्थर, और कायर बनोगे तुम।।

चाहे कितनी मुश्किलें हों,अपनी तुम राह मत छोड़ो।

न देखो राह के काँटे,हों चाहे आग के शोले।।

रहे बस याद यह तुमको, कोई गुमराह न कर दे।

खिले जो फूल गुलशन के,उन्हें झंखाड़ न कर दे।।

भला क्या बिन तपाये आग में,सोना निखरता है।

गुजर कर मुश्किलों से ही,कोई मंजिल पकड़ता है।।

अरे तुम हो नये राही,नजर इतिहास पर डालो।

परिश्रम में सफलता है,यही तुम तर्क अपनालो। ।

बढ़ो तुम वेग से आगे,मन में संकल्प तुम कर लो।

छोड़ दो जिन्दगी का सुख,लक्ष्य पाने का दम भर लो।।

एक कछुआ निरन्तर वेग से, निज लक्ष्य पा जाता।

मगर ठहरे हुए खरहे का,घमण्ड उसे चूर कर जाता।।

हुनर कोई अगर तुममे,जरा है कामयाबी की।

दिखा दो सुनहरी रंगत, अपने कारनामों की।।

कोशिशें लाख तुम कर लो,अपनी कमियाँ छिपाने की।

न बगुला हंस बन सकता, करे कोशिश बनाने की।।

अगर है अहमियत तुममें,खुद को बेहतर बनाने की।

करो तुम काम भी वैसा,कोशिशें आजमाने की।।

ममता

लखीमपुर खीरी उत्तर प्रदेश


ममता जी हिंदी में परास्नातक हैं और इसके साथ अपने स्नातक में इनके पास संस्कृत और दर्शनशास्त्र भी रहा है और आपने शिक्षा शास्त्र में भी स्नातक किया है, इस तरह लोगों को जीवन और स्वयं को लेकर स्पष्टता देने हेतु इनके पास प्रासंगिक सामग्री होने का बोध उनकी रचनाओं से झलकता है। 
आप एक शिक्षिका भी है बाल मन की एक बेहतर समझ भी है आप में। 
आपकी रचनाएं पाठकों में स्पष्टता, सही काम को लेकर निरंतरता का भाव जगाने में सक्षम हैं।

आपके द्वारा रचित साहित्य, पाठकों को हर संघर्ष के लिए तैयार कर उन्हें एक संवेदनशील, जागरूक और उत्कृष्ट बनाएगा, ऐसा विश्वास है।


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बीत गया समय (एक कविता) - ममता

बीती निशा की वेला

तम का कहर यूँ छूटा

आयी सुबह सुहानी

रक्तिम भानु लुढ़का

नभ की विरल दिशा में

दिनकर प्रभा यूँ फूटी

बीत गया समय 

तरुओं की डालियों में

विहगों का मधुर कलरव

दुर्वा की तीक्ष्ण नोकों पे

चमकती तुषार बूँदे 

दिनकर की तीव्र किरणें

तुषार बिन्दु पीती

बीत गया समय 

निर्झर की मन्द झर-झर 

सरिता प्रवाह कल-कल

दिवा पहर यूँ ढलता

ऊषा यूँ गुनगुनाती

गुंठन ये अपना खोले

बीत गया समय 

छायी निशा घटायें

अम्बर के पट के भीतर

मुक्ता का तेज चमके

मणिमय कन्दुक लुढ़के

शिशुओं के चक्षुओं को

निद्रा का देते दामन

बीत गया समय ।

ममता

लखीमपुर खीरी उत्तर प्रदेश


ममता जी हिंदी में परास्नातक हैं और इसके साथ अपने स्नातक में इनके पास संस्कृत और दर्शनशास्त्र भी रहा है और आपने शिक्षा शास्त्र में भी स्नातक किया है, इस तरह लोगों को जीवन और स्वयं को लेकर स्पष्टता देने हेतु इनके पास प्रासंगिक सामग्री होने का बोध उनकी रचनाओं से झलकता है। 
आप एक शिक्षिका भी है बाल मन की एक बेहतर समझ भी है आप में। 
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आपके द्वारा रचित साहित्य, पाठकों को हर संघर्ष के लिए तैयार कर उन्हें एक संवेदनशील, जागरूक और उत्कृष्ट बनाएगा, ऐसा विश्वास है।


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परिवर्तन - संजय सिंह 'अवध' 

परिवर्तन की ओट लिए जब,
कदम समय के चल जाते हैं,
तब नियति का घूँघट ओढ़े,
शिथिल प्रयास भी छल जाते हैं।

परिवर्तन में जो छँट जाते हैं,
नतमस्तक हो झुक जाते हैं,
ऐसे शीश धार से कट कर,
कभी नहीं फिर उठ पाते हैं।

परिवर्तन की राह पकड़ जो,
समय के रंग में ढल जाते हैं,
ऐसे शीश शैल से उठकर,
नभ में सूर्य से बन जाते हैं ।

जब इंकलाब के नारों से
बाधित ये अंतर्मन होता है,
तब ही परिवर्तन पाने को,
चिंगारी से आचमन होता है।

हवन कोई कितने भी कर ले,
जतन सहस्रों कर ले कोई,
परिवर्तन के अटल सत्य से,
चक्र काल का, बच नहीं पाता।

परिवर्तन हो पार्थ के मन में,
परिवर्तित हो शीश कुरु का,
विगत समय की चाल रोक कर,
परिवर्तन, कृष्ण जो कर जाते हैं,
मन में रण हो, या रण में मन,
परिवर्तन की ढाल लिए,
अर्जुन परिवर्तन कर जाते हैं।

परिवर्तन ऋतुओं का होकर,
जीवन में परिवर्तन करता,
जब परिवर्तन ग्रहों का होता,
राम भी उसको रोक ना पाते।
परिवर्तित यदि मृग ना होता,
तुलसी क़लम सींच ना पाते,
ना जाते लंका को रघुवर,
रावण घर घर सेंध लगाते।

परिवर्तन का कठिन दीर्घ पर,
सार बहुत ही कम होता है,
समय की सुइयाँ छिल ना जाएँ,
समय-समय से रंग ना जाये,
इस उद्देश्य जनित ज्वाला से ही,
ये जग परिवर्तन होता है।

- संजय सिंह 'अवध' 

ईमेल- green2main@yahoo.co.in

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उक्त मन को छूने वाली कविता के रचयिता भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण में ATC अधिकारी हैं और अपने कालेज के दिनों से ही, जैसा कि इनकी रचनाओं से घोतक है, जन जन में संवेदना, करूणा और साहस भरने के साथ अंतर्विषयक समझ द्वारा उत्कृष्टता के पथ पर युवाओं को अग्रसर करने को प्रयासरत हैं।

कवि के बारे में विस्तार से जानने के लिए यहां क्लिक करें।


यह कविता परिवर्तन के महत्व पर प्रकाश डालती है, जो मन, समय और जीवन के विभिन्न पहलुओं में होता है। यह परिवर्तन के विभिन्न रूपों और उनसे जुड़े परिणामों को उजागर करता है।

यह कविता परिवर्तन के महत्व को दर्शाती है और बताती है कि परिवर्तन हर जगह मौजूद है।

इस कविता में परिवर्तन की क्या भूमिका है?

इस कविता में, परिवर्तन जीवन का एक सार्वभौमिक पहलू है, जो मन, समय, ऋतुओं और यहां तक कि ग्रहों को भी प्रभावित करता है। परिवर्तन एक ऐसी शक्ति है जो न केवल व्यक्तिगत विचारों और भावनाओं को बदलती है, बल्कि पूरी दुनिया को भी प्रभावित करती है। यह निरंतरता, विनाश और सृजन की प्रक्रिया को दर्शाता है, जो जीवन के चक्र को आकार देता है।

कविता में 'यह जग परिवर्तन होता है' वाक्यांश का क्या अर्थ है?

यह वाक्यांश कविता के मुख्य विषय को सारांशित करता है: दुनिया में परिवर्तन हर जगह होता है। यह परिवर्तन की सार्वभौमिकता और सभी चीजों पर इसके प्रभाव को इंगित करता है। यह एक शक्तिशाली कथन है जो परिवर्तन की निरंतरता और महत्व पर जोर देता है।


इस कविता पर अपनी राय या प्रतिक्रिया आप संपर्क फॉर्म से भेज सकते हैं या lovekushchetna@gmail.com पर ईमेल कर सकते हैं।

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लेह और मौसमवीर - मनीष कुमार गुप्ता

पल भर में है धूप खिली, अगले पल छाया अंधकार।
कुछ पल में ही तेज हवा, लगता है जैसे चमत्कार।।
गर्मी में यहाँ फूल खिलें, स्वर्ग सा मौसम बन जाता है।
देश विदेश के सैलानियों को ये लद्दाख बहुत भाता है।।

सर्दी में तापमापी का पारा, ऋणात्मक बीस भी जाता है।
ऊपर से तेज हवा का झोंका, कभी कभी सताता है।।
पश्चिमी विक्षोभों से अधिकतर, वर्षा और बर्फबारी है।
समुद्रतल से 3500 मीटर ऊपर कर्मभूमि हमारी है ।।

सर्दी में जम जाता आर्द्र बल्ब, गर्म पानी से उसे उठाना है।
गर्म कपड़ों में सीलबंद होकर, वेधशाला में जाना है।।
समुद्र तल से ऊँचाई पर, ताप और दाब घट जाता है।
कम ऑक्सीजन के चलते यहाँ रक्त दाब बढ़ जाता है।।

अधिक ठंड और कम आर्द्रता के संयोग का विज्ञान।
ट्रॉस हिमालय की गोद में बसा लेह लद्दाख महान।।
पर्यावरण और प्रकृति का यहाँ संगम होता निराला है।
पहाड़ों की बर्फ के परावर्तन से, होता तेज उजाला है।।

जब सूरज तेजी से चमके, ठंड का नहीं होता अहसास।
बार बार ही गला सूखता, बुझती नहीं है प्यास ।।
कम आर्द्रता के कारण, स्थिर आवेश प्रभाव दिखाता है।
किसी चीज को छूने से, यदाकदा झटका लग जाता है।।

बढ़ने लगती आर बी सी और घटने लग जाती है भूख।
कितना भी करो आप जतन, त्वचा जाती है बिल्कुल सूख ।।
जब जब सर्दी में तापमान, माइनस में चला जाता है।
बंद होता नलकूप और सीवरेज, पानी भी जम जाता है।।

बर्फ तोड़कर, आग सेक कर फिर पानी मिल पाता है।
मुश्किल है यहाँ सर्दी का जीवन, कैसे कोई सह पाता है।।
बड़े दयालु 'सोनम' सर जी, यहाँ कहलाते "मौसमपीर"।
इन्हीं के मार्गदर्शन में, रहते हैं हम सब मौसमवीर।।

​​​मनीष कुमार गुप्ता जयपुर, राजस्थान 


मनीष जी भारत सरकार के भारत मौसम विज्ञान विभाग में सेवारत हैं और लेह में अपनी सेवाएं दे चुके हैं वह अपनी कई कविताओं से मौसम विज्ञान विभाग के सफर, उसके योगदान और महत्व पर प्रकाश डाल चुके हैं।


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मौसम विज्ञान विभाग ( चुनौतियां, प्रयास और महत्ता ) - संजय सिंह 'अवध'

मौसम विज्ञान विभाग 

वसुधा अपना विस्तार लिए, सारे मौसम श्रृंगार किए,
कुछ गूढ़ रहस्यों से गुज़री।
कभी नभ में दिखती काली घटा, नीले सागर की नभ में छटा, गर्जन करती सहसा बिजली नभ से क्यों धरती पर उतरी?

क्यों प्यास भी प्यास से तड़पी है? उच्छवास वहां क्यों मरती है ?
क्यों दूजी और हवा शीतल? खुशियां भी हिलोरे हैं भरती |
क्यों सूर्य प्रखर और तीक्ष्ण यहां ? क्यों चंदा सा शीतल है वहां?
यहां बादल खेल रहे होली, क्यों ढूंढ रहे हैं वहां चोली? 
क्या गोल धरा है इसीलिए, या मायाजाल कोई रचती ?

हाय! विपदा है कैसी अब आई? कुछ तो ये चेताती हरजाई| जिनको था भान वो बच भी गए, बिन ज्ञान के जान कहां आई?
कहीं उठती खुशियों की तफ़री, कहीं विपदा से उठती अर्थी |

पर जीवन सारे मोल समान, 
चलते पटरी , उड़े आसमान,
चेतन के ऐसे भाव लिए,
नवयुग का मन उद्धार लिए, 
खुलते रहस्य की धार लिए, 
मानवता के प्रति बस प्यार लिए, 
विज्ञान की गंगा भगीरथ संग,
आकाश से पृथ्वी पर उतरी|

इस ज्ञान की गंगा साथ लिए ,
सारे रहस्य को साथ लिए,
तारण करने मानवता का,
बस ज्ञान की बरछी हाथ लिए,
हर खतरे का आभास लिए,
इक सेना कुरुक्षेत्र उतरी|

कुछ घाव मिले थे अभावों में,
रहते थे पांव भी छालों में 
हर मौसम का मौसम समझें,
जिज्ञासा थी मतवालों में,
"आदित्यात् जायते वृष्टिः" के कौर लिए वो थालों में,
चलते रातों में उजालों में।

अठरह सौ पचहत्र कलकत्ता,शिमला फिर पुणे से आगे
"अन्वेषण" के संस्कार लिए, वो सेना दिल्ली में ठहरी|

आकाश से धरती के मौसम, 
हर राज्य बराबर संप्रेषण, विपदा का पूर्व ही अनुमान, 
यदि नहीं तो रक्षित हो जीवन,
बस ऐसा सेवा भाव लिए,
मौसम विभाग ने भारत में कर लिया जनम |

मां जैसी सबकी बलाएं लिए, 
और बहन सा राखी कवच लिए,
हर विपदा से रक्षा करने,
मौसम विभाग ने शपथ धरी ।

- संजय सिंह 'अवध' 

ईमेल- green2main@yahoo.co.in

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उक्त मन को छूने वाली कविता के रचयिता भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण में ATC अधिकारी हैं और अपने कालेज के दिनों से ही, जैसा कि इनकी रचनाओं से घोतक है, जन जन में संवेदना, करूणा और साहस भरने के साथ अंतर्विषयक समझ द्वारा उत्कृष्टता के पथ पर युवाओं को अग्रसर करने को प्रयासरत हैं।

कवि के बारे में विस्तार से जानने के लिए यहां क्लिक करें।


कविता में 'ज़ुबान खोजने' का क्या अर्थ है?

'ज़ुबान खोजने' का अर्थ है, बचपन की भोली-भाली बातों और मासूमियत को वापस पाना। यह उन शब्दों और भावनाओं को खोजने की बात करता है जो हम बड़े होते हुए खो देते हैं।

इस कविता का केंद्रीय विचार क्या है?

इस कविता का केंद्रीय विचार जीवन के सफर में बचपन की यादों को संजोना, सपनों को पुनर्जीवित करना और फिर से उड़ान भरने की प्रेरणा लेना है।


इस कविता पर अपनी राय या प्रतिक्रिया आप संपर्क फॉर्म से भेज सकते हैं या lovekushchetna@gmail.com पर ईमेल कर सकते हैं।

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बचपन की मुस्कान - संजय सिंह 'अवध' ( बाल दिवस विशेष )

चलो जवानी की गलियों में,
बचपन की मुस्कानखोजने,
चालाकी से भरे स्वरों में,
वो मासूम ज़ुबान खोजने,

"आँखों में" खिलते सपनों से,
नींदें जो भी टूट गई थी,
चलो आज फिर उन
"नींदों में" फिर से 
वही उड़ान खोजने।

 संजय सिंह 'अवध'


ईमेल- green2main@yahoo.co.in

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उक्त मन को छूने वाली कविता के रचयिता भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण में ATC अधिकारी हैं और अपने कालेज के दिनों से ही, जैसा कि इनकी रचनाओं से घोतक है, जन जन में संवेदना, करूणा और साहस भरने के साथ अंतर्विषयक समझ द्वारा उत्कृष्टता के पथ पर युवाओं को अग्रसर करने को प्रयासरत हैं।

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कविता में 'ज़ुबान खोजने' का क्या अर्थ है?

'ज़ुबान खोजने' का अर्थ है, बचपन की भोली-भाली बातों और मासूमियत को वापस पाना। यह उन शब्दों और भावनाओं को खोजने की बात करता है जो हम बड़े होते हुए खो देते हैं।

इस कविता का केंद्रीय विचार क्या है?

इस कविता का केंद्रीय विचार जीवन के सफर में बचपन की यादों को संजोना, सपनों को पुनर्जीवित करना और फिर से उड़ान भरने की प्रेरणा लेना है।


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