Recent Articles Related To समाज

आधुनिक समाज की सच्चाई (कविता) - विजयीप्रिया शर्मा

हम इतने सभ्य हो चुके हैं,

इतने सभ्य कि अब इंसान इंसान को देखकर मुस्कुराना भूल रहा है,

और कुछ यूं हुआ है

चारों तरफ उजाला है, पर अधिकतर अपनी अपनी स्क्रीन के अंधेरे में डूबे हुए हैं।

अंगूठे चल रहे हैं लगातार......

लाइक शेयर और स्क्रोल की अंधी दौड़ में, हम औंधे मुंह व्यस्त हैं फोन चलाने में,

बिना यह जाने कि .....

सामने बैठी बूढ़ी आंखें बात करना चाहती हैं,

वो अपना बुढ़ापा खोना चाहती हैं,

हमारी खिलती जवानी के साथ, 

पर हम रील के पंद्रह सेकंड के क्षणिक सुख में व्यस्त हैं।

रिश्तों के धागे अब वाई-फाई से जुड़ते हैं,

नेटवर्क कमजोर होते ही टूट जाते हैं। 

हजारों फ्रेंड्स है वर्चुअल दुनिया में, 

पर आधी रात को उदास दिल एक कंधा, दिल की सुनने वाला एक इंसान ढूंढने के लिए तरस जाता है।

यहां मशीनें इंसानों की तरह सोच रही है,

और इंसान रोबोट की तरह बिना सोचे जी रहा है। 

यह हमारी सबसे बड़ी प्रगति है। 

हमने चांद पर कदम रख दिया, 

पर जमीन पर अपनों का हाथ छोड़ दिया।

हम चालाक हो गए हैं। 

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से बात कर लेते हैं,

मगर पड़ोस के घर का हाल नहीं जानते हैं।

हम पत्थरों के दौर से निकल कर कांच और सिलिकॉन के नए पाषाण युग में आ खड़े हुए हैं,

पर उनमें अब कोई आहट नहीं होती है।

यह तरक्की का शिकार है यह संवेदनाओं का पतन?

हमारा चरित्र अब प्रोफाइल पिक्चर करती है,

और हमारी योग्यता.....

लाइक और कॉमेंट्स की गिनती।

 

- विजयीप्रिया शर्मा 


विजयीप्रिया जी स्नातक में मानविकी की छात्रा हैं और सामाजिक विषयों पर लिखती रहती हैं, वह वर्तमान में लखनऊ विश्वविद्यालय में अध्ययनरत हैं और पढ़ने लिखने की संस्कृति को बढ़ाने के लिए प्रयासरत हैं| उनका मानना है कि पढ़ने लिखने वालों को एक मंच पर लाकर हम अपने विचार और जीवन/दुनिया को लेकर अपने अवलोकन ज्यादा से ज्यादा लोगों से साझा कर पाएंगे और इस तरह दुनिया और स्वयं को लेकर एक व्यापक दृष्टिकोण बना पाएंगे, महान लेखिका महादेवी वर्मा जी की रचनाएँ और व्यक्तित्व उन्हे खास पसंद हैं|


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अधूरी उड़ान (कहानी): स्त्री विमर्श - विशाल चंद

"चेली, अगले रविवार को लोग तुझे देखने आ रहे हैं।"

रसोई में आटा गूँधते हुए माधवी के हाथ एक पल के लिए रुक गए। उसने धीरे से ईजा की ओर देखा। ईजा की नज़रें झुकी हुई थीं, जैसे यह बात कहते हुए वे स्वयं भी भीतर से टूट रही हों।

"लेकिन ईजा... मैं अभी पढ़ना चाहती हूँ।" 

ईजा ने बस इतना कहा—"सब ठीक हो जाएगा चेली... शादी के बाद भी पढ़ाई कर लेना।"

माधवी हल्का-सा मुस्कुराई। वह जानती थी कि यह मुस्कान केवल उसके चेहरे पर थी, मन में नहीं।

 

उस छोटे-से पहाड़ी गाँव में लड़कियों के सपनों की उम्र अक्सर बारहवीं की परीक्षा तक ही मानी जाती थी।

कुछ ही दिन पहले बोर्ड परीक्षा का परिणाम आया था।

"रिजल्ट आ गया?" पड़ोस की चाची ने आँगन से आवाज़ लगाई।

 

माधवी ने धीरे से सिर झुका दिया।

"एक विषय में रह गई..."

 

बस इतना सुनना था कि घर का माहौल बदल गया। ईजा (मां) चुप रहीं। बौजू(पिताजी) देर तक कुछ नहीं बोले। लेकिन शाम होते-होते अम्मा की आवाज़ पूरे आँगन में गूँज उठी— "अब पढ़ाई-लिखाई बहुत हो गई। चेली जवान हो गई है। कोई अच्छा लड़का देखो। पढ़-लिखकर कौन-सा कलेक्टर बनना है?"

 

उस दिन माधवी ने पहली बार महसूस किया कि परीक्षा में असफल होने से भी बड़ा डर उसके सामने खड़ा है—कहीं उसकी शादी तय न कर दी जाए और वही हुआ।

 

अगले ही सप्ताह दो रिश्तेदार घर आए। उनके हाथ में मिठाई का डिब्बा था और बातों में एक सरकारी नौकरी में कार्यरत लड़के का ज़िक्र। किसी ने माधवी से नहीं पूछा कि वह क्या चाहती है। उससे केवल इतना कहा गया—

"चेली, मेहमानों के लिए चाय बना दे।"

 

चाय की ट्रे लेकर जब वह कमरे में पहुँची तो उसे लगा जैसे वहाँ उसकी नहीं। उसके भविष्य की कीमत तय की जा रही हो।

 

रिश्तेदार जाते-जाते बौजू से कह गए— "ऐसे रिश्ते बार-बार नहीं मिलते। फ़ौज में नौकरी है। चेली की ज़िंदगी बन जाएगी।"

 

अम्मा कई महीनों से एक ही बात दोहराती थीं— "मरने से पहले अपनी पोती का ब्याह अपनी आँखों से देख लूँ, फिर भगवान जब चाहे बुला ले।" बौजू चुप रहते। ईजा की आँखें भर आतीं और माधवी... वह बस सब सुनती रहती।

 

वह पढ़ना चाहती थी। उसका सपना था कि वह अध्यापिका बने। उसे लगता था कि शिक्षा केवल नौकरी पाने का साधन नहीं बल्कि अपने पैरों पर खड़े होने और अपने जीवन के फैसले स्वयं लेने की ताक़त भी देती है। लेकिन गाँव में आज भी यह मान लिया जाता था कि चेली की सबसे बड़ी मंज़िल उसकी शादी है।

 

कुछ दिनों बाद बौजू ने धीरे से कहा— "माधवी, लड़का अच्छा है। सरकारी नौकरी करता है। हमें लगता है कि यही ठीक रहेगा।"

 

माधवी बहुत देर तक खिड़की से पहाड़ों को देखती रही। सामने दूर तक फैले चीड़ और बांज के जंगल हवा के साथ झूम रहे थे। उसे लगा जैसे पहाड़ों के ऊपर उड़ते पक्षी उससे पूछ रहे हों—"क्या सपनों की भी कोई उम्र होती है?"

 

उसने चाहा कि एक बार कह दे— "मैं अभी शादी नहीं करना चाहती। मैं पढ़ना चाहती हूँ।"लेकिन शब्द गले में ही अटक गए। शायद इसलिए कि वह जानती थी—उसके एक "ना" के सामने अम्मा की आख़िरी इच्छा, ईजा की मजबूरियाँ, बौजू की सामाजिक चिंता और रिश्तेदारों की सलाह खड़ी थी।

 

धीरे-धीरे शादी की तैयारियाँ शुरू हो गईं। कॉलेज की फीस के लिए जो पैसे उसने बचाकर रखे थे, उन्हीं पैसों से उसके लिए शादी की साड़ी खरीदी गई।

 

रिश्तेदार आते और कहते— "चेली भाग्यशाली है। फ़ौजी लड़का मिला है।" अब इससे अच्छा रिश्ता कहाँ मिलेगा?

 

हर कोई उसकी किस्मत की बातें कर रहा था, लेकिन किसी ने उसके सपनों के बारे में नहीं पूछा। 

शादी का दिन आ गया। मंडप में मंत्र गूँज रहे थे। अग्नि साक्षी थी। रिश्तेदार मुस्कुरा रहे थे। तभी उसकी दोस्त लक्ष्मी ने पूछा— तू इस विवाह से खुश तो हैं न ? 

 

माधवी ने सामने देखा। अम्मा के चेहरे पर संतोष था।

ईजा की आँखों में आँसू थे।

बौजू के चेहरे पर वर्षों की चिंता उतरती दिखाई दे रही थी।

 

उसने धीमे से कहा— "हाँ..."

 

उस एक शब्द के साथ सबके चेहरे खिल उठे। लेकिन किसी ने यह जानने की कोशिश नहीं की कि वह "हाँ" उसकी इच्छा थी या परिस्थितियों के आगे उसका मौन समर्पण।

 

समय बीत गया।

 

एक दिन माधवी अपनी छोटी-सी चेली को स्कूल छोड़ने जा रही थी। पहाड़ की वही पगडंडी थी, वही चीड़ के पेड़ और वही सुबह की धूप।

 

रास्ते में चेली ने मासूमियत से पूछा— "ईजा, मेरी शादी भी आप लोग ही तय करोगे?"

 

माधवी कुछ पल के लिए ठिठक गई। उसने अपनी चेली का हाथ थामा और मुस्कुराकर कहा— "नहीं चेली। शादी तेरी होगी, इसलिए फैसला भी तेरा होगा। हमारा काम तुझे समझाना होगा, तेरे लिए फैसला लेना नहीं।"

 

चेली मुस्कुरा दी और आगे दौड़ गई।

 

माधवी वहीं खड़ी पहाड़ों की ओर देखने लगी। उसे लगा कि उसकी अपनी उड़ान भले ही अधूरी रह गई हो, लेकिन अब उसकी चेली के पंख कोई नहीं काट पाएगा

 

शायद बदलाव ऐसे ही शुरू होता है—जब एक पीढ़ी अपने हिस्से का दर्द अगली पीढ़ी को विरासत में देने से इनकार कर देती है।

 

विशाल चन्द  @reading_owl.3

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 लेखक की टिप्पणी

 

यह कहानी मेरे द्वारा वर्ष 2021 में लिखे गए ब्लॉग लेख "लड़की, विवाह और सहमति" से प्रेरित है। उस समय उठाए गए सामाजिक प्रश्नों को इस कहानी के माध्यम से एक नए साहित्यिक रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है। कहानी के पात्र और घटनाएँ काल्पनिक हैं, किन्तु इसके सामाजिक संदर्भ वास्तविक अनुभवों और अवलोकनों से जुड़े हैं।

यदि यह कहानी पाठकों को विवाह में सहमति, शिक्षा और बेटियों के सपनों पर एक बार फिर सोचने के लिए प्रेरित करे, तो इसका उद्देश्य सार्थक होगा।


विशाल चन्द जी समाजशास्त्र के शोधार्थी, पाठक और संवेदनशील शिक्षार्थी हैं। नवीन ज्ञान अर्जन और सतत सीखना आपके व्यक्तित्व का अभिन्न हिस्सा है। पुस्तकों का पठन और संग्रहण आपको विशेष प्रिय है।

आपके भीतर एक घुमक्कड़ चेतना भी सक्रिय है, जो आपको नए लोगों, स्थानों और अनुभवों से जोड़ती रहती है। बागवानी आपके लिए प्रकृति से संवाद का माध्यम है।

आप समाज को अपने स्वतंत्र दृष्टिकोण से देखने और विभिन्न समूहों के साथ मिलकर सामाजिक दायित्वों के निर्वहन को निरंतर प्रयासरत रहते हैं।


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ताल :फिल्म समीक्षा - सौम्या गुप्ता

हमारे समाज में महिलाओं की स्थिति के बारे में बहुत कुछ कहा जाता है, बातें की जाती हैं पर एक समय तक एक ऐसा समूह जिसे न स्त्री माना जाता है न पुरुष अर्थात् किन्नर उनके विषय में उस स्तर पर न समाज में कुछ बात हुयी और न ही कानून में।

      हमें संविधान में समानता का अधिकार दिया गया पर ये कैसी समानता थी जिसमें एक दौर तक पूरे एक तबके को डेथ सर्टिफिकेट लेने के लिए लम्बा संघर्ष करना पड़ा|

गौरी सावंत जी के जीवन पर बनी फिल्म ताली संवेदनाओं और जोश का अद्‌भुत मिश्रण है। कैसे एक किन्नर अपनी कम्युनिटी के लिए लड़ती है। जिसे अपने घर से निकलना पड़ता है क्योंकि उसके पिता उसकी अलग पहचान को समाज के सामने स्वीकार नहीं कर पा रहे थे।

गणेश जिसे पता था कि गौरी बनने का सफर कितना दर्द देने वाला हो सकता है फिर भी उसने यह सफर तय किया। खाने के लिए और रहने के लिए संघर्ष किया।

अपनी कम्युनिटी में पूरी तरह उसे अपना समझा जाने लगे इसके लिए उसने जान जोखिम में डालकर ऑपरेशन कराया। फिर उसकी ही कम्युनिटी का एक मेंबर उसकी जान लेना चाहता था क्योंकि वो एक शिक्षिका बन गई थी।

गौरी जी ने किन्नर समुदाय के लिए ही नहीं काम नहीं किया, बल्कि वेश्यावृत्ति से जुड़ी महिलाओं के बच्चों को भी अपना माना। गणेश को गौरी बनना था क्योंकि उसे माँ बनना अच्छा लगता था।

गौरी जी कहती हैं कि इस देश में यशोदा की बहुत जरूरत है। उन्होंने शिक्षा भी ली और शिक्षिका भी बनीं।

शिक्षिका बनने तक का सफर भी आसान नहीं रहा होगा। वो ऐसी शिक्षिका बनी कि संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा इन्हें सम्मानित किया गया। उनकी एक दोस्त की जान जाने पर शरीर को नीचे रखने पर उन्होंने धरना प्रदर्शन कर दिया | साम-दाम-दण्ड की नीति के द्वारा उनको पूरा सम्मान दिलाया।

सुप्रीम कोर्ट में अपनी कम्युनिटी को तीसरे लिंग की पहचान दिलाई

उन्होंने राह के काले पत्थरों या मुँह पर पड़ी काली स्याही से रुकना सीखा ही नहीं था। इसीलिए तो चाहे अपनों का साथ छूटना हो या इस समुदाय के साथ होने वाले दुर्व्यवहार का पता चलना हो, ऑपरेशन के लिए जान जोखिम में डालना हो या अपने ही लोगों द्वारा मारने कोशिश, उन्होंने रुकना नहीं आगे बढ़ना स्वीकार किया।

ताली बजाना नहीं, बजवाना स्वीकार किया

हमें इस मूवी को देखना चाहिए और प्रत्येक समुदाय के प्रति सद्भाव रखना चाहिए आखिर हम सभी में ईश्वर का रूप भिन्न-भिन्न रूपों में साकार होता है। 

           हर समुदाय में कुछ कमियां होती है। हमें जरूरत है कि हम उसकी कमियों को समझें और हर समुदाय को समाज की मुख्यधारा में शामिल करें| जब तक हम उन्हें बराबर का अधिकार नहीं देते, शिक्षा और स्वास्थ्य के समान अवसर नहीं देते, हमें कोई हक नहीं है कि हम उनकी बुनियादी जरूरतों के लिए किए जाने वाले कामों के लिए उन्हें अपमानित करे। 

 

-सौम्या गुप्ता 

बाराबंकी, उत्तर प्रदेश 


सौम्या जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं |


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बदलतीं स्त्रियाँ (कविता)- सौम्या

प्रस्तुत है, कवयित्री सौम्या जी की एक कविता, जो महिलाओं की बदलते हुए सामाजिक भूमिकाओं के बारे में है। यह प्रश्न उठाती  है कि क्या समाज इस बदलाव के लिए तैयार है, और यह परंपरागत मान्यताओं और पितृसत्तात्मक अपेक्षाओं पर भी सवाल उठाती है।

 

मैंने सुना है एक प्रश्न जिसमें पूछा जाता है

कि जब आज स्त्रियां बदल रही हैं, 

वो अब दूसरों से पहले स्वयं को चुन रही हैं 

वो अब रसोईघर से पहले अपने अन्य हुनर को चुन रही हैं 

अब वो खुद का अलग अस्तित्व भी ढूंढ रही हैं 

बेबाक होकर बोल रही हैं, खेल रही है, उड़ भी रही हैं 

क्या समाज इस परिवर्तन के लिए तैयार है? 

तो मुझे ऐसा लगता है, कि नहीं

समाज का एक वर्ग आज भी इस परिवर्तन को नहीं देखना चाहता 

वह चाहता है वही पुरानी रुढियों में लिपटी स्त्री 

जिसके मुंह में न जुबान हो और न दिमाग़ में अपने कोई विचार 

पिता, पति और पुत्र पर निर्भर स्त्री 

जो एक कदम भी बिना किसी के सहारे के न चल सके 

जो हमेशा चले पुरुषों से एक कदम पीछे 

जो समर्पित कर दे अपने जीवन का एक-एक पल 

पुरुषों के लिए 

चाहे वह पुरुष दो पल भी न निकाल सके औरत के लिए 

चाहे वह पुरुष, औरत का सम्मान भी करना न जानता हो 

पर पुरुषों को आज भी चाहिए गूंगी गुड़िया|

 

-सौम्या 

बाराबंकी, उत्तर प्रदेश 


सौम्या जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं |


आइए कुछ प्रश्नों के माध्यम से कविता के निहित अर्थ को अच्छे से समझने का प्रयास करते हैं:

इस कविता  में महिलाओं के विषय में क्या विचार व्यक्त किए गए हैं?

इस कविता  में महिलाओं के बदलते सामाजिक भूमिकाओं और स्वतंत्रता की खोज पर विचार व्यक्त किए गए हैं। यह उन पुरानी परंपराओं पर सवाल उठाता है जो महिलाओं को पुरुषों पर निर्भर रहने और खुद को सीमित करने के लिए मजबूर करती हैं। कविता  में इस बात पर भी जोर दिया गया है कि समाज इस बदलाव के लिए तैयार नहीं है और अब भी कुछ लोग महिलाओं को पुरानी रूढ़ियों में देखना चाहते हैं।

इस कविता में समाज के प्रति क्या सवाल उठाया गया है?

इस कविता में समाज से यह सवाल पूछा गया है कि क्या वह महिलाओं के इस बदलाव को स्वीकार करने के लिए तैयार है। यह सवाल समाज की मानसिकता और महिलाओं के प्रति उसके दृष्टिकोण पर प्रकाश डालता है। कविता में इस बात पर जोर दिया गया है कि समाज का एक वर्ग अब भी महिलाओं को पुरानी भूमिकाओं में देखना चाहता है, जो उनके विकास और स्वतंत्रता में बाधा डालता है।

कवयित्री  महिलाओं के लिए किस प्रकार की स्वतंत्रता की वकालत करती है?

कवयित्री महिलाओं के लिए एक ऐसी स्वतंत्रता की वकालत करती  है जिसमें वे अपनी पसंद खुद कर सकें, अपने काम को चुन सकें, और एक अलग अस्तित्व ढूंढ सकें। यह स्वतंत्रता उन्हें बेबाक होकर बोलने, खेलने और उड़ने का अधिकार देती है, जिसका अर्थ है कि वे बिना किसी डर के अपनी इच्छाओं और सपनों को पूरा कर सकें।

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गलत के साथ खड़े होकर सही की उम्मीद! (पुनर्विचार) - सोनम वर्मा

यह लेख पढ़ते समय यदि आपको असहजता महसूस हो, तो यह असहजता व्यर्थ नहीं है, यह वही बेचैनी है, जो तब होती है जब कोई हमें आईना दिखा देता है।

हम अक्सर समाज, व्यवस्था और लोगों को दोष देते हैं, पर यह देखने से बचते हैं कि कहीं हम स्वयं ही उस गलत का हिस्सा तो नहीं बन रहे, जिसका रोना रोज़ रोते हैं।दुनिया ऐसे लोगों से भरी पडी है जो वही पढ़ते हैं जो उन्हें सोचने से बचाए, वही सुनते हैं जो उन्हें हँसाकर टाल दे और वही देखते हैं जो उन्हें ज़िम्मेदारी से दूर रखे। फिर भी हम उम्मीद करते हैं कि समाज बदल जाए, विचार ऊँचे हो जाएँ और लोग ईमानदार बन जाएँ। यह कैसी उम्मीद है, जो गलत को ताकत देकर सही से की जाती है?

जो लोग सच बोलते हैं, कठिन सवाल उठाते हैं और हमारी सुविधाजनक सोच को चुनौती देते हैं, उन्हें हम अनदेखा कर देते हैं। उन्हें उबाऊ, नकारात्मक या अव्यावहारिक कहकर किनारे कर दिया जाता है, पर जो लोग हमें बहलाते हैं, हमारी सोच को सुन्न करते हैं और भीड़ के स्वाद के अनुसार परोसते हैं, उन्हें हम सर आँखों पर बिठा लेते हैं। क्या यह चयन हमारी मानसिकता को उजागर नहीं करता?

हम शिकायत करते हैं कि आज कोई अच्छा नहीं लिखता, कोई ईमानदार नहीं रहा और कोई बदलाव नहीं चाहता। जबकी इसके ही समान्तर एक और सच्चाई यह है कि जब कोई सच में ईमानदारी से लिखता है या बदलाव की बात करता है, तो उसे पढने वालों कि संख्या कम ही मिलती है, क्योंकि ऐसा लेखन हमें कठघरे में खड़ा करता है, और खुद से सवाल करना हमें सबसे ज़्यादा असहज करता है।

हम गलत लोगों से सही काम की उम्मीद इसलिए करते हैं क्योंकि यह आसान है। खुद खड़े होना कठिन है, खुद बोलना जोखिम भरा है और खुद कुछ अलग करना असुविधाजनक है। इसलिए हम भीड़ में सुरक्षित रहना पसंद करते हैं।

वही भीड़ जो गलत को लोकप्रिय बना सकती है और फिर कहती है कि नेता खराब हैं, लेखक बिक गए हैं या व्यवस्था में खामियां आ गई हैं|

व्यवस्था की खामियों की तरफ इशारा करने वाले लोगों में अधिकतर, उसी व्यवस्था को रोज़ मज़बूत भी तो कर रहे हैं!

"हम जिन विचारों को समर्थन देते हैं, जिन लोगों को आगे बढ़ाते हैं और जिन बातों पर चुप रहते हैं, वही समाज की दिशा तय करती हैं।"

फिर भी हम अपने हिस्से की ज़िम्मेदारी स्वीकार करने से बचते हैं।

हम दोहरे मानक वाला इंसान नहीं कहलाना चाहते, पर सच यह है कि हम में से ज्यादातर सुविधावादी हो चुके हैं। और सुविधावाद धीरे-धीरे समाज की आत्मा को खोखला कर देता है। अमूमन लोग सही का साथ तभी देते हैं, जब उसमें हमें कोई असुविधा न हो।

यदि सच में बदलाव चाहिए, तो पहले यह देखना होगा कि हम किसके साथ खड़े हैं, किसे पढ़ रहे हैं और किस चुप्पी को हम समझदारी समझ रहे हैं।

क्योंकि गलत का साथ देकर सही की उम्मीद करना, समाज के साथ किया गया सबसे बड़ा छल है।

यदि यह लेख आपको चुभा हो, तो इसे नज़र अंदाज़ मत कीजिए, संभव है, यही चुभन उस बदलाव की शुरुआत हो, जिसकी बात हम हमेशा दूसरों से करते आए हैं।

- सोनम वर्मा

सीतापुर, उत्तर प्रदेश


उदीयमान लेखिका एवं कवयित्री सोनम वर्मा जी, इतिहास, राजनीति विज्ञान एवं अर्थशास्त्र विषयों में स्नातक हैं और इतिहास विषय में स्नातकोत्तर| शैक्षिक कार्यों के उद्देश्य हेतु बी.एड. किया  तथा वर्तमान में एम.एड. में अध्ययनरत हैं|

आपको सामाजिक जागरूकता से संबंधित लेखन में विशेष रुचि है| सामाजिक सरोकारों के साथ ही शैक्षिक एवं मानवीय विषयों पर लेख एवं कविताएँ लिखना आप अपना शैक्षिक दायित्व समझती हैं|


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परिवर्तन - संजय सिंह 'अवध' 

परिवर्तन की ओट लिए जब,
कदम समय के चल जाते हैं,
तब नियति का घूँघट ओढ़े,
शिथिल प्रयास भी छल जाते हैं।

परिवर्तन में जो छँट जाते हैं,
नतमस्तक हो झुक जाते हैं,
ऐसे शीश धार से कट कर,
कभी नहीं फिर उठ पाते हैं।

परिवर्तन की राह पकड़ जो,
समय के रंग में ढल जाते हैं,
ऐसे शीश शैल से उठकर,
नभ में सूर्य से बन जाते हैं ।

जब इंकलाब के नारों से
बाधित ये अंतर्मन होता है,
तब ही परिवर्तन पाने को,
चिंगारी से आचमन होता है।

हवन कोई कितने भी कर ले,
जतन सहस्रों कर ले कोई,
परिवर्तन के अटल सत्य से,
चक्र काल का, बच नहीं पाता।

परिवर्तन हो पार्थ के मन में,
परिवर्तित हो शीश कुरु का,
विगत समय की चाल रोक कर,
परिवर्तन, कृष्ण जो कर जाते हैं,
मन में रण हो, या रण में मन,
परिवर्तन की ढाल लिए,
अर्जुन परिवर्तन कर जाते हैं।

परिवर्तन ऋतुओं का होकर,
जीवन में परिवर्तन करता,
जब परिवर्तन ग्रहों का होता,
राम भी उसको रोक ना पाते।
परिवर्तित यदि मृग ना होता,
तुलसी क़लम सींच ना पाते,
ना जाते लंका को रघुवर,
रावण घर घर सेंध लगाते।

परिवर्तन का कठिन दीर्घ पर,
सार बहुत ही कम होता है,
समय की सुइयाँ छिल ना जाएँ,
समय-समय से रंग ना जाये,
इस उद्देश्य जनित ज्वाला से ही,
ये जग परिवर्तन होता है।

- संजय सिंह 'अवध' 

ईमेल- green2main@yahoo.co.in

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उक्त मन को छूने वाली कविता के रचयिता भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण में ATC अधिकारी हैं और अपने कालेज के दिनों से ही, जैसा कि इनकी रचनाओं से घोतक है, जन जन में संवेदना, करूणा और साहस भरने के साथ अंतर्विषयक समझ द्वारा उत्कृष्टता के पथ पर युवाओं को अग्रसर करने को प्रयासरत हैं।

कवि के बारे में विस्तार से जानने के लिए यहां क्लिक करें।


यह कविता परिवर्तन के महत्व पर प्रकाश डालती है, जो मन, समय और जीवन के विभिन्न पहलुओं में होता है। यह परिवर्तन के विभिन्न रूपों और उनसे जुड़े परिणामों को उजागर करता है।

यह कविता परिवर्तन के महत्व को दर्शाती है और बताती है कि परिवर्तन हर जगह मौजूद है।

इस कविता में परिवर्तन की क्या भूमिका है?

इस कविता में, परिवर्तन जीवन का एक सार्वभौमिक पहलू है, जो मन, समय, ऋतुओं और यहां तक कि ग्रहों को भी प्रभावित करता है। परिवर्तन एक ऐसी शक्ति है जो न केवल व्यक्तिगत विचारों और भावनाओं को बदलती है, बल्कि पूरी दुनिया को भी प्रभावित करती है। यह निरंतरता, विनाश और सृजन की प्रक्रिया को दर्शाता है, जो जीवन के चक्र को आकार देता है।

कविता में 'यह जग परिवर्तन होता है' वाक्यांश का क्या अर्थ है?

यह वाक्यांश कविता के मुख्य विषय को सारांशित करता है: दुनिया में परिवर्तन हर जगह होता है। यह परिवर्तन की सार्वभौमिकता और सभी चीजों पर इसके प्रभाव को इंगित करता है। यह एक शक्तिशाली कथन है जो परिवर्तन की निरंतरता और महत्व पर जोर देता है।


इस कविता पर अपनी राय या प्रतिक्रिया आप संपर्क फॉर्म से भेज सकते हैं या lovekushchetna@gmail.com पर ईमेल कर सकते हैं।

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अंधविश्वास- एक समीक्षा(सौम्या गुप्ता)

लोग अंधविश्वास में क्यों फंसते हैं?

लोकल न्यूजपेपर में पढ़ते हुए कि एक पिता ने बेटे की चाह में बेटी की बलि दे दी, इसे पढ़ते हुए मन दुःख के साथ-साथ आश्चर्य से भी भर गया, ख्याल आया कि कैसे अशिक्षित और असंवेदनशील लोग है!

इस अंधविश्वास का कारण क्या हो सकता है?

एक कारण जो मैं समझ पा रही हूं, हो सकता है कि जब हम दुखी होते हैं, तब हमारा मन आशा की किरण ढूंढता हैं। उस समय किसी को वो एक किरण मिल जाती है या एक भ्रम कि उस समय कुछ लोगों को उम्मीद नहीं दिखती है तो वो बाबाओं के पास जाते हैं,  दरअसल होता ये है, हम उस घोर दुःख की घड़ी में जो हमारे साथ खड़ा होता है उसे हम अपना भगवान समझ लेते हैं और ये वक्त की बात है कि उस समय हमें कैसा इंसान मिलता है,  उसी इंसान का हम अनुसरण करते है। इस विश्वास के साथ की हमारी दिक्कतें दूर हो जायेंगी लेकिन अगर ये विश्वास तर्कहीन हो और हम संवेदना और करूणा भूलकर केवल स्वार्थ के वशीभूत हो जायें तो यही विश्वास अंधविश्वास में बदल जाता है, एक सात्विक इंसान का साथ हमें प्रेममयी बनाता है जबकि एक पाशविक प्रवृत्ति के स्वकेंद्रित इंसान का साथ हमें स्वार्थी और संवेदनाहीन बना देता है।

इसीलिए जरूरी है कि ये अज्ञान खत्म हो लेकिन उसमें समय लगेगा। लेकिन जब भी आप किसी संकट से गुजर रहे हों उस वक्त या तो आप खुद की अंतरात्मा पर यकीन करे या उस समय भी आप सही इंसान इस आधार पर चुने कि क्या वह अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए दूसरों का अहित करने की बात तो नहीं कर रहा, उसके जीवन में सच कितना है, इस तरह एक चुनाव आपकी जिंदगी बदल सकता है सकारात्मक या नकारात्मक आपके चुनाव पर निर्भर करता है।

दिक्कतें आती जाती रहती हैं, विकल्प मौजूद रहते हैं, दिक्कत के समय में सच्चे इंसान को ही चुनें और दिक्कतों के ऊपर इंसानियत को रखें, खुद से पहले समष्टि को रखें, अपने हित के लिए कोई ग़लत उदाहरण पेश न करें।

आपकी राय क्या है जरूर अवगत करायें।

शुभकामनाएं 

-सौम्या गुप्ता 

बाराबंकी उत्तर प्रदेश 


सौम्या गुप्ता जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं, उनकी रचनाओं से जीवन, मानव संवेदना एवं मानव जीवन के संघर्षों की एक बेहतर समझ हांसिल की जा सकती है, वो बताती हैं कि उनकी किसी रचना से यदि कोई एक व्यक्ति भी लाभान्वित हो जाये, उसे कुछ स्पष्टता, कुछ साहस मिल जाये, या उसमे लोगों की/समाज की दिक्कतों के प्रति संवेदना जाग्रत हो जाये तो वो अपनी रचना को सफल मानेंगी, उनका विश्वास है कि समाज से पाने की कामना से बेहतर है समाज को कुछ देने के प्रयास जिससे शांति और स्वतंत्रता का दायरा बढे | 


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बचपन बचपन ( लघुकथा ) - मीरा जैन

दिव्यांम के जन्मदिन पर गिफ्ट में आए ढेर से  नई तकनीक के इलेक्ट्रॉनिक खिलौनों में कुछ को  दिव्यम चला नहीं पा रहा था घर के अन्य सदस्यों ने भी हाथ आजमाइश की लेकिन किसी को भी सफलता नहीं मिली तभी कामवाली बाई सन्नो का 11 वर्षीय लड़का किसी काम से घर आया सभी को खिलौनों में बेवजह मेहनत करता देख वह बड़े ही धीमे में व संकोची लहजे में बोला -
'आंटी जी ! आप कहें तो मैं इन  खिलौनों को चला कर बता दूं' पहले तो मालती  उसका चेहरा देखती रही फिर मन ही मन सोच रही थी कि इसे दिया तो निश्चित ही तोड़ देगा फिर भी सन्नो का लिहाज कर बेमन से हां कर दी और देखते ही देखते मुश्किल खिलौनों को उसने एक बार में ही स्टार्ट कर दिया सभी आश्चर्यचकित थे , मालती ने सन्नो को हंसते हुए ताना मारा -
' वाह री सन्नो ! तू तो हमेशा कहती है पगार कम पड़ती है और इतने महंगे खिलौने छोरे को दिलाती है जो मैंने आज तक नहीं खरीदे '
 इतना ही सुनते ही सन्नों की आंखें नम हो गई उसने भरे गले से कहा- ' मैडम जी ! यह खिलौनों से खेलता नहीं बल्कि खिलौनों की दुकान पर काम करता है।'

- मीरा जैन

उज्जैन मध्य प्रदेश 


अपनी रचनाओं से संवेदना और स्पष्टता जगाने वाली विख्यात लेखिका श्रीमती मीरा जैन का जन्म 2 नवबंर 1960 को जगदलपुर  (बस्तर) छ.ग. में हुआ, आपने  लघुकथा , आलेख व्यंग्य , कहानी, कविताएं , क्षणिकाएं जैसी लेखन विधाओं में रचनाएं रचकर साहित्य कोश में अमूल्य योगदान दिया है और आपकी 2000 से अधिक रचनाएं विभिन्न भाषाओं की देशी- विदेशी पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। और आकाशवाणी सरीखे माध्यमों से जनसामान्य के लिए प्रसारित भी।          
आप अनेक मंचो से बाल साहित्य , बालिका महिला सुरक्षा उनका विकास , कन्या भ्रूण हत्या , बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ , बालकों के लैगिंग यौन शोषण , निराश्रित बालक बालिकाओं  को समाज की मुख्य धारा से जोड़ना स्कूल , कॉलेजों के विद्यार्थियों को नैतिक शिक्षा आदि के अनेक विषयो पर उद्बोधन एवं कार्यशालाएं आयोजित कर चुकी हैं।

पता
516 साईं नाथ कॉलोनी,सेठीनगर
 उज्जैन ,मध्य प्रदेश 
पिन-456010
मो.9425918116
jainmeera02@gmail.com

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बदलते भाव ( लघुकथा ) - सविता मिश्रा 'अक्षजा'

"मर गया नालायक! देखो तो, कितना खून पीया था। उड़ भी नहीं पाया, जबकि सम्भव है इसने खतरा महसूस कर लिया होगा।"

"अरे मम्मी, आप दुखी नहीं है अपना ही खून देखकर?"

"नहीं, क्योंकि यह अब मेरा खून नहीं था, इसका हो गया था।"

"आप भी न, उस दिन उँगली कटने पर तो आपके आँसू नहीं रुक रहे थे। और आज अपना ही खून देखकर आप खुश हैं।"

''जो मेरा होता है, उसके नष्ट हो जाने पर कष्ट होता है। पर मेरा होकर भी जो मेरा न रहे, तब उसके नष्ट हो जाने पर मन को संतुष्टि होती है, समझा?''

"बस मम्मी, अब यह मत कहने लगिएगा कि यह खून पीने वाला मोटा मच्छर, कोई ठग व्यापारी या नेता है या फिर कोई भ्रष्ट अफसर! और उससे निकला खून, आपके खून पसीने की कमाई! जिसे पचा पाना सबके बस की बात नहीं!"

"मेरा पुत्तर, कितना समझने लगा है मुझे..! छीन-झपटकर कोई कब तक जिंदा रह सकता है भला। पाप का घड़ा एक न एक दिन तो फूटता ही है।"

© सविता मिश्रा 'अक्षजा'


ईमेल-2012.savita.mishra@gmail.com

अक्षजा जी को पढ़ना संवेदना जगाता है और स्पष्टता से भर देता है, आपने अपनी रचनाओं से मानवीय रिश्तों, संघर्षों, विरोधाभासों प्रकाश डालते हुए या कहें की ध्यान खींचते हुए एक शांतिमय और समृद्ध जीवन / दुनिया के लिए तरह तरह की विधाओं में साहित्य रचकर साहित्य कोश में अमूल्य योगदान दिया है, आपने लघुकथा, कहानी, व्यंग्य, छंदमुक्त कविता, पत्र, आलेख, समीक्षा, जापानी-विधा हाइकु-चोका आदि विधाओं में ढेरों रचनाएं साहित्य कोश को अर्पण की हैं, आपकी 'रोशनी के अंकुर' एवं 'टूटती मर्यादा' लघुकथा संग्रह तथा ‘सुधियों के अनुबंध’ कहानी संग्रह के साथ अस्सी के लगभग विभिन्न विधाओं में साझा-संग्रहों में रचनाएँ प्रकाशित हैं और 'खाकीधारी' 2024{लघुकथा संकलन} 'अदृश्य आँसू' 2025 {कहानी संकलन} 'किस्से खाकी के' 2025 {कहानी संकलन} 'उत्तर प्रदेश के कहानीकार' 2025 {कथाकोश} का सम्पादन भी किया, आप लघुकथा/समीक्षा/कहानी/व्यंग्य / कविता विधा में कई बार पुरस्कृत हैं| आदरणीय लेखिका के बारे में और इनकी अन्य रचनाओं, योगदान, सम्प्रतियों के बारे में जानने के लिए यहाँ क्लिक करें|


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संख्या (लघुकथा) - लवकुश कुमार

आलोक और विवेक, शाम को टहलते हुए,

आलोक - यार, विवेक बहुत कहानियाँ लिखी जा रही हैं आजकल, सबको ज्ञान दे ही दोगे लग रहा, बाकी सारे काम बंद कर दिए क्या? और आलोक हंसने लगता है।

विवेक मुस्कुराते हुए- हाँ, आलोक प्रयास तो ऐसा ही है, तुम तो आलोक कहीं डाल नहीं रहे हो, इसीलिए मैं ही ऐसा करने का प्रयास कर रहा हूं। (दोनों हंसने लगते है)

आलोक - अच्छा एक बात बताओ एक दिन में कितनी कहानियाँ लिख सकते हो?

विवेक - (मुस्कुराते हुए) लिखने को तो बहुत सी लिख दूँ, जिन मुद्दों पर लिखना है उनके नाम जेहन में हैं फिर भी अन्य काम भी है और जीविका भी तो चलानी है।

बात को आगे बढ़ाते हुए संयत होकर विवेक कहता है कि लिखने को तो एक दिन में 15 कहानी लिख दूँ अगर इस काम की महत्ता को दर्शाना हो। लेकिन अच्छा प्रदर्शन भी जरूरी है। पर कुछ मोटी बुद्धि के लोग सिर्फ संख्या देखकर ही महत्व समझते है,

©लवकुश कुमार

लेखक भौतिकी में परास्नातक हैं और उनके लेखन का उद्देश्य समाज की उन्नति और बेहतरी के लिए अपने विचार साझा करना है ताकि उत्कृष्टता, अध्ययन और विमर्श को प्रोत्साहित कर देश और समाज के उन्नयन में अपना बेहतर योगदान दिया जा सके, साथ ही वह मानते हैं कि सामाजिक विषयों पर लेखन और चिंतन शिक्षित लोगों का दायित्व है और उन्हें दृढ़ विश्वास है कि स्पष्टता ही मजबूत कदम उठाने मे मदद करती है और इस विश्वास के साथ कि अच्छा साहित्य ही युवाओं को हर तरह से मजबूत करके देश को महाशक्ति और पूर्णतया आत्मनिर्भर बनाने मे बेहतर योगदान दे पाने मे सक्षम करेगा, वह साहित्य अध्ययन को प्रोत्साहित करने को प्रयासरत हैं, 

जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना आपके जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट ।


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