हाय! यह बेरोज़गारी की जंजीरें
बड़ी कस के पकड़ लेती हैं,
लड़का हो चाहे लड़की,
ये जंजीरें सबको जकड़ लेती हैं!
एक बिन ब्याही लड़की, जो सबको खटकती है,
तैयारी का हवाला देकर वो मर-मर के जीती है।
“बस कुछ साल का मौका है तेरे पास”, यह कहकर बख्श दी जाती है!
दुनिया की आँखों में वो बस चुभती चली जाती है।
वहीं, दूसरी ओर, एक लड़का है; अब वो भी सबको खटकता है।
“कौन तुझे अपनी लड़की देगा?” यह कहकर आँखों में बड़ा चटकता है।
“तेरे पास लड़की से ज्यादा मौके हैं”, यह कहकर बख्श दिया जाता है,
पर दुनिया की नज़रों में तू थोड़ा कम सबको चुभता है।
एक लड़की, जो शादी से बचने के लिए पढ़ रही है,
वहीं वो लड़का शादी हो जाने के लिए पढ़ता है।
दोनों का मुद्दा एक ही है, वो है ‘बेरोज़गारी’,
पर दोनों की परिस्थिति अलग हैं, वो हैं खुद की लाचारी!
मैं तो कहती हूँ, लोग परिस्थिति देख कर हमें सम्मान देते हैं,
मानो एक साँप को शिवलिंग पर स्थान देते हैं।
शिवलिंग पर साँप दिखते ही लोग उस पर दूध और फूल चढ़ाते हैं,
वहीं साँप अगर घर में घुस जाए, लाठी-डंडों से उसे भगाते हैं।
था दोनों जगह साँप ही...
पर परिस्थिति ने रुतबा उसका बदल दिया।
मानो शिवलिंग पर चढ़ा साँप ‘रोज़गार’ में था,
और घर में आया साँप ‘बेरोज़गार’ बन गया।
बेरोज़गारी थी दोनों के लिए एक-सी,
मायने उसके सबने बदल दिए।
किसी के लिए वह अच्छी, तो किसी के लिए नासूर-सी बन गई।
हाय! यह बेरोज़गारी की जंजीरें
बड़ी कस के पकड़ लेती हैं,
लड़का हो चाहे लड़की,
ये जंजीरें सबको जकड़ लेती हैं!
- गरिमा जोशी
संपादकीय टिप्पणी - "कविता में प्रयुक्त शब्द प्रतीकात्मक हैं और समाज की दोहरी मानसिकता की तरफ ध्यान खींचने के प्रयोजन से उपयोग में लिए गए हैं, किसी भी इंसान की किसी भी भावना को आहत करने का कतई प्रयोजन नहीं है।" - लवकुश कुमार
युवा रचनाकार गरिमा जोशी जी की लेखन शैली सामाजिक मुद्दों पर केंद्रित होती है और वह समाज में मौजूद रूढ़िवादी सोच पर सवाल उठाती हैं।
आप एक ऐसे न्यायपूर्ण और समानता वाले समाज का सपना देखती हैं जहाँ लिंग, जाति, पंथ या धर्म के आधार पर कोई भेदभाव न हो।
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