अगर किसी इंसान की प्रकृति ही ऐसी है कि उसे बस अपनी सुविधा असुविधा दिखती है, दूसरों की उसे कोई परवाह नहीं है तो उसकी यह प्रकृति उसके एक-एक कार्य में दिखाई देंगी।
जैसे अगर वो किसी सड़क को रिपेयर करेगा तो बजडी वहीं छोड़ देगा, उसे इस बात से कोई सरोकार नहीं कि कोई वाहन उस पर फिसलकर गिर सकता है।
जैसे अगर उसके बालू खनन के डंपर चल रहे हैं तो वो ड्राइवर को पैसे नहीं देगा, उस डंपर को ढकने के लिए भले ही बालू उड़कर सड़क को गंदा करे या किसी की आंखों और फेफड़ों में जाए ।
अगर वो किसी सड़क के डिवाइडर बनाएगा तो उसमें पाइप और सरिया ऐसे ही छोड़ देगा भले ही किसी राहगीर के गिरते ही उसके सीने में घुस जाए।
सड़क ऐसी बनाएगा कि एक ही बरसात में ही उसमें गड्ढे बन जायें
स्वाद बढ़ाने के लिए मसालों में ऐसा रसायन मिला देगा कि उससे लोगों को कैंसर तक हो जाए।
एक दृष्टि डालते हैं खुद पर जब हमें कोई दिखता है जो लोगों के हित अहित को लेकर चिन्तित हो तो उससे हम क्या कहते हैं?
कि संयत होकर सोचो और बीच का रास्ता निकालो, जनहित को ऊपर रखो या फिर
हम कहते हैं कि " अपना देखो दूसरों के बारे में इतना क्यों सोचना! "
हमारा जवाब क्या होगा इससे ही निर्धारित होता है कि समाज में किस तरह के लोगों की संख्या ज्यादा होगी।
विरोधाभास देखिए कि जो इंसान खुद दूसरों की सुविधा - असुविधा का ध्यान नहीं रखता वो भी दूसरों से अपेक्षा रखता है कि लोग उसकी सुविधा असुविधा का ध्यान रखें।
आप किस तरह का उदाहरण बनना चाहतें हैं?
किन लोगों में खुद की गिनती करवाना चाहते हैं ?
उनमें जो जो दूसरों की चिंता करते हैं और दिमाग पर जोर देकर रास्ता निकालते हैं या उनमें जो बस अपना आराम और अपना वित्तीय फायदा नुकसान देखते हैं और दूसरों की परवाह नहीं करते ?
जरूर विचार करिए और दूसरों से भी चर्चा करिए, समय निकालकर करिए |
लोगों का आंकलन करते वक्त उनका व्यवहार नहीं उनके कार्य की गुणवत्ता, जिम्मेदारी लेनी की इच्छा और जवाबदेही का भाव देखिए।
जो इंसान कार्य के प्रति समर्पित है, संभावना है कि डेडलाइन के चलते या ज्यादा काम के चलते वो कभी-कभी अपने व्यवहार को संयत न रख पाए वहीं जो लोग कामचोर प्रवृत्ति के होते हैं, उनके लिए अपने व्यवहार को संयत रखना अपेक्षाकृत आसान होता है।
इसीलिए ये न देखिए कि कौन आपको हर त्योहार बधाई संदेश भेज रहा है या आपकी आत्मप्रशंसा की बातों में हां में हां मिला रहा है, बल्कि ये देखिए कि कौन अपने कार्यों और जिम्मेदारियों को अच्छे से पूरा कर रहा।
देश और समाज में समृद्धि और संपन्नता गुणवत्तापूर्ण और जिम्मेदारी के साथ किए गए कार्यों से आती है नकि बधाई संदेश फारवर्ड करने से।
-लवकुश कुमार
ख़ास वो जो अपनी असहमति को खुलकर व्यक्त करने की स्पष्टता और साहस रखे,
ख़ास वो जो अपनी सुविधा-असुविधा के साथ दूसरों की सुविधा का भी ध्यान रखे,
ख़ास वो जो मानवता को केंद्र में रखकर परम्पराओं से हटने से भी गुरेज न करे,
ख़ास वो जो इंसान की सूरत नहीं सीरत को तरजीह दे,
ख़ास वो जो सच को सुविधा से ऊपर रखे,
ख़ास वो जो सही को अच्छे बुरे से ऊपर रखे,
ख़ास वो जो सुख दुख से ऊपर कर्तव्य को रखे और कर्त्तव्य निर्धारण में सत्य को केंद्र में रखे
ख़ास वो जो मान्यताओं की अपेक्षा तथ्य को सम्मान देने की हिम्मत रखे
खास वो जो स्वयं से आगे समष्टि को रखे
अकेलेपन से डरने वाले सामाजिक गुलाम बनते हैं, इस तरह ख़ास वो जो अकेलेपन से न डरे
ख़ास वो जो चालाकी का जवाब समझदारी से दे
सांसारिक संपत्ति, संपत्ति अर्जन, संचयन और प्रबंधन की काबिलियत दिखाता है, ऐसा इंसान अध्यात्मिक रूप से भी संपन्न हो ऐसा जरुरी नहीं|
हाँ अध्यात्मिक रूप से संपन्न इंसान के लिए जरुरी है की वो इतनी संपत्ति जरुर
अर्जित करके की आत्मनिर्भर और निर्भीक होकर जी सके तथा सच के समर्थन में मजबूती से खड़ा हो सके |
-लवकुश कुमार
क्या बात है कनिष्क किन यादों में डूबे हो ?
निशीथ ने अपने रूममेट से पूंछा।
यही कि लोग कितने अजीब हैं, जो लोग उन्हें तरह तरह के झूठ बोलकर अंधेरे में रखते हैं,
असहमत होने पर भी अपनी असहमति व्यक्त नहीं करते और पीठ पीछे बुराई करते हैं
और तो और ऐसे लोग उनसे अपने मन मुताबिक काम भी करवा लेते हैं, ऐसों से तो वो
बहुत नज़दीक रहते हैं और मेरे जैसे लोग ( गहरी सांस लेते हुये )
जो उनका भला चाहते हैं, उनकी सुविधा असुविधा का ख्याल रखते हैं
उनसे वो दूरी बना लेते हैं क्या केवल इसलिए कि मैं उनकी बात से
सहमत न होने पर तुरंत अपना पक्ष रख देता हूं, कितना अजीब है न ?
हां अजीब तो है, निशीथ ने एक लंबी सांस लेते हुए कहा।
ये और भी अजीब होगा अगर तुम ऐसे " अंधेर-पसंद " इंसान से मेल जोल न बढ़ पाने पर
दुखी होते रहोगे जो सामने वाले से हर बात में केवल
" हां बिल्कुल सही " सुनना चाहते हैं और सामने वाले के "जीवन में सत्य के स्थान" के
बजाय अपने प्रति "तथाकथित समर्पण" को ही मानदंड मानते हैं।
यह सुन कनिष्क कमरे से बाहर निकल आया और हास्टल की बालकनी पर खड़ा हो
नीचे से गुलाब के फूलों की महक से सनी ठंडी हवा के झोंके को अपने गालों पर महसूस
करते हुए अपनी पसंद की समीक्षा करने लगा।
-लवकुश कुमार