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उद्देश्य - विद्यार्थियों को आने वाली दिक्कतों और उनसे होने वाली चूक के उपाय के तौर पर ताकि वह भौतिकी की बेहतर समझ के साथ अच्छा स्कोर करके अपने सपनों को पंख दे सकें |
शुभकामनाएँ
- लवकुश कुमार

The objective is to provide students with solutions to their challenges and mistakes, enabling them to achieve a better understanding of physics and achieve good scores to fulfill their dreams.
Best wishes
- Lovekush Kumar
उसके शरीर में इतनी ताकत न थी कि वह मेहनत-मजदूरी कर सके। भीख में रूखा-सूखा जो मिल जाता उसी से पेट की आग को शान्त करने का प्रयास करती, या कभी केवल पानी पीकर ही गुजारा कर लेती।
आज उसे भीख में थोड़ा-सा सूखा आटा मिल गया था। आटे को बनिये को बेच दूँ तो बदले में मिले पैसों से दो वक्त का गुजारा तो चल ही जाएगा, ये सोच कर दुकान पर पहुंच गयी, किन्तु बनिये ने आटा लेने से इन्कार कर दिया ।
अगले ही पल उसे विचार आया, क्यूंँ ना इस आटे की रोटी ही बनाकर खा लूँ, पर ईंधन, बर्तन, वो तो कुछ भी थे नहीं उसके पास। एक-दो टूटे-फूटेे बर्तन थे; उन्हें भी कुछ दिन पहले किसी ने चुरा लिया था। निराश होकर लौट चली, कि दू...s...र श्मशान में उठती हुई आग की लपटें देख उसकी आँखों में चमक आ गयी।
शव लगभग जल चुका था। शव के साथ आए लोग उसके वहाँ पहुँचने से पहले ही जा चुके थे, उसने आव देखा न ताव, चिता के निकट फूटे हुए मटके के एक टुकडे़ में थोड़ा-सा पानी देखकर उसी में आटा गूंथ लिया और मोटी-मोटी रोटियाँ थपक कर चिता के किनारे सुलगते अंगारों पर रख दी, ज्यादा इन्तजार नहीं करना पड़ा।
अरसे बाद पेट की आग गर्म रोटियों से बुझ रही थी।
- सुनीता त्यागी
राजनगर एक्सटेंशन गाजियाबाद
ईमेल : sunitatyagi2014@gmail.com
आदरणीय सुनीता जी की रचनाएं हमे मानवीय संवेदना, मानवीय भावना के विभिन्न रूप और तीव्रताएं यथा प्रेम, परवाह, चाह और संकल्प इत्यादि, नज़र की सूक्ष्मता, सामाजिक संघर्ष और विसंगतियों पर प्रकाश डालती और लोगों मे संवेदना और जागरूकता जगाने का सफल प्रयत्न करती दिखती हैं, इनकी रचनाएँ पढ़कर खुद को एक संवेदी और व्यापक सोंच और दृष्टिकोण वाला इंसान बनाने मे मदद मिलती है |
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शुभकामनाएं
सन्तान सुख से वंचित, निराश शर्मा जी ने अनाथालय से एक बच्चा गोद ले ले लिया। बच्चे की खिलखिलाहट से उनके जीवन में मानो खुशियों की बहार ही आ गयी थी। शर्मा दम्पति दोनों मिल कर बडे़ लाड़प्यार से पालन करने लगे उसका। बच्चे के कदम घर में पड़ने से शर्मा जी का भाग्य ने साथ दिया और उनके अपने भी दो बच्चे पैदा हो गये, परन्तु उन्होंने कभी तीनों बच्चों में भेदभाव नहीं किया। समान शिक्षा, समान लालन पालन।
बडे़ पुत्र शरद की किस्मत ने एक बार फिर करवट बदली और वो एक रोड़ ऐक्सीडैंट में बुरी तरह जख्मी हो गया तब शर्मा दम्पत्ति ने उसकी चिकित्सा में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी और वह ठीक भी हो गया, फिर भी वह अपने दोंनों पैर गंवा बैठा। इसी दौरान सहानुभूति दर्शाने वाले " अति शुभचिंतकों "के द्वारा वह जान चुका था कि उसे बाबा अनाथालय से ले कर आये थे । फिर तो जीवन से हताश शरद मन ही मन कुंठित रहने लगा। उसे लगने लगा किअब वह सबके ऊपर एक बोझ हो गया है। और एक दिन हिम्मत बटोर कर उसने शर्माजी से बोल ही दिया " बाबा मै जानता हूँ कि मैं आपकीऔलाद नहीं हूं आप मुझे अनाथालय से लाये थे
।अब मैं आपकी कभी सेवा नहीं कर सकूंगा, उल्टा आप पर ही बोझ बन गया हूं।अच्छा हो यदि आप मुझे वापस वहीं छोड़ आये "।
पुत्र के मुंह से ऐसी बाते सुन कर शर्माजी आहत हो उठे। आंखों की कोर में आगये पानी को धीरे से कमीज की बांह से पौंछ लिया " बेटा ! कभी ऐसी बात जबान पर भी मत लाना।
तुम नहीं जानते, पकने के बाद फल भले ही वृक्ष का साथ छोड़ दें,पर वृक्ष को अपने फल कभी बोझ नहीं लगते। और तुम तो मेरा पहला फल हो। मैं तुम्हें कैसे अपने से दूर कर सकता हूं।भावुक होकर शरद पिता के सीने से लिपटकर रोने लगा।
पिता का हाथ शरद के सिर पर था।
- सुनीता त्यागी
राजनगर एक्सटेंशन गाजियाबाद
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शुभकामनाएं
"अब्बू हमें इस बार ईदी में गिफ्ट और पैसे नहीं चाहियें"। नौ वर्षीय सुहेल ने अपने अब्बा सेे कहा, तो रहमत खां हैरान रह गये।
" मेरे बच्चे,तुझे ईदी नहीं चाहिये, तो और क्या चाहिए,तू बता मुझे! तू कहे तो मैं तेरे कदमों में जन्नत ला कर रख दूं "।
रहमत मियां बेटे को गोद में उठा कर उसे प्यार से चूमने लगे।
सुहेल ठुनते हुए कहने लगा " नहीं अब्बू!! जन्नत नहीं, एक वादा चाहिये आपसे। और सुहेल की हां में हां मिलाते हुए सारे बच्चों ने भी शोर मचा दिया " हांं हमें वादा चाहिये, वादा "।
" कैसा वादा मेरे बच्चों"!! बताओ तो सही?
"अब्बू हमने सुना है कि खुदा पाक ने हजरत इब्राहिम से उनकी सबसे अज़ीज़ चीज़ कुर्बान करने के लिये कहा था और उन्होंने अपने बेटे को कुर्बानी के लिए पेश किया था।"
" हांs.. मगर इससे तोहफे का क्या रिश्ता है बच्चों?"
"अब्बू तब खुदा पाक ने खुश होकर उनके बेटे की जगह बकरा रख दिया था। क्या ये सच है अब्बू" ।
"हां ये सच है, तो तुम क्या चाहते हो"।
"अब्बू हम चाहते हैं कि आप भी अपने अज़ीज़ बच्चों को कुर्बानी पर रखें और खुदा पाक खुश होकरउसके बदले बकरा रख देंगे"।
बच्चों के मासूम सवाल से रहमत मियां कांप उठे।दोनों हाथ कानों पर रख लिये " ला-हौल-बिला-कुव्वत!! ये क्या बोल रहे हो!! कहीं ऐसा होता है भला! वो दौर और था बच्चो!यदि तुम्हें कुछ हो गया तो हम जीते जी मर जायेंगे। नहीं नहीं..."।
अच्छा!! बच्चों ने कुछ सोचते हुए कहा "तो फिर एक वादा करो कि इस बार आप मासूम जानवरों का खून नहीं बहाओगे, आप कुर्बानी के लिए आटे,गुड़, मिट्टी या कागज से बने बकरे को ही हलाल करोगे"
"हाँ ये बात मानली तुम्हारी!" कह कर रहमत खां ने राहत की सांस ली।
सुनीता त्यागी
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शुभकामनाएं
छ:साल की तान्या खेलते -खेलते खलिहान में पहुंच गयी ,जहां खेत की रखवाली करने के लिए बिरजू काका बैठे थे ।
"अरे ! गुड़िया आयी है!आ जा गुड़िया रानी....आ जा.. !का देख रही है!आ हमारी गोदी में आ जा !" "आ हम तुझे शहतूत देंगे मीठे मीठे"! मासूम तान्या लपक कर बिरजू काका की गोद में जा बैठी।
काका गुडिया को सहलाने लगे. ,. धीरे धीरे यहां वहां हाथ फिराने लगे । गुड़िया छोटी थी परन्तु उसके सर्प जैसे रेंगते हाथों के दूषित स्पर्श और विक्षिप्त मनो भावों को महसूस कर रही थी ।
"चाचा मुझे प्यास लगी है, " चाचा बहुत तेज से लगी है,"तान्या रुआंसी हो गई ।
"अच्छा! हम अभी लाते हैं करवे से ठंडा ठंडा पानी" कह कर बिरजू काका पानी लाने के लिए खड़े हो गए ।
तान्या अन्दर ही अन्दर कांप रही थी और किसी तरह उनके बाहुपाश से छूटना चाहती थी।
"नहीं चाचा ...मुझे तो घर जा कर गिलास से ही पानी पीना है"।
जब तक काका ने करवा उठाया, तान्या जान बचा कर वहां से घर की ओर दौड़ गयी।
स्पर्श के वो विषैले कांटे आज भी उसकी देह में चुभने लगते है।और उसकी पीड़ा को दिल में दबा लेती है
- सुनीता त्यागी
राजनगर एक्सटेंशन गाजियाबाद
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शुभकामनाएं
सविता अपने बच्चों के स्वास्थ्य के प्रति सजग रहती थी। इसलिए वह सदैव उन्हें पौष्टिक भोजन ही कराती थी। सर्दी के मौसम में हल्दी युक्त दूध और विटामिन्स से भरपूर फल खाने के लिए देती और गर्मियों में आम का पन्ना और नींबू की शिकंजी देना न भूलती थी।
लेकिन उसका बेटा आयुष जब से टीनएजर हुआ है और नए स्कूल में जाने लगा है तभी से मित्रों के साथ पीजा - बर्गर, चाईनीज़, इटैलियन जैसे जंक फूड खाने लगा। अब उसे माँ के हाथों का बना खाना बेस्वाद लगने लगा था।
नतीजा यह हुआ कि आयुष की इम्युनिटी बहुत कमजोर हो गयी और आए दिन उसे नजला जुकाम रहने लगे। सुबह सोकर उठता तो उसे एक साथ बहुत सारी छींके आतीं और पूरे दिन नाक से पानी बहता रहता ।
अब यह उसकी रोज की बात हो गई थी।
कुछ महीने पहले आयुष गर्मियों की छुट्टियों में अपने मामा जी घर रहने गया। उसने देखा उसके मामाजी सुबह उठते ही गुनगुने पानी में सेंधा नमक डाल कर एक नली वाले लोटे की सहायता से नाक के एक छिद्र से पानी अन्दर पहुंचा कर दूसरे छिद्र से बाहर निकाल रहे थे।
उनके नजदीक खड़ा आयुष आश्चर्य से ये सब देख रहा था, और साथ ही छींकता भी जा रहा था ।
" मामाजी आप ये क्या कर रहे हैं"। उसने मामा जी से पूछा।
" बेटा ये जल नेति की क्रिया है, वही कर रहा हूं "
" मामा जी इसको करने से क्या लाभ होता है "।
, " बेटा यह नाक की सफाई करती है और सांस नली सम्बन्धी परेशानी, पुरानी सर्दी, दमा, सांस लेने में होने वाली समस्या को दूर करती है।
इससेआंखों में पानी आना और आंख में जलन की समस्या कम होती है। और यह कान, और गले को बीमारियों से भी बचाती है। सिरदर्द, अनिद्रा, सुस्ती में जलनेति करना फायदेमंद है।तुम्हें भी यह नित्य ही करनी चाहिए। "मामा जी ने विस्तार से जानकारी दी।"
परन्तु मुझे तो यह करनी आती ही नहीं
मामा जी"
" कोई बात नहीं मैं सिखाउंगा तुम्हें। क्यों कि यदि जल नेति गलत तरीके से कर ली जाये तो उससे हानि भी हो सकती है"
" कैसी हानि मामाजी" आयुष ने हैरानी से पूछा।
देखो बेटा यदि हम पानी को अधिक गर्म कर लेंगे या नमक अधिक डाल देंगे तो उससे हमारी नाक में जलन हो सकती है, नाक से खून भी आ सकता है। और यदि हमने नासिका के अन्दर से पूरा पानी बाहर नहीं निकाला तो कान नाक में दर्द भी हो सकता है। और यदि लोटा गंदा है तो संक्रमण भी हो सकता है, इसलिए इसे किसी विशेषज्ञ की देखरेख में ही करना चाहिए "।
ठीक है मामाजी आप मुझे भी सिखाइये ये जलनेति"
" ठीक है बेटा"
अगले दिन से मामाजी लम्बी नलकी वाले दो लोटों में चुटकी भर नमक और एक लीटर हल्का गर्म पानी डाल कर ले आये फिर उन्होंने धीरे-धीरे आयुष को नली से नाक में पानी डालने का और बाहर निकलने का अभ्यास कराया।
आयुष जब तक उनके घर रहा तब तक उन्होंने आयुष को जलनेति की क्रिया कराई व उसको ठीक प्रकार से करने की सावधानियां भी समझायीं।
आयुष को अब इससे कुछ लाभ दिखाई देने लगा था तो वह स्वयं ही सुबह उठकर गुनगुने पानी में नमक डालकर जलनेति की क्रिया करने लगा तथा साथ में कपालभाति भी करने लगा।
देखते ही देखते कुछ महीनों में ही उसे छींकें आनी व नाक से पानी आना भी बंद हो गया, साथ ही जुकाम के कारण सिर में जो दर्द रहता था वह भी ठीक हो गया।
अब तो आयुष के घर में भी उसकी देखा देखी सभी लोग इस क्रिया को करने लगे। व मित्रों को भी जलनेति के फायदे समझाने लगे।
- सुनीता त्यागी
राजनगर एक्सटेंशन गाजियाबाद
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शुभकामनाएं
लगभग, सबकुछ योगेन्द्र यादव सर ने कहा दिया, वीडियो देख लीजिए:
https://youtu.be/C2T153GAmKo?si=0DtS5GjmHKmr6E0G
शुभकामनाएं
लवकुश कुमार
यह मेरे लिए खुशी की बात है कि जिस पुस्तक के लिए, इतने महीनो से प्रयास चल रहा है वह जल्द ही पाठकों के लिए उपलब्ध होगी, उससे पहले मुख्य पुस्तक का एक अंश आप लोगों के समक्ष प्रस्तुत है, परिचय और आपकी प्रतिक्रिया के लिए, जरुर भेजें ईमेल - KCPHYQA@GMAIL.COM
नाम जो उद्देश्य के अनुरूप है :

लेखक का परिचय जरूरी है और प्रासंगिक भी, पुस्तक की सामग्री के आंकलन में

ये किताब क्यों खरीदें, अन्य किताबों से यह किस तरह अलग हो सकती है? कुछ बातें इस पर :

स्टूडेंट्स के लिए है अतः स्टूडेंट्स की कुछ समस्याएँ जिन्हें संबोधित किया गया है :


कुछ बातें जिनके चलते इस पुस्तक को लिखने की जरुरत पड़ी:


अंत में एक सन्देश जो किताबों के महत्त्व पर है, मोबाइल फ़ोन और शॉर्ट्स की दुनिया में किताबों से दोस्ती करने की बात पर जोर देते हुए :

किताब अपने उद्देश्यों पर कितनी खरी उतरी जरुर बताएं, उससे पहले अपनी प्रति book कराएँ या अपने निकटतम पुस्तक विक्रेता द्वारा डिमांड सबमिट करवाएं (पुस्तक के लिए अपने पते का फॉर्म भरें )
शुभकामनाएं
आपका
लवकुश कुमार
हम अक्सर सुनते हैं, कि अगर आधा रास्ता या आधे से ज्यादा रास्ता तय हो गया है तो आप हमेशा आगे बढ़िये क्योंकि मंजिल तक पहुचने के लिए भी उतना ही रास्ता तय करना है जितना पीछे लौटने के लिए। लेकिन इस पंक्ति पर सोचने की जरूरत है,
हम किसी परीक्षा की तैयारी शुरू करते हैं और लगभग एक निश्चित समय में अगर ठीक से पढ़ें तो हम 50 से 75 % पाठ्यक्रम पढ़ लेते हैं, फिर भी कई लोग उसके बाद भी कई साल लगे रहते है और सेलेक्ट नहीं होते (किसी नौकरी या प्रवेश परीक्षा को ही लें )।
अब ये सोचने की बात है कि क्या सच में हमने आधा रास्ता तय किया था?
पहली बात कि आपने पढ़ते वक्त क्या सच में जो तरीका मुफीद और लाभकारी है वो अपनाया था, जैसे पाठ्यक्रम को समझना, सवाल समझना, महत्वपूर्ण टॉपिक्स को रेखांकित करना आदि|
दूसरी बात कि आपने कितने मन से पढ़ा था, क्योंकि सिर्फ पढ़ाई ही काफी नहीं होती, आपने कितना समझा है, उसके बाद आपके दिमाग ने उसे कितना याद रखा है ये भी जरूरी है।
जो सबसे जरूरी बात है कि 50% रास्ता तय हुआ या नहीं इसके जो मानक या बेंचमार्क या पैमाना होना चाहिए जिन पर आप अपनी तैयारी का आंकलन करेंगे, वो हैं आपकी प्रश्न पत्र को हल करने कि क्षमता, जैसे तैयारी शुरू करने के समय आप 10% प्रश्न हल कर पा रहे थे, तैयारी करते हुए एक साल बाद अगर 30% हल हो पा रहे तब ये 30 कब 60 में बदल रहा है उसका सही आकलन बहुत जरूरी है..............
लेकिन सालों तक अगर बढ़ोत्तरी नहीं हो रही तो आत्मनिर्भर होने के लिए कुछ skills सीखिए, अगर score नहीं बढ़ रहा है, दूसरी परीक्षाओं में भी बैठने के विकल्प पर विचार करिए |
अपनी जिंदगी ये कह कर मत निकाल दीजिए कि कुछ तो सीखेंगे ही, हो सकता है उस कुछ की जगह आप और बहुत कुछ कर सकते हो दूसरे बेहतर विकल्प को अपनाकर, रही बात कुछ सीखने की तो आप अगर सच मे सीखना चाहते है तो सीखने के लिए और भी क्षेत्र हैं, उन पर भी विचार कर सकते हैं |
-सौम्या गुप्ता
बाराबंकी उत्तर प्रदेश
सौम्या गुप्ता जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं, वो अपनी समझ और लेखन कौशल से समाज में स्पष्टता, दयालुता, संवेदनशीलता और साहस को बढ़ाने के लिए प्रयासरत हैं।
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