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विशेष ध्यान दें:


अस्मिता - हेलो भैया, राधे राधे 🙏🙏
भैया, कैसे हैं आप?
लवकुश कुमार: राधे राधे बिटिया, मैं ठीक हूँ।
आप कैसी हैं?
अस्मिता- भैया, मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा है। मेरा एक एग्जाम छूट गया। 😔🙏
और दूसरा पेपर हुआ, बस एक, उसमें भी 40 प्रश्न ठीक हैं, मैं चेक करके आई हूँ।
मैं भी ठीक हूँ भैया।
लवकुश कुमार: एग्जाम कैसे मिस हुआ?
अस्मिता- अब प्रैक्टिकल में 65 या 70 नंबर होने चाहिए, तब क्लियर होगा।
लवकुश कुमार: ओ लेवल के लिए शायद आपने थोड़ा जल्दी कर दी। आपको पहले कोई आसान कोर्स करना चाहिए था। लैपटॉप लेकर प्रैक्टिस करनी चाहिए थी।
अस्मिता - भैया, रिपोर्टिंग टाइम बहुत नीचे लिखा था। मुझे नहीं पता था। एक घंटे पहले ही गेट बंद हो गया। 9 बजे ही, जबकि एग्जाम 10 बजे से था।
मैं 9:30 पर पहुँची वहाँ।
लवकुश कुमार: परेशान नहीं होते बिटिया, जो भी होगा देखा जाएगा।
अस्मिता- हाँ भैया, आप बिल्कुल ठीक कह रहे हैं।
लवकुश कुमार: लिमिटेड टाइम में जितना हो सकता है करो, फिर जो होगा देखा जाएगा।
चिंता नहीं करते 🤝🤝🤝
अस्मिता -: भैया, प्रैक्टिकल में समय लगता है।
लवकुश कुमार: मैं सोच रहा था बिटिया, समय ज्यादा लगेगा। कोई बात नहीं, ग्रेजुएशन पूरा होते-होते हो जाए, तब भी कोई दिक्कत नहीं।
फिर से दे देना एग्जाम, फिर से भर देना फॉर्म, नो इश्यू।
जीवन में सब कुछ अपने सोचे हुए अनुसार नहीं चलता।
अस्मिता - मेरा एग्जाम छूटा, इतनी रिक्वेस्ट करने पर भी जाने नहीं दिया भैया। 😔, और मेरे जैसे 50 से ज्यादा बच्चे थे, इतनी दूर-दूर से गए थे।
लवकुश कुमार: रिक्वेस्ट बड़े अधिकारी अप्रूव कर पाते हैं। सिक्योरिटी गार्ड के पास इतनी शक्ति नहीं होती। वे लोग अपने बॉस और ऊपर वालों के कहे अनुसार कार्य करते हैं।
इसलिए रिक्वेस्ट करना भी केवल सक्षम अधिकारी से ही फलदायी होता है और दूसरा की कुछ नियम सारे केन्द्रों के लिए एक जैसे होते हैं जैसी की गेट एक नियत समय पर बंद करने का निर्देश मानक संचालन प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है|
कहीं भी एग्जाम देने जाना हो तो रिपोर्टिंग टाइम से डेढ़ घंटे पहले पहुँचने का लक्ष्य लेकर चलो, यदि लोकल में है और यदि दूसरे शहर में है तो यदि संभव हो तो रात्रि विश्राम परीक्षा केंद्र के नजदीक रखो अन्यथा रास्ते की लंबाई के अनुसार अतिरिक्त समय लेकर चलो ताकि कुछ समय के लिए ट्रेफिक जैम मे फंस जाने पर भी केंद्र पर ससमय पहुंचा जा सके|
लवकुश कुमार: अच्छे से सीख लो, फिर देना एग्जाम। कोई बात नहीं बिटिया।
अस्मिता - हाँ भैया, अब आगे से यही करूँगी। अब दोबारा ऐसी गलती कभी नहीं होगी, मैं एडीएम से भी बात की भैया, पर नहीं हुआ।
लवकुश कुमार: कोई बात नहीं बिटिया।
कोई भी अवसर आख़िरी नहीं होता (जीवन में बेहतर करके एक आत्मनिर्भर और लोकोपयोगी जीवन जीने के लिए )
ये मत सोचो कि अब क्या होगा।
हो सकता है कि अब और बेहतर हो|
एक बात याद रखो कि "बहादुर लोग किसी नुकसान पर परेशान नहीं होते, बल्कि उसे स्वीकार करते हैं और भविष्य के लिए अतीत से सीखते हुये आगे बढ़ते हैं|"
अस्मिता - हाँ भैया, ये बात तो है।
अस्मिता - इतनी लंबी-लंबी कोडिंग होती है। बस 30 या 35 मिनट में दो प्रश्न करने होते हैं भैया।
लवकुश कुमार - कोडिंग के लिए यशवंत कानेटकर की पुस्तक मांगा सकती हो, मैंने इसी से प्रोग्रामिंग सीखी थी।
अस्मिता - हाँ भैया, किताब मँगा लेती हूँ। 🙏
एक ओ लेवल ही ऐसा विषय है जिसमें मुझे निराशा मिलती है भैया। समझ नहीं आता क्या करूँ। 🙏
लवकुश कुमार: ओ लेवल को आराम से करो, जीवन का संतुलन बनाए रखते हुए। कोई जल्दबाज़ी नहीं, लैपटाप लेलों और अभ्यास करो, यह सब अभ्यास के विषय हैं, किसी को कम तो किसी को ज्यादा समय लगता है लेकिन बारीकी से ध्यान देने से हो जाता है, अच्छी किताब और अच्छा शिक्षक|
अस्मिता - ओके भैया। 🙏🙏
मैं प्रैक्टिकल देती हूँ भैया। जो होगा, रिज़ल्ट आने पर पता चल जाएगा।
पर शायद भैया, न देकर मन में यह नहीं रखना चाहती कि कहीं ऐसा न लगे कि दिया होता तो हो जाता, क्या पता। 🙏🙏
लवकुश कुमार: ओके बिटिया, अच्छा। ख्याल रखो, प्रयोगात्मक परीक्षा दे आना, कुछ सीखने और समझने को मिलेगा। धीरे-धीरे सब अच्छा होगा, फिर बात होगी बिटिया।
एक काम से जा रहा हूँ
रिज़ल्ट से जुड़कर काम मत करो।
सीखने के लिए काम करो।
अस्मिता - ओके भैया। 🙏🙏

Electric Charge and Field


नोट- एकसमान विद्युत् क्षेत्र में एक द्विध्रुव की स्थितिज उर्जा पर उसके विभिन्न विन्यासों पर भी पढ़ लें|
लगभग हर दौर में दो तरह के लेखक रहे हैं—एक वे जो भाषा की अंतिम चमक-दमक और शिल्प पर वर्षों काम करते हैं, और दूसरे वे जो समय की पुकार सुनकर तत्काल बोलते हैं। समाज को दोनों की आवश्यकता होती है।
मेरी पुस्तक "अंतस – ज़रा ठहरिए" पर पिछले कुछ दिनों में अनेक प्रतिक्रियाएँ मिलीं। इन प्रतिक्रियाओं में एक रोचक अंतर दिखाई दिया।
किशोर और युवा पाठकों का एक बड़ा वर्ग कह रहा है—
"सर, यही तो हम ढूँढ़ रहे थे।"
"बहुत से ऐसे सवाल पहली बार पढ़ने को मिले जिन पर हमने कभी सोचा ही नहीं था, या इस तरह से नहीं सोचा था।"
"यह किताब जैसे हमारी पीढ़ी के लिए ही लिखी गई है।"
इन प्रतिक्रियाओं को पढ़कर संतोष होता है, क्योंकि पुस्तक का उद्देश्य भी यही था—युवाओं/किशोरों को कुछ महत्वपूर्ण प्रश्नों की ओर ले जाना।
लेकिन दूसरी ओर कुछ वरिष्ठ और गंभीर पाठकों ने भाषा, शैली, संपादन, टाइपिंग तथा अभिव्यक्ति की कमियों/विस्तार/गहराई की ओर भी ध्यान दिलाया है। मैं उनका भी उतना ही आभारी हूँ।
वास्तव में, दोनों प्रकार की प्रतिक्रियाएँ मेरे लिए मूल्यवान हैं।
फिर भी, इस अवसर पर मैं अपनी लेखकीय दृष्टि स्पष्ट करना चाहता हूँ।
मैंने यह पुस्तक भाषा का चमत्कार दिखाने के लिए नहीं लिखी।
मैंने यह पुस्तक इसलिए लिखी क्योंकि मुझे लगा कि आज का किशोर और युवा बहुत सारी सूचनाओं के बीच रहकर भी बहुत से बुनियादी प्रश्नों से दूर होता जा रहा है।
मुझे ऐसा लगता है, या कहिए कि मैंने अपनी सीमित दृष्टि में ऐसा देखा है कि:
वह करियर पर बात करता है,
लेकिन जीवन पर कम।
वह सफलता पर चर्चा करता है,
लेकिन संतोष पर नहीं।
वह प्रतियोगिता समझता है,
लेकिन स्वयं को कम समझता है।
वह दुनिया को बदलना चाहता है,
लेकिन अपने भीतर झाँकने का समय नहीं निकाल पाता।
यदि यह पुस्तक उसे थोड़ी देर रुककर सोचने पर विवश करती है, तो मुझे लगता है कि इसका सबसे बड़ा उद्देश्य पूरा हो जाता है।
निश्चित रूप से हैं।
मैं यह दावा कभी नहीं करूँगा कि यह एक परिपूर्ण पुस्तक है।
भाषा की सीमाएँ हो सकती हैं।
संपादन में त्रुटियाँ हो सकती हैं।
टाइपिंग की गलतियाँ भी हो सकती हैं।
जो मित्र इन कमियों की ओर संकेत कर रहे हैं, वे वास्तव में मेरी सहायता कर रहे हैं। अगली आवृत्तियों में इन्हें सुधारना मेरी जिम्मेदारी है।
लेकिन मैं एक बात अवश्य कहना चाहूँगा—
हर प्रकार की त्रुटि समान महत्व की नहीं होती।
एक त्रुटि भाषा में हो सकती है।
दूसरी त्रुटि समय पर न बोलने की हो सकती है।
मेरे लिए दूसरी त्रुटि अधिक गंभीर है।
मै मानता हूँ कि, समय पर कही गई अपूर्ण बात, देर से कही गई परिपूर्ण बात से अधिक उपयोगी हो सकती है।
दूसरा यदि मेरे द्वारा उठाए गए किसी प्रश्न पर गहराई से नहीं भी लिखा गया तो उसका कारण, एक ही किताब में कई सारे जरूरी प्रश्न शामिल करना था, कहते हैं समझदार के लिए इशारा काफी होता है, वैसे जिज्ञासु पाठक के लिए इच्छित विषय पर गहनता से जानने के लिए वरिष्ठ लेखकों का साहित्य भी मौजूद है, इसी के दृष्टिगत ही तो मैंने पुस्तकों की एक सूची भी दे रखी है मेरी पुस्तक के अंत में|
आज का समय तेजी से बदल रहा है।
बच्चे और युवा प्रतिदिन हजारों संदेशों, वीडियो और विचारों से घिरे हैं।
ऐसे समय में यदि कोई लेखक यह सोचकर वर्षों तक चुप रहे कि अभी भाषा और बेहतर हो जाए, शैली और निखर जाए, प्रत्येक वाक्य पूर्ण हो जाए, तब तक शायद जिन प्रश्नों पर बात करनी थी, वे और अधिक जटिल हो चुके होंगे।
मैं पूर्णता का विरोध नहीं करता।
बल्कि मैं स्वयं उसे पाने की दिशा में उन्मुख हूँ।
लेकिन मैं यह भी मानता हूँ कि जरूरी बात समय पर कही जानी चाहिए।
पूर्णता की यात्रा चलती रह सकती है।
मौन की भरपाई बाद में नहीं हो सकती।
अक्सर हम मान लेते हैं कि लेखक पुस्तक लिखने के बाद पूर्ण हो जाता है।
मेरा अनुभव इससे बिल्कुल अलग है।
मेरे लिए हर पाठक एक शिक्षक है।
कोई भाषा सिखाता है।
कोई विचारों की गहराई दिखाता है।
कोई संपादन की आवश्यकता बताता है।
कोई यह विश्वास दिलाता है कि पुस्तक ने उसके जीवन में कुछ बदल दिया।
इन सभी से मैं सीख रहा हूँ।
तो मेरे लिए यह उपलब्धि किसी भी भाषाई प्रशंसा से कम नहीं है।
साहित्य का अंतिम उद्देश्य केवल भाषा का सौंदर्य नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर चेतना जगाना भी है।
मैं अपने सभी आलोचकों और शुभचिंतकों का हृदय से धन्यवाद करता हूँ।
जो कमियाँ बता रहे हैं, वे भी मेरी यात्रा के साथी हैं।
जो पुस्तक के उद्देश्य को समझ रहे हैं, वे भी।
मैं भविष्य में भाषा, शिल्प और संपादन—सभी पर अधिक मेहनत करूँगा।
लेकिन यदि मुझे फिर कभी चुनाव करना पड़े कि एक जरूरी बात आज कहूँ या उसे पूर्ण बनाने के लिए वर्षों तक रोककर रखूँ, तो संभवतः मैं फिर वही करूँगा जो इस पुस्तक के साथ किया—
समय की पुकार को प्राथमिकता दूँगा।
क्योंकि मेरा विश्वास है—
पूर्णता एक सतत यात्रा है, पर समय पर की गई सार्थक अभिव्यक्ति कभी-कभी एक पूरी पीढ़ी की दिशा बदल सकती है।
मैं आलोचना को स्वीकार करता हूँ, सुधार के लिए प्रतिबद्ध हूँ, लेकिन समय पर आवश्यक संवाद को पूर्णता की प्रतीक्षा में स्थगित करना उचित नहीं मानता।
सादर धन्यवाद
लवकुश कुमार
अस्वीकरण - इस लेख को सँवारने के लिए, chatgpt का इस्तेमाल किया गया है|
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कुछ दिन पहले सोशल मीडिया पर एक पोस्ट पढ़ी। उसमें एक लेखिका ने लिखा कि उन्होंने किसी की प्रशंसा सुनकर एक पुस्तक खरीदी, लेकिन उन्हें वह पसंद नहीं आई। उन्होंने अपना अनुभव फेसबुक पर साझा किया। यह उनका व्यक्तिगत अनुभव था और उसे व्यक्त करने का अधिकार भी उन्हें है। लेकिन उस पोस्ट को पढ़ते हुए मेरे मन में एक बड़ा प्रश्न उठा—क्या हमारी अभिव्यक्ति का तरीका कभी-कभी अनजाने में पढ़ने-लिखने की संस्कृति को भी नुकसान पहुँचा सकता है?
यह लेख किसी व्यक्ति के पक्ष या विपक्ष में नहीं है। यह उस व्यापक चिंता पर विचार करने का प्रयास है कि जिस समाज में वैसे ही पुस्तकें कम पढ़ी जाती हों, वहाँ हम अपने शब्दों से कैसी साहित्यिक संस्कृति बना रहे हैं।
हम अक्सर कहते हैं कि लोग किताबें नहीं पढ़ते। मोबाइल, सोशल मीडिया और त्वरित मनोरंजन ने पढ़ने की आदत को कमज़ोर कर दिया है। लेकिन क्या केवल यही कारण हैं? या हम स्वयं भी अनजाने में ऐसी मानसिकता बना रहे हैं जिसमें पुस्तकें, लेखक और पढ़ने की प्रक्रिया कम महत्वपूर्ण दिखाई देने लगती है?
जब मैं लोगों से किताबों पर बात करता हूँ तो कई बार एक वाक्य सुनने को मिलता है—"फलाँ वक्ता तो बस अपनी किताब बेचने की फिराक में है।"
यह सुनकर मुझे आश्चर्य होता है। यदि कोई व्यक्ति तर्कपूर्ण बातें कर रहा है, हमें अपने अंतर्विरोधों से परिचित करा रहा है, हमारी सोच को चुनौती दे रहा है, या हमारे भीतर छिपी संभावनाओं को पहचानने में मदद कर रहा है, तो फिर उसकी पुस्तक बेचने में समस्या क्या है? क्या किसी लेखक को अपनी वर्षों की मेहनत का पाठक मिलना अपराध है?
हम पुस्तक को संवाद का माध्यम मानने के बजाय केवल एक उत्पाद क्यों मानने लगे हैं?
एक अच्छी पुस्तक केवल सूचना नहीं देती, वह हमारे अनुभव का विस्तार करती है। वह हमें अपने से भिन्न लोगों, संस्कृतियों, विचारों और समयों से मिलाती है। कई बार वह हमारे भीतर ऐसे प्रश्न पैदा करती है जिनका उत्तर हमें वर्षों बाद मिलता है। पुस्तक का मूल्य केवल इस बात से नहीं आँका जा सकता कि उसने पढ़ते ही हमें "वाह!" कहने पर मजबूर किया या नहीं।
आज एक और प्रवृत्ति दिखाई देती है। यदि किसी पुस्तक से तुरंत आनंद नहीं मिला, कोई बिल्कुल नया विचार नहीं मिला, या वह हमारी अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतरी, तो हम सार्वजनिक रूप से उसके बारे में नकारात्मक टिप्पणी कर देते हैं। इसमें कोई बुराई नहीं कि हम अपनी असहमति व्यक्त करें। स्वस्थ आलोचना साहित्य की आवश्यकता है। लेकिन आलोचना और निरुत्साहन में एक सूक्ष्म अंतर होता है।
हमें स्वयं से पूछना चाहिए—हम पढ़ते किसलिए हैं?
क्या केवल नया जानने के लिए?
क्या केवल मनोरंजन के लिए?
क्या केवल सौन्दर्यबोध के लिए?
या फिर स्वयं को थोड़ा और समझने के लिए?
कई बार कोई पुस्तक हमें नया कुछ नहीं बताती, बल्कि वही बात अधिक स्पष्टता, संवेदनशीलता या गहराई से समझाती है जिसे हम पहले से जानते थे। क्या यह कम उपलब्धि है? हर पुस्तक का उद्देश्य क्रांतिकारी विचार प्रस्तुत करना नहीं होता। कुछ पुस्तकें प्रश्न जगाती हैं, कुछ अनुभव बाँटती हैं, कुछ भाषा का सौन्दर्य दिखाती हैं, कुछ प्रेरित करती हैं, और कुछ केवल यह एहसास कराती हैं कि हम अपनी उलझनों में अकेले नहीं हैं।
हर पुस्तक हर पाठक के लिए नहीं होती।
जो पुस्तक किसी को साधारण लगे, वही किसी दूसरे व्यक्ति के जीवन की दिशा बदल सकती है। जिस कविता में एक व्यक्ति को कुछ न मिले, वही दूसरे के भीतर वर्षों से दबे भावों को शब्द दे सकती है। इसलिए किसी पुस्तक पर अंतिम निर्णय देने से पहले यह स्वीकार करना भी आवश्यक है कि हमारी प्रतिक्रिया एक व्यक्तिगत अनुभव है, सार्वभौमिक सत्य नहीं।
आज के समय में पुस्तकों के सामने एक और चुनौती है—प्रचार।
अक्सर कहा जाता है कि अच्छी पुस्तक को प्रचार की आवश्यकता नहीं होती। यह बात शायद उस समय सही रही होगी जब पुस्तकों के अलावा ज्ञान के बहुत कम माध्यम थे। लेकिन आज लाखों सूचनाओं के बीच यदि किसी पुस्तक की चर्चा ही न हो, तो पाठक उसके अस्तित्व से भी परिचित नहीं हो पाएगा।
प्रचार और अतिशयोक्ति में अंतर है।
यदि कोई पाठक किसी पुस्तक की अच्छाइयों की चर्चा करता है, तो वह केवल लेखक का नहीं, बल्कि पढ़ने की संस्कृति का भी समर्थन करता है। मैं स्वयं इसका अनुभव कर चुका हूँ। मेरी अपनी वेबसाइट को मित्रों का सहज समर्थन मिलने में लगभग दो वर्ष लग गए। तब मैंने सोचा—हम अपने मित्रों के अच्छे कार्यों का उल्लेख करने में इतना संकोच क्यों करते हैं? क्या हमें डर रहता है कि कहीं लोग इसे पक्षपात न समझ लें? या फिर हमने प्रशंसा को भी संदेह की दृष्टि से देखना शुरू कर दिया है?
एक समाज की बौद्धिक संस्कृति केवल लेखकों से नहीं बनती; वह पाठकों, शिक्षकों, मित्रों, पुस्तकालयों, समीक्षकों और संवादों से मिलकर बनती है।
यदि लेखक ही लगातार एक-दूसरे को छोटा सिद्ध करने में लगे रहें, तो उन लोगों की दृष्टि में लेखकों की छवि कैसी बनेगी जो पहले से ही पुस्तकों को अनावश्यक मानते हैं? स्वस्थ असहमति और कठोर अवमानना में अंतर होता है। साहित्य का विकास बहस से होता है, उपहास से नहीं।
इसका अर्थ यह नहीं कि पुस्तकों की आलोचना बंद कर दी जाए। बिल्कुल नहीं। बल्कि आलोचना और भी अधिक होनी चाहिए—पर वह ऐसी हो जो पाठक को सोचने के लिए प्रेरित करे, न कि पढ़ने से ही विमुख कर दे।
शायद पुस्तकों की समीक्षा लिखते समय कुछ बातें ध्यान रखी जा सकती हैं—
यह स्पष्ट किया जाए कि यह मेरा व्यक्तिगत पाठकीय अनुभव है।
पुस्तक किन पाठकों के लिए अधिक उपयोगी हो सकती है, इसका उल्लेख किया जाए।
केवल कमियाँ नहीं, उसकी विशेषताओं पर भी बात की जाए।
यदि पुस्तक हमारी अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतरी, तो उसके कारण बताए जाएँ।
लेखक के व्यक्तित्व और पुस्तक की समीक्षा को अलग रखा जाए।
कभी-कभी मुझे लगता है कि पुस्तकों पर एक प्रकार का "अस्वीकरण" होना चाहिए—यह पुस्तक किन पाठकों के लिए लिखी गई है, इसका संकेत दिया जाए। जैसे विज्ञान की पुस्तक और कविता की पुस्तक का उद्देश्य अलग होता है; वैसे ही आत्मकथा, दर्शन, उपन्यास, शोध और प्रेरक साहित्य की अपेक्षाएँ भी अलग-अलग होती हैं। इससे पाठक अपनी रुचि और आवश्यकता के अनुसार चयन कर सकेगा और अनावश्यक निराशा भी कम होगी।
यह बात सत्य है कि लोग एक दूसरे की पुस्तकों के सकारात्मक पहलू को पाठकों के सामने लाते हैं, क्या कोई और भी तरीका है? इससे बेहतर और क्या तरीका हो सकता है पुस्तकों के बारे मे अधिक से अधिक लोगों को बताने का? क्या इसमें कुछ गलत है? गलत तो तब है जब झूठी तारीफ की जाए, इसीलिए अब जब पुस्तक छपवाना आसान होता जा रहा है तो इस बात की जरूरत आन पड़ी है कि भूमिका से पहले एक पृष्ठ इस बात पर हो कि पुस्तक किनके लिए फायदेमंद हो सकती है और पाठकों के किस वर्ग के लिए लिखी गयी है|
अंततः प्रश्न किसी एक पुस्तक या एक लेखक का नहीं है। प्रश्न यह है कि क्या हम ऐसा वातावरण बना रहे हैं जहाँ अधिक लोग पढ़ने के लिए प्रेरित हों, या ऐसा वातावरण जहाँ लोग पुस्तक खरीदने से पहले ही संदेह से भर जाएँ।
यदि हम चाहते हैं कि आने वाली पीढ़ियाँ अधिक पढ़ें, अधिक सोचें और अधिक संवेदनशील बनें, तो हमें केवल अच्छी पुस्तकें लिखने की नहीं, बल्कि पढ़ने की संस्कृति को भी सहेजने की आवश्यकता है।
क्योंकि पुस्तकें केवल पन्नों का संग्रह नहीं होतीं; वे मनुष्य और मनुष्य के बीच चलने वाला सबसे लंबा, सबसे शांत और सबसे गहरा संवाद होती हैं। और किसी भी सभ्यता का भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि वह इस संवाद को कितना जीवित रख पाती है।
शुभकामनाएँ
लवकुश कुमार
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बरसों बाद शहर से छुट्टियाँ बिताने आया नाती शुभम अपने बूबू (दादाजी) के साथ खेतों की ओर निकल पड़ा ।
रास्ते में एक के बाद एक बंद पड़े मकानों पर ताले लटके थे। कहीं टूटी छतों पर घास उग आई थी तो कहीं आँगन में झाड़ियां अपनी मर्ज़ी से बढ़ रही थी। पूरे गाँव में ऐसा सन्नाटा था कि दूर बहते गधेरे की आवाज़ भी साफ़ सुनाई दे रही थी।
नाती ने धीरे से पूछा,
"बूबू, इतने सारे घर खाली क्यों हैं? क्या यहाँ कोई नहीं रहता?"
बूबू कुछ क्षण चुप रहे। उनकी आँखें उन बंद दरवाज़ों पर टिक गईं, जिनके पीछे कभी जीवन बसता था।
उन्होंने लंबी साँस ली और बोले,
"नाती, ये घर खाली नहीं हैं... इनमें यादें रहती हैं। यहाँ कभी हँसी रहती थी, त्योहार रहते थे, खेतों की खुशबू रहती थी। अब बस ताले रह गए हैं।"
दोनों धीरे-धीरे खेतों की ओर बढ़ने लगे। बूबू ने दूर फैले सीढ़ीनुमा खेतों की ओर इशारा करते हुए कहा,
"जब मैं तेरी उम्र का था, तब इन खेतों में मंडुवा, कौदा, झंगोरा, जौ और गेहूँ इतना होता था कि साल भर किसी चीज़ की कमी नहीं रहती थी। कटाई के दिनों में पूरा गाँव एक परिवार बन जाता था।"
नाती ने चारों ओर देखा। अधिकांश खेत झाड़ियों से ढके थे। "अब खेती क्यों नहीं होती, बूबू?"
बूबू मुस्कुराए, लेकिन वह मुस्कान भीतर के दर्द को छिपा नहीं सकी।
"खेती करने वाले ही कहाँ बचे, नाती? पहले जंगली सूअर रात में फसल का थोड़ा-बहुत नुकसान करते थे। अब बंदर, लंगूर, हिरण और दूसरे जंगली जानवर मिलकर पूरी मेहनत उजाड़ देते हैं। ऊपर से पढ़े-लिखे लड़कों को गाँव में काम नहीं मिलता। पेट की आग उन्हें शहर ले जाती है।"
कुछ दूर चलने के बाद एक कच्ची सड़क दिखाई दी।
नाती ने पूछा,
"बूबू, यह सड़क कब बनी?"
बूबू की आँखों में हल्की-सी चमक आई।
"यह सड़क सरकार ने नहीं बनाई थी बेटा... इसकी शुरुआत गाँव वालों ने की थी। हर घर से जिसने जितना बन पड़ा, उतना चंदा दिया। जिसके पास पैसे नहीं थे, उसने अपने हाथों का श्रम दिया। महीनों तक हम सबने गैंती और फावड़े से पहाड़ काटा। उस दिन लगा था कि अब हमारे बच्चे लौट आएँगे।"
"फिर लौटे क्यों नहीं?" शुभम ने पूछा
यह सुनकर बूबू कुछ देर तक चुप रहे।
फिर बोले,
"सड़क से रास्ता बनता है बेटा... ज़िंदगी नहीं। ज़िंदगी के लिए रोज़गार चाहिए, अस्पताल चाहिए, अच्छे स्कूल चाहिए और ऐसी खेती चाहिए जिसमें किसान की मेहनत बची रहे। जब तक ये सब नहीं होगा, तब तक सड़क गाँव तक तो पहुँच जाएगी, लेकिन गाँव के बच्चे वापस नहीं पहुँच पाएँगे।"
दोनों खेत की मेड़ पर बैठ गए।
सामने डूबता सूरज पहाड़ों के पीछे उतर रहा था। हवा में पहाड़ की हल्की-सी खुशबू थी लेकिन उस खुशबू में एक अनकहा दर्द भी घुला हुआ था।
नाती ने धीरे से बूबू का हाथ पकड़ लिया।
"बूबू... क्या मैं बड़ा होकर इस गाँव में रह सकता हूँ?"
बूबू ने उसके सिर पर हाथ फेरा। उनकी आँखें भीग चुकी थीं।
"रहना नाती... लेकिन मजबूरी में नहीं, अपनी मर्ज़ी से। ऐसा पहाड़ बनाना कि किसी को अपना गाँव छोड़ना ही न पड़े।"
सूरज पूरी तरह पहाड़ के पीछे छिप चुका था।
घर लौटते समय बूबू ने एक बार फिर पीछे मुड़कर गाँव को देखा। बंद घर वैसे ही खड़े थे, जैसे बरसों से किसी अपने का इंतज़ार कर रहे हों और नाती पहली बार समझ रहा था कि पलायन केवल गाँव छोड़ने का नाम नहीं बल्कि उन आँखों का दर्द है जो हर शाम लौटते कदमों की राह देखती हैं।
विशाल चन्द @reading_owl.3
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लेखक की टिप्पणी
यह कहानी मेरे द्वारा वर्ष 2021 में लिखे गए ब्लॉग लेख "उत्तराखंड में पलायन और मेरा गांव" से प्रेरित है। उस समय उठाए गये पलायन के प्रश्नों को इस कहानी के माध्यम से एक नए साहित्यिक रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है। कहानी के पात्र और घटनाएँ काल्पनिक हैं किन्तु इसके सामाजिक संदर्भ वास्तविक अनुभवों और अवलोकनों से जुड़े हैं।
विशाल चन्द जी समाजशास्त्र के शोधार्थी, पाठक और संवेदनशील शिक्षार्थी हैं। नवीन ज्ञान अर्जन और सतत सीखना आपके व्यक्तित्व का अभिन्न हिस्सा है। पुस्तकों का पठन और संग्रहण आपको विशेष प्रिय है।
आपके भीतर एक घुमक्कड़ चेतना भी सक्रिय है, जो आपको नए लोगों, स्थानों और अनुभवों से जोड़ती रहती है। बागवानी आपके लिए प्रकृति से संवाद का माध्यम है।
आप समाज को अपने स्वतंत्र दृष्टिकोण से देखने और विभिन्न समूहों के साथ मिलकर सामाजिक दायित्वों के निर्वहन को निरंतर प्रयासरत रहते हैं।
जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना आपके जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट ।
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