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विज्ञान केवल पढ़ाया नहीं गया, जिया गया: वैज्ञानिक चेतना, स्वतंत्र सोच और रुचिकर कक्षाओं की खोज में पद्मश्री प्रो. एच.सी. वर्मा की 21 दिवसीय उत्तराखंड विज्ञान यात्रा- एक विस्तृत रिपोर्ट

"विज्ञान जब समाज की सेवा करेगा, तभी चमकेगा भारत का भविष्य।"
— पद्मश्री प्रो. एच.सी. वर्मा

क्या आपके मन में भी कभी ये सवाल आए हैं?

  • बच्चों का ध्यान कक्षा में कैसे लगाया जाए?

  • क्या विज्ञान केवल अंकों और परीक्षाओं का विषय है?

  • क्या बिना महँगी प्रयोगशाला के भी विज्ञान रोचक बनाया जा सकता है?

  • क्या हम बच्चों को उत्तर याद करवाने के बजाय प्रश्न पूछना सिखा रहे हैं?

  • क्या आज की शिक्षा बच्चों को नई परिस्थितियों के लिए तैयार कर रही है?

यदि इन प्रश्नों ने कभी आपको भी परेशान किया है, तो उत्तराखंड में 12 मई से 1 जून 2026 तक चली यह विज्ञान यात्रा आपके लिए एक महत्वपूर्ण अध्ययन का विषय है।

एक यात्रा, जो केवल विज्ञान यात्रा नहीं थी

देश के सुप्रसिद्ध भौतिक विज्ञानी, पद्मश्री सम्मानित शिक्षाविद एवं आईआईटी कानपुर के पूर्व प्रोफेसर डॉ. हरीश चंद्र वर्मा (एचसीवी सर) ने अपने वैज्ञानिक जीवन के 75 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर "साइंस इन द सर्विस ऑफ सोसाइटी" और "सोपान आश्रम" के सहयोग से उत्तराखंड के छह जिलों में 21 दिवसीय विज्ञान यात्रा का नेतृत्व किया।

इस यात्रा का नाम था—

"प्रयोग-यात्रा सरिता : प्रयास"

12 मई से प्रारम्भ हुई यह यात्रा विभिन्न विद्यालयों, डीआईईटी संस्थानों और शिक्षक प्रशिक्षण केन्द्रों से होती हुई 27 मई से 1 जून तक आयोजित छह दिवसीय राष्ट्रीय आवासीय कार्यशाला (NWUPT 2026) के साथ सम्पन्न हुई।

इस दौरान—

  • 480 से अधिक भौतिक विज्ञान शिक्षक

  • 208 शिक्षक प्रशिक्षक

  • 410 शिक्षक प्रशिक्षु

  • 3000 से अधिक विद्यार्थी

प्रत्यक्ष रूप से इस अभियान से जुड़े।

आवश्यकता क्यों थी?

आज अधिकांश शिक्षक एक समान चुनौती का सामना कर रहे हैं—

बच्चे सुनते कम हैं, प्रश्न कम पूछते हैं, विज्ञान को कठिन मानते हैं और परीक्षा के बाद अधिकांश बातें भूल जाते हैं।

दूसरी ओर समाज बच्चों से लगातार अधिक अंक, अधिक प्रतिस्पर्धा और अधिक उपलब्धियों की अपेक्षा करता है।

परन्तु एचसीवी सर का प्रश्न अलग था—

"क्या हम बच्चों को सोचने के लिए तैयार कर रहे हैं?"

यात्रा का मूल उद्देश्य बच्चों और शिक्षकों में वैज्ञानिक चेतनास्वतंत्र सोचअवलोकन क्षमतातार्किक विश्लेषण और समस्या समाधान की क्षमता विकसित करना था।

विज्ञान की शुरुआत प्रयोग से नहीं, संवाद से हुई

इस यात्रा की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि किसी भी सत्र की शुरुआत सूत्रों या परिभाषाओं से नहीं हुई।

शुरुआत हुई—

  • नाम पूछने से

  • मुस्कुराने से

  • पहेली से

  • अवलोकन से

  • और छोटे-छोटे सवालों से

उदाहरण के लिए—

"धागा किस रंग का है?"

"अंधेरे में कैसा दिखाई देगा?"

"काला धागा कभी लाल दिखता है क्या?"

"हम स्कूल पढ़ने आते हैं या खेलने भी?"

ऐसे सरल प्रश्न बच्चों को चर्चा में शामिल कर लेते थे।

शिक्षकों ने अनुभव किया कि बच्चों से संवाद स्थापित करना किसी भी शिक्षण प्रक्रिया का सबसे महत्वपूर्ण चरण है।


ध्यान खींचने का अनोखा तरीका: Puzzle Method

कार्यशालाओं में बार-बार यह दिखाई दिया कि किसी भी अवधारणा को सीधे बताने के बजाय पहले एक ऐसी स्थिति बनाई जाती थी जिससे बच्चे चौंक जाएँ।

यानी—

पहले जिज्ञासा, फिर प्रयोग, फिर चर्चा और अंत में निष्कर्ष।

एचसीवी सर बार-बार कहते रहे—

"Attention create करना शिक्षक की जिम्मेदारी है।"

यही कारण था कि कई घंटे चलने वाले सत्रों में भी बच्चों और शिक्षकों का ध्यान बना रहा।

कबाड़ से प्रयोगशाला

यात्रा का सबसे प्रेरक पक्ष था कि अधिकांश प्रयोग अत्यंत सामान्य वस्तुओं से किए गए—

  • डेटॉल की खाली बोतल

  • प्लास्टिक डिब्बा

  • रिंग चुंबक

  • सिरिंज

  • कागज

  • लेजर पॉइंटर

  • पानी का गिलास

  • गुब्बारा

  • सिक्का

इनसे अपवर्तन, वायुदाब, जड़त्व, बल, परावर्तन, मृगमरीचिका, बॉयल का नियम, ऊर्जा तथा प्रकाश जैसी अवधारणाएँ समझाई गईं।

इससे शिक्षकों को यह संदेश मिला कि विज्ञान पढ़ाने के लिए महँगी प्रयोगशालाएँ अनिवार्य नहीं हैं।


स्वतंत्र सोच: पूरी यात्रा का केंद्रीय विचार

कार्यशाला में बार-बार एक बात दोहराई गई—

"नई परिस्थितियों के लिए बच्चों को तैयार करना है तो उनमें स्वतंत्र सोच विकसित करनी होगी।"

बच्चों को उत्तर देना नहीं, उत्तर खोजने की प्रक्रिया सिखाना आवश्यक है।

प्रयोग के बाद 15-20 मिनट की खुली चर्चा इसी उद्देश्य से होती थी।

कई बार एक ही प्रयोग के अलग-अलग उत्तर सामने आते थे।

यहीं से बच्चों को समझ आता था कि विज्ञान रटने की नहीं, सोचने की प्रक्रिया है।


शिक्षकों ने क्या सीखा?

शिक्षकों के अनुभवों से कुछ प्रमुख निष्कर्ष सामने आए—

1. कक्षा को जीवंत कैसे बनाया जाए

छोटे प्रश्नों और गतिविधियों से।

2. बच्चों को विषय से कैसे जोड़ा जाए

उनके अनुभवों और परिवेश से।

3. वैज्ञानिक दृष्टिकोण कैसे विकसित हो

अवलोकन, तर्क और प्रयोग के संयोजन से।

4. कम संसाधनों में प्रयोग कैसे कराए जाएँ

स्थानीय और बेकार पड़ी वस्तुओं के उपयोग से।

5. प्रश्न पूछने का साहस कैसे विकसित हो

ऐसा वातावरण बनाकर जहाँ गलत उत्तर देने का भय न हो।


विज्ञान से आगे की सीख

यह यात्रा केवल भौतिकी तक सीमित नहीं रही।

इसने समाज, पर्यावरण और जीवन मूल्यों पर भी चर्चा की।

प्लास्टिक मुक्त कार्यशालाएँ

डायट अल्मोड़ा और डायट बागेश्वर में एक बार उपयोग होने वाले प्लास्टिक पर रोक लगाने की घोषणा की गई।

VIP संस्कृति को चुनौती

सभी प्रतिभागियों ने अपने बर्तन स्वयं धोए।

यह संदेश था—

श्रम का सम्मान भी शिक्षा का हिस्सा है।


विज्ञान और समाज का रिश्ता

एचसीवी सर बार-बार इस बात पर जोर देते रहे कि विज्ञान का अंतिम उद्देश्य केवल तकनीक बनाना नहीं, बल्कि समाज की सेवा करना है।

उन्होंने कहा—

"धरती मेरी है, तो इसे बचाने की जिम्मेदारी भी मेरी है।"

यात्रा में पर्यावरण संरक्षण, वृक्षारोपण, हिमालय संरक्षण और सामाजिक जिम्मेदारी जैसे विषय भी समान रूप से शामिल रहे।


NAEST: जिज्ञासा और प्रयोग की राष्ट्रीय प्रयोगशाला

कार्यशालाओं के दौरान राष्ट्रीय प्रयोगात्मक परीक्षा NAEST (National Anveshika Experimental Skill Test) की भी चर्चा हुई।

यह भारत की एक अनूठी परीक्षा है—

  • 9वीं से MSc तक सभी के लिए एक ही प्रश्नपत्र

  • घर पर प्रयोग

  • स्वयं रीडिंग लेना

  • मौलिक सोच पर आधारित मूल्यांकन

  • चयनित विद्यार्थियों को सोपान आश्रम में तीन दिन का प्रशिक्षण

  • 50,000 रुपये तक की छात्रवृत्ति

यह परीक्षा इस विचार को मजबूत करती है कि विज्ञान का वास्तविक मूल्य प्रयोग और जिज्ञासा में है, न कि केवल अंकों में।

 

देहरादून में राष्ट्रीय संगम

27 मई से 1 जून तक आयोजित National Workshop for Utsahi Physics Teachers (NWUPT 2026) इस पूरी यात्रा का शिखर बिंदु रही।

देश भर से आए चुनिंदा शिक्षकों ने छह दिनों तक प्रयोग, चर्चा, चिंतन और नवाचार के माध्यम से विज्ञान शिक्षण के नए आयामों पर कार्य किया।

सोपान आश्रम द्वारा आयोजित यह 23वीं राष्ट्रीय कार्यशाला थी।


यह यात्रा क्यों याद रखी जाएगी?

क्योंकि इसने शिक्षकों को याद दिलाया—

  • विज्ञान सूत्रों से पहले सवाल है।

  • प्रयोगशाला भवन नहीं, सोच है।

  • शिक्षा का उद्देश्य केवल अंक नहीं है।

  • सीखना आनंददायक होना चाहिए।

  • बच्चों को उत्तर नहीं, खोज की प्रक्रिया देनी चाहिए।

  • वैज्ञानिक चेतना लोकतांत्रिक समाज की बुनियाद है।

कार्यशाला से मिली 21 प्रमुख सीख

  1. विज्ञान उत्तर याद करने का नहीं, प्रश्न पूछने का विषय है।

  2. जिज्ञासा सीखने का सबसे बड़ा ईंधन है।

  3. कक्षा की शुरुआत सरल और उत्तर देने योग्य प्रश्नों से होनी चाहिए।

  4. बच्चों का ध्यान आकर्षित करना शिक्षक की जिम्मेदारी है।

  5. Puzzle Method विद्यार्थियों को सक्रिय बनाती है।

  6. वैज्ञानिक चेतना अवलोकन से शुरू होती है।

  7. हर प्रयोग के पीछे "क्यों?" सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है।

  8. सीखने की प्रक्रिया परिणाम से अधिक महत्वपूर्ण है।

  9. कम लागत की सामग्री भी उत्कृष्ट प्रयोगशाला बन सकती है।

  10. विज्ञान को जीवन से जोड़ना जरूरी है।

  11. बच्चे तब बेहतर सीखते हैं जब वे चर्चा का हिस्सा बनते हैं।

  12. स्वतंत्र सोच भविष्य की सबसे महत्वपूर्ण क्षमता है।

  13. प्रयोग डर को कम करते हैं और आत्मविश्वास बढ़ाते हैं।

  14. प्रश्न पूछने वाला वातावरण रचनात्मकता को जन्म देता है।

  15. विज्ञान का उद्देश्य केवल परीक्षा नहीं, जीवन को समझना है।

  16. वैज्ञानिक दृष्टिकोण सामाजिक समस्याओं को समझने में भी मदद करता है।

  17. पर्यावरण संरक्षण भी वैज्ञानिक चेतना का हिस्सा है।

  18. शिक्षक स्वयं सीखना बंद कर दे तो कक्षा भी ठहर जाती है।

  19. समान परिस्थितियों में भी परिणामों की जांच आवश्यक है।

  20. सीखना आनंददायक होना चाहिए।

  21. बच्चों को उत्तर देने से अधिक महत्वपूर्ण है उन्हें उत्तर खोजने की प्रक्रिया सिखाना।


शिक्षकों की आवाज़ : कार्यशाला का प्रभाव

प्रकाश चन्द्र जोशी

"विज्ञान केवल सिद्धांत नहीं है। प्रयोगों के माध्यम से किसी विचार को परखना ही वास्तविक विज्ञान है।"

मदन मोहन सुंदरियाल

"जब मन किसी प्रश्न पर अटक जाता है, तब वास्तविक सीख शुरू होती है।"

प्रीति राणा

"Puzzle Method बच्चों को केवल सुनने वाला नहीं, सोचने वाला बनाती है।"

सुरभि पंत

"भौतिकी को संगीत से जोड़कर देखने का नया दृष्टिकोण मिला।"


NAEST : जहाँ अंकों से अधिक महत्व जिज्ञासा का है

कल्पना कीजिए—

  • कक्षा 9 से लेकर MSc तक के विद्यार्थियों के लिए एक ही प्रश्नपत्र।

  • घर पर प्रयोग करने की स्वतंत्रता।

  • स्वयं उपकरण बनाना।

  • स्वयं रीडिंग लेना।

  • कोई कोचिंग नहीं।

  • कोई रटंत नहीं।

यही है National Anveshika Experimental Skill Test (NAEST)।

इस अनूठी परीक्षा का उद्देश्य प्रतिभा नहीं, जिज्ञासा को पहचानना है। चयनित विद्यार्थियों को सोपान आश्रम, कानपुर में पद्मश्री प्रो. एच.सी. वर्मा के सानिध्य में कार्य करने का अवसर भी मिलता है।


एक सामाजिक संदेश : विज्ञान, पर्यावरण और समानता

इस यात्रा की एक बड़ी उपलब्धि यह रही कि विज्ञान की चर्चा केवल प्रयोगशाला तक सीमित नहीं रही।

  • प्लास्टिक और डिस्पोज़ल के प्रयोग पर रोक

  • सभी प्रतिभागियों द्वारा स्वयं अपने बर्तन धोना

  • श्रम के सम्मान का संदेश

  • VIP संस्कृति को चुनौती

  • पर्यावरण संरक्षण की प्रतिज्ञा

यह बताता है कि वैज्ञानिक चेतना केवल भौतिकी नहीं, बल्कि जीवन जीने का तरीका भी है।


आगे की राह

उत्तराखंड विज्ञान यात्रा 2026 समाप्त हो चुकी है, लेकिन इसके द्वारा उठाए गए प्रश्न अभी भी हमारे सामने हैं—

क्या हमारी कक्षाएँ बच्चों को सोचने के लिए प्रेरित कर रही हैं?

क्या हम विज्ञान को जीवन से जोड़ पा रहे हैं?

क्या हम बच्चों में स्वतंत्र सोच विकसित कर रहे हैं?

यदि इन प्रश्नों के उत्तर खोजने की प्रक्रिया शुरू हो गई है, तो यह यात्रा अपने उद्देश्य में सफल कही जाएगी।

क्योंकि अंततः—

"विज्ञान का सबसे बड़ा प्रयोग मानव मस्तिष्क है, और शिक्षा का सबसे बड़ा लक्ष्य उसे स्वतंत्र रूप से सोचने योग्य बनाना है।"

निष्कर्ष

उत्तराखंड विज्ञान यात्रा 2026 केवल कार्यशालाओं की श्रृंखला नहीं थी।

यह एक विचार था।

एक निमंत्रण था।

एक आग्रह था कि हम अपने विद्यालयों में ऐसी कक्षाएँ बनाएं जहाँ बच्चे केवल पढ़ें नहीं, सोचें; केवल सुनें नहीं, प्रश्न पूछें; केवल अंक न जुटाएँ, बल्कि जीवन को समझें।

यदि इस यात्रा से निकला सबसे महत्वपूर्ण संदेश एक वाक्य में कहा जाए, तो शायद वह यह होगा—

"बच्चों को उत्तर देने से अधिक महत्वपूर्ण है उन्हें प्रश्न पूछना सिखाना।"

और संभवतः यही वैज्ञानिक चेतना की पहली सीढ़ी है।