
क्या आप चाहते/चाहती हैं
ऐसा समाज जिसमे
लोग अपना काम बहुत अच्छे से कर रहे हों
लोग अपने काम से काम रखते हों और एक दूसरे को
परेशान न करते हों
सड़कों पर लोग नियम से चल रहे हों, दुर्घटनाएँ कम से
कम हों
सभी अपना काम ईमानदारी से कर रहे हों
लोग अपने वादों पर खरे उतरते हों
लोग किसी को उसकी जाति, समुदाय, वंश, शारीरिक
सुंदरता से न पहचान उसे उसके काम से पहचानते हों
अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करने का अवसर सबको मिलता
हो
लोग नयी जगह भी सुरक्षित महसूस करते हों
लोग एक दूसरे से सलीके से और प्रेम के साथ पेश आयें
लोग अपने अधिकार के साथ अपने कर्तव्यों को भी समझें
लोग अपनी स्वतन्त्रता का दुरुपयोग न करें
लोग कमजोर पर हसने के बजाय उनके साथ करुणा का
बर्ताव करें
तकलीफ मे फंसे इंसान को यथासंभव मदद मिले नाकि
लोग खड़े होकर बस वीडियो बनाएँ
काम करने वाले को काम का श्रेय दें नकि चापलूसी करने
वाले और बातें बनाने वालों को
सबको उनके हिस्से का श्रेय और प्रतिष्ठा मिले
हिंसा का स्थान न हो, लोगों को आजादी हो "न" कहने की
स्वतन्त्रता हो जबरदस्ती नहीं, सबसे उनका पक्ष या
अनुभव सुना जाए
साझा हितों के कार्यक्रमों मे सभी साझेदारों से उनकी राय
जानी जाये और उसे उचित स्थान भी दिया जाए
शिक्षकों का उचित सम्मान हो
लोग एक दूसरे का आंकलन सतही बातों पर न करें
अपराध कम से कम हों
मजबूत द्वारा कमजोर का शोषण न हो
भेदभाव न हो, परिवारवाद न हो
ज्यादा से ज्यादा लोगों में अपनी गलती स्वीकार करने का
और ज़िम्मेदारी लेने का साहस हो
वगैरह वगैरह......

बहुत तकलीफ होती है ये देखकर जब प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले अभ्यर्थियों को सुनता हूँ, ये कहते हुए कि अभी तो नौकरी की तैयारी कर रहे, अभी तो बिज़नेस को खड़ा करना है, साहित्य कहाँ!
कुछ तो इस अति प्रतियोगी समय की बात है और कुछ तो ओढ़ी हुयी बेचारगी, बेचारगी इसलिए कहना चाहता हूँ कि खुद को जानना और खुद की असली जरूरतों को समझना, हमारे जीवन का उद्देश्य होना चाहिए और साहित्य इसमें मदद करता है इसीलिए साहित्य तो जीवन का अभिन्न अंग होना चाहिए, उसके लिए नौकरी पाने या बहुत ज्यादा पैसा इकठ्ठा कर लेने का इंतज़ार क्यों!
हम अक्सर लोगों को कहते हुये सुनते हैं कि अमुक इंसान बहुत ही छोटी या संकीर्ण सोच का इंसान है, लेकिन क्या हमने कभी सोचा है कि और लोग भी हमारे बारे में ऐसी ही बाते हैं करते होंगे, कारण? एक दूसरे को न समझ पाना, कितना अच्छा हो कि हमारे आस पास देश दुनिया से, चहुं ओर का साहित्य मौजूद हो फिर जरूरत कम हो जाएगी किसी को संकीर्ण सोच वाला इंसान कहने की|

जब मायूसी में खुद को मोटीवेट करने के अन्य सतही उपायों में, अन्दर की तकलीफ ढकने के लिए मनोरंजन में समय लगाया जा सकता है तो फिर बेहतरीन साहित्य के अध्ययन में क्यों नहीं, जिससे एक दिशा और क्लैरिटी मिलेगी जो बार-बार मोटिवेशन की जरूरत को भी खत्म कर देगी|
ये साहित्य भी आपके लिए ही है, आपकी जरूरतों और दुविधाओं को ध्यान में रखकर, आपके आवेगों और भावनाओं को संबोधित करते हुये लिखा गया साहित्य|
किसी ने यदि अपना समय और जीवन देकर लिखा हो तो क्या आप इसे कोई व्यापार समझते हैं, क्योंकि कुछ लोगों का पूर्वाग्रह रहता है कि पुस्तकें भी एक वाणिज्य का हिस्सा हैं, इस पर मै एक ही बात कहना चाहता हूँ कि पुस्तकें यदि आपकी दुविधा को कम कर सकें, आपके जीवन को सार्थक दिशा दे सकें या फिर लेखकों के अनुभव और अभिव्यक्ति आपको सुकून दे सकें या मन को शांति दे सकें, समाज में सौहार्द बढ़े और लोगों मे संवेदनशीलता (ताकि वह एक दूसरे की तकलीफ समझ उनके साथ खड़े हो पाएँ) और करुणा बढ़े तो हमे ऐसी किताबों को खुद भी पढ़नी चाहिए और अन्य लोगों को भी पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए|
हर तरफ हर जगह बेशुमार आदमी, फिर भी तन्हाइयों का शिकार आदमी- निदा फ़ाजली आखिर ऐसा क्यों? जवाब साहित्य मे मिलेगा कि हम क्यों नहीं सहज हो पाते लोगों से जुडने में!

पुस्तकें निचोड़ होती हैं जीवन के अनुभवों का और प्रेम का प्रतीक होती हैं, उनके प्रेम का प्रतीक जिन्होने अपने जीवन के अहम पल में आपके लिए लेखन किया और फिर हमें उपलब्ध कराया|
बेचारगी वाली बात पर वापस आते हैं - ऐसी ही बेचारगी कुछ ऐसे लोगों ने भी ओढ़ रखी है जो एक नौकरी में पहले से हैं और दूसरी की तैयारी कर रहें, उनसे भी यही कहना है कि जिस तरह हम तैयारी के साथ सोना और आराम नहीं छोड़ देते और न ही छोड़ पाते हैं सोशल मीडिया और दोस्तों के साथ गपशप या मन बहलाने के अन्य शौक तो फिर क्यों हम दिन का आधा या एक घंटा साहित्य को नहीं दे सकते!, क्या केवल हर वक़्त प्रतियोगी परीक्षा के लिए पढ़ते रहने से हमारे सफल होने की संभावना 100% हो जाएगी, नहीं, फिर क्यों जीवन और दिनचर्या के संतुलन को बिगाड़ना? क्या ऐसा करना समझदारी है!
मैंने ऐसे काफी लोगों को देखा है जो सब कुछ छोड़कर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं और फिर चयन न होने पर जीवन से हताश हो जाते हैं उसका कारण साफ है क्योंकि उन्होने जीवन के केंद्र में ही उस परीक्षा को ही रख लिया, जबकि करने के लिए और भी बहुत कुछ है जीवन में, साहित्य अध्ययन से स्वयं की समझ को विस्तार देना भी उनमे से एक काम है, जो न केवल आपको समझ देता है बल्कि निर्णय लेने और विकट परिस्थितियों का सामना करने के लिए मानसिक रूप से तैयार करता है| और साथ ही मदद करते हैं लोगों के साथ तालमेल बैठाकर चलने में क्योंकि जीवन मे यह भी तो सीखना ही है तो इसे भी उचित महत्व दें, जब जीवन में और भी प्राथमिकताएँ होगी तो परीक्षा मे असफलता आपको तोड़ेगी नहीं, जीवन से निराश नहीं करेगी|

एक सवाल अक्सर आता है मन में कि बड़े-बड़े पढ़े-लिखे लोग भी क्यों भ्रष्टाचार मे संलिप्त पाये जाते हैं, क्यों उनमे भी साहस की कमी मिलती है अन्याय के खिलाफ लड़ने को? उसका जवाब यही है कि वो उत्कृष्ट साहित्य से दूर रहे और कभी जान ही न पाये स्वयं को! वो बस अपने आपको एक शरीर मानकर रह गए, काश! उन्होने महान लोगों को पढ़ा होता है और जान पाते कि कैसे महान आत्माओं ने सत्य और न्याय को व्यक्तिगत हित-अहित और मोह से ऊपर रखकर जीवन मे डटकर संघर्ष किया और केवल अपने परिवार तक सीमित न रहकर, जन सामान्य को भी अपना अंश मानकर कभी अन्याय और भेदभाव के रास्ते नहीं चले|

बहुत बार नासमझी में हम ऐसी प्राथमिकताएँ निर्धारित कर लेते हैं खुद के लिए (अमूमन समाज की देखा देखी में) कि हमेशा दबाव में रहते हैं और लोगों से प्रेमवत पेश नहीं आ पाते, साहित्य ऐसी अवस्था में आपको वह दृष्टि दे सकता है, जिससे आप समझ सको कि क्या है जो आपके जीवन मे वाकई जरूरी है और क्या है जो बिलकुल गैर जरूरी है और इस तरह आप समाज के दबाव मे आकर "सामाजिक गुलामी" करने से बच जाते हो|
कभी कभी हम दूसरों को समझ नहीं पाते और दूसरे हमे नहीं समझ पाते, कभी कभी ऐसा भी होता है कि हम देखते हैं कि कोई एक फर्जी इंसान पर भरोसा कर लेता है बल्कि एक सच्चे इंसान से दूर भागता है| क्या है ये सब ?- ये है समझ का अभाव और है दूसरों को समझ पाने या खुद को अभिव्यक्त कर पाने की कुशलता न हो होना|

साहित्य अध्ययन इसमे भी आपकी मदद कर सकता है क्योंकि कभी-कभी खुद को अभिव्यक्त करने का पूरा समय नहीं मिल पाता हमें, उस स्थिति में यदि सामने वाला साहित्य अध्ययन करने वाला इंसान हुआ तो संभावना है कि उसकी समझ इतनी विस्तृत होगी कि इशारे में ही आपकी बात समझ जाए, जैसे एक डॉक्टर अमूमन लक्षणों से हमारी दिक्कत समझ जाता है|




हर गाँव या मोहल्ले में एक सामुदायिक पुस्तकालय हो।
उपहार के रूप में लोग पुस्तकें भेंट करें।
शैक्षणिक संस्थाओं में पुरस्कार के रूप में अनिवार्य रूप से पुस्तकें दी जाय।


साहित्य हमे एक दूसरे को समझने में मदद करता है, और इस तरह से एक दूसरे से जुड़ने में भी और जब हम खुद को समाज से जुड़ा हुआ पाते हैं, तो हमारे अंदर प्रेम का भाव आता है जो हमसे एक से एक बेहतर काम करवा लेता है और हमारे लिए आनंद की अवस्था में रहना आसान होता है, इसीलिए साहित्य अध्ययन हमारी समझ को बेहतर करके हमारे मन को भी बेहतर कर सकता है|

बताये देता हूँ :-


इसीलिए अंत में इस बात पर अपनी बात खत्म करता हूँ कि यदि सामाज की बेहतरी के लिए कुछ बदलाव करने की चाहत है आपमें, तो बिना किस बड़े पद या खूब पैसे कमाकर लोगों का भला सोंचने से पहले अभी से अपनी दैनिक दिनचर्या में साहित्य अध्ययन को स्थान दें और अन्य लोगों को भी अपने कर्मों द्वारा प्रेरित करें|
याद रखिए, किसी पीड़ित की मदद से बड़ा और जरूरी काम है, उस इंसान का हृदय परिवर्तन जो लोगों को पीड़ा देने मे खुशी पाता है|
उससे भी पहले उस मानसिकता पर वार जो इंसान को उत्पीड़क और क्रूर बनाती है|

किसी गरीब की मदद से भी महत्वपूर्ण काम ये है कि उसे अपनी गरीबी मिटाने के अवसर मिलें, उसे उसकी मेहनत और जरूरत भर की आमदनी मिले, और ये तब ही संभव है जब लोगों में खुद के उन्नयन के लिए दूसरों को लूटने और एक्सप्लोइट करने की मानसिकता न हो|
एक उत्पीड़क केवल दूसरों का उत्पीड़न ही नहीं करता वह दूसरों के चेहरे की हंसी और जीवन की शांति छीनकर अपने आस पास के माहौल को भी दुख और तड़प से भर देता है!
हमारी पाश्विक प्रवृत्ति, असंवेदनशीलता और अधिक से अधिक भोगने की हवश और लोगों पर राज करने की असीमित भूख!
कौन मिलाएगे हमें अपने से पाशविक रूप से, कौन जगाएगा हमारे अंदर संवेदना?
जवाब है, "उत्कृष्ट साहित्य- दिल को छूती कहानियाँ, उपन्यास, तकलीफ और तड़प को अभिव्यक्त करती कविताएँ, सच्चाई उजागर करते संस्मरण और बहुत कुछ"
तो क्या आप संकल्प ले रहे/रहीं कि आज से तमाम व्यस्तताओं के बीच साहित्य को वक़्त देना सुनिश्चित करेंगे/करेंगी, अगर नहीं कर सकते/सकतीं तो फिर समाज में बदलाव कि बात करना या लोगों पर दोष मढ़ते रहने की आपकी टेंडेसी केवल खुद को धोखा देने और मन बहलाने वाली बात भर है, उसमें कोई सच्चाई नहीं |
यदि असहमत हैं तो लिख भेजें, ईमेल नीचे है -
कुछ नहीं तो एक पत्रिका से ही शुरुआत कर लें, भले ही कुछ खर्चें प्रबंधित करने हों|
शुभेच्छा
'कुमार' लवकुश कुमार
आदरणीय महेश चन्द्र पुनेठा सर का आभार ज़ो समय-समय उपाय सुझाते रहते हैं, समाज में पढ़ने लिखने की संस्कृति को आगे बढ़ाने के लिए ताकि हम एक संवेदनशील और साहसी समाज का निर्माण कर सकें|
आपके द्वारा शुरू किया गया "दीवार पत्रिका - एक अभियान " इस दिशा में एक सशक्त कदम है| आपकी पुस्तक "शिक्षा के सवाल, लोकोदय प्रकाशन लखनऊ" न केवल आपके शैक्षिक अनुभवों का संकलन हैं वरन उन दिक्कतों को अभिव्यक्त करता दस्तावेज़ भी है जो शिक्षा को उसके असली उद्देश्य को पाने यथा बच्चों में सृजनशीलता, रचनात्मकता, स्वतंत्र सोच, स्पष्टता और साहस जगाने/निखारने को पामे में बाधा बन रही हैं|
आपका कविता संग्रह "अब पहुंची हो तुम - समय साक्ष्य प्रकाशन, देहरादून" एक संकलन है ऐसी कविताओं का जो न केवल हमे संवेदित करती हैं बल्कि स्पष्टता और साहस भी देती हैं|
आपके द्वारा संपादित, "शैक्षिक दखल" एक बेहतरीन और जरूरी प्रयास है शिक्षा के समग्र पहलूओं को समझने का और उसके अंतिम उद्देश्य को पाने के लिए जरूरी उपाय करने हेतु माहौल तैयार करने का|
"समाज के सवाल शिक्षा के सवालों से भिन्न नहीं हैं|"- महेश चन्द्र पुनेठा

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शुभकामनाएं
अभी, एक बेहतरीन अभिनेता al pacino के बेस्ट सीन देख रहा था, एक दृश्य देखा और इतना प्रभावित हुआ कि तुरंत एक लेख लिखने लगा, एक जरूरी लेख।
लिंक लेख के अंत में;
लेख पर आते हैं, हम ज्यादातर हालातों में इस काबिल जरूर होते हैं कि अपने से किसी कमजोर की मदद कर सकें, और इससे जो आनंद और गर्व की अनुभूति होती है वो अप्रतिम होती है।
हम कई बार शिकायत करते हैं कि हमें दुनिया से यह नहीं मिला, वह नहीं मिला लेकिन क्या साथ में हम यह भी सोचते हैं कि हम अपने से छोटों या less privileged लोगों के लिए कुछ करके एक मिशाल पेश कर रहे हैं?
हम समाज में सच्चाई, ईमानदारी और भलमानसानियत की उम्मीद करते हैं, क्या आपको पता है कि इनकी रक्षा करनी होती है, इन्हें संरक्षण देना होता है तब ही ये मजबूत होकर दूसरों की रक्षा के लायक बन पाते हैं।
इसीलिए मेरा मेरे सुधी पाठकों से आग्रह है, जब भी अवसर मिले, ऐसे प्रयास करें कि सत्य की रक्षा हो और ईमानदारी को संरक्षण मिले।
आज अगर आपके पास संसाधन हैं, ताकत है तो उससे ईमानदारी को बल दें, अपने काम से प्यार करने वालों को प्रोत्साहित करने में लगाएं ताकि कल जब बूढ़े हों तब ये न कहना पड़े कि काम से प्यार करने वाले और ईमानदार लोग इतने कम क्यों हैं ? जब तक आपके पास ताकत है उससे सही चीजों को संरक्षण दें, उन्हें बल दें।
लिंक - https://youtu.be/Jd10x8LiuBc?si=As-rK9Rilah8atQZ
आज सरकारी सेवा में मेरे सीनियर आदरणीय संदीप यादव सर का जन्मदिन है, जितना उनको जाना, अपने सहकर्मियों के लिए मददगार और एक स्वस्थ माहौल का पोषक, परस्पर हितों और परस्पर सम्मान का हिमायती पाया, अतः यह लेख हम सबके प्रिय संदीप सर को समर्पित।
सभी पाठकों को शुभकामनाएं
-लवकुश कुमार
संपूर्ण पुरुष समाज को समर्पित:-
मैं बचपन से ही इस बात को लेकर बहुत चिढ़ती थी कि भगवान ने मुझे लड़की क्यों बनाया? इतनी पाबंदियाँ झेलनी पड़ती है। लेकिन जब थोड़ी समझदार हुई, तो समझ आया कि लड़का होना भी आसान नहीं है। घर में अगर एक बेटा हो या बड़ा बेटा हो तो पिता की तबियत बिगड़ते ही वह बड़ा बेटा, चाहे जितना ही छोटा क्यों न हो, घर की सारी जिम्मेदारी संभालने की कोशिश में लग जाता है। मैंने महिलाओं को अक्सर यह कहते सुना है कि हमें तो कभी छुट्टी नहीं मिलती, और एक सीमा तक यह सच भी है कि महिलाएँ पुरुषों से ज्यादा घंटे काम करती हैं।
पर एक पक्ष यह भी है कि महिलाएँ बीमार होने पर थोड़ा कम खाना बना सकती हैं, कुछ काम कम कर सकती हैं, अगर परिवार अच्छा है तो, पर पुरुषों के पास यह सुविधा नहीं होती। लगभग हर मध्यमवर्गीय और निम्नवर्गीय परिवार का पुरुष न बीमार होने पर जल्दी डाॅक्टर के पास जा पाता है, न कोई छुट्टी लेता है। जब तक वो ल़डका रहता है,घर की जिम्मेदारियों से तालमेल, फिर बहन की शादी, फिर अपनी शादी और घर में वो भी उलझा सा ही रह जाता है।
भावनात्मक रूप से अगर कोई पुरुष टूट भी जाए, तो वो किसी के सामने रो भी नहीं सकता क्योंकि हमारे समाज में ये भ्रम फैला हुआ है कि 'मर्द को दर्द नहीं होता'। लड़कियों और महिलाओं से ये अभिव्यक्ति तो नहीं छीनी जाती। मुझे लगता है कि ये धारणा टूटनी ही चाहिए और महिलाओं को ये मोर्चा उठाना चाहिए कि वो हर तरह के इमोशन को अभिव्यक्त कर सकें और साथ ही पुरूषों को भी अपनी हर तकलीफ़ साझा करने के लिए प्रोत्साहित कर सकें, ऐसा महिलाओं को ही इसलिए करना चाहिए कि वो ही माँ, बहन, पत्नी के रूप में पुरुष के जीवन में सिखाने में सबसे अहम् भूमिका निभाती है।
अमूमन पुरुषों में हार्ट अटैक तथा अन्य ऐसी ही तनाव से जुड़ी हुई बीमारियों ज्यादा होती है क्योंकि वो अपने इमोशन को दबाकर करते है। मैंने पढ़ा था कही 'बिन घरनी घर भूत का डेरा' पर इस समाज को और देश को जितनी महिलाओं की जरूरत है उतनी पुरुषों की भी।
आज झूठे महिला सशक्तिकरण की आड़ में पर जो महिलाएँ यह कहती है कि पुरुषों ने हमारा दमन किया है तो अब हम भी करेंगे, उनसे मेरा कहना है कि हमारी शक्ति सृजन की है, विनाश की नहीं। दुनिया को आधा पुरुषों ने नष्ट कर दिया तो दुनिया को आधा हम भी नष्ट करेंगे- ये नहीं करना।
साथ मिलना है महिला और पुरुष दोनों को, चेतना के स्तर पर दोनों एक हो और दोनों मिलकर इस समाज, देश और दुनिया को बचाएं।
"इस दुनिया को प्यार की जरूरत है, बदले की नहीं। "
जो हमारे जीवन में एक अहम भूमिका निभाते है, हम सबको जरूरत है कि हम उनके प्रति पूर्वाग्रहों से मुक्ति पाए।
पुरुषों में भी संवेदना होती है, आप जयशंकर प्रसाद की रचना, नारी तुम केवल श्रद्धा हो, रचना पढ़ सकते है। कितने ही गाने ऐसे है जिनमें महिलाओं को पुरुष कितना अच्छे से समझ सकते है उनको आप समझ सकते हैं, एक गाने की लाइन है, मेरी छाया है जो, आपके घर चली, सपना बनके मेरी आँखों में है पली, मैंने जब ये देखा कि इसको लिखने वाला भी एक " पुरुष" है तो मेरे लिए ये चौकाने वाली बात थी, इसीलिए पुरुषों के प्रति अपनी अवधारणाओं को बदलने की जरूरत है।
शुभकामनाएं
- सौम्या गुप्ता
सौम्या गुप्ता जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं, उनकी रचनाओं से जीवन, मानव संवेदना एवं मानव जीवन के संघर्षों की एक बेहतर समझ हांसिल की जा सकती है, वो बताती हैं कि उनकी किसी रचना से यदि कोई एक व्यक्ति भी लाभान्वित हो जाये, उसे कुछ स्पष्टता, कुछ साहस मिल जाये, या उसमे लोगों की/समाज की दिक्कतों के प्रति संवेदना जाग्रत हो जाये तो वो अपनी रचना को सफल मानेंगी, उनका विश्वास है कि समाज से पाने की कामना से बेहतर है समाज को कुछ देने के प्रयास जिससे शांति और स्वतंत्रता का दायरा बढे |
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शुभकामनाएं
एक इंसान कुछ अपनी समझ में बेहतर करने के लिए कुछ ऐसा कर रहा है जोकि अपने आप में नया है, लीक से हटकर है, व्यक्तिगत नुकसान होने की भी संभावना है लेकिन दूसरों को कोई भी नुकसान नहीं होना है, फिर भी समाज के कुछ लोग बिना उस इंसान की गरिमा ओर व्यक्तिगत स्वतंत्रता की परवाह किए बस उसे टोंकना शुरू कर देते हैं यहां तक उसे मूर्ख कहना शुरू कर देते हैं ! होना तो ये चाहिए था कि लोग उसकी योजना को समझते और अगर वह व्यक्तिगत या सामाजिक रुप से लाभकारी हो तो उसमें हर संभव सहयोग करते लेकिन होता है उल्टा, जो खुद दो काम करने में चिड़चिड़ा हो जाता है वो दूसरे के नए काम और तरीके का मज़ाक उड़ानें का साहस जुटा लेता है।
इस माहौल को बदलना होगा और नवाचार के लिए माहौल बनाना होगा।
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शुभकामनाएं
एक दृश्य में एक शायर, अपनी शायरी पाठ के बीच में बार-2 उस जलसे के आयोजक जोकि एक ज्ञानी इंसान थे उनका नाम ले रहा था और उनके जनहित के कार्यों को उद्धृत कर रहा था |
इसी घटना का सन्दर्भ लेते हुए क्या हम ये नहीं कर सकते कि जब किसी से बात करें तो उनका नाम लें बीच बीच में जरुरत के अनुसार, क्या होगा इससे ? इससे सामने वाले इंसान को अच्छा महसूस होगा और उसकी तरफ से बेहतर प्रतिक्रिया और बेहतर प्रदर्शन मिलेगा |
"वो फाइल उठा देना" से बेहतर है कि आप कहो कि " मोहन वो फाइल उठा देना"
"ठीक है" कहकर फ़ोन रखने से बेहतर है की आप कहो " ठीक है मोहन फ़ोन रखता हूँ " या "ठीक है मोहन फ़ोन रखता हूँ फिर बात होगी " या "ठीक है सोहन फ़ोन रखा जाये अब ? " या "ओके बाय मोहन रखता हूँ अब " |
नोट- हर किसी न किसी का कोई महत्व होता है, किसी को अपने व्यवहार से महत्वहीन न महसूस कराएँ
हर किसी से इंटरैक्ट करना जरुरी नहीं लेकिन जिससे इंटरेक्शन कर रहें हैं कम से कम उससे बात करते वक़्त उसकी गरिमा का ध्यान रखें और उसके कार्यों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करें अगर कोई शब्द नहीं कह सकते तो एक प्यारी सी मुस्कान क्योंकि मुस्कान से हर्ष का पता चलता है और " हर्ष कृतज्ञता का सरलतम रूप है "
-लवकुश कुमार
आपसी रिश्तों को सन्दर्भ में लेते हुए, आएये गौर करते हैं कुछ बातों पर;
क्या हम उसके पॉइंट ऑफ़ व्यू (नजरिये) को समझने का प्रयत्न करते हैं और उससे जिज्ञासा व्यक्त करते हैं कि वो हमें अपनी बात और अच्छे से समझाए
या फिर हम उससे बात बंद कर देते हैं क्योंकि हमारे अहम् को ठेस लग जाती है, या फिर खुद को सही साबित करने के लिए बिना उसकी बात को समझे हम उससे
बदतमीजी के साथ कुतर्क करने लग जाते हैं, या फिर उसे खुद से नीचा दिखकर उसकी आवाज को दबाने का प्रयास करने लग जाते हैं;
अगर आप पहले विकल्प के अलवा कोई प्रतिक्रिया चुनते हैं तो आपने परोक्ष रूप से असहमति दर्ज करने को मुश्किल बनाने का काम किया है, संभावना है की आगे वो इंसान आपसे किसी मामले पर सहमत न होने पर असहमति व्यक्त करने से परहेज करेगा और यदि आपसे कोई स्वार्थ है तो झूठे ही आपकी हाँ में हाँ मिला लेने की संभावना बढ़ जाएगी
इस तरह दो नुक्सान हुए, पहला तो सामने वाले ने झूठ बोला और दूसरा की आप चूक गये एक और नजरिये से चीज़ों को देखने के और अपनी दृष्टि और समझ को और समावेशी बनाने से |
2. आपका किसी से कोई विवाद या कहा सुनी हो गयी और आप अपने किसी साथी के सामने उस इंसान (जिससे विवाद या कहा सुनी हुयी हो) की बुराई करने लगे और उसकी कमियों पर बोलने लगे, क्या हो अगर आपका साथी उस आदमी की गलतियों के साथ आपकी गलती और कमी पर भी बात करने लगे या आपके उस नजरिये को बदलने को कहने लगे जिसके चलते आपको अपने विरोधी का सही काम भी गलत लग रहा है; या फिर आपसे झगड़ने के बजाय सुलह करने की बात बोलने लगे; क्या प्रतिक्रिया होगी आपकी ?
क्या हम उसके पॉइंट ऑफ़ व्यू (नजरिये) को समझने का प्रयत्न करते हैं और उससे जिज्ञासा व्यक्त करते हैं कि वो हमें अपनी बात और अच्छे से समझाए
या फिर हम उससे बात बंद कर देते हैं क्योंकि हमारे अहम् को ठेस लग जाती है; कहीं ऐसा तो नहीं की हम उसे खुद से अलग या विपरीत पक्ष वाला मानने लग जाएँ और इस कदर कि उसकी दिक्कत में भी उसके साथ खड़े होने से मन कर दें (दिक्कतें किसी के सामने भी आ सकती हैं, दिक्कत मे साथ देना तो मानव धर्म है )
अगर इस तरह का व्यवहार हुआ आपका फिर तो संभावना ये बन जाएगी की सामने वाला इंसान या तो आपसे दूरी बना लेगा (फिर आप कहोगे की सच बोलने वाले लोग कम हैं) या फिर आपके सामने आपकी हाँ में हाँ मिलाएगा और आपके विरोधी के सामने उसकी हाँ में हाँ मिलाएगा और नतीजा क्या होगा की दोनों की ग़लतफ़हमी बढती ही जाएगी और खुद की गलती हमें दिखाई ही न देगी | (अमूमन लोग ऐसा करते हैं ये सोंचकर की कहीं इनसे कोई काम न पड़ जाये ) आगे आप विचार कर सकते हैं ?
एक बात कहकर इस भाग को पूरा करूँगा कि लोग अपना टारगेट पहले ही फिक्स कर चुके होते हैं उसी हिसाब से तर्क चुनते हैं, उदाहरण के लिए ये जानते हुए भी की अमुक इंसान एक नंबर का भ्रष्ट इंसान है फिर भी कुछ लोग उससे रिश्ता जोड़ने को, उसे सम्मान देने को तैयार हो जाते है क्योंकि वो पैसे वाला है या रसूख वाला है क्योंकि उस वक़्त प्राथमिकता में (टारगेट ) पैसा या कोई विशेष काम होता है |
अगर प्राथमिकता में पैसा और भौतिक उपभोग रहेगा फिर क्यों लोग स्पष्टवादी होंगे लोग तो फिर पैसे के पीछे भागेंगे और उसके लिए नैतिक पतन से भी परहेज न करेंगे |
जिस तरह के लोगों को हमारे समाज में मान मिलेगा, उस तरफ को ही भावी पीढ़ी बढ़ेगी, अगर सच के रास्ते चलने वालों को नादान कहकर उनका मज़ाक उड़ाया जायेगा और साथ खड़े होने से मना कर दिया जायेगा तो फिर सच के रास्ते चलने वाले कम लोग ही बचेंगे |
जीवन में कुछ रोमांचक करना चाहते हैं तो सच को अपना समर्थन दें, सही काम के लिए सही तकलीफ चुनें|
चर्चा के लिए राय जरूर साझा करें - lovekush@kumarchetna.in
शुभकामनायें
-लवकुश कुमार
कई रास्ते हो सकते हैं ऐसा करने के, कुछ आपने सोंचे/देखे होंगे
एक रास्ते की बात मै करना चाहता हूँ, शायद आपको पसंद आ जाये:
एक संयत और ठसक वाला संतुलित जीवन जीकर आप एक आदर्श पेश कर सकते हो
इससे क्या होगा ? इससे ये हो सकता है कि
तो मानसिक शांति और उत्कृष्टता हांसिल होगी |
3. ईमानदारी के साथ ठसक (बिना किसी अनुचित दबाव में आये ) वाला जीवन जीकर आप एक आदर्श जीवन की मिशाल बन सकते हैं
आपको और आपके जीवन की शांति को देख और लोग भी प्रेरित हो सकते हैं |
4. जब आप अपने जीवन में ईमानदार होते हो माने कथनी और करनी में एक होते हो और अपने हर एक निर्णय के पीछे के केंद्र पर नज़र रखते हो तो उत्कृष्टता आती है जीवन में / कार्यों में जो दूसरों के लिए प्रेरणा बनती है |
इस तरह आपके काम में नए लोगों का साथ भी जुड़ सकता है और अगर लोगों का साथ मिलने में वक़्त भी लगा तो कम से कम आप एक प्रेरणादायक जीवन जी पाओगे और
इतनी संतुष्टि रहेगी की आपने किसी अव्यवस्था को बढ़ाने में सहयोग नहीं किया, बाकि संयोग होते चले गये और जरूरी कौशल विकसित होते गये तो कारवां आगे बढेगा लोग जुड़ते जायेंगे
आखिरकार समाज के लिए काम करना है तो आगे बढ़ते रहेंगे जैसा समाज का साथ मिलेगा वैसी गति रहेगी, किसी भी हालत में एक बेहतर जीवन जीना है जिसका ध्येय उच्च मानक स्थापित करना हो, लोगों का साथ या पहचान मिले या न मिले, हाँ अपने काम को बड़े मंच पर लाकर हम इसे ज्यादा लोगों की नज़र में ला सकते हैं, इससे ज्यादा लोगों का साथ मिलने की गुंजाइश बन जाएगी |
यहाँ पर मै साहिर लुधियानवी साहब की कुछ पंक्तियाँ उद्धृत करना चाहूँगा :
माना कि इस ज़मीं को न गुलज़ार कर सके कुछ ख़ार कम तो कर गए गुज़रे जिधर से हम
चर्चा के लिए राय जरूर साझा करें - lovekush@kumarchetna.in
शुभकामनायें
-लवकुश कुमार
इस लेख में मै अपने अनुभव और अध्यात्मिक अध्ययन के आधार पर
कुछ कारणों पर प्रकाश डालने का प्रयास कर रहा हूँ :
कटुता का उदय होता है परायेपन की भावना से
इंसान एक बेचैन चेतना है, अहम् ( झूठा ज्ञान या खुद को लेकर वहम ) को पुष्ट करने के लिए
वो उन लोगों को नीचा दिखाने का प्रयास करता है जिनको स्वयं से अलग मानता है,
कटुता में मुख्यता सामने वाले की गरिमा की परवाह
न करते हुए भाषा और व्यवहार में लापरवाही पायी जाती है,
ऐसे शब्दों का प्रयोग किया जाता है जिससे सामने वाले में हीन भावना और विरक्ति पैदा हो |
कटुता कैसे फैलती है ? इसके जवाब में हम देख सकते हैं
कि जब किसी इंसान को कटुता का सामना करना पड़ता है तो
प्रतिक्रिया में वो सामने वाले के साथ भी कटुता का व्यवहार कर सकता है
या फिर ये सोंचकर अपने व्यवहार को संयत कर सकता है की कल हमे
इनसे कोई काम (स्वार्थ) निकालना है; इस स्थिति में भी कटुता की भावना जो
उसके अन्दर जन्म ली थी वो ख़त्म नहीं होती केवल दब जाती है और जब सामने
कोई स्वयं से कमज़ोर और तथाकथित पराया इंसान आता है और कोई विशेष परिस्थिति बनती है
तो वो दबी हुयी भावना क्रोध और कटुता के रूप में सामने आती है |
क्रोध तुरंत पैदा नहीं होता, क्रोध तो अन्दर रहता है
जो जितना ही दमित जीवन जीता है वो उतना क्रोधी होती है
बस ज्यादातर मामलों में क्रोध स्वयं से कमज़ोर इंसान पर ही बरसता है |
अतः अगर आप चाहते हैं की आपमें क्रोध और कटुता न आये तो दबावरहित जीवन जियें
जो लोग आपकी गरिमा का सम्मान न करें उनसे कोई भी काम हो दूरी बना लें अन्यथा कटुता बरदाश्त करते -करते
आपके व्यवहार में भी कटुता आ जानी है की क्योंकि समय के साथ इंसान ऐसे व्यवहार को सामान्य मान लेता है |
इससे इत्तर राय होने पर कांटेक्ट फॉर्म से अपना मत जरुर साझा करें |
शुभकामनायें
-लवकुश कुमार
कुछ लोग ऐसे मिलते हैं जिनकी अनुचित मांगें आप ये सोचकर पूरी करते रहते हो कि इनसे बात बिगड़ न जाए, व्यवहार में जो मीठापन है वो चला न जाए और अक्सर ऐसा होता है कि ऐसा इंसान आपका दोहन करता रहता है।
तो आखिर क्या करें?
आपकी श्रद्धा सत्य के प्रति होनी चाहिए न कि किसी इंसान के प्रति, जब तक वो सत्य के साथ, आप साथ देते रहो।
जैसे ही कोई अनुचित मांग करें उससे तुरंत कहो कि उसकी मांग अनुचित है पूरी नहीं हो सकती।
फिर ऐसे इंसान से बिगड़नी हो तो बिगड़ जाए, जहां कल बिगड़नी हो आज बिगड़ जाए, कम से कम आपका नुकसान होने से बच जाएगा, ऐसे इंसान से बनाकर रखने से भी कोई लाभ न होगा।
जो जरूरी है आपके पास से जाएगा नहीं इसीलिए संभालने की जरूरत नहीं है और जो जरूरी नहीं है उसे संभालकर करोगे क्या!
जीवन में बहुत कुछ संयोग से मिलता है जिसका श्रेय आप नहीं ले सकते और बहुत कुछ तय प्रक्रियाओं से गुजरकर |
ऐसा हो सकता है कि किसी के जीवन की एक चूक उसे कुछ बहुत महत्व का पाने से वंचित कर दे, ऐसी अवस्था में ऐसे इंसान के द्वारा अमूमन दो तरह की प्रतिक्रियाएं होती हैं एक तो आगे बढ़कर वर्तमान में मौजूद विकल्पों पर विचार और अपनी परिस्थिति और प्राथमिकताओं के अनुसार विकल्प का चयन और दूसरा कि अपना जीवन अफ़सोस और दोषारोपण में बिताना, दूसरी तरह की प्रतिक्रिया बहुत हानिकारक है क्योंकि इस स्थिति में इंसान भूतकाल की याद में वर्तमान की अन्नंत बेहतर संभावनाओ पर ध्यान नहीं दे पाता और फिर से बार बार चूकता रहता है |
जीवन आत्मनिर्भरता, आज़ादी और गरिमा के साथ जीने और लोकसेवा में समर्पण से धन्य होता है फिर क्या फर्क पड़ता है की आपको अमुक क्षण में आपकी मनचाही वस्तु मिली या नहीं बल्कि हमारा ध्यान तो चल रहे और आने वाले हर पल की असीम संभावनाओं को तलाशने और उन्हें जरुरत अनुसार अंगीकार कर आत्मनिर्भरता, आज़ादी, गरिमा और लोकसेवा को समर्पित जीवन जीने पर होना चाहिए |
अगर हम वर्तमान की संभावनाओ के बजाय अपना ध्यान भूतकाल के नुकसान पर लगाये रखेंगे तो हो सकता है की उस पुराने नुकसान/चूक के लिए प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जिम्मेदार इंसान (वो इंसान आप स्वयं भी हो सकते हैं ) को कोसते रहें और अपने जीवन को कडवाहट से भर लें |
हमें ये याद रखना होगा की जिस पेड़ की छाया हम आज ले रहे हैं, बहुत संभावना है की वो पेड़ किसी और ने लगाया हो, एक बार आप भी समीक्षा करें की क्या आप कोई ऐसा काम कर रहें हैं जिसका लाभ ऐसे लोगों को मिल रहा है जिनसे आपका कोई रिश्ता नहीं, अगर नहीं तो मौजूद संसाधन, समय, ताकत और धन का एक हिस्सा इस काम को भी दें, जीवन में उत्कृष्टता आ जाएगी |