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सम्यक जीवन और बेहतरी के लिए कुछ प्राथमिकताएं और घर का माहौल; भाग -3
  • आंबेडकर जी का साहित्य रखिये घर में, फुले जी का साहित्य रखिये घर में, जो नेता संघर्ष वाले जीवन से आकर ऊँचाई तक पहुंचे या जिन्होंने समाज के पिछड़ी तबकों के भले के लिए काम किया उनकी जीवनी या आत्मकथा रखिये घर में खुद भी पढ़िए और बच्चों को भी प्रेरित करिए          
  • ही लोगों का मान करना सीखिए, जिस तरह के लोगों का मान आप करेंगे आपके बच्चे भी उनका ही मान करेंगे
  • अगर आप शिक्षित, समझदार और ईमानदार लोगों का मान करेंगे तो आपके बच्चे भी उनका मान करेंगे और खुद भी वैसा ही बनने का प्रयास करेंगे, फिर आपको उनसे बेहतर बनने को कहना न पड़ेगा, माहौल सब कह देगा |
  • हमें समाज में एक निर्णायक भूमिका पानी है इस विचार को जिन्दा रखने और याद रखने के लिए नियमित मीटिंग कर इस बारे में प्रगति पर चर्चा करें ताकि इस तरह हम केवल स्वयं तक ही सीमित न रह जाएँ, जब प्रयास सामूहिक हो तो उत्साह भी बना रहता है और काम भी चलते रहते हैं |
  • निडर बनंगे तो आगे बढ़ने और मजबूती के लिए मेहनत करेंगे, दब्बू रहेंगे तो आगे बढ़ने की उत्कंठा ही न पैदा होगी
  • आपना  मत और अपनी बात/स्तिथि स्पष्ट रूप से बोलना सिखाइए ताकि ऐसे ही लोगों से संग हो सके,क्योकि संगति महत्वपूर्ण है |
  • जो इंसान केवल हाँ में हाँ में मिलाता है अपना मतलब निकलने को फिर वो ऐसे ही लोगों से घिर जाता है
  • अपनी असहमति को खुलकर व्यक्त करें और लोगों को भी आजादी दें की वो अपनी सहमति को खुलकर व्यक्त कर सकें, फिर तर्क के द्वारा लोगों की शंका समाधान करें इस तरह लोग सच्चे मन से आपके साथ होंगे और जिन्हें केवल झूठ ही पसंद है वो खुद ही दूर हट जायेंगे|
  • नेतृत्व की क्षमता रखें, स्कूल के वक़्त से ही बच्चों को स्कूल में होने वाले कार्यक्रम में हिस्से लेने को प्रोत्साहित करें और खासकर भाषण देने, मंच संचालन और समन्वय के कामो में
  • उन्हें सिखाएं की जो भी लोग उनके साथ जुड़े हैं उनके हित सुरक्षित रहें और उनके वाजिब हित पूरे हो सकें इस बात को ध्यान में रखकर ही काम करें
  • साहस आता है स्पष्टता  से अतः बच्चों को साहित्य अध्ययन के लिए प्रोत्साहित करें ताकि उनमे स्पष्टता रहे और वह साहस के साथ आगे बढ़ सकें |
  • बच्चों में कोई फूट न डाल पाए इस तरह तैयार करें उन्हें, उन्हें बताएं की अपना वो जो सच के रास्ते चले, उन्हे बताएं कि किसी के कहने मे न आकर वस्तु स्थिति का जायजा लें और संबन्धित व्यक्ति से खुद बात करें |
  • जो सफल हुए हैं उनसे किसी भी तरह का इर्ष्या भाव या प्रतिस्पर्धा की भावना रखे बिना उनसे सीखने के इच्छा रख वार्तालाप करें, बहंस के बजे चर्चा के रुझान के साथ बाते करें |
  • बच्चों को दूसरों की मदद के लिए प्रेरित करने के लिए खुद अपनी इनकम का 2 % जरूरतमंद लोग जिनसे आपका कोई स्वार्थ नहीं उनकी मदद के लिए आरक्षित करें, इस तरह बच्चों में दूसरों की मदद के लिए पहले खुद को समर्थ बनाने के लिए मेहनत करने की प्रेरणा मिलेगी |
  • खुद को मांगने वाला नहीं देने वाला समझ खुद मेहनत कर वो हासिल करना है जिसके हम हकदार हैं, किसी का चमचा नहीं बनना, खुद समर्थ हो ऐसा मानकर खुद ही सारे तरीके सीखने हैं|

बाकी बातें अगले भागों मे |
शुभकामनाएं 

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सम्यक जीवन और बेहतरी के लिए कुछ प्राथमिकताएं और घर का माहौल; भाग -1
  • उद्देश्य में हो एक गरिमामय और आत्मनिर्भरता वाला व्यक्तिगत जीवन  समाज के निर्माण में निर्णायक भूमिका नाकि आपस में सम्मान पाने की होड़, अगर समाज के निर्माण मे निर्णायक भूमिका न निभा सकें तो अपने व्यक्तिगत जीवन मे ही सत्यनिष्ठा से जीवन जीकर एक सही मिसाल बने न कि झूठ और दिखावे का जीवन जीकर एक गलत उदाहरण |
  • अपने व्यक्तिगत उन्नयन के साथ अपने समाज के पिछड़े लोगों की मदद ताकि उनको उचित शिक्षा मिल पाए और वो भी समाज में एक गरिमामय उपस्थिति दर्ज कर सकें, इस तरह आपके आस-पास समृद्धि होगी तो आपको और अच्छा लगेगा|
  • छोटी छोटी औपचारिकताओं को लेकर विवाद के बजाय हमारे ध्यान में बड़ा उद्देश्य हो जिसमे शिक्षा, उन्नयन हो, आत्मनिर्भरता, सम्पन्नता और समाज में एक उचित स्थान के लिए के एक -दूसरे का  वाजिब साथ हो
  • बच्चों में साहित्य को लेक्रर रुझान विकसित करना होगा जिससे एक दूसरे को समझना और समन्वय बैठना आसान हो सके |
  • अध्यात्म की समझ को लेकर रुझान ताकि छोटी और सतही  चीज़ में उलझे बिना  बच्चे सही उद्देश्य के लिए मेहनत कर सकें
  • जहाँ समाज का एक तबका पूरे मनोयोग से शक्ति और सम्पन्नता के लिए लगे हैं वहीँ समाज का एक बड़ा तबका आपस के मतभेद में उलझे हैं, एक दूसरे कि टांग खींच रहे, और नीचा दिखा रहे, ऐसा बिलकुल न हो सारे क्रिया कलापों का उद्देश्य ऐसा हो कि एक दूसरे कि उन्नति मे सहयोग करना है, और खुद भी अपने काम मे उत्कृष्टता लाकर बेहतरी हासिल करनी है |
  • खुश होना ही है तो खुद के काम मे उत्कृष्टता लाकर खुश हो, किसी को नीचा दिखाकर खुश होना तो बहुत सतही है, किसी ने कुछ बेहतर किया हो तो उसकी तारीफ करें उसके प्रयासों कि तारीफ करें ताकि समाज के और लोग भी उससे प्रेरणा लेकर बेहतर काम करे, किसी कि सफलता का श्रेय अगर किस्मत को देंगे तो फिर लोग अपने काम मे कौशल लाने के बजाय बस किस्मत चमकाने के उपाय करते फिरेंगे|
  • साहित्य की समझ तो इंसान की समझ को वृहद् करती है और समावेशी बनती है, इसीलिए खुद भी साहित्य पढ़ें नियमित रूप से और दूसरों को भी पढ़ने का सुझाव दें, अगर साहित्य अध्ययन से आपके जीवन मे शांति का समावेश होगा तो लोग भी प्रेरित होंगे |
  • शारीरिक रूप से मजबूती, व्यायाम के द्वारा सुनिश्चित करें ताकि इस शरीर रूपी साधन का उपयोग आप स्वयं कि बेहतरी और एक आज़ाद जीवन जीने के लिए कर सकें, उत्तेजक भोजन से बचें |
  • मानसिक मजबूती के सारे साधन, माने मानव मन और दुनिया की स्पष्ट समझ, एक बार समझ आ गयी तो अकेले रहने से भी डर न लगेगा, और ये जो दुनिया का दबाव होता है की अकेले छोड़ देंगे इससे मुक्ति मिल जाएगी|

बाकी बातें अगले भागों मे |
शुभकामनाएं 

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दूसरों की परवाह या खुद को आराम ?

अगर किसी इंसान की प्रकृति ही ऐसी है कि उसे बस अपनी सुविधा असुविधा दिखती है, दूसरों की उसे कोई परवाह नहीं है तो उसकी यह प्रकृति उसके एक-एक कार्य में दिखाई देंगी।

 

जैसे अगर वो किसी सड़क को रिपेयर करेगा तो बजडी वहीं छोड़ देगा, उसे इस बात से कोई सरोकार नहीं कि कोई वाहन उस पर फिसलकर गिर सकता है।

जैसे अगर उसके बालू खनन के डंपर चल रहे हैं तो वो ड्राइवर को पैसे नहीं देगा, उस डंपर को ढकने के लिए भले ही बालू उड़कर सड़क को गंदा करे या किसी की आंखों और फेफड़ों में जाए ‌।

 

अगर वो किसी सड़क के डिवाइडर बनाएगा तो उसमें पाइप और सरिया ऐसे ही छोड़ देगा भले ही किसी राहगीर के गिरते ही उसके सीने में घुस जाए।

 

सड़क ऐसी बनाएगा कि एक ही बरसात में ही उसमें गड्ढे बन जायें

 

स्वाद बढ़ाने के लिए मसालों में ऐसा रसायन मिला देगा कि उससे लोगों को कैंसर तक हो जाए‌।

एक दृष्टि डालते हैं खुद पर जब हमें कोई दिखता है जो लोगों के हित अहित को लेकर चिन्तित हो तो उससे हम क्या कहते हैं?

कि संयत होकर सोचो और बीच का रास्ता निकालो, जनहित को ऊपर रखो या फिर 

हम कहते हैं कि " अपना देखो दूसरों के बारे में इतना क्यों सोचना! "

हमारा जवाब क्या होगा इससे ही निर्धारित होता है कि समाज में किस तरह के लोगों की संख्या ज्यादा होगी।

 

विरोधाभास देखिए कि जो इंसान खुद दूसरों की सुविधा - असुविधा का ध्यान नहीं रखता वो भी दूसरों से अपेक्षा रखता है कि लोग उसकी सुविधा असुविधा का ध्यान रखें।

 

आप किस तरह का उदाहरण बनना चाहतें हैं?

 

किन लोगों में खुद की गिनती करवाना चाहते हैं ?

उनमें जो जो दूसरों की चिंता करते हैं और दिमाग पर जोर देकर रास्ता निकालते हैं या उनमें जो बस अपना आराम और अपना वित्तीय फायदा नुकसान देखते हैं और दूसरों की परवाह नहीं करते ?

 

जरूर विचार करिए और दूसरों से भी चर्चा करिए, समय निकालकर करिए |

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व्यवहार नहीं कार्य की गुणवत्ता, जिम्मेदारी और जवाबदेही का भाव देखिए

लोगों का आंकलन करते वक्त उनका व्यवहार नहीं उनके कार्य की गुणवत्ता, जिम्मेदारी लेनी की इच्छा और जवाबदेही का भाव देखिए।

जो इंसान कार्य के प्रति समर्पित है, संभावना है कि डेडलाइन के चलते या ज्यादा काम के चलते वो कभी-कभी अपने व्यवहार को संयत न रख पाए वहीं जो लोग कामचोर प्रवृत्ति के होते हैं, उनके लिए अपने व्यवहार को संयत रखना अपेक्षाकृत आसान होता है।

इसीलिए ये न देखिए कि कौन आपको हर त्योहार बधाई संदेश भेज रहा है या आपकी आत्मप्रशंसा की बातों में हां में हां मिला रहा है, बल्कि ये देखिए कि कौन अपने कार्यों और जिम्मेदारियों को अच्छे से पूरा कर रहा।

देश और समाज में समृद्धि और संपन्नता गुणवत्तापूर्ण और जिम्मेदारी के साथ किए गए कार्यों से आती है नकि बधाई संदेश फारवर्ड करने से।

-लवकुश कुमार 

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ख़ास कौन ?

ख़ास वो जो अपनी असहमति को खुलकर व्यक्त करने की स्पष्टता और साहस रखे,

ख़ास वो जो अपनी सुविधा-असुविधा के साथ दूसरों की सुविधा का भी ध्यान रखे,

ख़ास वो जो मानवता को केंद्र में रखकर परम्पराओं से हटने से भी गुरेज न करे,

ख़ास वो जो इंसान की सूरत नहीं सीरत को तरजीह दे,

ख़ास वो जो सच को सुविधा से ऊपर रखे,

ख़ास वो जो  सही को अच्छे बुरे से ऊपर रखे,

ख़ास वो जो सुख दुख से ऊपर कर्तव्य को रखे और कर्त्तव्य निर्धारण में सत्य को केंद्र में रखे

ख़ास वो जो  मान्यताओं की अपेक्षा तथ्य को सम्मान देने की हिम्मत रखे

खास वो जो  स्वयं से आगे समष्टि को रखे

अकेलेपन से डरने वाले सामाजिक गुलाम बनते हैं, इस तरह ख़ास वो जो अकेलेपन से न डरे

ख़ास वो जो चालाकी का जवाब समझदारी से दे 

 

सांसारिक संपत्ति, संपत्ति अर्जन, संचयन और प्रबंधन की काबिलियत दिखाता है, ऐसा इंसान अध्यात्मिक रूप से भी संपन्न हो ऐसा जरुरी नहीं|

 

हाँ अध्यात्मिक रूप से संपन्न इंसान के लिए जरुरी है की वो इतनी संपत्ति जरुर

अर्जित करके की आत्मनिर्भर और निर्भीक होकर जी सके तथा सच के  समर्थन में मजबूती से खड़ा हो सके |

 

-लवकुश कुमार 

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अजीब - एक लघुकथा

क्या बात है कनिष्क किन यादों में डूबे हो ? 

निशीथ ने अपने रूममेट से पूंछा।

 

यही कि लोग कितने अजीब हैं, जो लोग उन्हें तरह तरह के झूठ बोलकर अंधेरे में रखते हैं,

असहमत होने पर भी अपनी असहमति व्यक्त नहीं करते और पीठ पीछे बुराई करते हैं

और तो और ऐसे लोग उनसे अपने मन मुताबिक काम भी करवा लेते हैं, ऐसों से तो वो

बहुत नज़दीक रहते हैं और मेरे जैसे लोग ( गहरी सांस लेते हुये )

जो उनका भला चाहते हैं, उनकी सुविधा असुविधा का ख्याल रखते हैं

उनसे वो दूरी बना लेते हैं क्या केवल इसलिए कि मैं उनकी बात से

सहमत न होने पर तुरंत अपना पक्ष रख देता हूं, कितना अजीब है न ?

 

हां अजीब तो है, निशीथ ने एक लंबी सांस लेते हुए कहा।

 

ये और भी अजीब होगा अगर तुम ऐसे " अंधेर-पसंद " इंसान से मेल जोल न बढ़ पाने पर

दुखी होते रहोगे जो सामने वाले से हर बात में केवल

" हां बिल्कुल सही " सुनना चाहते हैं और सामने वाले के "जीवन में सत्य के स्थान" के

बजाय अपने प्रति "तथाकथित समर्पण" को ही मानदंड मानते हैं।

 

यह सुन कनिष्क कमरे से बाहर निकल आया और हास्टल की बालकनी पर खड़ा हो

नीचे से गुलाब के फूलों की महक से सनी ठंडी हवा के झोंके को अपने गालों पर महसूस

करते हुए अपनी पसंद की समीक्षा करने लगा।

 

-लवकुश कुमार

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