यह लेख लिख रहा हूँ ताकि पाठक यह बेहतर समझ सकें कि मेरी लेखनयात्रा में प्रोत्साहन के विभिन्न रूपों या आयामों क्या महत्व है|
इस तरह की यात्रा में जहां हम कोई बात दूसरों तक पहुंचा रहे हों, यह बात बहुत मायने रखती है कि लेखक जो बात कह रहा है या जो सवाल उठा रहा है और पाठकों के जिस वर्ग को संबोधित कर रहा हो, उन तक वो बातें और सवाल पहुंचे, वह भी अपने सही अर्थों में|
इस एक उद्देश्य की दृष्टि से कुछ बातें बहुत महत्वपूर्ण हो जाती हैं:
पहली है फीडबैक या प्रतिक्रिया - इससे हमे पता चलता है कि लोगों को हमारे लेख कितने उपयोगी लगे और उनका अर्थ किस तरह लिया गया, इसका उपयोग लेखनी मे सुधार के लिए किया जा सकता है
दूसरी बात है समर्थन या प्रोत्साहन जिससे पता चलता है कि किसी लेख या पुस्तक के अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचकर उनको लाभन्वित कर सकें और लेखन को सार्थकता दे सकने की संभावना क्या है|
एक बात और, जब आप गैर साहित्यिक पृष्ठभूमि से हों और आपके साथ वाले अपनी नियमित ड्यूटी के बाद अन्य शौक में लगे हों या किसी मनोरंजन में, तो उस वक़्त लिखते रहने पर साथ वालों से उस स्तर का प्रोत्साहन नहीं मिल पाता और कभी कभी लगता है कि कहीं लिखना निरर्थक तो नहीं!
इस बीच यदि कोई दोस्त यह कह दे कि "बढ़िया कर रहे हो भाई, इससे जरुर कई लोगों को रास्ता मिलेगा और कॉन्फिडेंस भी", तब जो संतुष्टि मिलती है उससे आने वाले कई महीने तक लिखते रहना और ज्यादा आसान हो जाता है, माने एक निरंतरता आ जाती है, अन्यथा लेखन के मूल में तो कुछ जरूरी बातें और अनुभव पहुंचाना है इसीलिए काम तो होगा ही, लेकिन साथ मे यदि प्रोत्साहन मिल जाए तो निरंतरता और बल मिलता है लेखन में|
"बढ़िया कर रहे हो भाई, इससे जरुर कई लोगों को रास्ता मिलेगा और कॉन्फिडेंस भी", यही बोल थे राजेश भाई के कुछ दिन पहले मेरी पुस्तक पर बातचीत के दौरान, और यह भी कहा कि जैसे-जैसे यह पुस्तक और लोगों के बीच पहुंचेगी इस पर फीडबैक आना शुरू होगा|
प्रोत्साहन के साथ सहयोग भी मिल जाए तो काम की तीव्रता और स्केल दोनों बढ़ जाते हैं, बच्चों में बाल जिज्ञासा की निशुल्क प्रतियाँ वितरित करने के वक़्त भी दोस्तों ने कई तरह से सहयोग किया|
कभी कभी चीज़ों को वक़्त पर करने के लिए वित्तीय संसाधन उधार लेने की आवश्यकता आ बनती है, ऐसी अवस्था में किसी ऐसे काम के लिए पैसे उधार देना, जिससे कोई आय नहीं होनी, हर किसी के विवेक में नहीं होता है, लेकिन राजेश भाई जैसे कुछ दोस्तों ने इस नेक कार्य के ससमय पूरा होने के निमित्त इस मौके पर साथ खड़े रहे, यह साथ आत्मविश्वास को बढाता है कि हाँ मैं जिस काम में लगा हूँ, वह वाकई लोकहित में है| और यह बढ़ा हुआ आत्मविश्वास और लोगों का हम पर विश्वास हमसे थकान में भी काम करवा लेता है वो भी ख़ुशी ख़ुशी और रचनात्मकता के साथ|
अपने चॉइस ऐसी जरुर रखें कि ऐसे साथी सबको मिलें, जो केवल तारीफ ही ना करें, हर संभव और उचित सहयोग भी करें|
राजेश भाई का उदाहरण मन में रहेगा, जैसे एक मकान की नींव|
शुभेच्छा
लवकुश कुमार
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शुभकामनाएं

बच्चों का ध्यान कक्षा में कैसे लगाया जाए?
क्या विज्ञान केवल अंकों और परीक्षाओं का विषय है?
क्या बिना महँगी प्रयोगशाला के भी विज्ञान रोचक बनाया जा सकता है?
क्या हम बच्चों को उत्तर याद करवाने के बजाय प्रश्न पूछना सिखा रहे हैं?
क्या आज की शिक्षा बच्चों को नई परिस्थितियों के लिए तैयार कर रही है?
यदि इन प्रश्नों ने कभी आपको भी परेशान किया है, तो उत्तराखंड में 12 मई से 1 जून 2026 तक चली यह विज्ञान यात्रा आपके लिए एक महत्वपूर्ण अध्ययन का विषय है।

देश के सुप्रसिद्ध भौतिक विज्ञानी, पद्मश्री सम्मानित शिक्षाविद एवं आईआईटी कानपुर के पूर्व प्रोफेसर डॉ. हरीश चंद्र वर्मा (एचसीवी सर) ने अपने वैज्ञानिक जीवन के 75 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर "साइंस इन द सर्विस ऑफ सोसाइटी" और "सोपान आश्रम" के सहयोग से उत्तराखंड के छह जिलों में 21 दिवसीय विज्ञान यात्रा का नेतृत्व किया।
इस यात्रा का नाम था—
12 मई से प्रारम्भ हुई यह यात्रा विभिन्न विद्यालयों, डीआईईटी संस्थानों और शिक्षक प्रशिक्षण केन्द्रों से होती हुई 27 मई से 1 जून तक आयोजित छह दिवसीय राष्ट्रीय आवासीय कार्यशाला (NWUPT 2026) के साथ सम्पन्न हुई।
इस दौरान—
480 से अधिक भौतिक विज्ञान शिक्षक
208 शिक्षक प्रशिक्षक
410 शिक्षक प्रशिक्षु
3000 से अधिक विद्यार्थी
प्रत्यक्ष रूप से इस अभियान से जुड़े।

आज अधिकांश शिक्षक एक समान चुनौती का सामना कर रहे हैं—
बच्चे सुनते कम हैं, प्रश्न कम पूछते हैं, विज्ञान को कठिन मानते हैं और परीक्षा के बाद अधिकांश बातें भूल जाते हैं।
दूसरी ओर समाज बच्चों से लगातार अधिक अंक, अधिक प्रतिस्पर्धा और अधिक उपलब्धियों की अपेक्षा करता है।
परन्तु एचसीवी सर का प्रश्न अलग था—
"क्या हम बच्चों को सोचने के लिए तैयार कर रहे हैं?"
यात्रा का मूल उद्देश्य बच्चों और शिक्षकों में वैज्ञानिक चेतना, स्वतंत्र सोच, अवलोकन क्षमता, तार्किक विश्लेषण और समस्या समाधान की क्षमता विकसित करना था।

इस यात्रा की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि किसी भी सत्र की शुरुआत सूत्रों या परिभाषाओं से नहीं हुई।
शुरुआत हुई—
नाम पूछने से
मुस्कुराने से
पहेली से
अवलोकन से
और छोटे-छोटे सवालों से
उदाहरण के लिए—
"धागा किस रंग का है?"
"अंधेरे में कैसा दिखाई देगा?"
"काला धागा कभी लाल दिखता है क्या?"
"हम स्कूल पढ़ने आते हैं या खेलने भी?"
ऐसे सरल प्रश्न बच्चों को चर्चा में शामिल कर लेते थे।
शिक्षकों ने अनुभव किया कि बच्चों से संवाद स्थापित करना किसी भी शिक्षण प्रक्रिया का सबसे महत्वपूर्ण चरण है।
कार्यशालाओं में बार-बार यह दिखाई दिया कि किसी भी अवधारणा को सीधे बताने के बजाय पहले एक ऐसी स्थिति बनाई जाती थी जिससे बच्चे चौंक जाएँ।
यानी—
पहले जिज्ञासा, फिर प्रयोग, फिर चर्चा और अंत में निष्कर्ष।
एचसीवी सर बार-बार कहते रहे—
"Attention create करना शिक्षक की जिम्मेदारी है।"
यही कारण था कि कई घंटे चलने वाले सत्रों में भी बच्चों और शिक्षकों का ध्यान बना रहा।

यात्रा का सबसे प्रेरक पक्ष था कि अधिकांश प्रयोग अत्यंत सामान्य वस्तुओं से किए गए—
डेटॉल की खाली बोतल
प्लास्टिक डिब्बा
रिंग चुंबक
सिरिंज
कागज
लेजर पॉइंटर
पानी का गिलास
गुब्बारा
सिक्का
इनसे अपवर्तन, वायुदाब, जड़त्व, बल, परावर्तन, मृगमरीचिका, बॉयल का नियम, ऊर्जा तथा प्रकाश जैसी अवधारणाएँ समझाई गईं।
इससे शिक्षकों को यह संदेश मिला कि विज्ञान पढ़ाने के लिए महँगी प्रयोगशालाएँ अनिवार्य नहीं हैं।
कार्यशाला में बार-बार एक बात दोहराई गई—
"नई परिस्थितियों के लिए बच्चों को तैयार करना है तो उनमें स्वतंत्र सोच विकसित करनी होगी।"
बच्चों को उत्तर देना नहीं, उत्तर खोजने की प्रक्रिया सिखाना आवश्यक है।
प्रयोग के बाद 15-20 मिनट की खुली चर्चा इसी उद्देश्य से होती थी।
कई बार एक ही प्रयोग के अलग-अलग उत्तर सामने आते थे।
यहीं से बच्चों को समझ आता था कि विज्ञान रटने की नहीं, सोचने की प्रक्रिया है।
शिक्षकों के अनुभवों से कुछ प्रमुख निष्कर्ष सामने आए—
छोटे प्रश्नों और गतिविधियों से।
उनके अनुभवों और परिवेश से।
अवलोकन, तर्क और प्रयोग के संयोजन से।
स्थानीय और बेकार पड़ी वस्तुओं के उपयोग से।
ऐसा वातावरण बनाकर जहाँ गलत उत्तर देने का भय न हो।
यह यात्रा केवल भौतिकी तक सीमित नहीं रही।
इसने समाज, पर्यावरण और जीवन मूल्यों पर भी चर्चा की।
डायट अल्मोड़ा और डायट बागेश्वर में एक बार उपयोग होने वाले प्लास्टिक पर रोक लगाने की घोषणा की गई।
सभी प्रतिभागियों ने अपने बर्तन स्वयं धोए।
यह संदेश था—
श्रम का सम्मान भी शिक्षा का हिस्सा है।
एचसीवी सर बार-बार इस बात पर जोर देते रहे कि विज्ञान का अंतिम उद्देश्य केवल तकनीक बनाना नहीं, बल्कि समाज की सेवा करना है।
उन्होंने कहा—
"धरती मेरी है, तो इसे बचाने की जिम्मेदारी भी मेरी है।"
यात्रा में पर्यावरण संरक्षण, वृक्षारोपण, हिमालय संरक्षण और सामाजिक जिम्मेदारी जैसे विषय भी समान रूप से शामिल रहे।
कार्यशालाओं के दौरान राष्ट्रीय प्रयोगात्मक परीक्षा NAEST (National Anveshika Experimental Skill Test) की भी चर्चा हुई।
यह भारत की एक अनूठी परीक्षा है—
9वीं से MSc तक सभी के लिए एक ही प्रश्नपत्र
घर पर प्रयोग
स्वयं रीडिंग लेना
मौलिक सोच पर आधारित मूल्यांकन
चयनित विद्यार्थियों को सोपान आश्रम में तीन दिन का प्रशिक्षण
50,000 रुपये तक की छात्रवृत्ति
यह परीक्षा इस विचार को मजबूत करती है कि विज्ञान का वास्तविक मूल्य प्रयोग और जिज्ञासा में है, न कि केवल अंकों में।


27 मई से 1 जून तक आयोजित National Workshop for Utsahi Physics Teachers (NWUPT 2026) इस पूरी यात्रा का शिखर बिंदु रही।
देश भर से आए चुनिंदा शिक्षकों ने छह दिनों तक प्रयोग, चर्चा, चिंतन और नवाचार के माध्यम से विज्ञान शिक्षण के नए आयामों पर कार्य किया।
सोपान आश्रम द्वारा आयोजित यह 23वीं राष्ट्रीय कार्यशाला थी।
क्योंकि इसने शिक्षकों को याद दिलाया—
विज्ञान सूत्रों से पहले सवाल है।
प्रयोगशाला भवन नहीं, सोच है।
शिक्षा का उद्देश्य केवल अंक नहीं है।
सीखना आनंददायक होना चाहिए।
बच्चों को उत्तर नहीं, खोज की प्रक्रिया देनी चाहिए।
वैज्ञानिक चेतना लोकतांत्रिक समाज की बुनियाद है।
विज्ञान उत्तर याद करने का नहीं, प्रश्न पूछने का विषय है।
जिज्ञासा सीखने का सबसे बड़ा ईंधन है।
कक्षा की शुरुआत सरल और उत्तर देने योग्य प्रश्नों से होनी चाहिए।
बच्चों का ध्यान आकर्षित करना शिक्षक की जिम्मेदारी है।
Puzzle Method विद्यार्थियों को सक्रिय बनाती है।
वैज्ञानिक चेतना अवलोकन से शुरू होती है।
हर प्रयोग के पीछे "क्यों?" सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है।
सीखने की प्रक्रिया परिणाम से अधिक महत्वपूर्ण है।
कम लागत की सामग्री भी उत्कृष्ट प्रयोगशाला बन सकती है।
विज्ञान को जीवन से जोड़ना जरूरी है।
बच्चे तब बेहतर सीखते हैं जब वे चर्चा का हिस्सा बनते हैं।
स्वतंत्र सोच भविष्य की सबसे महत्वपूर्ण क्षमता है।
प्रयोग डर को कम करते हैं और आत्मविश्वास बढ़ाते हैं।
प्रश्न पूछने वाला वातावरण रचनात्मकता को जन्म देता है।
विज्ञान का उद्देश्य केवल परीक्षा नहीं, जीवन को समझना है।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण सामाजिक समस्याओं को समझने में भी मदद करता है।
पर्यावरण संरक्षण भी वैज्ञानिक चेतना का हिस्सा है।
शिक्षक स्वयं सीखना बंद कर दे तो कक्षा भी ठहर जाती है।
समान परिस्थितियों में भी परिणामों की जांच आवश्यक है।
सीखना आनंददायक होना चाहिए।
बच्चों को उत्तर देने से अधिक महत्वपूर्ण है उन्हें उत्तर खोजने की प्रक्रिया सिखाना।
"विज्ञान केवल सिद्धांत नहीं है। प्रयोगों के माध्यम से किसी विचार को परखना ही वास्तविक विज्ञान है।"
"जब मन किसी प्रश्न पर अटक जाता है, तब वास्तविक सीख शुरू होती है।"
"Puzzle Method बच्चों को केवल सुनने वाला नहीं, सोचने वाला बनाती है।"
"भौतिकी को संगीत से जोड़कर देखने का नया दृष्टिकोण मिला।"
कल्पना कीजिए—
कक्षा 9 से लेकर MSc तक के विद्यार्थियों के लिए एक ही प्रश्नपत्र।
घर पर प्रयोग करने की स्वतंत्रता।
स्वयं उपकरण बनाना।
स्वयं रीडिंग लेना।
कोई कोचिंग नहीं।
कोई रटंत नहीं।
यही है National Anveshika Experimental Skill Test (NAEST)।
इस अनूठी परीक्षा का उद्देश्य प्रतिभा नहीं, जिज्ञासा को पहचानना है। चयनित विद्यार्थियों को सोपान आश्रम, कानपुर में पद्मश्री प्रो. एच.सी. वर्मा के सानिध्य में कार्य करने का अवसर भी मिलता है।
इस यात्रा की एक बड़ी उपलब्धि यह रही कि विज्ञान की चर्चा केवल प्रयोगशाला तक सीमित नहीं रही।
प्लास्टिक और डिस्पोज़ल के प्रयोग पर रोक
सभी प्रतिभागियों द्वारा स्वयं अपने बर्तन धोना
श्रम के सम्मान का संदेश
VIP संस्कृति को चुनौती
पर्यावरण संरक्षण की प्रतिज्ञा
यह बताता है कि वैज्ञानिक चेतना केवल भौतिकी नहीं, बल्कि जीवन जीने का तरीका भी है।
उत्तराखंड विज्ञान यात्रा 2026 समाप्त हो चुकी है, लेकिन इसके द्वारा उठाए गए प्रश्न अभी भी हमारे सामने हैं—
क्या हमारी कक्षाएँ बच्चों को सोचने के लिए प्रेरित कर रही हैं?
क्या हम विज्ञान को जीवन से जोड़ पा रहे हैं?
क्या हम बच्चों में स्वतंत्र सोच विकसित कर रहे हैं?
यदि इन प्रश्नों के उत्तर खोजने की प्रक्रिया शुरू हो गई है, तो यह यात्रा अपने उद्देश्य में सफल कही जाएगी।
क्योंकि अंततः—
"विज्ञान का सबसे बड़ा प्रयोग मानव मस्तिष्क है, और शिक्षा का सबसे बड़ा लक्ष्य उसे स्वतंत्र रूप से सोचने योग्य बनाना है।"
उत्तराखंड विज्ञान यात्रा 2026 केवल कार्यशालाओं की श्रृंखला नहीं थी।
यह एक विचार था।
एक निमंत्रण था।
एक आग्रह था कि हम अपने विद्यालयों में ऐसी कक्षाएँ बनाएं जहाँ बच्चे केवल पढ़ें नहीं, सोचें; केवल सुनें नहीं, प्रश्न पूछें; केवल अंक न जुटाएँ, बल्कि जीवन को समझें।
यदि इस यात्रा से निकला सबसे महत्वपूर्ण संदेश एक वाक्य में कहा जाए, तो शायद वह यह होगा—
"बच्चों को उत्तर देने से अधिक महत्वपूर्ण है उन्हें प्रश्न पूछना सिखाना।"
और संभवतः यही वैज्ञानिक चेतना की पहली सीढ़ी है।
बीते शनिवार (23 मई 2026) को सुंदर उत्तराखंड के सुंदर अल्मोड़ा जिले के द्वाराहाट ब्लॉक में स्थित पीएम श्री राजकीय बालिका इंटर कॉलेज में आयोजित विज्ञान यात्रा- प्रयोग यात्रा सरिता – प्रयास 2026 के अंतर्गत एक कार्यशाला का आयोजन किया गया, यह कार्यक्रम साइन्स इन द सर्विस ऑफ सोसाइटी और सोपान आश्रम कानपुर की संयुक्त पहल से आयोजित 21 दिवसीय उत्तराखंड विज्ञान यात्रा के अंतर्गत सम्पन्न हुआ, जिसमें मुझे एक एक विज्ञान प्रेमी के तौर पर शामिल होने का अवसर मिला|
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि पदम्श्री अवकाश प्राप्त सम्मानित प्रो० डॉ हरीश चन्द्र वर्मा (आईआईटी कानपुर) और साथ में साइन्स इन सर्विस ऑफ सोसाइटी के कुमाऊं संयोजक भवानी शंकर कांडपाल सर रहे, कार्यक्रम की अध्यक्षता विद्यालय की प्रधानाचार्य, आदरणीय सोनिका नेगी मैम ने की|
साथ ही सहयोगी , हेमंत उपाध्याय , सोपान आश्रम कानपुर के अनुभव अवस्थी, साइंस इन द सर्विस ऑफ सोसाइटी के कार्यकर्ता विनोद कुमार जोशी ,सामाजिक कार्यकर्ता और पर्यावरणविद त्रिभुवन जोशी तथा केंद्रीय विद्यलाय हल्द्वानी से मोहित शर्मा सर पूरी यात्रा में साथ रहे| इस यात्रा का अंत देहारादून में उत्साही फ़िज़िक्स teachers की workshop के साथ होगा, वैबसाइट से कुछ पुरानी छवियाँ - National Workshop of Utsahi Physics Teachers (NWUPT)

कार्यक्रम की शुरुआत अतिथियों के स्वागत और सम्मान के साथ, संगीत शिक्षिका सुरभि पंत मैम और उनकी कुशल छात्राओं द्वारा प्रस्तुत संगीतमय वंदना द्वारा हुयी|
जीवंत और कुशल मंच संचालन, एल टी, गणित शिक्षिका भावना जोशी मैम ने किया जिसमें एल. टी विज्ञान की शिक्षिका रेनु तिवारी मैम एवं प्रवक्ता भौतिकी किरन बिष्ट मैम का विशेष योगदान रहा|
विद्यार्थियों को एक यादगार प्रयोगिक और वैज्ञानिक एक्सपोजर मिला साथ ही कार्यशाला बच्चों और शिक्षकों सबके लिए मन बांधने वाली और यादगार रही|


मै अगर अपनी बात करूँ तो सबसे पहले आभार विद्यालय प्रबंधन का, इतनी बेहतर व्यवस्था और आयोजन के लिए, सभी समर्पित और संबन्धित शैक्षिक और गैर-शैक्षिक स्टाफ का आभार क्योंकि "ऐसे आयोजन में सबका अपना योगदान" होता है|
आभारी हूँ साइन्स इन द सर्विस ऑफ सोसाइटी उत्तराखंड (विशेष आभार आदरणीय भवानी शंकर कांडपाल सर का जो कुमाऊँ समन्वयक हैं ) और सोपान आश्रम कानपुर का जिनकी संयुक्त पहल के अंतर्गत यह कार्यशाला हुयी, जिसमें न केवल HC वर्मा सर और उनकी टीम से मिलने का मौका मिला वरन वैज्ञानिक चेतना का माहौल कैसे बने, विद्यार्थियों और शिक्षकों में स्वतंत्र सोच कैसे विकसित हो और कैसे बच्चों को विज्ञान और विषयवस्तु से जोड़ा जा सके, इसके गुर सीखने का भी अवसर मिला|
मैंने सीखा कि कैसे कोई भी अध्याय या बात शुरू करने से पहले कैसे विद्यार्थियों/पाठकों के साथ कम्युनिकेशन स्थापित किया जाये ताकि आगे वह हमारी बात को और अच्छे से सुन/पढ़ सकें- यह सीख न केवल विद्यार्थियों/युवाओं को कुछ समझाने में मददगार होगी वरन पुस्तक लेखन में भी लाइटर नोट से बात शुरू करने का तरीका पाठकों का मन बांधने में उपयोगी होगा|
मैंने देखा कि कैसे वर्मा सर और उनकी टीम द्वारा विद्यार्थियों से छोटे-छोटे आसान सवाल (अवलोकन पर आधारित जैसे की धागा किस रंग का है, लाल धागा अंधेरे मे किस रंग का दिखेगा इत्यादि) करके न केवल उनका हौसला बढ़ाया बल्कि उन्हे विषय वस्तु से जोड़ लिया और भवानी सर द्वारा बच्चों के नाम पूछकर, उनके नाम को भी उस चर्चा का हिस्सा बना लेना ये साबित करता है कि शिक्षक यदि हाजिरजवाब है तो बच्चों के साथ संवाद स्थापित करना और उन्हे इन्वाल्व करना कितना आसान हो जाता है जैसे कांडपाल सर ने एक प्रयोग के दौरान एक बिटिया से उसका नाम पूछा, जवाब आया, “हितैषी” तुरंत कांडपाल सर कहते हैं कि अरे वाह देखो हरीश सर भी हमारे कितने हितैषी हैं जो आज हमारे बीच आए हैं |
अपने सवालों द्वारा (puzzle method द्वारा attention ensure करना) वर्मा सर और उनकी टीम ने सभी श्रोताओं को कार्यशाल से जोड़े रखा|
कई बार ऐसा होता है कि हम कहीं बैठे होते हैं और मन कहीं होता है, यह हमारे और विद्यार्थियों सबके साथ होता है, सोचिए कि यदि ऐसा हो कि हम हर काम को इन्वाल्व होकर करना अपनी आदत मे लाएँ तो न केवल हमारी मन स्थिति बेहतर होगी साथ ही बच्चे हम से सीखकर यही आदत ला पाएंगे और फिर रिवीजन क्लास लेने की जरूरत, या बार बार समझाने की जरूरत न पड़ेगी|
इस तरह की कार्यशाला में टाइम कब बीत जाता है पता ही नहीं चलता, इस तरह का इन्वाल्व्मेंत न केवल हमे और बच्चों को बेहतर अवलोकन मे मदद करता है बल्कि वर्तमान मे भी रखता है| यदि इस तरह का इनवल्वमेंट हम अपने हर काम मे सुनिश्चित कर सकें तो ये मन पास्ट और फ्युचर के चक्र से बाहर निकम हमे वर्तमान मे जीने मे मदद कर पाएगा और हमे चीजों को ढंग से अवलोकित कर पाएंगे|
सबसे महत्वपूर्ण कि कभी कभी ऐसा होता है कि विद्यालय मे लैब बनाने के साधन बहुत सीमित और कभी कभी न के बराबर होते हैं, उस अवस्था में भी कैसे बहुत आधारभूत और आसानी से मिलने वाले सामान से कुछ ऐसे प्रयोग किए जा सकते हैं जो बच्चों मे वैज्ञानिक चेतना जागा सकें, जैसे इस कार्यशाला में, "सामान्य लेजर पोइंटर, समतल दर्पण, पानी की बोतल, काँच का गिलास, सिक्का, रिंग चुंबक, इंजेक्शन वाली सिरिन्ज आदि" चीजों से बच्चों को प्रयोग कराये आगे, माने जैसा बजट हो वैसी व्यवस्था की जा सकती है|
ऐसी ही सामग्री के साथ प्रयोग के लिए आदरणीय वर्मा सर की वैबसाइट का अवलोकन किया जा सकता है, संदर्भ के लिए कुछ लिंक दिये जा रहे हैं:
https://www.shiksha-sopan.org/
Common Misconceptions of Physics PGTs in topics based on quantum Physics
Learning Physics through Simple experiments
Developing equations of light path in Mirage-like situations
डा0 एच0 सी0 वर्मा जी जो एक milestone और icon है उनके द्वारा जो आसानी से उपलब्ध और कम लागत वाली सामग्री से प्रयोग कराए गए, सही मायने में “ उन्होंने बताया कि केवल सिद्धांत पढ़ लेना विज्ञान नहीं है, बल्कि उसे प्रयोग द्वारा परखना ही वास्तविक विज्ञान है। तर्क हमें सोचने की दिशा देता है और प्रयोग उस तर्क की सत्यता सिद्ध करता है।”
-प्रकाश चन्द्र जोशी सर, सहायक अध्यापक विज्ञान, राजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय ईरा चौधार द्वाराहाट अल्मोड़ा
कार्यशाला ने हमें यह महसूस कराया कि किस प्रकार सरल प्रयोग, उनसे जुड़े प्रश्नों की श्रृंखला और विचारपूर्ण चर्चाएँ एक बेहतर शिक्षण वातावरण का निर्माण करती हैं तथा रचनात्मक सोच को बढ़ावा देती हैं।
जब हम प्रयोगों का अवलोकन कर रहे थे, तब हम यह समझने का प्रयास कर रहे थे कि ऐसा क्यों हो रहा है। कार्यशाला से मिली एक महत्वपूर्ण सीख यह रही कि सबसे अधिक सीख तब होती है जब हमारा मन किसी प्रश्न पर अटक जाता है। उसके बाद मन स्वयं उत्तर खोजने के लिए सक्रिय हो जाता है, और इस प्रकार प्राप्त ज्ञान लंबे समय तक स्मरण रहता है।
इसके अतिरिक्त, कार्यशाला में हमने यह भी अनुभव किया कि सीखने की "प्रक्रिया" अंतिम परिणाम से अधिक महत्वपूर्ण होती है। जीवन में भी मंज़िल से अधिक महत्वपूर्ण उसकी यात्रा होती है।
-मदन मोहन सुंदरियाल सर, प्रवक्ता भौतिक विज्ञान रा इ का बिन्ताएवं विज्ञान समन्वयक ब्लॉक द्वाराहाट
सबसे अच्छी बात जो मुझे सीखने को मिली वो यह है कि अपने विषय को पढ़ाने के तरीके को Puzzle Method द्वारा बनायें, जिससे ज्यादा से ज्यादा बच्चे उसमें involve हों और actively participate कर अपने ideas दें।
ये भी सीखा कि हमारे आस-पास हर वस्तु और घटना के पीछे विज्ञान है, इसलिए वो नज़रिया विकसित करना होगा, जिससे हम उन घटनाओं को विज्ञान के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत कर, बच्चों में विज्ञान के प्रति सहजता उत्पन्न कर सकें।
- प्रीति राणा मैम, LT GIC Asgoli, Almora
कुछ बातें जो इस कार्यशाला में अवलोकन मे आयीं सीधे उनको उद्धृत करता हूँ:
विद्यार्थियों से संवाद स्थापित करने का तरीका, कुछ वाक्य जिन्होने ने केवल बच्चों के मन को बांध लिया बल्कि उपस्थित शिक्षकों और अन्य लोगों के चेहरे पर मुस्कान और बीच बीच में हंसी लाकर माहौल को जीवंत बनाये रखा: -
अलंकृत और गैर अलंकृत शिक्षक और प्यारे बच्चों, सबको मेरा.... मेरा क्या ? सबको मेरा नमस्कार - HCV सर
अच्छा आपका नाम हितैषी है, देखो वर्मा सर भी हमारे हितैषी हैं जो आज हमारे बीच आए हैं - भवानी शंकर कांडपाल सर
भवानी सर ने इस बात से शुरुआत की कि गणित कैसा लगता है आप सबको?
ऐसे वर्मा सर ने बच्चों से पूछा कि सबसे खराब विषय कौन सा लगता है आपको?
अवलोकन करना सिखाया:
धागा किस रंग का है?
अच्छा लाल है
क्या अंधेरे में भी लाल ही रहेगा?
अच्छा अंधेरे में काला दिखेगा
लेकिन काला धागा क्या कभी लाल दिखता है!
और क्या है यहाँ आइए देखते हैं?
अच्छा, ये मैगनेट है, इसके बीच में छेंद क्यों
ये क्या है ? मिरर, अरे वाह पीछे से ही पहचान लिया
अच्छा शीशे में अपना चेहरा देख पा रहे ?
शीशे में कहाँ हो ? खंभे के अंदर (शीशे को खंभे से सटाकर रखते हुये)
हम स्कूल क्यों आते हैं ? पढ़ने
तो आज हम खेलेंगे
कौन कौन डॉ बनना चाहता है
ये सिरिन्ज इसीलिए नहीं चल रही है क्योंकि ये कह रही की कांडपाल सर ने जो इसके छेंद पर अंगूठा रख रखा है तो अब यह नहीं चलेगी
अच्छा किसने कहा की इसके कान खराब हैं, चलो इसे ही बुलाओ आँख और कान के समन्वय वाले प्रयोग के लिए
कुछ बातें जो सीधे शिक्षकों से कही गयीं-
HCV सर की कुछ कविताओं का संग्रह - https://hcverma.in/Poems
एक शिक्षक के सवाल पर कि यदि कोई विद्यार्थी पूछे कि अमुक कान्सैप्ट का जीवन में क्या इस्तेमाल? प्रस्तुत HCV सर का जवाब:
इस पर वर्मा सर ने बताया कि, “सब कुछ brain driven है और यह शिक्षा हमारे दिमाग़ को विकसित करने का एक साधन है , हम जो कुछ भी विषय आज पढ़ रहे’ हैं वह सीधे तौर पर भले ही हमारे पेशे में काम न आए लेकिन उस विषय को समझते हुये जो तार्किक क्षमता विकसित होती है हमारे भीतर, वह क्षमता ही आगे चलकर हमे चीजों को समझने, समझाने, सृजन करने और निर्णय लेने में मदद करती है| यह तार्किक क्षमता हमे नयी नयी परिस्थितियों से निपटने में मदद करती है|”
कार्यशाला का हिस्सा शिक्षकों के प्रश्नोत्तर का भी रहा|
कार्यशाला का प्रभाव ऐसा रहा कि संगीत शिक्षिका सुरभि पंत मैम ने भी कहा कि वाकई भौतिकी को हम जीवन के कई क्षेत्रों से जोड़ सकते हैं जैसे कि संगीत में, कंपन्न, आवृति और अनुनाद से|
कार्यशाला से जुड़े कुछ विडियो नीचे दिये गए लिंक से देखे जा सकते हैं
| पीएमश्री रा०क०इं०का० द्वाराहाट की छात्राओं द्वारा मन को सुकून देने लेने वाला गायन| | https://www.youtube.com/watch?v=XOrKWeNIMIA |
| पानी से भरे गिलास या पारदर्शी बोतल के उस तरफ कलम की निब का उल्टा और सीधा दिखाई देना | https://www.youtube.com/watch?v=Y9uzBinRul4&pp=0gcJCQoLAYcqIYzv |
| वायुदाब, घनत्व और तापमान पर HC वर्मा सर के विचार और विश्लेषण और साथ में उदाहरण प्रैशर कुकर का| | https://www.youtube.com/watch?v=7dafkrhKUl8 |
| छड़, उस पर टंगा झोला, बल और बल आघूर्ण, संतुलन के लिए विभिन्न बल और मांसपेशियों में तनाव | https://www.youtube.com/watch?v=v7Z9SyvachY |
| ऊष्मीय गति या तापमान के बढ्ने से बढ़ता वायुदाब- अनुभव जी और मोहित सर | https://www.youtube.com/watch?v=oD1yeAwIxOM |
| गिलास, सिक्का और कार्ड बोर्ड: जड़त्व या कुछ और? एक समीक्षा, एक एप्रोच- HC Verma सर | https://www.youtube.com/watch?v=gWcPqAwL450 |
| रुमाल से पाउडर के कण झड़ने का कारण जड़त्व से अलग- HC Verma सर | https://www.youtube.com/watch?v=hDFvhuLTNzE |
| जो राह चुनी तूने, उसी राह पे राही चलते जाना रे- गायन सुरभि पंत मैम | https://www.youtube.com/shorts/bf_QC6SEcKY |
साइन्स इन द सर्विस ऑफ सोसाइटी के बारे में और जानने या सदस्य बनने के लिए ईमेल करें- sss.dbu@gmail.com या संपर्क करें - 9528237575
पता- Kashmiri Colony, Niranjanpur, dehradun
कार्यशाला का समापन शामिल शिक्षकों को सहभागिता का प्रमाण पत्र उपलब्ध कराकर, धन्यवाद ज्ञापन और समूह फोटो से किया गया|


कई शिक्षकों ने कहा कि ऐसी कार्यशालाएँ होती रहें ताकि उनके अध्यापन और शिक्षण के तरीके मे बेहतरी होती रहे|
https://www.thetoptennews.com/archives/32605
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शुभकामनाएं
-लवकुश कुमार
विनम्र स्वभाव के धनी, चिंतक, शिक्षाविद और वरिष्ठ साहित्यकार आदरणीय महेश चन्द्र पुनेठा जी का परिचय कुछ इस प्रकार है:
जन्म तिथि 10 मार्च 1971
जन्म स्थान उत्तराखंड के सीमांत जनपद पिथौरागढ के सिरालीखेत गाँव में जन्म हुआ। लेकिन सेना द्वारा भूमि अधिग्रहण किए जाने के कारण वहाँ अधिक रहने का अवसर नहीं मिला। अततः इसी जनपद के लम्पाटा गाँव में बसे।
एम. ए. (राजनीति शास्त्र) किया।
शैक्षिक योग्यता - प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा जनपद में ही ग्रहण करते हुए
प्रकाशित पुस्तकें - अब पहुंची हो तुम (कविता संग्रह), शिक्षा के सवाल(लेख) भय अतल में (कविता संग्रह), पंछी बनती मुक्ति की चाह (कविता संग्रह), दीवार पत्रिका और रचनात्मकता (शैक्षिक अनुभव) संयुक्त कविता संकलनों-स्वर एकादश, कवि द्वादश, स्त्री होकर सवाल करती है, लिखनी ही होगी एक कविता, में कविताएँ संकलित ।
त्रैमासिक पत्रिका 'संकेत' का एक कविता केंद्रित अंक।
इसके अलावा हिन्दी की लगभग सभी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में कविता, लघुकथा, समीक्षा तथा आलोचनात्मक आलेख प्रकाशित।
शिक्षा पर केंद्रित पत्रिका 'शैक्षिक दखल' का संपादन
अन्य
शैक्षिक सरोकार तथा हिमाल प्रसंग के साहित्यिक अंकों का संपादन।
जनपदीय काव्य प्रतिभाओं को मंच प्रदान करने के उद्देश्य से 'काव्यांकुर' नाम से एक कविता फोल्डर के संपादन एवं प्रकाशन से सम्बद्ध।
एस.सी.ई.आर.टी. उत्तराखंड द्वारा स्कूली शिक्षा हेतु तैयार करवाई जाने वाली पाठ्यपुस्तकों का लेखन व संपादन।
बच्चों के लिए रोचक एवं भयमुक्त शिक्षा के वातावरण सृजन एवं वैज्ञानिक चेतना के विकास के उद्देश्य से गठित 'रचनात्मक शिक्षक मंडल', 'शैक्षिक नवाचार मंच', 'दृष्टिकोण', 'शैक्षिक दखल समिति' आदि शैक्षिक संस्थाओं की स्थापना हेतु पहलकदमी।
बच्चों की रचनात्मकता को बढ़ाने और पढ़ने की आदत को विकसित करने के लिए 'दीवार पत्रिकाः एक अभियान' का संचालन, जो आज देश भर में काफी लोकप्रिय हो रहा है। देश के लगभग एक हजार दो सौ स्कूलों तक पहुँच चुका है। इसके चलते बच्चों में लेखन कौशल का काफी विकास देखा गया है।
- पढ़ने की संस्कृति के विकास के लिए गाँव-गाँव पुस्तकालय खोलने का अभियान।
- गाँवों में लोककथा यात्रा के माध्यम से लोककथा चौपाल का अयोजन।
संप्रति - रा.इ. का. देवलथल-पिथौरागढ़ में अध्यापन।
संपर्क - ईमेल - punetha.mahesh@gmail.com
स्रोत - साभार "शिक्षा के सवाल"- महेश चन्द्र पुनेठा, प्रकाशक - लोकोदय प्रकाशन, 65/44, शंकर पुरी, छितवापुर रोड, लखनऊ
ईमेल - lokodayprakahsan@gmail.com
विशाल चन्द जी समाजशास्त्र के शोधार्थी, पाठक और संवेदनशील शिक्षार्थी हैं। आप समाजशास्त्र में स्नातकोत्तर हैं तथा इसी विषय में यू.जी.सी. नेट–जे.आर.एफ, यू-सेट और ग्रेजुएट एप्टीट्यूड टेस्ट इन इंजीनियरिंग (GATE) जैसी प्रतिष्ठित परीक्षाएँ भी उत्तीर्ण की हैं। वर्तमान में आप समाजशास्त्र के वरिष्ठ शोध अध्येता हैं। अकादमिक क्षेत्र के साथ-साथ आप एक प्रशिक्षित फार्मासिस्ट भी हैं।
नवीन ज्ञान अर्जन और सतत सीखना आपके व्यक्तित्व का अभिन्न हिस्सा है। पुस्तकों का पठन और संग्रहण आपको विशेष प्रिय है।
आपके भीतर एक घुमक्कड़ चेतना भी सक्रिय है, जो आपको नए लोगों, स्थानों और अनुभवों से जोड़ती रहती है। बागवानी आपके लिए प्रकृति से संवाद का माध्यम है।
आप समाज को अपने स्वतंत्र दृष्टिकोण से देखने और विभिन्न समूहों के साथ मिलकर सामाजिक दायित्वों के निर्वहन को निरंतर प्रयासरत रहते हैं।
मुझे विश्वास है कि आपका चहुंमुखी अनुभव आपकी रचनाओं में परिलक्षित होकर पाठकों को लाभान्वित करेगा और उन्हें एक समावेशी दृष्टिकोण विकसित करने में सहायक सिद्ध होगा।
- लवकुश कुमार
Gunjan is a life sciences undergraduate student from Pithoragarh, who believes that learning goes far beyond exams and degrees. She completed her schooling at Don Bosco Senior Secondary School, Pithoragarh, where her years as a student shaped not only academic discipline but also a growing curiosity about life itself. Early on, she became aware that "education does more than build careers—it quietly shapes how we think, feel, and understand the world around us."
Her journey through competitive exam preparation, especially NEET, became a turning point in her growth. The years of preparation exposed her to pressure, comparison, emotional fatigue, and phases of detachment—experiences that many students go through but rarely speak about.
Writing began during this phase as a way to process those emotions honestly. Over time, it grew into a "responsibility".
Gunjan believes that as young people who will soon become adults, it is important to reflect deeply and grow consciously—so that when younger minds seek guidance, they are met with empathy, clarity, and realism rather than confusion or unrealistic ideals.
Through her writing, she invites readers to slow down and sit with themselves. She views life as a series of seasons, each carrying its own lessons, and believes that nothing goes in vain—not struggle, not grief, not pauses.
She writes from lived experience: as a woman, as a young learner, as a "listener and observer", as both a student and a teacher in becoming, and above all, as a conscious human being.
Her work explores quieter, often unspoken emotions and encourages acknowledging them rather than suppressing them, reminding readers that "understanding what we feel is not weakness, but the beginning of living with awareness and purpose".
With best wishes and an attempt to impart clarity about things met so far.
Note- feedback, queries and comments may be submitted through contact form.
अपनी रचनाओं से संवेदना और स्पष्टता जगाने वाली विख्यात लेखिका श्रीमती मीरा जैन का जन्म 2 नवबंर 1960 को जगदलपुर (बस्तर) छ.ग. में हुआ, परिचय:
शिक्षा - स्नातक
जीवन साथी- इंजि. वीरचंद जैन
माता - श्रीमती केशर देवी मोदी
पिता - श्री विनयचंद जी मोदी
लेखन विधा- लघुकथा , आलेख व्यंग्य , कहानी, कविताएं , क्षणिकाएं आदि ।
पत्र-प्रत्रिकायें जिनमें रचनायें प्रकाशित हुई है 2000 से अधिक रचनाएं निम्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं-
कादम्बिनी , सरिता , गृहशोभा, हंस , नया ज्ञानोदय , सरस सलिल , अहा !जिदंगी , मेरी सहेली , गृहलक्ष्मी, वनिता , बिंदिया. नवनीत , जागरण सखी , मेरी सजनी , वीणा , नई गुदगुदी , साहित्य अमृत, कथादेश, माधुरी , मनस्वी , वेद अमृत , मनोरमा, विश्व हिंदी साहित्य मारीशस, देवपुत्र , नंदन , बाल भरती, मंगलयात्रा , साक्षात्कार . स्वदेश , पंजाब सौरभ, बाल भास्कर, बाल हंस, बच्चो का देश, शबनम ज्योति,अणुव्रत, द्वीप लहरी, अमृत कलश, प्रभात खबर, समाज्ञा ,नई दुनिया, दैनिक जागरण, अमर उजाला, समान्तर ,दैनिक भास्कर, नव भारत टाइम्स , राजस्थान पत्रिका ,हरिभूमि, प्रभात खबर, भारतदर्शन न्यूजीलैडं, ,हिंदी चेतना(कनाडा) नवनीत , बाल किलकारी(बिहार सरकार), उजाला, पंजाब केसरी, जनवाणी, नवभारत , सेतू-.यू.एस. कथा देश , अक्षरा, लोकमत , अक्षरा , चम्बा न्यूज , द राइजिंग स्टेप, साहित्य समीर दस्तक, विश्व गाथा, अक्षर खबर , संगिनी , साहित्य गुंजन, राज एक्सप्रेस , समावर्तन , दिव्यालोक , दैनिक अग्नि पथ ,अवन्तिका , अक्षर विश्व , शब्द प्रवाह, साहित्य समीर दस्तक , प्रभाश्री ज्ञान सागर आदि अनेक।
वे संग्रह जिनमे मेरी लघुकथाएॅ हैं- तीसरी ऑख , द्वीप लहरी , समान्तर ,क्षितिज ,चर्चित ,मिन्नी (पंजाबी), सेतु , कालीमाटी ,दोहरे चेहरे , महा मानव , सागर के मोती, बुजुर्ग जीवन की, लघुकथाएं , कलश, दृष्टि, मन के मोती, गुलाबी गलियां आदि अनेक।
नेपाली, गुजराती , पंजाबी , सिंधी , ओड़िया, बंगाली, असमिया, भोजपुरी, अंग्रेजी,मलयालम , मराठी ,भाषा मेें भी अनुवाद एंव प्रकाशन।
आकाशवाणी जगदलपुर एवम् इंदौर से व्यंग्य,लघुकथाओं व अन्य रचनाओं का प्रसारण. म.प्र.दूरदर्शन से कविताओं का प्रसारण , बोल हरियाणा बोल तथा रेडियो दस्तक से प्रसारण।
प्रकाशीत किताबें-
1- पुस्तक का नाम - मीरा जैन की सौ लघुकथाएं
प्रकाशन का वर्ष - सन् 2003 ,
प्रकाशक - मानव प्रकाशन
द्वितीय संस्करण - प्रकाशन का वर्ष - सन् 2011
प्रकाश - अध्ययन प्रकाशन ,दिल्ली
तृतीय संस्करण - प्रकाशन का वर्ष - सन् 2013
चतुर्थ संस्करण - प्रकाशन का वर्ष - सन् 2016
2- पुस्तक का नाम - 101 लघुकथाएं
प्रकाशन का वर्ष - सन् 2010दिसम्ब
द्वितीय संस्करण जून2012
तृतीय संस्करण अगस्त 2014
प्रकाशकश- पत्रिका प्रकाशन जयपुर , राज.
3- पुस्तक का नाम - दीन बनाता है दिखावा ,लेख,
प्रकाशन का वर्ष - सितंबर 2013
द्वितीय संस्करण - प्रकाशन का वर्ष -2016
प्रकाशक - बोधि प्रकाशन जयपुर राज.
4- पुस्तक का नाम - मीरा जैन की कवितायें , कविता संग्रह ,
प्रकाशन का वर्ष - 2014
प्रकाशक - अयन प्रकाशन दिल्ली
5- पुस्तक का नाम - सम्यक लघुकथाएं
प्रकाशन का वर्ष - सन् 2016 फरवरी
प्रकाशक - बोधि प्रकाशन जयपुर , राज.
6- पुस्तक का नाम - श्रेष्ठ जीवन की संजीवनी
प्रकाशन का वर्ष - फरवरी 2018
प्रकाशक - बोधि प्रकाशन जयपुर , राज
7- पुस्तक का नाम - हेल्थ हादसा, व्यंग्य संग्रह,
प्रकाशन का वर्ष - मार्च 2019
प्रकाशक - सूर्य मंदिर प्रकाशन
8- पुस्तक का नाम - मानव मीत लघुकथाएं
प्रकाशन का वर्ष - मार्च 2019
प्रकाशक - सूर्य मंदिर प्रकाशन बीकानेर
पुस्तक का नाम-
9-जीवन बन जाए आनंद का पर्याय,
लेख संग्रह
प्रकाशन वर्ष - 2020
प्रकाशक -इंडिया नेट बुक, दिल्ली
पुस्तक का नाम -
10-भोर में भास्कर , लघुकथा संग्रह
प्रकाशन वर्ष - 2022
प्रकाशक इंडिया नेटवर्क नेट बुक दिल्ली
11-मीरा जैन के सदाबहार लघुकथाएं
प्रकाशक- जिज्ञासा प्रकाशन प्रकाशन- वर्ष 2023
विशेष-
2011में ‘‘ मीरा जैन की सौ लघुकथाएं‘‘विक्रम विश्व विद्यालय उज्जैन द्वारा शोध कार्य करावाया जा चुका है ।
2022 - महाराष्ट्र, सावित्रीबाई फूले यूनिवर्सिटी पुणे द्वारा लघुकथाओं पर शोध कार्य जारी।
2024 - विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन द्वारा मेरी लघुकथाओं पर शोधकर जारी है
अनेक लघुकथाओं पर लघु फिल्मों का निर्माण
सम्यक लघुकथाएं पूर्णतया बालकों से संबंधित श्रेष्ठ आचरण पर आधारित है .
सन् 2007-8 में निर्धन वर्ग आयोग म.प्र.शासन राज्य स्तर पर मेरे द्वारा भेजे गये सुझावों को
प्रथम प्रथमिकता में चयनित किया .
केंद्रिय मानव संसाधन विकास मंत्रालय तथा छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा मेरी किताबें क्रय की गई है ।
अनेक भाषाओं में रचनाओं का अनुवाद एवं प्रकाशन
पुरस्कार - अंतर्राष्ट्रीय , राष्ट्र एंव राज्य स्तरीय अनेक पुरस्कार-
नईदुनिया तथा टाटा शक्ति द्वारा लेखन के लिये प्राइड स्टोरी अवार्ड 2014.
युग र्निमाण शिक्षण समिति तथा हिंदी साहित्य परिषद द्वारा हिंदी सेवा सम्मान 2015 से सम्मानित .
पुस्तक 101 लघुकथाएं को राष्ट्रीय स्तर पर प्रथम पुरूस्कार 2011 .
लघुकथा के लिये हस्ताक्षर संस्था द्वारा विशिष्ट पुरस्कार ,
दैनिक अग्नि पथ द्वारा वरिष्ठ लघुकथाकार साहित्य सम्मान 2013 ,
शब्द प्रवाह साहित्य सम्मान 2013 ,
सामाजिक कार्यो में विशिष्ट योगदान एवम् साहित्यक उपलब्धियों हेतू नवकार सेवा संस्थान द्वारा विषिष्ट सम्मान .
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लेख को प्रथम पुरस्कार
महिला एवं बाल विकास उज्जैन संभाग म.प्र. द्वारा अंर्तराष्ट्रीय महिला दिवस 2016 में सम्मान ,
कथादेश द्वारा 2016 में लघुकथा पुरस्कृत .
जे.एस.जी.आई.एफ. म.प्र.रीजन द्वारा विभिन्न क्षेत्रों की उपलब्धियॉ तथा समाज सेवा के क्षेत्र में अद्वितीय कार्यो के लिये अवार्ड 2016-17 से नवाजा गया.
अभिव्यक्ति मंच द्वारा कविता को राष्ट्रीय स्तर पर द्वितीय पुरस्कार
जे.एस.जी.आई.एफ. द्वारा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उत्कृष्ट लेखन व समाज सेवा के क्षेत्र में आउट स्टेंडिंग परफारमेंस हेतू अवार्ड 2017 .
महिला सशक्तिकरण उज्जैन ने बेहतर समाज सेवा , समाजिक एकता व उत्कृष्ट लेखन के लिये अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 2017 पर सम्मानित किया .
अभिव्यक्ति विचार मंच द्वारा राष्ट्रीय प्रतिभा सम्मान 2017-18 से सम्मानित आदि अनेक।
अखिल भारतीय साहित्य साधक मंच बंगलौर द्वारा राजभाषा साहित्य सम्मान
राष्ट्रीय संगठन सखी संगिनी द्वारा 2018 नारी सेवा सम्मान
लघुकथाएं व लेख को विभिन्न संस्थाओं द्वारा 2018 में पुरस्कृत,
भोपाल से प्रकाशित मासिक पत्रिका 'साहित्य समीर दस्तक' एंव श्री विभगूंज वेलफेयर सोसायटी' द्वारा 'सम्यक लघुकथाएं' को 'शब्द गुंजन लघुकथा सम्मान-2018' से सम्मानित किया गया।
विचार प्रवाह मंच इंदौर द्वारा सम्मानित 2020
डॉक्टर एस एन तिवारी सम्मान 2021
अमृत महोत्सव के तहत माधव महाविद्यालय उज्जैन द्वारा श्रेष्ठ साहित्य साधिका सम्मान 2021
मातृ भाषा उन्नयन संस्थान भारत के द्वारा हिंदी दिवस 2022 सम्मानित
हिंदी साहित्य सम्मेलन बदनावर द्वारा साहित्य सम्मान 2022
मथुरा देवी स्मृति वट स्मृति षोडश सम्मान 20 22
हिंदी साहित्य अकादमी भोपाल द्वारा व्यंग्य संग्रह 'हेल्थ हादसा ' को शरद जोशी व्यंग्य सम्मान 2019
भारतीय साहित्य परिषद इंदौर द्वारा प्रादेशिक साहित्य गौरव सम्मान 2023
विचार प्रवाह साहित्यिक मंच इंदौर द्वारा विशिष्ट लघुकथा के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान सम्मान 2023
इंटिग्रेटेड सोसायटी ऑफ मीडिया प्रोफेशनल लखनऊ द्वारा
समग्र सहित्य पर मैथिली शरण गुप्त सम्मान 2022
अथाई समूह द्वारा सर्वश्रेष्ठ कथाकार सम्मान 2023
संस्था विद्यांजलि भारत मंच इंदौर द्वारा समग्र साहित्य पर धरोहर सम्मान 2023
साहित्य संगीति जयपुर द्वारा लघुकथा संग्रह भोर में भास्कर को सर्वोत्कृष्ट कृति जयपुर सम्मान 2024
अभिनव कला परिषद भोपाल द्वारा अभिनव शब्द शिल्पी अलंकरण से सम्मानित 2023
अभ्युदय अंतरराष्ट्रीय महिला लेखन प्रेरणा पुरस्कार 2023
म. प्र लेखिका संघ भोपाल द्वारा लघुकथा संग्रह भोर में भास्कर के लिए राष्ट्रीय स्तर पर श्रीराजकुमार केसवानी सम्मान 2024
माता कौशल्या साहित्य संस्कृति शोध संस्थान वी डॉ.माया ठाकुर फाउंडेशन रायपुर द्वारा
लघुकथा भूषण सम्मान 2024
रक्त मित्र फाउंडेशन मथुरा उत्तर प्रदेश द्वारा नारी शक्ति पद्मश्री सम्मान 2024
पतंजलि योग समिति छत्तीसगढ़ द्वारा साहित्य सम्मान 2024
मां राजपति देवी स्मृति साहित्य सम्मान 2024-प्रयागराज
किस्सा कोतहा सम्मान आगरा 2024
राजराजेश्वरी म्यूजिकल ग्रुप इंदौर साहित्य सम्मान 2024
प्रेस क्लब ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट भोपाल द्वारा साहित्य सम्मान 2024
प्रांति इंडिया साहित्य सम्मान 2024
अभ्युदय अंतरराष्ट्रीय श्लाका
सम्मान 2024
अंतर्राष्ट्रीय सरस्वती साहित्य सम्मान 2025
श्रीमती आशा सुपेकर स्मृति सम्मान 2025
सम्प्रति-पूर्व सदस्य बाल कल्यााण समिति
पद-प्रथम श्रेणी न्यायायिक मजिस्ट्रेट बोर्ड , बा.क.स
चेयर पर्सन-गर्ल सेव चाइल्ड कमेटी जे.एस.जी.आई.एफ. 2016-17-18
2019 गृह मंत्रालय भारत सरकार द्वारा देश के विद्ववानों की सूची में शामिल
अनेक मंचो से बाल साहित्य , बालिका महिला सुरक्षा उनका विकास , कन्या भ्रूण हत्या , बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ , बालकों के लैगिंग यौन शोषण , निराश्रित बालक बालिकाओं को समाज की मुख्य धारा से जोड़ना स्कूल , कॉलेजों के विद्यार्थियों को नैतिक शिक्षा आदि के अनेक विषयो पर उद्बोधन एवं कार्यशाला ।
पता
मीरा जैन
516 साईं नाथ कॉलोनी,सेठीनगर
उज्जैन ,मध्य प्रदेश
पिन-456010
मो. बा-9425918116
https://www.meerajain.in
jainmeera02@gmail.com
श्री संजय सिंह, भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण में सन् २०१२ से वायु यातायात नियंत्रण अधिकारी (ATCO) के रूप में कार्यरत हैं।
“अवध” ये उपनाम इन्हें विद्यालय के दिनों में अपने भूगोल के अध्यापक से उपाधि के रूप में प्राप्त हुआ जिन्होंने इनको इस उपनाम से लिखने को प्रेरित किया।
केंद्रीय विद्यालय बैरागढ़ भोपाल से विद्यालयीन शिक्षा ग्रहण करने के पश्चात, संजय सिंह “अवध” ने राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय भोपाल से इंजीनियरिंग में स्नातक प्राप्त किया।
बचपन से ही लेखन के शौकीन संजय सिंह “अवध” अभी तक कई सारे मंचों पर भी अपनी कविताओं की प्रस्तुति दे चुके हैं और अपने कालेज के दिनों से ही, जैसा कि इनकी रचनाओं से घोतक है, जन जन में संवेदना, करूणा और साहस भरने के साथ अंतर्विषयक समझ द्वारा उत्कृष्टता के पथ पर युवाओं को अग्रसर करने को प्रयासरत हैं।
आपने युवाओं से जुड़ने और उन्हें अनुनादित कर उनका श्रेष्ठ बाहर लाने के लिए अपना यूट्यूब चैनल ( यहां क्लिक करें ) भी बनाया है।
जैसा कि आपकी एक कविता उड़ान में उद्धृत है आप इस बात के हिमायती हैं कि व्यक्ति को खुलकर, अपने काम में उत्कृष्टता के दम पर ऊंची से ऊंची उड़ान को ध्येय बनाकर नैतिकता का साथ लिए हुए प्रयासरत रहना चाहिए।
क्योंकि आप शतरंज और बैडमिंटन भी खेलते हैं शौकिया तौर पर इस तरह खेल भावना भी झलकती है आपकी रचनाओं में, इसके साथ ही देश के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों पर अपनी सेवाएं देने का जो अवसर मिला और उससे प्राप्त अनुभव का पुट भी रहता है आपकी रचनाओं में और ये तत्व इन्हें एक अलग ही कलेवर देते हैं जो पाठकों में रुचि जगाने और स्पष्टता देने में सफल साबित होता है।
लेखक, कवि और चिंतक, श्री संजय सिंह 'अवध' की रचनाओं को उनके ब्लॉग ( यहां क्लिक करें ) से भी पढ़ा जा सकता है और उनकी ईमेल से उनसे संपर्क साधा जा सकता है - green2main@yahoo.co.in
युवाओं से संपर्क में नियमितता बनी रहे इसके लिए आपका वाट्सऐप चैनल ( यहां क्लिक करें ) भी है।
ज्यादा से ज्यादा लोग लाभान्वित हों आपकी रचनाओं से, इसी विश्वास के साथ।
- लवकुश कुमार
आदरणीय सुषमा सिन्हा जी का जन्म वर्ष 1962 में गया (बिहार) में हुआ इनकी माता जी प्रधानाध्यापिका थी इन्होने बीए ऑनर्स (हिंदी), डी. सी. एच., इग्नू (वाराणसी) उर्दू डिप्लोमा में शिक्षा प्राप्त की|
इनकी प्रकाशित पुस्तकें निम्नलिखित हैं :-
चार लघुकथा संग्रह
1. औरत (2004)
2. राह चलते (2008)
3. बिखरती संवेदना (2014)
4. एहसास (2017)
विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में विगत 32 वर्षों से कविता, लघु कथा, कहानी आदि प्रकाशित ।
सम्मान पुरस्कार
सामाजिक संस्था "जागरूक जनता ट्रस्ट" द्वारा "जागरूक महिला पुरस्कार"।
साहित्यिक संस्था "मंजिल ग्रुप" दिल्ली, द्वारा "लाल बहादुर शास्त्री" सम्मान।
"शतकवीर सम्मान", "साहित्य योद्धा सम्मान", "मातोश्री सम्मान" एवं अन्य "साहित्यिक सम्मान" से सम्मानित।
"साहित्य सृजन मंच" खगड़िया (बिहार) द्वारा 2022 "लघुकथा गौरव" सम्मान एवं "सृजन गौरव सम्मान"।
"हरिवंश राय बच्चन स्मृति पर्व" पर "लघु कथा सम्मान"।
विभिन्न आध्यात्मिक एवं स्लोगन प्रतियोगिता में पुरस्कृत।
2017 में 29 वाँ "लघु कथा सम्मेलन" पटना बिहार में, गोवा की तत्कालीन राज्यपाल, श्रीमती मृदुला सिन्हा द्वारा, "लघु कथा सम्मान" से सम्मानित।
वर्तमान- स्वतंत्र लेखन।
ईमेल- ssinhavns@gmail.com
प्रो० राम मोहन पाठक जी द्वारा प्राप्त शुभाशंसा में प्रोफेसर साहब लिखते हैं कि
जीवन की अनुभूतियों के शब्दमंथन की परिणति रचना-'कथा-कहानी' प्रेरक, पठनीय पुस्तक है। लेखिका का कथन है- 'मैं सफर में आने वाले मील के पत्थर के साथ-साथ छोटे, बड़े कंकड़, पत्थर, विशाल वृक्ष, लताएँ-सभी को सहेजने की कोशिश करती हूँ, जो बाद में लेखनी में कब, कैसे बंध जाती हैं, पता नहीं चलता।'- यह कथन प्रस्तुत संग्रह की कथाओं में स्पष्ट ध्वनित होता है। पाठक को इन रचनाओं में आधुनिक जीवन की संगतियों-विसंगतियों और प्रस्तुत समस्याओं का कथारूप भी स्पष्ट झलकता है। साथ ही, समस्याओं के हल भी प्रस्तुत करने की लेखकीय चेष्टा इस संग्रह की विशिष्टता है।
काशी के साहित्यिक परिवेश में स्वतंत्र लेखन के लिए दीर्घ अवधि से समर्पित सुषमा जी के पूर्व प्रकाशित चार लघुकथा संग्रहों के कम में यह पांचवीं कृति है। संग्रह की कथाएँ प्रेरक और जीवनोपयोगी भी हैं।
लेखिका की मानव जीवन और समाज के प्रति विश्लेषणात्मक साहित्यिक दृष्टि पुस्तक की आत्मा है। आशा है साहित्यानुरागी पाठकों के लिए सकारात्मक चिंतन और जीवन की दार्शनिक दृष्टि प्रदान करता यह रचना-संग्रह अवश्य ही स्वीकार्य, रूचिकर एवं प्रेरक होगा!
साहित्य साधना की निरंतरता वस्तुतः तपस्या भी है। लेखिका की सार्थक, अनवरत साधना--तपस्या का यह क्रम जारी रहे, इसी शुभकामना के साथ......!
साथ ही जाना माना नाम श्री कृष्ण कुमार श्रीवास्तव (निर्देशक एवं लेखक) लेखिका के बारे में लिखते हैं कि
" दिनकर की कुछ पंक्तियां उद्धृत कर रहा हूं... बूढ़े बैल की पीठ पर बेरहमी से बेंत मत मारो। मेरी पीठ पर उसका निशान उगता है....।
इस एहसास की पराकाष्ठा जब लेखनी के माध्यम से कम शब्दों में अभिव्यक्त होकर पाठक की चेतना को जागृत करती है तो लघुकथा बन जाती
है। लघु कथा अर्थात् लघु है जो कथा।
लघु कथा का संक्षिप्त होना अनिवार्य माना जाता है, परन्तु संक्षिप्त होते हुए भी इसमें कथ्य, पात्र, चरित्र-चित्रण, संवाद और उद्देश्य निहित होते हैं।
लघु कथा लघु होने के बावजूद अपने उद्देश्य को बिजली की कौंध की तरह अपने पाठक के समक्ष अभिव्यक्त करने का सामर्थ्य रखती है।
लघु कथा, किसी क्षण विशेष में उत्पन्न भाव, घटना या विचार को संक्षिप्त रूप में सरल शब्दों से गढ़ी गई प्रभावी अभिव्यक्ति है। इसमें यथार्थ के
साथ-साथ कल्पना की उन्मुक्त उड़ान भी होती है। वर्तमान में साहित्यिक विधाओं की दौड़ में लघु कथा सबसे आगे है।
जहाँ तक मुझे ज्ञात है लघु कथा के बीज वेद-उपनिषिद् से लेकर पुराण, रामायण, महाभारत, बौद्ध-जातक कथाओं, पंचतंत्र, हितोपदेश आदि में
संस्थित हैं। भारतेंदु हरिश्चंद्र द्वारा लिखित अंगहीन धनी, अद्भुत संवाद और माधवराव सप्रे द्वारा लिखित "एक टोकरी भर मिट्टी" से लेकर सआदत हसन
मंटो, रमेश बत्रा, जगदीश कश्यप, सतीश दुबे, सतीश राज पुष्करण, कृष्ण कमलेश, विक्रम सोनी, विष्णु प्रभाकर, पृथ्वीराज अरोड़ा, मधुदीप, मधुकांत,
डॉ. शील कौशिक, हरिशंकर परसाई, प्रथम महिला लघु कथा लेखिका इंदिरा स्वप्न, चित्रा मृदुल, शकुंतला किरण, डॉ. चंद्रा सायता से होती हुई लघु कथा
की जो विशाल शोभायात्रा चल रही है उसमें सुषमा सिन्हा भी अपनी एक प्रमुख पहचान रखती हैं।
लघु कथा का कलेवर उसकी लघुता में ही होता है इसलिए लघु कथा के लेखक में अधिक सृजनशीलता होती है, क्योंकि उसे सीमित शब्दों में ही
अपनी संवेदनाओं को व्यक्त करना पड़ता है और अपने पाठकों को संतुष्ट एवं प्रभावित करना पड़ता है।
अपने शिल्प में निपुण सुषमा जी में अथाह सृजनशीलता है। इसी
कारण औरत, राह चलते, बिखरी संवेदना और एहसास के बाद इनका पांचवा
लघु कथा संग्रह प्रकाशित होने जा रहा है। इनके पूर्व प्रकाशित रचनाओं के
आधार पर यह स्पष्ट है कि तमाम सम्मानों से सम्मानित सुषमा जी की लेखनी
लघु कथा रचना शिल्प में सिद्ध हो चुकी है। अपनी सिद्ध लेखनी से सुषमा जी
जीवन के अनछुए पहलुओं पर लिखती रहें और लघु कथा विधा को और
अधिक समृद्धशाली करती रहें।
.."हमारे जीवन में घटने वाली छोटी-सी घटना में जीवन की
विराट व्याख्या छिपी रहती है। इस विराट कथ्य को बिम्बों में बांध लेना ही
लघु कथा है....."
"सुषमा जी" के लिए अनंत शुभकामनाओं के साथ....
आदरणीय अक्षजा जी को पढ़ना संवेदना जगाता है और स्पष्टता से भर देता है, आपने अपनी रचनाओं से मानवीय रिश्तों, संघर्षों, विरोधाभासों पर प्रकाश डालते हुए या कहें कि ध्यान खींचते हुए एक शांतिमय और समृद्ध जीवन / दुनिया के लिए तरह तरह की विधाओं में साहित्य रचकर साहित्य कोश में अमूल्य योगदान दिया है, आपके सम्बन्ध में निम्नलिखित जानकारी उपलब्ध है जो पाठकों के लिए प्रासंगिक होगी ऐसा विश्वास है :
सृजन की विधाएँ : लघुकथा, कहानी, व्यंग्य, छंदमुक्त कविता, पत्र, आलेख, समीक्षा, जापानी-विधा हाइकु-चोका आदि।
प्रकाशित कृतियाँ: 'रोशनी के अंकुर' एवं 'टूटती मर्यादा' लघुकथा संग्रह तथा ‘सुधियों के अनुबंध’ कहानी संग्रह।
अस्सी के लगभग विभिन्न विधाओं में साझा-संग्रहों में रचनाएँ प्रकाशित।
अनुवाद : 'अदहने क आखर' अवधी अनुबाद [लघुकथा-संकलन]
सम्पादन : 'खाकीधारी' 2024{लघुकथा संकलन} 'अदृश्य आँसू' 2025 {कहानी संकलन} 'किस्से खाकी के' 2025 {कहानी संकलन} 'उत्तर प्रदेश के कहानीकार' 2025 {कथाकोश}
पुरस्कार : लघुकथा/समीक्षा/कहानी/व्यंग्य / कविता विधा में कई बार पुरस्कृत |
आकाशवाणी आगरा से कहानी प्रसारित
कुछ लघुकथाएँ पंजाबी, उर्दू, नेपाली और उड़िया में अनूदित होकर प्रकाशित।
यू ट्यूब चैनल : 'savita mishra akshaja' और ‘साहित्य एक समुन्दर: 'अक्षजा' नाम से|
ब्लॉग: 'मन का गुबार' एवं 'दिल की गहराइयों से'।
ई-मेल: 2012.savita.mishra@gmail.com
मोबाइल: 09411418621