आज से कुछ साल पहले जब मैं कोई सीरियल या कोई फिल्म देखती थी तब मुझे वहां की स्वच्छता, वहां बड़े- बड़े घर, और बहुत सारी चीजें देख कर यह मन करता था कि काश यह सारी चीजें मेरे पास भी होती। इसीलिए मैं अपने घर को वैसा रखने की कोशिश करती थी लेकिन एक निम्न मध्यम वर्गीय परिवार और एक उच्च वर्ग के बीच समानता लाने की सोच भी जैसे एक बेवकूफी भरी सोच ही थी, लेकिन तब यह समझ नहीं थी कि चीजें सच में कैसी होती हैं? बस मैं यह सारी चीजें करना चाहती थी लेकिन जब मैं बड़ी हुई और चीजों को समझा और देखा की फिल्म की शूटिंग कैसे होती है तो मैंने देखा कि वहां पर जहां बड़ा घर होता था, वहां कुछ सेटअप ही था।
अब मैं सोचती हूं तो हँसी आती है कि मैं कितने बेवकूफी भरे सपने संजो रही थी। यहां मैंने यह इसलिए बताया है कि आप जब फिल्मों को या सीरियल्स को देखें तो इस बात का ध्यान रखें कि उसमें सच्चाई हो सकती है लेकिन पूरी फिल्म सच्ची हो जरूरी नहीं, नाटकीय रुपांतरण और असली हालात को पर्दे पर लाने की सीमित क्षमता, जैसे पहलू भी ध्यान रखें और नकल करने की कोशिश न करें, जरूरत नहीं, अपने विवेक से काम लें और इस बात को ध्यान रखें कि इंसान उन चीज़ों के लिए ही परेशान रहता है जिसकी उसे सबसे कम जरूरत है।
लोग सिनेमा से कितना ज्यादा प्रभावित हो सकते हैं? इसके बारे में कुछ कहना चाहती हूं जब हिटलर जर्मनी में शासक बना, उस समय वहाँ जो लोग कभी एक चींटी तक नहीं मार पाते थे, वह लोग इंसान तक को मार देने लगे थे, ऐसा वहां यहूदियों के प्रति फैलाई गई घृणा के कारण हुआ था।
लेकिन अब जर्मनी में जो नरसंहार हुआ था उसके चिन्ह रखे हुए हैं, लोग वहां पर जाते है तथा अपने पूर्वजों की गलतियों पर दुःख प्रकट करते हैं।आज जर्मनी एक विकसित राष्ट्र है।
प्रेम के उथले स्वरूप को भी कुछ गैर जिम्मेदाराना फिल्मों के चलते ही तवज्जो मिली और अनगिनत युवा डिप्रेशन की गर्त में चले गए।
आप भी सिनेमा, सीरिअल और न्यूज से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकते। आप अगर यह समझना चाहते है कि कानून और राजनीति कैसे हमारे सिनेमा या सीरिअल को प्रभावित करते है तो आप महिलाओं के लिए बनने वाले कानून और उनके समानांतर बनने वाले सीरिअल या फिल्म देखे, पहले महिलाओं को सिर्फ घर तक सीमित दिखाया गया है, फिर नर्स या टीचर के रूप में, फिर पुलिस या वकील के रूप में और अब आज के समय में महिलाओं पर भी हर तरह के रोल फ़िल्माये जाते है।
इसी तरह हमारे समाज में जिस विचारधारा की प्रबलता होती है, वो चाहे धार्मिक, सामाजिक,राजनीतिक,सांस्कृतिक उनकी छाप सिनेमा और सीरियल पर पड़ती ही है।
आप जब इन्हें देखे तो पूरा सच न माने, सच इसके आगे और इससे ज्यादा भी हो सकता है और अक्सर होता ही है। आज आपके पास इन्टरनेट है, आप जो देख रहे है, उसके विपरीत या उसकी समीक्षा भी देखिये या आप खुद उन चीजों पर विचार कर ले।
शुभकामनाएं
- सौम्या गुप्ता
सौम्या गुप्ता जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं, उनकी रचनाओं से जीवन, मानव संवेदना एवं मानव जीवन के संघर्षों की एक बेहतर समझ हांसिल की जा सकती है, वो बताती हैं कि उनकी किसी रचना से यदि कोई एक व्यक्ति भी लाभान्वित हो जाये, उसे कुछ स्पष्टता, कुछ साहस मिल जाये, या उसमे लोगों की/समाज की दिक्कतों के प्रति संवेदना जाग्रत हो जाये तो वो अपनी रचना को सफल मानेंगी, उनका विश्वास है कि समाज से पाने की कामना से बेहतर है समाज को कुछ देने के प्रयास जिससे शांति और स्वतंत्रता का दायरा बढे |
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शुभकामनाएं
मैं अक्सर सोचती हूँ कि कुछ लोग बिना काम किए ही कैसे सम्मान पा सकते हैं? लोगों के पास खूब पैसा होता है सिर्फ इसलिए!, भले ही वह काम के मामले में बहुत कम ही काम क्यों न करें।
ऐसा क्यों होता है? शायद ऐसा इसलिए क्योंकि अधिकतर लोगों की सोंच अब सामंतवादी हो चुकी है, कि जो काम नहीं करता है वही एक अच्छा जीवन जी रहा है और इसीलिए यह सम्मान देने योग्य इंसान है।
लेकिन हमारी भारतीय सभ्यता इससे बहुत ही अलग है अगर हम राजा जनक की बात करें तो वह भी बिल्कुल भी श्रम को कम महत्व नहीं देते थे। कृष्ण भी अपनी गायों को खुद चराते थे।
अगर हम भारतीय इतिहास की बात करें तो महात्मा गांधी भी श्रम को बहुत महत्व देते थे और अपना रोज़ का काम खुद से ही करते थे, वो किसी से अपना काम नहीं करवाते थे।
फिर हम लोगों के अंदर ऐसा भ्रम क्यों बैठा हुआ है कि जो श्रम करता है, वो कम सम्माननीय है। श्रम न करना, मन के द्वारा आपको आगे बढ़ने से रोकने के लिए किया गया एक खेल मात्र है।
श्रम करना शरीर की और आत्मा की जरूरत है, डार्विन का सिद्धांत है, उत्तरजिविता का सिद्धांत, जिसमें जो प्राणी लड़ता नहीं है, अपने जिन अंगों का उपयोग नहीं करता वो धीरे धीरे समाप्त हो जाते है, बिना श्रम के आप अपने शरीर का ही प्रयोग नहीं कर रहे है, उपरोक्त सिद्धांत के आधार पर आप अपना निष्कर्ष निकाल सकते हैं।
जिस दिन हम संघर्षों को और काम को सम्मान देना सीख जाएंगे, उस दिन हमारी बेरोजगारी की समस्या काफी हद तक कम हो जाएगी। आज बेरोजगारों में काफी लोग ऐसे हैं कि उन्हें कोई ऐसा काम नहीं मिल पाता है जो समाज की नजरों में सम्मानजनक हो!
ज्यादातर सम्मान वाले काम इस नजरिये से देखे जाते है कि इसमें काम कितना कम है, इसीलिए लोग सालों साल प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी में लगे रहते है और बेरोजगार रहते है।
बेरोजगारी जो हर बार चुनावी मुद्दा भी बनता है, वो इसलिए है क्योंकि लोग श्रम का सम्मान नहीं करते, मेरा व्यक्तिगत रूप से यही मानना है कि जब हम काम करना चाहते हैं तो काम मिल जाता है, उसमें पैसे कम हो सकते है लेकिन काम मिल जाता है।
किसी भी इंसान का सम्मान इसलिए नहीं करना चाहिए क्योंकि वो सफल हुआ या नहीं? उसको पैसे मिले, कितने मिले, बल्कि इस आधार पर करना चाहिए कि उस इंसान ने अपने उद्देश्य को पाने के लिए मेहनत कितनी की थी और कितने दिल से की थी, साथ ही उसका उद्देश्य कितना सच्चा था अगर उसकी मेहनत सच्ची है तो उसका सम्मान किया जाना चाहिए।
यही नजरिया बेरोजगारी को कुछ हद तक कम करने का शायद सबसे अच्छा और सबसे सही तरीका हो सकता है, तब ही ज्यादा से ज्यादा लोग संघर्ष को गले लगाकर कुछ नया, कुछ लीक से हटकर करने का जोखिम उठा पायेंगे क्योंकि तब लोगों के द्वारा उपहास की आशंका कम हो चुकी होगी।
शुभकामनाएं
- सौम्या गुप्ता
बाराबंकी उत्तर प्रदेश
सौम्या गुप्ता जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं, उनकी रचनाओं से जीवन, मानव संवेदना एवं मानव जीवन के संघर्षों की एक बेहतर समझ हांसिल की जा सकती है, वो बताती हैं कि उनकी किसी रचना से यदि कोई एक व्यक्ति भी लाभान्वित हो जाये, उसे कुछ स्पष्टता, कुछ साहस मिल जाये, या उसमे लोगों की/समाज की दिक्कतों के प्रति संवेदना जाग्रत हो जाये तो वो अपनी रचना को सफल मानेंगी, उनका विश्वास है कि समाज से पाने की कामना से बेहतर है समाज को कुछ देने के प्रयास जिससे शांति और स्वतंत्रता का दायरा बढे |
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शुभकामनाएं
संपूर्ण पुरुष समाज को समर्पित:-
मैं बचपन से ही इस बात को लेकर बहुत चिढ़ती थी कि भगवान ने मुझे लड़की क्यों बनाया? इतनी पाबंदियाँ झेलनी पड़ती है। लेकिन जब थोड़ी समझदार हुई, तो समझ आया कि लड़का होना भी आसान नहीं है। घर में अगर एक बेटा हो या बड़ा बेटा हो तो पिता की तबियत बिगड़ते ही वह बड़ा बेटा, चाहे जितना ही छोटा क्यों न हो, घर की सारी जिम्मेदारी संभालने की कोशिश में लग जाता है। मैंने महिलाओं को अक्सर यह कहते सुना है कि हमें तो कभी छुट्टी नहीं मिलती, और एक सीमा तक यह सच भी है कि महिलाएँ पुरुषों से ज्यादा घंटे काम करती हैं।
पर एक पक्ष यह भी है कि महिलाएँ बीमार होने पर थोड़ा कम खाना बना सकती हैं, कुछ काम कम कर सकती हैं, अगर परिवार अच्छा है तो, पर पुरुषों के पास यह सुविधा नहीं होती। लगभग हर मध्यमवर्गीय और निम्नवर्गीय परिवार का पुरुष न बीमार होने पर जल्दी डाॅक्टर के पास जा पाता है, न कोई छुट्टी लेता है। जब तक वो ल़डका रहता है,घर की जिम्मेदारियों से तालमेल, फिर बहन की शादी, फिर अपनी शादी और घर में वो भी उलझा सा ही रह जाता है।
भावनात्मक रूप से अगर कोई पुरुष टूट भी जाए, तो वो किसी के सामने रो भी नहीं सकता क्योंकि हमारे समाज में ये भ्रम फैला हुआ है कि 'मर्द को दर्द नहीं होता'। लड़कियों और महिलाओं से ये अभिव्यक्ति तो नहीं छीनी जाती। मुझे लगता है कि ये धारणा टूटनी ही चाहिए और महिलाओं को ये मोर्चा उठाना चाहिए कि वो हर तरह के इमोशन को अभिव्यक्त कर सकें और साथ ही पुरूषों को भी अपनी हर तकलीफ़ साझा करने के लिए प्रोत्साहित कर सकें, ऐसा महिलाओं को ही इसलिए करना चाहिए कि वो ही माँ, बहन, पत्नी के रूप में पुरुष के जीवन में सिखाने में सबसे अहम् भूमिका निभाती है।
अमूमन पुरुषों में हार्ट अटैक तथा अन्य ऐसी ही तनाव से जुड़ी हुई बीमारियों ज्यादा होती है क्योंकि वो अपने इमोशन को दबाकर करते है। मैंने पढ़ा था कही 'बिन घरनी घर भूत का डेरा' पर इस समाज को और देश को जितनी महिलाओं की जरूरत है उतनी पुरुषों की भी।
आज झूठे महिला सशक्तिकरण की आड़ में पर जो महिलाएँ यह कहती है कि पुरुषों ने हमारा दमन किया है तो अब हम भी करेंगे, उनसे मेरा कहना है कि हमारी शक्ति सृजन की है, विनाश की नहीं। दुनिया को आधा पुरुषों ने नष्ट कर दिया तो दुनिया को आधा हम भी नष्ट करेंगे- ये नहीं करना।
साथ मिलना है महिला और पुरुष दोनों को, चेतना के स्तर पर दोनों एक हो और दोनों मिलकर इस समाज, देश और दुनिया को बचाएं।
"इस दुनिया को प्यार की जरूरत है, बदले की नहीं। "
जो हमारे जीवन में एक अहम भूमिका निभाते है, हम सबको जरूरत है कि हम उनके प्रति पूर्वाग्रहों से मुक्ति पाए।
पुरुषों में भी संवेदना होती है, आप जयशंकर प्रसाद की रचना, नारी तुम केवल श्रद्धा हो, रचना पढ़ सकते है। कितने ही गाने ऐसे है जिनमें महिलाओं को पुरुष कितना अच्छे से समझ सकते है उनको आप समझ सकते हैं, एक गाने की लाइन है, मेरी छाया है जो, आपके घर चली, सपना बनके मेरी आँखों में है पली, मैंने जब ये देखा कि इसको लिखने वाला भी एक " पुरुष" है तो मेरे लिए ये चौकाने वाली बात थी, इसीलिए पुरुषों के प्रति अपनी अवधारणाओं को बदलने की जरूरत है।
शुभकामनाएं
- सौम्या गुप्ता
सौम्या गुप्ता जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं, उनकी रचनाओं से जीवन, मानव संवेदना एवं मानव जीवन के संघर्षों की एक बेहतर समझ हांसिल की जा सकती है, वो बताती हैं कि उनकी किसी रचना से यदि कोई एक व्यक्ति भी लाभान्वित हो जाये, उसे कुछ स्पष्टता, कुछ साहस मिल जाये, या उसमे लोगों की/समाज की दिक्कतों के प्रति संवेदना जाग्रत हो जाये तो वो अपनी रचना को सफल मानेंगी, उनका विश्वास है कि समाज से पाने की कामना से बेहतर है समाज को कुछ देने के प्रयास जिससे शांति और स्वतंत्रता का दायरा बढे |
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शुभकामनाएं
हमारी जिंदगी के बहुत से पल और कभी-कभी ज्ञान न होने पर पूरी जिंदगी ही चार लोगों को खुश करने में, चार लोगों की बातें मानने में ही निकल जाती हैं। हम अक्सर इन चार लोगों के करण पछताते भी रहते हैं। अगर लड़का हो तो रो मत अगर लड़की हो तो ऐसे मत करो, वैसे मत बैठो, ये मत करो, ऐसे हंसो, धीरे हंसो, बहुत सी बातें हम लोगों को समाज के नाम पर सिखाई जाती है। इन चार लोगों के कारण हम दौलत, shauhrat और पता नहीं क्या-क्या चाहते हैं? लोगों की सराहना पाने के लिए हम बहुत कुछ करने को तैयार रहते हैं। और फिर भी लोग जब हमसे खुश नहीं होते हैं तो हम सोचते हैं कि लोग क्या कहेंगे? और ऐसे ही हमारी जिंदगी निकलती जाती है। लेकिन ये सोचने की बात है क्या सच में हमारी जिंदगी सिर्फ इन्हीं चार लोगों के लिए है हम अपनी मर्जी से अपनी जिंदगी क्यों नहीं जीते हमेशा ये चार लोग ही क्यों?
हमारी वास्तविकता यही है कि हम कभी भी लोगों के हिसाब से खुद को या खुद के हिसाब से लोगों को नहीं बदल सकते। अगर हम खुश रहना चाहते हैं तो सबसे ज्यादा जरूरी है कि हम इन चार लोगों के सर्टिफिकेट पाने की कोशिश ना करें। हम जो बहुत से अच्छे लोग जो बातें कह गए हैं उनके बारे में सोचे, उन्हें पढ़े, अच्छे लोगों का साथ करें या अच्छी किताबों का साथ करे। ये चार लोग कभी बदलने वाले नहीं हैं। जो निष्कर्ष अच्छी किताबों और अच्छे लोगों से निकले उसके आधार पर निर्णय ले।
- सौम्या गुप्ता
सौम्या गुप्ता जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं, उनकी रचनाओं से जीवन, मानव संवेदना एवं मानव जीवन के संघर्षों की एक बेहतर समझ हांसिल की जा सकती है, वो बताती हैं कि उनकी किसी रचना से यदि कोई एक व्यक्ति भी लाभान्वित हो जाये, उसे कुछ स्पष्टता, कुछ साहस मिल जाये, या उसमे लोगों की/समाज की दिक्कतों के प्रति संवेदना जाग्रत हो जाये तो वो अपनी रचना को सफल मानेंगी, उनका विश्वास है कि समाज से पाने की कामना से बेहतर है समाज को कुछ देने के प्रयास जिससे शांति और स्वतंत्रता का दायरा बढे |
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शुभकामनाएं
आज से कुछ समय पहले पापा और उनके मित्र धर्म, राजनीति, समाज इन सब विषयों पर कुछ बातें कर रहे थे। उसी समय मैं वहां पहुंची और मैंने एक प्रश्न का उत्तर बहुत ही शानदार तरीके से दिया और कुछ देर तक मैं उन लोगों से बात भी करती रही जिन मुद्दों पर वे लोग बात कर रहे थे। पर मेरा तरीका थोड़ा सा तर्किक और अकादमिक स्तर का था। कुछ देर बाद ही पापा के मित्रों ने मुझे वहां से जाने के लिए कह दिया और कहा कि ये बाते बच्चों को नहीं करनी चाहिए। मुझे राजनीति, धर्म, समाज, दर्शनशास्त्र इन सभी विषयों पर बात करते हुए बहुत अच्छा लगता है और मुझमें इनकी एक स्तर की समझ भी है। मैंने उस समय सोचा कि क्यों मैं इन विषयों पर बात नहीं कर सकती?
शायद आज के समाज का एक हिस्सा लड़कियों को ऐसे मुद्दे जो पुरुषों के लिए ही समझे जाते थे उन पर लड़कियों को बात करने ही नहीं देना चाहता!
ऐसे लोगों को ये समझना चाहिए कि इस तरह वो दुनिया की आधी आबादी की विश्लेषण क्षमता और समझ का लाभ लेने से चूक रहे हैं, अगर न चूके तो दुनिया और बेहतर तथा संवेदनशील हो सकती है।
- सौम्या गुप्ता
सौम्या गुप्ता जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं, उनकी रचनाओं से जीवन, मानव संवेदना एवं मानव जीवन के संघर्षों की एक बेहतर समझ हांसिल की जा सकती है, वो बताती हैं कि उनकी किसी रचना से यदि कोई एक व्यक्ति भी लाभान्वित हो जाये, उसे कुछ स्पष्टता, कुछ साहस मिल जाये, या उसमे लोगों की/समाज की दिक्कतों के प्रति संवेदना जाग्रत हो जाये तो वो अपनी रचना को सफल मानेंगी, उनका विश्वास है कि समाज से पाने की कामना से बेहतर है समाज को कुछ देने के प्रयास जिससे शांति और स्वतंत्रता का दायरा बढे |
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शुभकामनाएं
अरे राजेश, ये किताब क्यों पैक कर रहे लिफाफे में?
मनीष भाई, गिफ्ट पैक हो रहा है गिफ्ट, अपने अतुल भाई की शादी के लिए।
अबे ! शादी में किताब कौन देता है?
क्यों? जरूरी है क्या जो परंपरा चल रही है उसी हिसाब से चले, कुछ नया नहीं कर सकते ?
भाई, मेरा मतलब है कि एंजॉयमेंट के दिन किताब !
अरे मनीष भाई उस दिन पढ़ने के लिए थोड़ी न है, यह तो एक पहल है कि जब दो लोग एक साथ मिल रहे हैं, एक दूसरे को उन्नति देने, एक दूसरे का साथ देने, एक दूसरे का ख्याल रखने को तो क्यों ना उस नेक काम की शुरुआत के आधार में एक अच्छी किताब हो, जिसकी कहानियां, नवयुगल में संवेदनशीलता लाएं, परस्पर सम्मान की भावना लाएं, एक दूसरे की गरिमा का सम्मान करने की इच्छा लाए, एक दूसरे की व्यक्तिगत चॉइस के साथ सामंजस्य बनाने की और समन्वय स्थापित करने की क्षमता निर्माण पर इशारा करें। इससे बढ़िया गिफ्ट और क्या हो सकता है जो उनकी शादी में प्रेम और आपसी सम्मान भरे और असहमति के बजाय सहमति के मुद्दों पर जोर देने को प्रेरित कर, हर निर्णय के केंद्र में जीवन की शांति को रखने को प्रेरित करें।
वह राजेश भाई बढ़िया लेक्चर देते हो, लेक्चर बाज आदमी हो एकदम, हाहाहा....
हां भाई क्यों नहीं, मेरे लेक्चर से अगर किसी के जीवन में शांति आ जाए तो मैं लेक्चर बाज ही सही।
दोनों हंसने लगते हैं..
एक नई पहल, एक बेहतरीन किताब, एक अमूल्य भेंट का रूप ले चुकी थी।
- लवकुश कुमार
लेखक भौतिकी में परास्नातक हैं और उनके लेखन का उद्देश्य समाज की उन्नति और बेहतरी के लिए अपने विचार साझा करना है ताकि उत्कृष्टता, अध्ययन और विमर्श को प्रोत्साहित कर देश और समाज के उन्नयन में अपना बेहतर योगदान दिया जा सके, साथ ही वह मानते हैं कि सामाजिक विषयों पर लेखन और चिंतन शिक्षित लोगों का दायित्व है और उन्हें दृढ़ विश्वास है कि स्पष्टता ही मजबूत कदम उठाने मे मदद करती है और इस विश्वास के साथ कि अच्छा साहित्य ही युवाओं को हर तरह से मजबूत करके देश को महाशक्ति और पूर्णतया आत्मनिर्भर बनाने मे बेहतर योगदान दे पाने मे सक्षम करेगा, वह साहित्य अध्ययन को प्रोत्साहित करने को प्रयासरत हैं,
जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना आपके जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट ।
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क्या ये कोई ट्रेंड चल रहा है ? कि हर प्रोफेशनल रिलेशन में कई लोग व्यक्तिगत संबंध पाने की कोशिश करते हैं शायद उन्हें भ्रम है कि जो व्यक्तिगत रूप से जुड़ेगा वही उनका हित कर पायेगा, लेकिन वास्तविकता ये है कि संवेदनशील लोग सबका भला करते हैं वह उनसे व्यक्तिगत रूप से जुड़े हो या फिर व्यावसायिक रूप से जड़े हों, इसलिए बेहतर यह है कि हम अपना कार्य अच्छे से करें और अपने व्यावसायिक संबंधों को अच्छा रखें उसके बाद ही हम अपने अधिकारों पर बात करें तो उनकी सुनवाई अच्छे से होगी।
ऐसा देखा गया है कि चापलूसी प्रिय व्यक्ति लोगों के कार्यों की बजाय उनके व्यवहार और उनकी हां मे हां मिलाने की आदत पर ज्यादा ध्यान देते हैं, लेकिन यह एक गलत प्रथा है इससे गुणवत्ता प्रभावित होती है।
अगर हम अपने कार्य की गुणवत्ता और कार्य में ईमानदारी पर ध्यान देने की बजाय व्यक्तिगत रूप से लोगों को खुश करने के चक्कर में पड़ेंगे तो झूठी और सतही औपचारिकताओं, दबाव, समय की बर्बादी और धोखे का सामना करने की परिस्थिति बनाएंगे।
काम में गुणवत्ता की भावना को अपना जीवन मूल्य बनाएं।
- शुभकामनाएं
- लवकुश कुमार
लेखक भौतिकी में परास्नातक हैं और उनके लेखन का उद्देश्य समाज की उन्नति और बेहतरी के लिए अपने विचार साझा करना है ताकि उत्कृष्टता, अध्ययन और विमर्श को प्रोत्साहित कर देश और समाज के उन्नयन में अपना बेहतर योगदान दिया जा सके, साथ ही वह मानते हैं कि सामाजिक विषयों पर लेखन और चिंतन शिक्षित लोगों का दायित्व है और उन्हें दृढ़ विश्वास है कि स्पष्टता ही मजबूत कदम उठाने मे मदद करती है और इस विश्वास के साथ कि अच्छा साहित्य ही युवाओं को हर तरह से मजबूत करके देश को महाशक्ति और पूर्णतया आत्मनिर्भर बनाने मे बेहतर योगदान दे पाने मे सक्षम करेगा, वह साहित्य अध्ययन को प्रोत्साहित करने को प्रयासरत हैं,
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अक्सर लोगों को बात करते सुना है कि " दान तो हम भी करते हैं लेकिन बताते नहीं फिरते या वाट्सऐप स्टेटस नही लगाते! "
आज के बदलते परिदृश्य में जब आम इंसान स्व केंद्रित होता जा रहा और उसकी व्यक्तिगत चाह और आवश्यकताएं इतनी बढ़ती जा रही हैं कि दूसरों की तकलीफ़ या सामाजिक सरोकार के कार्यों के लिए उसके लिए समय पैसा या अन्य संसाधन निकाल पाना मुश्किल होता जा रहा है, तब ऐसी हालत में किसी इंसान की व्यक्तिगत मदद में उसकी गोपनीयता का सम्मान करते हुए, अन्य संस्थागत मामलों में सामाजिक सरोकार के किए गए कार्यों का निस्वार्थ प्रचार एक निंदनीय नहीं सराहनीय कार्य है, इससे अन्य लोग प्रेरित होंगे और अपने व्यक्तिगत समस्याओं के साथ सामाजिक सरोकार के कार्यों के लिए भी प्रयत्न करेंगे, यथा: रक्तदान, श्रमदान, संस्था को वित्तीय मदद, वस्त्रदान इत्यादि।
- आरती
लेखिका संस्कृत में परास्नातक हैं और हिंदी में परास्नातक की विद्यार्थी साथ ही सामाजिक मुद्दों और राष्ट्रहित के मामलों पर चिंतन उनकी दिनचर्या की प्राथमिकताओं में शामिल है।
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अपनी शादी तय होने की बात पर रश्मि का गुस्सा फूट पड़ा माँ पर... "क्या चाहती हैं आप? क्यों पर कुतरना चाह रही हैं मेरे|"
"उन्मुक्त हो उड़ रही हो| तुम्हारी उड़ान पर किसी ने पाबन्दी लगायी क्या कभी ?" माँ ने रोष में जवाब दिया|
"हाँ माँ लगाई! " खीझकर रश्मि बोली|
"तुम्हें पढ़ाया-लिखाया, तुमने जो चाहा, तुम्हें वो दिया| कौन-सी पाबन्दी लगाई तुम पर?"
"तेईस की उम्र में ही पाँव में बेड़िया डाल दीं आपने और पूछ रही हैं कौन-सी पाबन्दी लगायीं? खुला आकाश बाहें फैलाये मेरे स्वागत के लिए बेताब था, पर आपने तो मेरे पर ही कतर दिए|"
"ऐसा क्यों बोल रही है? शादी तो करनी ही थी तेरी| अच्छा लड़का बड़े भाग्य से मिलता है| तेरे पापा के अंडर ट्रेनिंग किया है| तेरे पापा कह रहे थे एक दिन एक कामयाब आईपीएस बनेगा|"
"हाँ माँ, पापा की तरह कामयाब आइपीएस तो होगा, पर पापा की तरह पति भी बन गया तो?" उसके चेहरे पर कई भाव आये और चले गये|
बेटी के शब्द सुमन के दिल में 'जहर बुझे तीर' से चुभे| चेहरे पर उभर आए दर्द को छुपाते हुए बोली- "भाग्य का लिखा कोई मिटा सकता है क्या?"
"हाँ माँ, मिटा सकता है... जैसे पापा ने, आपका इस्तीफा दिलाकर मिटाया, आपका अपना भाग्य| नहीं तो आज आप पापा से भी बड़ी अफसर होतीं, पर... वे अपनी लकीर बड़ी तो खींच नहीं पाए, पर आपकी लकीर को छोटी... छोड़िए, उन्होंने तो उस लकीर का वजूद ही मिटा दिया |"
© सविता मिश्रा 'अक्षजा'
ईमेल-2012.savita.mishra@gmail.com
अक्षजा जी को पढ़ना संवेदना जगाता है और स्पष्टता से भर देता है, आपने अपनी रचनाओं से मानवीय रिश्तों, संघर्षों, विरोधाभासों प्रकाश डालते हुए या कहें की ध्यान खींचते हुए एक शांतिमय और समृद्ध जीवन / दुनिया के लिए तरह तरह की विधाओं में साहित्य रचकर साहित्य कोश में अमूल्य योगदान दिया है, आपने लघुकथा, कहानी, व्यंग्य, छंदमुक्त कविता, पत्र, आलेख, समीक्षा, जापानी-विधा हाइकु-चोका आदि विधाओं में ढेरों रचनाएं साहित्य कोश को अर्पण की हैं, आपकी 'रोशनी के अंकुर' एवं 'टूटती मर्यादा' लघुकथा संग्रह तथा ‘सुधियों के अनुबंध’ कहानी संग्रह के साथ अस्सी के लगभग विभिन्न विधाओं में साझा-संग्रहों में रचनाएँ प्रकाशित हैं और 'खाकीधारी' 2024{लघुकथा संकलन} 'अदृश्य आँसू' 2025 {कहानी संकलन} 'किस्से खाकी के' 2025 {कहानी संकलन} 'उत्तर प्रदेश के कहानीकार' 2025 {कथाकोश} का सम्पादन भी किया, आप लघुकथा/समीक्षा/कहानी/व्यंग्य / कविता विधा में कई बार पुरस्कृत हैं| आदरणीय लेखिका के बारे में और इनकी अन्य रचनाओं, योगदान, सम्प्रतियों के बारे में जानने के लिए यहाँ क्लिक करें|
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आप इतना खुलकर कैसे बात कर लेते है, क्या आपको डर नहीं लगता? कि सामने वाला आपके बारे में गलत सोच सकता है?
नहीं मुझे लोगों का डर नहीं लगता क्योंकि मैंने शराफत का लबादा नहीं ओढ़ रखा है।
©लवकुश कुमार
लेखक भौतिकी में परास्नातक हैं और उनके लेखन का उद्देश्य समाज की उन्नति और बेहतरी के लिए अपने विचार साझा करना है ताकि उत्कृष्टता, अध्ययन और विमर्श को प्रोत्साहित कर देश और समाज के उन्नयन में अपना बेहतर योगदान दिया जा सके, साथ ही वह मानते हैं कि सामाजिक विषयों पर लेखन और चिंतन शिक्षित लोगों का दायित्व है और उन्हें दृढ़ विश्वास है कि स्पष्टता ही मजबूत कदम उठाने मे मदद करती है और इस विश्वास के साथ कि अच्छा साहित्य ही युवाओं को हर तरह से मजबूत करके देश को महाशक्ति और पूर्णतया आत्मनिर्भर बनाने मे बेहतर योगदान दे पाने मे सक्षम करेगा, वह साहित्य अध्ययन को प्रोत्साहित करने को प्रयासरत हैं,
जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना आपके जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट ।
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