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संस्मरण ताकि मेरे पाठक नुकसान से बच सकें:
साल 2025 की पूर्वार्ध की बात है मैं एक व्यस्त तिराहे की तरफ बढ़ रहा था अपनी मोटरसाइकल पर, मै तिराहे पर पहुँचने से पहले देखता हूँ की जिस सड़क को मैं जॉइन करने की तरफ बढ़ रहा हूँ उस पर एक युवक स्कूटी से आ रहा है और उसके पीछे वाली सीट पर भी एक सवारी है, मेरा ध्यान गया की स्कूटी का ड्राईवर तो सामने देखने के बजाय अपनी दायीं तरफ को कुछ देख रहा है|
मुझे अनुमान लगा की तिराहे पर पहुँचते ही वह और मैं संभवतः एक ही पास पहुँचने वाले हैं अतः टक्कर होने के संभावना है, अतः मैंने कई बार हॉर्न बजाया, लेकिन उस व्यस्त सड़क में वह हॉर्न उसके लिए महज एक शोर था वह अपने दायें देखता रहा और उसकी स्कूटी आगे बढ़ती रही और मेरी मोटर साइकल भी, और मेरी बाइक का हॉर्न भी बीच बीच बजता रहा और इतने ही समय में दोनों गड़ीं टक्कर की नौबत में आ गईं और तब जाकर मुझे भी लगा कि ब्रेक लेना है और उसने भी देखा की बाइक आ रही है लेफ्ट से हम दोनों ने ब्रेक लिए उसने मेरी बाइक को लेफ्ट से टक्कर मारी हम तीनों गिरे (1+2) मैंने गिरते वक़्त अपने बाहर रखे बाइक से और पूरी तरह गिरने से बचने के लिए बायाँ हांथ जमीन पर टिकाया|
दोनों गाडियाँ उठाई गईं, एक दो बातों का आदान प्रदान हुआ, मैंने कहा कि पहले तो सामने के बजाय दायें देख रहे थे और दूसरा हॉर्न भी नहीं सुना
उसके पीछे बैठे साथी ने कहा कि तुम क्यों नहीं रुक गए हमे देखकर, मैंने डांटते हुये कहा कि एक तो लापरवाही से चल रहे ऊपर से मुझे ही दोष दे रहे| हम सभी अपने अपने रास्ते गए, कुछ दिन तक कलाई का दर्द कम न हुआ तो एक्स रे करवाया और पता चला की कलाई मे मामूली फ्रेक्चर है लेकिन प्लास्टर लगना बहुत जरूरी |
उस दिन समझ आया कि दूसरे तो दायें भी देखेंगे और हैडफोन पर गाने भी सुनेंगे ड्राइव करते वक़्त और हो सकता है कि गुस्से या शराब के नशे में हों, अपनी सुरक्षा के लिए हॉर्न बजाने के साथ रुक जाना और उसके निकाल जाने का इंतज़ार करना ही ठीक है अगर गुंजाइश है, क्योंकि हॉर्न तो बहुतों के लिए महज एक शोर है|
काश मुझे ये बात पहले किसी ने बताई होती, खैर मै आपको बता रहा हूँ|
कुछ और बातें खासकर पहाड़ पर ड्राइविंग की फिर कभी
शुभकामनायें
लवकुश
जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना आपके जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट ।
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हम इतने सभ्य हो चुके हैं,
इतने सभ्य कि अब इंसान इंसान को देखकर मुस्कुराना भूल रहा है,
और कुछ यूं हुआ है
चारों तरफ उजाला है, पर अधिकतर अपनी अपनी स्क्रीन के अंधेरे में डूबे हुए हैं।
अंगूठे चल रहे हैं लगातार......
लाइक शेयर और स्क्रोल की अंधी दौड़ में, हम औंधे मुंह व्यस्त हैं फोन चलाने में,
बिना यह जाने कि .....
सामने बैठी बूढ़ी आंखें बात करना चाहती हैं,
वो अपना बुढ़ापा खोना चाहती हैं,
हमारी खिलती जवानी के साथ,
पर हम रील के पंद्रह सेकंड के क्षणिक सुख में व्यस्त हैं।
रिश्तों के धागे अब वाई-फाई से जुड़ते हैं,
नेटवर्क कमजोर होते ही टूट जाते हैं।
हजारों फ्रेंड्स है वर्चुअल दुनिया में,
पर आधी रात को उदास दिल एक कंधा, दिल की सुनने वाला एक इंसान ढूंढने के लिए तरस जाता है।
यहां मशीनें इंसानों की तरह सोच रही है,
और इंसान रोबोट की तरह बिना सोचे जी रहा है।
यह हमारी सबसे बड़ी प्रगति है।
हमने चांद पर कदम रख दिया,
पर जमीन पर अपनों का हाथ छोड़ दिया।
हम चालाक हो गए हैं।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से बात कर लेते हैं,
मगर पड़ोस के घर का हाल नहीं जानते हैं।
हम पत्थरों के दौर से निकल कर कांच और सिलिकॉन के नए पाषाण युग में आ खड़े हुए हैं,
पर उनमें अब कोई आहट नहीं होती है।
यह तरक्की का शिकार है यह संवेदनाओं का पतन?
हमारा चरित्र अब प्रोफाइल पिक्चर करती है,
और हमारी योग्यता.....
लाइक और कॉमेंट्स की गिनती।
- विजयीप्रिया शर्मा
विजयीप्रिया जी स्नातक में मानविकी की छात्रा हैं और सामाजिक विषयों पर लिखती रहती हैं, वह वर्तमान में लखनऊ विश्वविद्यालय में अध्ययनरत हैं और पढ़ने लिखने की संस्कृति को बढ़ाने के लिए प्रयासरत हैं| उनका मानना है कि पढ़ने लिखने वालों को एक मंच पर लाकर हम अपने विचार और जीवन/दुनिया को लेकर अपने अवलोकन ज्यादा से ज्यादा लोगों से साझा कर पाएंगे और इस तरह दुनिया और स्वयं को लेकर एक व्यापक दृष्टिकोण बना पाएंगे, महान लेखिका महादेवी वर्मा जी की रचनाएँ और व्यक्तित्व उन्हे खास पसंद हैं|
जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना आपके जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट ।
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"चेली, अगले रविवार को लोग तुझे देखने आ रहे हैं।"
रसोई में आटा गूँधते हुए माधवी के हाथ एक पल के लिए रुक गए। उसने धीरे से ईजा की ओर देखा। ईजा की नज़रें झुकी हुई थीं, जैसे यह बात कहते हुए वे स्वयं भी भीतर से टूट रही हों।
"लेकिन ईजा... मैं अभी पढ़ना चाहती हूँ।"
ईजा ने बस इतना कहा—"सब ठीक हो जाएगा चेली... शादी के बाद भी पढ़ाई कर लेना।"
माधवी हल्का-सा मुस्कुराई। वह जानती थी कि यह मुस्कान केवल उसके चेहरे पर थी, मन में नहीं।
उस छोटे-से पहाड़ी गाँव में लड़कियों के सपनों की उम्र अक्सर बारहवीं की परीक्षा तक ही मानी जाती थी।
कुछ ही दिन पहले बोर्ड परीक्षा का परिणाम आया था।
"रिजल्ट आ गया?" पड़ोस की चाची ने आँगन से आवाज़ लगाई।
माधवी ने धीरे से सिर झुका दिया।
"एक विषय में रह गई..."
बस इतना सुनना था कि घर का माहौल बदल गया। ईजा (मां) चुप रहीं। बौजू(पिताजी) देर तक कुछ नहीं बोले। लेकिन शाम होते-होते अम्मा की आवाज़ पूरे आँगन में गूँज उठी— "अब पढ़ाई-लिखाई बहुत हो गई। चेली जवान हो गई है। कोई अच्छा लड़का देखो। पढ़-लिखकर कौन-सा कलेक्टर बनना है?"
उस दिन माधवी ने पहली बार महसूस किया कि परीक्षा में असफल होने से भी बड़ा डर उसके सामने खड़ा है—कहीं उसकी शादी तय न कर दी जाए और वही हुआ।
अगले ही सप्ताह दो रिश्तेदार घर आए। उनके हाथ में मिठाई का डिब्बा था और बातों में एक सरकारी नौकरी में कार्यरत लड़के का ज़िक्र। किसी ने माधवी से नहीं पूछा कि वह क्या चाहती है। उससे केवल इतना कहा गया—
"चेली, मेहमानों के लिए चाय बना दे।"
चाय की ट्रे लेकर जब वह कमरे में पहुँची तो उसे लगा जैसे वहाँ उसकी नहीं। उसके भविष्य की कीमत तय की जा रही हो।
रिश्तेदार जाते-जाते बौजू से कह गए— "ऐसे रिश्ते बार-बार नहीं मिलते। फ़ौज में नौकरी है। चेली की ज़िंदगी बन जाएगी।"
अम्मा कई महीनों से एक ही बात दोहराती थीं— "मरने से पहले अपनी पोती का ब्याह अपनी आँखों से देख लूँ, फिर भगवान जब चाहे बुला ले।" बौजू चुप रहते। ईजा की आँखें भर आतीं और माधवी... वह बस सब सुनती रहती।
वह पढ़ना चाहती थी। उसका सपना था कि वह अध्यापिका बने। उसे लगता था कि शिक्षा केवल नौकरी पाने का साधन नहीं बल्कि अपने पैरों पर खड़े होने और अपने जीवन के फैसले स्वयं लेने की ताक़त भी देती है। लेकिन गाँव में आज भी यह मान लिया जाता था कि चेली की सबसे बड़ी मंज़िल उसकी शादी है।
कुछ दिनों बाद बौजू ने धीरे से कहा— "माधवी, लड़का अच्छा है। सरकारी नौकरी करता है। हमें लगता है कि यही ठीक रहेगा।"
माधवी बहुत देर तक खिड़की से पहाड़ों को देखती रही। सामने दूर तक फैले चीड़ और बांज के जंगल हवा के साथ झूम रहे थे। उसे लगा जैसे पहाड़ों के ऊपर उड़ते पक्षी उससे पूछ रहे हों—"क्या सपनों की भी कोई उम्र होती है?"
उसने चाहा कि एक बार कह दे— "मैं अभी शादी नहीं करना चाहती। मैं पढ़ना चाहती हूँ।"लेकिन शब्द गले में ही अटक गए। शायद इसलिए कि वह जानती थी—उसके एक "ना" के सामने अम्मा की आख़िरी इच्छा, ईजा की मजबूरियाँ, बौजू की सामाजिक चिंता और रिश्तेदारों की सलाह खड़ी थी।
धीरे-धीरे शादी की तैयारियाँ शुरू हो गईं। कॉलेज की फीस के लिए जो पैसे उसने बचाकर रखे थे, उन्हीं पैसों से उसके लिए शादी की साड़ी खरीदी गई।
रिश्तेदार आते और कहते— "चेली भाग्यशाली है। फ़ौजी लड़का मिला है।" अब इससे अच्छा रिश्ता कहाँ मिलेगा?
हर कोई उसकी किस्मत की बातें कर रहा था, लेकिन किसी ने उसके सपनों के बारे में नहीं पूछा।
शादी का दिन आ गया। मंडप में मंत्र गूँज रहे थे। अग्नि साक्षी थी। रिश्तेदार मुस्कुरा रहे थे। तभी उसकी दोस्त लक्ष्मी ने पूछा— तू इस विवाह से खुश तो हैं न ?
माधवी ने सामने देखा। अम्मा के चेहरे पर संतोष था।
ईजा की आँखों में आँसू थे।
बौजू के चेहरे पर वर्षों की चिंता उतरती दिखाई दे रही थी।
उसने धीमे से कहा— "हाँ..."
उस एक शब्द के साथ सबके चेहरे खिल उठे। लेकिन किसी ने यह जानने की कोशिश नहीं की कि वह "हाँ" उसकी इच्छा थी या परिस्थितियों के आगे उसका मौन समर्पण।
समय बीत गया।
एक दिन माधवी अपनी छोटी-सी चेली को स्कूल छोड़ने जा रही थी। पहाड़ की वही पगडंडी थी, वही चीड़ के पेड़ और वही सुबह की धूप।
रास्ते में चेली ने मासूमियत से पूछा— "ईजा, मेरी शादी भी आप लोग ही तय करोगे?"
माधवी कुछ पल के लिए ठिठक गई। उसने अपनी चेली का हाथ थामा और मुस्कुराकर कहा— "नहीं चेली। शादी तेरी होगी, इसलिए फैसला भी तेरा होगा। हमारा काम तुझे समझाना होगा, तेरे लिए फैसला लेना नहीं।"
चेली मुस्कुरा दी और आगे दौड़ गई।
माधवी वहीं खड़ी पहाड़ों की ओर देखने लगी। उसे लगा कि उसकी अपनी उड़ान भले ही अधूरी रह गई हो, लेकिन अब उसकी चेली के पंख कोई नहीं काट पाएगा।
शायद बदलाव ऐसे ही शुरू होता है—जब एक पीढ़ी अपने हिस्से का दर्द अगली पीढ़ी को विरासत में देने से इनकार कर देती है।
विशाल चन्द @reading_owl.3
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लेखक की टिप्पणी
यह कहानी मेरे द्वारा वर्ष 2021 में लिखे गए ब्लॉग लेख "लड़की, विवाह और सहमति" से प्रेरित है। उस समय उठाए गए सामाजिक प्रश्नों को इस कहानी के माध्यम से एक नए साहित्यिक रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है। कहानी के पात्र और घटनाएँ काल्पनिक हैं, किन्तु इसके सामाजिक संदर्भ वास्तविक अनुभवों और अवलोकनों से जुड़े हैं।
यदि यह कहानी पाठकों को विवाह में सहमति, शिक्षा और बेटियों के सपनों पर एक बार फिर सोचने के लिए प्रेरित करे, तो इसका उद्देश्य सार्थक होगा।
विशाल चन्द जी समाजशास्त्र के शोधार्थी, पाठक और संवेदनशील शिक्षार्थी हैं। नवीन ज्ञान अर्जन और सतत सीखना आपके व्यक्तित्व का अभिन्न हिस्सा है। पुस्तकों का पठन और संग्रहण आपको विशेष प्रिय है।
आपके भीतर एक घुमक्कड़ चेतना भी सक्रिय है, जो आपको नए लोगों, स्थानों और अनुभवों से जोड़ती रहती है। बागवानी आपके लिए प्रकृति से संवाद का माध्यम है।
आप समाज को अपने स्वतंत्र दृष्टिकोण से देखने और विभिन्न समूहों के साथ मिलकर सामाजिक दायित्वों के निर्वहन को निरंतर प्रयासरत रहते हैं।
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बीते शनिवार (27-06-2026) हम सबके सामूहिक प्रयास और वरिष्ठजनों के प्रोत्साहन से सत्रहवीं साप्ताहिक पुस्तक परिचर्चा का ऑनलाइन आयोजन सफल रहा, जिसमें निम्नलिखित पुस्तकों/रचनाओं/विषयों पर सार्थक चर्चा हुयी:


केदारनाथ और पर्यटन, जरूरत इस बात पर सोचने की कि अब आस्था ही खींच रही या फिर रील संस्कृति भी
तेनजिंग से पहले के अभियानों का इतिहास, ताकि हम बेहतर समझ सकें एवरेस्ट पर फतेह को
पीपल बाबा को नानी द्वारा बचपन में ही प्रकृति-प्रेमी बना दिया (सीधे नहीं परोक्ष रूप से)
उत्तर पूर्व के हमारे देशवासियों के साथ जो भी भेदभाव की खबरें हमे सुनने को मिलती हैं इसका कारण है उनके बारे में हमारी जानकारी कम होना, क्योंकि इन पर आधारित साहित्यिक पुस्तकों की संख्या अपेक्षाकृत बहुत कम है|
श्री प्रकाश मिश्र के और भी उपन्यास हैं उत्तर पूर्वी भारत की जनजातियों पर, जिन्हे जरूर पढ़ा जाना चाहिए ताकि हम खुद से अलग एक समाज के बारे में जान सकें ताकि उनके साथ सहज हो सकें और जान सकें कि क्यों किसी के लिए अपनी पहचान बनाए रखने का संघर्ष, उसके जीवन एक एक अंग होता है|
एक बात जो जरूरी है वह है कि ऐसा साहित्य केवल इच्छा की दृष्टि से नहीं, एक जरूरत समझकर पढ़ा जाना चाहिए ताकि आपसी तालमेल, सहजता, एकता और सम्मान सुनिश्चित किया जा सके|

शैक्षिक दखल पत्रिका का प्रकाशन शैक्षिक दखल समिति द्वारा हर छमाही किया जाता है, जोकि शैक्षिक सरोकारों को समर्पित शिक्षकों तथा नागरिकों का साझा मंच है|
पुस्तक परिचर्चा में किसी भी पुस्तक पर बोलने के लिए किताब खत्म होने का इंतज़ार न करें, जितना पढ़ा है उसका संदर्भ देकर भी अपनी बात रखी जा सकता है|
कोई लेख पढ़ा है तो उस पर भी अपनी बात/अवलोकन साझा किया जा सकता है|
लाल बहादुर वर्मा का आदिवासी साहित्य हमे इस तबके को बेहतर समझने और इनके साथ संवेदित होने में मदद कर सकता है|

सोपान जोशी जी की किताब हम सबके के लिए जरूरी होनी चाहिए ताकि हम समझ सकें पर्यावरण और समाज के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी को,
ह्वेल का मल, अन्य समुद्री प्रजातियों के लिए पोषक तत्व का काम करता है|
ये समय है कि हम विचार करें और अध्ययन भी कि पहाड़ों पर बढ़ते सैलानियों का वहाँ की परिस्थितिकी पर क्या प्रभाव पड़ रहा है|
शिक्षकों को चाहिए कि यदि उन्हे विद्यार्थियों के किसी प्रश्न का जवाब नहीं आता तो उन्हें डांटने के बजाय (ऐसे प्रकरण सुनने को मिलते हैं) उनसे उस पर चर्चा कि जाए और अगर जरूरत पड़े तो समय भी मांगा जाये लेकिन उन्हे डांटकर प्रश्न पूछने के लिए हतोत्साहित न किया जाए, तब ही हम उनके अंदर की जिज्ञासा और सृजनशीलता को सही पोषण दे पाएंगे|
अगर किसी छात्र या छात्रा कि गणित या और कोई विषय कमजोर है और उसके द्वारा उस विषय को आगे चलकर छोड़ दिया जाता है तो कोई जरूरी नहीं कि इसमें उस विद्यार्थी की ही अक्षमता है, बहुत संभावना है कि उस विषय के अध्यापक उतने सक्षम न मिलें हों|
उक्त परिचर्चा में निम्नलिखित पुस्तकसाथी शामिल रहे:
आदरणीय महेश पुनेठा सर, हर्षा भण्डारी मैम,प्रियंका जोशी मैम, विशाल दा (विशाल चंद जी), कर्ण भाईजी,अंशुल मैम, कृष्णा जायसवाल, प्रिया कश्यप, प्रिया जायसवाल, प्रीति जायसवाल, शुभम गुप्ता, और लवकुश कुमार
परिचर्चा का कुशल संचालन, लिटरेरी लैंड, कानपुर के हमारे पुस्तक साथी कर्ण भाई जी ने किया, जोकि परिचर्चा को रोचक और यादगार बनाने वाला रहा|

पुस्तक परिचर्चा मे शामिल सभी पुस्तक साथियों (Bookmates) ने पुस्तक परिचर्चा मे शामिल होकर/अभिव्यक्ति/सराहना/भागीदारी के माध्यम से इस पहल को पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा देने में, मानवीय मूल्यों के पोषण में, अपनी बात को बेहिचक रखने में महत्वपूर्ण माना एवं एक दूसरे के प्रति आभार व्यक्त किया ताकि इस जरूरी कार्य की नियमितता बनी रहे एवं समाज मे एक सकारात्मक बदलाव में अपना विनम्र योगदान सुनिश्चित किया जा सके |

धन्यवाद ज्ञापन के साथ परिचर्चा को अगली परिचर्चा तक के लिए विराम दिया गया|
इस आशा के साथ कि यह रिपोर्ट पाठकों को पुस्तक परिचर्चा को समझने और उसमे शामिल होने के लिए प्रेरित करेगी |
अगली परिचर्चा 04 जुलाई (शनिवार रात 09:00 बजे) को होगी, शामिल होकर पढ़ने-लिखने की संस्कृति पर काम करने में अपना योगदान सुनिश्चित करें और पुस्तक परिचर्चा से साहित्यिक लाभ लेते हुये अपने दिन की सार्थकता में एक और आयाम जोड़ें|
धन्यवाद
-लवकुश कुमार
तुम बनाओ अपने महल अटारी,
मुझे अपने घोंसले में रहने दो,
मत रोको मुझको अब पिंजरे में,
मुझे गगन में उड़ने दो।
जानती हूँ तुम मुझे पिंजरा भी सोने का दोगे,
चुगने के लिए मोती से दाने भी दोगे,
पर जानती हूँ ये भी कि,
फिर तुम मुझे उड़ने भी नहीं दोगे,
मुझसे कीमत वसूलोगे,
मेरे पंखों को कुतरोगे।
इसीलिए मैं तिनका-तिनका जोड़कर बनाऊँगी अपना घोंसला,
चुगने के लिए दाना भी खुद ले आऊँगी,
लड़ूगी चील-बाज अन्य पक्षियों से अकेले,
कभी हार जाऊँगी, कभी संघर्ष कर पार पाऊँगी,
है सब मंजूर मुझे,
पर मैं तुम्हारे पिंजरे में नहीं आऊँगी।
- सौम्या गुप्ता
बाराबंकी, उत्तर प्रदेश
सौम्या जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं |
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शुभकामनाएं
क्या आपके साथ कभी ऐसा हुआ है क्या कि आप अपना पक्ष रखना चाहते/चाहती हों और सामने वाले इंसान ने बात करना ही बंद कर दिया हो, संचार के साधनों को ही बंद कर दिया हो, आईये पड़ताल का विनम्र प्रयास करते हैं:
जैसा आपके साथ हुआ ऐसा ही काफी लोगों के साथ हुआ है क्योंकि समय के साथ कुछ भ्रम लोगों के मन में अपनी पैठ बना चुके हैं, कई लोगों से चर्चा करने पर कुछ बातें सामने आई हैं जैसे कि -
अतः यह प्रयास हो कि हम पूर्वाग्रहों के दबाव में आये बिना सहजता से सच बोलें और सामने वाले विचार करने, अपने बात रखने का अवसर दें और संवाद का माहौल बनाएं|
- लवकुश कुमार
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शुभकामनाएं
समर्पण गलत नहीं होता
पर सच है यह कि,
यह भाव सबके लिए
लाना भी नहीं होता।
हो समर्पण सत्य के प्रति
सत्यवादी तुम बनोगे,
हो समर्पण कृष्ण के प्रति
तो कृष्ण जैसे तुम बनोगे।
तुम बनोगे कंस या कृष्ण
यह भी होगा इसी से निश्चित,
कि समर्पण किसके प्रति है?
कर्ण भी तो था समर्पित
पर समर्पण असत्य के प्रति,
दानवीर था वो ऐसा कि
जैसा न कोई और जगत् में,
कुरु वंश भी ठना हुआ था
पर ठना था अन्याय के प्रति,
नारायणी सेना थी पाई
फिर भी हारे महाभारत में,
आज भी वो निंदनीय हैं
क्योंकि वो थे समर्पित गलत के प्रति।
हनुमान का भी था समर्पण
पर समर्पण राम के प्रति,
अर्जुन भी तो था समर्पित
पर समर्पण कृष्ण के प्रति,
दोनों की होती प्रशंसा
दोनों ही हैं पूजनीय,
क्योंकि ये थे समर्पित सत्य के प्रति
कोई पूजनीय होगा
या कि होगी सिर्फ निंदा,
इसका निर्धारण होगा इससे
कि समर्पण है उनका किसके प्रति।
- सौम्या गुप्ता
बाराबंकी, उत्तर प्रदेश
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शुभकामनाएं
प्रोफेसर की डायरी एक जरूरी पढ़ी जाने योग्य पुस्तक है।
यह डायरी एक प्रोफेसर का अनुभव और आप बीती मात्र नहीं बल्कि शिक्षक वर्ग की व्यथा कथा भी है।
एक ईमानदारी के साथ लिखा गया अपना निजी अनुभव,जो उन्होंने महसूस किया है। वह लिखते है कि इस दौर में बोलने की कीमत चुकानी होती है। यह एक तथ्य है कि सवालों से घबराने वाली सत्ताएं चाहती है कि सवाल पैदा करने वाली जगहों को ही कमजोर कर दिया जाए। इसलिए ऐसी सत्ता की कोशिश रहती है कि शिक्षक हमेशा डर में रहें क्योंकि एक डरा हुआ शिक्षक अपनी कक्षाओं में रीढ़ विहीन विद्यार्थी तैयार करता है, जो समाज में जाकर मुर्दा नागारिक में तब्दील हो जाता है।"
यह पंक्ति ऐसी सच्चाई है, जो कहीं भीतर तक सोचने को मजबूर कर देती है। यह पुस्तक बहुत से भावावेगों से भर देती है। गुस्सा उस सिस्टम के खिलाफ जो छात्रों की उम्मीदों का गला घोंटने में लगा है। इसके साथ ही पुस्तक हमें प्रश्न पूछने का साहस, लड़ने का साहस, बोलने का साहस देती है।
यह डायरी मन को बहुत विचलित कर देती है। हमारी उच्च शिक्षा में सीनियर शिक्षकों द्वारा अपने जूनियरों से किस तरह बर्ताव किया जाता है, इसका उदाहरण है वह "लाइन" जब वहीं काम करने वाले कर्मचारी से पूछा जाता है कि कमरे में कौन है तो वह जवाब देता है कि कमरे में 2आदमी है और 3 एडहॉक है।यह पक्ति अपने आप में बहुत कुछ कह देती है।
प्रोफेसर लक्ष्मण को दिल्ली विश्वविद्याल जैसे प्रतिष्ठित विश्वविद्याल में 14साल पढ़ाने के बाद एक दिन उन्हें बताया जाता है कि अब आपकी जरूरत नहीं है। उन्हें अंदेशा था कि उन्हें बोलने की कीमत चुकानी होगी,उनके बहुत से सीनियरों ने उन्हें पहले ही आगाह कर दिया था कि आप ऐसे परमानेंट नहीं हो पाएंगें।
बार बार उन्हें ही नहीं उनकी तरह बहुत से शिक्षकों को प्रताड़ित किया जाता है। उन्हें 3 महीने के अस्थाई समय के लिए रखा जाता है, अगली बार उन्हें नियुक्ति मिलेगी या नहीं यह उनके द्वारा की गई या ना की गई जी हुजूरी पर निर्भर करता है।
वह शिक्षा जिससे उम्मीद की जाती है कि वह समाज में सभी के लिए समानता का वातावरण तैयार करेगी, सभी को समान अवसर देगीं। लेकिन यह संस्थान भी जातिवाद भाई-भतीजावाद, सामंतवाद का केंद्र बनते जा रहे हैं|
यह पुस्तक रोहित वेमुला जैसे तमाम छात्रों की कहानी है जो सिस्टम की भेंट चढ़ गए। जिनके सामने ऐसी परिस्थितियां तैयार करी गई, जिससे वह पूरी तरह टूट गए और अपनी लड़ाई अधूरी छोड़ गए।
अंत में पुस्तक में उनके द्वारा लिखी लाइन " मेरे लहजे में जी - हुजूर न था, और मेरा कोई कसूर न था।उनकी हिम्मत साहस और दृढ़संकल्प को दिखाता है। उनके पास परमानेंट होने के बहुत अवसर थे,लेकिन उन्होंने अपनी ईमानदारी को चुना और अंत तक लड़ते रहें। यह पुस्तक आज मूक हो चुकी आवाजों को स्वर देती है।उस साहस को जगाती है,जो भीतर कहीं दब गया है।
सच ही लिखते है "आज हमारे देश की शिक्षा व्यवस्था वेंटिलेटर पर है, जिसे अस्थाई शिक्षकों के जरिए ऑक्सीजन दिया जा रहा है।"
एक बहुत जरूरी और खोखली होती शिक्षा व्यवस्था की सच्चाई को सामने रखती पुस्तक, जो हमें भी अपनी आवाज बुलंद करने का साहस देती है, और हर हाल में अपने अधिकारों के लिए बोलने और लड़ने की हिम्मत देती है।
- शीतल भट्ट
शीतल जी, उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के एक दूरस्थ पहाड़ी गांव भट्टयूडा से आती हैं। आपने अपना परास्नातक, भूगोल विषय में लक्ष्मण सिंह मेहर कैंपस पिथौरागढ़ से किया है। आप सामाजिक खांचों में फिट नहीं होना चाहती, इसे इस परिप्रेक्ष्य मे देखें कि आप हर वह रिवाज नकारना चाहती हैं जो आपको एक लड़की होने का हवाला देकर कम आंकते हो।
किताबें संवेदनशील ,सामाजिक ,निर्भय और वैज्ञानिक चेतना देती हैं, अतः किताबें पढ़ना, नया जानते रहकर अपनी समझ को विस्तार देते रहना आपकी आदत मे शुमार है। आपको फिल्में देखना पसंद है, और घूमना भी। भूगोल आपको अपनी ओर खींचती है साथ ही नए और रचनात्मक लोगों के साथ बात करने और उनके बारे में जानने को उत्सुक रहती हैं |
माँ-देवी, नहीं इंसान बने,
चाहती हूँ माँ के अक्षय पात्र में भी कम पड़े,
माँ अब पहले-सी भूखी न रहे।
देवी बोल - बोल कर जो ली गई है बलि उससे,
अब उसे उसका हिसाब मिले।
कभी त्याग की मूरत, कभी देवी-सी सूरत,
कहकर कराये गए है त्याग उससे,
उसे उन त्यागों का प्रतिफल मिले।
तुम तो चुका भी नहीं पाओगे,
कर्ज की इस गठरी का क्या हिसाब लगा पाओगे?
जब चुका सकते नहीं तो कर्ज इतना क्यों लिया?
औरत को माना देवी और दासी बना दिया।
कहा ज्ञान की देवी पर पुस्तक भी न छूने दी,
बोला तुमने है माँ लक्ष्मी पर रोटी भी न कमाने दी,
बोला तुमने जननी है पर क्या केवल बच्चों की?
कब दोगे तुम आजादी उसको, स्व-अस्तित्व के सृजन की।
-सौम्या गुप्ता
बाराबंकी, उत्तर प्रदेश
सौम्या जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं |
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शुभकामनाएं
यह लेख लिख रहा हूँ ताकि पाठक यह बेहतर समझ सकें कि मेरी लेखनयात्रा में प्रोत्साहन के विभिन्न रूपों या आयामों क्या महत्व है|
इस तरह की यात्रा में जहां हम कोई बात दूसरों तक पहुंचा रहे हों, यह बात बहुत मायने रखती है कि लेखक जो बात कह रहा है या जो सवाल उठा रहा है और पाठकों के जिस वर्ग को संबोधित कर रहा हो, उन तक वो बातें और सवाल पहुंचे, वह भी अपने सही अर्थों में|
इस एक उद्देश्य की दृष्टि से कुछ बातें बहुत महत्वपूर्ण हो जाती हैं:
पहली है फीडबैक या प्रतिक्रिया - इससे हमे पता चलता है कि लोगों को हमारे लेख कितने उपयोगी लगे और उनका अर्थ किस तरह लिया गया, इसका उपयोग लेखनी मे सुधार के लिए किया जा सकता है
दूसरी बात है समर्थन या प्रोत्साहन जिससे पता चलता है कि किसी लेख या पुस्तक के अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचकर उनको लाभन्वित कर सकें और लेखन को सार्थकता दे सकने की संभावना क्या है|
एक बात और, जब आप गैर साहित्यिक पृष्ठभूमि से हों और आपके साथ वाले अपनी नियमित ड्यूटी के बाद अन्य शौक में लगे हों या किसी मनोरंजन में, तो उस वक़्त लिखते रहने पर साथ वालों से उस स्तर का प्रोत्साहन नहीं मिल पाता और कभी कभी लगता है कि कहीं लिखना निरर्थक तो नहीं!
इस बीच यदि कोई दोस्त यह कह दे कि "बढ़िया कर रहे हो भाई, इससे जरुर कई लोगों को रास्ता मिलेगा और कॉन्फिडेंस भी", तब जो संतुष्टि मिलती है उससे आने वाले कई महीने तक लिखते रहना और ज्यादा आसान हो जाता है, माने एक निरंतरता आ जाती है, अन्यथा लेखन के मूल में तो कुछ जरूरी बातें और अनुभव पहुंचाना है इसीलिए काम तो होगा ही, लेकिन साथ मे यदि प्रोत्साहन मिल जाए तो निरंतरता और बल मिलता है लेखन में|
"बढ़िया कर रहे हो भाई, इससे जरुर कई लोगों को रास्ता मिलेगा और कॉन्फिडेंस भी", यही बोल थे राजेश भाई के कुछ दिन पहले मेरी पुस्तक पर बातचीत के दौरान, और यह भी कहा कि जैसे-जैसे यह पुस्तक और लोगों के बीच पहुंचेगी इस पर फीडबैक आना शुरू होगा|
प्रोत्साहन के साथ सहयोग भी मिल जाए तो काम की तीव्रता और स्केल दोनों बढ़ जाते हैं, बच्चों में बाल जिज्ञासा की निशुल्क प्रतियाँ वितरित करने के वक़्त भी दोस्तों ने कई तरह से सहयोग किया|
कभी कभी चीज़ों को वक़्त पर करने के लिए वित्तीय संसाधन उधार लेने की आवश्यकता आ बनती है, ऐसी अवस्था में किसी ऐसे काम के लिए पैसे उधार देना, जिससे कोई आय नहीं होनी, हर किसी के विवेक में नहीं होता है, लेकिन राजेश भाई जैसे कुछ दोस्तों ने इस नेक कार्य के ससमय पूरा होने के निमित्त इस मौके पर साथ खड़े रहे, यह साथ आत्मविश्वास को बढाता है कि हाँ मैं जिस काम में लगा हूँ, वह वाकई लोकहित में है| और यह बढ़ा हुआ आत्मविश्वास और लोगों का हम पर विश्वास हमसे थकान में भी काम करवा लेता है वो भी ख़ुशी ख़ुशी और रचनात्मकता के साथ|
अपने चॉइस ऐसी जरुर रखें कि ऐसे साथी सबको मिलें, जो केवल तारीफ ही ना करें, हर संभव और उचित सहयोग भी करें|
राजेश भाई का उदाहरण मन में रहेगा, जैसे एक मकान की नींव|
शुभेच्छा
लवकुश कुमार
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