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हर महीने की दस्तक (कविता)- गरिमा जोशी

मासिक धर्म, रजोधर्म, ऋतु चक्र हूँ।
कुछ के लिए महावारी हूँ, तो
कुछ के लिए लाल चक्र हूँ।

अंग्रेज़ी में कह दो मुझे, तो पीरियड्स मैं हूँ।
कुछ मान लेते हैं मुझे कि छूत भी मैं हूँ।

कहते हैं मुझे कि एक नारी का गहना मैं हूँ।
मैं ना अगर हूँ, तो फिर ना जाने क्या ही हूँ।

मिलता है सम्मान मुझे कहीं तो, जब मैं पहली बार आती हूँ।
पूजते हैं लोग उस नारी को, जहाँ भी मैं जाती हूँ।

मैं ना आऊँ, तो चिंता तुम्हारी बढ़ जाती है।
कहीं तो मेरे आते ही वो नारी नज़रों से हटा दी जाती है।
एक कोने में बैठे, आँखों से जुदा कर दी जाती है।
थाली भी उसकी बड़ी अलग कर दी जाती है।

चादर, कम्बल, यहाँ तक कि अपने बच्चे से भी वो
बिल्कुल अलग कर दी जाती है।

कहीं न जाने, न छूने की उसकी आदत कर दी जाती है।
मंदिर के दरवाज़े से वो पूरी ही आउट कर दी जाती है।

पूछती है वो नारी मुझे, “क्यों तुम हर महीने आ जाती हो?”
और मेरे न आने पर उस नारी की हालत
बड़ी ही टाइट कर दी जाती है।

सोचती हूँ मैं कभी-कभी, मेरे आने पर
क्यों वो नारी बिल्कुल अपवित्र कर दी जाती है?
पीछे से मुझे चेक करने की उसकी फ़ितरत कर दी जाती है।

हर महीने मैं आती हूँ, ये बताने कि
मैं एक नारी को पूरा करने आती हूँ।
पूरा कर उसे, फिर भी मैं अधूरा ही पाती हूँ।

हर महीने की दस्तक देना मेरा काम है,
पर एक सवाल मेरा तुमसे है-
कि जिस नारी को मेरे आने पर
तुम अपवित्र कहते हो,
उसी नारी की कोख से जन्म लेकर
फिर तुम पवित्र कैसे हो जाते हो?

मैं अभिशाप नहीं, प्रकृति का सबसे सुंदर सत्य हूँ।
मैं अपवित्र नहीं, सृजन की पहली सीढ़ी हूँ।
मुझे छूने से धर्म नहीं टूटता, मुझे समझने से समाज बनता है।

हर महीने की दस्तक देना मेरा काम है,
और हर महीने उस दस्तक का सम्मान करना तुम्हारा!

 - गरिमा जोशी 


युवा रचनाकार गरिमा जोशी जी की लेखन शैली सामाजिक मुद्दों पर केंद्रित होती है और वह समाज में मौजूद रूढ़िवादी सोच पर सवाल उठाती हैं। 

आप एक ऐसे न्यायपूर्ण और समानता वाले समाज का सपना देखती हैं जहाँ लिंग, जाति, पंथ या धर्म के आधार पर कोई भेदभाव न हो। 

कवयित्री से garimaji0814@gmail.com के जरिए संपर्क साधा जा सकता

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