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पुस्तक- अंतस : ज़रा ठहरिए
लेखक- लवकुश कुमार
प्रकाशक- Notion Press
आज की तेज़ रफ्तार ज़िंदगी में ठहरना लगभग भूल चुके हैं हम। ऐसे समय में "अंतस" एक ऐसी पुस्तक बनकर सामने आती है, जो न सिर्फ हमें रुकने के लिए कहती है साथ ही भीतर झांकने का साहस भी देती है।
इस पुस्तक को पढ़ने से पहले मुझे लगा था कि यह एक सामान्य सेल्फ हेल्प किताब जैसी होगी लेकिन जैसे-जैसे मैं इसके पन्नों में आगे बढ़ता गया। यह अनुभव कहीं अधिक व्यक्तिगत और गहरा होता चला गया। लेखक ने रोज़मर्रा की साधारण लगने वाली घटनाओं के माध्यम से जीवन के बड़े सवालों को बेहद सहजता से उठाया है।
लेखक की सबसे बड़ी ताकत उनकी संवेदनशीलता है। वह किताबों और लेखकों के महत्व को जिस आत्मीयता से प्रस्तुत करते हैं। वह कहीं न कहीं सीधे दिल तक पहुंचती है। पुस्तक में विभिन्न किताबों, फिल्मों और विचारों का ज़िक्र न केवल पाठक की जिज्ञासा बढ़ाता है बल्कि उसकी सोच के दायरे को भी विस्तृत करता है।
इस पुस्तक की एक और खासियत इसके छोटे-छोटे प्रसंग और उद्धरण हैं। जो कम शब्दों में गहरी बात कह जाते हैं। एक जगह लेखक एक चिड़िया का उदाहरण देते हैं जो जंगल में लगी आग को बुझाने के लिए अपनी चोंच में पानी भरकर लाती है। यह प्रसंग हमें सिखाता है कि छोटी-छोटी कोशिशें भी बड़े बदलाव का हिस्सा बन सकती हैं। सिर्फ दर्शक बनकर रहने से बेहतर है कुछ करना।
संक्षेप में -
पुस्तक से कुछ उद्धरण -
" वह हर इंसान सम्मान के योग्य है जो अपना कार्य
ज़िम्मेदारी और ईमानदारी से कर रहा है भले ही आपको उससे कोई
व्यक्तिगत फायदा न हो, इसकी परिणति ऐसे होती है कि सम्मान की
चाह में अन्य लोग भी ज़िम्मेदारी से अपना काम करने को प्रेरित होते हैं"
"अपने संसाधनो / धन / समय का एक हिस्सा परोपकार मे जरूर
लगाएँ, आपकी आय कम हो या ज्यादा उसमे दूसरों के लिए कुछ
कर पाने की गुंजाइश जरूर रखें, ये न हो कि पूरा वक़्त तथाकथित
अपनों के लिए चीजें और सुरक्षा खरीदने मे या उसकी तैयारी में लगा
दिया, एक-एक दिन को सार्थक करें, जिसमे व्यायाम, अध्ययन, और
जरूरतमन्द की मदद जरूर से शामिल हों, आप कितना भी वंचित
महसूस कर लें, ऐसे लोग भी हैं जो आपसे भी ज्यादा वंचित हैं, उनके
लिए कुछ काम करके, एक जरूरी उदाहरण बनें।"
"जब जीवन मे कोई उद्देश्य न दिखे तब एक काम किया जा सकता है,
है, जरूरतमन्द लोगों की निस्वार्थ सेवा, उनमे सबसे ऊपर जिस बात को
मैं रखता हूँ, वह है लोगों को शिक्षित करना, उन्हे लोगों की तकलीफों
को लेकर संवेदित करना, उनकी समझ पर काम करना, उन्हे मेहनत,
उत्कृष्टता और हुनर के लिए तैयार करना, उन तक बड़े बड़े लोगों की
जीवनियाँ और प्रेरक प्रसंग पहुंचाना, उन तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाना"
"सबसे बड़ा पाप अन्याय को देखकर भी चुप रहना है।"
- महात्मा गांधी
"जो इंसान अपनी समझ और आकांक्षाएं साझा नहीं करना चाहता वो
समाज से अपनी सहूलियत की दिशा की अपेक्षा कैसे कर सकता है! बिना
किसी पूर्वाग्रह के और बिना इस बात की चिंता किए कि लोग मेरे बारे में
क्या सोचेंगे बेधड़क होकर अपनी बात रखिए और दूसरों को भी हिम्मत
दीजिए, जो कुछ महसूस कर रहें उसे सामने व्यक्त करने का |
आपका एक लाइन का इनपुट भी मायने रखता है।"
#opinion_matters
"एक उपाय बाहर के प्रभाव को न्यूट्रल करने का, वह है अपने घर मे
अपनी क्षमता में एक पुस्तकालय का निर्माण करना जिसमे देश दुनिया
का उत्कृष्ट साहित्य हो और हो जीवनियाँ दुनिया के महान लोगों की,
जिन्होने आजादी और गरिमा के लिए जीवन भर संघर्ष किया, और
दुनिया को एक बेहतर जगह बनाया, अपने जीवन मे उत्कृष्ट कार्य करके
आनंद प्राप्त किया, ईमानदारी, बहादुरी और करुणा का जीवन जिया,
ताकि बच्चों को जीवन के लिए सही आदर्श मिल सकें |"
उक्त पुस्तक निम्नलिखित लिंक से क्रय की जा सकती है :- https://notionpress.com/in/read/antas
विशाल चन्द @reading_owl.3
https://www.facebook.com/vishal.chandji
https://www.instagram.com/reading_owl.3
विशाल चन्द जी समाजशास्त्र के शोधार्थी, पाठक और संवेदनशील शिक्षार्थी हैं। नवीन ज्ञान अर्जन और सतत सीखना आपके व्यक्तित्व का अभिन्न हिस्सा है। पुस्तकों का पठन और संग्रहण आपको विशेष प्रिय है।
आपके भीतर एक घुमक्कड़ चेतना भी सक्रिय है, जो आपको नए लोगों, स्थानों और अनुभवों से जोड़ती रहती है। बागवानी आपके लिए प्रकृति से संवाद का माध्यम है।
आप समाज को अपने स्वतंत्र दृष्टिकोण से देखने और विभिन्न समूहों के साथ मिलकर सामाजिक दायित्वों के निर्वहन को निरंतर प्रयासरत रहते हैं।
जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना आपके जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट ।
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बीते रविवार (03-05-2026) हम सबके सामूहिक प्रयास और वरिष्ठजनों के प्रोत्साहन से नौवीं साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा का ऑनलाइन आयोजन सफल रहा, जिसमें निम्नलिखित पुस्तकों/रचनाओं/विषयों पर सार्थक चर्चा हुयी:
कबिरा सोई पीर है (उपन्यास) - प्रतिभा कटियार (लोकभारती प्रकाशन, लेखिका अजीम प्रेमजी फाउंडेशन की कार्यकर्ता हैं)
स्मारिका - उमेश डोभाल स्मृति ट्रस्ट
अब पहुंची हो तुम (कविता संग्रह) - महेश चन्द्र पुनेठा
मुसाफिर कैफे - दिव्य प्रकाश दुबे
खाकी में इंसान - अशोक कुमार साथ में लोकेश ओहरी
नचिकेता - महेश चन्द्र पुनेठा


उक्त परिचर्चा में निम्नलिखित पुस्तकसाथी शामिल रहे:
आदरणीय महेश चन्द्र पुनेठा सर, हिमांशु जोशी जी, आकाश कश्यप, कृष्णा जायसवाल, गुंजन त्यागी मैम, प्रिया शर्मा, अमितेन्द्र सिंह, सौम्या मैम, कपिल देव, अंशुल पाण्डेय, सौम्या वर्मा, प्रिया, लक्ष्मण जोशी, उर्मिला, सिद्धार्थ यादव, विजय कुमार, ममता, गायत्री जायसवाल, अरुण मौर्या और लवकुश|


पुस्तक परिचर्चा मे शामिल सभी पुस्तक साथियों (Bookmates) ने पुस्तक परिचर्चा मे शामिल होकर/अभिव्यक्ति/सराहना/भागीदारी के माध्यम से इस पहल को पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा देने में, मानवीय मूल्यों के पोषण में, अपनी बात को बेहिचक रखने में महत्वपूर्ण माना एवं एक दूसरे के प्रति आभार व्यक्त किया ताकि इस जरूरी कार्य की नियमितता बनी रहे एवं समाज मे एक सकारात्मक बदलाव में अपना विनम्र योगदान सुनिश्चित किया जा सके |
धन्यवाद ज्ञापन के साथ परिचर्चा के संचालक लवकुश कुमार ने परिचर्चा को अगली परिचर्चा तक के लिए विराम दिया |
इस आशा के साथ कि यह रिपोर्ट पाठकों को पुस्तक परिचर्चा को समझने और उसमे शामिल होने के लिए प्रेरित करेगी |
अगली परिचर्चा 10 मई, रविवार रात 09 बजे होगी, शामिल होकर पढ़ने-लिखने की संस्कृति पर काम करने में अपना योगदान सुनिश्चित करें और पुस्तक परिचर्चा से साहित्यिक लाभ लेते हुये अपने दिन की सार्थकता में एक और आयाम जोड़ें|
धन्यवाद
-लवकुश कुमार
माँ पर कविता (mother's day)
(अतुकांत कविता)
----------
हम सब हैं तुम्हारी रचना ,
तुम पर क्या रचे हम माँ!
न शब्द ,न शास्त्र, न लेखनी कोई,
जो तुम्हें परिभाषित कर सके माँ ।
ऐसी दीया जो खुद जलकर ,
हमे रौशन करती हो माँ.
आकांक्षा आसमान से ऊंचा,
ममता तेरी पृथ्वी से भारी है माँ.
गर्मी में सघन साया बन जाती,
जाड़े की नर्म धूप हो माँ.
तेरे स्नेह रसधार के आगे,
सागर भी 'कूप' दिखता है माँ .
कलेजे के टुकड़े को अपनी मौत तक ,
कलेजे से लगाए रखती हो माँ.
चोट हमें जब-जब लगती ,
घायल तुम होती हो माँ.
ईश्वर प्रार्थना सुने
न सुने ,
बिन बताए इच्छा पूरी करती हो माँ .
प्रभु क्षमा करें ना करें, तुम हर खता माफ करती हो माँ .
परमात्मा नतमस्तक तेरे आगे,
उन्हें भी तो, तुम पाली हो माँ ,
मौत के लाख बहाने होते,
जन्म के लिए सिर्फ तुम ही हो माँ.
हर मुश्किल में साथ निभाती,
निस्वार्थ प्रेम की मिसाल हो माँ .
इंसान के रूप में ही नहीं,
प्राणी मात्र के लिए देवी हो माँ.
संसार का नजारा बहुत प्यारा होता,
काश!' किस्मत की लेखनी' पा जाती माँ. परमात्मा ने भी यही कहा है,
उनकी सर्वश्रेष्ठ कृति तुमही हो माँ.
बच्चों के लिए हर पल बेचैन रहती,
चैन की नींद, चिता पर सोती है माँ.
फौजी देश पर कुर्बान होते,
प्रथम कुर्बानी देती है माँ.
"मदर्स डे"क्या मनाना!
हर क्षण तुम्हारे नाम है माँ.
सुषमा सिन्हा
वाराणसी
मोबाईल 9369998405
पुस्तक परिचर्चा में केवल पुस्तकों पर ही बात नहीं होती, इसमें पुस्तकों के महत्व पर भी बात होती है और एक मंच को निरंतरता मिलती है कि कल कोई जुझारू युवा जुड़े और इस मुहिम को और आगे तक ले जाए।
शुभकामनाएं
लवकुश कुमार
पुस्तक का नाम – अनारको के आठ दिन
लेखक - सत्यु
"अनारको का बहुत बहुत मन था कि पापा से कहे. पापा एक सवाल और पूछूं? और फिर पूछे कि आप जब भी कोई चीज जानते नहीं तो यह क्यों कह देते हैं कि उल्टा सवाल मत कर|"
प्रस्तुत पुस्तक में इसी प्रकार से बच्चों के सवालों, उनकी जिज्ञासाओं के उठने, अपने आसपास के माहौल को देखने, चल रही प्रक्रियाओं के कारण को समझने से जुड़े अनुभवों और बच्चों के इन व्यवहारों पर माता-पिता, विद्यालय और समाज की प्रतिक्रियाओं को बड़े ही सुन्दर तरीके व्यक्त किया गया है।
इस पूरे कथानक की नायिका अनारको है जो हर बात को जानने को जिज्ञासु है। लेखक ने कथानक को कुछ इस तरह बुना है कि अधिकतर बातें अनारको के सपनों में पूरी हो जाती हैं जो अलग-अलग दिनों में घटित होते हैं।
पहले दिन में उससे कहा जाता है कि लोटे में पानी लेकर ठाकुर जी को चढ़ा आओ तो वह सवाल करती है कि ठाकुर जी को पानी चढ़ाना या उन्हें खुश करना क्यों जरुरी है? फिर दादी के बताने पर कि ठाकुर जी तो पेड़ पौधे, कंकर पत्थर में हर जगह हैं, वह तर्क रखती है तो क्या मैं ये पानी बाहर भिंडी के पौधे में डाल दूँ।
दूसरे दिन में स्कूल की प्रक्रियाओं पर मछलियों की एक सभा द्वारा सवाल उठाये गए हैं जो बच्चों को मशीनीकृत वातावरण या अनुशासन के नाम पर दंडात्मक विधानों, कई तरह की बंदिशें लगाये जाने की ओर उन्मुख करते हैं। कई विद्यालयों में भी ऐसी बातें दिख जाती हैं नहीं अनुशासन के नाम पर बच्चों को बोलने की आजादी नहीं दी जाती। सवाल पूछने वाले बच्चों को अक्सर डांट मिल जाती है या उनके सवालों को टाल दिया जाता है। ऐसे ही एक विद्यालय में बच्चों से बातचीत के दौरान उनका बोलना ऐसे हो रहा था जैसे वे किसी खेल में बोल रहे हों और उनकी बात दूसरा सुन नहीं सके। "जबकि मध्यावकाश में उनकी आवाज में जबरदस्त तेजी देखने को मिली|
बच्चे हां या ना बोलने में सकुचा रहे थे। पूरी कक्षा एक दम शांत-शांत थी।"
तीसरे दिन में सामाजिक ताने-बाने और "पर उपदेश कुशल बहुतेरे" की समस्या दिखाई गई है जिसमें पितृसत्तात्मक परिवारों में जेंडर आधारित भेदभाव पर तंज कसा गया है। अनारको घर से भाग रही है तो गोलू के पापा उसे कहते हैं कि अपनी मौसी को भेज देना, नल आ रहा है, पानी भर ले आकर, जबकि वे खुद नल के पास में ही लेटे हुए हैं, लेकिन पानी भरना या घर से जुड़े काम तो केवल महिलाएं ही करेंगी, वे उठकर पानी नहीं भर सकते।
हमारे समाज में जेंडर आधारित भेदभाव एक बड़ी समस्या है, जिसमें समाज ने लिंग के आधार पर कामों का बंटवारा कर दिया है। कामाने घर से बाहर सिर्फ पुरुष ही जाएंगे और घर के कामों को महिलाएं ही करेंगी, ऐसी सोच और व्यवस्था हमारी सामाजिक और आर्थिक उन्नति के लिए बाधक है। साथ ही ऐसे लोगों की भी कमी नहीं जो खुद भले ही गलत व्यवहार करें लेकिन दूसरों को उपदेश देने में कोई कसर नहीं छोड़ते।
चौथे दिन के सपने के माध्यम से विभिन्न सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक मुद्दों पर बात की गयी है। हमारे समाज में अमीर-गरीब और ऊँच-नीच की जो खाई है वह समाज के लिए घातक है, इस पर बात की गयी है|
लेखक के ही शब्दों में अनारको ने देखा "जो ज्यादा अच्छे कपड़े पहने था वह ज्यादा बदमाशी कर रहा था।"
अनारको ने बहुत से लोगों ऐसे देखे थे। ऐसे- सब उन जैसे लगते थे जो गर्मी की दोपहर में कहीं से आकर घर के बाहर बैठे रहते थे और जब अनारको उनको पीने के लिए गिलास भरकर पानी देने जाती तो हमेशा मुँह के पास हाथ ले जाकर कहते 'डाल दो गुड़िया' कभी गिलास को हाथ में नहीं लेते।
पांचवें दिन में शिक्षा के उद्देश्य और आकलन को बेहतर तरीके से समझाया गया है। मम्मी के ये कहने पर कि पास होकर अच्छी नौकरी की जा सकती है तो अनारको कहती है कि ये काम तो मैं फेल होकर भी कर सकती हूँ। और यह कौन तय करता है कि कौन पास होगा और कौन फेल और यह तय करना जरुरी क्यों है? साथ ही आकलन के लिए अपनाई जाने वाली प्रक्रियाएं क्या समझने में ठीक तरह से मदद कर पाती हैं कि किसने क्या सीखा?
छठवें दिन में भूतों को लेकर समाज में व्याप्त अंधविश्वासों और बच्चों पर इनके प्रभाव को दर्शाया गया है। पहाड़ी सन्दर्भ में तो यह समस्या और बड़ी है। यहाँ तो बच्चे ढेरों ऐसी कहानियाँ जानते हैं जो भूतों के बारे में हैं। अमूमन इस अवधारणा की शुरुआत बाल्यकाल में ही हो जाती है। पालन पोषण के दौरान बच्चों को अलग-अलग तरीके से भय दिखाया जाना हमारी परम्पराओं में शामिल रहा है। जैसे शाम हो गयी, बाहर न जाना, नहीं तो भूत पकड़ ले जायेगा| इन बातों का बच्चों पर बहुत प्रभाव पड़ता है।
सातवें दिन में भी बहुत ही संवेदनशील बात को उकेरा गया है। बच्चों को अक्सर प्रदर्शन की वस्तु मान लिया जाता है। जैसे घर में कोई मेहमान आया तो बच्चों से कहा जाता है कि पोयम सुनाओ, डांस करो आदि। इस दिन प्रधानमंत्री आने वाले हैं तो सब लगे हैं उनकी आवभगत के लिए। घंटों के लिए सड़कों पर रास्ते बंद कर दिए जाते हैं और लोगों को कितनी परेशानी झेलनी पड़ती है।
आठवें दिन में किसी नई वस्तु के बारे में बच्चों की जिज्ञासा किस कदर बढ़ जाती है, वे वस्तु विशेष के बारे में जानने के लिए कई तरह के यत्न करते हैं। यह बात पुस्तकों के बारे में बहुत अच्छे से लागू होती है। कोई पुस्तक जब बच्चे को अच्छी लग जाए तो वह उसे पढ़े बिना नहीं रहेगा। लेकिन इसके लिए जरुरी है बच्चों को किताबों में रूचि पैदा की जा सके।
अनारको के आठ दिन पुस्तक बच्चों के व्यवहार, उनके कल्पना संसार, उनकी जिज्ञासाओं तथा हमारे कौन से व्यवहार बच्चों को पसंद नहीं आते, यह समझने के लिए बहुत ही उपयुक्त है।
-अंकित
अंकित मिश्रा जी हिन्दी विषय के विद्यार्थी हैं| उनका काम कक्षा- कक्ष में ऐसे हिन्दी शिक्षण को लेकर उन्मुख है जिसमें भाषाई कौशलों की सर्वोत्तम स्थिति बच्चों को हासिल कराई जा सके| उन्हें सम- सामयिक विषयों पर कविताएँ लिखना भी पसंद है|
इसी पुस्तक पर कुछ टिप्पणियां:- यहाँ क्लिक करें
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शुभकामनाएं
मुख्य पात्र - अनारको
पुस्तक में बच्चों के सवालों और व्यवहारों को किस प्रकार से प्रस्तुत किया गया है?
पुस्तक में बच्चों की जिज्ञासाओं, उनके आसपास की दुनिया को समझने की कोशिशों, और माता-पिता, विद्यालय और समाज की प्रतिक्रियाओं को सुंदर तरीके से व्यक्त किया गया है। बच्चों के अनुभवों और उनके व्यवहारों को समझने में मदद मिलती है।
पुस्तक में जेंडर आधारित भेदभाव को किस प्रकार दर्शाया गया है?
पुस्तक में जेंडर आधारित भेदभाव को दर्शाने के लिए, अनारको के परिवार की घटनाओं और बातचीत का उपयोग किया गया है। इसमें दिखाया गया है कि कैसे घर के कामों को महिलाओं के लिए निर्धारित किया जाता है, जबकि पुरुष इससे दूर रहते हैं। यह समाज में मौजूद लैंगिक असमानता को उजागर करता है।
बच्चों पर अंधविश्वासों का क्या प्रभाव पड़ता है?
अंधविश्वास बच्चों के मन में डर और अनिश्चितता पैदा करते हैं। वे उन्हें दुनिया को एक डरावनी जगह के रूप में देखने के लिए प्रेरित कर सकते हैं, जहाँ हर चीज का जवाब नहीं है। इससे बच्चों में आत्मविश्वास की कमी और दूसरों पर निर्भरता की भावना भी आ सकती है। अंधविश्वास बच्चों को गलत जानकारी पर विश्वास करने और तर्कसंगत सोच से दूर रहने के लिए भी प्रोत्साहित कर सकते हैं।
बच्चों को शिक्षा में कैसे रुचि पैदा की जा सकती है?
बच्चों को शिक्षा में रुचि पैदा करने के लिए कई तरीके हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि शिक्षा को बच्चों के लिए मजेदार और मनोरंजक बनाया जाए। इसके लिए, शिक्षकों को बच्चों की रुचियों और जरूरतों को ध्यान में रखना चाहिए। उन्हें खेल, कहानियों, और अन्य रचनात्मक गतिविधियों का उपयोग करना चाहिए।
इसके अतिरिक्त, माता-पिता को भी बच्चों को शिक्षा के प्रति प्रोत्साहित करना चाहिए। उन्हें बच्चों को पढ़ने और सीखने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए, और उनके सवालों का जवाब देना चाहिए। माता-पिता को बच्चों के स्कूल के काम में भी रुचि लेनी चाहिए और उनकी सफलता में मदद करनी चाहिए।
बच्चों को प्रदर्शन की वस्तु मानने से क्या नकारात्मक प्रभाव पड़ते हैं?
बच्चों को प्रदर्शन की वस्तु मानना उनके आत्म-सम्मान और विकास के लिए हानिकारक हो सकता है। इससे उन्हें ऐसा महसूस हो सकता है कि उन्हें प्यार और स्वीकृति पाने के लिए प्रदर्शन करना होगा। इससे उनमें आत्मविश्वास की कमी, सामाजिक चिंता और दूसरों को खुश करने की निरंतर आवश्यकता भी पैदा हो सकती है।
इसके अतिरिक्त, बच्चों को प्रदर्शन की वस्तु मानने से उनकी रचनात्मकता और जिज्ञासा भी कम हो सकती है। वे डर सकते हैं कि अगर वे गलतियाँ करते हैं तो उन्हें डांटा जाएगा, इसलिए वे नए विचारों और अनुभवों से डरेंगे।
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शुभकामनाएं
2013 में मैंने प्रवेश परीक्षा उत्तीर्ण करके बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया और फिर 2016 में आईआई टी दिल्ली, इन पड़ाव का प्रभाव, मेरे परिचितों पर पड़ा और परिणामतः कई लोगों ने अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए मुझसे सलाह ली
जिन्होने नहीं पूछा तो उनको मैंने बिना पूछे ही "तरीके" पर सुनने का आग्रह किया लेकिन अधिकतर ने नजरंदाज करके सीधे किताब, कोचिंग या स्कूल के नाम पर फोकस किया क्योंकि उनके मन में था कि "पढ़ तो उनका बच्चा लेगा ही बस किताब/कोचिंग का नाम पता चल जाएगा"
बदलाव कुछ खास नहीं रहे, क्योंकि मेरी बताई किताब तो कई बार खरीद ली गयी, मेरी बताई गयी कोचिंग मे प्रवेश भी ले लिया गया लेकिन कितना कुछ सीखा जा सका, इस पर कोई बात न हुयी, बात हुयी तो सीधे रिज़ल्ट आने पर|
इसीलिए जब भी किसी से पढ़ाई पर बात करें तो उस चर्चा में तरीके को समुचित स्थान दें |
शुभकामनाएँ
-लवकुश
बीते रविवार (26-04-2026) हम सबके सामूहिक प्रयास और आदरणीय महेश चन्द्र पुनेठा सर के प्रोत्साहन से आठवीं साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा का ऑनलाइन आयोजन सफल रहा, जिसमें निम्नलिखित पुस्तकों/रचनाओं/विषयों पर सार्थक चर्चा हुयी:
सर्जनात्मक शिक्षा – डॉ राघव प्रकाश एवं डॉ सविता पालीवाल
बाघेन – नवीन जोशी
जीव जंतुओं की विचित्र आदतें और प्रवृत्तियाँ - राजेंद्र कुमार राजीव
अविज्ञान – नरेंद्र कोहली
आषाढ़ का एक दिन – मोहन राकेश
प्रफुल्ल चन्द्र राय – पं श्रीराम शर्मा आचार्य
देवेंद्र मेवाड़ी के नाट्य साहित्य में बाल मनोविज्ञान (शोधपत्र)
तुम तो अच्छे मुसलमान थे रहमान
कमरुनिशा का कटोरदान




उक्त परिचर्चा में निम्नलिखित पुस्तकसाथी शामिल रहे:
आदरणीय महेश चन्द्र पुनेठा सर, हर्षा भंडारी मैम, कृष्णकांन्त वर्मा,आरती मैम, अंकित मिश्रा सर, गुंजन त्यागी मैम, नंदेश्वर, अमितेन्द्र सिंह, सौम्या मैम, सचिन सिंह, अंशुल, शोभित, प्रिया, दिव्याशु, लक्ष्मण जोशी, प्रिया जायसवाल, उर्मिला, सिद्धार्थ यादव, अरुण मौर्या और लवकुश|
पुस्तक परिचर्चा मे शामिल सभी पुस्तक साथियों (Bookmates) ने पुस्तक परिचर्चा मे शामिल होकर/अभिव्यक्ति/सराहना/भागीदारी के माध्यम से इस पहल को पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा देने में, मानवीय मूल्यों के पोषण में, अपनी बात को बेहिचक रखने में महत्वपूर्ण माना एवं एक दूसरे के प्रति आभार व्यक्त किया ताकि इस जरूरी कार्य की नियमितता बनी रहे एवं समाज मे एक सकारात्मक बदलाव में अपना विनम्र योगदान सुनिश्चित किया जा सके |
धन्यवाद ज्ञापन के साथ परिचर्चा के संचालक लवकुश कुमार ने परिचर्चा को अगली परिचर्चा तक के लिए विराम दिया |
इस आशा के साथ कि यह रिपोर्ट पाठकों को पुस्तक परिचर्चा को समझने और उसमे शामिल होने के लिए प्रेरित करेगी |
अगली परिचर्चा 02 मई (रविवार रात 09 बजे) को होगी, शामिल होकर पढ़ने-लिखने की संस्कृति पर काम करने में अपना योगदान सुनिश्चित करें और पुस्तक परिचर्चा से साहित्यिक लाभ लेते हुये अपने दिन की सार्थकता में एक और आयाम जोड़ें|
धन्यवाद
-लवकुश कुमार
एक गायक की भूमिका
एक गायक सिर्फ सुरों, बोल, भावनाओं और हृदय के उद्गारों का संवाहक नहीं होता, वह लोगों की ज़िंदगी का हिस्सा बन जाता है और साथ मे होता है संगीत|
उसकी आवाज़ में वो ताकत होती है जो बिना भौतिक स्पर्श दिल को छू ले।
जब इंसान खुश होता है तो संगीत और गीत जश्न बन जाते हैं और जब निराश हो तो वही गाने मरहम बनकर दर्द कम कर देते हैं, आशा और उत्साह जगा देते हैं|
गायक और गीतकार हमारे जज़्बातों की ज़ुबान होते हैं, जो बात हम कह नहीं पाते, वही बात एक गीतकार, गायक की आवाज के माध्यम से एक गाने में कह जाता है। मानवीय प्रेम और जुड़ाव की पहली धड़कन से लेकर जुदाई/अलगाव के आँसू तक, हर लम्हे का साथी बन सकता है एक गीत|
सफर में, अकेलेपन में, त्यौहार में - गायक की आवाज़ और संगीतकर का संगीत हमारे साथ चलते हैं और यादें बना देते हैं|
समाज में भी गायक का बड़ा योगदान होता है, वह अपनी आवाज़ से संस्कृति को जिंदा रखता है लोकगीतों और भजनों को नई पीढ़ी तक पहुँचाता है। कई बार उसके गाने हिम्मत देते हैं, एकता का संदेश देते हैं और भाग-दौड़ भरी ज़िंदगी में कुछ सुकून दे जाते हैं।
ये, वह काम है जो कम लोग कर पाते हैं - दर्द में संबल देना और खामोशी को आवाज़ दे देना। इसीलिए एक सच्चा गायक सिर्फ स्टेज पर नहीं गाता, वो लाखों लोगों के दिल में बस जाता है।
जैसे: अरिजीत सिंह, किशोर कुमार, भारत रत्न लता मंगेशकर जी सहित अनेक गायकों ने अपनी आवाज़ से कई दशकों तक देश को जोड़ा।
गायक वह क्षमता रखता रखता है जो सुरों से दिलों को जोड़ दे। खुशी में जश्न, गम में मरहम और यादों में साथी बन जाए। वह अपनी आवाज़ और गीतकार के लिखे बोल से वह बात कह देता है जो हम अपने लफ्ज़ों से नहीं कह पाते। इसीलिए गायक सिर्फ कलाकार नहीं, हमारी रोज़ की ज़िंदगी का सुकून होता है।
संगीत हमारी संस्कृति, देश की पहचान को बनाए रखता है। अच्छा संगीत और मनमोहक बोल हमें हमारे अंदर की विराटता और सूक्ष्म विश्लेषण से परिचित करवाते हैं|
इसीलिए यदि आप भी अपने काम से लोगों को सुकून और उम्मीद देना चाहें तो संगीतकार। गायक या गीतकार बनने के बारे में विचार किया जा सकता है|
उदाहरण चाहिए तो बस एक लाइन लिखिए वेब सर्च में, अपनी जरूरत के अनुसार, "जीवन पर आधारित कुछ बेहतरीन गाने", फिर आएगी एक सूची जिसके गाने सुनने पर मिल सकता है समाधान आपकी दुविधाओं को और चैन आपके बेचैन मन को |
कुछ गाने ये भी "एक दिन बिक जाएगा माटी के मोल" और "जिंदगी एक सफर है सुहाना" आदि
शुभकामनाएं
- प्रिया
बरेली, उत्तर प्रदेश
प्रिया जी स्नातक की विद्यार्थी हैं और सिविल सेवाओं की परीक्षा के लिए खुद को तैयार कर रही हैं|
आप कविताओं द्वारा स्वयं के विचारों और भावनाओं को व्यक्त करती हैं | समाज मे आपकी गहरी रुचि है और लोगों की मदद करने मे आपको एक अनोखी अनुभूति महसूस होती है, जो आपको और बेहतर करने को प्रेरित करती है|
इस बाबत कवि भवानी प्रसाद मिश्र जी की कुछ पंक्तियाँ याद आती हैं :
कुछ लिख के सो,
कुछ पढ़ के सो,
तू जिस जगह जागा सवेरे,
उस जगह से बढ़ के सो"
नए कवियों को निर्देशित करती वरिष्ठ कवि महेश चन्द्र पुनेठा जी की कविता, "पहली कोशिश" भी प्रासंगिक है:
मैं न लिख पाऊँ एक अच्छी कविता
दुनिया एक इंच इधर से उधर नहीं होगी
गर मैं न जी पाऊँ कविता
दुनिया में अंधेरा कुछ और बढ़ जाएगा
इसलिए मेरी पहली कोशिश है
कि मरने न पाए मेरे भीतर की कविता।
अगर आपके पास भी कुछ ऐसा है जो लोगों के साथ साझा करने का मन हो तो हमे लिख भेजें नीचे दिए गए लिंक से टाइप करके या फिर हाथ से लिखकर पेज का फोटो Lovekushchetna@gmail.com पर ईमेल कर दें
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शुभकामनाएं

"अंतस - जरा ठहरिए"
लेखक - लवकुश कुमार
प्रकाशक - नोशन (Notion) प्रेस चेन्नई
"अंतस - जरा ठहरिए" लवकुश कुमार जी द्वारा लिखी गई पहली साहित्यिक पुस्तक है,जो हॉल ही में प्रकाशित हुई है।
यह सरल शब्दों में जीवन मूल्यों की तरफ़ पाठक का ध्यान खींचती है। जो बहुत ही संवेदनशील तरीके से लिखी गई है।
जो किसी क्षेत्र या किसी एक विषय के बारे में भले ही आपको पूर्ण ज्ञान न दे सकें। लेकिन आम जीवन में छोटी छोटी चीजों का क्या महत्व है, उस ओर आपको जरा देर खींचकर रोक देती है।
बहुत सामान्य से विषय है,जहां सूक्ष्म चीजों को लेकर उन्होंने अपना लेखन किया है। एक तरह से यह पुस्तक मन में उठते तूफान को शांत कर देती है, खुद के लिए अपराधबोध, समाज के लिए ईर्ष्या,खुद के ही आगे बढ़ने की लालसा को ठहर कर सोचने को कहती है। उनका मुख्य चिंतन समाज के लिए है जो यह कहते हैं कि अपनी एक जिम्मेदारी समाज के लिए भी रखो।अपनी जिंदगी में इतने परेशान रहने की जरूरत नहीं है, किसी जरूरत मंद इंसान की मदद करो वह किसी भी तरह से की जा सकती है। दूसरों की मदद करने से बड़ा कोई सुख नहीं है।
आज जब जिंदगी बहुत तेजी से भाग रही है, आए दिन तरह-तरह की घटनाएं हमें सुनाई देती है, जब मानव सभ्यता को एक अलग दिशा में प्रवाहित किया जा रहा है।मनुष्य के लालच और भोग विलास को ही जीवन का उद्देश्य मान लिया गया है, ऐसे में लवकुश जी बहुत से उदाहरण देकर जीवन का उद्देश्य समझाते है।
जब मनुष्य, मनुष्य होने के नाते कुछ न कर पाने के अपराधबोध से खुद को दबाएं हुए है, ऐसे में आज के वातावरण का सूक्ष्म अवलोकन के लिए मानो कोई जगह ही नहीं रह गई है और परिणामतः हम कोई कार्य इसलिए नहीं कर रहे कि उससे हमें आनंद की प्राप्ति हो।
जीवन के मूलभूत पहलुओं में यह किताब एक मनुष्य को स्पष्टता देती है कि अभी कुछ भी नहीं छूटा, एक तसल्ली देती है कि अभी कुछ भी नहीं बिगड़ा,अगर किसी कारण से पढ़ाई छूट गई या कुछ परिस्थिति बदल गई तो उसका विकल्प फिर से शुरू करना है न कि आत्मघाती कदम उठा लेना|
जीवन की बारीकियों को समझाती हुई यह पुस्तक जीवन की खूबसूरती से पाठक का परिचय कराती है। वह स्पष्ट रूप से कहते हैं कि यह पुस्तक उनके द्वारा दुनिया और स्वयं को देखे और समझे जाने का प्रतिफल है।
यह पुस्तक पाठक के दिमाग में बहुत प्रभाव डालती है। मुझे स्वयं इसे पढ़ते हुए लग रहा था कि हां मुझे भी जरूरत थी इस तरह की पुस्तक की, जो आपको प्रेरित करें, लिखने को ,पढ़ने को अपने विचार खुल कर रखने को,अपनी असहमति दर्ज करने को और सामने वाले की बातों का सम्मान करने के लिए।
- शीतल
शीतल जी, उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के एक दूरस्थ पहाड़ी गांव भट्टयूडा से आती हैं। आपने अपना परास्नातक, भूगोल विषय में लक्ष्मण सिंह मेहर कैंपस पिथौरागढ़ से किया है। आप सामाजिक खांचों में फिट नहीं होना चाहती, इसे इस परिप्रेक्ष्य मे देखें कि आप हर वह रिवाज नकारना चाहती हैं जो आपको एक लड़की होने का हवाला देकर कम आंकते हो।
किताबें संवेदनशील ,सामाजिक ,निर्भय और वैज्ञानिक चेतना देती हैं, अतः किताबें पढ़ना, नया जानते रहकर अपनी समझ को विस्तार देते रहना आपकी आदत मे शुमार है। आपको फिल्में देखना पसंद है, और घूमना भी। भूगोल आपको अपनी ओर खींचती है साथ ही नए और रचनात्मक लोगों के साथ बात करने और उनके बारे में जानने को उत्सुक रहती हैं |
उक्त पुस्तक निम्नलिखित लिंक से क्रय की जा सकती है :- https://notionpress.com/in/read/antas
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