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खुद से जंग (कविता) - सौम्या गुप्ता

खुद से खुद की जंग है,

कई बार मैं हार जाती हूँ,

कई बार मन हार जाता है।

 

पर कोशिश है मन को

ज़्यादा हराने की,

 

हर बार एक कदम

मन से जीत जाने को,

 

जानती हूँ मन मेरा हर बार

प्रतिस्पर्धी नहीं होगा,

 

कई बार बनेगा यह मेरा मित्र,

कई बार खुद ही आदत हो जाएगी

इसे मुझसे हार जाने की।

 

-सौम्या गुप्ता 

बाराबंकी, उत्तर प्रदेश 

 

संपादकीय टिप्पणी:

 

इस कविता का मूल विषय क्या है?

इस कविता का मूल विषय आंतरिक संघर्ष है, जो व्यक्ति के मन के साथ होने वाली लड़ाई को दर्शाता है, जब मन हमें हमारी वृत्ति की और खींचता है और हम अपने शरीर से वह काम लेना चाहते हैं जो हमें उत्थान, आत्मनिर्भरता और मुक्ति की और ले जाएँ। यह हार और जीत के चक्र, और खुद को बेहतर बनाने की निरंतर कोशिश के बारे में है।


सौम्या जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं |


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