लगभग हर दौर में दो तरह के लेखक रहे हैं—एक वे जो भाषा की अंतिम चमक-दमक और शिल्प पर वर्षों काम करते हैं, और दूसरे वे जो समय की पुकार सुनकर तत्काल बोलते हैं। समाज को दोनों की आवश्यकता होती है।
मेरी पुस्तक "अंतस – ज़रा ठहरिए" पर पिछले कुछ दिनों में अनेक प्रतिक्रियाएँ मिलीं। इन प्रतिक्रियाओं में एक रोचक अंतर दिखाई दिया।
किशोर और युवा पाठकों का एक बड़ा वर्ग कह रहा है—
"सर, यही तो हम ढूँढ़ रहे थे।"
"बहुत से ऐसे सवाल पहली बार पढ़ने को मिले जिन पर हमने कभी सोचा ही नहीं था, या इस तरह से नहीं सोचा था।"
"यह किताब जैसे हमारी पीढ़ी के लिए ही लिखी गई है।"
इन प्रतिक्रियाओं को पढ़कर संतोष होता है, क्योंकि पुस्तक का उद्देश्य भी यही था—युवाओं/किशोरों को कुछ महत्वपूर्ण प्रश्नों की ओर ले जाना।
लेकिन दूसरी ओर कुछ वरिष्ठ और गंभीर पाठकों ने भाषा, शैली, संपादन, टाइपिंग तथा अभिव्यक्ति की कमियों/विस्तार/गहराई की ओर भी ध्यान दिलाया है। मैं उनका भी उतना ही आभारी हूँ।
वास्तव में, दोनों प्रकार की प्रतिक्रियाएँ मेरे लिए मूल्यवान हैं।
फिर भी, इस अवसर पर मैं अपनी लेखकीय दृष्टि स्पष्ट करना चाहता हूँ।
मैंने यह पुस्तक भाषा का चमत्कार दिखाने के लिए नहीं लिखी।
मैंने यह पुस्तक इसलिए लिखी क्योंकि मुझे लगा कि आज का किशोर और युवा बहुत सारी सूचनाओं के बीच रहकर भी बहुत से बुनियादी प्रश्नों से दूर होता जा रहा है।
मुझे ऐसा लगता है, या कहिए कि मैंने अपनी सीमित दृष्टि में ऐसा देखा है कि:
वह करियर पर बात करता है,
लेकिन जीवन पर कम।
वह सफलता पर चर्चा करता है,
लेकिन संतोष पर नहीं।
वह प्रतियोगिता समझता है,
लेकिन स्वयं को कम समझता है।
वह दुनिया को बदलना चाहता है,
लेकिन अपने भीतर झाँकने का समय नहीं निकाल पाता।
यदि यह पुस्तक उसे थोड़ी देर रुककर सोचने पर विवश करती है, तो मुझे लगता है कि इसका सबसे बड़ा उद्देश्य पूरा हो जाता है।
निश्चित रूप से हैं।
मैं यह दावा कभी नहीं करूँगा कि यह एक परिपूर्ण पुस्तक है।
भाषा की सीमाएँ हो सकती हैं।
संपादन में त्रुटियाँ हो सकती हैं।
टाइपिंग की गलतियाँ भी हो सकती हैं।
जो मित्र इन कमियों की ओर संकेत कर रहे हैं, वे वास्तव में मेरी सहायता कर रहे हैं। अगली आवृत्तियों में इन्हें सुधारना मेरी जिम्मेदारी है।
लेकिन मैं एक बात अवश्य कहना चाहूँगा—
हर प्रकार की त्रुटि समान महत्व की नहीं होती।
एक त्रुटि भाषा में हो सकती है।
दूसरी त्रुटि समय पर न बोलने की हो सकती है।
मेरे लिए दूसरी त्रुटि अधिक गंभीर है।
मै मानता हूँ कि, समय पर कही गई अपूर्ण बात, देर से कही गई परिपूर्ण बात से अधिक उपयोगी हो सकती है।
दूसरा यदि मेरे द्वारा उठाए गए किसी प्रश्न पर गहराई से नहीं भी लिखा गया तो उसका कारण, एक ही किताब में कई सारे जरूरी प्रश्न शामिल करना था, कहते हैं समझदार के लिए इशारा काफी होता है, वैसे जिज्ञासु पाठक के लिए इच्छित विषय पर गहनता से जानने के लिए वरिष्ठ लेखकों का साहित्य भी मौजूद है, इसी के दृष्टिगत ही तो मैंने पुस्तकों की एक सूची भी दे रखी है मेरी पुस्तक के अंत में|
आज का समय तेजी से बदल रहा है।
बच्चे और युवा प्रतिदिन हजारों संदेशों, वीडियो और विचारों से घिरे हैं।
ऐसे समय में यदि कोई लेखक यह सोचकर वर्षों तक चुप रहे कि अभी भाषा और बेहतर हो जाए, शैली और निखर जाए, प्रत्येक वाक्य पूर्ण हो जाए, तब तक शायद जिन प्रश्नों पर बात करनी थी, वे और अधिक जटिल हो चुके होंगे।
मैं पूर्णता का विरोध नहीं करता।
बल्कि मैं स्वयं उसे पाने की दिशा में उन्मुख हूँ।
लेकिन मैं यह भी मानता हूँ कि जरूरी बात समय पर कही जानी चाहिए।
पूर्णता की यात्रा चलती रह सकती है।
मौन की भरपाई बाद में नहीं हो सकती।
अक्सर हम मान लेते हैं कि लेखक पुस्तक लिखने के बाद पूर्ण हो जाता है।
मेरा अनुभव इससे बिल्कुल अलग है।
मेरे लिए हर पाठक एक शिक्षक है।
कोई भाषा सिखाता है।
कोई विचारों की गहराई दिखाता है।
कोई संपादन की आवश्यकता बताता है।
कोई यह विश्वास दिलाता है कि पुस्तक ने उसके जीवन में कुछ बदल दिया।
इन सभी से मैं सीख रहा हूँ।
तो मेरे लिए यह उपलब्धि किसी भी भाषाई प्रशंसा से कम नहीं है।
साहित्य का अंतिम उद्देश्य केवल भाषा का सौंदर्य नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर चेतना जगाना भी है।
मैं अपने सभी आलोचकों और शुभचिंतकों का हृदय से धन्यवाद करता हूँ।
जो कमियाँ बता रहे हैं, वे भी मेरी यात्रा के साथी हैं।
जो पुस्तक के उद्देश्य को समझ रहे हैं, वे भी।
मैं भविष्य में भाषा, शिल्प और संपादन—सभी पर अधिक मेहनत करूँगा।
लेकिन यदि मुझे फिर कभी चुनाव करना पड़े कि एक जरूरी बात आज कहूँ या उसे पूर्ण बनाने के लिए वर्षों तक रोककर रखूँ, तो संभवतः मैं फिर वही करूँगा जो इस पुस्तक के साथ किया—
समय की पुकार को प्राथमिकता दूँगा।
क्योंकि मेरा विश्वास है—
पूर्णता एक सतत यात्रा है, पर समय पर की गई सार्थक अभिव्यक्ति कभी-कभी एक पूरी पीढ़ी की दिशा बदल सकती है।
मैं आलोचना को स्वीकार करता हूँ, सुधार के लिए प्रतिबद्ध हूँ, लेकिन समय पर आवश्यक संवाद को पूर्णता की प्रतीक्षा में स्थगित करना उचित नहीं मानता।
सादर धन्यवाद
लवकुश कुमार
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कुछ दिन पहले सोशल मीडिया पर एक पोस्ट पढ़ी। उसमें एक लेखिका ने लिखा कि उन्होंने किसी की प्रशंसा सुनकर एक पुस्तक खरीदी, लेकिन उन्हें वह पसंद नहीं आई। उन्होंने अपना अनुभव फेसबुक पर साझा किया। यह उनका व्यक्तिगत अनुभव था और उसे व्यक्त करने का अधिकार भी उन्हें है। लेकिन उस पोस्ट को पढ़ते हुए मेरे मन में एक बड़ा प्रश्न उठा—क्या हमारी अभिव्यक्ति का तरीका कभी-कभी अनजाने में पढ़ने-लिखने की संस्कृति को भी नुकसान पहुँचा सकता है?
यह लेख किसी व्यक्ति के पक्ष या विपक्ष में नहीं है। यह उस व्यापक चिंता पर विचार करने का प्रयास है कि जिस समाज में वैसे ही पुस्तकें कम पढ़ी जाती हों, वहाँ हम अपने शब्दों से कैसी साहित्यिक संस्कृति बना रहे हैं।
हम अक्सर कहते हैं कि लोग किताबें नहीं पढ़ते। मोबाइल, सोशल मीडिया और त्वरित मनोरंजन ने पढ़ने की आदत को कमज़ोर कर दिया है। लेकिन क्या केवल यही कारण हैं? या हम स्वयं भी अनजाने में ऐसी मानसिकता बना रहे हैं जिसमें पुस्तकें, लेखक और पढ़ने की प्रक्रिया कम महत्वपूर्ण दिखाई देने लगती है?
जब मैं लोगों से किताबों पर बात करता हूँ तो कई बार एक वाक्य सुनने को मिलता है—"फलाँ वक्ता तो बस अपनी किताब बेचने की फिराक में है।"
यह सुनकर मुझे आश्चर्य होता है। यदि कोई व्यक्ति तर्कपूर्ण बातें कर रहा है, हमें अपने अंतर्विरोधों से परिचित करा रहा है, हमारी सोच को चुनौती दे रहा है, या हमारे भीतर छिपी संभावनाओं को पहचानने में मदद कर रहा है, तो फिर उसकी पुस्तक बेचने में समस्या क्या है? क्या किसी लेखक को अपनी वर्षों की मेहनत का पाठक मिलना अपराध है?
हम पुस्तक को संवाद का माध्यम मानने के बजाय केवल एक उत्पाद क्यों मानने लगे हैं?
एक अच्छी पुस्तक केवल सूचना नहीं देती, वह हमारे अनुभव का विस्तार करती है। वह हमें अपने से भिन्न लोगों, संस्कृतियों, विचारों और समयों से मिलाती है। कई बार वह हमारे भीतर ऐसे प्रश्न पैदा करती है जिनका उत्तर हमें वर्षों बाद मिलता है। पुस्तक का मूल्य केवल इस बात से नहीं आँका जा सकता कि उसने पढ़ते ही हमें "वाह!" कहने पर मजबूर किया या नहीं।
आज एक और प्रवृत्ति दिखाई देती है। यदि किसी पुस्तक से तुरंत आनंद नहीं मिला, कोई बिल्कुल नया विचार नहीं मिला, या वह हमारी अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतरी, तो हम सार्वजनिक रूप से उसके बारे में नकारात्मक टिप्पणी कर देते हैं। इसमें कोई बुराई नहीं कि हम अपनी असहमति व्यक्त करें। स्वस्थ आलोचना साहित्य की आवश्यकता है। लेकिन आलोचना और निरुत्साहन में एक सूक्ष्म अंतर होता है।
हमें स्वयं से पूछना चाहिए—हम पढ़ते किसलिए हैं?
क्या केवल नया जानने के लिए?
क्या केवल मनोरंजन के लिए?
क्या केवल सौन्दर्यबोध के लिए?
या फिर स्वयं को थोड़ा और समझने के लिए?
कई बार कोई पुस्तक हमें नया कुछ नहीं बताती, बल्कि वही बात अधिक स्पष्टता, संवेदनशीलता या गहराई से समझाती है जिसे हम पहले से जानते थे। क्या यह कम उपलब्धि है? हर पुस्तक का उद्देश्य क्रांतिकारी विचार प्रस्तुत करना नहीं होता। कुछ पुस्तकें प्रश्न जगाती हैं, कुछ अनुभव बाँटती हैं, कुछ भाषा का सौन्दर्य दिखाती हैं, कुछ प्रेरित करती हैं, और कुछ केवल यह एहसास कराती हैं कि हम अपनी उलझनों में अकेले नहीं हैं।
हर पुस्तक हर पाठक के लिए नहीं होती।
जो पुस्तक किसी को साधारण लगे, वही किसी दूसरे व्यक्ति के जीवन की दिशा बदल सकती है। जिस कविता में एक व्यक्ति को कुछ न मिले, वही दूसरे के भीतर वर्षों से दबे भावों को शब्द दे सकती है। इसलिए किसी पुस्तक पर अंतिम निर्णय देने से पहले यह स्वीकार करना भी आवश्यक है कि हमारी प्रतिक्रिया एक व्यक्तिगत अनुभव है, सार्वभौमिक सत्य नहीं।
आज के समय में पुस्तकों के सामने एक और चुनौती है—प्रचार।
अक्सर कहा जाता है कि अच्छी पुस्तक को प्रचार की आवश्यकता नहीं होती। यह बात शायद उस समय सही रही होगी जब पुस्तकों के अलावा ज्ञान के बहुत कम माध्यम थे। लेकिन आज लाखों सूचनाओं के बीच यदि किसी पुस्तक की चर्चा ही न हो, तो पाठक उसके अस्तित्व से भी परिचित नहीं हो पाएगा।
प्रचार और अतिशयोक्ति में अंतर है।
यदि कोई पाठक किसी पुस्तक की अच्छाइयों की चर्चा करता है, तो वह केवल लेखक का नहीं, बल्कि पढ़ने की संस्कृति का भी समर्थन करता है। मैं स्वयं इसका अनुभव कर चुका हूँ। मेरी अपनी वेबसाइट को मित्रों का सहज समर्थन मिलने में लगभग दो वर्ष लग गए। तब मैंने सोचा—हम अपने मित्रों के अच्छे कार्यों का उल्लेख करने में इतना संकोच क्यों करते हैं? क्या हमें डर रहता है कि कहीं लोग इसे पक्षपात न समझ लें? या फिर हमने प्रशंसा को भी संदेह की दृष्टि से देखना शुरू कर दिया है?
एक समाज की बौद्धिक संस्कृति केवल लेखकों से नहीं बनती; वह पाठकों, शिक्षकों, मित्रों, पुस्तकालयों, समीक्षकों और संवादों से मिलकर बनती है।
यदि लेखक ही लगातार एक-दूसरे को छोटा सिद्ध करने में लगे रहें, तो उन लोगों की दृष्टि में लेखकों की छवि कैसी बनेगी जो पहले से ही पुस्तकों को अनावश्यक मानते हैं? स्वस्थ असहमति और कठोर अवमानना में अंतर होता है। साहित्य का विकास बहस से होता है, उपहास से नहीं।
इसका अर्थ यह नहीं कि पुस्तकों की आलोचना बंद कर दी जाए। बिल्कुल नहीं। बल्कि आलोचना और भी अधिक होनी चाहिए—पर वह ऐसी हो जो पाठक को सोचने के लिए प्रेरित करे, न कि पढ़ने से ही विमुख कर दे।
शायद पुस्तकों की समीक्षा लिखते समय कुछ बातें ध्यान रखी जा सकती हैं—
यह स्पष्ट किया जाए कि यह मेरा व्यक्तिगत पाठकीय अनुभव है।
पुस्तक किन पाठकों के लिए अधिक उपयोगी हो सकती है, इसका उल्लेख किया जाए।
केवल कमियाँ नहीं, उसकी विशेषताओं पर भी बात की जाए।
यदि पुस्तक हमारी अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतरी, तो उसके कारण बताए जाएँ।
लेखक के व्यक्तित्व और पुस्तक की समीक्षा को अलग रखा जाए।
कभी-कभी मुझे लगता है कि पुस्तकों पर एक प्रकार का "अस्वीकरण" होना चाहिए—यह पुस्तक किन पाठकों के लिए लिखी गई है, इसका संकेत दिया जाए। जैसे विज्ञान की पुस्तक और कविता की पुस्तक का उद्देश्य अलग होता है; वैसे ही आत्मकथा, दर्शन, उपन्यास, शोध और प्रेरक साहित्य की अपेक्षाएँ भी अलग-अलग होती हैं। इससे पाठक अपनी रुचि और आवश्यकता के अनुसार चयन कर सकेगा और अनावश्यक निराशा भी कम होगी।
यह बात सत्य है कि लोग एक दूसरे की पुस्तकों के सकारात्मक पहलू को पाठकों के सामने लाते हैं, क्या कोई और भी तरीका है? इससे बेहतर और क्या तरीका हो सकता है पुस्तकों के बारे मे अधिक से अधिक लोगों को बताने का? क्या इसमें कुछ गलत है? गलत तो तब है जब झूठी तारीफ की जाए, इसीलिए अब जब पुस्तक छपवाना आसान होता जा रहा है तो इस बात की जरूरत आन पड़ी है कि भूमिका से पहले एक पृष्ठ इस बात पर हो कि पुस्तक किनके लिए फायदेमंद हो सकती है और पाठकों के किस वर्ग के लिए लिखी गयी है|
अंततः प्रश्न किसी एक पुस्तक या एक लेखक का नहीं है। प्रश्न यह है कि क्या हम ऐसा वातावरण बना रहे हैं जहाँ अधिक लोग पढ़ने के लिए प्रेरित हों, या ऐसा वातावरण जहाँ लोग पुस्तक खरीदने से पहले ही संदेह से भर जाएँ।
यदि हम चाहते हैं कि आने वाली पीढ़ियाँ अधिक पढ़ें, अधिक सोचें और अधिक संवेदनशील बनें, तो हमें केवल अच्छी पुस्तकें लिखने की नहीं, बल्कि पढ़ने की संस्कृति को भी सहेजने की आवश्यकता है।
क्योंकि पुस्तकें केवल पन्नों का संग्रह नहीं होतीं; वे मनुष्य और मनुष्य के बीच चलने वाला सबसे लंबा, सबसे शांत और सबसे गहरा संवाद होती हैं। और किसी भी सभ्यता का भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि वह इस संवाद को कितना जीवित रख पाती है।
शुभकामनाएँ
लवकुश कुमार
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समर्पण गलत नहीं होता
पर सच है यह कि,
यह भाव सबके लिए
लाना भी नहीं होता।
हो समर्पण सत्य के प्रति
सत्यवादी तुम बनोगे,
हो समर्पण कृष्ण के प्रति
तो कृष्ण जैसे तुम बनोगे।
तुम बनोगे कंस या कृष्ण
यह भी होगा इसी से निश्चित,
कि समर्पण किसके प्रति है?
कर्ण भी तो था समर्पित
पर समर्पण असत्य के प्रति,
दानवीर था वो ऐसा कि
जैसा न कोई और जगत् में,
कुरु वंश भी ठना हुआ था
पर ठना था अन्याय के प्रति,
नारायणी सेना थी पाई
फिर भी हारे महाभारत में,
आज भी वो निंदनीय हैं
क्योंकि वो थे समर्पित गलत के प्रति।
हनुमान का भी था समर्पण
पर समर्पण राम के प्रति,
अर्जुन भी तो था समर्पित
पर समर्पण कृष्ण के प्रति,
दोनों की होती प्रशंसा
दोनों ही हैं पूजनीय,
क्योंकि ये थे समर्पित सत्य के प्रति
कोई पूजनीय होगा
या कि होगी सिर्फ निंदा,
इसका निर्धारण होगा इससे
कि समर्पण है उनका किसके प्रति।
- सौम्या गुप्ता
बाराबंकी, उत्तर प्रदेश
सौम्या जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं |
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शुभकामनाएं
पहले जब छोटी थी तो 26 जनवरी मुझे सिर्फ लड्डू खाने का दिन लगता था और यह पता था कि संविधान इस दिन लागू हुआ था, लेकिन जब बड़ी हुई और मैंने संविधान को कुछ हद तक समझा और यह जाना कि संविधान बनाने के पीछे कितने लोगों की मेहनत लगी है और उससे भी पहले कितने लोगों को इसके लिए कितना बलिदान करना पड़ा है और इसके पीछे कई दार्शनिक मूल्य हैं तब यह जानकर मेरे लिए संविधान के प्रति बहुत आदर बढ़ गया है।
मुझे लगता है कि यह आदर सिर्फ मेरे मन में ही नहीं होना चाहिए बल्कि जितने भी पढ़े लिखे और जागरूक लोग हैं जिनको संविधान के बारे में पता है उनको चाहिए कि वो दूसरों को इन चीजों के बारे में बताएं कि हमारे संविधान में क्या है? हमारे मूल अधिकार क्या है? हमारे कर्तव्य क्या हैं? इन सभी के बारे में लोगों को जागरूक किया जाए खासकर गांव वासियों और मुख्य धारा से कटे हुए तबके को, जिससे कि हम अपने संविधान के बारे में बेहतर और सूक्षमता से जान सकें और इस तरह से हम अपने संविधान के प्रति और गणतंत्र दिवस के प्रति आदर को व्यक्त करे।
संविधान के बारे में जानना सिर्फ संविधान के बारे में जानना ही नहीं है, बल्कि उससे कहीं बढ़कर अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होना है, खुद को और अपने अधिकारों और दायित्यों को समझना है।
हमें पता होना चाहिए कि अगर हम एक गलत वोट कर रहे हैं तो उसका कितना बड़ा असर हमारे देश पर पड़ रहा है या हम वोट न करके क्या कर रहे हैं? उसका क्या असर हमारे देश पर पड़ता है? हमें पता होना चाहिए कि अभिव्यक्ति की आज़ादी की सीमा कहाँ तक होती है? भारतीय संविधान में धर्म क्या है? महिलाओं के लिए क्या अधिकार है? स्वतंत्रता क्या है? हम अपने संविधान के अनुच्छेदों का दुरुपयोग न करें, उनका अच्छे से पालन करें, उनको हम बहुत अच्छे से समझें यह हमारे लिए बहुत ज़रूरी है।
हमारे संविधान निर्माता एक धर्म निरपेक्ष और समानता वाला भारत चाहते थे न कि ऐसा भारत जिसमें साम्प्रदायिक उन्माद हो, जो विज्ञान नहीं अंध विश्वास को महत्व दे, वो भारतवासी होकर नहीं बल्कि किसी क्षेत्र विशेष का होकर बोले।
भारतीय संविधान की प्रस्तावना की शुरुआत में ही है *हम भारत के लोग* और आज सच मे बहुत जरूरी है कि हम सही चीजें समझ पाये क्योंकि यही समझेंगे तो सही लोगों को शक्ति मिलेगी और उसी से ये देश बदलेगा। हमें साथ आने की जरूरत है हमें भारतवासी सबसे पहले होने की जरूरत है। आइए साथ मिलकर एक संकल्प ले कि जिन लोगों को संविधान के बारे में पता है वो दूसरों को समझाएंगे और जिनको नहीं पता वो पढ़ेंगे और समझेंगे।
आइए हम जिम्मेदारी ले अपने भारत को फिर से महान बनाने की, उसकी खोयी हुई प्रतिष्ठा वापस लाने की।
आइए गणतंत्र दिवस कुछ ऐसे मनाए,
कि हर दिन गणतंत्र दिवस बन जाए।
गणतंत्र दिवस की बहुत-बहुत शुभकामनाएं।
-सौम्या गुप्ता
बाराबंकी उत्तर प्रदेश
सौम्या गुप्ता जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं, वो अपनी समझ और लेखन कौशल से समाज में स्पष्टता, दयालुता, संवेदनशीलता और साहस को बढ़ाने के लिए प्रयासरत हैं।
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यह लेख पढ़ते समय यदि आपको असहजता महसूस हो, तो यह असहजता व्यर्थ नहीं है, यह वही बेचैनी है, जो तब होती है जब कोई हमें आईना दिखा देता है।
हम अक्सर समाज, व्यवस्था और लोगों को दोष देते हैं, पर यह देखने से बचते हैं कि कहीं हम स्वयं ही उस गलत का हिस्सा तो नहीं बन रहे, जिसका रोना रोज़ रोते हैं।दुनिया ऐसे लोगों से भरी पडी है जो वही पढ़ते हैं जो उन्हें सोचने से बचाए, वही सुनते हैं जो उन्हें हँसाकर टाल दे और वही देखते हैं जो उन्हें ज़िम्मेदारी से दूर रखे। फिर भी हम उम्मीद करते हैं कि समाज बदल जाए, विचार ऊँचे हो जाएँ और लोग ईमानदार बन जाएँ। यह कैसी उम्मीद है, जो गलत को ताकत देकर सही से की जाती है?
जो लोग सच बोलते हैं, कठिन सवाल उठाते हैं और हमारी सुविधाजनक सोच को चुनौती देते हैं, उन्हें हम अनदेखा कर देते हैं। उन्हें उबाऊ, नकारात्मक या अव्यावहारिक कहकर किनारे कर दिया जाता है, पर जो लोग हमें बहलाते हैं, हमारी सोच को सुन्न करते हैं और भीड़ के स्वाद के अनुसार परोसते हैं, उन्हें हम सर आँखों पर बिठा लेते हैं। क्या यह चयन हमारी मानसिकता को उजागर नहीं करता?
हम शिकायत करते हैं कि आज कोई अच्छा नहीं लिखता, कोई ईमानदार नहीं रहा और कोई बदलाव नहीं चाहता। जबकी इसके ही समान्तर एक और सच्चाई यह है कि जब कोई सच में ईमानदारी से लिखता है या बदलाव की बात करता है, तो उसे पढने वालों कि संख्या कम ही मिलती है, क्योंकि ऐसा लेखन हमें कठघरे में खड़ा करता है, और खुद से सवाल करना हमें सबसे ज़्यादा असहज करता है।
हम गलत लोगों से सही काम की उम्मीद इसलिए करते हैं क्योंकि यह आसान है। खुद खड़े होना कठिन है, खुद बोलना जोखिम भरा है और खुद कुछ अलग करना असुविधाजनक है। इसलिए हम भीड़ में सुरक्षित रहना पसंद करते हैं।
वही भीड़ जो गलत को लोकप्रिय बना सकती है और फिर कहती है कि नेता खराब हैं, लेखक बिक गए हैं या व्यवस्था में खामियां आ गई हैं|
व्यवस्था की खामियों की तरफ इशारा करने वाले लोगों में अधिकतर, उसी व्यवस्था को रोज़ मज़बूत भी तो कर रहे हैं!
"हम जिन विचारों को समर्थन देते हैं, जिन लोगों को आगे बढ़ाते हैं और जिन बातों पर चुप रहते हैं, वही समाज की दिशा तय करती हैं।"
फिर भी हम अपने हिस्से की ज़िम्मेदारी स्वीकार करने से बचते हैं।
हम दोहरे मानक वाला इंसान नहीं कहलाना चाहते, पर सच यह है कि हम में से ज्यादातर सुविधावादी हो चुके हैं। और सुविधावाद धीरे-धीरे समाज की आत्मा को खोखला कर देता है। अमूमन लोग सही का साथ तभी देते हैं, जब उसमें हमें कोई असुविधा न हो।
यदि सच में बदलाव चाहिए, तो पहले यह देखना होगा कि हम किसके साथ खड़े हैं, किसे पढ़ रहे हैं और किस चुप्पी को हम समझदारी समझ रहे हैं।
क्योंकि गलत का साथ देकर सही की उम्मीद करना, समाज के साथ किया गया सबसे बड़ा छल है।
यदि यह लेख आपको चुभा हो, तो इसे नज़र अंदाज़ मत कीजिए, संभव है, यही चुभन उस बदलाव की शुरुआत हो, जिसकी बात हम हमेशा दूसरों से करते आए हैं।
- सोनम वर्मा
सीतापुर, उत्तर प्रदेश
उदीयमान लेखिका एवं कवयित्री सोनम वर्मा जी, इतिहास, राजनीति विज्ञान एवं अर्थशास्त्र विषयों में स्नातक हैं और इतिहास विषय में स्नातकोत्तर| शैक्षिक कार्यों के उद्देश्य हेतु बी.एड. किया तथा वर्तमान में एम.एड. में अध्ययनरत हैं|
आपको सामाजिक जागरूकता से संबंधित लेखन में विशेष रुचि है| सामाजिक सरोकारों के साथ ही शैक्षिक एवं मानवीय विषयों पर लेख एवं कविताएँ लिखना आप अपना शैक्षिक दायित्व समझती हैं|
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शुभकामनाएं
"अब्बू हमें इस बार ईदी में गिफ्ट और पैसे नहीं चाहियें"। नौ वर्षीय सुहेल ने अपने अब्बा सेे कहा, तो रहमत खां हैरान रह गये।
" मेरे बच्चे,तुझे ईदी नहीं चाहिये, तो और क्या चाहिए,तू बता मुझे! तू कहे तो मैं तेरे कदमों में जन्नत ला कर रख दूं "।
रहमत मियां बेटे को गोद में उठा कर उसे प्यार से चूमने लगे।
सुहेल ठुनते हुए कहने लगा " नहीं अब्बू!! जन्नत नहीं, एक वादा चाहिये आपसे। और सुहेल की हां में हां मिलाते हुए सारे बच्चों ने भी शोर मचा दिया " हांं हमें वादा चाहिये, वादा "।
" कैसा वादा मेरे बच्चों"!! बताओ तो सही?
"अब्बू हमने सुना है कि खुदा पाक ने हजरत इब्राहिम से उनकी सबसे अज़ीज़ चीज़ कुर्बान करने के लिये कहा था और उन्होंने अपने बेटे को कुर्बानी के लिए पेश किया था।"
" हांs.. मगर इससे तोहफे का क्या रिश्ता है बच्चों?"
"अब्बू तब खुदा पाक ने खुश होकर उनके बेटे की जगह बकरा रख दिया था। क्या ये सच है अब्बू" ।
"हां ये सच है, तो तुम क्या चाहते हो"।
"अब्बू हम चाहते हैं कि आप भी अपने अज़ीज़ बच्चों को कुर्बानी पर रखें और खुदा पाक खुश होकरउसके बदले बकरा रख देंगे"।
बच्चों के मासूम सवाल से रहमत मियां कांप उठे।दोनों हाथ कानों पर रख लिये " ला-हौल-बिला-कुव्वत!! ये क्या बोल रहे हो!! कहीं ऐसा होता है भला! वो दौर और था बच्चो!यदि तुम्हें कुछ हो गया तो हम जीते जी मर जायेंगे। नहीं नहीं..."।
अच्छा!! बच्चों ने कुछ सोचते हुए कहा "तो फिर एक वादा करो कि इस बार आप मासूम जानवरों का खून नहीं बहाओगे, आप कुर्बानी के लिए आटे,गुड़, मिट्टी या कागज से बने बकरे को ही हलाल करोगे"
"हाँ ये बात मानली तुम्हारी!" कह कर रहमत खां ने राहत की सांस ली।
सुनीता त्यागी
राजनगर एक्सटेंशन गाजियाबाद
ईमेल : sunitatyagi2014@gmail.com
आदरणीय सुनीता जी की रचनाएं हमे मानवीय संवेदना, मानवीय भावना के विभिन्न रूप और तीव्रताएं यथा प्रेम, परवाह, चाह और संकल्प इत्यादि, नज़र की सूक्ष्मता, सामाजिक संघर्ष और विसंगतियों पर प्रकाश डालती और लोगों मे संवेदना और जागरूकता जगाने का सफल प्रयत्न करती दिखती हैं, इनकी रचनाएँ पढ़कर खुद को एक संवेदी और व्यापक सोंच और दृष्टिकोण वाला इंसान बनाने मे मदद मिलती है |
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लगभग, सबकुछ योगेन्द्र यादव सर ने कहा दिया, वीडियो देख लीजिए:
https://youtu.be/C2T153GAmKo?si=0DtS5GjmHKmr6E0G
शुभकामनाएं
लवकुश कुमार
अक्सर लोगों को बात करते सुना है कि " दान तो हम भी करते हैं लेकिन बताते नहीं फिरते या वाट्सऐप स्टेटस नही लगाते! "
आज के बदलते परिदृश्य में जब आम इंसान स्व केंद्रित होता जा रहा और उसकी व्यक्तिगत चाह और आवश्यकताएं इतनी बढ़ती जा रही हैं कि दूसरों की तकलीफ़ या सामाजिक सरोकार के कार्यों के लिए उसके लिए समय, पैसा या अन्य संसाधन निकाल पाना मुश्किल होता जा रहा है, तब ऐसी हालत में किसी इंसान की व्यक्तिगत मदद में उसकी गोपनीयता का सम्मान करते हुए, अन्य संस्थागत मामलों में सामाजिक सरोकार के किए गए कार्यों का निस्वार्थ प्रचार एक निंदनीय नहीं सराहनीय कार्य है, इससे अन्य लोग प्रेरित होंगे और अपने व्यक्तिगत समस्याओं के निवारण के साथ सामाजिक सरोकार के कार्यों के लिए भी प्रयत्न करेंगे, यथा: रक्तदान, श्रमदान, संस्था को वित्तीय मदद, वस्त्रदान इत्यादि।
- आरती
लेखिका संस्कृत में परास्नातक हैं और हिंदी में परास्नातक की विद्यार्थी साथ ही सामाजिक मुद्दों और राष्ट्रहित के मामलों पर चिंतन उनकी दिनचर्या की प्राथमिकताओं में शामिल है।
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दहेज प्रथा: यह एक ऐसी प्रथा है जिससे शायद ही किसी भारतीय को परिचित कराना पड़े। सदियों से चली आ रही इस प्रथा को कुप्रथा कहना ज्यादा सही होगा। इस शब्द को आप यदि न्याय संगत नहीं पाते हैं तो कोई और शब्द सुझाया जा सकता है।
इतिहास के बारे में कुछ बातें:-
यह प्रथा कब से शुरू हुई, इसका कोई आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। पर पहले गायों को शादी के समय लड़की के साथ भेज दिया जाता था क्योंकि गाय का दूध लड़की ही दुहती थी इसीलिए लड़की के ससुराल जाने पर गाय उदास रहती थी, इसी कारण गायों को भी साथ भेज दिया जाता था।
रामचरितमानस में भी राजा जनक द्वारा अपनी पुत्री को संपदा देने का प्रमाण है, राजा जनक व उनके भाइयों के कोई पुत्र भी नहीं था। अतः वह पूरा राज्य उन की सभी भाइयों की बेटियों का ही हुआ।
वर्तमान संदर्भ में आज लड़के वाले लड़की के घर आते है, बहू बना कर लड़की ले जाते हैं। एक तो वर पक्ष किसी के द्वारा पहले पालन पोषण की गई लड़की को अपने घर लाता है और ऊपर से उसके पिता से पैसे की मांग करते हैं, उसके बाद भी न जाने कितने ही रस्मों के नाम पर दहेज, कपड़े, फर्नीचर पता नहीं क्या-क्या मांगते हैं!, जब बेटी के बच्चे होते हैं तब भी उनसे बहुत कुछ मांगते हैं सब कुछ बेस्ट चाहिए होता है, यदि कुछ अच्छा नहीं हुआ तो आप मंडली बिठाकर चर्चा करना शुरू कर देते हैं।
हमें सबसे ज्यादा आश्चर्य इस बात का होता है कि कैसे एक लड़की को दहेज के नाम पर ताना मारने वाली अक्सर सास और ननद होती हैं जिस सास ने पहले ही ये सब झेल रखा होता है, पता नहीं सास बनते ही उसकी सारी संवेदनशीलता कहां चली जाती है? वही सास जब बेटी को दहेज देती है तो मन ही मन सास और उसकी बेटी दोनों को ही बुरा लगता है।
अब आते हैं इस कुप्रथा के दुष्प्रभावों पर
आप दहेज से की डिमांड करते ही अपने घर में आने वाले सदस्य के मन में अपने प्रति अनादर का भाव भर देते हैं। भले ही वर पक्ष यही क्यों ना कहे कि यह सब आप अपनी बेटी को ही तो दे रहे हैं, बेटी भी जानती है कि ससुराल में वह किस सामान का कितना प्रयोग करेगी?
यह समझना बहुत अचरज का काम है कि कैसे कोई किसी से इतना धन लेने के बाद भी अपनी अकड़ दिखा सकता है इससे दामाद अपने ससुराल वालों की नजरों में भी वह नहीं रहते जो उन्हें होना चाहिए, उन परिवारों को छोड़कर जहां इतनी संपत्ति है कि ये कुप्रथाएं कोई खास असर नहीं छोड़तीं।
अब यदि वर पक्ष चाहे कि वह नया सदस्य आपके घर को अपना माने, मन से सब की सेवा करें, सबसे घुल मिलकर रहे! लेकिन एक बार सोचिए, दहेज मांग कर क्या एक अच्छे इंसान की छवि बच पाई।
फिर दो तरह की परिस्थितियां आ सकती हैं कि एक तो पारिवारिक शांति के लिए मिलकर रहा जाए और दूसरी की प्रतिशोध की भावना से परायों जैसा व्यवहार!
जब बहू घर को अपना मानती है, घर में शांति रहती है परस्पर सम्मान की भावना होती है तो घर में निरंतर लक्ष्मी आती है और उस शांति की संभावना अगर पहले ही भंग कर दी गई हो तो ?
इसका सबसे बड़ा परिणाम क्या होता है कि हमारे समाज में कन्या भ्रूण हत्या होती है, जिंदगी भर बेटी को सही पोषण, शिक्षा, सम्मान कुछ नहीं मिलता क्योंकि आगे चलकर दहेज देना है तो वही पैसा दहेज के लिए बचत में लगाया जाने लगता है, माता पिता और भाई, तनाव में रहकर चिड़चिड़े हो जाते हैं सो अलग।
मां-बाप बेटी के जन्म के बाद से ही तनाव में रहते हैं, जिस बच्ची के आने पर मां-बाप को खुश होना चाहिए था, वह दुखी हो जाते हैं।
आश्चर्य की बात यह है कि लड़का जितनी अच्छी नौकरी करता है उतनी ही ज्यादा दहेज की मांग करता है !
आज जरूरत है कि बेटियों को इतना सक्षम बनाया जाए कि वह दहेज प्रथा का मुह तोड़ जवाब दे सके। लड़कों को भी इसके परिणाम समझने होंगे। यदि एक समय में लड़का और लड़की अपने हाथ में दहेज के प्रति विद्रोह की मसाल उठा ले तो इसको प्रथा का अंत हो सकता है। हमें लकीर का फकीर नहीं, कुछ अलग और सार्थक करने की जरूरत है।
आपने दहेज के चलते बहुओं की प्रताणना के बारे में सुना होगा और ये भी सुना होगा कि दहेज प्रथा अधिनियम का दुरूपयोग कर कई परिवार बर्बाद कर दिए गए, इसीलिए यह सोचने की जरूरत है कि अगर दहेज प्रथा जैसी शोषणकारी व्यवस्थाएं न होती तो यह अधिनियम भी न होता और न इसका दुरूपयोग!
दहेज प्रथा की जड़ में एक और बात है, सजातीय विवाह जिसके चलते सीमित विकल्प वधु पक्ष को दहेज देने को मजबूर करते हैं और तो और दहेज की सामर्थ्य न होने पर एक काबिल लड़की एक नाकाबिल इंसान के साथ बांध दी गई, इसके भी कई उदाहरण हैं।
जिन गरीब और निम्न मध्यवर्गीय परिवारों में कमाने खाने और शिक्षा एवं स्वास्थ्य के भी उचित प्रबंध नहीं वो भी दहेज इकट्ठा करने के दबाव में बीमार भी होते हैं, चिड़चिड़े भी और कभी कभी ग़लत कामों में लिप्त भी।
इस प्रथा के दोषी वो भी हैं जो प्रतिष्ठा प्रदर्शन के चलते महंगी शादियों के ग़लत उदाहरण पेश करते हैं, हम सभी को पुनर्विचार करने की जरूरत है।
- लवकुश कुमार एवं सौम्या गुप्ता
लवकुश कुमार भौतिकी में परास्नातक हैं और उनके लेखन का उद्देश्य समाज की उन्नति और बेहतरी के लिए अपने विचार साझा करना है ताकि उत्कृष्टता, अध्ययन और विमर्श को प्रोत्साहित कर देश और समाज के उन्नयन में अपना बेहतर योगदान दिया जा सके, साथ ही वह मानते हैं कि सामाजिक विषयों पर लेखन और चिंतन शिक्षित लोगों का दायित्व है और उन्हें दृढ़ विश्वास है कि स्पष्टता ही मजबूत कदम उठाने मे मदद करती है और इस विश्वास के साथ कि अच्छा साहित्य ही युवाओं को हर तरह से मजबूत करके देश को महाशक्ति और पूर्णतया आत्मनिर्भर बनाने मे बेहतर योगदान दे पाने मे सक्षम करेगा, वह साहित्य अध्ययन को प्रोत्साहित करने को प्रयासरत हैं।
सौम्या गुप्ता जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं,उनकी रचनाओं से जीवन, मानव संवेदना एवं मानव जीवन के संघर्षों की एक बेहतर समझ हांसिल की जा सकती है, वो बताती हैं कि उनकी किसी रचना से यदि कोई एक व्यक्ति भी लाभान्वित हो जाये, उसे कुछ स्पष्टता, कुछ साहस मिल जाये, या उसमे लोगों की/समाज की दिक्कतों के प्रति संवेदना जाग्रत हो जाये तो वो अपनी रचना को सफल मानेंगी, उनका विश्वास है कि समाज से पाने की कामना से बेहतर है समाज को कुछ देने के प्रयास जिससे शांति और स्वतंत्रता का दायरा बढे |
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मेरी सीमित समझ में कुछ विश्लेषण और कुछ उपाय:
महिला सशक्तिकरण का अर्थ है महिलाओं को निर्णय की शक्ति देना और उन्हें आत्मनिर्भर बनाना, कहा जाता है कि महिलाएँ अगर नौकरी करें, उन्हें पैसे मिले तो वो सशक्त होंगी लेकिन हो सकता है कि उनके पास यही निर्णय लेने की शक्ति न हो कि उन्हें ये पैसे खर्च कहाँ करने है तो ये सशक्तिकरण हुआ ही नहीं। अच्छी शिक्षा, अच्छा पोषण, समान अवसर जरूरी है।
क्या करे कि महिलाएं सशक्त हो?
जब बच्ची छोटी हो उसे पूरा पोषण युक्त भोजन दीजिए, लड़की होने के कारण उसे बासी या बेकार खाना मिलना उसके सशक्तिकरण में बाधक है।
बच्चियों को सही शिक्षा दिलवाएँ और वो ऊँचे से ऊँचा जो भी पढ़ना चाहे उसका यथासंभव प्रयत्न करें साथ ही आध्यात्मिक शिक्षा भी दें जिससे वह सीख सके कि वो देह नहीं चेतना है।
उसको कंप्यूटर तथा अन्य आधुनिक तकनीकी शिक्षा भी दिलाएँ, जिससे अगर जब भी उसे नौकरी करना हो वो उसके लिए योग्य हो।
एक सबसे अहम् पहलू है कि महिलाओं को अपनी फिटनेस का ध्यान रखना बहुत ज़रूरी है, खेल, व्यायाम जैसी गतिविधियां हों उनकी दिनचर्या में क्योंकि बचपन से ही उन्हें उछलने-कूदने- खेलने की आजादी उन्हें शारीरिक के साथ मानसिक रूप से भी मजबूत करेगी।
बचपन से ही उसके मन में ये न भरे कि वो पराई है, पराए घर जाना है। ऐसी भावनात्मक आघात वाली छोटी- छोटी बातें बेटियों को अंदर तक खत्म कर जाती हैं और उनका जीवन में कुछ बड़ा सोचने और करने का उत्साह कम या खत्म हो जाता है।
२०२० में इतिहास के एक सर्वेक्षण में सामने आया था कि महिलाएँ भी पहले शिकार पर पुरुषों के साथ जाती थी। अभी हाल ही में भी एक ऐसा ही सर्वेक्षण सामने आया था। ये सर्वेक्षण बताते है कि महिलाओं के दिमाग में हमने अगर ये कमजोरी का कीड़ा न बिठाया होता तो वो आज अधिकांश क्षेत्रों में पुरुषों के बराबर होतीं।
आदर्श स्थिति यह है कि जैसे पुरुष सशक्तिकरण जैसी कोई स्थिति नहीं होती वैसे ही महिला सशक्तिकरण जैसी कोई बात ही न करनी पड़े। पर यह एक आदर्श स्थिति है जिसे पाने में शायद दशकों लगे पर ये शुरुआत तो की जा सकती है और ये शुरुआत हमें ही करनी होगी।
-सौम्या गुप्ता
बाराबंकी उत्तर प्रदेश
सौम्या गुप्ता जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं,
उनकी रचनाओं से जीवन, मानव संवेदना एवं मानव जीवन के संघर्षों की एक बेहतर समझ हांसिल की जा सकती है, वो बताती हैं कि उनकी किसी रचना से यदि कोई एक व्यक्ति भी लाभान्वित हो जाये, उसे कुछ स्पष्टता, कुछ साहस मिल जाये, या उसमे लोगों की/समाज की दिक्कतों के प्रति संवेदना जाग्रत हो जाये तो वो अपनी रचना को सफल मानेंगी, उनका विश्वास है कि समाज से पाने की कामना से बेहतर है समाज को कुछ देने के प्रयास जिससे शांति और स्वतंत्रता का दायरा बढे |
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