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बच्चों का ध्यान कक्षा में कैसे लगाया जाए?
क्या विज्ञान केवल अंकों और परीक्षाओं का विषय है?
क्या बिना महँगी प्रयोगशाला के भी विज्ञान रोचक बनाया जा सकता है?
क्या हम बच्चों को उत्तर याद करवाने के बजाय प्रश्न पूछना सिखा रहे हैं?
क्या आज की शिक्षा बच्चों को नई परिस्थितियों के लिए तैयार कर रही है?
यदि इन प्रश्नों ने कभी आपको भी परेशान किया है, तो उत्तराखंड में 12 मई से 1 जून 2026 तक चली यह विज्ञान यात्रा आपके लिए एक महत्वपूर्ण अध्ययन का विषय है।

देश के सुप्रसिद्ध भौतिक विज्ञानी, पद्मश्री सम्मानित शिक्षाविद एवं आईआईटी कानपुर के पूर्व प्रोफेसर डॉ. हरीश चंद्र वर्मा (एचसीवी सर) ने अपने वैज्ञानिक जीवन के 75 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर "साइंस इन द सर्विस ऑफ सोसाइटी" और "सोपान आश्रम" के सहयोग से उत्तराखंड के छह जिलों में 21 दिवसीय विज्ञान यात्रा का नेतृत्व किया।
इस यात्रा का नाम था—
12 मई से प्रारम्भ हुई यह यात्रा विभिन्न विद्यालयों, डीआईईटी संस्थानों और शिक्षक प्रशिक्षण केन्द्रों से होती हुई 27 मई से 1 जून तक आयोजित छह दिवसीय राष्ट्रीय आवासीय कार्यशाला (NWUPT 2026) के साथ सम्पन्न हुई।
इस दौरान—
480 से अधिक भौतिक विज्ञान शिक्षक
208 शिक्षक प्रशिक्षक
410 शिक्षक प्रशिक्षु
3000 से अधिक विद्यार्थी
प्रत्यक्ष रूप से इस अभियान से जुड़े।

आज अधिकांश शिक्षक एक समान चुनौती का सामना कर रहे हैं—
बच्चे सुनते कम हैं, प्रश्न कम पूछते हैं, विज्ञान को कठिन मानते हैं और परीक्षा के बाद अधिकांश बातें भूल जाते हैं।
दूसरी ओर समाज बच्चों से लगातार अधिक अंक, अधिक प्रतिस्पर्धा और अधिक उपलब्धियों की अपेक्षा करता है।
परन्तु एचसीवी सर का प्रश्न अलग था—
"क्या हम बच्चों को सोचने के लिए तैयार कर रहे हैं?"
यात्रा का मूल उद्देश्य बच्चों और शिक्षकों में वैज्ञानिक चेतना, स्वतंत्र सोच, अवलोकन क्षमता, तार्किक विश्लेषण और समस्या समाधान की क्षमता विकसित करना था।

इस यात्रा की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि किसी भी सत्र की शुरुआत सूत्रों या परिभाषाओं से नहीं हुई।
शुरुआत हुई—
नाम पूछने से
मुस्कुराने से
पहेली से
अवलोकन से
और छोटे-छोटे सवालों से
उदाहरण के लिए—
"धागा किस रंग का है?"
"अंधेरे में कैसा दिखाई देगा?"
"काला धागा कभी लाल दिखता है क्या?"
"हम स्कूल पढ़ने आते हैं या खेलने भी?"
ऐसे सरल प्रश्न बच्चों को चर्चा में शामिल कर लेते थे।
शिक्षकों ने अनुभव किया कि बच्चों से संवाद स्थापित करना किसी भी शिक्षण प्रक्रिया का सबसे महत्वपूर्ण चरण है।
कार्यशालाओं में बार-बार यह दिखाई दिया कि किसी भी अवधारणा को सीधे बताने के बजाय पहले एक ऐसी स्थिति बनाई जाती थी जिससे बच्चे चौंक जाएँ।
यानी—
पहले जिज्ञासा, फिर प्रयोग, फिर चर्चा और अंत में निष्कर्ष।
एचसीवी सर बार-बार कहते रहे—
"Attention create करना शिक्षक की जिम्मेदारी है।"
यही कारण था कि कई घंटे चलने वाले सत्रों में भी बच्चों और शिक्षकों का ध्यान बना रहा।

यात्रा का सबसे प्रेरक पक्ष था कि अधिकांश प्रयोग अत्यंत सामान्य वस्तुओं से किए गए—
डेटॉल की खाली बोतल
प्लास्टिक डिब्बा
रिंग चुंबक
सिरिंज
कागज
लेजर पॉइंटर
पानी का गिलास
गुब्बारा
सिक्का
इनसे अपवर्तन, वायुदाब, जड़त्व, बल, परावर्तन, मृगमरीचिका, बॉयल का नियम, ऊर्जा तथा प्रकाश जैसी अवधारणाएँ समझाई गईं।
इससे शिक्षकों को यह संदेश मिला कि विज्ञान पढ़ाने के लिए महँगी प्रयोगशालाएँ अनिवार्य नहीं हैं।
कार्यशाला में बार-बार एक बात दोहराई गई—
"नई परिस्थितियों के लिए बच्चों को तैयार करना है तो उनमें स्वतंत्र सोच विकसित करनी होगी।"
बच्चों को उत्तर देना नहीं, उत्तर खोजने की प्रक्रिया सिखाना आवश्यक है।
प्रयोग के बाद 15-20 मिनट की खुली चर्चा इसी उद्देश्य से होती थी।
कई बार एक ही प्रयोग के अलग-अलग उत्तर सामने आते थे।
यहीं से बच्चों को समझ आता था कि विज्ञान रटने की नहीं, सोचने की प्रक्रिया है।
शिक्षकों के अनुभवों से कुछ प्रमुख निष्कर्ष सामने आए—
छोटे प्रश्नों और गतिविधियों से।
उनके अनुभवों और परिवेश से।
अवलोकन, तर्क और प्रयोग के संयोजन से।
स्थानीय और बेकार पड़ी वस्तुओं के उपयोग से।
ऐसा वातावरण बनाकर जहाँ गलत उत्तर देने का भय न हो।
यह यात्रा केवल भौतिकी तक सीमित नहीं रही।
इसने समाज, पर्यावरण और जीवन मूल्यों पर भी चर्चा की।
डायट अल्मोड़ा और डायट बागेश्वर में एक बार उपयोग होने वाले प्लास्टिक पर रोक लगाने की घोषणा की गई।
सभी प्रतिभागियों ने अपने बर्तन स्वयं धोए।
यह संदेश था—
श्रम का सम्मान भी शिक्षा का हिस्सा है।
एचसीवी सर बार-बार इस बात पर जोर देते रहे कि विज्ञान का अंतिम उद्देश्य केवल तकनीक बनाना नहीं, बल्कि समाज की सेवा करना है।
उन्होंने कहा—
"धरती मेरी है, तो इसे बचाने की जिम्मेदारी भी मेरी है।"
यात्रा में पर्यावरण संरक्षण, वृक्षारोपण, हिमालय संरक्षण और सामाजिक जिम्मेदारी जैसे विषय भी समान रूप से शामिल रहे।
कार्यशालाओं के दौरान राष्ट्रीय प्रयोगात्मक परीक्षा NAEST (National Anveshika Experimental Skill Test) की भी चर्चा हुई।
यह भारत की एक अनूठी परीक्षा है—
9वीं से MSc तक सभी के लिए एक ही प्रश्नपत्र
घर पर प्रयोग
स्वयं रीडिंग लेना
मौलिक सोच पर आधारित मूल्यांकन
चयनित विद्यार्थियों को सोपान आश्रम में तीन दिन का प्रशिक्षण
50,000 रुपये तक की छात्रवृत्ति
यह परीक्षा इस विचार को मजबूत करती है कि विज्ञान का वास्तविक मूल्य प्रयोग और जिज्ञासा में है, न कि केवल अंकों में।


27 मई से 1 जून तक आयोजित National Workshop for Utsahi Physics Teachers (NWUPT 2026) इस पूरी यात्रा का शिखर बिंदु रही।
देश भर से आए चुनिंदा शिक्षकों ने छह दिनों तक प्रयोग, चर्चा, चिंतन और नवाचार के माध्यम से विज्ञान शिक्षण के नए आयामों पर कार्य किया।
सोपान आश्रम द्वारा आयोजित यह 23वीं राष्ट्रीय कार्यशाला थी।
क्योंकि इसने शिक्षकों को याद दिलाया—
विज्ञान सूत्रों से पहले सवाल है।
प्रयोगशाला भवन नहीं, सोच है।
शिक्षा का उद्देश्य केवल अंक नहीं है।
सीखना आनंददायक होना चाहिए।
बच्चों को उत्तर नहीं, खोज की प्रक्रिया देनी चाहिए।
वैज्ञानिक चेतना लोकतांत्रिक समाज की बुनियाद है।
विज्ञान उत्तर याद करने का नहीं, प्रश्न पूछने का विषय है।
जिज्ञासा सीखने का सबसे बड़ा ईंधन है।
कक्षा की शुरुआत सरल और उत्तर देने योग्य प्रश्नों से होनी चाहिए।
बच्चों का ध्यान आकर्षित करना शिक्षक की जिम्मेदारी है।
Puzzle Method विद्यार्थियों को सक्रिय बनाती है।
वैज्ञानिक चेतना अवलोकन से शुरू होती है।
हर प्रयोग के पीछे "क्यों?" सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है।
सीखने की प्रक्रिया परिणाम से अधिक महत्वपूर्ण है।
कम लागत की सामग्री भी उत्कृष्ट प्रयोगशाला बन सकती है।
विज्ञान को जीवन से जोड़ना जरूरी है।
बच्चे तब बेहतर सीखते हैं जब वे चर्चा का हिस्सा बनते हैं।
स्वतंत्र सोच भविष्य की सबसे महत्वपूर्ण क्षमता है।
प्रयोग डर को कम करते हैं और आत्मविश्वास बढ़ाते हैं।
प्रश्न पूछने वाला वातावरण रचनात्मकता को जन्म देता है।
विज्ञान का उद्देश्य केवल परीक्षा नहीं, जीवन को समझना है।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण सामाजिक समस्याओं को समझने में भी मदद करता है।
पर्यावरण संरक्षण भी वैज्ञानिक चेतना का हिस्सा है।
शिक्षक स्वयं सीखना बंद कर दे तो कक्षा भी ठहर जाती है।
समान परिस्थितियों में भी परिणामों की जांच आवश्यक है।
सीखना आनंददायक होना चाहिए।
बच्चों को उत्तर देने से अधिक महत्वपूर्ण है उन्हें उत्तर खोजने की प्रक्रिया सिखाना।
"विज्ञान केवल सिद्धांत नहीं है। प्रयोगों के माध्यम से किसी विचार को परखना ही वास्तविक विज्ञान है।"
"जब मन किसी प्रश्न पर अटक जाता है, तब वास्तविक सीख शुरू होती है।"
"Puzzle Method बच्चों को केवल सुनने वाला नहीं, सोचने वाला बनाती है।"
"भौतिकी को संगीत से जोड़कर देखने का नया दृष्टिकोण मिला।"
कल्पना कीजिए—
कक्षा 9 से लेकर MSc तक के विद्यार्थियों के लिए एक ही प्रश्नपत्र।
घर पर प्रयोग करने की स्वतंत्रता।
स्वयं उपकरण बनाना।
स्वयं रीडिंग लेना।
कोई कोचिंग नहीं।
कोई रटंत नहीं।
यही है National Anveshika Experimental Skill Test (NAEST)।
इस अनूठी परीक्षा का उद्देश्य प्रतिभा नहीं, जिज्ञासा को पहचानना है। चयनित विद्यार्थियों को सोपान आश्रम, कानपुर में पद्मश्री प्रो. एच.सी. वर्मा के सानिध्य में कार्य करने का अवसर भी मिलता है।
इस यात्रा की एक बड़ी उपलब्धि यह रही कि विज्ञान की चर्चा केवल प्रयोगशाला तक सीमित नहीं रही।
प्लास्टिक और डिस्पोज़ल के प्रयोग पर रोक
सभी प्रतिभागियों द्वारा स्वयं अपने बर्तन धोना
श्रम के सम्मान का संदेश
VIP संस्कृति को चुनौती
पर्यावरण संरक्षण की प्रतिज्ञा
यह बताता है कि वैज्ञानिक चेतना केवल भौतिकी नहीं, बल्कि जीवन जीने का तरीका भी है।
उत्तराखंड विज्ञान यात्रा 2026 समाप्त हो चुकी है, लेकिन इसके द्वारा उठाए गए प्रश्न अभी भी हमारे सामने हैं—
क्या हमारी कक्षाएँ बच्चों को सोचने के लिए प्रेरित कर रही हैं?
क्या हम विज्ञान को जीवन से जोड़ पा रहे हैं?
क्या हम बच्चों में स्वतंत्र सोच विकसित कर रहे हैं?
यदि इन प्रश्नों के उत्तर खोजने की प्रक्रिया शुरू हो गई है, तो यह यात्रा अपने उद्देश्य में सफल कही जाएगी।
क्योंकि अंततः—
"विज्ञान का सबसे बड़ा प्रयोग मानव मस्तिष्क है, और शिक्षा का सबसे बड़ा लक्ष्य उसे स्वतंत्र रूप से सोचने योग्य बनाना है।"
उत्तराखंड विज्ञान यात्रा 2026 केवल कार्यशालाओं की श्रृंखला नहीं थी।
यह एक विचार था।
एक निमंत्रण था।
एक आग्रह था कि हम अपने विद्यालयों में ऐसी कक्षाएँ बनाएं जहाँ बच्चे केवल पढ़ें नहीं, सोचें; केवल सुनें नहीं, प्रश्न पूछें; केवल अंक न जुटाएँ, बल्कि जीवन को समझें।
यदि इस यात्रा से निकला सबसे महत्वपूर्ण संदेश एक वाक्य में कहा जाए, तो शायद वह यह होगा—
"बच्चों को उत्तर देने से अधिक महत्वपूर्ण है उन्हें प्रश्न पूछना सिखाना।"
और संभवतः यही वैज्ञानिक चेतना की पहली सीढ़ी है।
बीते रविवार (24-05-2026) हम सबके सामूहिक प्रयास और वरिष्ठजनों के प्रोत्साहन से बारहवीं साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा का ऑनलाइन आयोजन सफल रहा, जिसमें निम्नलिखित पुस्तकों/रचनाओं/विषयों पर सार्थक चर्चा हुयी:
अकार - पत्रिका (दिलरस प्रियंवद द्वारा संपादित)
चीफ़ की दावत – भीष्म साहनी
The Trial Week – a wellness Programme
12 Week Fitness Project –
The autobiography of Paramhansh Yoganand




उक्त परिचर्चा में निम्नलिखित पुस्तकसाथी शामिल रहे:
आदरणीय महेश पुनेठा सर, हर्षा भण्डारी मैम, गुंजन त्यागी मैम, सौम्या मैम, अरविंद कुमार, रंजीत ठाकुर, प्रिया शर्मा, अनुपम जायसवाल, प्रीति जायसवाल, गायत्री जायसवाल, अंकित जायसवाल, रंजीत कुमार, प्रिया कश्यप,विशाल जायसवाल, c सिंह और लवकुश कुमार|
पुस्तक परिचर्चा मे शामिल सभी पुस्तक साथियों (Bookmates) ने पुस्तक परिचर्चा मे शामिल होकर/अभिव्यक्ति/सराहना/भागीदारी के माध्यम से इस पहल को पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा देने में, मानवीय मूल्यों के पोषण में, अपनी बात को बेहिचक रखने में महत्वपूर्ण माना एवं एक दूसरे के प्रति आभार व्यक्त किया ताकि इस जरूरी कार्य की नियमितता बनी रहे एवं समाज मे एक सकारात्मक बदलाव में अपना विनम्र योगदान सुनिश्चित किया जा सके |
धन्यवाद ज्ञापन के साथ परिचर्चा को अगली परिचर्चा तक के लिए विराम दिया गया|
इस आशा के साथ कि यह रिपोर्ट पाठकों को पुस्तक परिचर्चा को समझने और उसमे शामिल होने के लिए प्रेरित करेगी |
अगली परिचर्चा 06 जून (शनिवार रात 08:30 बजे) को होगी, शामिल होकर पढ़ने-लिखने की संस्कृति पर काम करने में अपना योगदान सुनिश्चित करें और पुस्तक परिचर्चा से साहित्यिक लाभ लेते हुये अपने दिन की सार्थकता में एक और आयाम जोड़ें|
धन्यवाद
-लवकुश कुमार

क्या आप चाहते/चाहती हैं
ऐसा समाज जिसमे
लोग अपना काम बहुत अच्छे से कर रहे हों
लोग अपने काम से काम रखते हों और एक दूसरे को
परेशान न करते हों
सड़कों पर लोग नियम से चल रहे हों, दुर्घटनाएँ कम से
कम हों
सभी अपना काम ईमानदारी से कर रहे हों
लोग अपने वादों पर खरे उतरते हों
लोग किसी को उसकी जाति, समुदाय, वंश, शारीरिक
सुंदरता से न पहचान उसे उसके काम से पहचानते हों
अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करने का अवसर सबको मिलता
हो
लोग नयी जगह भी सुरक्षित महसूस करते हों
लोग एक दूसरे से सलीके से और प्रेम के साथ पेश आयें
लोग अपने अधिकार के साथ अपने कर्तव्यों को भी समझें
लोग अपनी स्वतन्त्रता का दुरुपयोग न करें
लोग कमजोर पर हसने के बजाय उनके साथ करुणा का
बर्ताव करें
तकलीफ मे फंसे इंसान को यथासंभव मदद मिले नाकि
लोग खड़े होकर बस वीडियो बनाएँ
काम करने वाले को काम का श्रेय दें नकि चापलूसी करने
वाले और बातें बनाने वालों को
सबको उनके हिस्से का श्रेय और प्रतिष्ठा मिले
हिंसा का स्थान न हो, लोगों को आजादी हो "न" कहने की
स्वतन्त्रता हो जबरदस्ती नहीं, सबसे उनका पक्ष या
अनुभव सुना जाए
साझा हितों के कार्यक्रमों मे सभी साझेदारों से उनकी राय
जानी जाये और उसे उचित स्थान भी दिया जाए
शिक्षकों का उचित सम्मान हो
लोग एक दूसरे का आंकलन सतही बातों पर न करें
अपराध कम से कम हों
मजबूत द्वारा कमजोर का शोषण न हो
भेदभाव न हो, परिवारवाद न हो
ज्यादा से ज्यादा लोगों में अपनी गलती स्वीकार करने का
और ज़िम्मेदारी लेने का साहस हो
वगैरह वगैरह......

बहुत तकलीफ होती है ये देखकर जब प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले अभ्यर्थियों को सुनता हूँ, ये कहते हुए कि अभी तो नौकरी की तैयारी कर रहे, अभी तो बिज़नेस को खड़ा करना है, साहित्य कहाँ!
कुछ तो इस अति प्रतियोगी समय की बात है और कुछ तो ओढ़ी हुयी बेचारगी, बेचारगी इसलिए कहना चाहता हूँ कि खुद को जानना और खुद की असली जरूरतों को समझना, हमारे जीवन का उद्देश्य होना चाहिए और साहित्य इसमें मदद करता है इसीलिए साहित्य तो जीवन का अभिन्न अंग होना चाहिए, उसके लिए नौकरी पाने या बहुत ज्यादा पैसा इकठ्ठा कर लेने का इंतज़ार क्यों!
हम अक्सर लोगों को कहते हुये सुनते हैं कि अमुक इंसान बहुत ही छोटी या संकीर्ण सोच का इंसान है, लेकिन क्या हमने कभी सोचा है कि और लोग भी हमारे बारे में ऐसी ही बाते हैं करते होंगे, कारण? एक दूसरे को न समझ पाना, कितना अच्छा हो कि हमारे आस पास देश दुनिया से, चहुं ओर का साहित्य मौजूद हो फिर जरूरत कम हो जाएगी किसी को संकीर्ण सोच वाला इंसान कहने की|

जब मायूसी में खुद को मोटीवेट करने के अन्य सतही उपायों में, अन्दर की तकलीफ ढकने के लिए मनोरंजन में समय लगाया जा सकता है तो फिर बेहतरीन साहित्य के अध्ययन में क्यों नहीं, जिससे एक दिशा और क्लैरिटी मिलेगी जो बार-बार मोटिवेशन की जरूरत को भी खत्म कर देगी|
ये साहित्य भी आपके लिए ही है, आपकी जरूरतों और दुविधाओं को ध्यान में रखकर, आपके आवेगों और भावनाओं को संबोधित करते हुये लिखा गया साहित्य|
किसी ने यदि अपना समय और जीवन देकर लिखा हो तो क्या आप इसे कोई व्यापार समझते हैं, क्योंकि कुछ लोगों का पूर्वाग्रह रहता है कि पुस्तकें भी एक वाणिज्य का हिस्सा हैं, इस पर मै एक ही बात कहना चाहता हूँ कि पुस्तकें यदि आपकी दुविधा को कम कर सकें, आपके जीवन को सार्थक दिशा दे सकें या फिर लेखकों के अनुभव और अभिव्यक्ति आपको सुकून दे सकें या मन को शांति दे सकें, समाज में सौहार्द बढ़े और लोगों मे संवेदनशीलता (ताकि वह एक दूसरे की तकलीफ समझ उनके साथ खड़े हो पाएँ) और करुणा बढ़े तो हमे ऐसी किताबों को खुद भी पढ़नी चाहिए और अन्य लोगों को भी पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए|
हर तरफ हर जगह बेशुमार आदमी, फिर भी तन्हाइयों का शिकार आदमी- निदा फ़ाजली आखिर ऐसा क्यों? जवाब साहित्य मे मिलेगा कि हम क्यों नहीं सहज हो पाते लोगों से जुडने में!

पुस्तकें निचोड़ होती हैं जीवन के अनुभवों का और प्रेम का प्रतीक होती हैं, उनके प्रेम का प्रतीक जिन्होने अपने जीवन के अहम पल में आपके लिए लेखन किया और फिर हमें उपलब्ध कराया|
बेचारगी वाली बात पर वापस आते हैं - ऐसी ही बेचारगी कुछ ऐसे लोगों ने भी ओढ़ रखी है जो एक नौकरी में पहले से हैं और दूसरी की तैयारी कर रहें, उनसे भी यही कहना है कि जिस तरह हम तैयारी के साथ सोना और आराम नहीं छोड़ देते और न ही छोड़ पाते हैं सोशल मीडिया और दोस्तों के साथ गपशप या मन बहलाने के अन्य शौक तो फिर क्यों हम दिन का आधा या एक घंटा साहित्य को नहीं दे सकते!, क्या केवल हर वक़्त प्रतियोगी परीक्षा के लिए पढ़ते रहने से हमारे सफल होने की संभावना 100% हो जाएगी, नहीं, फिर क्यों जीवन और दिनचर्या के संतुलन को बिगाड़ना? क्या ऐसा करना समझदारी है!
मैंने ऐसे काफी लोगों को देखा है जो सब कुछ छोड़कर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं और फिर चयन न होने पर जीवन से हताश हो जाते हैं उसका कारण साफ है क्योंकि उन्होने जीवन के केंद्र में ही उस परीक्षा को ही रख लिया, जबकि करने के लिए और भी बहुत कुछ है जीवन में, साहित्य अध्ययन से स्वयं की समझ को विस्तार देना भी उनमे से एक काम है, जो न केवल आपको समझ देता है बल्कि निर्णय लेने और विकट परिस्थितियों का सामना करने के लिए मानसिक रूप से तैयार करता है| और साथ ही मदद करते हैं लोगों के साथ तालमेल बैठाकर चलने में क्योंकि जीवन मे यह भी तो सीखना ही है तो इसे भी उचित महत्व दें, जब जीवन में और भी प्राथमिकताएँ होगी तो परीक्षा मे असफलता आपको तोड़ेगी नहीं, जीवन से निराश नहीं करेगी|

एक सवाल अक्सर आता है मन में कि बड़े-बड़े पढ़े-लिखे लोग भी क्यों भ्रष्टाचार मे संलिप्त पाये जाते हैं, क्यों उनमे भी साहस की कमी मिलती है अन्याय के खिलाफ लड़ने को? उसका जवाब यही है कि वो उत्कृष्ट साहित्य से दूर रहे और कभी जान ही न पाये स्वयं को! वो बस अपने आपको एक शरीर मानकर रह गए, काश! उन्होने महान लोगों को पढ़ा होता है और जान पाते कि कैसे महान आत्माओं ने सत्य और न्याय को व्यक्तिगत हित-अहित और मोह से ऊपर रखकर जीवन मे डटकर संघर्ष किया और केवल अपने परिवार तक सीमित न रहकर, जन सामान्य को भी अपना अंश मानकर कभी अन्याय और भेदभाव के रास्ते नहीं चले|

बहुत बार नासमझी में हम ऐसी प्राथमिकताएँ निर्धारित कर लेते हैं खुद के लिए (अमूमन समाज की देखा देखी में) कि हमेशा दबाव में रहते हैं और लोगों से प्रेमवत पेश नहीं आ पाते, साहित्य ऐसी अवस्था में आपको वह दृष्टि दे सकता है, जिससे आप समझ सको कि क्या है जो आपके जीवन मे वाकई जरूरी है और क्या है जो बिलकुल गैर जरूरी है और इस तरह आप समाज के दबाव मे आकर "सामाजिक गुलामी" करने से बच जाते हो|
कभी कभी हम दूसरों को समझ नहीं पाते और दूसरे हमे नहीं समझ पाते, कभी कभी ऐसा भी होता है कि हम देखते हैं कि कोई एक फर्जी इंसान पर भरोसा कर लेता है बल्कि एक सच्चे इंसान से दूर भागता है| क्या है ये सब ?- ये है समझ का अभाव और है दूसरों को समझ पाने या खुद को अभिव्यक्त कर पाने की कुशलता न हो होना|

साहित्य अध्ययन इसमे भी आपकी मदद कर सकता है क्योंकि कभी-कभी खुद को अभिव्यक्त करने का पूरा समय नहीं मिल पाता हमें, उस स्थिति में यदि सामने वाला साहित्य अध्ययन करने वाला इंसान हुआ तो संभावना है कि उसकी समझ इतनी विस्तृत होगी कि इशारे में ही आपकी बात समझ जाए, जैसे एक डॉक्टर अमूमन लक्षणों से हमारी दिक्कत समझ जाता है|




हर गाँव या मोहल्ले में एक सामुदायिक पुस्तकालय हो।
उपहार के रूप में लोग पुस्तकें भेंट करें।
शैक्षणिक संस्थाओं में पुरस्कार के रूप में अनिवार्य रूप से पुस्तकें दी जाय।


साहित्य हमे एक दूसरे को समझने में मदद करता है, और इस तरह से एक दूसरे से जुड़ने में भी और जब हम खुद को समाज से जुड़ा हुआ पाते हैं, तो हमारे अंदर प्रेम का भाव आता है जो हमसे एक से एक बेहतर काम करवा लेता है और हमारे लिए आनंद की अवस्था में रहना आसान होता है, इसीलिए साहित्य अध्ययन हमारी समझ को बेहतर करके हमारे मन को भी बेहतर कर सकता है|

बताये देता हूँ :-


इसीलिए अंत में इस बात पर अपनी बात खत्म करता हूँ कि यदि सामाज की बेहतरी के लिए कुछ बदलाव करने की चाहत है आपमें, तो बिना किस बड़े पद या खूब पैसे कमाकर लोगों का भला सोंचने से पहले अभी से अपनी दैनिक दिनचर्या में साहित्य अध्ययन को स्थान दें और अन्य लोगों को भी अपने कर्मों द्वारा प्रेरित करें|
याद रखिए, किसी पीड़ित की मदद से बड़ा और जरूरी काम है, उस इंसान का हृदय परिवर्तन जो लोगों को पीड़ा देने मे खुशी पाता है|
उससे भी पहले उस मानसिकता पर वार जो इंसान को उत्पीड़क और क्रूर बनाती है|

किसी गरीब की मदद से भी महत्वपूर्ण काम ये है कि उसे अपनी गरीबी मिटाने के अवसर मिलें, उसे उसकी मेहनत और जरूरत भर की आमदनी मिले, और ये तब ही संभव है जब लोगों में खुद के उन्नयन के लिए दूसरों को लूटने और एक्सप्लोइट करने की मानसिकता न हो|
एक उत्पीड़क केवल दूसरों का उत्पीड़न ही नहीं करता वह दूसरों के चेहरे की हंसी और जीवन की शांति छीनकर अपने आस पास के माहौल को भी दुख और तड़प से भर देता है!
हमारी पाश्विक प्रवृत्ति, असंवेदनशीलता और अधिक से अधिक भोगने की हवश और लोगों पर राज करने की असीमित भूख!
कौन मिलाएगे हमें अपने से पाशविक रूप से, कौन जगाएगा हमारे अंदर संवेदना?
जवाब है, "उत्कृष्ट साहित्य- दिल को छूती कहानियाँ, उपन्यास, तकलीफ और तड़प को अभिव्यक्त करती कविताएँ, सच्चाई उजागर करते संस्मरण और बहुत कुछ"
तो क्या आप संकल्प ले रहे/रहीं कि आज से तमाम व्यस्तताओं के बीच साहित्य को वक़्त देना सुनिश्चित करेंगे/करेंगी, अगर नहीं कर सकते/सकतीं तो फिर समाज में बदलाव कि बात करना या लोगों पर दोष मढ़ते रहने की आपकी टेंडेसी केवल खुद को धोखा देने और मन बहलाने वाली बात भर है, उसमें कोई सच्चाई नहीं |
यदि असहमत हैं तो लिख भेजें, ईमेल नीचे है -
कुछ नहीं तो एक पत्रिका से ही शुरुआत कर लें, भले ही कुछ खर्चें प्रबंधित करने हों|
शुभेच्छा
'कुमार' लवकुश कुमार
आदरणीय महेश चन्द्र पुनेठा सर का आभार ज़ो समय-समय उपाय सुझाते रहते हैं, समाज में पढ़ने लिखने की संस्कृति को आगे बढ़ाने के लिए ताकि हम एक संवेदनशील और साहसी समाज का निर्माण कर सकें|
आपके द्वारा शुरू किया गया "दीवार पत्रिका - एक अभियान " इस दिशा में एक सशक्त कदम है| आपकी पुस्तक "शिक्षा के सवाल, लोकोदय प्रकाशन लखनऊ" न केवल आपके शैक्षिक अनुभवों का संकलन हैं वरन उन दिक्कतों को अभिव्यक्त करता दस्तावेज़ भी है जो शिक्षा को उसके असली उद्देश्य को पाने यथा बच्चों में सृजनशीलता, रचनात्मकता, स्वतंत्र सोच, स्पष्टता और साहस जगाने/निखारने को पामे में बाधा बन रही हैं|
आपका कविता संग्रह "अब पहुंची हो तुम - समय साक्ष्य प्रकाशन, देहरादून" एक संकलन है ऐसी कविताओं का जो न केवल हमे संवेदित करती हैं बल्कि स्पष्टता और साहस भी देती हैं|
आपके द्वारा संपादित, "शैक्षिक दखल" एक बेहतरीन और जरूरी प्रयास है शिक्षा के समग्र पहलूओं को समझने का और उसके अंतिम उद्देश्य को पाने के लिए जरूरी उपाय करने हेतु माहौल तैयार करने का|
"समाज के सवाल शिक्षा के सवालों से भिन्न नहीं हैं|"- महेश चन्द्र पुनेठा

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शुभकामनाएं
बीते शनिवार (23 मई 2026) को सुंदर उत्तराखंड के सुंदर अल्मोड़ा जिले के द्वाराहाट ब्लॉक में स्थित पीएम श्री राजकीय बालिका इंटर कॉलेज में आयोजित विज्ञान यात्रा- प्रयोग यात्रा सरिता – प्रयास 2026 के अंतर्गत एक कार्यशाला का आयोजन किया गया, यह कार्यक्रम साइन्स इन द सर्विस ऑफ सोसाइटी और सोपान आश्रम कानपुर की संयुक्त पहल से आयोजित 21 दिवसीय उत्तराखंड विज्ञान यात्रा के अंतर्गत सम्पन्न हुआ, जिसमें मुझे एक एक विज्ञान प्रेमी के तौर पर शामिल होने का अवसर मिला|
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि पदम्श्री अवकाश प्राप्त सम्मानित प्रो० डॉ हरीश चन्द्र वर्मा (आईआईटी कानपुर) और साथ में साइन्स इन सर्विस ऑफ सोसाइटी के कुमाऊं संयोजक भवानी शंकर कांडपाल सर रहे, कार्यक्रम की अध्यक्षता विद्यालय की प्रधानाचार्य, आदरणीय सोनिका नेगी मैम ने की|
साथ ही सहयोगी , हेमंत उपाध्याय , सोपान आश्रम कानपुर के अनुभव अवस्थी, साइंस इन द सर्विस ऑफ सोसाइटी के कार्यकर्ता विनोद कुमार जोशी ,सामाजिक कार्यकर्ता और पर्यावरणविद त्रिभुवन जोशी तथा केंद्रीय विद्यलाय हल्द्वानी से मोहित शर्मा सर पूरी यात्रा में साथ रहे| इस यात्रा का अंत देहारादून में उत्साही फ़िज़िक्स teachers की workshop के साथ होगा, वैबसाइट से कुछ पुरानी छवियाँ - National Workshop of Utsahi Physics Teachers (NWUPT)

कार्यक्रम की शुरुआत अतिथियों के स्वागत और सम्मान के साथ, संगीत शिक्षिका सुरभि पंत मैम और उनकी कुशल छात्राओं द्वारा प्रस्तुत संगीतमय वंदना द्वारा हुयी|
जीवंत और कुशल मंच संचालन, एल टी, गणित शिक्षिका भावना जोशी मैम ने किया जिसमें एल. टी विज्ञान की शिक्षिका रेनु तिवारी मैम एवं प्रवक्ता भौतिकी किरन बिष्ट मैम का विशेष योगदान रहा|
विद्यार्थियों को एक यादगार प्रयोगिक और वैज्ञानिक एक्सपोजर मिला साथ ही कार्यशाला बच्चों और शिक्षकों सबके लिए मन बांधने वाली और यादगार रही|


मै अगर अपनी बात करूँ तो सबसे पहले आभार विद्यालय प्रबंधन का, इतनी बेहतर व्यवस्था और आयोजन के लिए, सभी समर्पित और संबन्धित शैक्षिक और गैर-शैक्षिक स्टाफ का आभार क्योंकि "ऐसे आयोजन में सबका अपना योगदान" होता है|
आभारी हूँ साइन्स इन द सर्विस ऑफ सोसाइटी उत्तराखंड (विशेष आभार आदरणीय भवानी शंकर कांडपाल सर का जो कुमाऊँ समन्वयक हैं ) और सोपान आश्रम कानपुर का जिनकी संयुक्त पहल के अंतर्गत यह कार्यशाला हुयी, जिसमें न केवल HC वर्मा सर और उनकी टीम से मिलने का मौका मिला वरन वैज्ञानिक चेतना का माहौल कैसे बने, विद्यार्थियों और शिक्षकों में स्वतंत्र सोच कैसे विकसित हो और कैसे बच्चों को विज्ञान और विषयवस्तु से जोड़ा जा सके, इसके गुर सीखने का भी अवसर मिला|
मैंने सीखा कि कैसे कोई भी अध्याय या बात शुरू करने से पहले कैसे विद्यार्थियों/पाठकों के साथ कम्युनिकेशन स्थापित किया जाये ताकि आगे वह हमारी बात को और अच्छे से सुन/पढ़ सकें- यह सीख न केवल विद्यार्थियों/युवाओं को कुछ समझाने में मददगार होगी वरन पुस्तक लेखन में भी लाइटर नोट से बात शुरू करने का तरीका पाठकों का मन बांधने में उपयोगी होगा|
मैंने देखा कि कैसे वर्मा सर और उनकी टीम द्वारा विद्यार्थियों से छोटे-छोटे आसान सवाल (अवलोकन पर आधारित जैसे की धागा किस रंग का है, लाल धागा अंधेरे मे किस रंग का दिखेगा इत्यादि) करके न केवल उनका हौसला बढ़ाया बल्कि उन्हे विषय वस्तु से जोड़ लिया और भवानी सर द्वारा बच्चों के नाम पूछकर, उनके नाम को भी उस चर्चा का हिस्सा बना लेना ये साबित करता है कि शिक्षक यदि हाजिरजवाब है तो बच्चों के साथ संवाद स्थापित करना और उन्हे इन्वाल्व करना कितना आसान हो जाता है जैसे कांडपाल सर ने एक प्रयोग के दौरान एक बिटिया से उसका नाम पूछा, जवाब आया, “हितैषी” तुरंत कांडपाल सर कहते हैं कि अरे वाह देखो हरीश सर भी हमारे कितने हितैषी हैं जो आज हमारे बीच आए हैं |
अपने सवालों द्वारा (puzzle method द्वारा attention ensure करना) वर्मा सर और उनकी टीम ने सभी श्रोताओं को कार्यशाल से जोड़े रखा|
कई बार ऐसा होता है कि हम कहीं बैठे होते हैं और मन कहीं होता है, यह हमारे और विद्यार्थियों सबके साथ होता है, सोचिए कि यदि ऐसा हो कि हम हर काम को इन्वाल्व होकर करना अपनी आदत मे लाएँ तो न केवल हमारी मन स्थिति बेहतर होगी साथ ही बच्चे हम से सीखकर यही आदत ला पाएंगे और फिर रिवीजन क्लास लेने की जरूरत, या बार बार समझाने की जरूरत न पड़ेगी|
इस तरह की कार्यशाला में टाइम कब बीत जाता है पता ही नहीं चलता, इस तरह का इन्वाल्व्मेंत न केवल हमे और बच्चों को बेहतर अवलोकन मे मदद करता है बल्कि वर्तमान मे भी रखता है| यदि इस तरह का इनवल्वमेंट हम अपने हर काम मे सुनिश्चित कर सकें तो ये मन पास्ट और फ्युचर के चक्र से बाहर निकम हमे वर्तमान मे जीने मे मदद कर पाएगा और हमे चीजों को ढंग से अवलोकित कर पाएंगे|
सबसे महत्वपूर्ण कि कभी कभी ऐसा होता है कि विद्यालय मे लैब बनाने के साधन बहुत सीमित और कभी कभी न के बराबर होते हैं, उस अवस्था में भी कैसे बहुत आधारभूत और आसानी से मिलने वाले सामान से कुछ ऐसे प्रयोग किए जा सकते हैं जो बच्चों मे वैज्ञानिक चेतना जागा सकें, जैसे इस कार्यशाला में, "सामान्य लेजर पोइंटर, समतल दर्पण, पानी की बोतल, काँच का गिलास, सिक्का, रिंग चुंबक, इंजेक्शन वाली सिरिन्ज आदि" चीजों से बच्चों को प्रयोग कराये आगे, माने जैसा बजट हो वैसी व्यवस्था की जा सकती है|
ऐसी ही सामग्री के साथ प्रयोग के लिए आदरणीय वर्मा सर की वैबसाइट का अवलोकन किया जा सकता है, संदर्भ के लिए कुछ लिंक दिये जा रहे हैं:
https://www.shiksha-sopan.org/
Common Misconceptions of Physics PGTs in topics based on quantum Physics
Learning Physics through Simple experiments
Developing equations of light path in Mirage-like situations
डा0 एच0 सी0 वर्मा जी जो एक milestone और icon है उनके द्वारा जो आसानी से उपलब्ध और कम लागत वाली सामग्री से प्रयोग कराए गए, सही मायने में “ उन्होंने बताया कि केवल सिद्धांत पढ़ लेना विज्ञान नहीं है, बल्कि उसे प्रयोग द्वारा परखना ही वास्तविक विज्ञान है। तर्क हमें सोचने की दिशा देता है और प्रयोग उस तर्क की सत्यता सिद्ध करता है।”
-प्रकाश चन्द्र जोशी सर, सहायक अध्यापक विज्ञान, राजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय ईरा चौधार द्वाराहाट अल्मोड़ा
कार्यशाला ने हमें यह महसूस कराया कि किस प्रकार सरल प्रयोग, उनसे जुड़े प्रश्नों की श्रृंखला और विचारपूर्ण चर्चाएँ एक बेहतर शिक्षण वातावरण का निर्माण करती हैं तथा रचनात्मक सोच को बढ़ावा देती हैं।
जब हम प्रयोगों का अवलोकन कर रहे थे, तब हम यह समझने का प्रयास कर रहे थे कि ऐसा क्यों हो रहा है। कार्यशाला से मिली एक महत्वपूर्ण सीख यह रही कि सबसे अधिक सीख तब होती है जब हमारा मन किसी प्रश्न पर अटक जाता है। उसके बाद मन स्वयं उत्तर खोजने के लिए सक्रिय हो जाता है, और इस प्रकार प्राप्त ज्ञान लंबे समय तक स्मरण रहता है।
इसके अतिरिक्त, कार्यशाला में हमने यह भी अनुभव किया कि सीखने की "प्रक्रिया" अंतिम परिणाम से अधिक महत्वपूर्ण होती है। जीवन में भी मंज़िल से अधिक महत्वपूर्ण उसकी यात्रा होती है।
-मदन मोहन सुंदरियाल सर, प्रवक्ता भौतिक विज्ञान रा इ का बिन्ताएवं विज्ञान समन्वयक ब्लॉक द्वाराहाट
सबसे अच्छी बात जो मुझे सीखने को मिली वो यह है कि अपने विषय को पढ़ाने के तरीके को Puzzle Method द्वारा बनायें, जिससे ज्यादा से ज्यादा बच्चे उसमें involve हों और actively participate कर अपने ideas दें।
ये भी सीखा कि हमारे आस-पास हर वस्तु और घटना के पीछे विज्ञान है, इसलिए वो नज़रिया विकसित करना होगा, जिससे हम उन घटनाओं को विज्ञान के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत कर, बच्चों में विज्ञान के प्रति सहजता उत्पन्न कर सकें।
- प्रीति राणा मैम, LT GIC Asgoli, Almora
कुछ बातें जो इस कार्यशाला में अवलोकन मे आयीं सीधे उनको उद्धृत करता हूँ:
विद्यार्थियों से संवाद स्थापित करने का तरीका, कुछ वाक्य जिन्होने ने केवल बच्चों के मन को बांध लिया बल्कि उपस्थित शिक्षकों और अन्य लोगों के चेहरे पर मुस्कान और बीच बीच में हंसी लाकर माहौल को जीवंत बनाये रखा: -
अलंकृत और गैर अलंकृत शिक्षक और प्यारे बच्चों, सबको मेरा.... मेरा क्या ? सबको मेरा नमस्कार - HCV सर
अच्छा आपका नाम हितैषी है, देखो वर्मा सर भी हमारे हितैषी हैं जो आज हमारे बीच आए हैं - भवानी शंकर कांडपाल सर
भवानी सर ने इस बात से शुरुआत की कि गणित कैसा लगता है आप सबको?
ऐसे वर्मा सर ने बच्चों से पूछा कि सबसे खराब विषय कौन सा लगता है आपको?
अवलोकन करना सिखाया:
धागा किस रंग का है?
अच्छा लाल है
क्या अंधेरे में भी लाल ही रहेगा?
अच्छा अंधेरे में काला दिखेगा
लेकिन काला धागा क्या कभी लाल दिखता है!
और क्या है यहाँ आइए देखते हैं?
अच्छा, ये मैगनेट है, इसके बीच में छेंद क्यों
ये क्या है ? मिरर, अरे वाह पीछे से ही पहचान लिया
अच्छा शीशे में अपना चेहरा देख पा रहे ?
शीशे में कहाँ हो ? खंभे के अंदर (शीशे को खंभे से सटाकर रखते हुये)
हम स्कूल क्यों आते हैं ? पढ़ने
तो आज हम खेलेंगे
कौन कौन डॉ बनना चाहता है
ये सिरिन्ज इसीलिए नहीं चल रही है क्योंकि ये कह रही की कांडपाल सर ने जो इसके छेंद पर अंगूठा रख रखा है तो अब यह नहीं चलेगी
अच्छा किसने कहा की इसके कान खराब हैं, चलो इसे ही बुलाओ आँख और कान के समन्वय वाले प्रयोग के लिए
कुछ बातें जो सीधे शिक्षकों से कही गयीं-
HCV सर की कुछ कविताओं का संग्रह - https://hcverma.in/Poems
एक शिक्षक के सवाल पर कि यदि कोई विद्यार्थी पूछे कि अमुक कान्सैप्ट का जीवन में क्या इस्तेमाल? प्रस्तुत HCV सर का जवाब:
इस पर वर्मा सर ने बताया कि, “सब कुछ brain driven है और यह शिक्षा हमारे दिमाग़ को विकसित करने का एक साधन है , हम जो कुछ भी विषय आज पढ़ रहे’ हैं वह सीधे तौर पर भले ही हमारे पेशे में काम न आए लेकिन उस विषय को समझते हुये जो तार्किक क्षमता विकसित होती है हमारे भीतर, वह क्षमता ही आगे चलकर हमे चीजों को समझने, समझाने, सृजन करने और निर्णय लेने में मदद करती है| यह तार्किक क्षमता हमे नयी नयी परिस्थितियों से निपटने में मदद करती है|”
कार्यशाला का हिस्सा शिक्षकों के प्रश्नोत्तर का भी रहा|
कार्यशाला का प्रभाव ऐसा रहा कि संगीत शिक्षिका सुरभि पंत मैम ने भी कहा कि वाकई भौतिकी को हम जीवन के कई क्षेत्रों से जोड़ सकते हैं जैसे कि संगीत में, कंपन्न, आवृति और अनुनाद से|
कार्यशाला से जुड़े कुछ विडियो नीचे दिये गए लिंक से देखे जा सकते हैं
| पीएमश्री रा०क०इं०का० द्वाराहाट की छात्राओं द्वारा मन को सुकून देने लेने वाला गायन| | https://www.youtube.com/watch?v=XOrKWeNIMIA |
| पानी से भरे गिलास या पारदर्शी बोतल के उस तरफ कलम की निब का उल्टा और सीधा दिखाई देना | https://www.youtube.com/watch?v=Y9uzBinRul4&pp=0gcJCQoLAYcqIYzv |
| वायुदाब, घनत्व और तापमान पर HC वर्मा सर के विचार और विश्लेषण और साथ में उदाहरण प्रैशर कुकर का| | https://www.youtube.com/watch?v=7dafkrhKUl8 |
| छड़, उस पर टंगा झोला, बल और बल आघूर्ण, संतुलन के लिए विभिन्न बल और मांसपेशियों में तनाव | https://www.youtube.com/watch?v=v7Z9SyvachY |
| ऊष्मीय गति या तापमान के बढ्ने से बढ़ता वायुदाब- अनुभव जी और मोहित सर | https://www.youtube.com/watch?v=oD1yeAwIxOM |
| गिलास, सिक्का और कार्ड बोर्ड: जड़त्व या कुछ और? एक समीक्षा, एक एप्रोच- HC Verma सर | https://www.youtube.com/watch?v=gWcPqAwL450 |
| रुमाल से पाउडर के कण झड़ने का कारण जड़त्व से अलग- HC Verma सर | https://www.youtube.com/watch?v=hDFvhuLTNzE |
| जो राह चुनी तूने, उसी राह पे राही चलते जाना रे- गायन सुरभि पंत मैम | https://www.youtube.com/shorts/bf_QC6SEcKY |
साइन्स इन द सर्विस ऑफ सोसाइटी के बारे में और जानने या सदस्य बनने के लिए ईमेल करें- sss.dbu@gmail.com या संपर्क करें - 9528237575
पता- Kashmiri Colony, Niranjanpur, dehradun
कार्यशाला का समापन शामिल शिक्षकों को सहभागिता का प्रमाण पत्र उपलब्ध कराकर, धन्यवाद ज्ञापन और समूह फोटो से किया गया|


कई शिक्षकों ने कहा कि ऐसी कार्यशालाएँ होती रहें ताकि उनके अध्यापन और शिक्षण के तरीके मे बेहतरी होती रहे|
https://www.thetoptennews.com/archives/32605
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शुभकामनाएं
-लवकुश कुमार
बीते रविवार (17-05-2026) हम सबके सामूहिक प्रयास और वरिष्ठजनों के प्रोत्साहन से ग्यारहवीं साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा का ऑनलाइन आयोजन सफल रहा, जिसमें निम्नलिखित पुस्तकों/रचनाओं/विषयों पर सार्थक चर्चा हुयी:
बूढ़ा आदमी और समुद्र - अर्नेस्ट हेमिंग्वे
सांसो को पढ़ता कवि (केशव तिवारी) - सम्पादन डॉ जीवन सिंह
गबन - मुंशी प्रेमचंद
इकिगाई - लम्बे और स्वस्थ जीवन का जापानी रहस्य
अखंड ज्योति पत्रिका - गायत्री पीठ
त्यागपत्र - जैनेन्द्र कुमार

सही और जरुरी काम में लगें हैं तो हताशा या निराशा में न फंसे
पुस्तक परिचर्चा का सिलसिला जारी रहे ताकि एक मंच मौजूद रहे, साहित्य प्रेमियों के लिए, पुस्तक प्रेमियों के लिए

परिचर्चा के दौरान समीक्षा ज्यादा लम्बी न रखी जाए और तीन बिंदुओं पर ही अपनी बात में जरुर शामिल किये जाएँ यथा पुस्तक में क्या है, आपको क्यों पसंद आयी और दूसरों को यह पुस्तक क्यों पढ़नी चाहिए|

डॉ जीवन सिंह एक प्रतिष्ठित आलोचक हैं जिन्होंने कविताओं की आलोचना का पैमाना इनका तेवर, जनवादी और लोकधर्मी स्वरुप रखा

केशव तिवारी जी ने अपनी एक कविता में कहा कि यदि वह अपनी कविता के माध्यम से किसी बेईमान आदमी की आँखों में ना खटके तो कविकर्म का दायित्व अपूर्ण रह जाये
केशव तिवारी जी के काव्य में बुंदेलखंड का लोकजीवन, भूगोल, इतिहास और संघर्ष समाहित है|
क्यों पढ़ी जानी चाहिए, सांसो को पढ़ता कवि (केशव तिवारी) - सम्पादन डॉ जीवन सिंह ? ताकि काव्यशास्त्र की समझ आये, कविता विधा के शर्तों का पता चले जिनके बिना कविता अर्थ नहीं पाती, माने कौन से गुण एक रचना को कविता बनाते हैं, न तो छंदयुक्त और न तो छंदमुक्त, कविता को अर्थ मिलता है सन्दर्भ, अंदाज और कथ्य तथा शिल्प के बीच सम्बन्ध से|
मुक्तिबोध की कविताओं की अंतर्वस्तु तक पहुँचने में मददगार हो सकती हैं ऐसे समालोचनात्मक पुस्तकें
ऐसे भी साहसी विद्यार्थी हैं जो पुस्तक परिचर्चा के महत्व और निरंतरता को समझते हुए परीक्षा वाले दिन से पहले दिन भी परिचर्चा में शामिल होने के लिए व्यवस्थित रहते हैं|
उक्त परिचर्चा में निम्नलिखित पुस्तकसाथी शामिल रहे:
आदरणीय महेश चन्द्र पुनेठा सर, मुकेश जोशी जी, अंशुल मैम, सौम्या मैम, उर्मिला जायसवाल, विशाल जायसवाल, अरविंद कुमार, प्रिया शर्मा, प्रिया कश्यप, प्रिया जायसवाल, गायत्री जायसवाल, प्रीति जायसवाल, और लवकुश कुमार|
श्रोताओं को परिचर्चा से जोड़े रखने वाला समन्वय और संचालन सौम्या गुप्ता मैम और लवकुश कुमार ने किया|
पुस्तक परिचर्चा मे शामिल सभी पुस्तक साथियों (Bookmates) ने पुस्तक परिचर्चा मे शामिल होकर/अभिव्यक्ति/सराहना/भागीदारी के माध्यम से इस पहल को पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा देने में, मानवीय मूल्यों के पोषण में, अपनी बात को बेहिचक रखने में महत्वपूर्ण माना एवं एक दूसरे के प्रति आभार व्यक्त किया ताकि इस जरूरी कार्य की नियमितता बनी रहे एवं समाज मे एक सकारात्मक बदलाव में अपना विनम्र योगदान सुनिश्चित किया जा सके |
धन्यवाद ज्ञापन के साथ परिचर्चा को अगली परिचर्चा तक के लिए विराम दिया गया|
इस आशा के साथ कि यह रिपोर्ट पाठकों को पुस्तक परिचर्चा को समझने और उसमे शामिल होने के लिए प्रेरित करेगी |
अगली परिचर्चा 24 मई (रविवार रात 09 बजे) को होगी, शामिल होकर पढ़ने-लिखने की संस्कृति पर काम करने में अपना योगदान सुनिश्चित करें और पुस्तक परिचर्चा से साहित्यिक लाभ लेते हुये अपने दिन की सार्थकता में एक और आयाम जोड़ें|
धन्यवाद
-लवकुश कुमार
हमारे समाज में महिलाओं की स्थिति के बारे में बहुत कुछ कहा जाता है, बातें की जाती हैं पर एक समय तक एक ऐसा समूह जिसे न स्त्री माना जाता है न पुरुष अर्थात् किन्नर उनके विषय में उस स्तर पर न समाज में कुछ बात हुयी और न ही कानून में।
हमें संविधान में समानता का अधिकार दिया गया पर ये कैसी समानता थी जिसमें एक दौर तक पूरे एक तबके को डेथ सर्टिफिकेट लेने के लिए लम्बा संघर्ष करना पड़ा|
गौरी सावंत जी के जीवन पर बनी फिल्म ताली संवेदनाओं और जोश का अद्भुत मिश्रण है। कैसे एक किन्नर अपनी कम्युनिटी के लिए लड़ती है। जिसे अपने घर से निकलना पड़ता है क्योंकि उसके पिता उसकी अलग पहचान को समाज के सामने स्वीकार नहीं कर पा रहे थे।
गणेश जिसे पता था कि गौरी बनने का सफर कितना दर्द देने वाला हो सकता है फिर भी उसने यह सफर तय किया। खाने के लिए और रहने के लिए संघर्ष किया।
अपनी कम्युनिटी में पूरी तरह उसे अपना समझा जाने लगे इसके लिए उसने जान जोखिम में डालकर ऑपरेशन कराया। फिर उसकी ही कम्युनिटी का एक मेंबर उसकी जान लेना चाहता था क्योंकि वो एक शिक्षिका बन गई थी।
गौरी जी ने किन्नर समुदाय के लिए ही नहीं काम नहीं किया, बल्कि वेश्यावृत्ति से जुड़ी महिलाओं के बच्चों को भी अपना माना। गणेश को गौरी बनना था क्योंकि उसे माँ बनना अच्छा लगता था।
गौरी जी कहती हैं कि इस देश में यशोदा की बहुत जरूरत है। उन्होंने शिक्षा भी ली और शिक्षिका भी बनीं।
शिक्षिका बनने तक का सफर भी आसान नहीं रहा होगा। वो ऐसी शिक्षिका बनी कि संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा इन्हें सम्मानित किया गया। उनकी एक दोस्त की जान जाने पर शरीर को नीचे रखने पर उन्होंने धरना प्रदर्शन कर दिया | साम-दाम-दण्ड की नीति के द्वारा उनको पूरा सम्मान दिलाया।
सुप्रीम कोर्ट में अपनी कम्युनिटी को तीसरे लिंग की पहचान दिलाई।
उन्होंने राह के काले पत्थरों या मुँह पर पड़ी काली स्याही से रुकना सीखा ही नहीं था। इसीलिए तो चाहे अपनों का साथ छूटना हो या इस समुदाय के साथ होने वाले दुर्व्यवहार का पता चलना हो, ऑपरेशन के लिए जान जोखिम में डालना हो या अपने ही लोगों द्वारा मारने कोशिश, उन्होंने रुकना नहीं आगे बढ़ना स्वीकार किया।
ताली बजाना नहीं, बजवाना स्वीकार किया।
-सौम्या गुप्ता
बाराबंकी, उत्तर प्रदेश
सौम्या जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं |
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शुभकामनाएं
मेरी प्यारी कॉफी,
सुमधुर स्मृति,
तुम जहां भी होगी बहुत खुश होगी, ऐसा मेरा विश्वास है क्योंकि तुम थी ही इतनी प्यारी। तुम सबसे इतने प्यार से मिलती थी, हर आने वाले को तुम प्यार की डोर में बाँध लेती थी जैसे तुम्हारा उससे जन्म-जन्मांतर का रिश्ता हो। हमारी कॉलोनी वाले सभी तुमको बहुत प्यार करते थे। जब तुम कार में बैठकर रानी की तरह ठाठ से जाती तो सभी बच्चे हाथ हिला कर तुम्हारा अभिवादन करते। तुम्हारे जाने के बाद भी वे तुम्हारी खोज-खबर लेने हमारे घर आ जाते हैं। कुछ लोग तो अब भी पूछते हैं, जब हमारे घर का गेट खोलते हैं तो सबसे पहले अंदर झांकते हैं, मेरे आश्वासन देने पर की डरने की कोई बात नहीं है, काॅफी चली गई है, तब ही वे अंदर आते हैं। आज कुछ निडर प्राणी हमारे घर में खूब उछल-कूद मचा रहे हैं जो तुम्हारे रहने पर फटकते भी नहीं थे, अब ये बेधड़क नन्हें-मुन्हें बच्चे तुम्हारी जगह धमा-चौकड़ी कर हमारा मन लगाए रहते हैं और म्याऊँ-म्याऊँ की बोली से हमारे कानों में मिश्री-सी घोल जाते हैं । उनका दबे-पांव आना और चुपचाप झांकना मुझे तुम्हारी याद दिलाता रहता है। वैसे भी हम तुमको भूले ही कहां है, बस कुछ इस तरह से तुम्हारी यादें ताजी हो जाती हैं।
तुम्हारी भारी-भरकम आवाज जब पूरे घर में गूंजती तो हम समझ जाते कि कोई आया है और तुम हमें बुला रही हो या आने वाले से उसका नाम पूछ रही हो। तुम्हारे पास तो एक ही भाषा थी, हमें समझना पड़ता था कि तुम क्या कहना चाहती हो? गुस्से के समय तुम्हारा चेहरा बदल जाता था। तुम्हारे अंदर के भाव तुम्हारे प्यारे से चेहरे पर ऐसे आते जैसे कोई बच्चा रूठ गया हो और उस समय मेरी हंसी रोके नहीं रुकती। तुमको अपने गले से लगाए बिना मैं ना रह पाती। जब मैं सितार बजाती तो तुम मेरी गोद में सिर रख कर पूरी तन्मयता से सुनती जैसे सब समझ रही हो और आनंद ले रही हो। तुमने मुझे हर एक प्राणी से प्यार करना सिखा दिया। सभी प्राणियों में मुझे एक ही आत्मा दिखाई देने लगी, यह मेरे लिए तुम्हारी सबसे बड़ी सौगात थी जो मुझे कोई और नहीं दे सकता था, एक आध्यात्मिकता का अहसास जो तुमने करवा दिया। आज इसी वजह से मैं उन प्राणियों से डरने या डराने की जगह उनसे दोस्ती करने की कोशिश कर रही हूं। यह मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि पहले मैं जिनसे भयभीत रहती थी,उनसे आज प्यार करने का मन चाह रहा है, यह सब कुछ हमारी कॉफी रानी की बदौलत ही तो हो रहा है। परिवर्तन ही तो जीवन का नियम है, तभी तो हम अपने आप को बदलते हुए आगे बढ़ते हैं और ऊपर उठते जाते हैं। तुमने मुझमें आध्यात्मिक चेतना जगा दी कि आखिर हम सब भी तो उस एक परमात्मा की संतान ही तो है। बस रूप अलग-अलग है, फिर सभी की मूलभूत जरूरतें भी तो एक ही है इसीलिए तुम हमारे परिवार की सदस्या बन गई थी। पूरे अधिकार से तुम हमारे बीच धंसने में जरा भी नहीं हिचकती। तुम्हारा बस चलता तो तुम गलबाहियां डालकर बैठ जाती। मेरे पति ने इसीलिये तुम्हारा नाम काॅफी रानी रख दिया था। हमारे सोफे पर बैठकर तुम हमारे साथ ही अखबार पढ़ा करती थी हमसे छीन कर, जब हम तुमसे अखबार मांगते तो तुम अजीब-सा मुंह बनाकर हम पर गुस्सा दिखाती। शायद तुमको हमारा अखबार पढ़ना अच्छा नहीं लगता था क्योंकि उस समय हम तुम्हारे साथ होकर भी पेपर पढ़ने में व्यस्त हो जाते थे, यह बात तुमको नागवार गुजरती।
तुम्हारा पालन-पोषण मेरे बेटे सान्निध्य की गोद में और बचपन हमारे साथ खेलकर गुजरा। मस्ती के साथ झूमते हुए तुम बहुत जल्दी बड़ी होने लगी। कभी-कभी अफसोस होता कि तुम इतनी तेजी से क्यों बड़ी हो रही हो? हम लोगों का और हमारे यहां आने वाले सभी लोगों का तुमने मन मोह रखा था, तुम मनमोहिनी बन गई थी। तुम्हारा रंग भी दूध वाली कॉफी जैसा था, व्हाइट और ब्राउन मिक्स, इसीलिए बेटे ने तुम्हारा नाम कॉफी रखा था। कोई यदि हमारे यहां से जाने के बाद बहुत दिनों के बाद हमसे मिलने आया और तुम उसको पहचानती तो बस उसके पास आकर बैठ जाती और वहां से उठने का नाम नहीं लेती क्योंकि उससे प्यार जो करवाना होता, तुम प्यार की प्रतिमूर्ति थी। हर एक से प्यार पाकर तुम्हारे चेहरे पर एक सुकून दिखाई देता और तुम आंखें बंद कर उसका सुखद अहसास सामने वाले को भी करवा देती, जैसे तुम कृतज्ञता व्यक्त कर रही हो। तुम्हारी हर एक गतिविधि ने जैसे हम सबको एक बंधन में बांध दिया था। घर में तुम्हारी बातें ज्यादा होती और दूसरी बातें कम होती। तुम हमारे बीच जैसे एक पुल बन गई थी। बड़ी होने पर भी तुम शायद खुद को बच्ची ही समझती थी। उसी तरह रूठना लेकिन जल्दी मान जाना तुम्हारी बहुत बड़ी विशेषता थी।
उम्र का तकाज़ा अब तुम्हें पहले की तरह उछल-कूद की इजाज़त नहीं दे रहा था। तुम्हारा भागना-दौड़ना भी प्रतिबंधित हो गया। तुम्हारी चंचलता पर भी लगाम लग गई। यह सब हम लोगों के लिए भी कष्टदायी हो गया। तुम हमारे पलंग पर अब भी पहले की तरह सोने के लिए मचल जाती लेकिन लाचार होकर बैठ जाती, हम लोग भी विवश थे क्योंकि तुम्हारा भारी शरीर बाधा बन गया था इसीलिए हम भी तुम्हें पलंग पर नहीं चढ़ा सकते थे। हमें तुम्हारे बिना पलंग सूना लगता था, जबकि शुरू में जब तुम हमारे साथ सोने की जिद करती तो हम तुम्हारी इस जिद से बहुत परेशान और नाराज होते थे। लेकिन तुम जीत जाती और हम हार जाते पर हमें हार कर भी जीत से ज्यादा खुशी मिलती। लेकिन तुमको उदास देखकर हम भी दुखी हो जाते थे। क्या करें कि तुम पहले की तरह ही उछलकर पलंग पर चढ़ जाओ और हम दोनों के बीच धंस जाओ। मेरे पतिदेव के सीने पर ठोड़ी टिकाये बिना तो तुमको नींद ही नहीं आती थी। तुम्हारी गर्दन का बोझ जब बर्दाश्त नहीं होता तो प्यार से हम तुम्हें हटाते, लेकिन यह हमारी कल्पना के भी बाहर था कि हम तुमको बिस्तर पर अपने साथ सुलाएंगे पर तुम्हारे प्यारे से मुखमंडल के आगे हम सबकुछ भूल जाते थे। तुम्हारा बिस्तर हमारे कमरे के कोने में लगा दिया जाता, जहां तुम चुपचाप दुबक कर बैठ जाती, बिना किसी शोर-शराबे के। तुम भी शायद अब उम्र के तकाजे के साथ समझौते का रुख अपना रही थी, तुमको उठने में और चलने में परेशानियां शुरू हो गई। किसी के आने की आहट भी तुमको अब शायद सुनाई नहीं देती। तुम्हारे ऊपर बुढ़ापा तेजी से हावी हो रहा था। धीरे-धीरे तुम्हारी सारी गतिविधियां उम्र के साथ प्रतिबंधित हो रही थी। इससे हम भी परेशान रहने लगे क्योंकि तुम्हारी हालत दिन पर दिन बिगड़ती जा रही थी। तुम्हारी लाचारी ने ही तुम्हें चिड़चिड़ा बना दिया था। हम लोग धैर्य के साथ तुम्हारा उस समय में साथ दे रहे थे और सब मिलकर सेवा करते थे। कभी-कभी हम लोग भी तेजी से गिरते तुम्हारे स्वास्थ्य के लिए परेशान हो जाते। ना जाने तुम कैसे स्वस्थ होगी? लेकिन उम्र का तकाज़ा रोके कहां रुकता है? तुम भी उसकी गिरफ्त में आ गई थी,ये हमें खुद को समझाना पड़ा। जो आया है, उसे जाना ही पड़ेगा। कोई यहां अमरफल खाकर नहीं आया। तुम्हारा शायद अब अंतिम समय आ गया था। बेटे सान्निध्य ने अच्छे से अच्छा इलाज करवाया। लेकिन शायद ईश्वर ने इतने ही समय के लिए हमारे साथ तुम्हारा अद्भुत संबंध जोड़कर हमें एक आध्यात्मिक जगत से जोड़ने के लिए भेजा था। तुम्हारी सारी स्मृतियां अंतिम समय तक हमारे साथ रहेंगी। बेटे ने तुम्हारी समाधि हमारे छोटे से लाॅन में जो तुमको बहुत पसंद था, वही बनवाई है, जिससे तुम मीठी-प्यारी स्मृतियों के रूप में हमारे पास मौजूद रहोगी। मेरे पतिदेव रोज उस जगह धूपबत्ती लगाते हैं। मैंने एक साल तक तुम्हारे लिए वहां दूध रखा क्योंकि तुम दूध पीने के लिए सबसे ज्यादा उछलती हुई आती थी। आज भी मुझे तुम्हारी बड़ी-बड़ी कजरारी आंखों में तुम्हारे अंतिम समय की लाचारी याद आती है। एक अफसोस है, काॅफी काश मैं तुम्हें अपने अंतिम समय तक साथ रख पाती। जब मैंने तुम्हें अंतिम बार गले लगाया, तुम जमीन पर निढाल मेरी तरफ याचना भरी दृष्टि से देख रही थी। तब तुम्हारी आंखें मेरे आलिंगन और चुंबन से धीरे-धीरे हमेशा के लिए जैसे बंद हो गई और वातावरण में खामोशी-सी छाने लगी, तुमको अलविदा करते ही एक सन्नाटा-सा चारों पसर गया हो । जैसे घर का कोई बड़ा बुजुर्ग हमें अकेला और असहाय छोड़कर चला गया हो जो हमारी बहुत प्यारी सुकून देने वाली छाया थी।
तुम कभी-कभी सपनें में अपनी झलक दिखला जाती हो। बेटे सान्निध्य के साथ तुम्हारा लगाव बिल्कुल माँ-बेटे के संबंध जैसा था। आज भी उसे जाने-अनजाने में एक अलौकिक अहसास करवा देती हो तुम। आत्मा के रूप में तुम हमारे साथ ही हो। तुम्हें जो रोज घुमाते थे, आज भी वह कॉलोनी में डॉग्स को घुमाते मिल जाते हैं तो नमस्ते के साथ-साथ तुम्हारी तारीफ किए बिना नहीं रहते। ऐसी डॉगी अभी तक नहीं मिली जो इतनी प्यारी और शांत थी। अब तो तुम्हारी यादें ही प्यारी लगने लगी हैं और इन्हीं यादों के साथ हमने जीना सीख लिया है। एक प्यारा-सा खिलौना भगवान ने पोते के रूप में हमें दिया है। सौभाग्य से उसे भी तुम्हारा स्नेह मिला था। वह जब तुम्हारे ऊपर पैरों से कूदता था तो तुम उसे प्यार से मुड़ कर देखती जैसे दादी एक पोते पर प्यार लुटा रही हो। इससे ज्यादा तुम उसे क्या दे सकती थी? यही तुम्हारी हम सब के लिए सबसे बड़ी सौगात थी प्यार, जो तुम जाते-जाते हम सभी को दे गई। नन्हा-सा पोता अपने नन्हें-नन्हें कदमों से अक्सर तुम्हारी समाधि तक पहुंच कर वैसे ही चढ़ जाता है जैसे तुम्हारी पीठ पर चढ़ा करता था। तुम हमेशा हमारी स्मृतियों में रहोगी कॉफी, यह पंक्तियां तुम्हारी यादों को समर्पित है-
हमारे घर की पहचान थी कॉफी
हम सब का अरमान थी काॅफी
हमारे घर की शान थी कॉफी
हम लोगों की जान थी काॅफी
तुम्हारी अपनी
स्नेहिल प्रीति
डॉ. प्रीति अग्रवाल ने सन् 1984 में हिंदी-साहित्य में स्वर्ण-पदक लिया। सन् 2015 में पी.एच.डी. की उपाधि प्राप्त की। आपने कॉलेज की नौकरी करने के बदले खुद को साहित्य, कला, संस्कृति और सामाजिक कार्यों में शामिल करने का निर्णय लिया।
आपको संस्कार भारती ग्वालियर द्वारा सामाजिक-सांस्कृतिक सेवाओं के लिए वीरांगना लक्ष्मीबाई सम्मान भी दिया गया है। आपने अनेक राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में विभिन्न विषयों पर लेख प्रकाशित किए हैं।
आपकी पुस्तक यात्रा संस्मरण चलो चले अंडमान तथा शोध प्रबंध हिंदी बाल गीतों में लोक संस्कृति और पूर्व सिविल सेवा अधिकारी और माननीय राष्ट्रपति श्री शंकर दयाल शर्मा जी के निजी सचिव जो आपके पति है, उनकी जीवनी तृषित- एक जीवन यात्रा प्रकाशित हो चुकी है।
आपका दूरदर्शन एवं आकाशवाणी से जीवंत जुड़ा रहा है। फिलहाल आप लाइफ काउंसलर के रूप में लोगों को फोन पर निःशुल्क सेवा उपलब्ध करा रही हैं।
आपने लोगों की जटिल से जटिल जीवन संबंधी समस्याओं को सुलझाया है। अनेक लोगों के जीवन को अपने मार्गदर्शन से आत्महत्या से बचाया है तथा उनके जीवन को सार्थकता भी दी है। वे रिश्तें जो तलाक तक पहुंच गए थे आपने उन्हें भी फिर से मिला दिया। आप प्री-मैरिज काउंसलिंग भी निःशुल्क करती हैं।
कोई भी इच्छुक व्यक्ति आपसे बात कर सकता है, यह काउंसलिंग पूरी तरह निःशुल्क है, आपका मोबाइल नंबर 9644624449 है। शाम को 6:00 बजे से 9:00 बजे तक आपसे संपर्क किया जा सकता है।आपातकालीन परिस्थितियों में कभी भी बात कर सकते हैं।
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शुभकामनाएं
खुद से खुद की जंग है,
कई बार मैं हार जाती हूँ,
कई बार मन हार जाता है।
पर कोशिश है मन को
ज़्यादा हराने की,
हर बार एक कदम
मन से जीत जाने को,
जानती हूँ मन मेरा हर बार
प्रतिस्पर्धी नहीं होगा,
कई बार बनेगा यह मेरा मित्र,
कई बार खुद ही आदत हो जाएगी
इसे मुझसे हार जाने की।
-सौम्या गुप्ता
बाराबंकी, उत्तर प्रदेश
संपादकीय टिप्पणी:
इस कविता का मूल विषय क्या है?
इस कविता का मूल विषय आंतरिक संघर्ष है, जो व्यक्ति के मन के साथ होने वाली लड़ाई को दर्शाता है, जब मन हमें हमारी वृत्ति की और खींचता है और हम अपने शरीर से वह काम लेना चाहते हैं जो हमें उत्थान, आत्मनिर्भरता और मुक्ति की और ले जाएँ। यह हार और जीत के चक्र, और खुद को बेहतर बनाने की निरंतर कोशिश के बारे में है।
सौम्या जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं |
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शुभकामनाएं
बीते रविवार (10-05-2026) हम सबके सामूहिक प्रयास और वरिष्ठजनों के प्रोत्साहन से दसवीं साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा का ऑनलाइन आयोजन सफल रहा, जिसमें निम्नलिखित पुस्तकों/रचनाओं/विषयों पर सार्थक चर्चा हुयी:
ब्राह्मण की बेटी – शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय
जीत आपकी- शिव खेड़ा
संबंध और क्या है जीवन- आचार्य प्रशांत



जीवन सम्बन्ध है। व्यक्ति का व्यक्ति से सम्बन्ध, प्रकृति से सम्बन्ध, समाज से सम्बन्ध।
इन सम्बन्धों का आधार क्या है?
क्या है हमारे सम्बन्धों की वास्तविकता ?
क्या हमारे सम्बन्ध डर, लालच, मोह, आसक्ति की छाया मात्र हैं, या ये प्रेम की अभिव्यक्ति हैं?
क्या हमारे सम्बन्ध अकेलेपन से बचने के उपाय हैं, या आन्तरिक पूर्णता का प्रस्फुटन ?
और क्या है, सच्चा प्रेम?

उक्त परिचर्चा में निम्नलिखित पुस्तकसाथी शामिल रहे:
अंशिका शर्मा मैम, हिमांशु जोशी जी, उर्मिला जायसवाल, विशाल जायसवाल, अंजना वर्मा, आरती मैम, अरविंद कुमार, धर्मेंद्र शर्मा सर, शोभित, प्रिया शर्मा, लक्ष्मण जोशी, प्रिया जायसवाल, गायत्री जायसवाल, विजय कुमार, प्रिय कश्यप और कर्ण भाईजी|
कुशल और श्रोताओं को परिचर्चा से जोड़े रखने वाला समन्वय और संचालन कर्ण भाईजी ने किया|
पुस्तक परिचर्चा मे शामिल सभी पुस्तक साथियों (Bookmates) ने पुस्तक परिचर्चा मे शामिल होकर/अभिव्यक्ति/सराहना/भागीदारी के माध्यम से इस पहल को पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा देने में, मानवीय मूल्यों के पोषण में, अपनी बात को बेहिचक रखने में महत्वपूर्ण माना एवं एक दूसरे के प्रति आभार व्यक्त किया ताकि इस जरूरी कार्य की नियमितता बनी रहे एवं समाज मे एक सकारात्मक बदलाव में अपना विनम्र योगदान सुनिश्चित किया जा सके |
धन्यवाद ज्ञापन के साथ परिचर्चा को अगली परिचर्चा तक के लिए विराम दिया गया|
इस आशा के साथ कि यह रिपोर्ट पाठकों को पुस्तक परिचर्चा को समझने और उसमे शामिल होने के लिए प्रेरित करेगी |
अगली परिचर्चा 17 मई (रविवार रात 09 बजे) को होगी, शामिल होकर पढ़ने-लिखने की संस्कृति पर काम करने में अपना योगदान सुनिश्चित करें और पुस्तक परिचर्चा से साहित्यिक लाभ लेते हुये अपने दिन की सार्थकता में एक और आयाम जोड़ें|
धन्यवाद
-लवकुश कुमार
"एक मजेदार कक्षा के साथ, सीखने, खुलने, निखरने और बेहतरी के सफर पर एक संकोची लड़की के एक मुखर व्यक्ति बनने की कहानी"
शालिनी बहुत ही चुपचुप रहने वाली लड़की है। पहले वह स्कूल में अक्सर अपना सिर नीचे ही रखती,वह कभी सवाल नहीं करती थी। समझ न आने में सर को बताती नहीं थी कि उसे समझ नहीं आ रहा है। उसके लिए स्कूल जाना सबसे बोझिल कामों में से एक था। स्कूल और वहां के माहौल ने उसकी तरफ कभी कोमल हाथ नहीं बढ़ाया, बचपन से ही टीचर के लिए डर और अपने साथियों द्वारा उसका मजाक बनाए जाने का ऐसा असर हुआ कि स्कूल उसके लिए किसी यातना शिविर सा बन गया।
वह हमेशा दबाव में रहती, डर उसके ऊपर इतना हावी हो गया था कि वह हमेशा डरी-डरी रहती। ऐसा करते-करते शालिनी ने आठवीं पास कर लिया। वह घर में बहुत खुश रहती, वहां वह सहज हो पाती। मां के साथ घर के काम में हाथ बटाती। स्कूल से आते ही मां को खोजते हुए खेतों में पहुंच जाती थी।
शालिनी को लगता स्कूल जाने से अच्छा यह होता कि वह अपनी मां के साथ घर और खेतों का काम कर पाती। लेकिन स्कूल तो जाना ही था,उससे बचना नामुमकिन सा था। अब उसका दाखिला बड़े स्कूल में हो गया। वह नौवीं में पहुंच गई थी। तमाम तरह की शंकाएं और उस स्कूल के बारे में सुनी बातें उसे रह रहकर डराती। वही डर में वह खुद को फिर से सहमा हुआ पाती जहां से वह अभी अच्छी से निकली भी नहीं थी। नया स्कूल सच में बड़ा था ,वहां बहुत सारे बच्चे थे। टीचर भी बहुत सारे।यह नजारा उसके लिए आश्चर्यजनक करने वाला रहा।
एक दिन उन्हें कक्षा में एक अध्यापक पढ़ाने आएं। सोमेश सर ,जो उन्हें सामाजिक विज्ञान पढ़ाते थे। पहली बार तो वह सर के व्यवहार को देखकर अचंभित हो गई कि कोई अध्यापक ऐसा भी हो सकता है। वह बच्चों से लगातार प्रश्न पूछने को कह रहे थे। बिना किसी डर के वह पहली कक्षा थी जहां शालिनी को राहत सी महसूस हुई।
सोमेश सर ने बहुत सारी बातें बताई। किताबें,समाज और साथ में स्कूल के पुस्तकालय की भी। शालिनी ने आज तक अपने जीवन में पुस्तकालय नहीं देखा था। सच बात तो यह थी कि पाठयपुस्तक के अलावा उसने कोई किताब देखी ही नहीं थी। सोमेश सर के मृदु और बच्चों के साथ दोस्ताना व्यवहार का यह असर होने लगा कि शालिनी दबे पांव पुस्तकालय का रुख करने लग गई। वह सहमी सी जाती थी,एक कोने में जाकर बैठ जाती थी। उसके लिए वह पुस्तकालय किसी अजूबे से कम न था।टेबल पर बहुत सारी पत्रिकाएं बिखरी हुई थी। अलमारियों में बहुत करीने से किताबें लगी थी।
दीवारों में बच्चों के हाथों से लिखे हुई कुछ लंबे से पोस्टर टंगे हुए थे। बाद में सर ने बताया कि यह दीवार पत्रिका है। जो वहां के बच्चों ने स्वयं बनाई है। इसमें कुछ भी लिख सकते हो,जिसे किसी किताब से नहीं उतारना बल्कि अपने भीतर की दुनिया में जो चल रहा है उसे कागज में उतारना है,बिना किसी संकोच के। उसे पहली बार महसूस हुआ कि बच्चों को भी स्कूल में सम्मान दिया जाता है। यहां कुछ न आने पर सिर्फ उन्हें मारा या डांट नहीं लगाई जाती बल्कि उनके हिस्से की दुनिया रचने की आजादी भी दी जाती है।
इस तरह से शालिनी सर के साथ धीरे धीरे घुलने मिलने लग गई। अब वह सर के सामने वाली बेंच में बैठी रहती। इंटरवल होते ही पुस्तकालय आ जाती। पत्रिकाएं पढ़ती। यह उसका पसंदीदा काम होने लगा। सोमेश सर के पढ़ाने का अंदाज सबसे निराला था। उनके कक्षा में सन्नाटा कभी भी जगह नहीं ले पाया,वहां बच्चों की हंसी, बच्चों के प्रश्न और विषय से संबंधी किसी बात पर अपनी बात रखते बच्चों का शोर कक्षा को जीवन्त बनाएं रखता था।हर किसी की बात सुनी जाती, बहुत बार तो ऐसा होता कि बच्चे सर की बात से सहमत नहीं होते, उसके एवज में स्वयं तर्क करने लगते, फिर भी पूरा माहौल खुशनुमा बना रहता। यह सब शालिनी को भीतर ही भीतर गुदगुदाता । उसने आज तक ऐसा दृश्य न देखा था न कभी कल्पना की थी। उसने एक ऐसे अध्यापक की कल्पना किसी सपने में भी नहीं की थी। उसका बालमन सर की तरफ आकर्षित होता जा रहा था। वह सोमेश सर ही थे जो उसे हर वक्त लाइब्रेरी में मिलते। शालिनी का यह पहला परिचय था पुस्तकों से। उसे किताबों की रंग बिरंगी दुनिया अपनी सी लगती। वहां कोई उसे उसकी कमजोरी से नहीं आंकता था, बल्कि अपनी क्षमताओं से मिलाता।सोमेश सर बच्चों के विचार व्यक्त करने और पढ़ने के बहुत पक्ष में रहते,यही कारण था कि बच्चों की चहलकदमी सर के आस पास बनी रहती।
एक दिन शालिनी इंटरवल में लाइब्रेरी में बैठी थी, तब ही स्कूल में बनने वाली दीवार पत्रिका के लिए नए संपादक मंडल का चुनाव हो रहा था। सर ने शालिनी से भी पूछा कि क्या वह भी संपादक मंडल की सदस्य बनना चाहेगी।सर के सामने वह सिर्फ हां बोल पाई थी। लेकिन उसकी खुशी का ठिकाना नहीं था। उसे लगा हां यही तो चाहती थी वो। उसके बाद उसका लेखन शुरू हो गया। जिसे सोमेश सर ने काफी सराहना शुरू किया। इसका असर यह होने लगा कि सर की कक्षा में उसका डर निकलने लगा। वह सभी चीजों में बढ़ चढ़ के प्रतिभाग करने लगी। सर के सिखाने का ही तरीका था कि उसके भीतर कभी गौरवबोध नहीं आया। सोमेश सर सभी बच्चों को एक समान मानते। किसी को सिर्फ इसलिए तवज्जो नहीं देते थे कि वह अच्छा बोलता है या पढ़ने में अच्छा है। वह बच्चों की तरफ से आने वाली शिकायत में भी तटस्थ बने रहते। उन्हें कभी शालिनी ने किसी की तरफदारी करते नहीं सुना। हालांकि वह बच्चों के लेखन को सार्वजनिक रूप से सराहते। शालिनी को अब पढ़ने में आनंद आने लगा,सामाजिक विषय उसका पसंदीदा विषय बन गया। उसे सोमेश सर के पढ़ाने का बेसब्री से इंतजार रहता।वह एक दिन भी घर में नहीं रहती,रोज स्कूल में जाती,अब वह पहले से ज्यादा चीजों को सीखने की कोशिश करती।
शालिनी धीरे धीरे आत्मविश्वास से भरने लगी थी। वह किसी न किसी बहाने से सर के आस पास रहती,उनसे बातें करती। सर का स्नेह ही था जो उसे सीखने को प्रेरित कर रहा था।अब उसने अपने आस पास समाज को ज्यादा बारीकी से देखना शुरू कर दिया। सर ने उसकी यह भ्रांति भी तोड़ी कि सिर्फ स्कूल की चारदीवारों के भीतर और पाठयपुस्तकों से ही सीखा जाता है। वह किताब को समाज से जोड़कर पढ़ाया करते थे। उनमें अक्सर गांव के गरीब व्यक्ति की कहानी, सस्ते गल्ले की दुकान वाले का इंटरव्यू , अगर आप प्रधानमंत्री बन गए तो क्या करोगे, इस तरह के विषय शामिल रहते। इन सबको वह बड़ी ईमानदारी से करती।
उसे सर को दिखाने का उतावलापन रहता, उसने कैसा लिखा है करके। स्कूल पहुंचकर वह सबसे पहले लाइब्रेरी की ओर देखती कि सर आएं हैं या नहीं। जो विषय आज तक उसे रटने वाला और उबाऊ लगता था उसे सोमेश सर ने सबसे मजेदार बना दिया था। स्कूल अब उसके लिए दबाव नहीं बल्कि उत्सुकता का केंद्र बन गया। सोमेश सर उसकी जिंदगी में न आएं होते तो उसके जीवन में जो यह बदलाव आ रहे थे ,वह कभी नहीं आ पाते। उसने अब लोगों की बातों को नजरअंदाज करना सीख लिया था। वह बाकी विषयों में भी ध्यान लगाने लगी थी। 10वीं में वह अच्छे अंकों से पास हो गई थी। जबकि उसके घर वालों को यह डर था कि कहीं वह फेल न हो जाएं। विषय में रुचि बढ़ने के कारण उसने 11वीं में भी मानविकी विषय लिए। जिसके लिए उसे घर में भी काफी संघर्ष करना पड़ा। घर वाले चाहते थे लड़की साइंस ले, लेकिन दिल तो मानविकी विषयों में अटक गया था।
जबरदस्ती वो विज्ञान पढ़ भी नहीं पाती। फिर भी कुछ दिन विज्ञान पढ़ने गई, एकदम वह उदास पड़ने लग गई। सोमेश सर की कक्षा उसे रह रहकर याद आती,उसका वहां न होने का विचार उसे उदास कर जाता। उसने किसी से बात करना छोड़ दिया था। घर में भी किसी से बात नहीं करती थी। एक दिन हताश होकर वह स्कूल से जाते ही बिस्तर में जाकर सो गई, कंबल के अंदर मुंह छिपाकर रोती रही। उस रात घर वालों के बहुत मनाने पर भी उसने खाना नहीं खाया। उसकी जिद्द के आगे घर वालों को हार माननी पड़ी। दूसरे दिन सुबह स्कूल जाते वक्त पापा ने उसे मानविकी पढ़ने की इजाजत दे दी। वह दिन उसके लिए किसी उपलब्धि की तरह था। मानो उसने अपनी कोई जरूरी मांग मनवाई हो। इस तरह उसने मानविकी में अपना एडमिशन लिया। वह खुश तो थी, लेकिन उसके सभी साथियों ने विज्ञान विषय ले लिए थे। वह अकेली पड़ गई थी। बाकी जो थे वह अभी उसके लिए नए थे। पूरे स्कूल में एक तरह की हवा फैल गई कि शालिनी ने मानविकी ले ली। वह भी सोमेश सर के विषय के कारण। घर जाते वक्त उसके कुछ साथियों ने कहा भी था यह पागल हो गई है, सोमेश सर ने इसमें काला जादू कर लिया है।
जहां सब विज्ञान पढ़ रहे हैं और यह कला वर्ग में जा रही है। पहले पहले उसे यह बताने में शर्म सी आती या संकोच होता की वह कला वर्ग की छात्रा है।लोग भी उसे शक की नजरों से देखते। बाकी धीरे धीरे उसे वहां वहीं सुकून मिलने लगा था, जिसके लिए उसने संघर्ष किया था। सोमेश सर राजनीति विज्ञान पढ़ाते। वह लाइब्रेरी जाने लगी। लिखना,पढ़ना दोनों साथ साथ चलता रहा। उसे याद है एक बार सर ने उसे "आजादी मेरा ब्रांड" पुस्तक पढ़ने को दी,जो अनुराधा बेनीवाल का यात्रा वृतांत है। उसे पढ़कर उसे बहुत आजादी का अनुभव हुआ। जहां पहले वह कहीं भी अकेले जाने से डरती थी,अब उसने अकेले चलना शुरू कर दिया। उसने इस पुस्तक की समीक्षा भी लिखी। जिसे काफी सराहना मिली।
इस तरह पढ़ना लिखना उसकी आदतों का हिस्सा बन गया। 12वीं तक वह लगातार सोमेश सर से पढ़ती रहीं और चीजों को जानती रही। लिखना पढ़ना उसके पसंदीदा कामों में एक बन गया।सोमेश सर का ही असर था कि शालिनी के व्यवहार में बहुत सकारात्मक परिवर्तन आएं। बाकी विषयों में भी उसने मन लगाकर पढ़ना शुरू किया।
एक बार जब वह इंटरवल के बाद होने वाली क्लास में थोड़ी देरी से पहुंची तो इंग्लिश के अध्यापक ने उसे बुरी तरह डांटते हुए कहा कि तुम्हारा यही रवैया रहा तो तुम इंग्लिश में फेल हो जाओगी। यह सुनकर वह सहम गई और चुपचाप अपनी जगह में जाकर बैठ गई। जब 12वीं का रिजल्ट आया तो शालिनी न सिर्फ अंग्रेजी में उत्तीर्ण हुई थी बल्कि बहुत अच्छे नंबर लेकर आई। यह देखकर उसके आंखों में आंसू आ गए । यह पल उसके लिए भावुक करने वाला था। यह सिर्फ परीक्षा का ही रिजल्ट नहीं था , शालिनी के टूटने, बिखरने बनने, सीखने, अपने डर से लड़ने, खुद को लेकर हीन भावना से निकलने का सफर था। उन सभी लोगों की उपेक्षाओं के बावजूद सोमेश सर की अपेक्षाओं ने उसे बचा लिया था। सोमेश सर ने अपने प्रेम और मृदु स्वभाव से न सिर्फ पढ़ने को रुचि में बदल दिया बल्कि कभी भी किसी प्रश्न का जवाब नहीं बताते थे, बल्कि स्वयं खोज लाने को कहते थे। जिससे बच्चों को स्वयं जूझना पड़ता। इसी ने शालिनी को मजबूत और स्वयं कुछ खोजने सीखने को उत्साहित किया।
-शीतल भट्ट
शीतल जी, उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के एक दूरस्थ पहाड़ी गांव भट्टयूडा से आती हैं। आपने अपना परास्नातक, भूगोल विषय में लक्ष्मण सिंह मेहर कैंपस पिथौरागढ़ से किया है। आप सामाजिक खांचों में फिट नहीं होना चाहती, इसे इस परिप्रेक्ष्य मे देखें कि आप हर वह रिवाज नकारना चाहती हैं जो आपको एक लड़की होने का हवाला देकर कम आंकते हो।
किताबें संवेदनशील ,सामाजिक ,निर्भय और वैज्ञानिक चेतना देती हैं, अतः किताबें पढ़ना, नया जानते रहकर अपनी समझ को विस्तार देते रहना आपकी आदत मे शुमार है। आपको फिल्में देखना पसंद है, और घूमना भी। भूगोल आपको अपनी ओर खींचती है साथ ही नए और रचनात्मक लोगों के साथ बात करने और उनके बारे में जानने को उत्सुक रहती हैं |
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