Recent Articles Related To समाज

पितृसत्ता (कविता) - सौम्या

पुरुषों ने नहीं रहने दिया इंसान किसी को 

स्त्री को बनाया देवी कि वो सब सह जाए 

किन्नर में कहा कि देवता वास करते हैं इनके हृदय में 

जिससे इस व्यवस्था में रह सके सिर्फ वहीं इंसान 

और बने रहे अन्य सभी लिंगों के स्वामी 

क्योंकि इंसान बने रहना ही था सबसे अच्छा 

इसीलिए उन्होंने अपने लिए चुना इंसान रहना 

पुरुषत्व पर भी रखा सिर्फ अपना वर्चस्व 

सारे कल्याण के काम खुद ही करने लगे 

स्त्रियों की सुरक्षा से पालन पोषण तक 

उसके तन से लेकर मन तक 

किया अपना ही अधिकार 

पर इस वर्चस्व से सबसे ज्यादा मुसीबत में पड़ा भी पुरुष 

महिला तो दासी बनी ही 

पर पुरुष ने भी महिला को इतना दुर्लभ बनाया 

कि वो भी उसका दास हो गया 

कभी मानसिक तौर पर तो कभी शारीरिक

 

-सौम्या 

बाराबंकी उत्तर प्रदेश 

सौम्या जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं |


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शुभकामनाएं

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सुविधाओं की राह की लंबी डगर! अवलोकन शृंखला | लेख सं - 002

जब भी किसी से बात होती है कि अमुक क्षेत्र में कोई सुविधा नहीं है, या जनता को किसी तरह की असुविधा हो रही है—तो अक्सर तुरंत कई सुझाव आने लगते हैं:

“इसे ऐसे कर देना चाहिए था…”
“वैसे कर देते तो समस्या ही नहीं होती…”

ऐसी बातें सुनकर कभी-कभी लगता है कि लोगों की नज़र में उस काम के लिए जिम्मेदार व्यक्ति को शायद तरीका ही नहीं पता!

लेकिन मुझे बात कुछ और लगती है।

मैं अभी इसके कारणों में नहीं जाना चाहता। बस एक सवाल की तरफ ध्यान खींचना चाहता हूँ—

जब एक आम आदमी के पास किसी काम को पूरा करने के लिए कई तरह के उपाय, तरकीबें और रास्ते हो सकते हैं, तो वही रास्ते उन लोगों को क्यों नहीं सूझते जिन्हें उस काम को करने की जिम्मेदारी दी गई है?

और अगर सचमुच कोई रास्ता नहीं सूझ रहा, तो फिर उस क्षेत्र की जनता से ही क्यों न पूछ लिया जाए?

आख़िर जिस व्यक्ति को रोज़ उस असुविधा से गुजरना पड़ रहा है, संभव है उसके पास समस्या का कोई सरल और व्यावहारिक समाधान हो।

यहीं से एक असहज सवाल खड़ा होता है—

कहीं ऐसा तो नहीं कि बहाने ऊपर की बात हों, और फिलहाल सुविधा को पंक्ति में खड़े आख़िरी इंसान तक पहुँचाने की नीयत ही नीचे हो?

क्योंकि किसी सुविधा का होना और उसका वास्तव में अंतिम व्यक्ति तक पहुँच जाना, दो बिल्कुल अलग बातें हैं और इसमें समय और नियत दोनों चाहिए|

-लवकुश कुमार  

लेखक भौतिकी में परास्नातक हैं और अपने कार्यालयी दायित्व से इत्तर संवेदनशीलता के प्रवाह हेतु साहित्य के प्रचार प्रसार हेतु प्रयासरत हैं| 

जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना अपने जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट। वेबसाइट के उद्देश्य के बारे में जानने के लिए यहां क्लिक करें।


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रचनात्मकता अपेक्षाकृत कम लोगों में क्यों दिखती है? अवलोकन शृंखला | लेख सं - 001

अगर आपको भी लगता है कि हमारे आसपास की चीज़ें बहुत ज़्यादा एक जैसी होती जा रही हैं—वही विचार, वही तरीके, वही पसंद और वही तरह के काम—तो एक सवाल स्वाभाविक है:

आख़िर रचनात्मकता या कुछ नया करने की कोशिश हमें इतनी कम क्यों दिखाई देती है?

इसका एक कारण शायद यह है कि हम बतौर इंसान भीड़ में रहना सुरक्षित महसूस करते हैं। वही काम करना आसान लगता है, जो दूसरे कर रहे हैं। जिस रास्ते पर पहले से लोग चल रहे हों, वहाँ जोखिम कम महसूस होता है और समाज से validation भी जल्दी मिल जाता है।

इसके उलट, कुछ नया करने का मतलब अक्सर अनिश्चितता को स्वीकार करना होता है। आपको यह भी पता नहीं होता कि लोग आपके विचार को समझेंगे या नहीं, पसंद करेंगे या उसका मज़ाक उड़ाएँगे।

विडंबना यह है कि इसकी शुरुआत कई बार समाज से भी पहले हमारे अपने परिवारों से होती है। अगर परिवार में कोई व्यक्ति सामान्य रास्ते से अलग कुछ करने लगे, तो उसे प्रोत्साहित करने के बजाय अक्सर सवाल, संदेह या मज़ाक का सामना करना पड़ता है—
“इससे क्या मिलेगा?”
“लोग क्या कहेंगे?”
“सब यही कर रहे हैं, तुम भी वही करो।”

शायद इसी वजह से बहुत-से नए विचार जन्म लेने से पहले ही दब जाते हैं।

रचनात्मकता केवल प्रतिभा का मामला नहीं है। इसके लिए अलग सोचने की आज़ादी, असफल होने की गुंजाइश और थोड़ी-सी सामाजिक असहमति सहने का साहस भी चाहिए।

और शायद इसी कारण रचनात्मक लोग कम नहीं होते—बस उनमें से बहुत-से लोग अपनी रचनात्मकता को सुरक्षित रहने के लिए छिपा लेते हैं।

-लवकुश कुमार  

लेखक भौतिकी में परास्नातक हैं और अपने कार्यालयी दायित्व से इत्तर संवेदनशीलता के प्रवाह हेतु साहित्य के प्रचार प्रसार हेतु प्रयासरत हैं| 

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शिक्षा क्यों जरूरी है? (शिक्षा में समग्रता) - विजयीप्रिया शर्मा

आइए एक कहानी से शुरू करते हैं

एक आदमी सड़क के किनारे समोंसे बेचा करता था। अनपढ़ होने की वजह से अखबार नहीं पड़ता था। ऊंचा सुनने की वजह से रेडियो नहीं सुनता था, और आंखें कमजोर होने की वजह से उसने कभी टेलीविजन भी नहीं देखा था। इसके बावजूद भी वह काफी समोसे बेच लेता था। उसकी बिक्री में लगातार बढ़ोतरी होती गई। उसने और ज्यादा आलू खरीदना शुरू किया, साथ ही पहले वाले चूल्हे से बड़ा और बढ़िया चूल्हा खरीद कर ले आया। उसका व्यापार लगातार बढ़ रहा था, तभी हाल में ही कॉलेज से (बी.ए )की डिग्री हासिल कर चुका उसका बेटा पिता का हाथ बंटाने के लिए चला आया। उसके बाद एक अजीबोगरीब  घटना घटी। बेटे ने उसे आदमी से पूछा,"पिता जी क्या आपको मालूम है कि हम लोग एक बड़ी मंदी का शिकार बनने वाले हैं?"

पिता ने जवाब दिया,"नहीं, लेकिन मुझे उसके बारे में बताओ।" बेटे ने कहा-"अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों बड़ी गंभीर हैं। घरेलू हालात तो और भी बुरे हैं। हमें आने वाले बुरे हालात का सामना करने के लिए तैयार हो जाना चाहिए।" उस आदमी ने सोचा कि उसका बेटा कॉलेज जा चुका है, अखबार पढ़ता है, और रेडियो सुनता है, इसलिए उसकी राय को हल्के ढंग से नहीं लेना चाहिए। दूसरे दिन से उसने आलू की खरीद कम कर दी, और अपना साइन बोर्ड नीचे उतार दिया। उसका जोश खत्म हो चुका था। जल्द ही उसी दुकान पर आने वालों की तादाद घटने लगी,और उसकी बिक्री तेजी से गिरने लगी । पिता ने अपने बेटे से कहा,"तुम सही कह रहे थे। हम लोग मंदी के दौर से गुजर रहे हैं। मुझे खुशी है कि तुमने वक्त से पहले ही सचेत कर दिया।"

इस कहानी से हम कुछ सीख ले सकते हैं:

1. एक इंसान ज्यादा जानकार होने के बावजूद गलत फैसला कर सकता है।

2. हम अपनी सीमित समझ के मुताबिक, खुद को तुष्ट करने वाली भविष्यवाणी कर देते हैं।

 

शिक्षित होने का मतलब क्या है ?

सबसे बड़ी बात यह है ,कि जो लोग सफलता मिलने पर बिगड़ते नहीं, जो अपनी असलियत से मुंह मोड़ते नहीं साथ ही बुद्धिमानी, गंभीरता तथा दृढ़ता के साथ जमीन पर पैर जमाए रखते हैं। तुक्के से मिली अच्छी चीजों पर खुश होने की बजाए, मेहनत और अभ्यास से अपनी आंतरिक उच्च संभावनाओं की ओर अग्रसर होते हुये, काबिलियत को विकसित करते हुये और अध्ययन/अवलोकन जनित बुद्धि से प्राप्त कामयाबियों पर खुश होते हैं। खुश होने की ऐसी प्रवृत्ति उनमें सहज होती है|

"शिक्षित व्यक्ति एक दीपक कि तरह होता है जिस प्रकार एक दीपक एक ही स्थान पर रहकर चारों तरफ उजाला फैलाता है, ठीक उसी प्रकार एक शिक्षित व्यक्ति होता है, एक सही अर्थों में शिक्षित व्यक्ति भी ज्ञान रूपी दीपक से चारों तरफ उजाला फैलाना चाहता है।

शिक्षा का मतलब केवल किताबों से प्राप्त ज्ञान नहीं, बल्कि  शिक्षा तो वह है, जो व्यक्ति को जीवन जीना सिखाए।

 

  • शिक्षा केवल किताबी ज्ञान नहीं, शिक्षा केवल पढ़ने- लिखने तक सीमित नहीं ,बल्कि यह व्यक्ति के विचारों व व्यक्तित्व को निखारती है।
  • एक शिक्षित व्यक्ति उचित फैसला स्वयं ले सकता है।
  • शिक्षा में जो शक्ति है वह किसी कीमती हीरे में नहीं है।
  • किसी भी देश/समाज के विकास के लिए शिक्षा अत्यंत आवश्यक पहलू है।
  • शिक्षा  हमारे जीवन की सबसे बड़ी पूंजी है।
  • जो व्यक्ति शिक्षा के माध्यम से स्वयं को निखारता है, वह व्यक्ति एक दिन समाज को गौरवशाली  बनाता है, घर के हालात हो ,समाज में हो रहे अत्याचार हो, गरीबों के अधिकारों का हनन हो, स्वयं को बदलने का आयाम हो, इन सभी के निमित्त  शिक्षा एक प्रभावशाली/शक्तिशाली साधन है। 
  • "थोड़े में कहे तो सही अर्थों में पढ़े-लिखे वे लोग हैं, जो किसी भी हालत में साहस और अक्लमंदी से काम तय करते हैं।
  • शिक्षा हमारी जिंदगी का सबसे कीमती हिस्सा है।

अगर कोई व्यक्ति मूर्खता के बजाय समझदारी, बुराई के जगह अच्छाई, और असभ्यता के बजाए सद्गुण को चुनता है, वास्तविक रूप से ऐसे व्यक्ति ही शिक्षित होते हैं।"

            अज्ञान का तिमिर मिटाकर,

           ज्ञान का दीप जलाती शिक्षा। 

           जीवन का सही अर्थ बताकर, 

           जीवन जीना सिखाती शिक्षा। 

           पत्थर को भी मूरत गढ़ती,

           अनपढ़ को आकार देती शिक्षा।

           हर मुश्किल को आसान बनाती, 

           बुद्धि को विस्तार है देती शिक्षा।

           मानवता का पाठ पढ़ाती,

           पंख देती  है ऊंचाइयों को, 

           मंजिल तक पहुंचाती शिक्षा।

           यह केवल अच्छे ज्ञान नहीं,

           यह तो जीवन का आधार है ,

           संस्कारों की मधुर बगिया,

           सदाचार का उपहार है।

इसी लेख के साथ कुछ उक्तियों की तरफ ध्यान दे लिया जाए

  1. स्वामी विवेकानन्द
    "शिक्षा मनुष्य में निहित पूर्णता की अभिव्यक्ति है।"

  2. महात्मा गांधी
    "शिक्षा से मेरा अभिप्राय बालक और मनुष्य के शरीर, मन तथा आत्मा का सर्वांगीण विकास है।"

  3. रवीन्द्रनाथ ठाकुर
    "सर्वोच्च शिक्षा वह है जो हमें केवल जानकारी ही नहीं देती, बल्कि हमारे जीवन को समस्त अस्तित्व के साथ सामंजस्य में लाती है।"

  4. डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन
    "शिक्षा का उद्देश्य केवल जानकारी देना नहीं, बल्कि स्वतंत्र और रचनात्मक चिंतन का विकास करना है।"

  5. नेल्सन मंडेला
    "शिक्षा सबसे शक्तिशाली हथियार है, जिसका उपयोग करके आप दुनिया को बदल सकते हैं।"

  6. अरस्तू
    "हृदय को शिक्षित किए बिना बुद्धि को शिक्षित करना, शिक्षा नहीं है।"

  7. अल्बर्ट आइंस्टीन
    "शिक्षा वह है जो विद्यालय में सीखी हुई बातों को भूल जाने के बाद भी हमारे साथ रह जाती है।"

  8. जॉन ड्यूई
    "शिक्षा जीवन की तैयारी नहीं है; शिक्षा स्वयं जीवन है।"

  9. मारिया मोंटेसरी
    "शिक्षा का उद्देश्य केवल ज्ञान देना नहीं, बल्कि बच्चे की स्वाभाविक क्षमताओं का विकास करना है।"

  10. डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम
    "शिक्षा रचनात्मकता को जन्म देती है, रचनात्मकता सोच को, सोच ज्ञान को और ज्ञान आपको महान बनाता है।

चलते चलते दो बातें और 

शिक्षा का उद्देश्य परीक्षा में अंक प्राप्त करना नहीं, बल्कि जीवन की चुनौतियों का सामना करने योग्य बनना है।

वह शिक्षा अधूरी है जो मनुष्य में करुणा, नैतिकता और सामाजिक उत्तरदायित्व का विकास न करे।

 

-विजयी प्रिया शर्मा 

स्नातक (बी .ए ) लखनऊ विश्वविद्यालय

ईमेल :-priyasham515@gmail.com


विजयीप्रिया जी स्नातक में मानविकी की छात्रा हैं और सामाजिक विषयों पर लिखती रहती हैं, वह वर्तमान में लखनऊ विश्वविद्यालय में अध्ययनरत हैं और पढ़ने लिखने की संस्कृति को बढ़ाने के लिए प्रयासरत हैं| उनका मानना है कि पढ़ने लिखने वालों को एक मंच पर लाकर हम अपने विचार और जीवन/दुनिया को लेकर अपने अवलोकन ज्यादा से ज्यादा लोगों से साझा कर पाएंगे और इस तरह दुनिया और स्वयं को लेकर एक व्यापक दृष्टिकोण बना पाएंगे, महान लेखिका महादेवी वर्मा जी की रचनाएँ और व्यक्तित्व उन्हे खास पसंद हैं|


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आधुनिक समाज की सच्चाई (कविता) - विजयीप्रिया शर्मा

हम इतने सभ्य हो चुके हैं,

इतने सभ्य कि अब इंसान इंसान को देखकर मुस्कुराना भूल रहा है,

और कुछ यूं हुआ है

चारों तरफ उजाला है, पर अधिकतर अपनी अपनी स्क्रीन के अंधेरे में डूबे हुए हैं।

अंगूठे चल रहे हैं लगातार......

लाइक शेयर और स्क्रोल की अंधी दौड़ में, हम औंधे मुंह व्यस्त हैं फोन चलाने में,

बिना यह जाने कि .....

सामने बैठी बूढ़ी आंखें बात करना चाहती हैं,

वो अपना बुढ़ापा खोना चाहती हैं,

हमारी खिलती जवानी के साथ, 

पर हम रील के पंद्रह सेकंड के क्षणिक सुख में व्यस्त हैं।

रिश्तों के धागे अब वाई-फाई से जुड़ते हैं,

नेटवर्क कमजोर होते ही टूट जाते हैं। 

हजारों फ्रेंड्स है वर्चुअल दुनिया में, 

पर आधी रात को उदास दिल एक कंधा, दिल की सुनने वाला एक इंसान ढूंढने के लिए तरस जाता है।

यहां मशीनें इंसानों की तरह सोच रही है,

और इंसान रोबोट की तरह बिना सोचे जी रहा है। 

यह हमारी सबसे बड़ी प्रगति है। 

हमने चांद पर कदम रख दिया, 

पर जमीन पर अपनों का हाथ छोड़ दिया।

हम चालाक हो गए हैं। 

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से बात कर लेते हैं,

मगर पड़ोस के घर का हाल नहीं जानते हैं।

हम पत्थरों के दौर से निकल कर कांच और सिलिकॉन के नए पाषाण युग में आ खड़े हुए हैं,

पर उनमें अब कोई आहट नहीं होती है।

यह तरक्की का शिकार है यह संवेदनाओं का पतन?

हमारा चरित्र अब प्रोफाइल पिक्चर करती है,

और हमारी योग्यता.....

लाइक और कॉमेंट्स की गिनती।

 

- विजयीप्रिया शर्मा 


विजयीप्रिया जी स्नातक में मानविकी की छात्रा हैं और सामाजिक विषयों पर लिखती रहती हैं, वह वर्तमान में लखनऊ विश्वविद्यालय में अध्ययनरत हैं और पढ़ने लिखने की संस्कृति को बढ़ाने के लिए प्रयासरत हैं| उनका मानना है कि पढ़ने लिखने वालों को एक मंच पर लाकर हम अपने विचार और जीवन/दुनिया को लेकर अपने अवलोकन ज्यादा से ज्यादा लोगों से साझा कर पाएंगे और इस तरह दुनिया और स्वयं को लेकर एक व्यापक दृष्टिकोण बना पाएंगे, महान लेखिका महादेवी वर्मा जी की रचनाएँ और व्यक्तित्व उन्हे खास पसंद हैं|


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अधूरी उड़ान (कहानी): स्त्री विमर्श - विशाल चंद

"चेली, अगले रविवार को लोग तुझे देखने आ रहे हैं।"

रसोई में आटा गूँधते हुए माधवी के हाथ एक पल के लिए रुक गए। उसने धीरे से ईजा की ओर देखा। ईजा की नज़रें झुकी हुई थीं, जैसे यह बात कहते हुए वे स्वयं भी भीतर से टूट रही हों।

"लेकिन ईजा... मैं अभी पढ़ना चाहती हूँ।" 

ईजा ने बस इतना कहा—"सब ठीक हो जाएगा चेली... शादी के बाद भी पढ़ाई कर लेना।"

माधवी हल्का-सा मुस्कुराई। वह जानती थी कि यह मुस्कान केवल उसके चेहरे पर थी, मन में नहीं।

 

उस छोटे-से पहाड़ी गाँव में लड़कियों के सपनों की उम्र अक्सर बारहवीं की परीक्षा तक ही मानी जाती थी।

कुछ ही दिन पहले बोर्ड परीक्षा का परिणाम आया था।

"रिजल्ट आ गया?" पड़ोस की चाची ने आँगन से आवाज़ लगाई।

 

माधवी ने धीरे से सिर झुका दिया।

"एक विषय में रह गई..."

 

बस इतना सुनना था कि घर का माहौल बदल गया। ईजा (मां) चुप रहीं। बौजू(पिताजी) देर तक कुछ नहीं बोले। लेकिन शाम होते-होते अम्मा की आवाज़ पूरे आँगन में गूँज उठी— "अब पढ़ाई-लिखाई बहुत हो गई। चेली जवान हो गई है। कोई अच्छा लड़का देखो। पढ़-लिखकर कौन-सा कलेक्टर बनना है?"

 

उस दिन माधवी ने पहली बार महसूस किया कि परीक्षा में असफल होने से भी बड़ा डर उसके सामने खड़ा है—कहीं उसकी शादी तय न कर दी जाए और वही हुआ।

 

अगले ही सप्ताह दो रिश्तेदार घर आए। उनके हाथ में मिठाई का डिब्बा था और बातों में एक सरकारी नौकरी में कार्यरत लड़के का ज़िक्र। किसी ने माधवी से नहीं पूछा कि वह क्या चाहती है। उससे केवल इतना कहा गया—

"चेली, मेहमानों के लिए चाय बना दे।"

 

चाय की ट्रे लेकर जब वह कमरे में पहुँची तो उसे लगा जैसे वहाँ उसकी नहीं। उसके भविष्य की कीमत तय की जा रही हो।

 

रिश्तेदार जाते-जाते बौजू से कह गए— "ऐसे रिश्ते बार-बार नहीं मिलते। फ़ौज में नौकरी है। चेली की ज़िंदगी बन जाएगी।"

 

अम्मा कई महीनों से एक ही बात दोहराती थीं— "मरने से पहले अपनी पोती का ब्याह अपनी आँखों से देख लूँ, फिर भगवान जब चाहे बुला ले।" बौजू चुप रहते। ईजा की आँखें भर आतीं और माधवी... वह बस सब सुनती रहती।

 

वह पढ़ना चाहती थी। उसका सपना था कि वह अध्यापिका बने। उसे लगता था कि शिक्षा केवल नौकरी पाने का साधन नहीं बल्कि अपने पैरों पर खड़े होने और अपने जीवन के फैसले स्वयं लेने की ताक़त भी देती है। लेकिन गाँव में आज भी यह मान लिया जाता था कि चेली की सबसे बड़ी मंज़िल उसकी शादी है।

 

कुछ दिनों बाद बौजू ने धीरे से कहा— "माधवी, लड़का अच्छा है। सरकारी नौकरी करता है। हमें लगता है कि यही ठीक रहेगा।"

 

माधवी बहुत देर तक खिड़की से पहाड़ों को देखती रही। सामने दूर तक फैले चीड़ और बांज के जंगल हवा के साथ झूम रहे थे। उसे लगा जैसे पहाड़ों के ऊपर उड़ते पक्षी उससे पूछ रहे हों—"क्या सपनों की भी कोई उम्र होती है?"

 

उसने चाहा कि एक बार कह दे— "मैं अभी शादी नहीं करना चाहती। मैं पढ़ना चाहती हूँ।"लेकिन शब्द गले में ही अटक गए। शायद इसलिए कि वह जानती थी—उसके एक "ना" के सामने अम्मा की आख़िरी इच्छा, ईजा की मजबूरियाँ, बौजू की सामाजिक चिंता और रिश्तेदारों की सलाह खड़ी थी।

 

धीरे-धीरे शादी की तैयारियाँ शुरू हो गईं। कॉलेज की फीस के लिए जो पैसे उसने बचाकर रखे थे, उन्हीं पैसों से उसके लिए शादी की साड़ी खरीदी गई।

 

रिश्तेदार आते और कहते— "चेली भाग्यशाली है। फ़ौजी लड़का मिला है।" अब इससे अच्छा रिश्ता कहाँ मिलेगा?

 

हर कोई उसकी किस्मत की बातें कर रहा था, लेकिन किसी ने उसके सपनों के बारे में नहीं पूछा। 

शादी का दिन आ गया। मंडप में मंत्र गूँज रहे थे। अग्नि साक्षी थी। रिश्तेदार मुस्कुरा रहे थे। तभी उसकी दोस्त लक्ष्मी ने पूछा— तू इस विवाह से खुश तो हैं न ? 

 

माधवी ने सामने देखा। अम्मा के चेहरे पर संतोष था।

ईजा की आँखों में आँसू थे।

बौजू के चेहरे पर वर्षों की चिंता उतरती दिखाई दे रही थी।

 

उसने धीमे से कहा— "हाँ..."

 

उस एक शब्द के साथ सबके चेहरे खिल उठे। लेकिन किसी ने यह जानने की कोशिश नहीं की कि वह "हाँ" उसकी इच्छा थी या परिस्थितियों के आगे उसका मौन समर्पण।

 

समय बीत गया।

 

एक दिन माधवी अपनी छोटी-सी चेली को स्कूल छोड़ने जा रही थी। पहाड़ की वही पगडंडी थी, वही चीड़ के पेड़ और वही सुबह की धूप।

 

रास्ते में चेली ने मासूमियत से पूछा— "ईजा, मेरी शादी भी आप लोग ही तय करोगे?"

 

माधवी कुछ पल के लिए ठिठक गई। उसने अपनी चेली का हाथ थामा और मुस्कुराकर कहा— "नहीं चेली। शादी तेरी होगी, इसलिए फैसला भी तेरा होगा। हमारा काम तुझे समझाना होगा, तेरे लिए फैसला लेना नहीं।"

 

चेली मुस्कुरा दी और आगे दौड़ गई।

 

माधवी वहीं खड़ी पहाड़ों की ओर देखने लगी। उसे लगा कि उसकी अपनी उड़ान भले ही अधूरी रह गई हो, लेकिन अब उसकी चेली के पंख कोई नहीं काट पाएगा

 

शायद बदलाव ऐसे ही शुरू होता है—जब एक पीढ़ी अपने हिस्से का दर्द अगली पीढ़ी को विरासत में देने से इनकार कर देती है।

 

विशाल चन्द  @reading_owl.3

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 लेखक की टिप्पणी

 

यह कहानी मेरे द्वारा वर्ष 2021 में लिखे गए ब्लॉग लेख "लड़की, विवाह और सहमति" से प्रेरित है। उस समय उठाए गए सामाजिक प्रश्नों को इस कहानी के माध्यम से एक नए साहित्यिक रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है। कहानी के पात्र और घटनाएँ काल्पनिक हैं, किन्तु इसके सामाजिक संदर्भ वास्तविक अनुभवों और अवलोकनों से जुड़े हैं।

यदि यह कहानी पाठकों को विवाह में सहमति, शिक्षा और बेटियों के सपनों पर एक बार फिर सोचने के लिए प्रेरित करे, तो इसका उद्देश्य सार्थक होगा।


विशाल चन्द जी समाजशास्त्र के शोधार्थी, पाठक और संवेदनशील शिक्षार्थी हैं। नवीन ज्ञान अर्जन और सतत सीखना आपके व्यक्तित्व का अभिन्न हिस्सा है। पुस्तकों का पठन और संग्रहण आपको विशेष प्रिय है।

आपके भीतर एक घुमक्कड़ चेतना भी सक्रिय है, जो आपको नए लोगों, स्थानों और अनुभवों से जोड़ती रहती है। बागवानी आपके लिए प्रकृति से संवाद का माध्यम है।

आप समाज को अपने स्वतंत्र दृष्टिकोण से देखने और विभिन्न समूहों के साथ मिलकर सामाजिक दायित्वों के निर्वहन को निरंतर प्रयासरत रहते हैं।


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ताल :फिल्म समीक्षा - सौम्या गुप्ता

हमारे समाज में महिलाओं की स्थिति के बारे में बहुत कुछ कहा जाता है, बातें की जाती हैं पर एक समय तक एक ऐसा समूह जिसे न स्त्री माना जाता है न पुरुष अर्थात् किन्नर उनके विषय में उस स्तर पर न समाज में कुछ बात हुयी और न ही कानून में।

      हमें संविधान में समानता का अधिकार दिया गया पर ये कैसी समानता थी जिसमें एक दौर तक पूरे एक तबके को डेथ सर्टिफिकेट लेने के लिए लम्बा संघर्ष करना पड़ा|

गौरी सावंत जी के जीवन पर बनी फिल्म ताली संवेदनाओं और जोश का अद्‌भुत मिश्रण है। कैसे एक किन्नर अपनी कम्युनिटी के लिए लड़ती है। जिसे अपने घर से निकलना पड़ता है क्योंकि उसके पिता उसकी अलग पहचान को समाज के सामने स्वीकार नहीं कर पा रहे थे।

गणेश जिसे पता था कि गौरी बनने का सफर कितना दर्द देने वाला हो सकता है फिर भी उसने यह सफर तय किया। खाने के लिए और रहने के लिए संघर्ष किया।

अपनी कम्युनिटी में पूरी तरह उसे अपना समझा जाने लगे इसके लिए उसने जान जोखिम में डालकर ऑपरेशन कराया। फिर उसकी ही कम्युनिटी का एक मेंबर उसकी जान लेना चाहता था क्योंकि वो एक शिक्षिका बन गई थी।

गौरी जी ने किन्नर समुदाय के लिए ही नहीं काम नहीं किया, बल्कि वेश्यावृत्ति से जुड़ी महिलाओं के बच्चों को भी अपना माना। गणेश को गौरी बनना था क्योंकि उसे माँ बनना अच्छा लगता था।

गौरी जी कहती हैं कि इस देश में यशोदा की बहुत जरूरत है। उन्होंने शिक्षा भी ली और शिक्षिका भी बनीं।

शिक्षिका बनने तक का सफर भी आसान नहीं रहा होगा। वो ऐसी शिक्षिका बनी कि संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा इन्हें सम्मानित किया गया। उनकी एक दोस्त की जान जाने पर शरीर को नीचे रखने पर उन्होंने धरना प्रदर्शन कर दिया | साम-दाम-दण्ड की नीति के द्वारा उनको पूरा सम्मान दिलाया।

सुप्रीम कोर्ट में अपनी कम्युनिटी को तीसरे लिंग की पहचान दिलाई

उन्होंने राह के काले पत्थरों या मुँह पर पड़ी काली स्याही से रुकना सीखा ही नहीं था। इसीलिए तो चाहे अपनों का साथ छूटना हो या इस समुदाय के साथ होने वाले दुर्व्यवहार का पता चलना हो, ऑपरेशन के लिए जान जोखिम में डालना हो या अपने ही लोगों द्वारा मारने कोशिश, उन्होंने रुकना नहीं आगे बढ़ना स्वीकार किया।

ताली बजाना नहीं, बजवाना स्वीकार किया

हमें इस मूवी को देखना चाहिए और प्रत्येक समुदाय के प्रति सद्भाव रखना चाहिए आखिर हम सभी में ईश्वर का रूप भिन्न-भिन्न रूपों में साकार होता है। 

           हर समुदाय में कुछ कमियां होती है। हमें जरूरत है कि हम उसकी कमियों को समझें और हर समुदाय को समाज की मुख्यधारा में शामिल करें| जब तक हम उन्हें बराबर का अधिकार नहीं देते, शिक्षा और स्वास्थ्य के समान अवसर नहीं देते, हमें कोई हक नहीं है कि हम उनकी बुनियादी जरूरतों के लिए किए जाने वाले कामों के लिए उन्हें अपमानित करे। 

 

-सौम्या गुप्ता 

बाराबंकी, उत्तर प्रदेश 


सौम्या जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं |


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बदलतीं स्त्रियाँ (कविता)- सौम्या

प्रस्तुत है, कवयित्री सौम्या जी की एक कविता, जो महिलाओं की बदलते हुए सामाजिक भूमिकाओं के बारे में है। यह प्रश्न उठाती  है कि क्या समाज इस बदलाव के लिए तैयार है, और यह परंपरागत मान्यताओं और पितृसत्तात्मक अपेक्षाओं पर भी सवाल उठाती है।

 

मैंने सुना है एक प्रश्न जिसमें पूछा जाता है

कि जब आज स्त्रियां बदल रही हैं, 

वो अब दूसरों से पहले स्वयं को चुन रही हैं 

वो अब रसोईघर से पहले अपने अन्य हुनर को चुन रही हैं 

अब वो खुद का अलग अस्तित्व भी ढूंढ रही हैं 

बेबाक होकर बोल रही हैं, खेल रही है, उड़ भी रही हैं 

क्या समाज इस परिवर्तन के लिए तैयार है? 

तो मुझे ऐसा लगता है, कि नहीं

समाज का एक वर्ग आज भी इस परिवर्तन को नहीं देखना चाहता 

वह चाहता है वही पुरानी रुढियों में लिपटी स्त्री 

जिसके मुंह में न जुबान हो और न दिमाग़ में अपने कोई विचार 

पिता, पति और पुत्र पर निर्भर स्त्री 

जो एक कदम भी बिना किसी के सहारे के न चल सके 

जो हमेशा चले पुरुषों से एक कदम पीछे 

जो समर्पित कर दे अपने जीवन का एक-एक पल 

पुरुषों के लिए 

चाहे वह पुरुष दो पल भी न निकाल सके औरत के लिए 

चाहे वह पुरुष, औरत का सम्मान भी करना न जानता हो 

पर पुरुषों को आज भी चाहिए गूंगी गुड़िया|

 

-सौम्या 

बाराबंकी, उत्तर प्रदेश 


सौम्या जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं |


आइए कुछ प्रश्नों के माध्यम से कविता के निहित अर्थ को अच्छे से समझने का प्रयास करते हैं:

इस कविता  में महिलाओं के विषय में क्या विचार व्यक्त किए गए हैं?

इस कविता  में महिलाओं के बदलते सामाजिक भूमिकाओं और स्वतंत्रता की खोज पर विचार व्यक्त किए गए हैं। यह उन पुरानी परंपराओं पर सवाल उठाता है जो महिलाओं को पुरुषों पर निर्भर रहने और खुद को सीमित करने के लिए मजबूर करती हैं। कविता  में इस बात पर भी जोर दिया गया है कि समाज इस बदलाव के लिए तैयार नहीं है और अब भी कुछ लोग महिलाओं को पुरानी रूढ़ियों में देखना चाहते हैं।

इस कविता में समाज के प्रति क्या सवाल उठाया गया है?

इस कविता में समाज से यह सवाल पूछा गया है कि क्या वह महिलाओं के इस बदलाव को स्वीकार करने के लिए तैयार है। यह सवाल समाज की मानसिकता और महिलाओं के प्रति उसके दृष्टिकोण पर प्रकाश डालता है। कविता में इस बात पर जोर दिया गया है कि समाज का एक वर्ग अब भी महिलाओं को पुरानी भूमिकाओं में देखना चाहता है, जो उनके विकास और स्वतंत्रता में बाधा डालता है।

कवयित्री  महिलाओं के लिए किस प्रकार की स्वतंत्रता की वकालत करती है?

कवयित्री महिलाओं के लिए एक ऐसी स्वतंत्रता की वकालत करती  है जिसमें वे अपनी पसंद खुद कर सकें, अपने काम को चुन सकें, और एक अलग अस्तित्व ढूंढ सकें। यह स्वतंत्रता उन्हें बेबाक होकर बोलने, खेलने और उड़ने का अधिकार देती है, जिसका अर्थ है कि वे बिना किसी डर के अपनी इच्छाओं और सपनों को पूरा कर सकें।

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गलत के साथ खड़े होकर सही की उम्मीद! (पुनर्विचार) - सोनम वर्मा

यह लेख पढ़ते समय यदि आपको असहजता महसूस हो, तो यह असहजता व्यर्थ नहीं है, यह वही बेचैनी है, जो तब होती है जब कोई हमें आईना दिखा देता है।

हम अक्सर समाज, व्यवस्था और लोगों को दोष देते हैं, पर यह देखने से बचते हैं कि कहीं हम स्वयं ही उस गलत का हिस्सा तो नहीं बन रहे, जिसका रोना रोज़ रोते हैं।दुनिया ऐसे लोगों से भरी पडी है जो वही पढ़ते हैं जो उन्हें सोचने से बचाए, वही सुनते हैं जो उन्हें हँसाकर टाल दे और वही देखते हैं जो उन्हें ज़िम्मेदारी से दूर रखे। फिर भी हम उम्मीद करते हैं कि समाज बदल जाए, विचार ऊँचे हो जाएँ और लोग ईमानदार बन जाएँ। यह कैसी उम्मीद है, जो गलत को ताकत देकर सही से की जाती है?

जो लोग सच बोलते हैं, कठिन सवाल उठाते हैं और हमारी सुविधाजनक सोच को चुनौती देते हैं, उन्हें हम अनदेखा कर देते हैं। उन्हें उबाऊ, नकारात्मक या अव्यावहारिक कहकर किनारे कर दिया जाता है, पर जो लोग हमें बहलाते हैं, हमारी सोच को सुन्न करते हैं और भीड़ के स्वाद के अनुसार परोसते हैं, उन्हें हम सर आँखों पर बिठा लेते हैं। क्या यह चयन हमारी मानसिकता को उजागर नहीं करता?

हम शिकायत करते हैं कि आज कोई अच्छा नहीं लिखता, कोई ईमानदार नहीं रहा और कोई बदलाव नहीं चाहता। जबकी इसके ही समान्तर एक और सच्चाई यह है कि जब कोई सच में ईमानदारी से लिखता है या बदलाव की बात करता है, तो उसे पढने वालों कि संख्या कम ही मिलती है, क्योंकि ऐसा लेखन हमें कठघरे में खड़ा करता है, और खुद से सवाल करना हमें सबसे ज़्यादा असहज करता है।

हम गलत लोगों से सही काम की उम्मीद इसलिए करते हैं क्योंकि यह आसान है। खुद खड़े होना कठिन है, खुद बोलना जोखिम भरा है और खुद कुछ अलग करना असुविधाजनक है। इसलिए हम भीड़ में सुरक्षित रहना पसंद करते हैं।

वही भीड़ जो गलत को लोकप्रिय बना सकती है और फिर कहती है कि नेता खराब हैं, लेखक बिक गए हैं या व्यवस्था में खामियां आ गई हैं|

व्यवस्था की खामियों की तरफ इशारा करने वाले लोगों में अधिकतर, उसी व्यवस्था को रोज़ मज़बूत भी तो कर रहे हैं!

"हम जिन विचारों को समर्थन देते हैं, जिन लोगों को आगे बढ़ाते हैं और जिन बातों पर चुप रहते हैं, वही समाज की दिशा तय करती हैं।"

फिर भी हम अपने हिस्से की ज़िम्मेदारी स्वीकार करने से बचते हैं।

हम दोहरे मानक वाला इंसान नहीं कहलाना चाहते, पर सच यह है कि हम में से ज्यादातर सुविधावादी हो चुके हैं। और सुविधावाद धीरे-धीरे समाज की आत्मा को खोखला कर देता है। अमूमन लोग सही का साथ तभी देते हैं, जब उसमें हमें कोई असुविधा न हो।

यदि सच में बदलाव चाहिए, तो पहले यह देखना होगा कि हम किसके साथ खड़े हैं, किसे पढ़ रहे हैं और किस चुप्पी को हम समझदारी समझ रहे हैं।

क्योंकि गलत का साथ देकर सही की उम्मीद करना, समाज के साथ किया गया सबसे बड़ा छल है।

यदि यह लेख आपको चुभा हो, तो इसे नज़र अंदाज़ मत कीजिए, संभव है, यही चुभन उस बदलाव की शुरुआत हो, जिसकी बात हम हमेशा दूसरों से करते आए हैं।

- सोनम वर्मा

सीतापुर, उत्तर प्रदेश


उदीयमान लेखिका एवं कवयित्री सोनम वर्मा जी, इतिहास, राजनीति विज्ञान एवं अर्थशास्त्र विषयों में स्नातक हैं और इतिहास विषय में स्नातकोत्तर| शैक्षिक कार्यों के उद्देश्य हेतु बी.एड. किया  तथा वर्तमान में एम.एड. में अध्ययनरत हैं|

आपको सामाजिक जागरूकता से संबंधित लेखन में विशेष रुचि है| सामाजिक सरोकारों के साथ ही शैक्षिक एवं मानवीय विषयों पर लेख एवं कविताएँ लिखना आप अपना शैक्षिक दायित्व समझती हैं|


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परिवर्तन - संजय सिंह 'अवध' 

परिवर्तन की ओट लिए जब,
कदम समय के चल जाते हैं,
तब नियति का घूँघट ओढ़े,
शिथिल प्रयास भी छल जाते हैं।

परिवर्तन में जो छँट जाते हैं,
नतमस्तक हो झुक जाते हैं,
ऐसे शीश धार से कट कर,
कभी नहीं फिर उठ पाते हैं।

परिवर्तन की राह पकड़ जो,
समय के रंग में ढल जाते हैं,
ऐसे शीश शैल से उठकर,
नभ में सूर्य से बन जाते हैं ।

जब इंकलाब के नारों से
बाधित ये अंतर्मन होता है,
तब ही परिवर्तन पाने को,
चिंगारी से आचमन होता है।

हवन कोई कितने भी कर ले,
जतन सहस्रों कर ले कोई,
परिवर्तन के अटल सत्य से,
चक्र काल का, बच नहीं पाता।

परिवर्तन हो पार्थ के मन में,
परिवर्तित हो शीश कुरु का,
विगत समय की चाल रोक कर,
परिवर्तन, कृष्ण जो कर जाते हैं,
मन में रण हो, या रण में मन,
परिवर्तन की ढाल लिए,
अर्जुन परिवर्तन कर जाते हैं।

परिवर्तन ऋतुओं का होकर,
जीवन में परिवर्तन करता,
जब परिवर्तन ग्रहों का होता,
राम भी उसको रोक ना पाते।
परिवर्तित यदि मृग ना होता,
तुलसी क़लम सींच ना पाते,
ना जाते लंका को रघुवर,
रावण घर घर सेंध लगाते।

परिवर्तन का कठिन दीर्घ पर,
सार बहुत ही कम होता है,
समय की सुइयाँ छिल ना जाएँ,
समय-समय से रंग ना जाये,
इस उद्देश्य जनित ज्वाला से ही,
ये जग परिवर्तन होता है।

- संजय सिंह 'अवध' 

ईमेल- green2main@yahoo.co.in

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उक्त मन को छूने वाली कविता के रचयिता भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण में ATC अधिकारी हैं और अपने कालेज के दिनों से ही, जैसा कि इनकी रचनाओं से घोतक है, जन जन में संवेदना, करूणा और साहस भरने के साथ अंतर्विषयक समझ द्वारा उत्कृष्टता के पथ पर युवाओं को अग्रसर करने को प्रयासरत हैं।

कवि के बारे में विस्तार से जानने के लिए यहां क्लिक करें।


यह कविता परिवर्तन के महत्व पर प्रकाश डालती है, जो मन, समय और जीवन के विभिन्न पहलुओं में होता है। यह परिवर्तन के विभिन्न रूपों और उनसे जुड़े परिणामों को उजागर करता है।

यह कविता परिवर्तन के महत्व को दर्शाती है और बताती है कि परिवर्तन हर जगह मौजूद है।

इस कविता में परिवर्तन की क्या भूमिका है?

इस कविता में, परिवर्तन जीवन का एक सार्वभौमिक पहलू है, जो मन, समय, ऋतुओं और यहां तक कि ग्रहों को भी प्रभावित करता है। परिवर्तन एक ऐसी शक्ति है जो न केवल व्यक्तिगत विचारों और भावनाओं को बदलती है, बल्कि पूरी दुनिया को भी प्रभावित करती है। यह निरंतरता, विनाश और सृजन की प्रक्रिया को दर्शाता है, जो जीवन के चक्र को आकार देता है।

कविता में 'यह जग परिवर्तन होता है' वाक्यांश का क्या अर्थ है?

यह वाक्यांश कविता के मुख्य विषय को सारांशित करता है: दुनिया में परिवर्तन हर जगह होता है। यह परिवर्तन की सार्वभौमिकता और सभी चीजों पर इसके प्रभाव को इंगित करता है। यह एक शक्तिशाली कथन है जो परिवर्तन की निरंतरता और महत्व पर जोर देता है।


इस कविता पर अपनी राय या प्रतिक्रिया आप संपर्क फॉर्म से भेज सकते हैं या lovekushchetna@gmail.com पर ईमेल कर सकते हैं।

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